भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 |श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221
श्लोक 222 से 239 कुलकरों का कार्य
संख्याएँ संख्यात और असंख्यात हैं। कुलकरों के नाम प्रतिश्रुति से नाभिराज तक हैं। इन्होंने भय दूर करने से लेकर नाल काटने तक के कार्य किए। गौतम ने यह कथन किया। सभा आनंदित हुई। वे वृषभदेव का पुराण कहने को तत्पर हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 3- Shlok 222 to 239
श्लोक ( Shlok ) 222 -227
पूर्वाङ्ग च तथा पूर्व पर्वाङ्ग पर्वसाइयम् । नयुताङ्गं परं तस्मान्न
युतं व ततः परम् ॥२२२॥
कुमुदाङ्गमतो विद्धि कुमुदाद्धमतः परम् । पद्मानं च ततः पद्म नलिनाङ्गमतोऽपि च ॥२२३।।
नखिनं कमलाङ्गं च तथान्यत् कमळं विदुः । तुव्यंग तुटिक चान्यष्टटाङ्गमथाटटम् ॥२२४।।
अममाङ्गमतो ज्ञेयमममाध्यमतः परम् । हाहांग च तथा हाहा हूहूश्चैवं प्रतीयताम् ।।२२५।।
लताङ्गं च लताह्न व महत्पूर्व च तद्द्वयम् । शिरःप्रकम्पितं चान्यन्ततो हस्तप्रहेलितम् ।।२२६।।
अचलास्मकमित्येवं प्रकारः काळपर्ययः । संख्येयो गणनातीतं विदुः कालमतः परम् ।।२२७।।
पूर्वांग, पूर्व, पर्वांग, पर्व, नयुतांग, नयुत, कुमुदांग, कुमुद, पद्मांग, पद्म, नलिनांग, नलिन, कमलांग, कमल, तुव्यंग, तुटिक, अटटांग, अटट, अममांग अमम, हाहांग, हाहा, हूह्वंग, हूहू, लतांग, लता, महालतांग, महालता, शिर:प्रकंपित, हस्तप्रहेलित और अचल ये सब उक्त संख्या के नाम हैं जो कि कालद्रव्य की पर्याय हैं । यह सब संख्येय हैं―संख्यात के भेद हैं इसके आगे का संख्या से रहित है―असंख्यात है ।।222-227।।
Purvang, Pur, Parvang, Parv, Nayutang, Nayut, Kumudang, Kumud, Padmang, Padm, Nalinang, Nalina, Kamalang, Kamal, Tuvyang, Tutik, Attang, Att, Amamang, Amam, Hahang, Haha, Huhvang, Huhu, Latang, Lata, Mahalatang, Mahalata, Shir:Prakampit, Hastaprahelit, and Achal—these are all the names of numbers which correspond to the different aspects of time (Kaldhruvya). These are all measurable numbers—varieties of the countable. Beyond this, numbers become immeasurable (Asankhyat).” (Verses 222-227)
श्लोक ( Shlok ) 228
यथासंभवमेतेषु मनूनामायुरुद्धताम् । संख्याज्ञानमिदं विद्वान् सुधी पौराणिको भवेत् ॥२२८॥
ऊपर मनुओं-कुलकरों की जो आयु कही है उसे इन भेदों में ही यथासंभव समझ लेना चाहिए । जो बुद्धिमान् पुरुष इस संख्या ज्ञान को जानता है वही पौराणिक-पुराण का जानकार विद्वान् हो सकता है ।।228।।
“The lifespan of the Manus and Kulakaras mentioned above should be understood within these categories as much as possible. Only the wise person who understands this knowledge of numbers can be considered a scholar of the Puranas and the ancient texts.” (Verse 228)
श्लोक ( Shlok ) 229–232
आद्यः प्रतिश्रुतिः प्रोक्तः द्वितीयः सम्मतिर्मतः । तृतीयः क्षेमकृनाम्नः चतुर्थः क्षेमधृन्मनुः ॥२२९॥
सीमकृत् पञ्चमो ज्ञेयः षष्ठः सीमधृदिष्यते । ततो विमलवाहाङ्कश्चक्षुष्मामष्टमो मतः ॥२३०॥
यशस्वान्नवमस्तस्मान्नभिचन्द्रोऽप्यनन्तरः । चन्द्रामोऽस्मात् परं ज्ञेयो मरुद्देवस्ततः परम् ॥२३१॥
प्रसेनजित् परं तस्मानाभिराजश्चतुर्दशः । वृषभो भरतेशच तीर्थचक्रभृतौ मनु ॥२३२॥
ऊपर जिन कुलकरों का वर्णन कर चुके हैं यथाक्रम से उनके नाम इस प्रकार हैं―पहले प्रतिश्रुति, दूसरे सन्मति, तीसरे क्षेमंकर, चौथे क्षेमंधर, पाँचवें सीमंकर, छठे सीमंधर, सातवें विमलवाहन, आठवें चक्षुष्मान् नौवें यशस्वान् दसवें अभिचंद्र, ग्यारहवें चंद्राभ, बारहवें, मरुद्देव, तेरहवें प्रसेनजित् और चौदहवें नाभिराज । इनके सिवाय भगवान् वृषभदेव तीर्थंकर भी थे और मनु भी तथा भरत चक्रवर्ती भी थे और मनु भी ।।229-232।।
“The names of the Kulakaras, as previously mentioned, in sequential order, are as follows:
- Pratishruti,
- Sanmati,
- Kshemankara,
- Kshemandhara,
- Seemanakara,
- Seemandhara,
- Vimalvahan,
- Chakshushman,
- Yashaswan,
- Abhichandra,
- Chandrabh,
- Maruddev,
- Prasenjit, and
- Nabhiraj.
Apart from these, Lord Vrishabhdev was also a Tirthankara, as well as a Manu, and Bharat Chakravarti was also a Manu.” (Verses 229-232)
श्लोक ( Shlok ) 233 – 237
प्रतिश्रुतिः “प्रत्यश्वणोत् प्रजानां चन्द्रार्कसं दर्शनभीतिमाजाम् । स सन्मतिस्तारकिताअमार्गसंदर्शने भीप्तिमपाचकार ॥२३३॥
क्षेमंकरः क्षेमकृदार्यवर्गे क्षेमंधरः क्षेमधृतेः प्रजानाम् । सीमंकरः सोमकृदार्यनृष्यां सीमंधरः सीमध्तेस्तरूणाम् ॥ २३४॥
वाहोपदेशाद्विमलादिवाहः पुत्राननाकोकनसंप्रदायात् । चक्षुष्मदाख्या मनुरग्रगोऽभूद्यशस्वदाख्यस्तदा भिष्टवेन ॥२३५॥
सोऽक्रोड्यच्चन्द्रमसाभिचन्द्रश्चन्द्राभकस्तैः कियदप्यजीवीत् । मरुत्सुरोऽभूच्चिरजीवना तैः प्रसेनजिदगर्ममलापहारात् ॥२३६॥
नामिश्च तक्रामिनिकर्तनेन प्रजासमाश्वासनहेतुरासीत् । सोऽजोजनत् तं वृषभं महात्मा सोऽप्यप्रसूनु मनुमादिराजम् ॥२३७॥
अब संक्षेप में उन कुलकरों के कार्य का वर्णन करता हूँ―प्रतिश्रुति ने सूर्य चंद्रमा के देखने से भयभीत हुए मनुष्यों के भय को दूर किया था, तारों से भरे हुए आकाश के देखने से लोगों को जो भय हुआ था उसे सन्मति ने दूर किया था, क्षेमंकर ने प्रजा में क्षेम-कल्याण का प्रचार किया था, क्षेमंधर ने कल्याण धारण किया था, सीमंकर ने आर्य पुरुषों की सीमा नियत की थी, सीमंधर ने कल्पवृक्षों की सीमा निश्चित की थी, विमलवाहन ने हाथी आदि पर सवारी करने का उपदेश दिया था, सबसे अग्रसर रहने वाले चक्षुष्मान् ने पुत्र के मुख देखने की परंपरा चलायी थी, यशस्वान् का सब कोई यशोगान करते थे, अभिचंद्र ने बालकों की चंद्रमा के साथ क्रीड़ा कराने का उपदेश दिया था, चंद्राभ के समय माता-पिता अपने पुत्रों के साथ कुछ दिनों तक जीवित रहने लगे थे, मरुदेव के समय माता-पिता अपने पुत्रों के साथ बहुत दिनों तक जीवित रहने लगे थे, प्रसेनजित् ने गर्भ के ऊपर रहने वाले जरायु रूपी मल के हटाने का उपदेश दिया था और नाभिराज ने नाभि-नाल काटने का उपदेश देकर प्रजा को आश्वासन दिया था । उन नाभिराज ने वृषभदेव को उत्पन्न किया था ।।233-237।।
Here is the English translation of the verses:
“Now, I will briefly describe the actions of these Kulakaras:
- Pratishruti removed the fear of humans who were terrified by the sight of the Sun and Moon.
- Sanmati removed the fear of people caused by the sight of the star-filled sky.
- Kshemankara propagated welfare and prosperity among the people.
- Kshemadhara upheld the cause of welfare.
- Seemanakara set the limits for the Aryan people.
- Seemandhara determined the boundaries of the Kalpavriksha trees.
- Vimalvahan taught the practice of riding elephants and other animals.
- Chakshushman established the tradition of looking at the face of a son.
- Yashaswan was celebrated by all for his glory.
- Abhichandra taught children to play with the moon.
- Chandrabh’s time saw parents living longer with their children.
- Maruddev’s time witnessed parents living for long periods alongside their children.
- Prasenjit taught the removal of impurities in the form of the placental discharge from the womb.
- Nabhiraj instructed the cutting of the umbilical cord and reassured the people.
Nabhiraj was the one who gave birth to Lord Vrishabhdev.” (Verses 233-237)
श्लोक ( Shlok ) 238
इत्थं “युगादिपुरुषोद्भवमादरेण तस्मिन्निरूपयति गौतमसद्गणेन्द्रे । सा साधुसंसदखिका सह मागधेन राज्ञा प्रमोदमचिराद परमाजगाम ॥२३८।
इस प्रकार जब गौतम गणधर ने बड़े आदर के साथ युग के आदिपुरुषों-कुलकरों की उत्पत्ति का कथन किया तव वह मुनियों की समस्त सभा राजा श्रेणिक के साथ परम आनंद को प्राप्त हुई ।।238।।
“In this way, when Gautam Ganadhar respectfully narrated the origin of the primeval beings of the era, the Kulakaras, the entire assembly of monks, along with King Shrenik, attained supreme joy.” (Verse 238)
श्लोक ( Shlok ) 239
सकलमनुनियोगात् कालभेदं च षोढा परिषदि ‘जिनसेनाचार्यमुख्यो निरुप्म पुनरथ पुरुनाम्नः पुण्यमाद्यं पुराणं कथयितुमुदियाय श्रेणिकाकर्णयेति ॥
उस समय महावीर स्वामी की शिष्य परंपरा के सर्वश्रेष्ठ आचार्य गौतम स्वामी काल के छह भेदों का तथा कुलकरों के कार्यों का वर्णन कर भगवान् आदिनाथ का पवित्र पुराण कहने के लिए तत्पर हुए और मगधेश्वर से बोले कि हे श्रेणिक, सुनो ।।239।।
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण
संग्रह में पीठिकावर्णन नामक तृतीय पर्व समाप्त हुआ ।।3।।
“Thus, the third chapter, known as the ‘Pitthikavarnana,’ in the ‘Trishashti Lakshana Mahapurana’ compiled by the revered Bhagwan Jin Sen Acharya, who is famous by the name Arsha, has concluded.” (Verse 3)
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172 से 183 |श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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