भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण तृतीयं पर्व Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
यह पर्व महापुराण की पीठिका के रूप में कालद्रव्य, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल, और चौदह कुलकरों के कार्यों का वर्णन करता है।
श्लोक 1 से 10 : कालद्रव्य का स्वरूप
ग्रंथकर्ता वृषभनाथ को नमस्कार कर पीठिका का व्याख्यान करता है। कालद्रव्य अनादिनिधन और सूक्ष्म है। यह लोकाकाश में भरा है। यह पदार्थों के परिणमन में सहकारी है। जीव, पुद्गल आदि पाँच अस्तिकाय हैं। काल एकप्रदेशी होने से अस्तिकाय नहीं है। यह व्यवहारकाल का मूल है। इसमें गुण और पर्याय हैं। यह अनस्तिकाय सिद्ध होता है। व्यवहारकाल मुख्य काल से उत्पन्न है।
श्लोक 11 से 20 व्यवहारकाल और उसके भेद
व्यवहारकाल समय, आवलि आदि भेदों से जाना जाता है। यह सूर्यादि के चक्र से प्रकट होता है। भव और आयु का समय अगत होता है। इसके दो भेद हैं—उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। प्रत्येक का प्रमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है। दोनों के छह-छह भेद हैं। अवसर्पिणी के भेद सुषमासुषमा से दुःषमदुःषमा हैं। उत्सर्पिणी इसके विपरीत है। ये नाम सार्थक हैं। दोनों कालचक्र से घूमते हैं।
श्लोक 21 से 30 सुषमासुषमा काल
भरतक्षेत्र में सुषमासुषमा काल चार कोड़ाकोड़ी सागर का था। यहाँ भोगभूमि जैसी स्थिति थी। मनुष्यों की आयु तीन पल्य और ऊँचाई छह हजार धनुष थी। उनके शरीर सुवर्ण-से थे। वे आभूषण धारण करते थे। पुण्य से उन्हें सौंदर्य मिलता था। वे बलवान और तेजस्वी थे। वे तीन दिन बाद भोजन करते थे।
श्लोक 31 से 40 सुषमासुषमा की व्यवस्था
उन्हें रोग या परिश्रम नहीं था। स्त्रियाँ भी समान आयु और ऊँचाई की थीं। दोनों भोगों में अनुरक्त थे। उनका रूप और वचन सुंदर थे। कल्पवृक्ष उन्हें भोग देते थे। ये वृक्ष प्रकाशमान थे। ये दस प्रकार के थे। ये पुण्यात्माओं को भोग देते थे।
श्लोक 41 से 51 सुषमा काल
आयु अंत में पुरुष जम्हाई और स्त्री छींक से स्वर्ग जाते थे। वे भद्र थे। सुषमासुषमा का वर्णन हुआ। इसके बाद सुषमा काल तीन कोड़ाकोड़ी सागर का था। यहाँ मध्यम भोगभूमि थी। मनुष्यों की आयु दो पल्य और ऊँचाई चार हजार धनुष थी। वे दो दिन बाद भोजन करते थे। फिर सुषमादुःषमा काल शुरू हुआ।
श्लोक 52 से 62 सुषमादुःषमा काल
सुषमादुःषमा दो कोड़ाकोड़ी सागर का था। मनुष्यों की आयु एक पल्य और ऊँचाई एक कोश थी। वे एक दिन बाद भोजन करते थे। पल्य का आठवाँ भाग शेष रहने पर कल्पवृक्ष कमजोर हुए। आषाढ़ पूर्णिमा को सूर्य और चंद्रमा दिखे। वे आकाश में सुवर्ण-से शोभते थे। वे साधुओं और राजाओं का अनुकरण करते थे।
श्लोक 63 से 71 प्रतिश्रुति कुलकर
प्रतिश्रुति पहले कुलकर थे। उनकी आयु पल्य का दसवाँ भाग और ऊँचाई 1800 धनुष थी। वे आभूषणों से शोभित थे। वे अवधिज्ञान धारक थे। उन्होंने प्रजा को अमृत-से वचन दिए। सूर्य-चंद्रमा को देख भयभीत प्रजा को उन्होंने आश्वस्त किया। वे ग्रहों का स्वरूप समझाते थे।
श्लोक 72 से 81 सन्मति कुलकर
प्रतिश्रुति ने व्यवस्थाएँ बताईं। प्रजा ने उनकी स्तुति की। असंख्यात वर्ष बाद सन्मति कुलकर हुए। वे आभूषणों से शोभित थे। उनकी आयु संख्यात वर्ष और ऊँचाई 1300 धनुष थी। ज्योतिरंग वृक्ष मंद हुए। रात्रि में तारे दिखे।
श्लोक 82 से 91 सन्मति का उपदेश
तारों को देख प्रजा भयभीत हुई। सन्मति ने उन्हें भयमुक्त किया। उन्होंने तारों और ज्योतिश्चक्र का स्वरूप बताया। वे सूर्यग्रहण आदि समझाते थे। प्रजा ने उनकी प्रशंसा की। असंख्यात वर्ष बाद क्षेमंकर मनु हुए। वे मेरु-से शोभित थे।
श्लोक 92 से 101 क्षेमंकर मनु
क्षेमंकर की आयु अटट और ऊँचाई 800 धनुष थी। पशु विकारग्रस्त हुए। प्रजा ने भयभीत होकर उनसे पूछा। क्षेमंकर ने पशुओं के बदलाव को कालदोष बताया। उन्होंने दुष्ट पशुओं को छोड़ने की सलाह दी। प्रजा ने गाय-भैंस के साथ रहना शुरू किया।
श्लोक 102 से 111 क्षेमंधर और सीमंकर
क्षेमंकर की आयु समाप्त होने पर असंख्यात वर्षों बाद क्षेमंधर चौथे मनु हुए। उनकी आयु तुटिक वर्ष और ऊँचाई 775 धनुष थी। इन्होंने दुष्ट पशुओं से रक्षा के लिए लाठी का उपदेश दिया। इसके बाद सीमंकर पाँचवें मनु हुए। उनकी आयु कमल वर्ष और ऊँचाई 750 धनुष थी। इन्होंने कल्पवृक्षों की सीमा नियत की।
श्लोक 112 से 124 सीमंधर और विमलवाहन
सीमंधर छठे मनु हुए। उनकी आयु नलिन वर्ष और ऊँचाई 725 धनुष थी। इन्होंने कल्पवृक्षों की सीमाएँ चिह्नित कीं। इसके बाद विमलवाहन सातवें मनु हुए। उनकी आयु पद्म वर्ष और ऊँचाई 700 धनुष थी। इन्होंने सवारी के लिए पशुओं पर उपकरण लगाने का उपदेश दिया। फिर चक्षुष्मान आठवें मनु हुए। उनकी आयु पद्मांग वर्ष और ऊँचाई 675 धनुष थी। इन्होंने पुत्र-मुख देखने का भय दूर किया।
श्लोक 125 से 138 यशस्वान से चंद्राभ
यशस्वान नौवें मनु हुए। उनकी आयु कुमुद वर्ष और ऊँचाई 650 धनुष थी। इन्होंने संतानों को आशीर्वाद देने की प्रथा शुरू की। अभिचंद्र दसवें मनु हुए। उनकी आयु कुमुदा वर्ष और ऊँचाई 625 धनुष थी। इन्होंने चंद्रमा के साथ क्रीड़ा सिखाई। चंद्राभ ग्यारहवें मनु हुए। उनकी आयु नयुत वर्ष और ऊँचाई 600 धनुष थी। ये संतानों के साथ जीवित रहने की प्रथा लाए।
श्लोक 139 से 151 मरुदेव और प्रसेनजित
मरुदेव बारहवें मनु हुए। उनकी आयु नयुत वर्ष और ऊँचाई 575 धनुष थी। इन्होंने नाव और सीढ़ियाँ बनाने का उपदेश दिया। प्रसेनजित तेरहवें मनु हुए। उनकी आयु एक पर्व और ऊँचाई 550 धनुष थी। इन्होंने जरायु हटाने का उपदेश दिया। ये सूर्य-से शोभित थे।
श्लोक 152 से 163 नाभिराज का स्वरूप
नाभिराज चौदहवें मनु हुए। उनकी आयु एक करोड़ पूर्व और ऊँचाई 525 धनुष थी। वे आभूषणों से शोभित थे। उनका मुख चंद्रमा को लज्जित करता था। उनकी भुजाएँ सर्प-सी थीं। उनका कटि स्थिर और नाभि सुंदर थी। उनका शरीर इंद्र से भी श्रेष्ठ था।
श्लोक 164 से 171 मेघों का आगमन
नाभिराज के समय मेघ प्रकट हुए। वे बिजली और गर्जना से युक्त थे। ठंडी वायु बहने लगी। चातक और मोर हर्षित हुए। मेघ पर्वतों का अभिषेक करते थे।
श्लोक 172से 183 धान्य की उत्पत्ति
मेघों से नदियाँ बहीं। वे शोक-से रोते थे। बिजली नटी-सी नृत्य करती थी। चातक मेघों से प्रेम करते थे। मेघों से धान्य उत्पन्न हुए। ये पुण्य से पक गए।
श्लोक 184 से 192 प्रजा की व्याकुलता
धान्य मध्यम वृष्टि से फले। चावल, गेहूँ आदि उत्पन्न हुए। प्रजा उपयोग नहीं जानती थी। कल्पवृक्ष नष्ट होने से वे व्याकुल हुए। भूख से चित्त अशांत हुआ। वे नाभिराज से प्रार्थना करने लगे।
श्लोक 193 से 201 नाभिराज का उपदेश
प्रजा ने वृक्षों और झाड़ियों के उपयोग पूछा। नाभिराज ने उन्हें भयमुक्त किया। इन्होंने कहा कि ये वृक्ष भोग्य हैं। विषवृक्षों को छोड़ना चाहिए। ओषधियाँ स्वाद बढ़ाती हैं।
श्लोक 202 से 212 प्रजा का हित
नाभिराज ने रस निकालने और बर्तन बनाने का उपदेश दिया। प्रजा प्रसन्न हुई। भोगभूमि नष्ट हो गई। चौदह कुलकर विदेह से आए थे। इन्होंने पुण्य से सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। ये कुल और वंश स्थापित करते थे।
नाभिराज ने रस निकालने, बर्तन बनाने का उपदेश। प्रजा प्रसन्न, भोगभूमि समाप्त। कुलकर विदेह से उत्पन्न, सम्यग्दर्शन धारक। कार्यों हेतु कुलकर नाम।
श्लोक 213 से 221 दंड और संख्याएँ
वृषभदेव और भरत भी कुलकर थे। कुलकरों ने दंड व्यवस्था बनाई। प्रथम पांच (हा), अगले पांच (हा, मा), शेष (हा, मा, धिक)। भरत ने शारीरिक दंड शुरू किए। आयु की संख्याएँ पूर्व, पर्व आदि हैं। इनका गुणाकार से निश्चय होता है।
श्लोक 222 से 239 कुलकरों का कार्य
संख्याएँ संख्यात और असंख्यात हैं। कुलकरों के नाम प्रतिश्रुति से नाभिराज तक हैं। इन्होंने भय दूर करने से लेकर नाल काटने तक के कार्य किए। गौतम ने यह कथन किया। सभा आनंदित हुई। वे वृषभदेव का पुराण कहने को तत्पर हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 3- Shlok 1 to 10
भगवान वृषभनाथ को नमस्कार कर पीठिका शुरू। कालद्रव्य अनादिनिधन, सूक्ष्म, लोकाकाश में व्याप्त। यह पदार्थों के परिणमन में सहकारी, जैसे चाक की कील। पांच अस्तिकाय (जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश), काल छठा द्रव्य, एकप्रदेशी होने से अनस्तिकाय। व्यवहारकाल (घड़ी आदि) से मुख्य काल सिद्ध। काल में गुण-पर्याय, द्रव्यत्व सिद्ध।
श्लोक ( Shlok ) 1
पुराणं मुनिमानम्य जिनं वृषभमच्युतम् । महतस्तत्पुराणस्य पीठिका व्याकरिष्यते ।।१।।
मैं उन वृषभनाथ स्वामी को नमस्कार करके इस महापुराण की पीठिका का व्याख्यान करता हूँ जो कि इस अवसर्पिणी युग के सबसे प्राचीन मुनि हैं, जिन्होंने कर्मरूपी शत्रुओं को जीत लिया है और विनाश से रहित हैं ।।1।।
“I offer my salutations to Lord Vrishabhanatha and then proceed to explain the introduction of this great Purana, which is the most ancient sage of this Avasarpini era, who has conquered the enemies in the form of actions and is free from destruction.” (1)
श्लोक ( Shlok ) 2
अनादिनिधनः कालो वर्त्तनालक्षणो मतः । लोकमाग्रः सुसूक्ष्माणुपरिच्छिन प्रमाणकः ।।२।।
कालद्रव्य अनादिनिधन है, वर्तना उसका लक्षण माना गया है (जो द्रव्यों की पर्यायों के बदलने में सहायक हो उसे वर्तना कहते हैं) यह कालद्रव्य अत्यंत सूक्ष्म परमाणु बराबर है और असंख्यात होने के कारण समस्त लोकाकाश में भरा हुआ है । भावार्थ―कालद्रव्य का एक-एक परमाणु लोकाकाश के एक-एक प्रदेश पर स्थित है ।।2।।
“Time is an eternal and beginningless substance, and its characteristic is considered to be ‘Vartana’ (which refers to that which helps in the transformation of the states of substances). This time substance is extremely subtle, equivalent to the size of an atom, and because it is infinite, it fills the entire cosmic space.
Meaning: Every atom of the time substance is located in a specific region of the cosmic space.” (2)
श्लोक ( Shlok ) 3
सोऽसंख्येयोऽप्यनन्तस्य वस्तुराशेरुपग्रहे । वर्त्तते स्वगतानन्तसामर्थ्यपरिश्रृंहितः ।।३।।
उस कालद्रव्य में अनंत पदार्थों के परिणमन कराने की सामर्थ्य है अत: वह स्वयं असंख्यात होकर भी अनंत पदार्थों के परिणमन में सहकारी होता है ।।3।।
“The time substance has the ability to cause the transformation of infinite substances. Therefore, although it is itself infinite, it collaborates in the transformation of countless substances.” (3)
श्लोक ( Shlok ) 4
यथा कुलालचक्रस्य भ्रन्ते हें तुररिशला । तथा कालः पदार्थानां वर्शनोपग्रहे मतः ॥४॥
जिस प्रकार कुम्हार के चाक के घूमने में उसके नीचे लगी हुई कील कारण है उसी प्रकार पदार्थों के परिणमन होने में काल द्रव्य सहकारी कारण है । संसार के समस्त पदार्थ अपने-अपने गुणपर्यायों द्वारा स्वयमेव ही परिणमन को प्राप्त होते रहते हैं और कालद्रव्य उनके उस परिणमन में मात्र सहकारी कारण होता है । जब कि पदार्थों का परिणमन अपने-अपने गुणपर्याय रूप होता है तब अनायास ही सिद्ध हो जाता है कि वे सब पदार्थ सर्वदा पृथक्-पृथक् रहते है अर्थात् अपना स्वरूप छोड़कर परस्पर में मिलते नहीं हैं ।।4।।
“Just as the nail fixed under the potter’s wheel is the cause of its rotation, in the same way, the time substance is the cooperating cause in the transformation of substances. All the substances in the world naturally undergo transformation through their own inherent qualities and states, and the time substance merely acts as a cooperative cause in that transformation. Since the transformation of substances occurs according to their own inherent qualities and states, it naturally becomes evident that all these substances always remain distinct and do not merge with each other, leaving their own form unchanged.” (4)
श्लोक ( Shlok ) 5–7
*स्वतोऽपि वैर्त्तमानानां सोऽर्थानां परिवर्त्तकः । यथास्वं गुणपर्यायैरतो नान्योऽन्यसं प्लः ।।
सोऽस्तिकायेष्वसंपाठानास्तीत्येके’ विमन्वते । षड्ङ्गन्येष्पदिष्टत्वाद्युक्तियोगाच्च तद्गतिः ।।६।
मुख्यकल्पेन कालोऽस्ति व्यवहारप्रतीतितः । मुख्याइते न गौखोऽस्ति सिंहो माणवको यथा ॥७॥
जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश ये पाँच अस्तिकाय हैं अर्थात् सत्स्वरूप होकर बहुप्रदेशी है । इनमें कालद्रव्य का पाठ नहीं है, इसलिए वह है ही नहीं इस प्रकार कितने ही लोग मानते हैं परंतु उनका वह मानना ठीक नहीं है क्योंकि यद्यपि एक प्रदेशी होने के कारण काल द्रव्य का पंचास्तिकायों में पाठ नहीं है तथापि छह द्रव्यों में तो उसका पाठ किया गया है । इसके सिवाय युक्ति से भी काल द्रव्य का सद्धाव सिद्ध होता है । वह युक्ति इस प्रकार है कि संसार में जो घड़ी, घाटा आदि व्यवहार काल प्रसिद्ध है वह पर्याय है । पर्याय का मूलभूत कोई न कोई पर्यायी अवश्य होता है क्योंकि बिना पर्यायी के पर्याय नहीं हो सकती इसलिए व्यवहार काल का मूलभूत मुख्य काल द्रव्य है । मुख्य पदार्थ के बिना व्यवहार―गौण पदार्थ की सत्ता सिद्ध नहीं होती । जैसे कि वास्तविक सिंह के बिना किसी प्रतापी बालक में सिंह का व्यवहार नहीं किया जा सकता, वैसे ही मुख्य काल के बिना घड़ी, घाटा आदि में काल द्रव्य का व्यवहार नहीं किया जा सकता । परंतु होता अवश्य है इससे काल द्रव्य का अस्तित्व अवश्य मानना पड़ता है ।।5-7।।
Jiva (soul), Pudgala (matter), Dharma (medium of motion), Adharma (medium of rest), and Akasha (space) are the five Astikayas, meaning they possess existence and have multiple spatial units. Among these, the substance of time (Kala Dravya) is not included in the Astikayas, and some people argue that it does not exist because it is not a spatial entity. However, this belief is incorrect.
Although Kala Dravya is not part of the Astikayas due to being single-spatial (ekadeshi), it is included in the six fundamental substances (Dravyas). Additionally, the existence of Kala Dravya can be established through reasoning.
This reasoning is as follows: In the world, the conventional concept of time (Vyavahara Kala), such as seconds, minutes, and hours, is well-known. These are transformations (paryayas). Every transformation must have an underlying entity (paryayee), as a transformation cannot exist without its base. Therefore, the conventional notion of time is rooted in the fundamental entity of Kala Dravya.
Without a primary entity, the existence of a secondary or conventional entity cannot be established. For example, without the existence of a real lion, the figurative usage of ‘lion’ for a brave child cannot be justified. Similarly, without the existence of the primary Kala Dravya, the conventional use of time (such as seconds, minutes, and hours) cannot occur. Thus, the existence of Kala Dravya must be accepted.”
श्लोक ( Shlok ) 8
प्रदेशप्रचयापायाद कालस्यानस्तिकायता । गुणप्रचययोगोऽस्य इव्यत्वादस्ति सोऽस्त्यतः ।।८।।
यद्यपि इनमें एक से अधिक बहुप्रदेशों का अभाव है इसलिए इसे अस्तिकायों में नहीं गिना जाता है तथापि इसमें अगुरुलघु आदि अनेक गुण तथा उनके विकारस्वरूप अनेक पर्याय अवश्य हैं क्योंकि यह द्रव्य है, जो-जो द्रव्य होता है उसमें गुणपर्यायों का समूह अवश्य रहता है । द्रव्यत्व का गुणपर्यायों के साथ जैसा संबंध है वैसा बहुप्रदेशों के साथ नहीं है । अत: बहुप्रदेशों का अभाव होने पर भी काल पदार्थ द्रव्य माना जा सकता है और इस तरह काल नामक पृथक् पदार्थ की सत्ता सिद्ध हो जाती है ।।8।।
Although it lacks the characteristic of being multi-spatial (having multiple regions or divisions), and thus cannot be considered among the “Astitkayas” (extended substances), it nevertheless possesses numerous qualities like “Agurulaghu” (neither heavy nor light) and various transformations arising from these qualities. This is because it is a “Dravya” (substance). Every substance inherently contains a collection of qualities and their transformations.
The relationship of “Dravyatva” (substantiality) with qualities and transformations is not the same as its relationship with multi-spatiality. Therefore, even in the absence of multi-spatiality, the entity called “Kala” (time) can be considered a substance. In this way, the independent existence of a separate entity known as “Kala” is established.
श्लोक ( Shlok ) 9
अस्तिका यश्रुतिर्वक्ति कालस्यानस्तिका यताम् । सर्वस्य सविप४रवाज्जीवकामश्रुति यथा ॥९॥
जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म और आकाश को अस्तिकाय कहने से ही यह सब होता है कि काल द्रव्य अस्तिकाय नहीं है क्योंकि विपक्षी के रहते हुए ही विशेषण की सार्थकता सिद्ध हो सकती है । जिस प्रकार छह द्रव्यों में चेतनरूप आत्मद्रव्य को जीव कहना ही पुद्गलादि पाँच द्रव्यों को अजीव सिद्ध कर देता है उसी प्रकार जीवादि को अस्तिकाय कहना ही काल को अनस्तिकाय सिद्ध कर देता है ।।9।।
The context of this verse is rooted in Jain philosophy, which describes six fundamental substances (dravya): jīva (soul), pudgala (matter), dharma (medium of motion), adharma (medium of rest), ākāśa (space), and kāla (time). The discussion here revolves around the concepts of “astikāya” (having a corporeal existence) and “anastikāya” (not having a corporeal existence).
Translation:
Jīva, pudgala, dharma, adharma, and ākāśa are referred to as “astikāya” (having a corporeal form). This automatically implies that kāla (time) is not “astikāya” because the relevance of a specific attribute or designation is established only when its opposite exists.
For instance:
- Among the six substances, jīva is described as sentient, which automatically classifies the remaining five substances (pudgala, dharma, adharma, ākāśa, and kāla) as non-sentient (ajīva).
- Similarly, calling jīva and others “astikāya” implies that kāla (time) is “anastikāya” (not having a corporeal form).
Key Points:
- “Astikāya” refers to something that possesses both “existence” (astitva) and “corporeal form” (kāya or extension).
- Kāla (time), being formless and without corporeal dimensions, is categorized as “anastikāya.”
Thus, the designation “astikāya” gains significance and meaning only in the presence of its opposite, “anastikāya” (represented by kāla).
श्लोक ( Shlok ) 10
कालोऽन्यो व्यवहारात्मा मुख्यकालव्यपाश्रयः । परापरत्वसंसूच्यो वर्णितः सर्वदर्शिभिः ।।१०।।
इस मुख्य काल के अतिरिक्त जो घड़ी, घाटा आदि है वह व्यवहारकाल कहलाता है । यहाँ यह याद रखना आवश्यक होगा कि व्यवहारकाल मुख्य काल से सर्वथा स्वतंत्र नहीं है वह उसी के आश्रय से उत्पन्न हुआ उसकी पर्याय ही है । यह छोटा है, यह बड़ा है आदि बातों से व्यवहारकाल स्पष्ट जाना जाता है ऐसा सर्वज्ञदेव ने वर्णन किया है ।।10।।
part from the primary or eternal time (main time), there exists another aspect of time, referred to as Vyavahar Kala (practical time), which encompasses units like hours, minutes, etc. It is essential to remember that practical time is not entirely independent of the primary time; rather, it is derived from and dependent on it. It is essentially a counterpart or manifestation of the primary time. Concepts such as “this is small,” “this is big,” etc., help in understanding practical time more clearly, as described by the omniscient sages.
श्लोक 11 से 20
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155 | श्लोक 156 से 162
पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
Front Desk Jainism Forum (FDJF)
FAIR USE DECLARATION
This information is provided by the Front Desk Jainism Forum (FDJF) under Fair Use guidelines for educational and research purposes. To the best of our knowledge, it is in the public domain, and our goal is to make it more accessible.
If you are the intellectual property owner and have concerns, please contact us, and we will address the matter promptly. Users are advised to verify legal use in their jurisdiction before accessing this material. For more details, visit our website.