पुरुषार्थ सिद्धयुपाय रचयिता – श्रीअमृतचन्द्राचार्य गाथा 2 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
परमागमस्य जीवं निषिद्धजात्यन्ध सिन्धुरविधानम् ।
सकलनय विलसितानां विरोधमथनं नमाम्यनेकान्तम् ॥2॥
उत्थानिका – अब इष्टदेवता को नमस्कार करने के बाद जिनागम को स्मरण करते हुए द्वितीय आर्या लिखते हैं –
अन्वय :- निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानं, सकलनयविलसितानां विरोधमथनं परमागमस्य बीजं अनेकान्तं नमामि (अहम्)।
अन्वयार्थ – (निषिद्धजात्यन्धसिन्धुरविधानम्) जन्मान्ध पुरुषों की हाथी की अवधारणा को दूर करने वाले (सकलनयविलसितानां) समस्त नयों से प्रकाशित (विरोधमथनं) विरोध को नष्ट करने वाले (परमागमस्य बीजं) परमागम उत्कृष्ट जैन सिद्धांत के बीजभूत (अनेकान्तम्) अनेकान्त को, एकपक्ष रहित स्याद्वाद को मैं (अमृतचन्द्राचार्य) (नमामि) नमस्कार करता हूँ।
अनेकान्त को नमन हो, परमागम का बीज ।
सब नय से हाथी लखो, द्वेष मिटे मत खीज ॥२॥
टीकार्थ – जहाँ वस्तु के एक अन्त अर्थात् धर्म को नहीं कहा जाता है वह अनेकान्त है।
अथवा – स्याद्वाद श्रुत रूप लक्षण से युक्त सिद्धान्त को अनेकान्त कहते हैं। ऐसे अनेकान्त स्वरूप परमागम को मैं (अमृतचन्द्राचार्य) नमस्कार करता हूँ। वस्तु में अनेक विरोधी धर्म रहते हैं। जो अपनी इच्छानुसार वस्तु में मात्र एक धर्म को स्वीकार करते हैं, अन्य समस्त धमर्मों को न मान कर अपने इष्ट धर्म को ही स्वीकार करते हैं उनको एकान्तवादी कहते हैं। प्रत्येक वस्तु में नित्य, अनित्य, सामान्य, विशेष, एक, अनेक, सापेक्ष, निरपेक्ष आदि अनेक धर्म स्वभाव से ही देखे जाते हैं। परीक्षामुख में कहा है- “अनेकान्तात्मक वस्तु में एकान्त स्वरूप की उपलब्धि नहीं होती है।” स्याद्वाद कथन पद्धति है। जैसे ‘ स्यात्’ शब्द पूर्वक बाद अर्थात् कहना उसे स्याद्वाद कहते हैं। स्यात् सत् अर्थात् कथञ्चित् वस्तु है। स्यात् असत् अर्थात् कथञ्चित् वस्तु नहीं है। स्यात् शब्द यह अव्यय पद निपातन से सिद्ध है।
विधि और प्रतिषेध के द्वारा सप्त भङ्गों को जानकर विवक्षित और अविवक्षित धर्मों के कथन करने में जो प्रवण है उसे स्याद्वाद कहते हैं। “स्यात् शब्द सर्वथा एकान्त का त्यागी होने से ‘किं’ शब्द निष्पन्न चित्-प्रकार के रूप में कथञ्चित्, कथञ्चन आदि का वाचक है और इसलिए कथञ्चित् आदि शब्द स्याद्वाद के पर्यायवाची नाम हैं। यह स्याद्वाद सप्त भङ्गों और नयों की अपेक्षा को लिए रहता है, तथा हेय-उपादेय का विशेषक (भेदक) होता है। स्याद्वाद के बिना हेय और उपादेय की विशेष रूप से व्यवस्था नहीं बनती।” (आप्त मीमांसा १०४)
शंका – वह अनेकान्त किस विशेषता वाला है ?
समाधान – अनेकान्त परमागम का बीज है। परमागम अर्थात् उत्कृष्ट आगम उसका बीज अर्थात् उत्पत्ति स्थान अथवा कारण है। अनेकान्त के निश्चय बिना आगम, परमागम नहीं कहा जा सकता है। अन्य मतावलंबियों ने भी निगम और आगम की कल्पना की है, किन्तु उस आगम का यहाँ ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि परीक्षामुख में कहा है आप्त के वचन आदि के निमित्त से होने वाले अर्थज्ञान को आगम कहते हैं। कहीं-कहीं पर ‘बीजं’ के स्थान पर ‘जीवं’ ऐसा पाठ भी देखा जाता है। यहाँ पर दोनों के अर्थ में कोई विशेषता न होने से विरोध नहीं आता हैं। परमागम का जीव अर्थात् अनेकान्त परमागम के प्राण स्वरूप है, ऐसा अर्थ होता है।
पुनः अनेकान्त की विशेषता बताते हैं जन्मान्ध पुरुषों ने हाथी के विधान का निषेध कर दिया- यहाँ अनेकान्त को समझाने के लिए कथानक उपस्थित किया जाता है।
एक बार एक नगर में सात जन्मान्धों को हाथी देखने की उत्कण्ठा हुई। वे लोग हाथी के पास जाकर अपने हाथ से हाथी के विभिन्न अङ्गों को स्पर्श करके परस्पर चर्चा करने लगे। जिसने हाथी का पैर पकड़ा, उसने कहा ‘हाथी खम्भे के समान होता है।’ जिसने हाथी का कान पकड़ा उसने कहा ‘हाथी सूपा के समान होता है’। जिसने हाथी का दाँत पकड़ा उसने कहा ‘हाथी मूसल के समान होता है।’ जिसने हाथी की सूँड पकड़ी उसने कहा’ हाथी भुजा के समान होता है।’ जिसने हाथी का पेट पकड़ा उसने कहा ‘हाथी गोमय (कुठिया) के समान होता है।’ जिसने हाथी की पूँछ पकड़ी उसने कहा ‘हाथी रस्सी के समान होता है।’ जिसने हाथी का मस्तक पकड़ा उसने कहा ‘हाथी तो नारियल के समान होता है।’ इस प्रकार नेत्र के बिना हाथी के देखे जाने पर बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो जाता है। वास्तव में परमागम रूमी नेत्र ही वस्तु स्वरूप के विवाद को दूर करने में समर्थ है दूसरा कोई नहीं, यह कथन का तात्पर्य हैं। ‘सकलनयविलसितानाम्’ इस पद में ‘पदार्थानाम्’ यह वाक्यशेष है। अर्थात् सम्पूर्ण नयों से शोभित पदार्थों के विरोध को दूर करने वाला अनेकान्त है।
जितने वस्तु के धर्म हैं उतने ही नय है। चूँकि वस्तु स्वरूप अनन्तधर्मात्मक है अतः नय भी अनन्त हैं। वक्ता के अभिप्राय की अपेक्षा से जितने नय हैं, उतने ही वचन के मार्ग हैं। अथवा जितने वचन हैं उतने नय हैं, इनमें कोई विरोध नहीं। कहा भी है “जितने वचन के मार्ग हैं उतने ही नयवाद है और जितने नयवाद हैं उतने ही पर समय हैं।”
फिर भी पूर्वाचार्यों ने सप्त नय कहे हैं। उन्हीं में सभी अभिप्रायों का अन्तर्भाव हो जाता है। नैगम, संग्रह, व्यवहार, ऋजुसूत्र, शब्द, समभिरूढ़ और एवम्भूत ये सात नय हैं। अथवा सूत्र में सकलनय पर दिया है। जिससे सकल अर्थात् प्रमाण और नय शब्द से सप्तनय लेना चाहिए, क्योंकि वाक्य के एकदेश के उच्चारण से पूरे वाक्य का अर्थ ग्रहण हो जाता है। जैसे भीमसेन को अकेला भीम भी कहा जा सकता है अथवा अकेला सेन भी कहा जा सकता है। इससे पूरे भीमसेन का ज्ञान हो जाता है। “सकलादेशः प्रमाणाधीनो, विकलादेशो नयाधीनः” कहा है इसलिए वस्तु का स्वरूप प्रमाण और नयों से सुशोभित है। विवक्षित नय की अपेक्षा वस्तु परस्पर विरुद्ध धर्म धारण करने पर भी कभी विरोध को प्राप्त नहीं होती है। इस प्रकार इन विशेषणों से विशिष्ट अनेकान्त को मैं नमस्कार करता हूँ॥२॥
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 2
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