भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 स्वयंप्रभा का वियोग और संन्यास
ललितांगदेव के च्युत होने पर स्वयंप्रभा वियोग से खिन्न हुई, जैसे चकवी, पृथ्वी, या कोयल। उसे मानसिक व्यथाएँ सताने लगीं। दृढ़धर्म देव ने उसका शोक दूर कर धर्म में लगाया। वह भोगों से निस्पृह होकर छह माह जिनपूजा करती रही, और सौमनस वन में पंचपरमेष्ठियों का स्मरण कर समाधि से च्युत हुई। वह पुंडरीकिणी नगरी में वज्रदंत और लक्ष्मीमती की पुत्री श्रीमती बनी।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
दिव्यस्येवौषधस्यास्य विरहातां तथा सतीम । आधयो ऽपीडयन् गाढं ब्याधिकल्पाः सुदुःसहाः ॥५२॥
जिस प्रकार दिव्य औषधियों के अभाव में अनेक कठिन बीमारियाँ दुःख देने लगती हैं उसी प्रकार ललितांगदेव के अभाव में उस पतिव्रता स्वयंप्रभा को अनेक मानसिक व्यथाएँ दुःख देने लगी थीं ।।52।।
“Just as the absence of divine medicines causes many severe ailments to inflict pain, similarly, in the absence of Lalitangadeva, the devoted wife Swayamprabha began to suffer from numerous mental agonies.”( 52)
श्लोक ( Shlok ) 53
ततोऽस्या दृढधर्माख्यो देवोऽन्तःपरिषद्भवः । शुचं व्यपोह्य सन्मार्गे मतिमासञ्जयतराम् ॥५३॥
तदनंतर उसकी अंतःपरिपक्व के सदस्य दृढ़धर्म नाम के देव ने उसका शोक दूर कर सन्मार्ग में उसकी मति लगायी ।।53।।
“After that, a member of her inner circle, a deity named Dridhadharma, alleviated her sorrow and guided her mind toward the path of righteousness.”( 53)
श्लोक ( Shlok ) 54
सा चित्रप्रतिमेवासीत् तदा भोगेषु निःस्पृहा । विमुक्तमृतिभीशूरपुरुषस्येव शेमुषी ॥५४॥
उस समय वह स्वयंप्रभा चित्रलिखित प्रतिमा के समान अथवा मरण के भय से रहित शूर-वीर मनुष्य की बुद्धि के समान भोगों से निस्पृह हो गयी थी ।।54।।
“At that time, Swayamprabha became indifferent to worldly pleasures, like a painted image devoid of life or the mind of a brave warrior unshaken by the fear of death.”( 54)
श्लोक ( Shlok ) 55
श्रीमती सा भव्य विष्यन्ती भव्य मालेव धर्मभाक। षण्मासान् जिनपूजायामुद्धताऽभूम्मनस्विनी ॥५५॥
जो आगामी काल में श्रीमती होने वाली है ऐसी वह मनस्विनी (विचारशक्ति से सहित) स्वयंप्रभा, भव्य जीवों की श्रेणी के समान धर्म सेवन करती हुई छह महीने तक बराबर जिनपूजा करने में उद्यत रही ।।55।।
श्लोक ( Shlok ) 56 – 57
ततः सौमनसोद्यानपूर्वदिग्जिनमन्दिरे । मूले चैत्यतरोः सम्यक् स्मरन्ती गुरुपञ्चकम् ॥५६॥
समाधिना कृतप्राणत्यागाप्राच्योष्ट सा दिवः । तारकेव निशापाये सहसाऽदृश्यतां गता ॥५७॥
तदनंतर सौमनस वनसंबंधी पूर्वदिशा के जिनमंदिर में चैत्यवृक्ष के नीचे पंचपरमेष्ठियों का भले प्रकार स्मरण करते हुए समाधिपूर्वक प्राण त्याग कर स्वर्ग से च्युत हो गयी । वहाँ से च्युत होते ही वह रात्रि का अंत होने पर तारिका की तरह में अदृश्य हो गयी ।।56-57।।
“After that, in the Jin temple of the Saumanasa forest, under the Chaitya tree, she meditated deeply on the Panch Parmeshthis (five supreme beings). Immersed in meditation, she relinquished her life and fell from the heavens. As she descended, she disappeared like a star fading away at the end of the night.”
( 56–57)
श्लोक ( Shlok ) 58 – 59
प्राग्भाषिते विदेहेऽस्ति नगरी पुण्डरीकिणी । तस्याः पतिरभूनाम्ना वज्रदन्तो महीपतिः ॥५८॥
लक्ष्मीरिवास्य कान्ताङ्गी लक्ष्मीमतिरभूत् प्रिया । स तया कल्पवल्स्येव सुरागोऽलङृकृतो नृपः ॥५९॥
जिसका वर्णन पहले किया जा चुका है ऐसे विदेह क्षेत्र में एक पुंडरीकिणी नगरी है । वज्रदंत नामक राजा उसका अधिपति था । उसकी रानी का नाम लक्ष्मीमती था जो वास्तव में लक्ष्मी के समान ही सुंदर शरीर वाली थी । वह राजा उस रानी से ऐसा शोभायमान होता था जैसे कि कल्पलता से कल्पवृक्ष ।।58-59।।
“In the Videha region, as previously described, there is a city called Pundarikini. Its ruler was King Vajradanta. His queen, named Lakshmimati, possessed a beauty comparable to that of Goddess Lakshmi herself. The king appeared as resplendent with his queen as a Kalpavriksha (wish-fulfilling tree) does with a Kalpalata (divine creeper).”( 58–59)
श्लोक ( Shlok ) 60
तयोः पुत्री बभूषासौ विश्रुता। श्रीमतीति या । पताकेवमनोजस्य रूपसौन्दर्यलीलया ॥६०॥
वह स्वयंप्रभा उन दोनों के श्रीमती नाम से प्रसिद्ध पुत्री हुई । वह श्रीमती अपने रूप और सौंदर्य की लीला से कामदेव की पता का के समान मालूम होती थी ।।60।।
“Swayamprabha was reborn as their daughter, renowned by the name Shrimati. With her charm and beauty, Shrimati seemed like the very banner of Kamadeva (the god of love).”( 60)
श्लोक ( Shlok ) 61
नवयौवनमासाद्य मधुमासमिवाधिकम् । लोकस्य प्रमदं तेने बाळा शशिकलेव सा ॥६९॥
जिस प्रकार चैत्र मास को पाकर चंद्रमा की कला लोगों को अधिक आनंदित करने लगती है उसी प्रकार नवयौवन को पाकर वह श्रीमती भी लोगों को अधिक आनंदित करने लगती थी ।।61।।
“Just as the moon’s phases bring greater delight to people upon the arrival of the month of Chaitra, similarly, as Shrimati attained youth, she brought even greater joy to those around her.”( 61)
श्लोक 62 से 71
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
Download PDF