भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 चैत्यालय का वर्णन और पंडिता की परीक्षा
चैत्यालय मुनियों के स्तोत्र, पताकाओं, धूम, और ताराओं से सुशोभित था। वह महाकाव्य और हाथी समान था। पंडिता ने जिनेंद्र वंदना की और चित्रशाला में चित्रपट फैलाकर लोगों की परीक्षा शुरू की। वह गंभीर भाव से उत्तर देती रही।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
दिवामन्यां निशां हर्तुं क्षमैर्मणिविचित्रितैः । तुङ्गः शृङ्गेः स्म योभाति दिवमुन्मीलयन्निव ॥१८२॥
रात को भी दिन बनाने में समर्थ और मणियों से चित्र-विचित्र रहने वाले अपने ऊँचे-ऊँचे शिखरों से वह मंदिर ऐसा मालूम होता था मानो स्वर्ग का उन्मीलन ही कर रहा है―स्वर्ग को भी प्रकाशित कर रहा हो ।।182।।
That temple, with its lofty spires, which were capable of turning night into day and adorned with various patterns made of jewels, seemed as if it were unveiling heaven itself—illuminating even the celestial realms. ||182||
श्लोक ( Shlok ) 183
पठद्भिरनिशं साधुवृन्दैरामन्द्रनिःस्वनम् । प्रजल्पन्निव यो भव्यै र्व्यभाव्यत समागतैः ॥१८३॥
उस मंदिर में निरंतर अनेक मुनियों के समूह गंभीर शब्दों से स्तोत्रादिक का पाठ करते रहते थे जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वह आये हुए भव्य जीवों के साथ संभाषण ही कर रहा दो ।।183।।
In that temple, a continuous group of monks would chant hymns and other sacred texts in deep voices, creating the impression that they were engaging in a conversation with the divine souls that had arrived. ||183||
श्लोक ( Shlok ) 184
यस्य कूटाग्रसंसक्ताः केतऽवोनिलघट्टिताः । विबभुर्वन्दनाभत्तयै व्याहृयन्त इवामरान् ॥ १८४॥
उसकी शिखरों के अग्रभाग पर लगी हुई तथा वायु के द्वारा हिलती हुई पताकाएँ ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो वंदना भक्ति आदि के लिए देवों को ही बुला रही हों ।।184।।
The flags, fluttering in the wind and placed at the tips of its spires, were so beautifully adorned that it seemed as though they were inviting the gods themselves for worship, reverence, and other divine rituals. ||184||
श्लोक ( Shlok ) 185
“यद्वातायननिर्याता धूपधूमाश्चकासिरे । स्वर्गस्योपायनीकर्त्तु ‘निर्भिमाणा धनानिव ॥१८५॥
उस मंदिर के झरोखों से निकलते हुए धूम के धूम ऐसे मालूम होते थे मानो स्वर्ग को भेंट देने के लिए नवीन मेघों को ही बना रहे हों ।।185।।
The smoke emerging from the windows of that temple seemed to form clouds, as if they were being created to offer a tribute to heaven itself. ||185||
श्लोक ( Shlok ) 186
यस्य कूटतटालग्नाः तारास्तरलरोचिषः । पुष्पोपहारसंमोहे माँतन्वन्नभोजुषाम् ॥१८६॥
उस मंदिर के शिखरों के चारों ओर जो चंचल किरणों के धारक तारागण चमक रहे थे वे ऊपर आकाश में स्थित रहने वाले देवों को पुष्पोपहार की भ्रांति उत्पन्न किया करते थे अर्थात देव लोग यह समझते थे कि कहीं शिखर पर किसी ने फूलों का उपहार तो नहीं चढ़ाया है ।।186।।
The twinkling stars, holders of restless rays, around the spires of that temple, would create the illusion of offering floral tributes to the gods residing in the heavens. The gods would often wonder if someone had offered flowers atop the spires. ||186||
श्लोक ( Shlok ) 187
“सदवृत्तसंगता श्चित्रसंदर्भ रुचिराकृतिः । यः सु शब्दो महान्मह्यां काव्यबन्ध इवाबभौ ॥ १८७॥
वह चैत्यालय सद्वृत्तसंगत-सम्यक्चारित्र के धारक मुनियों से सहित था, अनेक चित्रों के समूह से शोभायमान था, और स्तोत्रपाठ आदि के शब्दों से सहित था इसलिए किसी महाकाव्य के समान सुशोभित हो रहा था क्योंकि महाकाव्य भी, सद्वृत्त-वसंततिलक आदि सुंदर-सुंदर छंदों से सहित होता है, मुरज कमल छत्र हार आदि चित्र श्लोकों से मनोहर होता है और उत्तम-उत्तम शब्दों से सहित होता है ।।187।।
That shrine, adorned with the presence of monks who embodied right conduct and perfect character, was beautifully embellished with numerous images and filled with the sounds of hymn recitations and other sacred chants. It appeared as magnificent as a great epic, which is also adorned with beautiful verses such as those of right conduct, with delightful images like the conch, lotus, umbrella, and garlands, and with the finest words. ||187||
श्लोक ( Shlok ) 188
सपताको रणदघण्टो यो दृढस्तम्भसंभृतः । व्यभाद् गम्भीरनिर्घोषैः सवृंहित इवेभराट् ॥१८८॥
उस चैत्यालय पर पताकाएँ फहरा रही थीं, भीतर बजते हुए घंटे लटक रहे थे, स्तोत्र आदि के पढ़ने से गंभीर शब्द हो रहा था, और स्वयं अनेक मजबूत खंभों से स्थिर था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो कोई बड़ा हाथी ही हो क्योंकि हाथी पर भी पताका फहराती है, उसके गले में मनोहर शब्द करता हुआ घंटा बँधा रहता है । वह स्वयं गंभीर गर्जना के शब्द से सहित होता है तथा मजबूत खंभों से बँधा रहने के कारण स्थिर होता है ।।188।।
Flags were fluttering on that shrine, and bells were hanging inside, ringing with sound. The chanting of hymns and other prayers created a deep resonance, and it was supported by numerous sturdy pillars. Because of this, it seemed as if a great elephant stood there, for an elephant also carries flags, has a beautiful bell around its neck that produces a pleasant sound, emits a deep roar, and remains steady due to being bound to strong pillars. ||188||
श्लोक ( Shlok ) 189
पठतां पुण्यनिर्घोषैः वन्दारूणां च निःस्वनैः । यः संदधावकालेऽपि मदारम्भ शिखण्डिषु ॥१८९॥
वह चैत्यालय पाठ करने वाले मनुष्यों के पवित्र शब्दों तथा वंदना करने वाले मनुष्यों की जय-जय ध्वनि से असमय में ही समूहों? को मदोन्मत्त बना देता था अर्थात् मंदिर में होने वाले शब्द को मेघ का शब्द समझकर मयूर वर्षा के बिना ही मदोन्मत्त हो जाते थे ।।189।।
That shrine, filled with the sacred words of those who read sacred texts and the victorious chants of those who offered worship, could intoxicate groups of people even at untimely moments. In other words, the sounds from the temple, mistaken for the thunder of clouds, would make the peacocks intoxicated with joy, even without the arrival of rain. ||189||
श्लोक ( Shlok ) 190
यस्तुङ्गशिखरः शश्वच्चारणैः कृतसंस्तवः” । “विद्याधरैः समासेव्यो मन्दराद्रिरिवाद्युतत् ॥१९०॥
वह चैत्यालय अत्यंत ऊँचे-ऊँचे शिखरों से सहित था, अनेक चारण (मागध स्तुतिपाठक) सब उसकी स्तुति किया करते थे और अनेक विद्याधर (परमागम के जानने वाले) उसको सेवा करते थे इसलिए ऐसा शोभायमान होता था मानो मेरु पर्वत ही हो क्योंकि मेरु पर्वत भी अत्यंत ऊँचे शिखरों से सहित है, अनेक चारण (ऋद्धि के धारक मुनिजन) उसकी स्तुति करते रहते हैं तथा अनेक विद्याधर उसकी सेवा करते हैं ।।190।।
The shrine was adorned with extremely tall spires, and many bards (who recited praises) would sing its glory, while numerous celestial beings (those who knew the highest teachings) served it. Because of this, it appeared as magnificent as Mount Meru, for Mount Meru, too, is adorned with towering peaks, is praised by many bards (monks endowed with divine powers), and is served by numerous celestial beings. ||190||
श्लोक ( Shlok ) 191
तत्र पट्टकशालायां पण्डिता कृतवन्दना । प्रसार्य पट्टकं तस्थौ ‘परिचिक्षिपुरागतान् ॥१९१
इत्यादि वर्णनयुक्त उस चैत्यालय में जाकर पंडिता धाय ने पहले जिनेंद्र देव की वंदना की फिर वह वहाँ की चित्रशाला में अपना चित्रपट फैलाकर आये हुए लोगों की परीक्षा करने की इच्छा से बैठ गयी ।।191।।
Having entered that shrine, as described above, the learned one first offered her worship to Lord Jinedra. Then, spreading the pictorial representation in the gallery, she sat down with the intention of testing the visitors. ||191||
श्लोक 202 से 208
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
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