भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261
श्लोक 262 से 271 ललितांगदेव का आश्चर्य और ज्ञान
ललितांगदेव ने देवों को नमस्कार करते देखा और आश्चर्यचकित हुआ। अवधिज्ञान से उसने स्वयंबुद्ध और पूर्वभव जाना। उसने स्वर्ग, विमान, देवियाँ, और भोगों को पहचाना। देवों ने उसकी जय-जयकार की।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 262 to 271
श्लोक ( Shlok ) 262
मृदुराधूतमन्दारनन्दनादाहरन् रजः । सुगन्धिराववौ मन्दमनिलोऽम्बुकणान् किरन् ।।२६२।।
जल की छोटी-छोटी बूँदों को बिखेरता और नंदन वन के हिलते हुए कल्पवृक्षों से पुष्पपराग ग्रहण करता हुआ अतिशय सुहावना पवन धीरे-धीरे बह रहा था ।।262।।
A delightful breeze was gently blowing, scattering tiny droplets of water and carrying the fragrance of flower pollen from the swaying Kalpavrikshas of the Nandanavana (celestial garden). ॥262॥
श्लोक ( Shlok ) 263 – 264
ततोऽसौ वलितां किंचिद्दृशं व्यापारयन् दिशाम् । समन्तादानमदेवकोटिदेहप्रभाजुषाम् ।।२६३।।
अहो परममैश्वर्य किमेतत् कोऽस्मि ‘किं न्विमे । आनमन्त्येत्य मा दूरादित्यासीद् विस्मितः क्षणम् ॥ २६४
तदनंतर सब ओर से नमस्कार करते हुए करोड़ों देवों के शरीर की प्रभा से व्याप्त दिशाओं में दृष्टि घुमाकर ललितांगदेव ने देखा कि यह परम ऐश्वर्य क्या है ? मैं कौन हूँ ? और ये सब कौन हैं जो मुझे दूर-दूर से आकर नमस्कार कर रहे हैं । ललितांगदेव यह सब देखकर क्षणभर के लिए आश्चर्य से चकित हो गया ।।263-264।।
After offering his salutations in all directions, Lalitangdeva, with his gaze sweeping across the directions filled with the radiance of the bodies of millions of deities, wondered, “What is this supreme wealth? Who am I? And who are all these beings who have come from afar to offer their salutations?” Upon witnessing all this, Lalitangdeva was momentarily astonished and bewildered. ॥263-264॥
श्लोक ( Shlok ) 265 – 266
क्वायातोऽस्मि कुतो वाऽद्य प्रप्रसीदति मे मनः । शय्यातलमिदं कस्य रम्यः कोऽयं महाश्रमः ॥ २६५॥
इति चिन्तयतस्तस्य क्षय्ादवधिरुथयौ । तेनायुद्ध सुरः सर्व स्वयं बुद्धादिवृत्तकम् ॥२६६॥
मैं यहाँ कहाँ आ गया कहाँ से आया आज मेरा मन प्रसन्न क्यों हो रहा है ? यह शय्यातल किसका है ? और यह मनोहर महान् आश्रम कौनसा है इस प्रकार चिंतवन कर ही रहा था कि उसे उसी क्षण अवधिज्ञान प्रकट हो गया । उस अवधिज्ञान के द्वारा ललितांगदेव ने स्वयंबुद्ध मंत्री आदि के सब समाचार जान लिये ।।265-266।।
“Where have I come to? Where did I come from? Why is my mind so joyful today? Whose is this celestial abode? And what is this charming, grand ashram?” While pondering thus, at that very moment, the knowledge of the past and future (Avadhijnana) manifested in his mind. Through this divine insight, Lalitangdeva came to know all the details about the self-enlightened minister and others. ॥265-266॥
श्लोक ( Shlok ) 267 – 271
अये, तपः फलं दिग्यमयं स्वर्गों महाद्युतिः । इमे देवास्समुत्सर्पद्देहोषोताः प्रणामिनः ॥२६७॥
विभानमेतदुद्धासि कल्पपादपवेष्टितम् । इमा मन्जुगिरी देव्या शिञ्जनमणिनूपुराः ॥२६८॥
अप्सरःपरिवारोऽय मित्तो नृत्यति सस्मितम् । गीयते कलमामन्द्रमितश्च सुरवध्वनिः ॥२६९॥
इति निश्चित्य तत्सर्व भवप्रत्ययतोऽवधेः । शय्योत्संगे सुखासीनो नानारत्नांधुमासुरे ॥२७०।
जयेश विजयिन् नन्द “नेत्रानन्द महाद्युते । वर्धस्वेत्युद्भिरो नम्रास्तमासीदन् दिवौकसः ॥२७१॥
यह हमारे तप का मनोहर फल है, यह अतिशय कांतिमां स्वर्ग है, ये प्रणाम करते हुए तथा शरीर का प्रकाश सब ओर फैलाते हुए देव हैं, यह कल्पवृक्षों से घिरा हुआ शोभायमान विमान है ये मनोहर शब्द करती तथा रुनझुन शब्द करने वाले मणिमय नूपुर पहने हुई देवियाँ है, इधर यह अप्सराओं का समूह मंद-मंद हँसता हुआ नृत्य कर रहा है, इधर मनोहर और गंभीर गान हो रहा है, और इधर यह मृदंग बज रहा है । इस प्रकार भवप्रत्यय अवधिज्ञान से पूर्वोक्त सभी बातों का निश्चय कर वह ललितांगदेव अनेक रत्नों की किरणों से शोभायमान शय्या पर सुख से बैठा ही था कि नमस्कार करते हुए अनेक देव उसके पास आये । वे देव ऊँचे स्वर से कह रहे थे कि हे स्वामिन् आपकी जय हो । हे विजयशील, आप समृद्धिमान् हैं । हे नेत्रों को आनंद देने वाले, महाकांतिमां आप सदा बढ़ते रहें―आपके बलविद्या, ऋद्धि आदि की सदा वृद्धि होती रहे ।।267-271।।
“This is the beautiful fruit of our penance, this is the supreme, radiant heaven. These are the deities offering salutations, their bodies shining in all directions. This is the splendid celestial vehicle surrounded by Kalpavrikshas, and these are the goddesses wearing jeweled anklets that produce delightful sounds. Over here, a group of apsaras is dancing and laughing gently. Over there, beautiful and profound hymns are being sung, and here, the mridang (a type of drum) is being played.
Having confirmed all these details through his divine insight into past and future, Lalitangdeva, radiant with the rays of many gems, was seated on his blessed couch when many deities approached him, offering their salutations. In loud voices, they were proclaiming, ‘O Lord, victory be yours! O conqueror, you are prosperous. O delight of the eyes, you are ever-growing—may your strength, wisdom, and spiritual powers always increase.'” ॥267-271॥
श्लोक 272 से 281
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261
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