भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54
श्लोक 55 से 71 ललितांग और युगंधर का परिचय
वज्रदंत ने बताया कि 22वाँ ललितांग (महाबल) श्रीमती का पति था, जो स्वयंबुद्ध के उपदेश से देव बना और अब मनुष्यलोक में है। अच्युत स्वर्ग में उन्होंने ब्रह्मेंद्र, लांतव इंद्रों, और ललितांग-स्वयंप्रभा को युगंधर का चरित्र सुनाया। वत्सकावती देश के सुसीमा नगर में प्रहसित और विकसित विद्वान् थे, जो अजितंजय के मंत्री अमितमति के पुत्र और मित्र थे। दोनों ने मतिसागर मुनि से जीवतत्त्व पूछा और अभाव का तर्क दिया।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 55 to 71
श्लोक ( Shlok ) 55
तेष्वन्त्योभवती भर्ता प्राग्भवेऽभून्महाबलः । स्वयंबुद्धोपदेशेन सोऽन्वभूदामरों श्रियम् ॥५५॥
[उन बाईस ललितांगों में से पहला ललितांग तो मेरी माता मनोहरा का जीव था जो कि क्रम से जंमांतर में पिहितास्रव हुआ] और अंत का ललितांग तेरा पति था जो कि पूर्वभव में महाबल था तथा स्वयंबुद्ध मंत्री के उपदेश से देवों की विभूति का अनुभव करने वाला हुआ था ।।55।।
“Among those twenty-two Lalitāṅgas, the first was the soul of my mother, Manoharā, who, through successive rebirths, became Pihitāsrava. The last Lalitāṅga was your husband, who in a previous birth was Mahābala. Through the teachings of the wise minister Svayambuddha, he experienced the splendor of the divine realms.” (55)
श्लोक ( Shlok ) 56
लक्षिताङ्गश्च्युतः स्वर्गान्मर्त्यभावे स्थितोऽद्य नः । प्रत्यासन्नतमो बन्धुः स ते मर्त्ता भविष्यति ॥५६॥
वह बाईसवाँ ललितांग स्वर्ग से च्युत होकर इस समय मनुष्यलोक में स्थित है । वह हमारा अत्यंत निकट संबंधी है । हे पुत्रि, वही तेरा पति होगा ।।56।।
“The twenty-second Lalitāṅga, having descended from heaven, now resides in the human realm. He is closely related to us. O daughter, he will be your husband.” (56)
श्लोक ( Shlok ) 57 – 58
तवाभिज्ञान मन्यच्च वक्ष्ये पद्मानने शृणु । ब्रह्मेन्द्रलाब्रह्मेन्द्रलान्तवेशाभ्यां भक्त्या पृष्टस्तदेत्यहम् ॥५७॥
युगन्धरजिनेन्द्रस्य तीर्थेऽलप्स्वहि दर्शनम् । ततस्तच्चरितं कृत्स्नं संबुभुत्सावहेऽधुना ॥५८॥
हे कमलानने, मैं उस विषय का परिचय कराने वाली एक कथा और कहता हूँ उसे भी सुन । जब मैं अच्युत स्वर्ग का इंद्र था तब एक बार ब्रह्मेंद्र और लांतव स्वर्ग के इंद्रों ने भक्तिपूर्वक मुझ से पूछा था कि हम दोनों ने युगंधर तीर्थंकर के तीर्थ में सम्यग्दर्शन प्राप्त किया है इसलिए इस समय उनका पूर्ण चरित्र जानना चाहते हैं ।।57-58।।
“O lotus-faced one, I shall narrate a story that provides insight into this matter — listen carefully. When I was the Indra of the Achyuta heaven, the Indras of Brahmendra and Lāntava heavens once approached me with devotion and asked: ‘We have attained true faith (Samyagdarshan) in the Tīrtha of Yugandhar Tīrthankara, and now we wish to know the complete account of his life and teachings.'” (57-58)
श्लोक ( Shlok ) 59
ततोऽवोचमहं ताभ्यामिति तच्चरितं तदा । दम्पतिभ्यां समेताभ्यां युवाभ्यां च यदृच्छया ॥५९॥
उस समय मैंने उन दोनों इंद्रों तथा अपनी इच्छा से साथ-साथ आये हुए तुम दोनों दंपत्तियों (ललितांग और स्वयंप्रभा) के लिए युगंधर स्वामी का चरित्र इस प्रकार कहा था ।।59।।
“At that time, for both those Indras and for you both as a couple (Lalitāṅga and Svayamprabhā), who had accompanied me by your own will, I narrated the life and teachings of Yugandhar Swami in this manner.” (59)
श्लोक ( Shlok ) 60 – 61
जम्बूद्वीपस्य पूर्वस्मिन् विदेहे वस्सकाह्वये । विषये भोगभूदेश्ये सीतादक्षिणदिग्गते ॥६०॥
सुसीमानगरे नित्यं वास्तव्यौ ज्ञानवित्तकौ । जातौ प्रहसिताख्यश्र तथा विकसिताह्वयः ॥६१॥
जंबूद्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में एक वत्सकावती देश है जो कि भोगभूमि के समान है । इसी देश में सीता नदी की दक्षिण दिशा की ओर एक सुसीमा नाम का नगर है । उसमें किसी समय प्रहसित और विकसित नाम के दो विद्वान् रहते थे, वे दोनों ज्ञानरूपी धन सहित अत्यंत बुद्धिमान् थे ।।60-61।।
“In the eastern Videha region of Jambūdvīpa, there is a land called Vatsakāvati, which resembles the Bhogabhūmi (land of enjoyment). In this land, on the southern bank of the Sītā River, lies a city named Susīma. At one time, two learned scholars named Prahasita and Vikasita lived there. They were both extremely wise and possessed the wealth of profound knowledge.” (60-61)
श्लोक ( Shlok ) 62 – 63
तत्पुराधिपतेः श्रीमजितंजयभूभृतः । नाम्नामृतमतिर्मन्त्री सत्यभामा प्रियास्य च ॥६२॥
तयोः प्रहसिताख्योऽयमभूत् सुनुर्विचक्षणः । सखा विकसितो ऽस्यासौ सदेमौ सहचारिणौ ॥६३॥
उस नगर के अधिपति श्रीमान् अजितंजय राजा थे । उनके मंत्री का नाम अमितमति और अमितमति की स्त्री का नाम सत्यभामा था । प्रहसित, इन दोनों का ही बुद्धिमान् पुत्र था और विकसित इसका मित्र था । ये दोनों सदा साथ-साथ रहते थे ।।62-63।।
“The ruler of that city was King Ajitanjaya. His minister was named Amitamati, and his wife was named Satyabhāma. Prahasita had a wise son, who was a close friend of Vikasita. These two young men always stayed together.” (62-63)
श्लोक ( Shlok ) 64 – 65
जात्या हेतुतदामासच्छल जात्यादिकोविदौ । ‘तीर्णव्याकरणाम्भोधी सभारञ्जनतत्परौ॥६४॥
वो राजसम्मतौ वादकण्डूयाकाण्डपण्डितौ विद्यासंवादसंगोष्ठीषु निकषोपलतां गतौ ॥६५॥
ये दोनों विद्वान हेतु, हेत्वाभास, छल, जाति आदि सब विषयों के पंडित, व्याकरणरूपी समुद्र के पारगामी, सभा को प्रसन्न करने में तत्पर, राजमान्य, वादविवादरूपी खुजली को नष्ट करने के लिए उत्तम वैद्य तथा विद्वानों की गोष्ठी में यथार्थ ज्ञान की परीक्षा के लिए कसौटी के समान थे ।।64-65।।
“These two scholars were experts in all subjects, including logic, fallacy, deceit, and caste. They were well-versed in grammar, having crossed the ocean of its complexities, always eager to please the assembly, respected by the king, and skilled in healing the itching caused by debates and disputes. In scholarly gatherings, they were like a touchstone for testing true knowledge.” (64-65)
श्लोक ( Shlok ) 66
कदाचिच्च नरेन्द्रेण समं गत्वा मुनीश्वरम् । मतिसागरमद्राष्टाममृतस्त्रवणद्धिंकम् ॥६६॥
किसी दिन उन दोनों विद्वानों ने राजा के साथ अमृतस्राविणी ऋद्धि के धारक मतिसागर नामक मुनिराज के दर्शन किये ।।66।।
“One day, the two scholars, along with the king, had the darshan (sight) of Muni Raj Matisāgara, who was a holder of the Amṛtasrāviṇī Riddhi (the divine power of nectar flow).” (66)
श्लोक ( Shlok ) 67 – 68
नृपप्रश्नवशात्तस्मिन् जीवतत्वनिरूपणम् । कुर्वाणे चोद्य चुञ्चुत्वात् इत्यब्रूतां प्रसह्य तौ ॥६७॥॥
विनोपलब्ध्या सद्भावं प्रतीमः कथमात्मनः । स नास्त्यतः कृतस्तस्य प्रेत्य भावफलादिकम् ॥॥६८॥
राजा ने मुनिराज से जीवतत्त्व का स्वरूप पूछा, उत्तर में वे मुनिराज जीवतत्त्व का निरूपण करने लगे, उसी समय प्रश्न करने में चतुर होने के कारण वे दोनों विद्वान् प्रहसित और विकसित हठपूर्वक बोले कि उपलब्धि के बिना हम जीवतत्त्व पर विश्वास कैसे करें? जब कि जीव ही नहीं है तब मरने के बाद होने वाला परलोक और पुण्य-पाप आदि का फल कैसे हो सकता है? ।।67-68।।
“The king asked Muni Raj Matisāgara about the nature of the soul (Jīvatattva). In response, the Muni began to explain the essence of the soul. At that moment, the two scholars, Prahasita and Vikasita, being clever in questioning, obstinately interrupted, saying: ‘How can we believe in the existence of the soul without experiencing it? If there is no soul, then how can there be an afterlife or the effects of merit and sin after death?'” (67-68)
श्लोक ( Shlok ) 69
तिदुपालम्भमित्युच्चैराकर्ण्यमुनिपुङ्गवः। वचनं तत्प्रबोधीदं धीरधीः प्रत्यभाषत ॥॥६९॥
वे धीर-वीर मुनिराज उन विद्वानों के ऐसे उपालंभरूप वचन सुनकर उन्हें समझाने वाले नीचे लिखे वचन कहने लगे ।।69।।
“The patient and courageous Muni Raj, upon hearing such reproachful words from the scholars, began to address them with the following words to guide and enlighten them.” (69)
श्लोक ( Shlok ) 70
यदुक्तं जीवनास्तत्वेऽनुपलब्धिः प्रसाधनम् । तदसद्धेतुदोषाणां भूयसां तत्र संभवात् ॥७०॥
आप लोगों ने जीव का अभाव सिद्ध करने के लिए जो अनुपलब्धि हेतु दिया है (जीव नहीं है क्योंकि वह अनुपलब्ध है) वह असत् हेतु है क्योंकि उसमें हेतुसंबंधी अनेक दोष पाये जाते हैं।।70।।
“The argument you have put forth to prove the absence of the soul—that it does not exist because it is not perceivable— is false, as it contains numerous flaws related to its reasoning.” (70)
श्लोक ( Shlok ) 71
छद्मस्थानुपलब्धिभ्यः सूक्ष्मादिषु कुतो गतिः : अमावस्य ततो हेतुः साध्यं व्यभिचरत्ययम् ॥
उपलब्धि पदार्थों के सद्भाव का कारण नहीं हो सकती क्योंकि अल्प ज्ञानियों को परमाणु आदि सूक्ष्म, राम, रावण आदि अंतरित तथा मेरु आदि दूरवर्ती पदार्थों की भी उपलब्धि नहीं होती परंतु इन सर्व का सद्भाव माना जाता है इसलिए जीव का अभाव सिद्ध करने के लिए आपने जो हेतु दिया है वह व्यभिचारी है ।।71।।
“Perception cannot be the cause of the existence of substances, because even those with limited knowledge cannot perceive atoms, subtle entities like Ram and Ravana, or distant objects like Mount Meru. However, the existence of all these is still accepted. Therefore, the reason you have provided to prove the absence of the soul is flawed.” (71)
श्लोक 72 से 82
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 |
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