श्रीअमृतचन्द्राचार्य विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय – गाथा 6 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी और हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
उत्थानिका – अभूतार्थ का प्रतिपादन किस लिए किया है? इसक समाधान करते हैं –
अबुधस्य बोधनार्थं मुनीश्वरा: देशयन्त्यभूतार्थम् । व्यवहारमेव केवलमवैति यस्तस्य देशना नास्ति ॥6॥
अन्वय – मुनीश्वराः अबुधस्य बोधनार्थं अभूतार्थं देशयन्ति यः केवलं व्यवहारं एव अवैति तस्य देशना नास्ति ।
अन्वयार्थ – (मुनीश्वराः) गणधरादि (अबुधस्य) अज्ञानी जीव को (बोधनार्थ) समझाने के लिए या ज्ञान उत्पन्न कराने के लिए (अभूतार्थं देशयन्ति) व्यवहार नय का उपदेश करते हैं। (यः) जो (केवलं) मात्र (व्यवहारं एव) व्यवहार नय को ही (अवैति) जानता है (तस्य) उसके लिए (देशना नास्ति) उपदेश नहीं है।
टीकार्थ – गणधरादि देव अज्ञानी जीवों को समझाने के लिए व्यवहार नय का उपदेश करते हैं। “अबुधस्य बोधनार्थं” यहाँ पर अबुध का अर्थ अज्ञानी होता है किन्तु समास के चमत्कार से अबुध शब्द के मुनिश्री ने दो अर्थ किये हैं। (१) जो ज्ञानी नहीं ऐसे अज्ञानी मिथ्यादृष्टि जीव को ग्रहण करना चाहिए। यहाँ तत्पुरुषसमास करने पर अज्ञानी मिथ्यादृष्टि अर्थ निकलता है। (२) अबुध अ बुध अ अर्थात् ईषत् किञ्चित् या थोड़ा। बुध अर्थात् ज्ञानी। अर्थात् यहाँ ईषत् ज्ञानी का अर्थ अविरत सम्यग्दृष्टि ग्रहण करना चाहिए। यहाँ ‘नञ् समास’ का प्रयोग करने से सम्यग्दृष्टि अर्थ भी ग्रहण किया जाता है। जैसे ईषत् कषाय अर्थात् नोकषाय। नोकषाय को तत्त्वार्थसूत्र में अकषाय वेदनीय कहा है। जैसे “कषायाकषायवेदनीय” (त.सू. अ. ८ सूत्र ८) ऐसा प्रसिद्ध है। अबुधस्य का यह अर्थ स्पष्ट हुआ कि सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि जीवों को समझाने के लिए यह उपदेश हुआ है अर्थात् सम्यग्दृष्टि और मिथ्यादृष्टि दोनों को समझाने में व्यवहार नय ही समर्थ है।
अज्ञानी जन के लिए, अभूतार्थ का ज्ञान। मात्र उसे ही जानते, उनको नहीं बखान ॥६॥
व्यवहार – ‘वि’ उपसर्गपूर्वक अवहार शब्द से व्यवहार बनता है। वि-विशेष रूप से, अवहार अर्थात् भाग। जहाँ तक विभाग किया जा सके वहाँ तक व्यवहार नय प्रवृत्ति करता है।
निश्चय निः+चय-निः निकल गयी है चय वृद्धि जिसकी अर्थात् अखण्ड एक भेद द्रव्य को विषय करने वाला होने से उसे निश्चय कहते हैं। इसलिए निश्चय नय से भिन्न सर्वत्र व्यवहार ही प्रथम भूमिका वालों के लिए अवलम्बन के योग्य है। समयसार कलश में कहा है व्यवहार नय की इस प्रथम पदवी में (जब तक शुद्ध स्वरूप की प्राप्ति न हुई हो तब तक) जिन्होंने अपना पैर रखा है ऐसे पुरुषों के लिए हस्तावलम्ब तुल्य कहा है तो भी जो पुरुष चैतन्य चमत्कार मात्र परद्रव्यभावों से रहित परम अर्थ (शुद्ध नय के विषयभूत) को अंतरंग में अवलोकन करते हैं, उसका श्रद्धान करते हैं तथा उस स्वरूप में लीनता स्वरूप चारित्र भाव को प्राप्त होते हैं उनके लिए यह व्यवहार नय कुछ भी प्रयोजनवान नहीं है। इसलिए व्यवहार और निश्चय नय की मैत्री सदा अनुसरण के योग्य है। जो पुरुष मात्र व्यवहार नय को ही स्वीकार करता है, उस पुरुष के लिए देशना कार्यकारी नहीं है॥६॥
हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
प्रश्न होता है कि जब व्यवहारनय अभूतार्थ है और फलस्वरूप हेय है तब उसको ग्रहण करना एवं उसका उपयोग या इस्तेमाल करना अथवा उसकी अपेक्षा करना व्यर्थ है, कारण कि वह अकिंचित्कर जैसा सिद्ध होता है ? आचार्य इस प्रश्नका समाधान, अनेकान्तकी दृष्टिसे प्रारम्भिक दशामें उसका उपयोग लेना आवश्यक है, यह कहकर करते हैं –
भावार्य-अनादिकालसे संसारी जीव, संयोमीपर्याय में रहते हुए अनेक तरहसे अज्ञानी व भूलवाले ( विपरोतबुद्धि ) बन रहे हैं। उनमेंसे कितने ही जीव ऐसे हैं कि जो तत्त्वों ( पदार्थों) का नाम न स्वरूप तक नहीं जानते, न उन्हें द्रध्यगुण पर्यायका ज्ञान है न निश्चय और व्यवहारका ही ज्ञान है ऐसे भोले हैं, तथा कुछ ऐसे भी हैं, जो तत्वोंके नाम, लक्षण, भेद आदि सब जानते हैं किन्तु विपरीत बुद्धि व श्रद्धा होनेसे भूले हुए हैं। उनसबको ठीक ठीक समझानेके लिये आचार्य उपाय बतला रहे हैं। वह उपाय प्रारंभ दशा या हीन अवस्थामें ‘व्यवहारनय’ का आलम्बन करना है अर्थात् उसके द्वारा बोध कराना है अथवा उसकी सहायता लेना है ( उसे मुहरा माना है ) दूसरा (निश्चय नय) उपाय ( साधन नहीं है। कारण कि उतनी बुद्धि व विचारशक्ति उनमें नहीं पाई जाती यह स्वाभाविक है, एवं प्राचीन संस्कार पड़े रहते हैं। अस्तु,
नियमानुसार पदार्थोंका ज्ञान जीवको दो नयोंसे होता है.–१) निश्चयनय से ( २) व्यवहारनयसे । परन्तु उनमेंसे निश्चयनय, पदार्थके सत्य ( असली भूतार्थ) स्वरूपका ज्ञान कराता और व्यवहार नय पदार्थोके असत्य ( नकली अभूतार्थ) स्वरूपका बोध . मूल भेद है । अतएव व्यवहारनय प्रारम्भमें कामचलाऊ अस्थायी साधन है लेकिन हेय अवश्य है । और निश्चयन हमेशा कार्यकारी व स्थायी साधन है और उपादेय है । फलतः व्यवहारनयका प्रयोजन जबतक उसकी सहायतासे निश्चयनयका या पदार्थोके असली स्वरूपका ज्ञान नहीं हो जाता तब तक कै लिए है, हमेशा के लिए उसका आलम्बन व प्रयोजन नहीं है निश्चय का उद्योत होने पर वह स्वयं तिरोहित या अनावश्यक हो जाता है, कारण कि निश्चय नय स्वयं स्वसहाय है पर सहाय नहीं है। तभी तो ‘स्वाश्रितो निश्चयः’, ‘पराश्रितो व्यवहारः’ कहा गया है। सारांश – व्यवहार नयकी उपयोगिता ( सार्थकता तभीतक है जबतक निश्चयल नय का राज्य नहीं होता है। जिस प्रकार म्लेच्छ भाषाका उपयोग तबतक किया जाता है जबतक कि म्लेच्छ ( अनार्थ ) जीव आर्यभाषा नहीं जानता, जब वह आर्यभाषा जान लेता है तब फिर अनार्य भाषाका प्रयोग बन्द कर दिया जाता है । ऐसा हो प्रयोजन व्यवहारनयका समझना चाहिये । परन्तु दोनों नय परस्पर सापेक्ष ( संधिरूप ) एकत्र अवश्य रहते हैं व माने जाते हैं अर्थात् एकके अभाव में दूसरा नय अपना कार्य नहीं करता है । सारांश यह कि जब एक नय अपना कार्य नहीं करता तब दूसरा ( विपक्ष ) नय अपना कार्य करता है और एक दूसरेकी सत्ता ( अस्तित्व ) स्थापित करता है क्योंकि एकके बिना दूरेका नामनिर्देश हो नहीं सकता ऐसा परस्पर जोड़ा है, हाँ, गौणमूख्यता बराबर रहती है विषय व अधिकरण भी दोनों नयो का एक ही द्रव्य है ।
व्यवहारनय के भेद व कार्य
व्यवहारनय तीन प्रकारका होता है ( १ ) भेदाति वा भेदरूप मान्यता ( २ ) पर्यायश्रित या पर्यायरूप मान्यता ( ३ ) पराश्रित या निमित्ताधीन मान्यता । इन तीनोंका उदाहरण प्रयोजनवश व्यतिक्रमरूपसे दिया जाता है । और जीवद्रव्यका ज्ञान करानेके लिये व्यवहारको विधि ( प्रक्रिया ) बतलाई जाती हैं।
यथा-
( १ ) जब कोई अज्ञानी मनुष्य जीवके निश्चय स्वरूपको जानना चाहता है तब यदि उसको इकदम प्रारंभ में यह बताया जाय कि जीवका निश्चयस्वरूप ‘एकत्वविभक्त’ है इत्यादि, तब बिना दिखाये या व्यवहारनयकी सहायता व आलम्बन लिये वगैर अनंत कालतक वह जीवद्रव्य नहीं जान सकता, यह पक्का है । इसलिये प्रारंभकालमें जीवका ज्ञान, पर्यायाश्रित व्यवहारनयका आश्रय लेकर कराया जाता है कि – जिसके मनुष्य देवनारक तिर्यंच का शरीर हो या पाँच इन्द्रियां हों, वही जीव कहलाता है । उस जिज्ञासु श्रोताको यह ज्ञान हो जाता है कि मेरे मनुष्य शरीर व इन्द्रियाँ हैं, अतः में जीव हूँ । यहाँ पर जीवका ज्ञान संयोगी पर्याय द्वारा कराया जाता है जो व्यवहारयरूप है या व्यवहारका कार्य हैं अर्थात् इस प्रकार जीवद्रव्यका श्रोता या जिज्ञासुको ज्ञान होना व्यवहारनपाश्रित है, निश्चयनयाश्रित ज्ञान नहीं है। उपचरितज्ञान है कारण कि शरीर या इन्द्रियाँ सब पुद्गलको पर्याय हैं जो जीवद्रव्यसे भिन्न हैं ।
(२) इसी तरह पराश्रित (निमित्ताश्रित) व्यवहारनयका उदाहरण ऐसा है— जो इन्द्रियों के द्वारा जाने वह जीव है। यहाँ भी इन्द्रियों (साधनों-निमित्तों) को पराधीनतासे जीवको सिद्धि बतायी गई है, जो सरासर व्यवहारनयका ही भेद है अर्थात् श्रोताको यह अभूतार्थ ज्ञाम होता है कि मैं इन्द्रियोंसे जानता हूँ अतएव में जीव हूँ। क्योंकि भिश्चयनयो जीवका स्वरूप स्वाधीन व स्वाश्रित है, पराश्रित या निमिताश्रित नहीं है यह दूसरा व्यवहारनयका उदाहरण है। (३) इसी तरह भेदाश्रित व्यवहारका उदाहरण यह है-जो ज्ञान व दर्शनसे जानता है वह जीव है। यहाँ पर अखंड व अवक्तव्य जीवद्रव्यमें ज्ञान व दर्शनका भेद करके कथन किया जाता है अतएन वह व्यवहारनयका विषय है निश्चयनयका विषय अखंडपिंड है। यद्यपि व्यवहारनय हेय है परन्तुर, प्रारंभ दशा जीवतत्त्यक विषयमें कुछ अज्ञान भिटाया है अतएव वह कचित् अपेक्षणीय है सर्वथा उपेक्षणीय नहीं है. प्रारंभ अवस्थामें कार्यकारी है। व्यवहारनय पदार्शका अशुद्ध स्वरूप बतलाता है, जिससे वह आत्मकल्याणका साधक नहीं है बाधक है व त्याज्य है। फलतः तीनों प्रकारका व्वहारनय है तो हेय, परन्तु प्रारंभमें अज्ञानियों को समझानेके लिये थोड़ा उपादेय भी है किन्तु श्रद्धान गलत या विपरास नहीं होना चाहिये, यह निष्कर्ष है |
अशुद्ध या विभावरूप प्रवृत्तिको या क्रियारूप परिणमनको उपादेय या आत्महितकारी न मानकर निमित्त या उपाधिरूप ही मानना और बस्तु स्वभावपर हमेशा दृष्टि रखना, उसको नहीं हटाना अर्थात् पर { विभाव ) की ओर दृष्टिको नहीं जाने देना ही मूलमें भूल नहीं करना है और निज स्वभाव ( ज्ञानदर्शनादि } से दृष्टिको विचलित करना ही. मूल में भूल’च अपराध है, यह ध्यान रखना चाहिए। फलतः असंयम या संयम (द्रव्यभावरूप) दोनों बन्धके कारण या निमित्त हैं विकार है अतएव ज्ञानी वीतरागो उनको भी त्याग देता है वह ज्ञातादृष्टा मात्र स्वस्थ होता है, एकाकी स्वरूप रमता है।
इसके विपरीत जो केवल व्यवहारनयावलम्बी अशुद्धज्ञानी और अशुद्धाचरणी हैं वे जिनवाणीके उपदेशके पात्र नहीं है क्योंकि वे उसको समझ नहीं सकते न उनको रुचि होती है, यह खराबी उनमें पाई जाती है तब उन्हें उपदेश देना ही व्यर्थ है 1 अथवा कभी-कभी उसका उल्टा फल भी होता है । फलतः संयोगी पर्यायमें होनेवाली प्रवृत्ति या क्रियाको वस्तुका परिणमन निश्चयरूप समझते हुए उसके द्वारा अपनी आत्माका कल्याश नहीं हो सकता ऐसा दृढ़ श्रद्धान करना और हेयको हेय उपादेयको उपादेय मानकर कार्य करते रहना मना नहीं है वह तो वस्तुस्थितिकी मर्यादा है, उसको सम्यग्दृष्टि नहीं तोड़ सकता उसका वह पालन या रक्षा हमेशा करता है। अतः सम्यग्दृष्टि उच्च है। कोई भी सरागी जीव संयोगी पर्यायमें रहते हुए सब सरहका व्यवहार कार्य करना नहीं छोड़ सकता किन्तु उसको करता हुआ उससे सदा विरक्त या उदासीन ( रुचिरहित ) रहता है तथा यथाशिक्ति उसे छोड़ता भी है, यह विशेषता रहती है।
उपसंहार
व्यवहारनयके ज्ञानीको ही निश्चयनयका ज्ञान व आचरण होता है, परन्तु उसका तरीका पूर्वोक्त प्रकार ही है अन्य प्रकार नहीं है अर्थात् पेश्तर व्यवहारनयका आलम्बन करते कराते हुए जैसे अरूपी अदृश्य पदार्थ का रूपी शरीरादि साधनों द्वारा ज्ञान कराया जाता है, जोकि यद्यपि है अशुद्ध ( व्यवहार ) ज्ञान, तथापि मुख्य लक्ष्य निश्चयका ज्ञान कराना होनेसे वह धोखा देना या मायाचार व कपट करना ( गुमराह करना ) नहीं कहा जा सकता, बल्कि उस जीव उसकी योग्यता के अनुसार सान्त्वना ( तसल्ली ) देना है, जिससे वह घबड़ाने न पावै । ऐसा करते करते जब उस जिज्ञासुको स्वयं ही निवमनयरूप सत्यज्ञान प्रस्फुटित ( प्रकट ) होता है तब अपने आप वह निश्चय व्यवहारकी समझ लेता है और पहले के हुए ज्ञान को अशुद्ध ज्ञान जानकर उसको छोड़ देता है क्योंकि वह तो शरीरादि साधनों को हो जीव जनानेवाला भ्रम ज्ञान था ऐसा मेदज्ञान उसको प्रकट हो जाता है । वह व्यवहारज्ञान असत्यार्थ है और निश्चयशान सत्यार्थ ऐसा दृढ़ ज्ञान श्रद्धान उसको हो जाता है व उसके होनेमें पर ( कोई शरीरादि व इन्द्रियादि) सहायक नहीं होते, उसका आत्मा ही सहायक ( स्व सहाय ) होता है और मेरा आत्मा या जीव यही है, जो अपनेको अखण्ड पिण्ड रूपसे नियत जानता है । फलतः व्यवहारनयसे साध्यसाधनभाव या कार्यकारणभाव परके साथ माना जाता है और निश्चयनयसे अपने भीतर हो सब पाया जाता है । जब जिज्ञासु और आचार्यका एक मत हो जाता है तभी साध्य ( सम्यग्ज्ञान की सिद्धि रूप अन्तिम लक्ष्य पूरा हुआ समझा जाता है । यही आशय उक्त श्लोक द्वारा आचार्यने दरशाया है। इसकी पूर्ति न होनेतक सभी ज्ञान प्राय: अज्ञान कोटि में शामिल रहते हैं क्योंकि वे प्रमाणरूप नहीं हैं। हितकी प्राप्ति ओर अहितका परिहार कराने में समर्थ ज्ञान हो प्रमाण माना जाता है और वह सम्यग्ज्ञान ही है, किम्बहुना ॥ ६ ॥
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 6
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