भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173
श्लोक 174 से 181 वज्रदंत और वज्रबाहु का मिलन
पंडिता ने श्रीमती को सुखी किया, पर वह वज्रजंघ की प्राप्ति तक निराकुल न हुई। वज्रदंत वज्रबाहु को ले आए। दोनों ने प्रीति से कुशल पूछी। वज्रदंत ने अतिथियों का सत्कार किया, जिससे वज्रबाहु प्रसन्न हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 174 to 181
श्लोक ( Shlok ) 174
लताङ्गि ललिताङ्गस्य विविक्ते तस्य मानसे । रमस्व राजहंसीव लताङ्गमितवत्सरान् ॥१७४||
हे लताङ्गि (लताके समान कृश अंगोंको धारण करनेवाली) जिस प्रकार पवित्र मानस-सरोवरमें राजहंसी क्रीडा किया करती है उसी प्रकार तू भी ललिताङ्ग (वाजंघ) के पवित्र और एकान्त मनमें अनेक वर्षों तक क्रीडा कर ॥१७४॥
“O slender one, just as a royal swan plays in the sacred Manasarovar, similarly, you too, with your graceful form, may play in the pure and solitary heart of Vajrajangha for many years.” ( 174)
श्लोक ( Shlok ) 175 –176
युवयोरुचितं योगं कृत्वा यातु कृतार्थताम् । विधाता जननिर्वादात् मुष्येत कथमन्यथा ॥१७५॥
समाश्वसिहि तदभद्रे क्षिप्रमेष्यति ते वरः। त्वद्वरागमने पश्य पुरमुद्वेल कौतुकम् ॥१७६॥
विधाता तुम दोनोंका योग्य समागम-कर कृतकृत्यपनेको प्राप्त हो; क्योंकि यदि वह ऐसा नहीं करता अर्थात् तुम दोनोंका समागम नहीं करता तो लोकनिन्दासे कैसे छूटता ? ॥१७५॥॥
इसलिए हे भद्रे, धैर्य घर, तेरा पति शीघ्र ही आयेगा, देख, तेरे पतिके आगमनके लिए सारा नगर कैसा अतिशय कौतुकपूर्ण हो रहा है॥१७६॥
May the Creator bring about a suitable union for both of you, so that you may achieve fulfillment; for if he does not, that is, if he does not unite with you both, how can he be free from the reproach of the world?” ( 175)
“Therefore, O noble one, be patient, your husband will arrive soon. See how the entire city is filled with immense curiosity for your husband’s arrival.” ( 176)
श्लोक ( Shlok ) 177
इत्यादितद् गतालापैः श्रव्यैस्तां सुखमानयत् । पण्डिता सा तु तत्प्राप्तौ नाद्याप्यासीन्निराकुला॥ १७७॥
इस तरह पंडिता ने वज्रजंघ संबंधी अनेक मनोहर बातें कहकर श्रीमती को सुखी किया, परंतु वह उसकी प्राप्ति के विषय में अबतक भी निराकुल नहीं हुई ।।177।।
In this way, Pandita spoke many delightful things about Vajrajangha, making Shrimati happy, but she still remained restless regarding his attainment. ( 177)
श्लोक ( Shlok ) 178
तावच्च चक्रिणा बन्धुप्रीतिमातन्वता पराम् । गत्वार्धपथमानीतो वज्रबाहुर्महीपतिः ॥१७८॥
इधर पंडिता ने श्रीमती से जब तक सब समाचार कहे तब तक महाराज वज्रदंत, विशाल भ्रातृप्रेम को विस्तृत करते हुए आधी दूर तक जाकर वज्रबाहु राजा को ले आये ।।178।।
While Pandita was telling Shrimati all the news, King Vajradanta, extending his immense brotherly affection, traveled halfway and brought King Vajrabahu with him. ( 178)
श्लोक ( Shlok ) 179
*स्वसुः पति स्वसारं च “स्वस्त्रीयं च विलोकयन् । प्रापच्चक्री परां प्रीतिं प्रेम्णे दृष्टा हि बन्धुता ॥१७९॥
राजा वज्रदंत अपने बहनोई, बहन और भानजे को देखकर परम प्रीति को प्राप्त हुए सो ठीक ही है क्योंकि इष्टजनों का दर्शन प्रीति के लिए ही होता है ।।179।।
King Vajradanta, upon seeing his brother-in-law, sister, and nephew, was filled with immense affection. This is only natural, for the sight of loved ones is meant to bring joy and love. ( 179)
श्लोक ( Shlok ) 180
सुखसंकथया कांचित् स्थित्वा कालकलां पुनः । प्राघूर्णकोचितां तेऽमी सत्क्रियां तेन लम्भिताः ॥१८०॥
तदनंतर कुछ देर तक कुशलमंगल की बातें होती रही और फिर चक्रवर्ती की ओर से सब पाहुनों (अतिथियों) का उचित सत्कार किया गया ।।180।।
After that, for a while, there were discussions about well-being and good wishes, and then, on behalf of the emperor, all the guests were properly honored. ( 180)
श्लोक ( Shlok ) 181
चक्रवर्त्तिकृतां प्राप्य वज्रबाहुः स माननाम् । पिप्रिये ननु संप्रीत्यै सत्कारः प्रभुणा कृतः ॥१८१।।
स्वयं चक्रवर्ती के द्वारा किये हुए सत्कार को पाकर राजा वज्रबाहु बहुत प्रसन्न हुआ । सच है, स्वामी के द्वारा किया हुआ सत्कार सेवकों की प्रीति के लिए ही होता है ।।181।।
King Vajrabahu was greatly pleased to receive the hospitality offered by the emperor himself. It is true that the hospitality extended by a master is meant to win the affection of his servants. ( 181)
श्लोक 182 से 191
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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