भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82
श्लोक 83 से 91 महाबल का आध्यात्मिक पथ
महाबल ने अतिबल की मृत्यु पर समाधिगुप्त से दीक्षा ली, प्राणत स्वर्ग में इंद्र बना। वहाँ से प्रभाकरी नगरी में महासेन और वसुंधरा का पुत्र जयसेन बना, चक्रवर्ती हुआ, दीक्षा ली, और ग्रैवेयक में अहमिंद्र बना। फिर रत्नसंचय नगर में अजितंजय और वसुमती का पुत्र युगंधर बना, जो तीर्थंकर हुआ।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 83 to 91
श्लोक ( Shlok ) 83
राज्यान्ते केशवेऽतीते तपस्तप्त्वा महाबलः । पाश्वे समाधिगुप्तस्य प्राणतेन्द्रस्ततोऽभवत् ॥८३॥
राज्य के अंत में जब नारायण अतिबल की आयु पूर्ण हो गयी तब महाबल ने समाधिगुप्त मुनिराज के पास दीक्षा लेकर अनेक तप तपे, जिससे आयु के अंत में शरीर छोड़कर वह प्राणत नामक चौदहवें स्वर्ग में इंद्र हुआ ।।83।।
“At the end of his reign, when Narayana Atibal’s lifespan came to an end, Mahabal renounced worldly life and took initiation from the sage Samadhigupta. He practiced intense austerities, and at the end of his lifespan, after leaving his mortal body, he was reborn as Indra in the fourteenth heaven, Pranat.” 83
श्लोक ( Shlok ) 84 – 86
भुक्त्वामरी श्रियं तत्र विंशत्यम्ध्युपमात्यये । घातकी खण्डपश्चार्द्ध पुरोवर्त्तिविदेहगे ॥८४॥
विषये वत्सकावत्यां प्रभाकर्याः पुरः प्रभोः । महासेनस्य भूभर्तुः प्रतापानतविद्विषः ॥८५॥
देव्यां वसुन्धराख्यायां जयसेनाह्वयोऽजनि । प्रजानां जनितानन्दश्चन्द्रमा इव नन्दनः ॥८६॥
आयु पूर्ण होने पर वहाँ से चयकर धातकीखंड द्वीप के पश्चिम भाग संबंधी पूर्वविदेह क्षेत्र में स्थित वत्सकावती देश की प्रभाकरी नगरी के अधिपति तथा अपने प्रताप से समस्त शत्रुओं को नष्ट करने वाले महासेन राजा की वसुंधरा नामक रानी से जयसेन नाम का पुत्र हुआ । वह पुत्र चंद्रमा के समान समस्त प्रजा को आनंदित करता था ।।84-86।।
“After completing his lifespan in heaven, he descended and was reborn in the Pūrvavideha region of Dhātakīkhaṇḍa Dvīpa, in the land of Vatsakāvati, within the city of Prabhākari. He was born as a son to King Mahasena, who vanquished all his enemies with his valor, and Queen Vasundhara. This son, named Jayasena, delighted the entire populace like the moon bringing joy to all.” 84-86
श्लोक ( Shlok ) 87
क्रमाचक्रधरो भूत्वा प्रजाः स चिरमन्वशात् । विरक्तधीश्च भोगेषु प्रव्रज्यामार्हतीं श्रितः ॥८७॥
अनुक्रम से उसने चक्रवर्ती होकर पहले तो चिरकाल तक प्रजा का शासन किया और फिर भोगों से विरक्त हो जिनदीक्षा धारण की ।।87।।
“In due course, he became a Chakravarti (universal monarch) and ruled over his subjects for a long time. Eventually, disenchanted with worldly pleasures, he renounced them and accepted Jain initiation.”87
श्लोक ( Shlok ) 88
सीमन्धरार्हत्पादाब्जमूले षोडशकारणीम् । भावयन् सुचिरं तेपे तपो निरतिचारकम् ॥८८॥
सीमंधर स्वामी के चरणकमलों के मूल में सोलहकारण भावनाओं का चिंतवन करते हुए उसने बहुत समय तक निर्दोष तपश्चरण किया ।।88।।
“Meditating on the sixteen contemplations (Shodasha-Karana Bhavanas) at the feet of Lord Simandhar Swami, he engaged in faultless austerities for a long time.” 88
श्लोक ( Shlok ) 89– 91
स्वायुरन्तेऽहमिन्द्रोऽभूद् ग्रैवेयेर्ध्वमध्यमे । त्रिंशदब्ध्युपमं कालं दिव्यं तत्रान्वभूत् सुखम् ॥८९॥
ततोऽवतीर्णः स्वर्गाग्रात् पुष्करार्द्धपुरोगते । विदेहे मंगलावत्यांप्राक्पुरे रत्नसंचये ॥९०॥
अजितंजय भूपालाद् वसुमत्याः सुतोऽभवत् । युगन्धर इति ख्यातिमुद्वहन् नृसुरार्चितः ॥९१॥
फिर आयु का अंत होने पर उपरिम ग्रैवेयक के मध्यभाग अर्थात् आठवें ग्रैवेयक में अहमिंद्र पद प्राप्त किया । वहाँ तीस सागर तक दिव्य सुखों का अनुभव कर वहाँ से अवतीर्ण हुआ और पुष्करार्ध द्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में मंगलावती देश के रत्न-संचय नगर में अजितंजय राजा की वसुमती रानी से युगंधर नाम का प्रसिद्ध पुत्र हुआ । वह पुत्र मनुष्य तथा देवों द्वारा पूजित था ।।89-91।।
“At the end of his lifespan, he attained the position of Ahamindra in the central region of the Upper Graiveyaka, specifically the eighth Graiveyaka heaven. There, he experienced divine pleasures for thirty sagaras. After descending from there, he was reborn in the Pūrvavideha region of Pushkarardha Dvīpa, in the land of Mangalaavati, in the city of Ratnasanchaya. He was born to King Ajitanjaya and Queen Vasumati as a renowned son named Yugandhara, who was revered by both humans and celestial beings.” 89-91
श्लोक 92 से 102
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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