श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72
English translation of Uttar Puran parv 57- shlok 73 to 81
श्लोक ( Shlok ) 73
विश्वभूतेविंशाखादिभूतिर्जातोऽनुजः प्रिया । लक्ष्मणाख्यास्य नन्द्यन्तविशाखस्तनयोऽनयोः ॥ ७३ ॥
विश्व-भूतिके विशाखभूति नामका छोटा भाई था, उसेकी स्त्रीका नाम लक्ष्मणा था और उन दोनोंके विशाखनन्दी नामका पुत्र था ॥ ७३ ॥
Vishvabhuti had a younger brother named Vishakhabhuti; his wife’s name was Lakshmana, and the two of them had a son named Vishakhanandi. || 73 ||
श्लोक ( Shlok ) 74
विश्वभूतिस्तपः प्रायात् कृत्वा राज्ये निजानुजम् । प्रजाः प्रपालयत्यस्मिन्प्रणताखिलभूपतौ ॥ ७४ ॥
विश्वभूति अपने छोटे भाईको राज्य सौंपकर तपके लिए चला गया और समस्त राजाओंको नम्र बनाता हुआ विशाखभूति प्रजाका पालन करने लगा ॥ ७४ ॥
Having entrusted the kingdom to his younger brother, Vishvabhuti departed to perform penance; meanwhile, Vishakhabhuti began to protect and rule over the subjects, bringing all other kings into submission. || 74 ||
श्लोक ( Shlok ) 75
नानावीरुलतावृक्षैविंराजन्नन्दनं वनम् । यद्विश्वनन्दिनस्तत्र प्राणेभ्योऽपि प्रियं परम् ॥ ७५ ॥
उसी राजगृह नगरमें नाना गुल्मों, लताओं और वृक्षोंसे सुशोभित एक नन्दन नामका बाग था जो कि विश्वनन्दीको प्राणोंसे अधिक प्यारा था ।। ७५ ।।
In that same city of Rajgriha, there was a garden named Nandan, adorned with various clusters of shrubs, creepers, and trees, which was dearer to Vishvanandi than his own life. || 75 ||
श्लोक ( Shlok ) 76
विशाखभूतिपुत्रेण निर्भर्त्य वनपालकान् । स्वीकृतं तद्बलात्तेन तेनासीत्संयुगस्तयोः ॥ ७६ ॥
विशाखभूतिके पुत्रने वनवालोंको डाँट कर जबर्दस्ती वह वन ले लिया जिससे उन दोनों – विश्वनन्दी और विशाखनन्दीमें युद्ध हुआ ।॥ ७६ ॥
The son of Vishakhabhuti (Vishakhanandi) rebuked the forest keepers and took possession of that garden by force, which led to a battle between the two—Vishvanandi and Vishakhanandi. || 76 ||
श्लोक ( Shlok ) 77
संग्रामासहनात्तत्र दृष्ट्वा तस्य पलायनम् । विश्वनन्दी विरक्तः सन् धिग्मोहमिति चिन्तयन् ॥ ७७ ॥
विशाखनन्दी उस युद्धको नहीं सह सका अतः भाग खड़ा हुआ। यह देखकर विश्वनन्दीको वैराग्य उत्पन्न हो गया और वह विचार करने लगा कि इस मोहको धिक्कार है ।। ७७ ।।
Vishakhanandi could not withstand that battle and fled the field. Seeing this, a sense of detachment (Vairagya) arose within Vishvanandi, and he began to reflect: “Fie upon this worldly attachment!” || 77 ||
श्लोक ( Shlok ) 78
त्यक्त्वा सर्वं समागत्य सम्भूतगुरुसन्निधौ । पितृव्यमग्रणीकृत्य संयमं प्रत्यपद्यत ॥ ७८ ॥
वह सबको छोड़कर सम्भूत गुरुके समीप आया और काका विशाखभूतिको अग्रगामी बनाकर अर्थात् उसे साथ लेकर दीक्षित हो गया ।॥ ७८ ॥
Leaving everything behind, he came to the presence of Preceptor Sambhuta and, placing his uncle Vishakhabhuti at the forefront—that is, taking him along—he was initiated into the monkhood. || 78 ||
श्लोक ( Shlok ) 79
स शीलगुणसम्पन्नः कुर्वननशनं तपः । विहरन्नेकदा भोक्तुं प्राविशन् मथुरापुरम् ॥ ७९ ॥
वह शील तथा गुणोंसे सम्पन्न होकर अनशन तप करने लगा तथा विहार करता हुआ एक दिन मथुरा नगरीमें प्रविष्ट हुआ ॥ ७९ ll
Having become endowed with character and virtuous qualities, he began performing the penance of fasting (Anashan); while wandering from place to place, he entered the city of Mathura one day. || 79 ||
श्लोक ( Shlok ) 80 – 81
स बालवत्सया धेन्वा क्रुधा प्रतिहतोऽपतत् । दौष्ट्यान्निर्वासितो देशान् भ्राम्यंस्तत्रागतो विधीः ॥८०॥विशाखनन्दी तं दृष्ट्वा वेश्यासौधतले स्थितः । व्यहसद्विक्रमस्तेऽद्य क यातः स इति क्रुधा ॥ ८१ ॥
वहाँ एक छोटे बछड़ेवाली गायने क्रोधसे धक्का दिया जिससे वह गिर पड़ा । दुष्टताके कारण राज्यसे बाहर निकाला हुआ मूर्ख विशाखनन्दी अनेक देशोंमें घूमता हुआ उसी मथुरानगरीमें आकर रहने लगा था। वह उस सयय एक वेश्याके मकानकी छतपर बैठा था। वहाँ से उसने विश्वनन्दीको गिरा हुआ देखकर क्रोधसे उसकी हँसी की कि तुम्हारा वह पराक्रम आज कहाँ गया ? ।। ८०-८१ ।।
There, a cow with a young calf struck him in anger, causing him to fall. Meanwhile, the foolish Vishakhanandi, who had been exiled from the kingdom due to his wickedness and had wandered through many lands, was then living in that same city of Mathura. At that moment, he was sitting on the roof of a courtesan’s house. From there, seeing Vishvanandi fallen, he mocked him in anger, saying, “Where has that prowess of yours gone today?” || 80–81 ||
श्लोक 82 से 91
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