भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 |
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272
प्रयान्तमनुयाति स्म श्रीमती तं महाद्युतिम् । भास्वन्तमिव रुद्धान्धतमसंभासुरा प्रभा ॥२७२॥
अतिशय कांति का धारक वज्रजंघ आगे-आगे जा रहा था और श्रीमती उसके पीछे-पीछे जा रही थी । जैसे कि अंधकार को नष्ट करनेवाले सूर्य के पीछे-पीछे उसकी दैदीप्यमान प्रभा जाती है ।।272।।
The exceedingly radiant Vajrajangha was walking ahead, and Shri Mati was following him, just like the radiant light of the sun follows the sun, dispelling darkness. ||272||
श्लोक ( Shlok ) 273
“पूजाविभूर्ति महतीं पुरस्कृत्य जिनालयम् । प्रापदुतुङ्गकूटाग्रं स सुमेरुमिवोच्छितम् ॥२७३॥
वह वज्रजंघ पूजा की बड़ी भारी सामग्री साथ लेकर जिनमंदिर पहुँचा । वह मंदिर मेरु पर्वत के समान ऊँचा था, क्योंकि उसके शिखर भी अत्यंत ऊँचें थे ।।273।।
Vajrajangha, carrying a large amount of offerings for the worship, arrived at the Jain temple. The temple was as tall as Mount Meru, as its spires were also exceedingly high. ||273||
श्लोक ( Shlok ) 274
स तं प्रदक्षिणीकुर्वन् ‘समानिर्विवभौ नृपः । मेरुमर्क इव श्रीमान् महादीप्त्या परिष्कृतः ॥२७४॥
श्रीमती के साथ-साथ चैत्यालय की प्रदक्षिणा देता हुआ वज्रजंघ ऐसा शोभायमान हो रहा था जैसा कि महाकांति से युक्त सूर्य मेरु पर्वत की प्रदक्षिणा देता हुआ शोभायमान होता है ।।274।।
Vajrajangha, along with Shri Mata, performing the circumambulation of the Chaityalaya, was shining so brilliantly, just like the sun, endowed with great radiance, beautifully performing the circumambulation of Mount Meru. ||274||
श्लोक ( Shlok ) 275 – 276
कृतेर्यांद्धिरिशुद्धद्धिः प्रविश्य जिनमन्दिरम् । तत्रापश्यदृषीन् दीप्ततपसः कृतवन्दनः ॥२७५॥
ततो गन्धकुटीमध्ये जिनेन्द्रार्चा हिरण्मयीम् । पूजयामास गम्धाद्यैरभिषेकपुरस्सरम् ॥२७६॥
प्रदक्षिणा के बाद उसने ईर्यापथशुद्धि की अर्थात् मार्ग चलते समय होनेवाली शारीरिक अशुद्धता को दूर किया तथा प्रमादवश होने वाली जीवहिंसा को दूर करने के लिए प्रायश्चित्त आदि किया । अनंतर, अनेक विभूतियों को धारण करने वाले जिनमंदिर के भीतर प्रवेश कर वहाँ महातपस्वी मुनियों के दर्शन किये और उनकी वंदना की । फिर गंधकुटी के मध्य में विराजमान जिनेंद्रदेव की सुवर्णमयी प्रतिमा की अभिषेकपूर्वक चंदन आदि द्रव्यों से पूजा की ।।275-276।।
After the circumambulation, he purified his path, removing any physical impurities that might have occurred while walking, and performed atonement for any inadvertent harm to living beings. Then, he entered the Jain temple, adorned with various divine qualities, where he paid his respects to the great ascetic monks. Afterward, he worshipped the golden idol of Lord Jinendra, seated in the center of the Gandhakuti, with anointing rituals and offerings of sandalwood and other substances. ||275-276||
श्लोक ( Shlok ) 277
कृतार्जनस्ततः स्तोतुं प्रारंभेऽसौ महामतिः । अर्थ्याभिः स्तुतिभिः साक्षात्कृत्य स्तुत्यं जिनेश्वरम् ।।२७७॥
पूजा करने के बाद उस महाबुद्धिमान् वज्रजंघ ने स्तुति करने के योग्य जिनेंद्रदेव को साक्षात् कर (प्रतिमा को साक्षात् जिनेंद्रदेव मानकर) उत्तम अर्थों से भरे हुए स्तोत्रों से उनकी स्तुति करना प्रारंभ किया ।।277।।
After performing the worship, the highly intelligent Vajrajangh, seeing the idol as the very presence of Lord Jinendra, began to praise Him with excellent hymns, filled with profound meanings, offering his sincere reverence to the Lord. ||277||
श्लोक ( Shlok ) 278
नमो जिनेशिने तुभ्यमनभ्यस्तदुराधये । त्वामद्याराधयामीश कर्मशत्रुबिभित्सया॥ २७८॥
हे देव ! आप कर्मरूपी शत्रुओं को जीतने वालों में सर्वश्रेष्ठ हैं, और मानसिक व्यथाओं से रहित हैं इसलिए आपको नमस्कार हो । हे ईश, आज मैं कर्मरूपी शत्रुओं का नाश करने की इच्छा से आपकी आराधना करता हूँ ।।278।।
O Lord! You are the greatest among those who conquer the enemies in the form of karma, and are free from mental afflictions. Therefore, I offer my salutations to You. O God, today I worship You with the intention of destroying the enemies in the form of karma. ||278||
श्लोक ( Shlok ) 279
अनन्तास्त्वद्गुणाः स्तोतुमशक्या गणपैरपि । भक्त्या तु प्रस्तुवे स्तोत्रं भक्तिः श्रेयोऽनुबन्धिनी ॥ २७९॥
हे देव, आपके अनंत गुणों की स्तुति स्वयं गणधरदेव भी नहीं कर सकते तथापि मैं भक्तिवश आपकी स्तुति प्रारंभ करता हूँ क्योंकि भक्ति ही कल्याण करने वाली है ।।279।।
O Lord, even the revered Gandharva gods cannot fully praise Your infinite virtues. Nevertheless, I begin to praise You out of devotion, for it is devotion that leads to true welfare. ||279||
श्लोक ( Shlok ) 280
त्वद्भक्तः सुखमभ्येतिलक्ष्मी स्त्वद्भक्तमश्नुते। त्वद्भक्तिर्भुक्तये पुंसां मुक्तये या स्थवीयसी ॥२८०॥
हे प्रभो, आपका भक्त सदा सुखी रहता है, लक्ष्मी भी आपके भक्त पुरुष के समीप ही जाती है आप में अत्यंत स्थिर भक्ति स्वर्गादि के भोग प्रदान करती है और अंत में मोक्ष भी प्राप्त कराती है ।।280।।
O Lord, Your devotee is always happy. Lakshmi herself approaches the devotee, and Your unwavering devotion grants the pleasures of heaven and beyond, ultimately leading to liberation. ||280||
श्लोक ( Shlok ) 281
अतो भजन्ति स्त्वां मनोवाक्कायशुद्धिभिः । फलार्थिभिर्भवान् सेव्योव्यक्तं कल्पतरूयते ॥ २८१॥
इसलिए ही भव्य जीव शुद्ध मन, वचन, काय से आपकी स्तुति करते हैं । हे देव, फल चाहने वाले जो पुरुष आपकी सेवा करते हैं उनके लिए आप स्पष्ट रूप से कल्पवृक्ष के समान आचरण करते हैं अर्थात् मन वांछित फल देते हैं ।।281।।
Therefore, the noble souls, with pure mind, speech, and body, praise You. O Lord, those who serve You with desires for fruits, You, like the Kalpavriksha (wish-fulfilling tree), fulfill their wishes and grant them the desired results. ||281||
श्लोक 282 से 291
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 |
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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