अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्तीका वर्णन पर्व 48 – श्लोक 85 से 101 | श्लोक 102 से 112
English translation of Uttar Puran parv 48- shlok 113 to 121
श्लोक ( Shlok ) 113
ज्ञात्वापि तन्मृतिं भूपमाकर्णयितुमक्षमाः । तत्स्नेहं तेषु जानानः संवृत्य सचिवाः स्थिताः ॥ ११३ ॥
मंत्री यह जानते थे कि राजाका पुत्रों पर कितना स्नेह है अतः पुत्रोंका मरण जानकर भी वे राजाको यह समाचार सुनानेके लिए समर्थ नहीं हो सके। समाचारका सुनाना तो दूर रहा किन्तु उसे छिपा कर ही बैठ रहे ।।११३।।
Knowing well the depth of the king’s affection for his sons, the ministers, even upon learning of their death, found themselves unable to convey this tidings to him. Far from announcing it, they remained silent, concealing the news within themselves. ॥ 113 ॥
श्लोक ( Shlok ) 114
तदा ब्राह्मणरूपेण मणिकेतुरुपेत्य तम् । महाशोकसमाक्रान्तो वावेदयदिदं वचः ॥ ११४ ॥
तदनन्तर मणिकेतु ब्राह्मणका रूप रख कर चक्रवर्ती सगरके पास पहुँचा और बहुत भारी शोकसे आक्रान्त होकर निम्न्नाङ्कित वचन कहने लगा ॥ ११४ ॥
Thereafter, Maṇiketu, assuming the guise of a Brāhmaṇa, approached Emperor Sagara and, overwhelmed with profound grief, began to utter the following words: ॥ 114 ॥
श्लोक ( Shlok ) 115 – 117
देव देवे धराचक्रं रक्षति क्षेममत्र नः । किन्त्वन्तकेन मत्पुत्रोऽहार्यारा ज्जीवितावधेः ॥ ११५ ॥
प्रेयान् ममैक एवासौ नायुषा तेन जीवितम् । नानीतश्चेस्वया सोऽद्य तेन मामपि पश्यतः ॥ ११६ ॥
तव विद्धयग्रतो नीतं । किं कुर्वन्ति न गर्विताः । “शलाटुभक्षणे लोलः किं पक्कं तत्त्यजेदिति ॥ ११७ ॥
‘हे देव ! जब आप पृथिवीमण्डलका पालन कर रहे हैं तब हम लोगोंकी यहाँ सब प्रकार कुशल है किन्तु आयुकी अवधि दूर रहने पर भी यमराजने मेरा पुत्र हरण कर लिया है। वह मेरा एक ही पुत्र था। यदि आप उसे आयुसे युक्त अर्थात् जीवित नहीं करते हैं तो आज मुझे भी आपके देखते-देखते उस यमराजके द्वारा ले जाया हुआ समझें । क्योंकि अहङ्कारी लोग क्या नहीं करते हैं। जो कच्चे फल खानेमें सतृष्ण है वह भला पके फल क्यों छोड़ेगा ।। ११५-११७ ।।
“O Lord! While you are the protector of the earthly realm, all is well with us in every respect; yet, though his allotted span of life was far from exhausted, Yama has carried away my son. He was my only child. If you do not restore him to life—endowed with his full term of years—then know that even I, before your very eyes, shall be taken away by that same Yama. For what is it that the arrogant do not dare? He who greedily plucks unripe fruit will scarcely spare the ripe.” ॥ 115–117 ॥
श्लोक ( Shlok ) 118
तदाकर्ष्याह सन् राजा द्विज किं वेत्सि नान्तकः । सिद्धैरेव स वार्योऽन्यैर्ने त्यागोपालविश्रुतम् ॥११८॥
ब्राह्मणके वचन सुनकर राजाने कहा कि हे द्विजराज ! क्या आप नहीं जानते कि यमराज सिद्ध भगवान्के द्वारा ही निवारण किया जाता है; अन्य जीवोंके द्वारा नहीं, यह बात तो आबाल-गोपाल प्रसिद्ध है । ।। ११८ ॥
Hearing the Brāhmaṇa’s words, the king replied: “O foremost of the twice-born! Do you not know that Yama is restrained only by the Siddha Lord, and not by any other being? This truth is well known to all, even from children to elders.” ॥ 118 ॥
श्लोक ( Shlok ) 119
अपवर्त्यायुषः केचिद्वद्धायुर्जीविनः परे । तान् सर्वान् संहरत्येष यमो मृत्योरगोचरः ॥ ११९ ॥
इस संसारमें कितने ही प्राणी ऐसे हैं कि जिनकी आयु बीचमें ही छिद जाती है और कितने ही ऐसे हैं कि जो जितनी आयुका बंध करते हैं उतना जीवित रहते हैं-बीचमें उनका मरण नहीं होता। यह यमराज उन सब जीवोंका संहार करता है पर स्वयं संहारसे रहित है ।। ११ ९।।
“In this world, there are countless beings whose span of life is cut short before its completion, and many others who live out precisely the duration of life they have bound, meeting no untimely end. That Yama brings about the destruction of all such beings, yet he himself remains beyond destruction.” ॥ 119 ॥
श्लोक ( Shlok ) 120
तस्मिन् वहसि चेद्वैर जीर्णो मा भूर्गृहे वृथा । मोक्षदीक्षां गृहाणाशु शोकं हित्वेत्युवाच तम् ॥ १२० ॥
यदि तुम उस यमराज पर द्वेष रखते हो तो घरके भीतर व्यर्थ ही जीर्ण-शीर्ण मत होओ। मोक्ष प्राप्त करनेके लिए शीघ्र ही दीक्षा धारण करो; शोक छोड़ो’ ।। १२० ॥
“If you bear enmity toward that Yama, then do not languish in vain within your house, wasting away in grief. Instead, renounce sorrow and swiftly embrace initiation, so that you may attain liberation.” ॥ 120 ॥
श्लोक ( Shlok ) 121
इत्युक्ते देव किं सत्यमेतद्यन्नान्तकात्परः । बलीति तन्न भेतव्यं मया किञ्चिद्वदिष्यता ॥ १२१ ॥
जब राजा सगर यह कह चुके तो ब्राह्मण-वेषधारी मणिकेतु बोला- ‘हे देव! यदि यह सच है कि यमराजसे बढ़कर और कोई बलवान् नहीं है तो मैं जो कुछ कहूँगा उससे आपको भयभीत नहीं होना चाहिये । ।। १२१ ।।
When King Sagara had thus spoken, Maṇiketu—disguised as a Brāhmaṇa—replied: “O Lord! If it is indeed true that none is more powerful than Yama, then you should not be alarmed by what I am about to say.” ॥ 121 ॥
श्लोक 122 से 131
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