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उत्तरपुराण पर्व 48 अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्तीका वर्णन
श्लोक 1–8 : अजितनाथ पुराण की मंगलाचरण और विमलवाहन का धर्माभिमुख जीवन
भगवान अजितनाथ अनन्तचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से विभूषित ऐसे तीर्थंकर हैं जिनकी निर्मल वाणी भव्य जीवों के राग-द्वेषरूपी मल को धो देती है। उनके चरित्र का श्रवण मोक्षलक्ष्मी की प्राप्ति कराने वाला है। पूर्वविदेह क्षेत्र के वत्स देश में सुसीमा नगर के राजा विमलवाहन अत्यंत गुणवान, न्यायप्रिय और धर्मनिष्ठ थे। वे उत्साह, मन्त्र और फलशक्ति से सम्पन्न होकर प्रजा का पुत्रवत पालन करते थे। उन्होंने यह समझकर कि धर्म ही पुण्य, अर्थ और काम का मूल है, जैनधर्म को अपनाया। जब उनके घातक कषाय क्षीण हुए तब उन्हें आत्मजागरण हुआ और वे संसार से विरक्त होकर जीवन की क्षणभंगुरता पर विचार करने लगे।
श्लोक 9–20 : वैराग्य, दीक्षा, तीर्थंकर नामकर्म और विजय विमान
राजा विमलवाहन ने आयु की क्षणभंगुरता समझकर आशारूपी बन्धनों को तोड़ दिया और राज्य त्यागकर अनेक राजाओं सहित जिनदीक्षा धारण की। कठोर तप, शास्त्रज्ञान और सोलह भावनाओं के चिंतन से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। समाधिमरण के पश्चात वे विजय नामक अनुत्तर विमान में देव हुए, जहाँ उन्होंने दिव्य सुखों का उपभोग किया। पृथ्वी पर अवतरण के छह माह पूर्व भरतक्षेत्र के राजा जितशत्रु के यहाँ प्रतिदिन रत्नवृष्टि होने लगी, जो तीर्थंकर प्रकृति के प्रभाव का सूचक था।
श्लोक 21–31 : माता के स्वप्न, अजितनाथ का जन्म और राजवैभव
रानी विजयसेना ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और राजा जितशत्रु ने उनके गर्भ में तीर्थंकर के अवतरण की घोषणा की। माघ शुक्ल दशमी को भगवान अजितनाथ का जन्म हुआ। देवों ने मेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उन्हें अजितनाथ नाम दिया। वे द्वितीय तीर्थंकर बने। उनका शरीर सुवर्णवर्ण, विशाल और अद्भुत तेज से युक्त था। उचित समय पर उन्होंने राज्य प्राप्त किया और दीर्घकाल तक राज्य तथा भोगों का उपभोग करते हुए भी भीतर से वैराग्य की दिशा में अग्रसर रहे।
श्लोक 32–41 : वैराग्य, दीक्षा और केवलज्ञान की भूमिका
एक दिन महल की छत पर उल्का देखकर अजितनाथ को लक्ष्मी की अस्थिरता का बोध हुआ और वे तत्काल वैराग्य से भर उठे। लौकान्तिक देवों ने उनके इस निर्णय की प्रशंसा की। उन्होंने राज्य अपने पुत्र अजितसेन को सौंप दिया और देवों द्वारा दीक्षाभिषेक के बाद सहेतुक वन में एक हजार राजाओं सहित संयम धारण किया। दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। तत्पश्चात उन्होंने आहार ग्रहण किया और बारह वर्षों तक तपश्चर्या कर आत्मशुद्धि की दिशा में अग्रसर रहे।
श्लोक 42–51 : केवलज्ञान, धर्मसंघ और विश्वविहार
पौष शुक्ल एकादशी को अजितनाथ को केवलज्ञान प्राप्त हुआ और वे सर्वज्ञ बने। उनके विशाल धर्मसंघ में गणधर, मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे। समवसरण में वे संसार, मोक्ष, कारण और फल का उपदेश देते रहे। वे अष्टप्रातिहार्यों से विभूषित, घातिया कर्मों के विजेता और ‘अजित’ नाम के पूर्णतः सार्थक स्वरूप बने। उन्होंने समस्त आर्यक्षेत्र में विहार कर धर्मप्रभावना की और अंततः सम्मेदाचल पहुँचे।
श्लोक 52–61 : मोक्ष, धर्ममहिमा और सगर चक्रवर्ती की भूमिका
सम्मेदाचल पर भगवान अजितनाथ ने शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मक्षय कर चैत्र शुक्ल पंचमी को मोक्ष प्राप्त किया। उनका जीवन विमलवाहन से देव और फिर तीर्थंकरत्व तक आत्मविजय की महान यात्रा है। धर्म, सोलह भावनाओं और शुद्ध ध्यान की महिमा का प्रतिपादन करते हुए ग्रंथकार उनकी वंदना करता है। इसके बाद अजितनाथ के तीर्थ में उत्पन्न द्वितीय चक्रवर्ती सगर का चरित्र आरम्भ होता है। पूर्वविदेह के वत्सकावती देश में राजा जयसेन और रानी जयसेना के रतिषेण और धृतिषेण नामक दो तेजस्वी पुत्र थे। रतिषेण की अकाल मृत्यु से परिवार शोकसागर में डूब गया।
श्लोक 62–73 : जयसेन का वैराग्य और सगर का जन्म
पुत्रशोक से व्यथित राजा जयसेन और उनकी रानी मूर्छित हो गए, पर गुरु के उपदेश से जयसेन को संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने शरीर और परिग्रह को दुःखमूल मानकर धृतिषेण को राज्य सौंप दिया और अपने साले महारुत सहित दीक्षा ले ली। संन्यासमरण के बाद जयसेन अच्युत स्वर्ग में महाबल देव और महारुत मणिकेतु देव बने। वहाँ दोनों ने परस्पर यह संकल्प किया कि जो पहले मनुष्य जन्म लेगा, दूसरा उसे वैराग्य का उपदेश देगा। तत्पश्चात महाबल देव अयोध्या में राजा समुद्रविजय और रानी सुबाला के यहाँ सगर के रूप में जन्मे। सगर चक्रवर्ती दीर्घायु, दिव्य लक्षणों से युक्त, सुवर्णकान्तिमान और महान भविष्य वाले पुरुष बने।
श्लोक 74–84 : सगर का चक्रवर्ती वैभव और मणिकेतु का प्रथम उपदेश
सगर ने अठारह लाख पूर्व कुमारावस्था में बिताकर महामण्डलेश्वर पद प्राप्त किया और फिर चक्ररत्न प्रकट होने पर छह खण्डों की पृथ्वी पर दिग्विजय कर भरत चक्रवर्ती के समान सार्वभौम साम्राज्य स्थापित किया। अयोध्या लौटकर वह राज्यलक्ष्मी और भोगों में सुखपूर्वक स्थित रहा तथा उसके साठ हजार तेजस्वी पुत्र हुए। इसी समय केवलज्ञानी चतुर्मुख मुनि के समवसरण में मणिकेतु देव ने अपने पूर्वसखा महाबल को सगर रूप में पहचाना और उसे पूर्व प्रतिज्ञा स्मरण कराकर वैराग्य का उपदेश दिया। उसने भोगों की भयावहता और मोक्षमार्ग की महिमा समझाई, किन्तु काललब्धि के अभाव और सांसारिक आसक्ति के कारण सगर उस समय विरक्त न हो सका।
श्लोक 85–101 : मणिकेतु के पुनः प्रयास और राजपुत्रों की उत्सुकता
सगर की विमुखता देखकर भी मणिकेतु ने उसे नहीं छोड़ा और दूसरे उपाय से चारण ऋद्धिधारी मुनि का रूप धारण कर पुनः वैराग्योपदेश दिया। उसने यौवन, शरीर, संसार और कर्मबंधन की नश्वरता का अत्यंत प्रभावशाली वर्णन किया, जिससे सगर क्षणिक रूप से प्रभावित तो हुआ, पर पुत्रमोह के कारण दीक्षा ग्रहण न कर सका। मणिकेतु ने समझ लिया कि सगर की सबसे बड़ी आसक्ति उसके पुत्र हैं। उधर सगर के वीर पुत्रों ने पिता से कोई महान कार्य माँगा जिससे उनका जीवन सार्थक हो सके और वे केवल भोगभोगी न कहलाएँ।
श्लोक 102–112 : कैलास पर कार्य, गंगापरिखा और मणिकेतु की कठोर नीति
प्रारम्भ में सगर ने पुत्रों को राज्यभोग का ही उपदेश दिया, पर उनके आग्रह पर उसने उन्हें धर्मकार्य सौंपा कि वे भरत चक्रवर्ती द्वारा निर्मित कैलास स्थित चौबीस जिनमन्दिरों के चारों ओर गंगा की परिखा बनाएँ। राजपुत्रों ने दण्डरत्न से यह कार्य शीघ्र पूर्ण कर दिया। तब मणिकेतु ने विचार किया कि हित के लिए कभी-कभी अप्रिय उपाय भी आवश्यक होते हैं। उसने दुष्ट नाग का रूप धारण कर उन अहंकारी राजकुमारों को मायामय भस्मावस्था में डाल दिया ताकि इस घटना से सगर को गहन वैराग्य प्राप्त हो सके।
श्लोक 113–121 : ब्राह्मण वेश में शोकसंदेश और यम पर प्रश्न
मंत्रियों ने सगर के पुत्रों के विनाश का समाचार सीधे देने का साहस नहीं किया। तब मणिकेतु ब्राह्मण रूप में सगर के पास पहुँचा और अपने पुत्र की मृत्यु का उदाहरण देकर यमराज की शक्ति पर प्रश्न उठाया। सगर ने उत्तर दिया कि मृत्यु अटल है और उससे बचाव केवल मोक्षमार्ग द्वारा संभव है; इसलिए शोक के स्थान पर वैराग्य और दीक्षा श्रेष्ठ हैं। तब ब्राह्मण-वेषधारी मणिकेतु ने अवसर देखकर संकेत दिया कि यदि मृत्यु इतनी प्रबल है, तो सगर को अपने ही पुत्रों के प्रसंग में इस सत्य को स्वीकार करना होगा।
श्लोक 122–131 : पुत्रशोक से वैराग्य, दीक्षा और राजकुमारों का जागरण
जब मणिकेतु ने सगर को बताया कि उसके पुत्र भी यम के अधीन हो चुके हैं, तब सगर शोक से मूर्छित हो गया; किन्तु चेतना आने पर उसने संसार, शरीर, यौवन और राज्य की नश्वरता को पहचान लिया। उसने भगीरथ को राज्य देकर दृढ़धर्मा केवली के पास दीक्षा धारण कर ली। इसके बाद मणिकेतु राजकुमारों के पास गया, उन्हें उनके पिता के वैराग्य की सूचना दी और अपनी मायाशक्ति से उन्हें सचेत किया। राजकुमारों ने भी जिनधर्म का आश्रय लेकर तपमार्ग स्वीकार किया।
श्लोक 132–143 : भगीरथ, गंगातीर्थ, मित्रधर्म और सगर की परम सिद्धि
भगीरथ ने भी मुनियों के दर्शन कर श्रावकधर्म ग्रहण किया। मणिकेतु ने अंततः अपनी समस्त योजना प्रकट कर क्षमा माँगी, पर सबने इसे हितकारी मित्रधर्म माना। सगर, उसके पुत्र और अन्य मुनिराज दीर्घ तप के बाद सम्मेदशैल से मोक्ष को प्राप्त हुए। बाद में भगीरथ ने भी राज्य त्यागकर दीक्षा ली; इन्द्र द्वारा उसके चरणाभिषेक से गंगा तीर्थरूप में प्रतिष्ठित हुई। गौतम स्वामी ने निष्कर्ष दिया कि सच्चा मित्र वही है जो हित के लिए कठिनतम उपाय भी करे; मणिकेतु इसका आदर्श उदाहरण है। जयसेन से महाबल देव, फिर सगर चक्रवर्ती और अंततः मोक्षगामी आत्मा बनने तक सगर का चरित्र वैभव से वैराग्य और वैराग्य से परम सिद्धि की महान यात्रा है।
उत्तरपुराण पर्व 49 – संभवनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन
श्लोक 1 से 12 : पूर्वभव में विमलवाहन राजा का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म बन्ध
संभवनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए वर्णन आता है कि पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर के राजा विमलवाहन संसार की नश्वरता, आयु की क्षणभंगुरता और विषयभोगों की असारता का गहन चिंतन कर वैराग्य को प्राप्त हुए। उन्होंने राज्य पुत्र को सौंपकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्र से दीक्षा ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। जीवनांत में वे प्रथम ग्रैवेयक के सुदर्शन विमान में महान् अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 13 से 21 : अहमिन्द्र देव से संभवनाथ के गर्भ और जन्म कल्याणक तक
अहमिन्द्र रूप में दिव्य सुख भोगने के बाद वही जीव भरत क्षेत्र की श्रावस्ती नगरी में राजा दृढ़राज्य और रानी सुषेणा के यहाँ अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और कार्तिक पूर्णिमा को भगवान् संभवनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से लोक में सुख का संचार हुआ और देवों ने उनके दिव्य स्वरूप तथा जगत्-हितकारी महिमा की स्तुति की।
श्लोक 22 से 31 : जन्ममहिमा, राज्यवैभव और वैराग्य की पुनः जागृति
देवों ने संभवनाथ के तेज, ज्ञान और लोकहितकारी स्वरूप की प्रशंसा की। भगवान् दीर्घकाल तक राजवैभव भोगते रहे, परंतु मेघों की चंचलता देखकर उन्हें पुनः संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने समझा कि आयुकर्म ही वास्तविक मृत्युकारक है और जीव अज्ञानवश शरीर एवं विषयों में आसक्त होकर दुःख पाता है।
श्लोक 32 से 41 : दीक्षा, तप और केवलज्ञान
भगवान् ने राज्य त्यागकर पुत्र को सौंपा और सहस्र राजाओं सहित संयम ग्रहण किया। दीक्षा के साथ उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ। चौदह वर्ष तक कठोर तप एवं मौन साधना के पश्चात् शाल्मली वृक्ष के नीचे उन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया और ज्ञानकल्याणक सम्पन्न हुआ।
श्लोक 42 से 54 : धर्मतीर्थ स्थापना, विशाल संघ और दिव्य प्रभाव
केवलज्ञान के बाद भगवान् संभवनाथ ने विशाल धर्मसंघ की स्थापना की जिसमें गणधर, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ और असंख्य देव सम्मिलित थे। वे चौंतीस अतिशयों और आठ प्रातिहार्यों से विभूषित थे। उनकी दिव्यध्वनि ने मिथ्यात्व का नाश किया और वे चन्द्रमा से भी श्रेष्ठ सिद्ध हुए क्योंकि उन्होंने बाह्य और आंतरिक दोनों अंधकारों का नाश किया।
श्लोक 55 से 59 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और परम कल्याण
आयु पूर्ण होने पर भगवान् संभवनाथ सम्मेदाचल पहुँचे, प्रतिमायोग धारण किया और चैत्र शुक्ल षष्ठी को निर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त किया। पूर्वभव के विमलवाहन राजा से अहमिन्द्र और फिर पंचकल्याणक सम्पन्न तीर्थंकर बनकर उन्होंने अनंत जीवों के कल्याण का मार्ग प्रकाशित किया।
उत्तरपुराण पर्व 50 – श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन
श्लोक 1 से 11 : पूर्वभव में राजा महाबल का वैभव और वैराग्य
मंगलावली देश के रत्नसंचय नगर में महाबल नामक प्रतापी और न्यायप्रिय राजा राज्य करते थे। उनके शासन में प्रजा पूर्ण स्वतंत्रता और सुख से जीवन व्यतीत करती थी। वे अपार ऐश्वर्य, कीर्ति, विद्या और पराक्रम से विभूषित थे। दीर्घकाल तक सांसारिक सुख भोगने के पश्चात उनमें वैराग्य जाग्रत हुआ। उन्होंने पुत्र धनपाल को राज्य सौंपकर विमलवाहन गुरु से दीक्षा ग्रहण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं का चिंतन किया।
श्लोक 12 से 22 : तीर्थंकर नामकर्म बंध, देवगति और अभिनन्दननाथ का गर्भ-जन्म
सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से महाबल ने तीर्थंकर नामकर्म बाँधा और समाधिमरण के पश्चात विजय अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव बने। आयु पूर्ण होने पर वे भरत क्षेत्र की अयोध्या नगरी में राजा स्वयंवर और रानी सिद्धार्था के गर्भ में अवतरित हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल द्वादशी को भगवान अभिनन्दननाथ का जन्म हुआ। इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘अभिनन्दन’ रखा।
श्लोक 23 से 31 : जन्म महोत्सव, दिव्य महिमा और राज्यारोहण
इन्द्र ने अत्यंत हर्षपूर्वक नृत्य और उत्सव मनाकर बालक को पुनः अयोध्या पहुँचाया। भगवान अभिनन्दननाथ संभवनाथ के बाद अवतीर्ण हुए। उनका शरीर अत्यंत ऊँचा, स्वर्णवत् कान्तिमान और पुण्यसमूह का प्रत्यक्ष स्वरूप था। कुमारावस्था पूर्ण होने पर पिता ने उन्हें राज्य देकर वनगमन किया। वे तेज, शांति, वैभव और पुण्य में अद्वितीय सम्राट बने।
श्लोक 32 से 41 : असाधारण गुण, सम्यग्दर्शन और लोककल्याणकारी व्यक्तित्व
राजा अभिनन्दननाथ के चरणों में समस्त राजाओं सहित इन्द्र भी नतमस्तक होते थे। उनमें अविनाशी क्षायिक सम्यग्दर्शन विद्यमान था। वे कुमार अवस्था में धीर-वीर, संयम में शांत और अंतिम अवस्था में उदात्त बने। उनका जीवन धर्म, शक्ति, ज्ञान और लोकहित का अद्भुत समन्वय था। वे जन्मपूर्व से ही श्रेष्ठ गुणों से सम्पन्न थे और मोहादि शत्रुओं के विनाश के लिए तत्पर रहते थे।
श्लोक 42 से 53 : वैराग्य, दीक्षा और मनःपर्ययज्ञान
राज्यकाल के अंत में मेघों में उत्पन्न और नष्ट होते महल को देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने शरीर, आयु और सम्पत्ति की अस्थिरता पर चिंतन कर वैराग्य धारण किया। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने हजार राजाओं सहित माघ शुक्ल द्वादशी को दीक्षा ली। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान की प्राप्ति हुई।
श्लोक 54 से 63 : केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के अगले दिन इन्द्रदत्त राजा ने उन्हें प्रथम आहार अर्पित किया। अठारह वर्ष के तप और मौन साधना के पश्चात पौष शुक्ल चतुर्दशी को असन वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उनके विशाल संघ में गणधर, पूर्वधारी, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, मुनि, आर्यिका, श्रावक और श्राविकाओं की विशाल संख्या थी। वे धर्मवृष्टि द्वारा असंख्य जीवों का कल्याण करते रहे।
श्लोक 64 से 70: सम्मेदशिखर पर मोक्ष और अंतिम स्तुति
भगवान अभिनन्दननाथ ने आर्यखण्ड में व्यापक विहार कर धर्म का प्रचार किया और अंततः सम्मेदगिरि पर एक मास के ध्यान के पश्चात वैशाख शुक्ल षष्ठी को पुनर्वसु नक्षत्र में अनेक मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनकी पूजा की। पूर्वभव के महाबल, देवगति के अहमिन्द्र और वर्तमान के तीर्थंकर अभिनन्दननाथ—इन तीनों महान अवस्थाओं से विभूषित प्रभु समस्त भव्य जीवों के भय का नाश कर कल्याण करें।
उत्तरपुराण पर्व 51 – सुमतिनाथ तीर्थंकर का पुराण वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा रतिषेण का वैराग्यपूर्ण चिंतन
धातकीखण्ड द्वीप के पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा रतिषेण धर्मनिष्ठ, समृद्ध और न्यायप्रिय शासक थे। वे अर्थ, धर्म और काम का संतुलित पालन करते हुए भी संसार के सुखों की नश्वरता को समझने लगे। उन्होंने विचार किया कि अर्थ और काम संसारवृद्धि के कारण हैं तथा पापयुक्त धर्म भी मोक्षदायक नहीं; केवल निष्पाप मुनिधर्म ही जीव को जन्म-मरण से मुक्त कर सकता है। इस प्रकार उनके अंतःकरण में वैराग्य जागृत हुआ।
श्लोक 12 से 21 : दीक्षा, तीर्थंकर प्रकृति बन्ध और सुमतिनाथ के गर्भावतरण की भूमिका
राजा रतिषेण ने राज्य पुत्र को सौंपकर दीक्षा धारण की, कठोर तप किया और दर्शनविशुद्धि आदि कारणों से तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। अंतकाल में संन्यासमरण कर वे वैजयन्त विमान के अहमिन्द्र बने। आयु पूर्ण होने पर वे अयोध्या के राजा मेघरथ और रानी मंगला के गर्भ में अवतरित हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे, जो महान तीर्थंकर जन्म का संकेत बने।
श्लोक 22 से 31 : सुमतिनाथ भगवान का जन्म और दिव्य बालरूप
चैत्र शुक्ल एकादशी को सुमतिनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक कर ‘सुमति’ नाम दिया। उनका शरीर सुवर्ण सदृश कान्तिमान, अत्यंत मनोहर और दिव्य लक्षणों से युक्त था। बाल्यकाल से ही वे अलौकिक सौन्दर्य, ज्ञान और महापुरुषत्व के चिह्नों से विभूषित थे।
श्लोक 32 से 41 : दिव्य मुखमण्डल और भुजाओं की अलौकिक शोभा
भगवान के नेत्र, मुख, अधर, नासिका, कपोल, दन्तपंक्ति और कण्ठ अनुपम सौन्दर्य से युक्त थे। उनका मुख दिव्यध्वनि का आधार बना और स्याद्वाद से समस्त वादियों को पराजित करने वाला था। उनकी विशाल भुजाएँ और वक्षस्थल त्रिभुवनाधिपत्य तथा मोक्षलक्ष्मी के प्रतीक रूप में वर्णित हैं।
श्लोक 42 से 51 : शरीर के मध्यभाग से चरणों तक परम सौन्दर्य
भगवान का मध्यभाग, नाभि, कमर, जंघाएँ, घुटने और चरण सभी अनुपम दिव्य लक्षणों से सम्पन्न थे। उनके चरणों के नख चन्द्रमा को भी लज्जित करने वाले थे। सम्पूर्ण देह ऐसी प्रतीत होती थी मानो स्वयं मुक्ति ने उसे अपने योग्य स्वीकार किया हो।
श्लोक 52 से 61 : कुमारावस्था, राज्य और धर्मयुक्त भोग
कुमारावस्था से युवावस्था तक भगवान सुमतिनाथ अप्रतिम शोभा से युक्त रहे। राज्य प्राप्ति के पश्चात भी वे हिंसा, असत्य, चोरी, परिग्रह तथा आर्त-रौद्रध्यान से रहित रहे। वे धर्म, अर्थ और न्यायपूर्ण भोगों का सेवन करते हुए लोककल्याणकारी जीवन जीते रहे।
श्लोक 62 से 71 : वैराग्य, संसार की निस्सारता का बोध और दीक्षा
राज्य एवं दिव्य वैभव का उपभोग करते हुए भी भगवान के भीतर वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने विषयभोगों को पापरूपी बन्धन समझा और आत्मकल्याण का मार्ग चुना। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से वैशाख शुक्ल नवमी को सहस्र राजाओं सहित दीक्षा धारण कर संयममार्ग स्वीकार किया तथा तत्काल मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 72 से 81: तप, केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के बाद भगवान ने कठोर तप किया, दीर्घकालीन संयम के पश्चात प्रियंगु वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में असंख्य देव, मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित हुए। उनका धर्मसंघ अत्यंत विशाल था और वे अनगिनत जीवों को सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र प्रदान करते रहे।
श्लोक 82 से 87 : लोककल्याण, निर्वाण और मंगलाशंसन
भगवान सुमतिनाथ ने अठारह क्षेत्रों में विहार कर दिव्यध्वनि द्वारा भव्य जीवों को रत्नत्रय का उपदेश दिया। आयु पूर्ण होने पर सम्मेदगिरि पर प्रतिमायोग धारण कर चैत्र शुक्ल एकादशी को निर्वाण प्राप्त किया। पूर्वजन्म के राजा रतिषेण और अहमिन्द्र से लेकर तीर्थंकर पद तक उनकी यात्रा आत्मोन्नति की परम साधना है। वे राग-द्वेष रहित, पंचकल्याणक सम्पन्न और समस्त भव्य जीवों को शांति, सद्बुद्धि तथा मोक्षमार्ग प्रदान करने वाले हैं।
उत्तरपुराण पर्व 52 – पद्मप्रभ भगवान् के पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा अपराजित का आदर्श राज्य और वैराग्य का उदय
धातकीखण्ड द्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र के वत्स देश में सुसीमा नगरी के राजा अपराजित अत्यंत पराक्रमी, धर्मनिष्ठ, सत्यवादी और दानी शासक थे। उन्होंने बाह्य और आन्तरिक दोनों प्रकार के शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर आदर्श शासन स्थापित किया। उनके राज्य में समृद्धि, न्याय और सुख का विस्तार था। दीर्घकाल तक राज्यभोग करने के पश्चात उन्होंने संसार की समस्त पर्यायों को क्षणभंगुर समझकर वैराग्यपूर्ण चिंतन किया।
श्लोक 12 से 21 : दीक्षा, तीर्थंकर प्रकृति बन्ध और पद्मप्रभ के गर्भावतरण
राजा अपराजित ने पुत्र को राज्य देकर वन में दीक्षा धारण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। समाधिमरण के पश्चात वे ऊर्ध्व ग्रैवेयक में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे जम्बूद्वीप की कौशाम्बी नगरी के राजा धरण और रानी सुसीमा के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को लाल कमल के समान प्रभामय पुत्र का जन्म हुआ।
श्लोक 22 से 31 : पद्मप्रभ भगवान का जन्मोत्सव और अनुपम सौन्दर्य
भगवान के जन्म से गुणों की वृद्धि, दोषों का नाश और लोक में हर्ष का संचार हुआ। इन्द्रों ने मेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘पद्मप्रभ’ रखा। उनका रूप, सौन्दर्य और तेज अतुलनीय था। स्त्री और पुरुष दोनों ही उनके दर्शन से मोहित होते थे, क्योंकि उनका व्यक्तित्व दिव्य सौन्दर्य और पुण्य की पराकाष्ठा था।
श्लोक 32 से 43 : राज्यवैभव, लोककल्याण और वैराग्य की जागृति
भगवान पद्मप्रभ ने दीर्घकाल तक एकछत्र राज्य किया और उनके शासन में भय, दरिद्रता तथा दुःख का नाश हो गया। प्रजा समृद्ध और संतुष्ट रही। पूर्वभव स्मरण होने पर उन्होंने संसार, भोग और शरीर की नश्वरता को समझा। उन्होंने अनुभव किया कि विषयभोग अनन्त बार भोगे जा चुके हैं, अतः उनमें नवीनता नहीं है; यही चिंतन उनके वैराग्य का कारण बना।
श्लोक 44 से 52 : संसार-विमुखता, आत्मज्ञान और दीक्षा
भगवान ने जाना कि इन्द्रियभोग तृप्ति नहीं दे सकते और शरीर रोगों का घर है। उन्होंने हिंसा आदि पापों से युक्त संसार को त्याज्य समझा और उस साधना को श्रेष्ठ माना जिससे पाप-पुण्य दोनों का अतिक्रमण हो। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी को एक हजार राजाओं सहित मनोहर वन में दीक्षा धारण की तथा मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 53 से 64 : तप, केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के दूसरे दिन राजा सोमदत्त ने उन्हें आहारदान दिया। भगवान ने गुप्ति, समिति, धर्म, अनुप्रेक्षा, परिषहजय, चारित्र और तप द्वारा कर्मक्षय किया। छह माह की कठोर साधना के बाद उन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में विशाल मुनिसंघ, आर्यिकाएँ, श्रावक, श्राविकाएँ तथा असंख्य देव उपस्थित हुए, और उन्होंने अनगिनत जीवों को मोक्षमार्ग में प्रवृत्त किया।
श्लोक 65 से 70 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और पद्मप्रभ की मंगलमयी महिमा
भगवान पद्मप्रभ ने धर्मोपदेश द्वारा भव्य जीवों का कल्याण करते हुए सम्मेदशिखर पर प्रतिमायोग धारण किया। फाल्गुन कृष्ण चतुर्थी को चतुर्थ शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मों का क्षय कर उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। देवों ने निर्वाण कल्याणक मनाया। पूर्वभव के राजा अपराजित, फिर अहमिन्द्र और अंततः छठे तीर्थंकर पद्मप्रभ के रूप में उनकी आत्मयात्रा लोककल्याण, वैराग्य, तप और मोक्ष की परम साधना का दिव्य आदर्श प्रस्तुत करती है।
उत्तरपुराण पर्व 53 – सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 राजा नन्दिषेण का धर्ममय राज्य और वैराग्य का उदय
धातकीखण्ड के पूर्व विदेह क्षेत्र के सुकच्छ देश की क्षेमपुर नगरी में राजा नन्दिषेण बुद्धिमान, पराक्रमी, धर्मपरायण और लोकहितकारी शासक थे। उनके राज्य में सुख, समृद्धि और नीति का वास था। धर्म, अर्थ और काम तीनों पुरुषार्थ उनके जीवन में संतुलित थे, परंतु उन्होंने संसार के बन्धन, मोह और कर्मचक्र की गहनता को समझा। आत्मकल्याण की भावना से उन्होंने संसार की आसक्ति को धिक्कारा और मोक्षमार्ग की ओर उन्मुख हुए।
श्लोक 12 से 22 : दीक्षा, तीर्थंकर प्रकृति बन्ध और सुपार्श्वनाथ का गर्भावतरण
राजा नन्दिषेण ने पुत्र धनपति को राज्य देकर स्वयं अर्हन्नन्दन मुनि से दीक्षा ग्रहण की। ग्यारह अंगों का अध्ययन कर उन्होंने दर्शनविशुद्धि आदि सोलह कारण भावनाओं से तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। संन्यासमरण के पश्चात वे मध्यम ग्रैवेयक के सुभद्र विमान में अहमिन्द्र देव बने। वहाँ से च्युत होकर वे काशी देश की बनारस नगरी के राजा सुप्रतिष्ठ और रानी पृथिवीषेणा के यहाँ गर्भस्थ हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को दिव्य पुत्र का जन्म हुआ।
श्लोक 23 से 34 : जन्मकल्याणक, अलौकिक सौन्दर्य और राज्यवैभव
इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर जन्माभिषेक कर उनका नाम ‘सुपार्श्व’ रखा। वे प्रियंगु पुष्प के समान कान्तिमान, दिव्य लक्षणों से युक्त और अतिशयों से सम्पन्न थे। युवावस्था में उन्होंने राज्य स्वीकार किया, परन्तु भोगों के मध्य भी आत्मसंयम बनाए रखा। उनका जीवन ज्ञान, पुण्य, करुणा और अलौकिक प्रभाव से परिपूर्ण था।
श्लोक 35 से 42 : नश्वरता का बोध, वैराग्य और दीक्षा
ऋतु परिवर्तन देखकर भगवान सुपार्श्वनाथ को संसार और राज्यलक्ष्मी की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने समझा कि भोग और वैभव मायामय हैं तथा आत्मज्ञान ही शाश्वत है। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से वे मनोगति पालकी में सवार होकर सहेतुक वन पहुँचे और ज्येष्ठ शुक्ल द्वादशी को एक हजार राजाओं सहित दीक्षा धारण की। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 43 से 51 : तप, केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
दीक्षा के पश्चात भगवान सुपार्श्वनाथ ने नौ वर्ष तक मौनपूर्वक तप और संयम का पालन किया। शिरीष वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर फाल्गुन कृष्ण षष्ठी को उन्होंने केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके समवसरण में विशाल मुनिसंघ, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा असंख्य देव उपस्थित रहे। उन्होंने धर्मामृतमयी वाणी से जीवों को मोक्षमार्ग की प्रेरणा दी।
श्लोक 52 से 56 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और मंगलमयी महिमा
अंतकाल समीप जानकर भगवान सुपार्श्वनाथ सम्मेदशिखर पहुँचे और प्रतिमायोग धारण किया। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी को उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने निर्वाणकल्याणक मनाया और सम्मेदशिखर को पवित्र निर्वाणभूमि घोषित किया। पूर्वभव के राजा नन्दिषेण, फिर अहमिन्द्र और अंततः सप्तम तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ के रूप में उनकी आत्मयात्रा वैराग्य, तप, सर्वज्ञता और मोक्ष का दिव्य आदर्श प्रस्तुत करती है।
उत्तरपुराण पर्व 54 – चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 मंगलाचरण एवं सुगन्धि देश का परिचय
इन श्लोकों में चन्द्रप्रभ स्वामी की स्तुति करते हुए पुराण श्रवण की महिमा बताई गई है कि यह सम्यग्ज्ञान का मूल कारण है। इसके पश्चात विदेहक्षेत्र के ‘सुगन्धि’ देश का वर्णन है, जो किलों, वनों और प्राकृतिक संपदा से सुशोभित था। यहाँ के निवासी स्नेहपूर्ण और सूक्ष्म तत्वों के ज्ञाता थे।
श्लोक 12 से 21 आदर्श समाज एवं कृषि की सम्पन्नता
सुगन्धि देश के किसान अत्यंत सरल और धार्मिक थे, जिनके श्रम का फल सदैव निश्चित और सफल होता था। यहाँ के सरोवर निर्मल और खेत राजा के भंडार के समान समृद्ध थे। समाज में दण्ड, कठोरता और अपवाद जैसे नकारात्मक शब्द केवल तराजू, स्त्रियों के यौवन या व्याकरण शास्त्रों तक ही सीमित थे; वास्तविक जीवन में प्रजा पूर्णतः सुखी, निर्दोष और भयमुक्त थी।
श्लोक 22 से 31 श्रीपुर नगर का वैभव और धार्मिक वातावरण
देश के मध्य में स्थित ‘श्रीपुर’ नगर देवलोक के समान सुंदर था। यहाँ के निवासियों में क्रूरता या स्वार्थ के स्थान पर सम्यग्दृष्टि और त्याग की भावना प्रबल थी। नगर के भव्य भवन और सरोवर इसकी शोभा बढ़ाते थे। यहाँ के लोग केवल स्वर्ग के सुखों के लिए नहीं, अपितु मोक्ष प्राप्ति के महान उद्देश्य से धर्म का पालन करते थे।
श्लोक 32 से 41 राजा श्रीषेण और रानी श्रीकान्ता का चरित्र
नगर के स्वामी राजा श्रीषेण इन्द्र के समान प्रतापी और साम-दान की नीति में निपुण थे। उनकी पत्नी श्रीकान्ता गुणों की खान और पतिव्रता थी। उनके गुण विद्वानों के मन को आनंदित करने वाले और सज्जनों द्वारा वंदनीय थे। यह दंपती निष्पाप होकर उत्कृष्ट सुखों का उपभोग कर रहा था।
श्लोक 42 से 51 पुत्र प्राप्ति हेतु अनुष्ठान एवं मंगल स्वप्न
पुत्र के अभाव में दुखी राजा ने पुरोहित के परामर्श पर स्वर्णमयी जिन-प्रतिमाओं का निर्माण कर ‘आष्टाह्निकी’ पूजा और महाभिषेक संपन्न किया। इसके फलस्वरूप रानी ने स्वप्न में हाथी, सिंह, चन्द्रमा और लक्ष्मी का अभिषेक देखा, जो एक पराक्रमी और भाग्यशाली पुत्र के आगमन का संकेत था।
श्लोक 52 से 61 रानी का गर्भाधान और राजा का हर्ष
रानी के गर्भ धारण करते ही उनके शरीर में तेज और स्वाभाविक लज्जा के चिह्न प्रकट होने लगे। जब दासियों ने राजा को यह सुखद समाचार सुनाया, तो राजा का मुख कमल के समान खिल उठा। राजा ने इसे अपने वंश की उन्नति का कारण मानकर अपार प्रसन्नता व्यक्त की और सेविकाओं को पुरस्कृत किया।
श्लोक 62 से 71 राजकुमार श्रीवर्मा का जन्म और शिक्षा
शुभ ग्रहों के योग में रानी ने ‘श्रीवर्मा’ नामक पुत्र को जन्म दिया, जिससे राजा को असीम संतोष प्राप्त हुआ। राजकुमार का शरीर अत्यंत तेजस्वी था और उनकी बुद्धि का विकास वैद्यक एवं व्याकरण आदि शास्त्रों के अनुसार अत्यंत प्रखर रूप में हुआ। वे जम्बूद्वीप के मेरु पर्वत के समान सुशोभित होने लगे।
श्लोक 72 से 81 वैराग्य, राज्याभिषेक और मुनि दीक्षा
जिनेन्द्र श्रीपद्म के उपदेश से प्रभावित होकर राजा श्रीषेण ने पुत्र श्रीवर्मा को राज्य सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली। कालान्तर में श्रीवर्मा ने भी आकाश में उल्कापात (टूटता तारा) देखकर संसार की नश्वरता को समझा और वैराग्य धारण कर लिया। उन्होंने अपने पुत्र श्रीकान्त को राज्य दिया और श्रीप्रभ जिनेन्द्र के समीप तपस्या करते हुए अंततः समाधिमरण प्राप्त किया।
श्लोक 82 से 91 श्रीधर देव एवं चक्रवर्ती अजितसेन का आगमन और राजा अजितंजय के स्वप्न
श्रीवर्मा का जीव स्वर्ग में ‘श्रीधर’ नामक देव हुआ, जिसकी आयु दो सागर थी।। वहाँ से च्युत होकर वह धातकीखण्ड द्वीप के अयोध्या नगर के राजा अजितंजय की रानी अजितसेना के गर्भ में आया। रानी ने आठ शुभ स्वप्न (हाथी, बैल, सिंह, चंद्रमा, सूर्य, सरोवर, शंख और पूर्ण कलश) देखे, जिनका फल राजा ने एक महाप्रतापी चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति के रूप में बताया।
श्लोक 92 से 101 चक्रवर्ती अजितसेन का साम्राज्य
रानी ने श्रीधर देव के जीव को अजितसेन के रूप में जन्म दिया। राजा अजितंजय ने पुत्र को राज्य सौंपकर स्वयं दीक्षा ले ली।। अजितसेन के पुण्य से ‘चक्ररत्न’ सहित चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुआ और उन्होंने सुगमता से छह खण्डों पर विजय प्राप्त की। वे एक ऐसे चक्रवर्ती थे जो अपार वैभव के स्वामी होकर भी मोह और परिग्रह से अछूते थे।
श्लोक 102 से 111 दिशापालों से तुलना और शासक की श्रेष्ठता
यहाँ कवि ने अलंकृत वर्णन करते हुए कहा कि अजितसेन वास्तविक रक्षक थे, जबकि पौराणिक दिशापाल (अग्नि, यम, वरुण आदि) अपनी प्रकृति के कारण रक्षा में असमर्थ थे। अजितसेन के पराक्रम और न्यायप्रियता की स्तुति देवों द्वारा भी की जाती थी।
श्लोक 112 से 121 दान-धर्म एवं मुनि-आहार
राजा अजितसेन की बुद्धि सदैव धर्म और परोपकार में लगी रहती थी। उन्होंने मुनि अरिन्दम को भक्तिपूर्वक आहार-दान दिया, जिससे आकाश से रत्नों की वर्षा जैसे ‘पञ्चाश्चर्य’ प्रकट हुए। उनका जीवन संयम और प्रजा-रक्षा का उत्कृष्ट उदाहरण था।
श्लोक 122 से 131 अच्युतेन्द्र पद और पद्मनाभ का जन्म
गुप्तप्रभ जिनेन्द्र के उपदेश से वैराग्य पाकर अजितसेन ने पुत्र जितशत्रु को राज्य दिया और दीक्षा लेकर 16वें स्वर्ग में ‘अच्युतेन्द्र’ हुए। वहाँ का सुख भोगकर उनका जीव राजा कनकप्रभ और रानी कनकमाला के यहाँ ‘पद्मनाभ’ नामक पुत्र के रूप में अवतरित हुआ।
श्लोक 132 से 141 पद्मनाभ की शिक्षा एवं विवाह
राजकुमार पद्मनाभ ने अपनी इन्द्रियों को जीत लिया था और समस्त कलाओं एवं शास्त्रों में प्रवीणता प्राप्त की। यौवन प्राप्त करने पर उनका विवाह सोमप्रभा आदि अनेक कन्याओं से हुआ और उनके सुवर्णनाभ जैसे तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ।
श्लोक 142 से 151 संसार की नश्वरता एवं कर्म-दर्शन
मुनि श्रीधर के उपदेश से पद्मनाभ के पिता ने दीक्षा ली। पद्मनाभ ने स्वयं भी संसार के चक्र का चिंतन किया। उन्होंने समझा कि जब तक ‘मिथ्यात्व’ जैसे दोष विद्यमान हैं, आत्मा कर्मों के बंधन में फंसी रहती है। उन्होंने संसार को जन्म-मरण का दुःखद जाल माना।
श्लोक 152 से 162 तीर्थंकर नामकर्म का बंध एवं अहमिन्द्र पद
पद्मनाभ ने पुत्र सुवर्णनाभ को राज्य देकर कठिन तपस्या प्रारम्भ की। उन्होंने सोलहकारण भावनाओं का चिंतन किया और ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त कर ‘तीर्थंकर नामकर्म’ का उपार्जन किया। अंत में, समाधिमरण के उपरांत वे वैजयन्त विमान में ‘अहमिन्द्र’ हुए, जहाँ से वे आगे चलकर तीर्थंकर पद प्राप्त करेंगे।
श्लोक 163 से 173 चन्द्रपुर में भगवान का अवतरण और नामकरण
अहमिन्द्र की आयु पूर्ण कर भगवान का जीव जम्बूद्वीप के भरतक्षेत्र स्थित चन्द्रपुर नगर में राजा महासेन और रानी लक्ष्मणा के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने चैत्र कृष्ण पंचमी को सोलह मंगलकारी स्वप्न देखे। तत्पश्चात, पौष कृष्ण एकादशी के दिन तीन ज्ञान से सम्पन्न पुत्र का जन्म हुआ। इन्द्र ने नवजात बालक को सुमेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया। चूँकि उनके जन्म से पृथ्वी मण्डल नील-कमलों (कुवलय) के समान विकसित हो उठा था, इसलिए इन्द्र ने उनका सार्थक नाम ‘चन्द्रप्रभ’ रखा।
श्लोक 174 से 181 शैशव काल और शारीरिक वैशिष्ट्य
इन्द्र ने भगवान के समक्ष ‘आनन्द’ नामक नाटक किया और कुबेर को उनकी सेवा का निर्देश दिया। भगवान चन्द्रप्रभ, सुपार्श्वनाथ स्वामी के मोक्ष जाने के नौ सौ करोड़ सागर बाद उत्पन्न हुए थे। उनकी आयु दस लाख पूर्व और शरीर की ऊँचाई एक सौ पचास धनुष थी। उनका बाल्यकाल दिव्य चेष्टाओं और देवताओं के साथ कुतूहलपूर्ण क्रीड़ाओं में व्यतीत हुआ। उनके मुख की मन्द मुस्कान और लड़खड़ाते कदमों की शोभा देखते ही बनती थी।
श्लोक 182 से 193 अलौकिक कान्ति और युवावस्था
युवावस्था प्राप्त करने पर भगवान का शरीर अमृतमयी और चन्द्रमा के समान धवल कान्ति (शुक्ल लेश्या) से युक्त था। उनकी आभा के सामने ज्योतिषी देवों का प्रकाश भी फीका पड़ जाता था। वे वीणा वादन, संगीत, शास्त्रों की परीक्षा और भव्य जीवों को दर्शन देने में अपना समय व्यतीत करते थे। कवि कहते हैं कि उनके गुण चन्द्रमा की किरणों के समान निर्मल थे, जो भव्य जीवों के मन रूपी कमलों को विकसित करते थे।
श्लोक 194 से 201 राज्याभिषेक और सांसारिक ऐश्वर्य
दो लाख पचास हजार पूर्व वर्ष बीतने पर भगवान चन्द्रप्रभ का राज्याभिषेक हुआ। वे तीन लोक की रक्षा करने वाले अद्भुत तेज से सम्पन्न थे। यद्यपि वे सांसारिक सुखों और रानियों के बीच घिरे थे, किन्तु उनका ऐश्वर्य अलौकिक था। इन्द्र आदि देव भी उनकी सेवा में तत्पर रहते थे। उनका शासन काल न्याय और समृद्धि का प्रतीक था।
श्लोक 202 से 211 दर्पण दर्शन और वैराग्य का उदय
जब भगवान के साम्राज्य सुख का छह लाख पचास हजार पूर्व वर्ष व्यतीत हो गया, तब एक दिन दर्पण में अपना मुख देखते समय उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने चिन्तन किया कि यह शरीर नश्वर है और सांसारिक संयोग अंततः वियोग में परिणत होने वाले हैं। उन्होंने स्वयं को धिक्कारा कि जानते हुए भी वे मोह में फंसे रहे। अनित्य को नित्य समझना ही अज्ञान है और इसी कारण जीव संसार रूपी सागर के दुखों में भटकता है।
श्लोक 212 से 222 दीक्षा कल्याणक और कठोर तपश्चर्या
वैराग्य भाव प्रबल होते ही लौकान्तिक देवों ने आकर उनके विचारों की पुष्टि की। भगवान ने अपने पुत्र वरचन्द्र का राज्याभिषेक किया और ‘विमला’ पालकी में सवार होकर सर्वर्तुक वन पहुँचे। वहाँ पौष कृष्ण एकादशी को एक हजार राजाओं के साथ निर्ग्रन्थ दीक्षा धारण की, जिससे उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। दूसरे दिन नलिन नगर के राजा सोमदत्त ने उन्हें आहार दान दिया। इसके उपरांत भगवान कषायों को जीतकर, पंच महाव्रतों और तीन गुप्तियों का पालन करते हुए परम योग में लीन हो गए।
श्लोक 223 से 231 केवलज्ञान की प्राप्ति और दिव्य अतिशय
भगवान ने दीक्षा के पश्चात तीन माह तक नागवृक्ष के नीचे कठोर तप किया। फाल्गुन कृष्ण सप्तमी के दिन क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ होकर उन्होंने मोह रूपी शत्रु का विनाश किया और चारों घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान (सर्वज्ञता) प्राप्त किया। वे शरीर सहित ‘सयोगकेवली’ हुए और चौंतीस अतिशयों एवं आठ प्रातिहार्यों के साथ तीन लोक के रक्षक और उपदेशक के रूप में सुशोभित हुए।
श्लोक 232 से 241 भगवान का अलौकिक वैभव और प्रतीकात्मकता
भगवान का सिंहासन और उनके शरीर की प्रभा केवलज्ञान की कान्ति के समान समस्त दिशाओं को प्रकाशित कर रही थी। उनकी दिव्यध्वनि एक ही समय में सभी श्रोताओं के संशयों का निवारण करती थी। उनके मस्तक पर सुशोभित तीन छत्र रत्नत्रय (सम्यग्दर्शन, ज्ञान, चारित्र) के प्रतीक थे। आकाश से होने वाली पुष्प वर्षा और देवों के नगाड़े उनके द्वारा मोह रूपी शत्रु पर विजय की घोषणा कर रहे थे।
श्लोक 242 से 251 समवशरण की भव्यता और इन्द्र का आगमन
भगवान बारह सभाओं से घिरी ‘गन्धकुटी’ के मध्य में ऐसे सुशोभित थे जैसे नक्षत्रों के बीच चन्द्रमा। उनके संघ में 93 गणधर और ढाई लाख मुनिराजों सहित लाखों आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ उपस्थित थीं। इसी समय ऐशानेन्द्र (इन्द्र) ने आकर भक्तिपूर्वक भगवान के चरणों में वन्दना की और उनसे संसार के दुखों से मुक्ति दिलाने वाले रत्नत्रय की याचना की।
श्लोक 252 से 261 इन्द्र द्वारा दार्शनिक एवं भावपूर्ण स्तुति
इन्द्र ने स्तुति करते हुए कहा कि कल्पवृक्ष केवल दूसरों का हित करता है, किन्तु भगवान स्व और पर दोनों का कल्याण करने वाले हैं। जो मनुष्य भगवान के वचनों और धर्म को हृदय में धारण करता है, वह उन्हीं के समान आनन्द प्राप्त करता है। इन्द्र ने उन्हें कर्म रूपी शत्रुओं का विनाशक और संसार रूपी समुद्र से पार उतारने वाला ‘आधार’ बताया। भगवान सबको जानते हैं, किन्तु इन्द्रियों द्वारा पूर्णतः नहीं जाने जा सकते।
श्लोक 262 से 272 मत-मतांतर का खंडन और निर्वाण गमन
इन्द्र ने नास्तिकता और केवल भाग्यवादिता का खंडन करते हुए भगवान के ‘अनेकान्त’ मार्ग की सराहना की। उन्होंने सिद्ध किया कि द्रव्य और गुण परस्पर अभिन्न हैं। स्तुति के पश्चात, भगवान चन्द्रप्रभ ने विभिन्न देशों में विहार कर धर्म की प्रभावना की और अंततः सम्मेद शिखर पहुँचे। वहाँ एक माह का योग निरोध कर फाल्गुन शुक्ल सप्तमी के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्ध पद (निर्वाण) प्राप्त किया |
श्लोक 273 से 276 मंगल कामना और उपसंहार
भगवान के निर्वाण के अवसर पर देवों ने आकर निर्वाण-कल्याणक की पूजा की। अंत में कवि मंगल कामना करते हुए कहते हैं कि जो चन्द्रमा के समान धवल लेश्या वाले हैं और जिन्होंने अष्ट कर्मों को नष्ट कर दिया है, वे भगवान चन्द्रप्रभ हमारी अज्ञानता को दूर कर मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करें। यहाँ श्रीवर्मा से लेकर तीर्थंकर बनने तक की उनकी सात भवों की यात्रा का पवित्र वर्णन समाप्त होता है।
उत्तरपुराण पर्व 55 – पुष्पदन्त (सुविधिनाथ) पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 राजा महापद्म का वैभव और न्यायप्रिय शासन – – राजा महापद्म की राज्य-विभूति और गुण वर्णन
पुराण का प्रारंभ भगवान सुविधिनाथ (पुष्पदन्त) की स्तुति से होता है। पूर्वविदेह के पुष्कलावती देश की पुण्डरीकिणी नगरी में राजा महापद्म राज्य करते थे। वे एक कुशल गोपालक के समान अपनी प्रजा का पालन करते थे और पृथ्वी उन्हें रत्नों के रूप में उपहार देती थी। उनके राज्य में कोई दण्ड का पात्र नहीं था क्योंकि समस्त प्रजा गुणवान थी। राजा महापद्म नीतिवान, पराक्रमी और अपार पुण्य के धारी थे, वे अपनी प्रजा का पालन एक ग्वाले की भाँति स्नेहपूर्वक करते थे, जिन्होंने चिरकाल तक सुखपूर्वक राज्य का उपभोग किया और उन्होंने अपनी राज्य-लक्ष्मी का उपयोग सदैव परोपकार और सज्जनों के हित में किया।
श्लोक 12 से 22 वैराग्य, तप और स्वर्ग गमन – आत्मबोध, प्रव्रज्या और स्वर्ग में इन्द्र पद की प्राप्ति
एक दिन वनपाल से भूतहित जिनराज के आगमन का समाचार सुनकर राजा महापद्म उनके दर्शन हेतु गए। भगवान का उपदेश सुनकर उन्हें आत्मज्ञान हुआ और वे संसार की असारता पर विचार करने लगे। मोह का त्याग कर उन्होंने अपने पुत्र धनद को राज्य सौंपा और दीक्षा धारण कर ली। कठोर तप और सोलहकारण भावनाओं के बल पर उन्होंने ‘तीर्थंकर नामकर्म’ का बंध किया। देह त्याग कर वे प्राणत स्वर्ग (दसवें स्वर्ग) में इन्द्र हुए, जहाँ उन्होंने बीस सागर की आयु तक दिव्य सुख भोगे।
श्लोक 23 से 31 भगवान पुष्पदन्त का काकन्दी नगरी में अवतरण और वैभव
स्वर्ग से च्युत होकर भगवान का जीव भरतक्षेत्र की काकन्दी नगरी के राजा सुग्रीव और रानी जयरामा के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने फाल्गुन कृष्ण नवमी को सोलह मंगलकारी स्वप्न देखे। मार्गशीर्ष शुक्ल प्रतिपदा के दिन भगवान का जन्म हुआ। इन्द्रों ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक किया और उनकी कुन्द के पुष्प जैसी धवल कान्ति के कारण उनका नाम ‘पुष्पदन्त’ (या सुविधिनाथ) रखा। उनकी आयु दो लाख पूर्व और शरीर की ऊँचाई सौ धनुष थी।
श्लोक 32 से 42 राज्य भोग और उल्कापात से वैराग्य
भगवान सुविधिनाथ ने पचास हजार पूर्व और अट्ठाईस पूर्वांग तक राज्य सुख का उपभोग किया। एक दिन आकाश में उल्कापात (तारा टूटना) देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि यह उल्का नहीं, अपितु उनके मोह रूपी अंधकार को नष्ट करने वाली दीपक की लौ है। उन्होंने आत्म-चिंतन किया कि यह आत्मा शरीर से पृथक है और संसार इन्द्रजाल के समान असत्य है। मोह के कारण ही जीव नश्वर पदार्थों को अपना समझकर दुःख भोगता है।
श्लोक 43 से 51दीक्षा कल्याणक और केवलज्ञान प्राप्ति
वैराग्य होने पर लौकान्तिक देवों ने उनकी स्तुति की। भगवान ने पुत्र सुमति को राज्य भार सौंपकर ‘सूर्यप्रभा’ पालकी में सवार होकर पुष्पक वन में दीक्षा ली। दीक्षा के साथ ही उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। चार वर्ष की छद्मस्थ अवस्था के बाद, नागवृक्ष के नीचे ध्यान लगाते हुए उन्होंने घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान (अनन्तचतुष्टय) प्राप्त किया। इन्द्रों ने उनके लिए समवशरण की रचना की, जहाँ से उन्होंने दिव्यध्वनि के माध्यम से तत्व का उपदेश दिया।
श्लोक 52 से 62 संघ विस्तार, निर्वाण और उपसंहार
भगवान के संघ में विदर्भ आदि 88 गणधर और दो लाख मुनि थे। उनके संघ में आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ लाखों की संख्या में थे। भगवान ने आर्य देशों में विहार कर धर्म की प्रभावना की और अंततः सम्मेद शिखर पर्वत पर पहुँचे। वहाँ एक हजार मुनियों के साथ योग निरोध कर भाद्रपद शुक्ल अष्टमी को उन्होंने निर्वाण प्राप्त किया। कवि अंत में प्रार्थना करते हैं कि महापद्म से सुविधिनाथ तक की यात्रा करने वाले भगवान पुष्पदन्त हमें अक्षय लक्ष्मी और मोक्षमार्ग प्रदान करें।
उत्तरपुराण पर्व 56 – शीतल पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा पद्मगुल्म का वैभव और वैराग्य की भूमिका
भगवान् शीतलनाथ भगवान् के धर्म को संसार के दुःखों से संतप्त जीवों के लिए चन्द्रमा के समान शीतल और शान्तिदायक बताया गया है। पुष्करवर द्वीप के वत्स देश में सुसीमा नगरी के राजा पद्मगुल्म अत्यन्त बुद्धिमान, पराक्रमी और नीति-कुशल शासक थे। उनका राज्य धर्म, अर्थ और काम से सम्पन्न था तथा वे न्यायपूर्वक प्रजा का पालन करते थे। वसन्त ऋतु के आगमन के साथ उनका मन विषय-भोगों में आसक्त हुआ और कामदेव के प्रभाव से वे सांसारिक सुखों में रत रहने लगे।
श्लोक 12 से 22 : वैराग्य, दीक्षा और स्वर्गगमन
वसन्त ऋतु के समाप्त होते ही राजा पद्मगुल्म का चित्त विषाद से भर गया। उन्होंने विचार किया कि काम और विषय संसार के दुःखों का कारण हैं। इस विवेक से उनमें वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य अपने पुत्र चन्दन को सौंपकर आनन्द मुनिराज के पास दीक्षा ग्रहण की। तप, अध्ययन और त्रिरत्न की आराधना द्वारा उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और समाधिमरण से आरण स्वर्ग में इन्द्र पद प्राप्त किया। वहाँ उन्होंने अत्यन्त दिव्य सुखों का उपभोग करते हुए अपनी आयु पूर्ण की।
श्लोक 23 से 31 : भगवान् शीतलनाथ का गर्भ और जन्म कल्याणक
जब उस इन्द्र की आयु समाप्ति के समीप आई तब वे भरत क्षेत्र के मलय देश के भद्रपुर नगर में राजा दृढ़रथ की रानी सुनन्दा के गर्भ में अवतीर्ण हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और देवों ने प्रथम कल्याणक की पूजा की। माघ कृष्ण द्वादशी के दिन भगवान् शीतलनाथ का जन्म हुआ। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका अभिषेक कर “शीतलनाथ” नाम रखा। उनका शरीर सुवर्ण के समान कान्तिमान, आयु एक लाख पूर्व और शरीर नब्बे धनुष ऊँचा था।
श्लोक 32 से 41 : राज्यपालन और संसार की अनित्यता का बोध
युवावस्था पूर्ण होने पर भगवान् शीतलनाथ ने राज्य संभाला और आदर्श रूप से प्रजा का पालन किया। एक दिन वन-विहार करते समय उन्होंने पाले को शीघ्र नष्ट होते देखा। इससे उन्हें संसार की नश्वरता का गहन बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि विषय-सुख मिथ्या हैं और राग-द्वेषयुक्त जीव कभी वास्तविक सुख प्राप्त नहीं कर सकता। इस प्रकार उनके भीतर गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ।
श्लोक 42 से 55 : दीक्षा, केवलज्ञान और दिव्य संघ
भगवान् शीतलनाथ ने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया और लौकान्तिक देवों की स्तुति के मध्य सहेतुक वन में दीक्षा ग्रहण की। उन्होंने एक हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया। पुनर्वसु राजा के यहाँ आहार ग्रहण करने के बाद कठोर तप किया और बेल वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने ज्ञान कल्याणक मनाया। उनके विशाल धर्मसंघ में गणधर, पूर्वधारी, अवधिज्ञानी, केवलज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ बड़ी संख्या में सम्मिलित थे।
श्लोक 56 से 61 : मोक्ष और भगवान् की स्तुति
भगवान् शीतलनाथ ने असंख्यात जीवों को सम्यक्त्व प्रदान करते हुए सम्मेदशिखर पर पहुँचकर एक माह तक योगनिरोध किया। आश्विन शुक्ल अष्टमी के दिन उन्होंने एक हजार मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रों ने पंचम कल्याणक सम्पन्न किया। कवि ने उनकी स्तुति करते हुए कहा है कि उनके जन्म से संसार में चन्द्रमा के समान शीतलता और आनन्द फैल गया तथा उन्होंने रति और तृष्णा का नाश किया।
श्लोक 62 से 71 : धर्म का ह्रास और दानों का विवेचन
भगवान् शीतलनाथ के तीर्थ के अन्तकाल में कालदोष से धर्म का ह्रास होने लगा। उसी समय राजा मेघरथ ने सभा में श्रेष्ठ दान के विषय में प्रश्न किया। मंत्री सत्यकीर्ति ने शास्त्रदान, अभयदान और आहारदान को श्रेष्ठ बताया तथा कहा कि शास्त्रदान सबसे महान है क्योंकि वही मोक्षमार्ग का प्रकाशक है। अभयदान प्राणियों को निर्भयता देता है और आहारदान साधुओं की साधना में सहायक होता है।
श्लोक 72 से 81 : शास्त्रदान की महिमा और मिथ्या मत का उदय
मंत्री ने स्पष्ट किया कि शास्त्र के अध्ययन, श्रवण और मनन से शुद्ध बुद्धि उत्पन्न होती है, जिससे जीव मोक्षमार्ग में अग्रसर होता है। इसलिए शास्त्रदान सर्वश्रेष्ठ दान है। परन्तु राजा मेघरथ इस मत से संतुष्ट नहीं हुआ। उसी सभा में उपस्थित मुण्डशालायन नामक ब्राह्मण ने राजाओं के लिए भूमि, सुवर्ण आदि दानों को श्रेष्ठ बताकर मंत्री के मत का विरोध किया।
श्लोक 82 से 91 : कुपात्र दान की निन्दा
मुण्डशालायन ने अपनी रचित पुस्तक द्वारा राजा को भ्रमित किया और राजा ने उसे भूमि तथा सुवर्ण का दान देना आरम्भ कर दिया। तब मंत्री ने समझाया कि दान वही प्रशंसनीय है जो योग्य पात्र को दिया जाए और जिससे अपने तथा दूसरे दोनों का उपकार हो। कुपात्र को दिया गया दान ऊसर भूमि में बोए गए बीज के समान निष्फल होता है। फिर भी राजा ने मंत्री की बात स्वीकार नहीं की और मिथ्या दान-प्रथा को बढ़ावा दिया।
श्लोक 92 से 96 : मिथ्या दानों का प्रचार और पर्व की पूर्णता
राजा मेघरथ ने प्राचीन सत्पथ छोड़कर मुण्डशालायन द्वारा बताए गए नवीन लौकिक दानों को प्रचलित किया। कन्यादान, हस्तिदान, सुवर्णदान, अश्वदान, गोदान, भूमिदान आदि दस प्रकार के दानों का प्रचार हुआ। इस प्रकार शीतलनाथ भगवान् के तीर्थ के अन्तकाल में धर्म की शुद्ध परम्परा क्षीण होती गई। अंत में आचार्य द्वारा रचित शीतलपुराण के छप्पनवें पर्व की पूर्णता का वर्णन किया गया है।
उत्तरपुराण पर्व 57 – श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराणका वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा नलिनप्रभ का वैभव और वैराग्य
श्रेयांसनाथ भगवान् को समस्त कल्याण का सर्वोत्तम आश्रय बताया गया है। पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर में नलिनप्रभ नामक राजा राज्य करते थे। वे धर्म, अर्थ और काम को मर्यादित रूप से धारण करने वाले न्यायप्रिय और प्रजावत्सल राजा थे। एक दिन सहस्राम्रवन में जिनेन्द्र भगवान् के दर्शन और धर्मोपदेश सुनकर उन्हें तत्त्वज्ञान उत्पन्न हुआ। उन्होंने समझा कि परिग्रह मोह का कारण है और उसका त्याग ही कल्याणकारी है।
श्लोक 12 से 22 : दीक्षा, स्वर्गगमन और गर्भ कल्याणक
राजा नलिनप्रभ ने राज्य अपने पुत्र सुपुत्र को सौंपकर अनेक राजाओं के साथ संयम धारण किया। तप और साधना से उन्होंने तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया और समाधिमरण के बाद अच्युत स्वर्ग में इन्द्र हुए। वहाँ दिव्य सुख भोगकर वे भरत क्षेत्र के सिंहपुर नगर में राजा विष्णु और रानी सुनन्दा के यहाँ गर्भ में अवतीर्ण हुए। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और देवों ने गर्भ कल्याणक का उत्सव मनाया।
श्लोक 23 से 31 : भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म महोत्सव
फाल्गुन कृष्ण एकादशी को भगवान् श्रेयांसनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से समस्त संसार में हर्ष और शान्ति फैल गई। रोगी निरोग हो गये, दुखी प्रसन्न हो गये और धर्म की भावना जागृत हुई। देवों ने आकर दुन्दुभियाँ बजाईं, पुष्पवृष्टि की और सौधर्मेन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर भगवान् का जन्माभिषेक कर उनका “श्रेयांस” नाम रखा।
श्लोक 32 से 41 : कुमारकाल और आदर्श राज्य
भगवान् श्रेयांसनाथ के शरीर और गुण क्रमशः बढ़ते गये। उनकी आयु चौरासी लाख वर्ष और शरीर अस्सी धनुष ऊँचा था। युवावस्था पूर्ण होने पर उन्होंने राज्य संभाला। वे चन्द्रमा के समान प्रजा को शीतलता देने वाले और धर्ममय जीवन जीने वाले आदर्श सम्राट थे। उन्हें अर्थ की चिन्ता नहीं थी, क्योंकि पूर्व जन्म के पुण्यों से सभी सम्पत्तियाँ स्वतः प्राप्त थीं।
श्लोक 42 से 52 : वैराग्य, दीक्षा और केवलज्ञान
वसन्त ऋतु के परिवर्तन को देखकर भगवान् श्रेयांसनाथ को संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि मोक्ष प्राप्त किये बिना स्थायी सुख सम्भव नहीं है। उसी समय लौकान्तिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की। उन्होंने पुत्र को राज्य देकर मनोहर उद्यान में एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। कठोर तप के बाद तुम्बुर वृक्ष के नीचे उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 53 से 62 : विशाल धर्मसंघ और मोक्ष
देवों ने भगवान् के केवलज्ञान कल्याणक की पूजा की। उनके विशाल संघ में गणधर, पूर्वधारी, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ बड़ी संख्या में थीं। धर्मोपदेश देते हुए वे सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ एक माह तक योगनिरोध कर श्रावण शुक्ल पूर्णिमा के दिन उन्होंने समस्त कर्मों का नाश कर सिद्धपद प्राप्त किया।
श्लोक 63 से 72 : भगवान् की स्तुति और विश्वनन्दी का प्रारम्भिक चरित्र
देवों ने भगवान् श्रेयांसनाथ का निर्वाण कल्याणक मनाया। उनकी स्तुति करते हुए कहा गया कि उनका ज्ञान अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करने वाला है। इसके बाद प्रथम नारायण के चरित्र का वर्णन आरम्भ होता है। मगध देश के राजगृह नगर में विश्वभूति राजा राज्य करते थे। उनके पुत्र विश्वनन्दी और छोटे भाई विशाखभूति के पुत्र विशाखनन्दी थे।
श्लोक 73 से 81 : वैराग्य और मुनि दीक्षा
विश्वभूति ने राज्य त्यागकर तप स्वीकार किया और विशाखभूति राजा बने। विशाखनन्दी ने विश्वनन्दी के प्रिय नन्दन वन पर अधिकार कर लिया, जिससे दोनों में युद्ध हुआ। विशाखनन्दी के पराजित होकर भागने पर विश्वनन्दी को वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने सम्भूत गुरु के पास दीक्षा ग्रहण कर तपस्या प्रारम्भ की। बाद में मथुरा में विशाखनन्दी ने उनका उपहास किया, जिससे उनके मन में शल्य उत्पन्न हुई।
श्लोक 82 से 91 : त्रिपृष्ठ, विजय और अश्वग्रीव का जन्म
विश्वनन्दी मृत्यु के बाद महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए और फिर पोदनपुर में त्रिपृष्ठ नारायण के रूप में जन्मे। विशाखभूति भी उसी स्वर्ग से च्युत होकर विजय बलभद्र बने। विशाखनन्दी अनेक भवों में भटककर अश्वग्रीव प्रतिनारायण हुआ। विजय और त्रिपृष्ठ दोनों अत्यन्त प्रभावशाली और विशाल साम्राज्य के स्वामी बने। उन्होंने अश्वग्रीव को पराजित कर तीन खण्डों वाली पृथ्वी पर शासन किया।
श्लोक 92 से 100 : कर्मफल और तीनों का अन्त
त्रिपृष्ठ नारायण के पास सात दिव्य रत्न थे और विजय बलभद्र के पास चार रत्न थे। त्रिपृष्ठ अत्यधिक परिग्रह और विषय-भोगों में आसक्त रहा, जिसके फलस्वरूप वह सातवें नरक में गया। अश्वग्रीव भी अधोगति को प्राप्त हुआ। दूसरी ओर विजय बलभद्र ने वैराग्य लेकर संयम धारण किया, अनगार केवली बने और मोक्ष प्राप्त किया। अंत में कवि ने निष्कर्ष दिया कि दुष्ट कर्म के रहते संसार में स्थायी सुख सम्भव नहीं है; इसलिए मोक्षमार्ग ही वास्तविक कल्याण का मार्ग है।
उत्तरपुराण पर्व 58 – श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायणका वर्णन
श्लोक 1 से 11 — पद्मोत्तर राजा का वैराग्य और दीक्षा
वासुपूज्य भगवान की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि वे इन्द्रों द्वारा पूजित तथा समस्त जीवों को पवित्र करने वाले हैं। पुष्करार्ध द्वीप के वत्सकावती देश के रत्नपुर नगर में पद्मोत्तर नामक धर्मात्मा राजा राज्य करता था। उसकी कीर्ति, दया, नीति, दानशीलता और जिनभक्ति सर्वत्र प्रसिद्ध थी।
एक दिन मनोहर पर्वत पर विराजमान युगन्धर जिनराज के दर्शन एवं उपदेश सुनकर उसके भीतर संसार, शरीर और भोगों के प्रति गहरा वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसने लक्ष्मी, जीवन और शरीर की असारता का चिंतन किया तथा संसाररूपी दुःख-सागर से पार होने का निश्चय किया। अंततः उसने राज्य अपने पुत्र धनमित्र को सौंपकर अनेक राजाओं सहित दीक्षा धारण कर ली।
श्लोक 12 से 22 — महाशुक्र इन्द्र से वासुपूज्य भगवान के जन्म तक
दीक्षा के बाद पद्मोत्तर मुनि ने ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। मृत्यु के पश्चात् वे महाशुक्र स्वर्ग में इन्द्र हुए, जहाँ उन्होंने दिव्य सुखों का उपभोग किया। काल पूर्ण होने पर उनका जीव भरत क्षेत्र के चम्पा नगर में जन्म लेने हेतु अवतीर्ण हुआ।
चम्पा के राजा वसुपूज्य और रानी जयावती के यहाँ रानी ने शुभ स्वप्न देखे और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को भगवान का जन्म हुआ। देवों ने सुमेरु पर्वत पर उनका जन्माभिषेक किया, उनका नाम “वासुपूज्य” रखा और महान उत्सव मनाया।
श्लोक 23 से 32 — वासुपूज्य भगवान का कुमारकाल और वैराग्य
वासुपूज्य भगवान का जन्म श्रेयान्सनाथ भगवान के तीर्थ के बहुत काल बाद हुआ। उनका शरीर कुङ्कुम के समान लाल कान्तिवाला, सत्तर धनुष ऊँचा तथा बहत्तर लाख वर्ष की आयु वाला था। वे गुणों के भण्डार थे और उनकी बुद्धि से समस्त सद्गुणों को श्रेष्ठ अभिव्यक्ति मिली।
अठारह लाख वर्ष के कुमारकाल के पश्चात् भगवान ने संसार की वास्तविकता का चिंतन किया। उन्होंने समझा कि विषयासक्ति जीव को कर्मबंधन में डालती है और वही दुःखमय संसार का कारण बनती है। शरीर, भोग और इन्द्रिय-सुख सब नश्वर हैं; अतः मोक्ष ही सर्वोत्तम मार्ग है — इस प्रकार उनके भीतर गहन वैराग्य उत्पन्न हुआ।
श्लोक 33 से 41 — दीक्षा और केवलज्ञान की तैयारी
भगवान के वैराग्य भाव को देखकर लौकान्तिक देवों ने आकर उनकी स्तुति की और दीक्षा-कल्याणक सम्पन्न किया। वासुपूज्य भगवान देवों द्वारा उठाई गई पालकी में बैठकर मनोहर उद्यान पहुँचे और फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को विशाखा नक्षत्र में सामायिक चारित्र सहित दीक्षा धारण की। उसी समय उन्हें मनःपर्यय ज्ञान भी प्राप्त हुआ।
उनके साथ ६७६ राजाओं ने भी दीक्षा ली। अगले दिन सुन्दर नामक राजा ने उन्हें आहार दिया और पंचाश्चर्य प्रकट हुए। एक वर्ष की साधना के बाद भगवान पुनः उसी वन में लौटे और कठोर तप में स्थित हुए।
श्लोक 42 से 53 — केवलज्ञान, धर्मप्रभावना और निर्वाण
कदम्ब वृक्ष के नीचे उपवासपूर्वक ध्यान करते हुए वासुपूज्य भगवान ने माघ शुक्ल द्वितीया को चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने आकर उनकी पूजा की। उनके विशाल संघ में हजारों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा अनेक ऋद्धिधारी साधु सम्मिलित थे।
भगवान ने समस्त आर्यक्षेत्रों में विहार कर धर्म की वर्षा की और अनगिनत जीवों को सद्मार्ग प्रदान किया। आयु के अंतिम समय में वे मन्द्रागिरि के मनोहर उद्यान में पहुँचे और भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी को चौरानवे मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 54 से 61— वासुपूज्य भगवान की महिमा और द्विपृष्ठ नारायण का प्रारम्भिक वर्णन
निर्वाण के बाद देवों ने भगवान की भव्य पूजा की। ग्रन्थ में बताया गया है कि जैसे राजा को छह नीतियों से विजय मिलती है, वैसे ही मोक्षाभिलाषी को अनन्त गुणों से सिद्धि प्राप्त होती है। भगवान ने सप्तभंगी नय द्वारा पदार्थों का यथार्थ स्वरूप प्रतिपादित किया तथा आन्तरिक और बाह्य परिग्रह के त्याग का उपदेश दिया।
पूर्वभव में पद्मोत्तर राजा और महाशुक्र इन्द्र रहे वही जीव आगे चलकर वासुपूज्य भगवान बने। वे बालब्रह्मचारी रहकर राज्य करने वाले अद्वितीय तीर्थंकर थे। इसके बाद उनके तीर्थ में उत्पन्न द्विपृष्ठ नारायण का वर्णन आरम्भ होता है, जो तीन खण्डों का स्वामी और द्वितीय अर्धचक्री नारायण था। उसके पूर्वजन्मों के चरित्र को संसार से वैराग्य उत्पन्न करने वाला बताया गया है।
श्लोक 62 से 71— गुणमंजरी के कारण उत्पन्न वैर और युद्ध की भूमिका
कनकपुर के राजा सुषेण की नृत्यांगना गुणमंजरी अत्यन्त रूपवती, कलाओं में निपुण और दूसरी सरस्वती के समान मानी जाती थी। उसकी प्रसिद्धि सुनकर विन्ध्यपुर के राजा विन्ध्यशक्ति उसके प्रति आसक्त हो गया। उसने सुषेण के पास दूत भेजकर गुणमंजरी को कुछ समय के लिए भेजने का आग्रह किया।
दूत के असम्मानजनक शब्द सुनकर सुषेण अत्यन्त क्रोधित हो गया और उसने दूत का अपमान कर उसे लौटा दिया। जब यह समाचार विन्ध्यशक्ति को मिला तो वह भी क्रोध से भर उठा और मंत्रियों के साथ गुप्त योजना बनाकर युद्ध की तैयारी करने लगा।
श्लोक 72 से 81 — सुषेण का पराभव, वैराग्य और स्वर्गगमन
विन्ध्यशक्ति ने युद्ध में सुषेण को पराजित कर गुणमंजरी को बलपूर्वक छीन लिया। इस अपमान से सुषेण का मन टूट गया और वह अत्यन्त दुःखी रहने लगा। बाद में उसने विरक्त होकर सुव्रत जिनेन्द्र से धर्मोपदेश सुना और समझा कि यह सब पूर्वकृत पापों का फल है।
उसने दीक्षा धारण कर कठोर तप किया, किन्तु भीतर शत्रु के प्रति क्रोध बना रहने से निदानबन्ध सहित मृत्यु को प्राप्त हुआ और प्राणत स्वर्ग में देव हुआ। दूसरी ओर महापुर के राजा वायुरथ ने भी सुव्रत जिनेन्द्र से धर्म सुनकर राज्य त्याग दिया और तप द्वारा उसी स्वर्ग में उच्च देवपद प्राप्त किया।
श्लोक 82 से 91 — द्विपृष्ठ नारायण और अचल बलभद्र का जन्म
स्वर्ग से च्युत होकर वायुरथ का जीव द्वारावती के राजा ब्रह्म और रानी सुभद्रा के यहाँ अचल बलभद्र के रूप में उत्पन्न हुआ। उसी प्रकार सुषेण का जीव राजा ब्रह्म की दूसरी रानी उषा के यहाँ द्विपृष्ठ नारायण के रूप में जन्मा।
दोनों भाई अत्यन्त तेजस्वी, शास्त्रज्ञ और परस्पर प्रेमयुक्त थे। उनका आपसी स्नेह गंगा-यमुना के संगम के समान प्रतीत होता था। वे बिना भेदभाव के पृथ्वी का उपभोग करते थे और अपनी ऊँचाई, बल तथा सौन्दर्य से कैलास और अञ्जनगिरि के समान शोभायमान लगते थे।
श्लोक 92 से 101 तारक प्रतिनारायण का उदय और शत्रुता
पूर्वजन्म का विन्ध्यशक्ति अनेक जन्मों तक संसार में भटकने के बाद भोगवर्धन नगर के राजा श्रीधर के पुत्र तारक प्रतिनारायण के रूप में जन्मा। वह अत्यन्त पराक्रमी और क्रूर स्वभाव का था। उसके भय से अनेक राजा और विद्याधर उसके अधीन हो गये थे।
तारक अपनी शक्ति और अहंकार के कारण द्विपृष्ठ और अचल की उन्नति सहन नहीं कर सका। उसने सोचा कि ये दोनों उसके अधीन नहीं हैं और भविष्य में उसके लिए संकट बन सकते हैं। इसलिए उसने किसी दोष का बहाना बनाकर उन्हें नष्ट करने का निश्चय किया।
श्लोक 102 से 111 — दूत का अपमान और युद्ध का प्रारम्भ
तारक प्रतिनारायण ने कलहप्रिय दूत को भेजकर दोनों भाइयों से उनका प्रसिद्ध गन्धहस्ती माँगा और धमकी दी कि यदि हाथी नहीं भेजा गया तो युद्ध करके उन्हें मार डालेगा।
यह अपमानजनक संदेश सुनकर अचल बलभद्र ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया कि तारक स्वयं सेना सहित आए, तब उसे हाथी और अन्य वस्तुएँ भी मिलेंगी। दूत ने लौटकर यह बात तारक को बताई, जिससे वह क्रोधाग्नि में जल उठा। बिना उचित विचार किए वह विशाल सेना लेकर दोनों भाइयों के नगर पर चढ़ आया और चारों ओर से घेरा डाल दिया।
श्लोक 112 से 121 — तारक का वध, दिग्विजय और दोनों भाइयों का भिन्न परिणाम
अचल बलभद्र ने पर्वत के समान स्थिर रहकर शत्रु सेना को रोक लिया और द्विपृष्ठ नारायण ने महान पराक्रम से युद्ध किया। अंत में तारक ने अपना चक्र फेंका, परन्तु वह द्विपृष्ठ की प्रदक्षिणा करके उसकी दाहिनी भुजा पर स्थिर हो गया। उसी चक्र से द्विपृष्ठ ने तारक का वध कर दिया।
द्विपृष्ठ तीन खण्डों का स्वामी और सात रत्नों से सम्पन्न नारायण बना, जबकि अचल बलभद्र को चार रत्न प्राप्त हुए। दोनों ने दिग्विजय कर वासुपूज्य भगवान को नमस्कार किया।
किन्तु अंत में दोनों का परिणाम भिन्न हुआ। द्विपृष्ठ ने भोगों और परिग्रह में आसक्त होकर मृत्यु के बाद सातवें नरक में जन्म लिया, जबकि अचल ने भाई के वियोग से वैराग्य प्राप्त कर संयम धारण किया और मोक्ष को प्राप्त हुआ। इस प्रसंग से बताया गया है कि समान वैभव प्राप्त होने पर भी पुण्य और पाप के भिन्न परिणाम जीव को ऊर्ध्वगति या अधोगति की ओर ले जाते हैं।
श्लोक 122 से 124— तीनों महापुरुषों के पूर्वभव और निष्कर्ष
द्विपृष्ठ नारायण पूर्वजन्म में सुषेण राजा था, फिर स्वर्ग में देव हुआ, उसके बाद तीन खण्डों का स्वामी नारायण बना और अंत में पापकर्मों के कारण सातवें नरक में गया।
अचल बलभद्र पूर्वजन्म में वायुरथ राजा था, फिर स्वर्ग में देव हुआ, उसके बाद अचल बलभद्र बना और अंततः मोक्ष प्राप्त कर त्रिभुवन द्वारा पूजित हुआ।
तारक प्रतिनारायण पूर्वभव में विन्ध्यशक्ति राजा था। बाद में तारक प्रतिनारायण बना और द्विपृष्ठ के हाथों मारा जाकर महापाप के कारण नरक में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार यह सम्पूर्ण चरित्र कर्मों के उदय और उनके फल का गम्भीर उपदेश प्रदान करता है।
उत्तरपुराण पर्व 59 – विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर का वर्णन
श्लोक 1 से 13 : पद्मसेन राजा का वैराग्य और देवगति
इस श्लोक समूह में भगवान् विमलनाथ की महिमा का वर्णन करते हुए पश्चिम धातकीखण्ड के रम्यकावती देश के राजा पद्मसेन का चरित्र बताया गया है। राजा पद्मसेन न्यायप्रिय, धर्मनिष्ठ और प्रजावत्सल थे। उनकी प्रजा धर्म, अर्थ और काम के संतुलित पालन में स्थित थी। एक दिन प्रीतिंकर वन में स्वर्गगुप्त केवली से धर्म का स्वरूप सुनकर उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके केवल दो भव शेष हैं। इससे उनमें वैराग्य जागृत हुआ और उन्होंने राज्य पुत्र पद्मनाभ को देकर तपश्चर्या आरम्भ कर दी। ग्यारह अंगों का अध्ययन, सोलह कारण भावनाओं का अभ्यास तथा चार आराधनाओं की सिद्धि द्वारा उन्होंने तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया। अंत में वे सहस्त्रार स्वर्ग में इन्द्र हुए और वहाँ दिव्य सुखों का दीर्घकाल तक उपभोग किया।
श्लोक 14 से 21 : गर्भकल्याणक और भगवान् का जन्म
सहस्त्रार स्वर्ग से च्युत होकर वही जीव भरत क्षेत्र के काम्पिल्य नगर में राजा कृतवर्मा और रानी जयश्यामा के यहाँ गर्भ में आया। देवों ने रानी की पूजा की और रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया। रानी के गर्भ की वृद्धि से समस्त नगर में हर्ष फैल गया। माघ शुक्ल चतुर्थी के दिन उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में रानी ने तीन ज्ञानों के धारक, तीन लोकों के स्वामी भगवान् विमलवाहन को जन्म दिया।
श्लोक 22 से 31 : विमलवाहन भगवान् का ऐश्वर्य और राज्यकाल
जन्माभिषेक के पश्चात् देवों ने उनका नाम विमलवाहन रखा। भगवान् वासुपूज्य के तीर्थ के पश्चात धर्म का विच्छेद हो जाने पर विमलवाहन भगवान् का अवतार हुआ। उनकी आयु साठ लाख वर्ष, शरीर साठ धनुष ऊँचा तथा कान्ति सुवर्ण के समान थी। वे समस्त पुण्यों की मूर्ति प्रतीत होते थे। राज्याभिषेक के पश्चात उन्होंने दीर्घकाल तक धर्मपूर्वक राज्य किया। लक्ष्मी, कीर्ति और सरस्वती मानो उनकी सहचरिणी थीं। उनके सत्य और सद्गुण मुनियों द्वारा भी प्रशंसनीय थे। वे केवलज्ञान प्राप्त कर देवाधिदेव कहलाए और उनका निर्मल यश समस्त दिशाओं में फैल गया।
श्लोक 32 से 41 : वैराग्य, दीक्षा और मनःपर्ययज्ञान
एक दिन हेमन्त ऋतु में हिम की क्षणभंगुर शोभा देखकर भगवान् को संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्हें पूर्वजन्म की स्मृति हुई और वे संसार से विरक्त हो गए। उन्होंने विचार किया कि सीमित ज्ञान और अपूर्ण चारित्र से मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता। मोह, परिग्रह और प्रमाद की सत्ता को पहचानकर उन्होंने वैराग्य धारण किया। लौकान्तिक देवों ने उनकी स्तुति की और देवों ने दीक्षाकल्याणक का उत्सव मनाया। भगवान् देवदत्ता पालकी में सवार होकर सहेतुक वन पहुँचे और माघ शुक्ल चतुर्थी को एक हजार राजाओं के साथ दीक्षित हुए। उसी दिन उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ।
श्लोक 42 से 54 : केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के दूसरे दिन नन्दनपुर में राजा कनकप्रभु ने उन्हें आहारदान दिया। भगवान् ने तीन वर्ष तक कठोर तप किया। माघ शुक्ल षष्ठी को जामुन वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। देवों ने आठ प्रातिहार्यों सहित उनकी पूजा की। भगवान् मन्दर आदि पचपन गणधरों, हजारों मुनियों, आर्यिकाओं, श्रावकों और श्राविकाओं से घिरे रहते थे। वे धर्मक्षेत्रों में विहार कर संसार-दग्ध जीवों को शांति प्रदान करते रहे। अंततः वे सम्मेदशिखर पर विराजमान हुए।
श्लोक 55 से 61 : मोक्ष और विमलनाथ नाम की सार्थकता
भगवान् ने आठ हजार छह सौ मुनियों के साथ प्रतिमायोग धारण किया और आषाढ़ कृष्ण अष्टमी को शुक्लध्यान द्वारा मोक्ष प्राप्त किया। उसी दिन से कालाष्टमी का महत्त्व प्रसिद्ध हुआ। देवों ने उनका अन्त्येष्टि संस्कार कर स्तुति की। भगवान् ने शिक्षा दी कि जीव पाप-पुण्य दोनों से मल संचय करता है, इसलिए शुद्धोपयोग द्वारा आत्मा को निर्मल बनाना चाहिए। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, चार आराधनाएँ और धर्मरूपी हाथी द्वारा उन्होंने पापरूपी शत्रु का नाश किया, इसलिए वे विमलवाहन कहलाए। पूर्वभव में पद्मसेन राजा, फिर सहस्त्रार स्वर्ग के इन्द्र और अंततः तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ बने।
श्लोक 62 से 71 : धर्म बलभद्र का पूर्वभव और जन्म
यहाँ धर्म नामक बलभद्र के पूर्वभव का वर्णन है। पश्चिम विदेह क्षेत्र के मित्रनन्दी राजा प्रजावत्सल और धर्मनिष्ठ थे। वे प्रजा की भलाई में ही अपना सुख मानते थे। एक दिन सुव्रत जिनेन्द्र के उपदेश से उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उन्होंने संयम धारण कर लिया। अंत में वे अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र हुए। वहाँ से च्युत होकर द्वारावती नगरी में राजा भद्र और रानी सुभद्रा के यहाँ धर्म नामक पुत्र के रूप में उत्पन्न हुए।
श्लोक 72 से 81 : सुकेतु राजा और जुए के दोष
कुणाल देश के श्रावस्ती नगर में सुकेतु नामक राजा रहता था जो जुए और भोगों में आसक्त था। मंत्रियों और बन्धुओं के समझाने पर भी उसने जुआ नहीं छोड़ा और अंततः राज्य, धन, बल तथा रानी सब हार गया। शास्त्रों में जुए को अत्यन्त निकृष्ट व्यसन बताया गया है, क्योंकि इससे सत्य, लज्जा, कुल, सुख, धर्म, यश और परिवार सब नष्ट हो जाते हैं। जुआरी न स्नान करता है, न भोजन, न निद्रा; वह रोगी और अपमानित हो जाता है। सुकेतु इसका जीवंत उदाहरण बना। इसलिए जो दोनों लोकों का कल्याण चाहता है, उसे जुए का त्याग करना चाहिए।
श्लोक 82 से 91 : स्वयंभू नारायण का पूर्वभव और मधु से वैर
सर्वस्व हारने के बाद सुकेतु सुदर्शनाचार्य के पास पहुँचा और वैराग्य लेकर दीक्षित हो गया। किन्तु उसका अंतःकरण निर्मल नहीं हुआ। उसने तप करते हुए निदान किया कि भविष्य में उसका बल और वैभव प्रकट हो। इस कारण वह लान्तव स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से च्युत होकर द्वारावती के राजा भद्र और रानी पृथिवी के यहाँ स्वयंभू नामक पुत्र हुआ। धर्म बलभद्र और स्वयंभू नारायण बने। पूर्व जन्म के वैर के कारण स्वयंभू राजा मधु से द्वेष रखता था। एक बार उसने मधु के लिए भेजी गई भेंट छीन ली और दूतों को मार डाला। आचार्य बताते हैं कि प्रेम और द्वेष दोनों के संस्कार स्थायी हो जाते हैं, इसलिए ज्ञानी पुरुष को किसी से द्वेष नहीं करना चाहिए।
श्लोक 92 से 101 : मधु और स्वयंभू का युद्ध तथा धर्म का वैराग्य
जब मधु को दूतों के मारे जाने का समाचार मिला तो वह युद्ध के लिए चला। स्वयंभू और धर्म भी युद्ध के लिए तैयार थे। दोनों पक्षों में घमासान युद्ध हुआ। अंत में मधु ने क्रोध में चक्र फेंका, पर वह स्वयंभू के हाथ में आकर ठहर गया। तब स्वयंभू ने उसी चक्र से मधु का वध कर दिया और आधे भरतक्षेत्र का राज्य प्राप्त किया। मधु घोर पाप के कारण सातवें नरक में गया और स्वयंभू भी वैरभाव के कारण बाद में उसी नरक में गया। स्वयंभू के वियोग से धर्म बलभद्र अत्यन्त शोकाकुल हुए और संसार से विरक्त होकर भगवान् विमलनाथ के पास पहुँचे।
श्लोक 102 से 111 : धर्म बलभद्र का मोक्ष और मेरु-मन्दर गणधरों की भूमिका
धर्म बलभद्र ने सामायिक संयम धारण कर कठोर तप किया और संयमियों में श्रेष्ठ बन गए। वे सूर्य के समान तेजस्वी, निर्मल और अज्ञानरूपी अन्धकार का नाश करने वाले थे। अंततः उन्होंने समस्त कर्ममल नष्ट कर मोक्ष प्राप्त किया। इसके विपरीत स्वयंभू और मधु वैर तथा जुए के कारण पाप संचय कर नरकगति को प्राप्त हुए। यहाँ निदान-बन्ध की भी निन्दा की गई है, क्योंकि तप करने पर भी यदि मन में वासना या अभिलाषा बनी रहे तो वह भवभ्रमण का कारण बनती है। इसके पश्चात् मेरु और मन्दर नामक दो गणधरों की कथा आरम्भ होती है। पश्चिम विदेह क्षेत्र के वीतशोक नगर में वैजयन्त राजा तथा रानी सर्वश्री के संजयन्त और जयन्त नामक दो पुत्र थे। स्वयंभू तीर्थंकर के उपदेश से दोनों भाई वैराग्य को प्राप्त हुए।
श्लोक 112 से 125 : संजयन्त मुनि पर उपसर्ग
संजयन्त और जयन्त ने राज्य त्यागकर संयम धारण किया। संजयन्त मुनि ने कषायों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया। जयन्त मुनि ने धरणेन्द्र का वैभव देखकर धरणेन्द्र बनने का निदान किया और अगले भव में धरणेन्द्र बना। एक दिन संजयन्त मुनि भीम वन में प्रतिमायोग धारण कर स्थित थे। तभी विद्युदंष्ट्र नामक विद्याधर पूर्वभव के वैर से प्रेरित होकर उन्हें उठा लाया और नदियों के संगमस्थल में डाल दिया। उसने अन्य विद्याधरों को भ्रमित कर यह कहकर भड़काया कि यह कोई भयंकर राक्षस है। भयभीत विद्याधरों ने समाधिस्थ संजयन्त मुनि पर शस्त्रों से प्रहार करना आरम्भ कर दिया।
श्लोक 126 से 131 : संजयन्त मुनि का मोक्ष और धरणेन्द्र का क्रोध
संजयन्त मुनि ने समस्त उपसर्गों को समभाव से सहन किया। वे पर्वत के समान अचल रहे और शुक्लध्यान के प्रभाव से मोक्ष को प्राप्त हुए। उनके निर्वाणकल्याणक के अवसर पर चारों निकायों के देव उपस्थित हुए। धरणेन्द्र ने अवधिज्ञान से जाना कि विद्याधरों ने उसके बड़े भाई पर उपसर्ग किया है, इसलिए उसने क्रोधित होकर सब विद्याधरों को नागपाश में बाँध लिया। विद्याधरों ने विनयपूर्वक निवेदन किया कि वे तो विद्युदंष्ट्र के छल में आ गए थे। तब धरणेन्द्र ने उन्हें छोड़ दिया और विद्युदंष्ट्र को दण्डित करने के लिए उद्यत हुआ।
श्लोक 132 से 141 : आदित्याभ देव का उपदेश और वैर की निरर्थकता
उसी समय आदित्याभ नामक देव वहाँ आया और उसने धरणेन्द्र को समझाया कि महापुरुषों को क्षुद्र जीवों पर क्रोध नहीं करना चाहिए। उसने कहा कि संसार में बन्धुता और अबन्धुता स्थायी नहीं होती। पूर्वजन्मों में संजयन्त ने भी विद्युदंष्ट्र के जीव को दण्ड दिया था, उसी वैरभाव के संस्कार से उसने यह उपसर्ग किया है। आदित्याभ ने यह भी बताया कि विद्युदंष्ट्र ने पूर्व के चार जन्मों में भी संजयन्त के जीव के साथ वैर किया था। इस प्रकार संसार में वैर का चक्र निरन्तर चलता रहता है।
श्लोक 142 से 151 : भद्रमित्र और सत्यघोष की कथा का प्रारम्भ
आदित्याभ ने कहा कि इस जन्म में विद्युदंष्ट्र ने उपसर्ग देकर भी संजयन्त मुनि के मोक्ष का कारण बनकर उपकार ही किया है। फिर उसने पूर्वजन्म की कथा सुनानी आरम्भ की। भरतक्षेत्र के सिंहपुर नगर में सिंहसेन राजा और रामदत्ता रानी राज्य करते थे। उनके मंत्री श्रीभूति थे, जो स्वयं को सत्यघोष कहते थे। पद्मखण्डपुर के सेठ सुदत्त के पुत्र भद्रमित्र ने रत्नद्वीप से बहुत से रत्न अर्जित किए और उन्हें सुरक्षित रखने के लिए सत्यघोष मंत्री को सौंप दिया। जब वह लौटकर आया और अपने रत्न माँगे, तब लोभवश मंत्री मुकर गया और कहने लगा कि वह कुछ नहीं जानता।
श्लोक 152 से 161 : भद्रमित्र का विलाप और सत्यघोष की कपटपूर्ण वृत्ति
भद्रमित्र नगर में विलाप करने लगा, जबकि सत्यघोष अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए लोगों को भ्रमित करता रहा कि भद्रमित्र का धन चोरों ने लूट लिया है। उसने न्यायालय में झूठी शपथ भी खाई। भद्रमित्र बार-बार मंत्री को स्मरण कराता रहा कि उसने उसे सत्यवादी और श्रेष्ठ मंत्री मानकर विश्वासपूर्वक रत्न सौंपे थे। उसने कहा कि मंत्री के पास सब प्रकार का वैभव होते हुए भी वह धर्म, यश और सत्य का नाश कर रहा है। भद्रमित्र ने न्यासापहार अर्थात् विश्वासघात के दोष को अत्यन्त निन्दनीय बताया।
श्लोक 162 से 171 रानी की बुद्धिमत्ता और रत्नों की पुनर्प्राप्ति
भद्रमित्र प्रतिदिन वृक्ष पर चढ़कर अपना दुःख प्रकट करता था। रानी रामदत्ता ने उसकी बातों से अनुमान किया कि वह पागल नहीं, बल्कि सत्य बोल रहा है। उसने चतुराई से मंत्री का यज्ञोपवीत और अंगूठी प्राप्त की तथा धाय को मंत्री के घर भेजकर उन्हीं की पहचान से रत्नों का पिटारा मँगवा लिया। राजा सिंहसेन ने उस पिटारे में कुछ और रत्न मिलाकर भद्रमित्र को बुलाया और पूछा कि क्या यह तुम्हारा पिटारा है। भद्रमित्र ने सत्यपूर्वक स्वीकार किया कि इसमें कुछ अतिरिक्त रत्न भी हैं। उसकी सत्यनिष्ठा से प्रसन्न होकर राजा ने उसे राजश्रेष्ठी बना दिया।
श्लोक 172 से 181 : सत्यघोष का दण्ड और चोरी की निन्दा
भद्रमित्र ने केवल अपने रत्न ही ग्रहण किए। इससे राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए और भद्रमित्र को ‘सत्यघोष’ उपनाम प्रदान किया। दूसरी ओर श्रीभूति मंत्री को दोषी सिद्ध कर दण्डित किया गया। उसका धन छीन लिया गया, उसे कठोर शारीरिक दण्ड दिए गए और अपमानित किया गया। इसके बाद चोरी के दोषों का विस्तार से वर्णन किया गया है। चोरी दो प्रकार की बताई गई है—एक स्वभावजन्य और दूसरी परिस्थितिजन्य। स्वभावजन्य चोर करोड़ों का धन होते हुए भी चोरी से तृप्त नहीं होता। चोरी जीव को दुर्गति और दुःख की ओर ले जाती है तथा उसकी कीर्ति और विश्वास दोनों नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 182 से 191 : दुराचार का फल और व्याघ्री का प्रसंग
चोरी करने वाला जीव अशुभ आयु बाँधता है और दीर्घकाल तक दुःख भोगता है। सत्यघोष मंत्री भी चोरी के कारण पदच्युत हुआ और दुर्गति को प्राप्त हुआ। उसके स्थान पर धर्मिल नामक ब्राह्मण मंत्री बनाया गया। समय बीतने पर भद्रमित्र ने मुनि वरधर्म से धर्मोपदेश सुनकर बहुत-सा दान दिया। उसकी माता सुमित्रा यह सहन न कर सकी और क्रोधवश मरकर व्याघ्री बनी। एक दिन उसी व्याघ्री ने अपने पूर्वजन्म के पुत्र भद्रमित्र को मार डाला। इससे बताया गया है कि क्रोध जीव को कितना अन्धा बना देता है।
श्लोक 192 से 201 : नवीन भव और वैराग्य की प्रेरणा
भद्रमित्र अगले जन्म में रानी रामदत्ता के सिंहचन्द्र नामक पुत्र हुए और पूर्णचन्द्र उनके छोटे भाई बने। उधर सत्यघोष मंत्री का जीव अगन्धन नामक सर्प हुआ। उसने क्रोधवश राजा सिंहसेन को डस लिया। बाद में वह सर्प अग्नि में जलकर मृग बना और सिंहसेन हाथी के रूप में जन्मा। सिंहचन्द्र राजा बना और पूर्णचन्द्र युवराज। जब रानी रामदत्ता ने आर्यिकाओं से अपने पति की मृत्यु का समाचार सुना, तब उसने संयम धारण कर लिया। इस घटना से सिंहचन्द्र के भीतर वैराग्य जागृत हुआ और उसने मुनि पूर्णचन्द्र से धर्मोपदेश सुना।
श्लोक 202 से 211 : सिंहचन्द्र का संयम और पूर्वभवों का रहस्य
सिंहचन्द्र ने राज्य छोटे भाई पूर्णचन्द्र को सौंपकर दीक्षा ग्रहण की और अप्रमत्त विरत गुणस्थान को प्राप्त हुआ। तप के प्रभाव से उसे मनःपर्ययज्ञान और आकाशगामिनी ऋद्धि प्राप्त हुई। एक दिन रानी रामदत्ता ने उनसे पूछा कि क्या पूर्णचन्द्र भी कभी धर्ममार्ग पर आएगा। तब सिंहचन्द्र मुनि ने पूर्वभवों की कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि पूर्णचन्द्र पूर्वजन्म में वारुणी नामक कन्या थी और रामदत्ता स्वयं पूर्वभव में मधुरा थी। भद्रमित्र का जीव सिंहचन्द्र बना था। इस प्रकार उन्होंने अनेक जन्मों के पारस्परिक सम्बन्धों का वर्णन कर संसार की अनित्यता और कर्मबंधन का बोध कराया।
श्लोक 212 से 221 : हाथी का संयम, सर्प का वैर और श्रीधर देव
सिंहचन्द्र मुनि ने रामदत्ता को बताया कि पूर्वजन्म का राजा सिंहसेन हाथी बना था। सिंहचन्द्र ने उसे पूर्वभव का स्मरण कराकर देशव्रत धारण कराया। वह हाथी विरक्त होकर कठोर तप करता, उपवास करता और सूखे पत्तों से पारणा करता था। एक दिन नदी में जल पीते समय सत्यघोष के जीव, जो कुर्कुट सर्प बना था, ने उसे डस लिया। समाधिमरण के प्रभाव से वह हाथी सहस्त्रार स्वर्ग में श्रीधर देव हुआ। धर्मिल ब्राह्मण का जीव वानर बना था, उसने उस सर्प को मार डाला, जिससे वह तीसरे नरक में गया। हाथी के दाँत और मोती धनमित्र सेठ द्वारा राजा पूर्णचन्द्र को भेंट किए गए।
श्लोक 222 से 232 : रामदत्ता का बोध और नवीन भव
राजा पूर्णचन्द्र ने हाथी के दाँतों से पलंग बनवाया और मोतियों का हार धारण किया। सिंहचन्द्र मुनि के उपदेश से रामदत्ता को संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उसने पूर्णचन्द्र को धर्ममार्ग का उपदेश दिया। पूर्णचन्द्र ने धर्म को स्वीकार कर दीर्घकाल तक राज्य किया। रामदत्ता पुत्रस्नेह के कारण निदान बाँधकर महाशुक्र स्वर्ग में भास्कर देव हुई और पूर्णचन्द्र वैडूर्य विमान में वैर्य देव बना। सिंहचन्द्र मुनि समाधिमरण कर प्रीतिंकर विमान में अहमिन्द्र हुए। आगे चलकर रामदत्ता का जीव श्रीधरा और पूर्णचन्द्र का जीव यशोधरा नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुए। सिंहसेन का जीव श्रीधर देव से रश्मिवेग नामक पुत्र बना। सूर्यावर्त राजा के वैराग्य लेने पर श्रीधरा और यशोधरा ने भी दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 233 से 242 : रश्मिवेग मुनि और अजगर का उपसर्ग
रश्मिवेग ने हरिचन्द्र मुनि से धर्मोपदेश सुनकर संयम ग्रहण किया और आकाशचारण ऋद्धि प्राप्त की। एक दिन काञ्चन गुफा में श्रीधरा और यशोधरा आर्यिकाएँ उन्हें नमस्कार कर बैठीं। उसी समय सत्यघोष का जीव, जो अनेक भवों के बाद अजगर बना था, क्रोधवश तीनों को निगल गया। दोनों आर्यिकाएँ समाधिमरण से देवगति को प्राप्त हुईं और रश्मिवेग भी स्वर्ग में देव हुए, जबकि अजगर चौथे नरक में गया। बाद में सिंहचन्द्र का जीव चक्रायुध और रश्मिवेग का जीव वज्रायुध नामक राजपुत्र बना। श्रीधरा का जीव रत्नमाला और यशोधरा का जीव रत्नायुध बना।
श्लोक 243 से 252 : चक्रायुध और वज्रायुध का वैराग्य
राजा अपराजित ने धर्मोपदेश सुनकर चक्रायुध को राज्य देकर दीक्षा ले ली। बाद में चक्रायुध ने भी वज्रायुध को राज्य सौंपकर संयम ग्रहण किया और उसी भव में मोक्ष प्राप्त किया। वज्रायुध ने भी राज्य रत्नायुध को देकर दीक्षा ले ली। दूसरी ओर रत्नायुध भोगों में आसक्त रहा। एक दिन वज्रदन्त मुनि के लोकानुयोग प्रवचन को सुनकर मेघविजय हाथी को जातिस्मरण हुआ। उसने मांसादि आहार त्याग दिया और संसार की दुःखमयता पर विचार करने लगा। वैद्यों ने समझा कि यह कोई शारीरिक रोग नहीं, बल्कि धर्मश्रवण से उत्पन्न वैराग्य है।
श्लोक 253 से 262 : प्रीतिंकर और विचित्रमति की कथा
राजा के प्रश्न पर वज्रदन्त मुनि ने पूर्वजन्म की कथा सुनाई। छत्रपुर के राजा प्रीतिभद्र के पुत्र प्रीतिंकर और मंत्रीपुत्र विचित्रमति ने धर्मरुचि मुनि से उपदेश सुनकर दीक्षा ली। प्रीतिंकर मुनि को क्षीरास्त्रव ऋद्धि प्राप्त हुई। साकेतपुर में एक वेश्या बुद्धिषेणा ने प्रीतिंकर मुनि से श्रेष्ठ कुल और रूप प्राप्ति का कारण पूछा। उन्होंने मद्य-मांस त्याग का उपदेश दिया। बाद में विचित्रमति मुनि ने उसी वेश्या से अनुचित रागपूर्ण बातें कीं और अपमानित होकर मुनिपना छोड़ दिया।
श्लोक 263 से 271 : विचित्रमति का पतन और राजा का वैराग्य
विचित्रमति ने राजसेवा ग्रहण कर मांसाहार द्वारा राजा गन्धमित्र को अपने वश में कर लिया और बुद्धिषेणा को भी प्राप्त कर लिया। अंत में वह मरकर मेघविजय हाथी बना। वज्रदन्त मुनि ने बताया कि त्रिलोकप्रज्ञप्ति सुनकर उसे जातिस्मरण हुआ है, इसलिए वह अशुद्ध आहार का त्याग कर चुका है। धर्म को भोगों के लिए छोड़ना महामणि के बदले काँच लेने के समान है। यह सुनकर राजा रत्नायुध धर्म में प्रवृत्त हुआ। उसने राज्य त्यागकर माता सहित संयम धारण किया और तप कर सोलहवें स्वर्ग में देव हुआ।
श्लोक 272 से 281 : अतिदारुण व्याध और विभीषण का चरित्र
सत्यघोष का जीव चौथे नरक से निकलकर अनेक योनियों में भटका और अंततः अतिदारुण नामक व्याध बना। उसने प्रियंगुखण्ड वन में प्रतिमायोगस्थ वज्रायुध मुनि की हत्या कर दी। वज्रायुध मुनि धर्मध्यान से सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग को प्राप्त हुए और अतिदारुण सातवें नरक में गया। आगे रत्नमाला का जीव वीतभय और रत्नायुध का जीव विभीषण नामक बलभद्र-नारायण बने। विभीषण नरकगति को प्राप्त हुआ, जबकि वीतभय ने अंत में दीक्षा लेकर लान्तव स्वर्ग पाया। आदित्याभ देव ने विभीषण को नरक में जाकर सम्बोधित किया था।
श्लोक 282 से 291 : जयन्त, धरणेन्द्र और विद्युदंष्ट्र के पूर्वभव
विभीषण का जीव श्रीधर्मा बना और आगे ब्रह्मस्वर्ग का देव हुआ। वज्रायुध का जीव संजयन्त बना। श्रीधर्मा का जीव जयन्त होकर निदान के कारण धरणेन्द्र बना। सत्यघोष का जीव सातवें नरक से निकलकर अनेक तिर्यंच योनियों में भ्रमण करता हुआ मृगशृंग तपस्वी बना। उसने विद्याधर राजा को देखकर निदान बाँधा और मरकर विद्युदंष्ट्र विद्याधर बना। पूर्ववैर के संस्कार से उसने पुनः कर्मबंध किया और अनेक दुःख भोगे।
श्लोक 292 से 301 : वैरत्याग का उपदेश और ह्रीमन्त पर्वत
आदित्याभ देव ने धरणेन्द्र को समझाया कि संसार में कोई स्थायी बन्धु या शत्रु नहीं होता। जीव कर्मवश कभी पिता, पुत्र, माता, भाई या बहन बनता रहता है। इसलिए वैर धारण नहीं करना चाहिए। इन वचनों से धरणेन्द्र का हृदय शान्त हुआ। उसने विद्युदंष्ट्र की महाविद्याएँ छीनने का निश्चय किया, पर देव के अनुरोध पर केवल इतना शाप दिया कि उसके वंश के पुरुष महाविद्या सिद्ध नहीं कर पाएँगे, केवल स्त्रियाँ संजयन्त स्वामी के समीप उन्हें सिद्ध कर सकेंगी। इस घटना से लज्जित विद्याधरों के कारण उस पर्वत का नाम ‘ह्रीमान्’ पड़ा। धरणेन्द्र ने वहाँ संजयन्त मुनि की प्रतिमा स्थापित की।
श्लोक 302 से 312 : मेरु और मन्दर गणधरों के पूर्वभव
आदित्याभ देव आयु पूर्ण कर मेरु नामक राजपुत्र हुआ और धरणेन्द्र मन्दर नामक पुत्र बना। दोनों अत्यन्त निकट भव्य थे। उन्होंने विमलवाहन भगवान् से अपने पूर्वभव सुने और दीक्षा लेकर गणधर बने। आगे उनके अनेक भवों का संक्षिप्त विवरण दिया गया है। सिंहसेन का जीव अनेक भवों से होकर संजयन्त केवली बना। मधुरा का जीव रामदत्ता, श्रीधरा, रत्नमाला आदि भवों से गुजरकर मेरु गणधर बना। वारुणी का जीव पूर्णचन्द्र, यशोधरा, रत्नायुध, विभीषण, श्रीधर्मा, जयन्त और धरणेन्द्र होते हुए मन्दर गणधर बना और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुआ।
श्लोक 313 से 319: सत्यघोष, भद्रमित्र और उपसंहार
सत्यघोष मंत्री का जीव अनेक दुर्गतियों—सर्प, नरक, अजगर, व्याध और विद्युदंष्ट्र—में भटकता रहा, पर अंत में वैररहित होकर शांत हुआ। भद्रमित्र का जीव सिंहचन्द्र, प्रीतिंकरदेव और चक्रायुध आदि भवों से गुजरकर मोक्ष को प्राप्त हुआ। इस प्रकार तीनों जीव कर्मों के अनुसार कभी सुख और कभी दुःख भोगते रहे, पर अंत में निष्पाप होकर परमपद को प्राप्त हुए। संजयन्त स्वामी ने भीषण उपसर्ग को समता से सहन कर शुक्लध्यान धारण किया और कर्ममल से रहित हुए। अंत में मेरु और मन्दर गणधरों की महिमा का वर्णन कर पर्व का समापन किया गया।
उत्तरपुराण पर्व 60 – अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा पद्मरथ का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध
धातकीखण्ड द्वीप के अरिष्ट नगर में पद्मरथ नामक राजा राज्य करता था। वह अत्यन्त पुण्यशाली और सुख-संपन्न था। एक दिन स्वयंप्रभ जिनेन्द्र के उपदेश से उसे संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उसने आत्मा, शरीर और इन्द्रिय-विषयों के क्षणभंगुर संबंध पर विचार किया और विषयासक्ति का त्याग करने का निश्चय किया। पुत्र घनरथ को राज्य सौंपकर उसने दीक्षा ग्रहण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया तथा तीर्थंकर प्रकृति का बन्ध किया।
श्लोक 12 से 21 : अच्युत स्वर्ग से अनन्तनाथ के गर्भावतरण तक
सल्लेखना सहित देह त्यागकर पद्मरथ अच्युत स्वर्ग में इन्द्र पद को प्राप्त हुआ। वहाँ दीर्घकाल तक दिव्य सुख भोगने के पश्चात उसका जीव पुनः मनुष्यलोक में आया। भरत क्षेत्र की अयोध्या नगरी में राजा सिंहसेन और रानी जयश्यामा के यहाँ शुभ स्वप्नों एवं दिव्य संकेतों के साथ उसका गर्भावतरण हुआ। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया और समय पूर्ण होने पर जयश्यामा ने एक पुण्यवान पुत्र को जन्म दिया।
श्लोक 22 से 32 : अनन्तनाथ का जन्म, राज्य और दीक्षा
इन्द्रों ने नवजात बालक का मेरु पर्वत पर अभिषेक कर उसका नाम अनन्तजित रखा। वे आगे चलकर अनन्तनाथ तीर्थंकर कहलाए। दीर्घकाल तक राज्य करने के बाद एक दिन उल्कापात देखकर उन्हें संसार और कर्मबंधन की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने कर्मरूपी लता को नष्ट करने का संकल्प किया। पुत्र अनन्तविजय को राज्य देकर वे सहेतुक वन में एक हजार राजाओं सहित दीक्षित हो गए।
श्लोक 33 से 42 : तप, केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के दूसरे दिन राजा विशाख ने उन्हें आहारदान देकर पंचाश्चर्यों की प्राप्ति की। दो वर्ष की कठोर साधना के बाद सहेतुक वन में अश्वत्थ वृक्ष के नीचे अनन्तनाथ को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने चतुर्थ कल्याणक मनाया। उनके धर्मसंघ में हजारों मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे तथा उनकी दिव्यध्वनि से असंख्य जीवों का कल्याण हुआ।
श्लोक 43 से 51 : मोक्ष और सुप्रभ–पुरुषोत्तम कथा का आरम्भ
भगवान अनन्तनाथ ने अनेक प्रदेशों में विहार कर जीवों को सम्यक् मार्ग का उपदेश दिया। अंत में सम्मेदशिखर पर प्रतिमायोग धारण कर चतुर्थ शुक्लध्यान से मोक्ष प्राप्त किया। इसके पश्चात ग्रंथकार सुप्रभ बलभद्र और पुरुषोत्तम नारायण के पूर्वभवों का वर्णन प्रारम्भ करते हैं। पोदनपुर के राजा वसुषेण और उनकी प्रिय रानी नन्दा का परिचय दिया जाता है।
श्लोक 52 से 61 : वसुषेण और महाबल के वैराग्यपूर्ण पूर्वभव
मलयदेश का राजा चण्डशासन नन्दा पर मोहित होकर उसका हरण कर ले गया। इस अपमान से दुःखी वसुषेण ने वैराग्य ग्रहण किया, दीक्षा लेकर कठोर तप किया और भविष्य में महान सामर्थ्य प्राप्त करने का निदान बाँधा। मृत्यु के बाद वह सहस्रार स्वर्ग में देव हुआ। दूसरी ओर पूर्वविदेह क्षेत्र के महाबल राजा ने भी संसार से विरक्त होकर संयम धारण किया और तपश्चर्या के फलस्वरूप वही सहस्रार स्वर्ग में देव रूप से उत्पन्न हुआ।
श्लोक 62 से 71 : सुप्रभ बलभद्र और पुरुषोत्तम नारायण का जन्म
सहस्रार स्वर्ग से च्युत होकर महाबल का जीव द्वारवती के राजा सोमप्रभ के यहाँ सुप्रभ नामक पुत्र रूप में जन्मा। वसुषेण का जीव उसी राजा की दूसरी रानी के यहाँ पुरुषोत्तम नामक पुत्र बना। दोनों अत्यन्त तेजस्वी, गुणवान और लोकप्रसिद्ध हुए। वे क्रमशः बलभद्र और नारायण के रूप में विख्यात हुए तथा दीर्घकाल तक राज्य और वैभव का उपभोग करते रहे। इसी समय पूर्वजन्म का चण्डशासन अनेक भवों के बाद वाराणसी का राजा मधुसूदन बना।
श्लोक 72 से 81 : मधुसूदन का वध और सुप्रभ का मोक्ष
मधुसूदन ने अहंकारवश सुप्रभ और पुरुषोत्तम से कर माँगा। दोनों भाइयों ने उसका प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया। परिणामस्वरूप भीषण युद्ध हुआ। युद्ध में पुरुषोत्तम ने उसी चक्र से मधुसूदन का वध कर दिया जिसे मधुसूदन ने उसके विरुद्ध चलाया था। बाद में पुरुषोत्तम अपने हिंसक कर्मों के कारण नरक गया, जबकि उसके वियोग से दुःखी सुप्रभ ने दीक्षा लेकर साधना की और क्षपक श्रेणी प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त हुआ।
श्लोक 82 से 85: तीनों पात्रों के भव और कर्मफल का निष्कर्ष
पुरुषोत्तम के जीव ने वसुषेण राजा, देव और नारायण के रूप में जन्म लेकर अंततः नरकगति प्राप्त की। चण्डशासन अनेक भवों के बाद मधुसूदन बना और अधोगति को प्राप्त हुआ। इसके विपरीत महाबल राजा, देव और सुप्रभ बलभद्र के रूप में जन्म लेकर अंततः मोक्ष को प्राप्त हुआ। इस प्रकार एक ही प्रकार के सांसारिक सुख भोगने वाले दो व्यक्तियों में से एक मोक्ष और दूसरा नरक गया, जिससे स्पष्ट होता है कि जीव की गति उसके आचरण और प्रवृत्ति पर निर्भर करती है।
उत्तरपुराण पर्व 61 – धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : धर्मनाथ भगवान् के पूर्वभव एवं अहमिन्द्र पद
पूर्व धातकीखण्ड के पूर्वविदेह क्षेत्र में सुसीमा नगरी के राजा दशरथ चन्द्रग्रहण देखकर वैराग्य को प्राप्त हुए। उन्होंने राज्य अपने पुत्र महारथ को सौंपकर दीक्षा धारण की, सोलह कारण-भावनाओं का चिंतन किया और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध कर समाधिमरण से सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ उन्होंने महान दिव्य सुखों का उपभोग किया।
श्लोक 12 से 23 : धर्मनाथ भगवान् का गर्भ, जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन
सर्वार्थसिद्धि से च्युत होकर वह जीव रत्नपुर के राजा भानु की रानी सुप्रभा के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल त्रयोदशी को धर्मनाथ भगवान् का जन्म हुआ। इन्द्रों ने उनका जन्माभिषेक किया। उनका शरीर स्वर्ण के समान कान्तिमान, 180 हाथ ऊँचा तथा आयु दस लाख वर्ष की थी। कुमारकाल पूर्ण होने पर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ।
श्लोक 24 से 41 : राज्य, वैराग्य एवं दीक्षा
धर्मनाथ भगवान् गुण, दानशीलता, न्यायप्रियता और लोककल्याणकारी प्रवृत्ति से युक्त आदर्श शासक थे। पाँच लाख वर्ष राज्य करने के बाद उल्कापात देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने आत्मस्वरूप का चिंतन किया और वैराग्य धारण किया। पुत्र सुधर्म को राज्य देकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के साथ ही उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ तथा धन्यषेण राजा ने उन्हें प्रथम आहार प्रदान किया।
श्लोक 42 से 52 : केवलज्ञान, धर्मप्रवर्तन और मोक्ष
एक वर्ष की साधना के पश्चात् धर्मनाथ भगवान् ने सप्तच्छद वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके विशाल तीर्थ में असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा देव-देवी सम्मिलित थे। उन्होंने धर्म का व्यापक उपदेश दिया। अंत में सम्मेदशिखर पर आठ सौ नौ मुनियों सहित शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 53 से 61 : धर्मनाथ भगवान् की स्तुति एवं सुमित्र राजा का पराभव
देवों ने निर्वाणोत्सव मनाया और धर्मनाथ भगवान् की स्तुति की। तत्पश्चात् उनके तीर्थकाल में सुदर्शन बलभद्र और पुरुषसिंह नारायण का प्रसंग प्रारम्भ होता है। राजगृह के राजा सुमित्र अत्यन्त अभिमानी और बलवान थे, किन्तु राजसिंह नामक राजा से मल्लयुद्ध में पराजित होकर उनका अभिमान चूर हो गया। इस अपमान से व्यथित होकर उन्होंने राज्य त्याग दिया।
श्लोक 62 से 71 : सुमित्र और नरवृषभ के पूर्वभव
सुमित्र ने कृष्णाचार्य से दीक्षा ली और कठोर तप किया, किन्तु मन में पराजय का क्लेश बना रहा। उन्होंने अगले जन्म में महान बल प्राप्त करने की इच्छा रूप निदान बाँधा और माहेन्द्र स्वर्ग के देव बने। दूसरी ओर नरवृषभ राजा ने वैराग्य लेकर दिगम्बर दीक्षा धारण की और सहस्त्रार स्वर्ग में देव हुए। बाद में वही क्रमशः पुरुषसिंह नारायण और सुदर्शन बलभद्र के रूप में जन्मे।
श्लोक 72 से 81 : मधुक्रीड़ प्रतिनारायण के साथ युद्ध
सुदर्शन बलभद्र और पुरुषसिंह नारायण दोनों भाइयों ने परस्पर प्रेमपूर्वक राज्य किया। हस्तिनापुर के राजा मधुक्रीड़ ने उनसे कर की माँग की। इससे विवाद उत्पन्न हुआ और युद्ध छिड़ गया। दीर्घ संघर्ष के बाद पुरुषसिंह नारायण ने मधुक्रीड़ का वध कर दिया और दोनों भाइयों ने तीन खण्डों पर राज्य स्थापित किया।
श्लोक 82 से 90 : बलभद्र का मोक्ष और मघवा चक्रवर्ती का पूर्वभव
पुरुषसिंह नारायण मृत्यु के बाद सातवें नरक में गया। उसके वियोग से सुदर्शन बलभद्र ने धर्मनाथ भगवान् की शरण लेकर दीक्षा ग्रहण की और मोक्ष प्राप्त किया। इसके बाद तीसरे चक्रवर्ती मघवा का चरित्र आरम्भ होता है। पूर्व जन्म में वे नरपति नामक राजा थे, जिन्होंने तप करके मध्यम ग्रैवेयक में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।
श्लोक 91 से 101 : मघवा चक्रवर्ती का वैराग्य और केवलज्ञान
देवलोक से च्युत होकर नरपति का जीव अयोध्या में मघवा चक्रवर्ती के रूप में जन्मा। उन्होंने छह खण्डों पर राज्य किया और चक्रवर्ती वैभव का उपभोग किया। अभयघोष केवली के उपदेश से उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। पुत्र को राज्य देकर उन्होंने संयम धारण किया, घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त कर धर्म का प्रचार किया।
श्लोक 102 से 112 : मघवा का मोक्ष और सनत्कुमार चक्रवर्ती का उदय
मघवा चक्रवर्ती ने अंततः समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। उनके पश्चात् अयोध्या के राजा अनन्तवीर्य के यहाँ सनत्कुमार चक्रवर्ती का जन्म हुआ। वे अनुपम सौन्दर्य, वैभव और साम्राज्य के स्वामी बने। उनकी रूप-सम्पदा की चर्चा स्वर्ग तक पहुँची और दो देव उनके दर्शन के लिए पृथ्वी पर आए।
श्लोक 113 से 121 : सनत्कुमार का वैराग्य और संयम जीवन
देवों ने सनत्कुमार को स्मरण कराया कि रूप, यौवन और सम्पत्ति नश्वर हैं तथा रोग, जरा और मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। यह सुनकर उन्हें गहन वैराग्य हुआ। उन्होंने पुत्र देवकुमार को राज्य देकर शिवगुप्त जिनेन्द्र के समक्ष दीक्षा ग्रहण की। वे अट्ठाईस मूलगुणों और अनेक उत्तरगुणों से विभूषित आदर्श मुनि बने।
श्लोक 122 से 130 : सनत्कुमार की साधना, केवलज्ञान और मोक्ष
सनत्कुमार मुनि ने महान क्षमा, समता, वैराग्य और तप का पालन किया। उन्होंने परिषहों और उपसर्गों को जीतकर अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कीं तथा क्षपकश्रेणी पर आरूढ़ होकर केवलज्ञान प्राप्त किया। अनेक जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देने के बाद उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर अविनाशी मोक्ष प्राप्त किया। पर्व के अंत में धर्मनाथ तीर्थ के अन्तर्गत धर्मनाथ भगवान्, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के चरित्रों का समापन किया गया है।
उत्तरपुराण पर्व 62 – अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन
श्लोक 1 से 10 : वक्ता और श्रोता के लक्षण
भगवान शान्तिनाथ की स्तुति के साथ इस पर्व का आरम्भ होता है। इसके बाद धर्मकथा के वक्ता और श्रोता के गुणों का वर्णन किया गया है। योग्य वक्ता को विद्वान, चारित्रवान, दयालु, बुद्धिमान तथा लोकव्यवहार का ज्ञाता होना चाहिए। योग्य श्रोता वह है जो विवेकशील, गुरुभक्त, क्षमाशील, धर्मग्राही तथा सत्य को ग्रहण करने में तत्पर हो।
श्लोक 11 से 21 : धर्मकथा का स्वरूप और भरत क्षेत्र का वर्णन
धर्मकथा वह है जिसमें जीव-अजीव, बन्ध-मोक्ष, दान, शील, तप, दया और वैराग्य का यथार्थ निरूपण किया जाता है। इसके पश्चात् शान्तिनाथ भगवान के चरित्र का प्रारम्भ करते हुए जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्र का वर्णन किया गया है, जिसे तीर्थंकरों, चक्रवर्तियों और मोक्षमार्ग की उपलब्धि के कारण अत्यन्त श्रेष्ठ कहा गया है। उसी क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत स्थित है।
श्लोक 22 से 31 : विजयार्ध पर्वत और रथनूपुर नगरी
विजयार्ध पर्वत की भव्यता, उसकी नदियों तथा देव-विद्याधरों से युक्त महिमा का वर्णन किया गया है। उसकी दक्षिण श्रेणी में रथनूपुर चक्रवाल नामक समृद्ध नगरी थी, जहाँ धर्म, अर्थ और काम की वृद्धि होती थी। वहाँ के राजा ज्वलनजटी पराक्रमी, नीतिज्ञ और प्रजावत्सल शासक थे।
श्लोक 32 से 41 : ज्वलनजटी और वायुवेगा
राजा ज्वलनजटी का राज्य निरन्तर उन्नति कर रहा था। दूसरी ओर द्युतिलक नगर के राजा चन्द्राभ और रानी सुभद्रा की पुत्री वायुवेगा अपने गुण, रूप और विद्याओं के कारण प्रसिद्ध थी। ज्वलनजटी और वायुवेगा का विवाह हुआ। दोनों में गहरा प्रेम था तथा वे आदर्श दाम्पत्य जीवन व्यतीत कर रहे थे।
श्लोक 42 से 52 : अर्ककीर्ति और स्वयंप्रभा का जन्म
ज्वलनजटी और वायुवेगा के यहाँ अर्ककीर्ति नामक पुत्र तथा स्वयंप्रभा नामक अत्यन्त रूपवती पुत्री उत्पन्न हुई। स्वयंप्रभा यौवन प्राप्त कर असाधारण सौन्दर्य से युक्त हुई। इसी बीच दो चारण ऋद्धिधारी मुनि उद्यान में पधारे। राजा ने उनके उपदेश से सम्यग्दर्शन, दान और व्रतों को ग्रहण किया तथा धर्ममार्ग में प्रवृत्त हुआ।
श्लोक 53 से 61 : स्वयंप्रभा का धर्मानुराग और विवाह-चिन्ता
स्वयंप्रभा ने भी धर्म को स्वीकार किया और उपवास तथा पूजा द्वारा अपनी श्रद्धा प्रकट की। उसकी भक्ति और सौन्दर्य देखकर राजा ज्वलनजटी उसके योग्य वर के विषय में चिंतित हुआ। उसने मंत्रियों को बुलाकर स्वयंप्रभा के विवाह के लिए उपयुक्त वर का चयन करने का विचार किया।
श्लोक 62 से 72 : योग्य वर की खोज
मंत्रियों ने विभिन्न विद्याधर राजाओं का विचार प्रस्तुत किया। किसी ने अश्वग्रीव को योग्य वर बताया तो किसी ने अन्य राजाओं का नाम सुझाया। अंततः श्रुतसागर मंत्री ने सुरेन्द्रकान्तार नगर के राजा मेघवाहन के पुत्र विद्युत्प्रभ को गुण, कुल, आयु और भविष्य की दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ वर बताया तथा उसकी बहन ज्योतिर्माला का विवाह अर्ककीर्ति से करने का सुझाव दिया।
श्लोक 73 से 82 : विद्युत्प्रभ का पूर्वभव और स्वयंवर का निर्णय
श्रुतसागर मंत्री ने अवधिज्ञानी मुनि से सुनी हुई विद्युत्प्रभ की पूर्वभव कथा सुनाई। पूर्वजन्म में वह विजयभद्र नामक राजकुमार था, जिसने वैराग्य लेकर संयम धारण किया था और देवगति प्राप्त की थी। वर्तमान जन्म में भी वह मोक्ष का अधिकारी बताया गया। फिर भी अनेक राजाओं की संभावित शत्रुता से बचने के लिए मंत्री सुमति ने स्वयंवर आयोजित करने की सलाह दी, जिसे सभी ने स्वीकार कर लिया।
श्लोक 83 से 92 : निमित्तज्ञानी की भविष्यवाणी
राजा ने निमित्तज्ञानी से पूछा कि स्वयंप्रभा का वास्तविक पति कौन होगा। उसने भगवान ऋषभदेव द्वारा कही गई एक प्राचीन कथा का उल्लेख किया। उसमें पुरूरवा भील, उसके पुण्यफल तथा आगे चलकर त्रिपृष्ठ के जन्म की भविष्यवाणी का वर्णन किया गया। साथ ही बताया गया कि विजय और त्रिपृष्ठ आगे चलकर प्रथम बलभद्र और प्रथम नारायण बनेंगे तथा त्रिपृष्ठ का भविष्य अत्यन्त महान होगा।
श्लोक 93 से 101 : स्वयंप्रभा का त्रिपृष्ठ से संबंध
निमित्तज्ञानी ने बताया कि स्वयंप्रभा का विवाह भविष्य के महान पुरुष त्रिपृष्ठ से होना निश्चित है। यह संबंध दोनों कुलों के लिए गौरव और कल्याणकारी होगा। राजा ज्वलनजटी ने इस भविष्यवाणी को स्वीकार कर प्रसन्नतापूर्वक दूत को प्रजापति महाराज के पास भेजा। प्रजापति पहले से ही इस संबंध के विषय में अवगत थे, इसलिए उन्होंने दूत का आदरपूर्वक स्वागत किया और विवाह प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार करने की भावना व्यक्त की।
श्लोक 102 से 112 : विवाह सम्पन्न होना और स्वयंप्रभा का त्रिपृष्ठ को वरण
दूत द्वारा विवाह-संदेश सुनाए जाने पर प्रजापति महाराज अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने सम्मानपूर्वक दूत को विदा किया। ज्वलनजटी स्वयंप्रभा को लेकर पोदनपुर पहुँचे, जहाँ बड़े उत्सव के साथ विवाह सम्पन्न हुआ। स्वयंप्रभा का विवाह त्रिपृष्ठ से किया गया तथा ज्वलनजटी ने सिंहवाहिनी और गरुड़वाहिनी नामक विद्याएँ भी प्रदान कीं। इस प्रकार दोनों कुलों में आनन्द और समृद्धि का विस्तार हुआ।
श्लोक 113 से 122 : अश्वग्रीव के लिए अशुभ संकेत और त्रिपृष्ठ के प्रति शत्रुता
उधर अश्वग्रीव प्रतिनारायण के राज्य में अनेक अशुभ उत्पात प्रकट होने लगे। निमित्तज्ञानी शतबिन्दु ने बताया कि ये उत्पात त्रिपृष्ठ के कारण उत्पन्न होने वाले संकट के सूचक हैं। उसने त्रिपृष्ठ के बढ़ते प्रभाव और पराक्रम की ओर संकेत किया। यह सुनकर अश्वग्रीव चिंतित और क्रोधित हो उठा तथा उसने त्रिपृष्ठ को अपना शत्रु मान लिया।
श्लोक 123 से 131 : दूतों का आगमन और त्रिपृष्ठ का उत्तर
अश्वग्रीव ने त्रिपृष्ठ की भावना जानने के लिए दूत भेजे। दूतों ने आकर अश्वग्रीव की आज्ञा सुनाई और त्रिपृष्ठ को उसके पास चलने का आदेश दिया। त्रिपृष्ठ ने इसे अस्वीकार कर दिया और अश्वग्रीव के प्रति सम्मान प्रकट करने से भी इंकार कर दिया। दूतों ने उसे समझाने का प्रयास किया, किन्तु वह अपने निर्णय पर अडिग रहा।
श्लोक 132 से 141 : युद्ध की घोषणा और सेनाओं का संघर्ष
दूतों ने लौटकर त्रिपृष्ठ के उत्तर का समाचार अश्वग्रीव को सुनाया। इससे वह अत्यन्त क्रोधित हो गया और युद्ध की घोषणा कर दी। दोनों पक्षों की विशाल सेनाएँ आमने-सामने आ गईं। भयंकर युद्ध आरम्भ हुआ और दोनों ओर भारी विनाश होने लगा। सैनिकों की निरर्थक हानि देखकर अंततः त्रिपृष्ठ स्वयं अश्वग्रीव के सम्मुख युद्ध के लिए उपस्थित हुआ।
श्लोक 142 से 151 : अश्वग्रीव का वध और नारायण पद की प्राप्ति
द्वन्द्व युद्ध में दोनों वीरों ने अत्यन्त पराक्रम दिखाया। जब सामान्य युद्ध से निर्णय नहीं हुआ तो मायायुद्ध और दिव्य अस्त्रों का प्रयोग हुआ। अंत में अश्वग्रीव ने चक्र चलाया, किन्तु त्रिपृष्ठ ने उसी चक्र से उसका वध कर दिया। इस विजय के बाद त्रिपृष्ठ प्रथम नारायण और विजय प्रथम बलभद्र के रूप में प्रतिष्ठित हुए। ज्वलनजटी को दोनों श्रेणियों का आधिपत्य मिला तथा अर्ककीर्ति का विवाह ज्योतिर्माला से सम्पन्न हुआ।
श्लोक 152 से 161 : वंशवृद्धि, वैराग्य और मोक्षमार्ग
अर्ककीर्ति और ज्योतिर्माला के यहाँ अमिततेज और सुतारा का जन्म हुआ। त्रिपृष्ठ और स्वयंप्रभा के यहाँ श्रीविजय, विजयभद्र तथा ज्योतिप्रभा नामक सन्तानें उत्पन्न हुईं। इसी समय प्रजापति महाराज को वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने राज्य त्यागकर संयम धारण किया, तपस्या की और अंततः मोक्ष प्राप्त किया। बाद में ज्वलनजटी ने भी राज्य अर्ककीर्ति को सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 162 से 171 : पारिवारिक सम्बन्ध और बलभद्र का संयम
त्रिपृष्ठ ने अपनी पुत्री ज्योतिप्रभा का विवाह अमिततेज से कराया तथा सुतारा का विवाह श्रीविजय के साथ सम्पन्न हुआ। दोनों कुलों के बीच घनिष्ठ सम्बन्ध स्थापित हुए। कालान्तर में त्रिपृष्ठ की मृत्यु के बाद वह सातवें नरक में गया, जबकि विजय बलभद्र ने वैराग्य ग्रहण कर सात हजार राजाओं के साथ संयम धारण किया, केवलज्ञान प्राप्त किया और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हुए। अर्ककीर्ति ने भी राज्य त्यागकर तपस्वी जीवन अपना लिया।
श्लोक 172 से 181 : भविष्यवाणी और अष्टाङ्ग निमित्त का परिचय
एक निमित्तज्ञानी ने श्रीविजय को चेतावनी दी कि सातवें दिन उसके मस्तक पर महावज्र गिरेगा। युवराज ने उसकी परीक्षा ली और उसके ज्ञान का आधार पूछा। तब निमित्तज्ञानी ने अपने अध्ययन और अनुभव का परिचय देते हुए अष्टाङ्ग निमित्तों—अन्तरिक्ष, भौम, अङ्ग, स्वर, व्यञ्जन, लक्षण, छिन्न और स्वप्न—का उल्लेख किया तथा उनके विषय में बताने का आरम्भ किया।
श्लोक 182 से 191 : अष्टाङ्ग निमित्तों का विवेचन
निमित्तज्ञानी ने विभिन्न निमित्तों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया। उसने ग्रह-नक्षत्रों से सम्बन्धित अन्तरिक्ष निमित्त, पृथ्वी से सम्बन्धित भौम निमित्त, शरीर के चिह्नों से सम्बन्धित अङ्ग और व्यञ्जन निमित्त, स्वर और लक्षण निमित्त तथा छिन्न और स्वप्न निमित्तों का अर्थ समझाया। इन सबके माध्यम से शुभ-अशुभ घटनाओं का अनुमान किया जाता है।
श्लोक 192 से 201 : निमित्तज्ञानी का जीवनवृत्त और उपाय-विचार
निमित्तज्ञानी ने अपना पूर्व जीवन सुनाया। वह पहले मुनि था, किन्तु परिषहों को सहन न कर पाने के कारण गृहस्थ जीवन में लौट आया। अध्ययन और निमित्तज्ञान के बल पर उसने भविष्यवाणी की सिद्धि प्राप्त की। उसके युक्तिपूर्ण कथन से श्रीविजय और उसके मंत्री चिंतित हो गए। राजा की रक्षा के लिए विभिन्न उपाय सुझाए गए। किसी ने समुद्र के भीतर लोहे के सन्दूक में रखने का सुझाव दिया, तो किसी ने विजयार्ध पर्वत की गुफा में सुरक्षित रखने का। अंत में बुद्धिसागर मंत्री ने एक प्राचीन कथा सुनाने का निश्चय किया, जिससे आगे का प्रसंग आरम्भ होता है।
श्लोक 202 से 211 : सोम परिव्राजक का पतन और कुम्भ की नरभक्षी प्रवृत्ति
मिथ्यादृष्टि सोम परिव्राजक जिनदास से शास्त्रार्थ में पराजित होकर मृत्यु के बाद भैंसा और फिर राक्षस बना। उसी समय सिंहपुर का राजा कुम्भ नरमांस का स्वाद लग जाने से नरभक्षी बन गया। उसकी क्रूरता से प्रजा भयभीत होकर नगर छोड़कर कारकट नगर चली गई, किन्तु कुम्भ वहाँ भी लोगों को खाने लगा और समस्त जनसमुदाय आतंकित हो उठा।
श्लोक 212 से 221 : बुद्धिमानी से वज्र-भय का निवारण
कुम्भकारकटपुर में प्रतिदिन एक मनुष्य कुम्भ को दिया जाने लगा। इस कथा को सुनाकर बुद्धिसागर मंत्री ने विजयार्ध की गुफा में राजा को छिपाने की योजना का विरोध किया। तब मतिसागर मंत्री ने सुझाव दिया कि चूँकि भविष्यवाणी पोदनपुर के राजा पर वज्र गिरने की थी, इसलिए अस्थायी रूप से यक्ष-प्रतिमा को राजा घोषित कर दिया जाए। सबने यह उपाय स्वीकार किया और श्रीविजय धर्माराधना में प्रवृत्त हो गया।
श्लोक 222 से 231 : भविष्यवाणी की सिद्धि और सुतारा का अपहरण
सातवें दिन वज्र यक्ष-प्रतिमा पर गिरा और भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई। नगर में उत्सव मनाया गया तथा निमित्तज्ञानी का सम्मान किया गया। इसके बाद श्रीविजय आकाशगामिनी विद्या सिद्ध कर सुतारा के साथ विहार करने गया। वहीं चमरचंचपुर के राजकुमार अशनिघोष ने सुतारा को देखकर उस पर आसक्त होकर छलपूर्वक उसका अपहरण करने की योजना बनाई।
श्लोक 232 से 240 : अशनिघोष का छल और वैताली का भेद खुलना
अशनिघोष ने कृत्रिम मृग के बहाने श्रीविजय को अलग किया और उसका रूप धारण कर सुतारा को विमान में बैठाकर ले गया। दूसरी ओर वैताली विद्या सुतारा का रूप बनाकर श्रीविजय के पास रही। जब वह कृत्रिम सुतारा मृत्यु का अभिनय करने लगी तो शोकाकुल श्रीविजय उसके साथ चिता पर चढ़ने को तैयार हो गया। तभी एक विद्याधर ने वैताली का वास्तविक रूप प्रकट कर दिया और सारा छल उजागर हो गया।
श्लोक 241 से 252 : सुतारा का समाचार और सहायता का आश्वासन
संभिन्न नामक विद्याधर राजा ने श्रीविजय को बताया कि सुतारा जीवित है और अशनिघोष उसे बलपूर्वक ले जा रहा है। उसने यह भी कहा कि स्वयं सुतारा ने उसे श्रीविजय तक समाचार पहुँचाने के लिए भेजा है। यह सुनकर श्रीविजय को संतोष हुआ और उसने संभिन्न को धन्यवाद देकर अपने परिवार को सूचना पहुँचाने की व्यवस्था की।
श्लोक 253 से 261 : स्वयंप्रभा का शोक और पुत्र से मिलन
पोदनपुर में उत्पात देखकर निमित्तज्ञानी लोगों को धैर्य बँधाते रहे। दीपशिख विद्याधर ने आकर श्रीविजय की कुशलता और सुतारा के अपहरण का समाचार दिया। यह सुनकर स्वयंप्रभा अत्यन्त दुःखी हुई और तत्काल पुत्र से मिलने के लिए निकल पड़ी। वन में पहुँचकर उसने श्रीविजय को सकुशल देखा और अत्यन्त हर्ष अनुभव किया।
श्लोक 262 से 271 : अशनिघोष के विरुद्ध युद्ध की तैयारी
श्रीविजय ने माता को सम्पूर्ण घटना सुनाई और संभिन्न विद्याधर के उपकार की प्रशंसा की। स्वयंप्रभा उसे लेकर रथनूपुर पहुँची, जहाँ अमिततेज ने उनका भव्य स्वागत किया। जब अशनिघोष ने दूत के माध्यम से भी सुतारा को लौटाने से इन्कार कर दिया, तब अमिततेज ने युद्ध का निश्चय किया और श्रीविजय को विशेष विद्याएँ तथा सैन्य सहायता प्रदान की।
श्लोक 272 से 283 : अशनिघोष के साथ युद्ध और समवसरण में शांति
श्रीविजय विशाल सेना के साथ युद्ध के लिए गया। अशनिघोष के पुत्र पराजित हुए, तब वह स्वयं युद्धभूमि में उतरा और मायावी विद्याओं से अनेक रूप धारण कर लिया। इसी समय अमिततेज महाज्वाला विद्या सिद्ध कर युद्ध में पहुँचा। अशनिघोष पराजित होकर विजय तीर्थंकर के समवसरण में शरण लेने गया। उसके पीछे पहुँचे सभी योद्धाओं का क्रोध मानस्तम्भ के प्रभाव से शांत हो गया और वे भगवान के समक्ष विनम्र होकर बैठ गए।
श्लोक 284 से 292 : जिनेन्द्र की महिमा और सद्धर्म की जिज्ञासा
अशनिघोष की माता आसुरी देवी सुतारा को लेकर समवसरण में आई और क्षमा याचना की। वहाँ यह प्रतिपादित किया गया कि जिनेन्द्र भगवान की उपस्थिति में घोर वैर भी समाप्त हो जाता है तथा कर्मबंधन शिथिल पड़ जाते हैं। इस प्रभाव को देखकर अमिततेज ने भगवान से सद्धर्म का स्वरूप पूछते हुए संसार-सागर से पार होने का उपाय जानने की प्रार्थना की।
श्लोक 293 से 301 : मिथ्यात्व का स्वरूप
भगवान ने दिव्यध्वनि द्वारा उपदेश देते हुए कहा कि संसार का मूल कारण कर्म है और कर्म का मूल कारण मिथ्यात्व तथा असंयम हैं। मिथ्यात्व ज्ञान को विपरीत बना देता है और बन्ध का कारण बनता है। इसके अज्ञान, संशय, एकान्त, विपरीत और विनय—ये पाँच भेद बताए गए। भगवान ने समझाया कि तत्त्वों के यथार्थ स्वरूप को न समझना ही मिथ्यात्व है और यही जीव को संसार में बाँधे रखता है।
श्लोक 302 से 311 : मिथ्यात्व, असंयम, प्रमाद, कषाय और योग
भगवान ने कर्मबन्ध के प्रमुख कारणों का वर्णन करते हुए बताया कि सभी देवों और मतों को समान रूप से मोक्षमार्ग मानना विनय-मिथ्यात्व कहलाता है। व्रतरहित मन-वचन-काय की प्रवृत्ति असंयम है, जो जीव और इन्द्रिय-असंयम के रूप में दो प्रकार का होता है। छठे गुणस्थान तक प्रमाद तथा सातवें से दसवें गुणस्थान तक कषाय कर्मबन्ध के कारण बनते हैं। ग्यारहवें से तेरहवें गुणस्थान तक योग बन्ध का कारण रहता है। इन्हीं पाँच कारणों से जीव विविध कर्मों का बन्ध करता हुआ संसार में भ्रमण करता रहता है।
श्लोक 312 से 321 : जीव की आध्यात्मिक उन्नति और मोक्षमार्ग
जीव अनादिकाल से जन्म, जरा, रोग और मरण के चक्र में भटकता रहता है। जब उसे अनुकूल लब्धियाँ प्राप्त होती हैं तब वह मिथ्यात्व का उपशम कर सम्यग्दर्शन प्राप्त करता है, व्रत धारण करता है और क्रमशः चारित्र की शुद्धि करता हुआ केवलज्ञान को प्राप्त करता है। अंत में शुक्लध्यान के प्रभाव से समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त कर लेता है। भगवान के इस उपदेश को सुनकर अमिततेज अत्यन्त प्रसन्न हुआ।
श्लोक 322 से 331 : अमिततेज का प्रश्न और कपिल की कथा का आरम्भ
सम्यग्दर्शन और श्रावकव्रत ग्रहण करने के बाद अमिततेज ने भगवान से पूछा कि अशनिघोष ने उसके प्रभाव को जानते हुए भी सुतारा का हरण क्यों किया। उत्तर में भगवान ने पूर्वजन्म की कथा सुनानी आरम्भ की। मगध देश के अचल ग्राम में धरणीजट नामक ब्राह्मण रहता था, जिसके पुत्र इन्द्रभूति, अग्निभूति और दासीपुत्र कपिल थे। कपिल अत्यन्त बुद्धिमान था, किन्तु तिरस्कार के कारण घर छोड़कर रत्नपुर चला गया और वहीं प्रतिष्ठित विद्वान बन गया।
श्लोक 332 से 341 : कपिल का छल और राजपरिवार का परिचय
कपिल के पिता दरिद्र होकर उसके पास पहुँचे। कपिल ने सम्मानपूर्वक उनका सत्कार किया, परन्तु अपने जन्म का रहस्य छिपाए रखा। बाद में सत्यभामा ने धन देकर सत्य जानना चाहा और ब्राह्मण ने सब भेद खोल दिया। इसी प्रसंग में राजा श्रीषेण, उनकी रानियाँ सिंहनन्दिता और अनिन्दिता तथा उनके पुत्र इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन का परिचय दिया गया, जो गुणवान और प्रिय राजकुमार थे।
श्लोक 342 से 351 : कपिल का निर्वासन और पुण्य का संचय
सत्यभामा अपने पति के दुश्चरित्र से विरक्त होकर राजा की शरण में गई। राजा ने कपिल के आचरण को अनुचित मानकर उसे राज्य से निकाल दिया। कुछ समय बाद राजा श्रीषेण ने चारण ऋद्धिधारी मुनियों को आहारदान दिया और महान पुण्य अर्जित किया। उनकी रानियों तथा सत्यभामा ने भी अनुमोदना द्वारा श्रेष्ठ भव का बन्ध किया। इसी बीच कौशाम्बी के राजा महाबल की पुत्री श्रीकान्ता का विवाह इन्द्रसेन के साथ हुआ।
श्लोक 352 से 363 भाइयों का विवाद और पूर्वजन्म का रहस्य
श्रीकान्ता के साथ आई अनन्तमति के कारण इन्द्रसेन और उपेन्द्रसेन में विवाद उत्पन्न हो गया। दोनों युद्ध के लिए तैयार हो गए और इस दुःख से राजा तथा रानियों की मृत्यु हो गई। बाद में एक विद्याधर ने आकर दोनों भाइयों को बताया कि अनन्तमति वास्तव में उनके पूर्वजन्मों से सम्बद्ध जीव है और उसके कारण युद्ध करना अनुचित है। इसके समर्थन में उसने अपने पूर्वभव का वृत्तांत सुनाया।
श्लोक 364 से 371 : पूर्वभवों का विस्तृत वर्णन
विद्याधर ने बताया कि पूर्वजन्म में कनकमालिका और उसकी पुत्रियाँ धर्मश्रवण के प्रभाव से देवगति को प्राप्त हुई थीं, जबकि पद्मावती कामासक्ति के कारण अप्सरा बनी थी। आगे चलकर वही जीव विभिन्न रूपों में जन्म लेकर वर्तमान जीवन में आए। अनन्तमति और दोनों राजकुमारों के बीच का संबंध भी इन्हीं पूर्वभवों का परिणाम था। इस सत्य को जानकर दोनों भाइयों का मोह दूर हुआ।
श्लोक 372 से 382 : वैराग्य, स्वर्गगमन और अशनिघोष का कारण
पूर्वभव का रहस्य सुनकर दोनों भाइयों में वैराग्य उत्पन्न हुआ। उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और अंततः मोक्षमार्ग पर अग्रसर हुए। अनन्तमति ने भी श्रावकधर्म धारण कर स्वर्गगति प्राप्त की। आगे भगवान ने बताया कि राजा श्रीषेण, उनकी रानियाँ तथा सत्यभामा विभिन्न दिव्य भवों में जन्म लेकर वर्तमान पात्रों के रूप में उत्पन्न हुए। पूर्वजन्म का दुष्ट कपिल अनेक दुर्गतियों में भटकने के बाद अशनिघोष बना और पूर्व संस्कारों के कारण उसने सुतारा का हरण किया।
श्लोक 383 से 390 : अमिततेज का भविष्य और धर्मनिष्ठ शासन
भगवान ने भविष्यवाणी की कि अमिततेज आगे चलकर पाँचवाँ चक्रवर्ती और सोलहवें तीर्थंकर भगवान शान्तिनाथ होगा। यह सुनकर अमिततेज का हृदय धर्मभाव से भर गया। उसी समय अशनिघोष, स्वयंप्रभा, सुतारा तथा अन्य अनेक व्यक्तियों ने संयम धारण किया। अमिततेज ने धर्म, दान, पूजा, व्रत और धर्मोपदेश में निरन्तर प्रवृत्त रहकर आदर्श शासन किया।
श्लोक 391 से 401 : विद्याओं की सिद्धि और विद्याधर चक्रवर्ती पद
अमिततेज ने अनेक दिव्य विद्याओं की सिद्धि प्राप्त की और उन सबमें पारंगत हो गया। उसके प्रभाव, ज्ञान और सामर्थ्य के कारण समस्त विद्याधर उसके अधीन हो गए। इस प्रकार वह दोनों श्रेणियों का अधिपति और विद्याधरों का चक्रवर्ती बनकर दीर्घकाल तक ऐश्वर्य एवं वैभव का उपभोग करता रहा।
श्लोक 402 से 411 : वैराग्य, संन्यास और देवगति
अमिततेज ने चारण ऋद्धिधारी मुनियों को आहारदान देकर महान पुण्य अर्जित किया। बाद में अमिततेज और श्रीविजय ने श्रेष्ठ मुनियों से धर्मोपदेश सुना तथा अपने पूर्वभवों का ज्ञान प्राप्त किया। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी आयु केवल एक मास शेष है, तब उन्होंने अपने पुत्रों को राज्य सौंप दिया, आष्टाह्निक पूजा की और प्रायोपगमन संन्यास धारण कर लिया। समाधिमरण के पश्चात् अमिततेज तेरहवें स्वर्ग में रविचूल देव और श्रीविजय मणिचूल देव के रूप में उत्पन्न हुए। इस प्रकार उनका जीवन धर्म, वैराग्य और उत्कृष्ट आध्यात्मिक साधना का आदर्श बन गया।
श्लोक 412 से 421 : अपराजित और अनन्तवीर्य का जन्म एवं गुणवैभव
तेरहवें स्वर्ग से च्युत होकर रविचूल देव राजा स्तिमितसागर और रानी वसुन्धरा के पुत्र अपराजित के रूप में तथा मणिचूल देव रानी अनुमति के पुत्र अनन्तवीर्य के रूप में जन्मे। दोनों भाई रूप, तेज, नीति, दया और कलाओं से सम्पन्न थे। वे चन्द्रमा और बालसूर्य के समान लोक को आनन्द देने वाले, अज्ञान का नाश करने वाले तथा प्रजा के हितकारी शासक थे। उनके यश, सदाचार और सौम्यता के कारण शत्रु भी उनसे मैत्री स्थापित करने को उत्सुक रहते थे।
श्लोक 422 से 433 : राज्यारोहण और नारद का क्रोध
राजा स्तिमितसागर ने पुत्रों को योग्य समझकर अपराजित को राज्य और अनन्तवीर्य को युवराज पद देकर स्वयं संयम धारण कर लिया। बाद में धरणेन्द्र की विभूति देखकर निदान-बन्ध के कारण वे धरणेन्द्र पद को प्राप्त हुए। दोनों भाई नीति और वैभव से राज्य का विकास करने लगे। एक अवसर पर वे नृत्यांगनाओं बर्बरी और चिलातिका का नृत्य देख रहे थे, तभी नारद आए। उचित सम्मान न मिलने से नारद क्रोधित होकर वहाँ से चले गए और प्रतिशोध की भावना से शिवमन्दिरनगर के राजा दमितारि के पास पहुँचे।
श्लोक 434 से 442 : नारद द्वारा दमितारि को उकसाना
राजा दमितारि ने आदरपूर्वक नारद का स्वागत किया। नारद ने उसे बताया कि अपराजित और अनन्तवीर्य के पास दो अद्वितीय नर्तकियाँ हैं जो उसके योग्य हैं। उन्होंने दोनों भाइयों को भोगासक्त, प्रमादी और सरलता से पराजित किए जाने योग्य बताकर दमितारि को उन नर्तकियों को प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। नारद की बातों में आकर दमितारि ने उन्हें माँगने हेतु दूत भेज दिया।
श्लोक 443 से 451 : दमितारि का संदेश
दमितारि का दूत प्रभाकरीपुरी पहुँचा, जहाँ दोनों भाई प्रोषधोपवास में स्थित थे। उसने दमितारि के पराक्रम, प्रताप और विजयश्री का वर्णन करते हुए कहा कि अनेक राजा उसके अधीन हैं और उसकी आज्ञा का सम्मान करते हैं। उसने दोनों नर्तकियों को दमितारि को सौंप देने का अनुरोध किया ताकि आपसी मैत्री और अधिक सुदृढ़ हो सके।
श्लोक 452 से 462 : विद्यादेवियों का आगमन और योजना
दूत का संदेश सुनकर दोनों भाइयों ने मंत्रियों से विचार-विमर्श किया। उसी समय उनके पुण्य के प्रभाव से विद्यादेवियाँ प्रकट हुईं और सहायता का आश्वासन दिया। तब अपराजित और अनन्तवीर्य ने स्वयं नर्तकियों का वेश धारण किया और दूत के साथ शिवमन्दिरनगर पहुँच गए। वे गुप्त रूप से राजमहल में प्रवेश कर अवसर की प्रतीक्षा करने लगे।
श्लोक 463 से 472 : कनकश्री का अनुराग
दमितारि ने अपनी पुत्री कनकश्री को नृत्य सिखाने का कार्य उन दोनों के सुपुर्द कर दिया। एक दिन उन्होंने भावी नारायण अनन्तवीर्य के गुणों का वर्णन करने वाला गीत गाया। गीत सुनकर कनकश्री अनन्तवीर्य के प्रति आकर्षित हो गई और उसके विषय में पूछने लगी। तब दोनों भाइयों ने उसके रूप, वैभव और महिमा का वर्णन किया तथा अन्ततः उसे अनन्तवीर्य का वास्तविक स्वरूप दिखा दिया, जिससे कनकश्री अत्यन्त अनुरक्त हो गई।
श्लोक 473 से 481 : युद्ध का प्रारम्भ
कनकश्री को साथ लेकर दोनों भाई आकाशमार्ग से निकल गए। यह समाचार सुनकर दमितारि ने सैनिक भेजे। अपराजित ने कनकश्री और अनन्तवीर्य को सुरक्षित भेजकर अकेले ही शत्रु सेना से युद्ध किया और अनेक योद्धाओं का संहार कर दिया। तब दमितारि स्वयं विशाल सेना लेकर युद्ध के लिए निकला, किन्तु अपराजित ने उसके सैनिकों को भी परास्त कर दिया।
श्लोक 482 से 491 : दमितारि का वध और केवलज्ञानी जिनेन्द्र का दर्शन
अनन्तवीर्य ने स्वयं दमितारि से युद्ध कर उसे पराजित कर दिया। दमितारि द्वारा छोड़ा गया चक्र अनन्तवीर्य की प्रदक्षिणा कर उसके दाहिने कंधे के समीप ठहर गया। उसी चक्र से अनन्तवीर्य ने दमितारि का वध किया। युद्ध के बाद दोनों भाइयों का विमान एक केवलज्ञानी जिनेन्द्र के समीप रुक गया। वे उतरे, जिनेन्द्र की वंदना की, धर्मश्रवण किया और अपने पापों का क्षय करने वाले उपदेश सुनकर वहाँ विनम्रतापूर्वक बैठ गए।
श्लोक 492 से 501: कनकश्री का पूर्वभव
कनकश्री ने जिनेन्द्र से अपना पूर्वभव पूछा। भगवान् ने बताया कि पूर्वजन्म में वह श्रीदत्ता नाम की धर्मनिष्ठ कन्या थी जिसने अहिंसा-व्रत और उपवास जैसे पुण्यकर्म किए थे। किन्तु एक आर्यिका के प्रति घृणा भाव रखने के कारण उसे वर्तमान जीवन में दुःख भोगना पड़ा। उसी पुण्य के प्रभाव से वह स्वर्ग में देवी बनी और वहाँ से कनकश्री के रूप में जन्मी। भगवान् ने उपदेश दिया कि साधुओं के प्रति कभी घृणा नहीं करनी चाहिए।
श्लोक 502 से 513 : कनकश्री की दीक्षा और दोनों भाइयों का वैभव
कनकश्री ने अपने भाइयों के बन्धन और उनके दुःख को देखकर संसार से विरक्ति ग्रहण की। उसने बलभद्र और नारायण से अपने भाइयों को मुक्त करवाया, तीर्थंकर स्वयंप्रभ के उपदेश सुने और सुप्रभ गणिनी के पास दीक्षा धारण कर ली। मृत्यु के बाद वह सौधर्म स्वर्ग में देवी बनी। उधर अपराजित ने विद्याधरों का अधिपति तथा बलभद्र पद प्राप्त किया और अपने नाम को सार्थक किया। अनन्तवीर्य ने दमितारि को पराजित कर तीन खण्डों का राज्य प्राप्त किया तथा महान् नारायण के रूप में प्रसिद्ध हुआ। दोनों भाई धर्म, नीति, पराक्रम और यश से विभूषित होकर दीर्घकाल तक लोककल्याण करते रहे।
इस प्रकार उत्तरपुराण के बासठवें पर्व में भावी बलभद्र अपराजित और नारायण अनन्तवीर्य के उदय, पराक्रम, धर्मनिष्ठा, कनकश्री के वैराग्य तथा उनके गौरवपूर्ण जीवन का वर्णन पूर्ण होता है।
उत्तरपुराण पर्व 63 – शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन
श्लोक 1 से 11 सुमति के स्वयंवर और पूर्वभव का उद्घाटन
अर्द्धचक्री नारायण अनन्तवीर्य और बलभद्र अपराजित सुखपूर्वक राज्य कर रहे थे। अपराजित की पुत्री सुमति यौवन प्राप्त कर विवाह योग्य हुई। दोनों भाइयों ने उसका स्वयंवर आयोजित किया। स्वयंवर सभा में एक देवी प्रकट हुई और सुमति को स्मरण कराया कि वे दोनों पूर्व जन्म में स्वर्ग की सहचरियाँ थीं। देवी ने उनके पूर्वभवों का वृत्तांत सुनाने के लिए सुमति को एकाग्र होकर सुनने को कहा
श्लोक 12 से 22 पूर्वजन्म की कथा और मोक्ष का भविष्यवचन
देवी ने बताया कि पूर्व जन्म में वे दोनों नन्दनपुर के राजा अमितविक्रम की पुत्रियाँ धनश्री और अनन्तश्री थीं। उन्होंने धर्म ग्रहण कर व्रत एवं तप का पालन किया। वज्राङ्गद विद्याधर द्वारा अपहरण का प्रयास होने पर उन्होंने वन में संन्यास-मरण किया और देवियाँ बनीं। बाद में चारण मुनि धृतिषेण से उन्होंने अपनी मुक्ति के विषय में पूछा। मुनि ने भविष्यवाणी की कि चौथे भव में दोनों को मोक्ष प्राप्त होगा। इसी कारण देवी सुमति को वैराग्य का उपदेश देने आई थी।
श्लोक 23 से 31 सुमति का वैराग्य और अनन्तवीर्य का पुनर्जन्म
देवी के उपदेश से प्रभावित होकर सुमति ने सात सौ कन्याओं सहित आर्यिका दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप किया और अंत में आनत स्वर्ग में देवी हुई। दूसरी ओर नारायण अनन्तवीर्य ने दीर्घकाल तक राज्य किया, किंतु पापोदय से प्रथम नरक में गया। अपराजित ने पुत्र को राज्य देकर दीक्षा धारण की और अच्युत स्वर्ग के इन्द्र बने। बाद में धरणेन्द्र के उपदेश से नरक में स्थित अनन्तवीर्य को सम्यग्दर्शन प्राप्त हुआ और अगले जन्म में वह मेघनाद नामक विद्याधर बना।
श्लोक 32 से 41 मेघनाद का संयम और वज्रायुध का जन्म
अच्युतेन्द्र बने अपराजित के जीव के उपदेश से मेघनाद को आत्मज्ञान प्राप्त हुआ और उसने दीक्षा धारण कर दीर्घकाल तक साधना की। उपसर्गों के बावजूद वह अचल रहा और अंत में अच्युत स्वर्ग का प्रतीन्द्र बना। उधर अपराजित का जीव स्वर्ग से च्युत होकर पूर्वविदेह क्षेत्र में राजा क्षेमंकर के यहाँ वज्रायुध नामक तेजस्वी पुत्र के रूप में जन्मा। उसके जन्म से समस्त राज्य में हर्ष और संतोष फैल गया तथा वह गुणों और वैभव से निरंतर विकसित होने लगा।
श्लोक 42 से 51 वज्रायुध की कीर्ति और दार्शनिक परीक्षा
वज्रायुध की कीर्ति चारों दिशाओं में फैल गई। युवावस्था में वह राज्यलक्ष्मी और लक्ष्मीमती रानी से सुशोभित हुआ तथा उसके पुत्र सहस्त्रायुध और पौत्र कनकशान्त का जन्म हुआ। एक अवसर पर ऐशान स्वर्ग के इन्द्र ने उसकी सम्यग्दृष्टि की प्रशंसा की। इसे सुनकर विचित्रचूल देव ने उसकी परीक्षा लेने का निश्चय किया और सौत्रान्तिक बौद्ध मत का आश्रय लेकर सभा में उपस्थित हुआ। उसने द्रव्य और पर्याय के संबंध में जटिल दार्शनिक प्रश्न उठाया।
श्लोक 52 से 61 स्याद्वाद द्वारा पर्याय-पर्यायी का समाधान
विचित्रचूल ने द्रव्य और पर्याय को भिन्न अथवा अभिन्न मानने पर अनेक तर्कदोष प्रस्तुत किए। उत्तर में वज्रायुध ने जैन स्याद्वाद का प्रतिपादन किया। उसने बताया कि व्यवहार नय से द्रव्य और पर्याय में भेद है, जबकि द्रव्यार्थिक नय से दोनों अभिन्न हैं। इस प्रकार अनेकान्त दृष्टि ही सत्य का समुचित निरूपण करती है और एकान्तवाद के दोषों से बचाती है।
श्लोक 62 से 71 बौद्ध मत का खण्डन और क्षेमंकर का वैराग्य
वज्रायुध ने बौद्धों के क्षणिकवाद और सन्तानवाद की तार्किक समीक्षा कर उनके मत की दुर्बलताओं को उजागर किया। उसके तर्कों से विचित्रचूल देव का अहंकार नष्ट हो गया और उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त हुआ। उसने वज्रायुध की स्तुति कर स्वर्ग गमन किया। बाद में राजा क्षेमंकर को आत्मज्ञान जाग्रत हुआ और उन्होंने राज्य त्यागकर पुत्र वज्रायुध का अभिषेक किया तथा स्वयं दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 72 से 81 क्षेमंकर की तपस्या और वज्रायुध का वन-विहार
क्षेमंकर मुनि ने कठोर तप, शास्त्राध्ययन और पूर्ण संयम का पालन किया। उन्होंने ममता, अहंकार और कषायों का त्याग कर केवलज्ञान प्राप्त किया तथा दिव्यध्वनि द्वारा धर्मोपदेश दिया। उधर राजा वज्रायुध राज्य का सुचारु संचालन करते हुए अपनी रानियों के साथ चैत्र ऋतु में देवरमण वन पहुँचे और सुदर्शन सरोवर में जलक्रीड़ा करने लगे।
श्लोक 82 से 92 विद्याधर का आक्रमण और शरणागत की रक्षा
जलक्रीड़ा के समय पूर्वभव का शत्रु विद्युद्दंष्ट्र विद्याधर आया। उसने सरोवर को शिला से ढक दिया और राजा को नागपाश में बाँधने का प्रयास किया, किन्तु वज्रायुध ने अपनी शक्ति से शिला को चूर-चूर कर दिया और शत्रु भाग गया। बाद में उसे नौ निधियाँ और चौदह रत्न प्राप्त हुए तथा वह चक्रवर्ती-समान वैभव से विभूषित हुआ। एक दिन उसकी सभा में भयभीत एक विद्याधर शरण लेने आया, जिसके पीछे एक क्रोधित विद्याधरी और एक वृद्ध विद्याधर भी पहुँचे।
श्लोक 93 से 102 शान्तिमती की रक्षा और पूर्वजन्म का रहस्य
वृद्ध विद्याधर वायुवेग ने बताया कि उसकी पुत्री शान्तिमती विद्या-सिद्धि के लिए गई थी, जहाँ एक दुष्ट विद्याधर ने विघ्न डालने का प्रयास किया। भयवश वह अपराधी वज्रायुध की शरण में आया था। अवधिज्ञानी वज्रायुध ने कहा कि वह इस घटना का गहरा कारण जानता है। तब उसने एक पूर्वजन्म की कथा सुनानी आरम्भ की, जिसमें राजकुमार नलिनकेतु ने कामवश होकर व्यापारी-पत्नी प्रीतिंकरा का बलपूर्वक अपहरण किया था। यही कर्म आगे चलकर वर्तमान विवाद का मूल कारण बना।
श्लोक 103 से 114 पूर्वभव का फल और शान्तिमती का वैराग्य
सुदत्त ने वैराग्य धारण कर दीक्षा ली, कठोर तप किया और ऐशान स्वर्ग में देव हुआ। वहाँ से च्युत होकर वह अजितसेन नामक पराक्रमी राजकुमार बना। दूसरी ओर नलिनकेतु ने भी आत्मज्ञान प्राप्त कर दीक्षा ग्रहण की, केवलज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष को प्राप्त हुआ। प्रीतिंकरा ने भी आर्यिका दीक्षा लेकर तप किया, स्वर्ग में देवी हुई और पुनर्जन्म में शान्तिमती के रूप में उत्पन्न हुई। वज्रायुध द्वारा पूर्वभव का संबंध बताने पर शान्तिमती को वैराग्य हुआ, उसने संयम ग्रहण किया और अंत में ऐशान स्वर्ग में देव हुई।
श्लोक 115 से 121 कनकशान्ति का वनगमन और मुनिदर्शन
चक्रवर्ती वज्रायुध सुखपूर्वक राज्य कर रहे थे। इसी समय मेघवाहन की पुत्री कनकमाला और समुद्रसेन की पुत्री वसन्तसेना, राजा कनकशान्ति की रानियाँ थीं। एक अवसर पर कनकशान्ति अपनी पत्नियों के साथ वन-विहार के लिए गया। वहाँ उसे विमलप्रभ मुनिराज के दर्शन हुए, जो उसके जीवन में आध्यात्मिक परिवर्तन का कारण बने।
श्लोक 122 से 132 कनकशान्ति की दीक्षा और वज्रायुध का वैराग्य
विमलप्रभ मुनि से तत्त्वज्ञान प्राप्त कर कनकशान्ति ने तत्काल दीक्षा ग्रहण कर ली। उसकी दोनों रानियों ने भी आर्यिका दीक्षा धारण की। बाद में चित्रचूल विद्याधर ने पूर्ववैरवश उपसर्ग करना चाहा, किन्तु सफल नहीं हुआ। कनकशान्ति ने कठोर साधना करते हुए केवलज्ञान प्राप्त किया। नाती के केवलज्ञान-महोत्सव को देखकर वज्रायुध को भी वैराग्य हुआ और उन्होंने राज्य पुत्र सहस्त्रायुध को सौंपकर क्षेमंकर तीर्थंकर के समक्ष दीक्षा ले ली।
श्लोक 133 से 141 वज्रायुध और सहस्त्रायुध की तपस्या
वज्रायुध मुनिराज ने सिद्धिगिरि पर प्रतिमायोग धारण कर घोर तप किया। उनके प्रभाव से अनेक जीव धर्ममार्ग पर अग्रसर हुए। पूर्वभव के वैरी असुर भी उनका विघ्न करना चाहते थे, परन्तु देवियों ने उन्हें रोक दिया। उधर सहस्त्रायुध को भी वैराग्य हुआ और उसने राज्य त्यागकर संयम धारण किया। पिता-पुत्र दोनों ने दीर्घकाल तक तपस्या की और अंत में समाधिमरण कर सौमनस विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 142 से 153 मेघरथ और दृढ़रथ का जन्म तथा मुर्गों का युद्ध
सौमनस विमान से च्युत होकर वज्रायुध का जीव राजा घनरथ के यहाँ मेघरथ के रूप में और सहस्त्रायुध का जीव दृढ़रथ के रूप में उत्पन्न हुआ। दोनों राजकुमार गुण, पराक्रम और विनय से सम्पन्न थे। उनके विवाह हुए तथा पुत्र भी उत्पन्न हुए। एक दिन राजमहल में दो दासियों द्वारा लाए गए मुर्गों के बीच युद्ध कराया गया। यह हिंसक दृश्य धर्मात्माओं के लिए अनुचित था, इसलिए राजा ने इस युद्ध के वास्तविक कारण को जानना चाहा।
श्लोक 154 से 161 पुराने वैर का परिणाम
राजा के प्रश्न पर मेघरथ ने अवधिज्ञान से बताया कि ये दोनों मुर्गे पूर्वजन्म में भद्र और धन्य नामक दो भाई थे। बैल के विवाद में वे एक-दूसरे को मारकर मरे। इसके बाद वे हाथी बने और पुनः वैरवश लड़कर मरे। फिर भैंसे बने और परस्पर संघर्ष में प्राण गंवाए। इस प्रकार जन्म-जन्मांतर तक उनका वैर समाप्त नहीं हुआ और वही संस्कार वर्तमान जन्म तक चले आए।
श्लोक 162 से 171 विद्याधरों के पूर्वभव का रहस्य
मेघरथ ने आगे बताया कि ये दोनों जीव बाद में मेढ़े बने और फिर मुर्गों के रूप में जन्मे। उन्हें दो विद्याधर अपनी विद्या से लड़वा रहे थे। उन विद्याधरों का परिचय देते हुए उसने कहा कि वे गरुड़वेग राजा के पुत्र दिवितिलक और चन्द्रतिलक हैं। उन्होंने सिद्धकूट पर चारण मुनियों से अपने पूर्वभव के विषय में प्रश्न किया था। तब मुनियों ने उन्हें बताया कि वे पूर्वजन्म में अभयघोष राजा के पुत्र विजय और जयन्त थे।
श्लोक 172 से 182 अभयघोष का वैराग्य और पुनर्जन्म
मुनियों ने बताया कि अभयघोष राजा पृथिवीतिलका में आसक्त हो गए थे, जिससे उनकी रानी सुवर्णतिलका अत्यंत दुःखी हुई और उसने दीक्षा ग्रहण कर ली। बाद में अभयघोष को भी आत्मज्ञान हुआ और उन्होंने दोनों पुत्रों सहित संयम धारण कर तीर्थंकर-नामकर्म के कारणभूत सोलह भावनाओं का चिंतन किया। समाधिमरण के पश्चात वे अच्युत स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वही जीव वर्तमान में राजा घनरथ के रूप में जन्मा था।
श्लोक 183 से 192 वैर का अंत और जम्बूद्वीप का दर्शन
पूर्वभव का संबंध जानकर दोनों विद्याधरों ने राजा घनरथ और मेघरथ की पूजा की तथा दीक्षा ग्रहण कर ली। मुर्गों ने भी अपना पूर्ववैर त्याग दिया और आगे चलकर व्यन्तर देव बने। उन देवों ने मेघरथ को सम्मानपूर्वक विमान में बैठाकर मानुषोत्तर पर्वत के भीतर स्थित जम्बूद्वीप का दर्शन कराया। उन्होंने भरत, हैमवत, हरिवर्ष, विदेह, रम्यक, हैरण्यवत और ऐरावत—इन सात क्षेत्रों तथा उन्हें विभाजित करने वाले सात कुलाचल पर्वतों का परिचय दिया।
श्लोक 193 से 201 जम्बूद्वीप के पर्वत, नदियाँ और हृद
देवों ने मेघरथ को जम्बूद्वीप की भौगोलिक रचना का विस्तार से परिचय दिया। हिमवान, महाहिमवान, निषध, मेरु, नील, रुक्मी और शिखरी नामक सात कुलाचल पर्वतों का वर्णन किया। उन्होंने चौदह महानदियों तथा सोलह हृद-सरोवरों का भी परिचय कराया। प्रथम छह हृदों में श्री, ह्री, धृति, कीर्ति, बुद्धि और लक्ष्मी नामक देवियाँ निवास करती हैं, जबकि शेष दस हृदों में नागकुमार देव निवास करते हैं। इस प्रकार मेघरथ को जम्बूद्वीप की अद्भुत संरचना और दिव्य वैभव का दर्शन कराया गया।
श्लोक 202 से 221 जम्बूद्वीप का विस्तृत दर्शन और देवों का सम्मान
व्यन्तर देवों ने मेघरथ को जम्बूद्वीप के पर्वतों, विभंग नदियों, बत्तीस विदेह क्षेत्रों तथा उनकी राजधानियों का विस्तार से दर्शन कराया। उन्होंने समुद्रों, वनों, मानुषोत्तर पर्वत और विविध पवित्र स्थलों का भी अवलोकन किया। मेघरथ ने अकृत्रिम जिनमन्दिरों की भक्तिपूर्वक पूजा और स्तुति की। नगर लौटने पर व्यन्तर देवों ने दिव्य आभूषणों तथा मंगलमय वचनों से उनका सम्मान किया और फिर अपने स्थान को लौट गए।
श्लोक 222 से 231 उपकार की महिमा और घनरथ का वैराग्य
ग्रन्थ में उपकार के प्रत्युपकार का महत्व बताते हुए कहा गया कि जो उपकारी का प्रतिदान नहीं करता, वह सुगन्धहीन पुष्प के समान निष्फल जीवन जीता है। इसी बीच राजा घनरथ को संसार की असारता का विचार हुआ। उन्होंने शरीर, सुख, धन और संबंधों की नश्वरता पर चिंतन किया तथा आत्मकल्याण की आवश्यकता को समझा। उनके इस वैराग्यपूर्ण भाव को जानकर लौकान्तिक देव आए, उनकी स्तुति की और संयम ग्रहण करने के संकल्प का समर्थन किया।
श्लोक 232 से 244 घनरथ का संयम और सिंहरथ का अभिमान भंग
घनरथ ने मेघरथ को राज्य सौंपकर दीक्षा धारण कर ली। उन्होंने मन, वचन और काया को शुद्ध बनाकर कषायों का क्षय किया और शीघ्र ही केवलज्ञान के योग्य निर्मल अवस्था प्राप्त कर ली। दूसरी ओर एक दिन मेघरथ अपनी रानियों के साथ उद्यान में बैठे थे, तभी सिंहरथ विद्याधर का विमान उनके ऊपर रुक गया। अहंकारवश वह उन्हें हटाना चाहता था, परन्तु मेघरथ ने केवल पैर के अंगूठे से उसे असहाय बना दिया। बाद में उसकी पत्नी के निवेदन पर उसे मुक्त किया गया।
श्लोक 245 से 254 सिंहरथ का पूर्वभव और वैराग्य
प्रियमित्रा के पूछने पर मेघरथ ने सिंहरथ का पूर्वभव बताया। वह पूर्व जन्म में राजा राजगुप्त था, जिसने धर्मपालन और दान के पुण्य से ब्रह्मेन्द्र पद प्राप्त किया था। उसकी पत्नी शङ्खिका भी पुण्य के प्रभाव से श्रेष्ठ जन्मों को प्राप्त हुई। पूर्वजन्म का यह वृत्तांत सुनकर सिंहरथ का अहंकार समाप्त हो गया। उसने पुत्र को राज्य देकर घनरथ तीर्थंकर के समीप दीक्षा ग्रहण कर ली और उसकी पत्नी मदनवेगा ने भी आर्यिका दीक्षा लेकर तपस्या आरम्भ कर दी।
श्लोक 255 से 271 कबूतर-गीध प्रसंग और दान का स्वरूप
एक अवसर पर मेघरथ उपवासपूर्वक धर्मोपदेश दे रहे थे। तभी एक भयभीत कबूतर उनकी शरण में आया और उसके पीछे एक भूखा गीध भी पहुँचा। गीध ने कबूतर को अपना आहार बताकर उसे सौंपने की याचना की। मेघरथ ने बताया कि दोनों पूर्वजन्म में धन के कारण लड़ने वाले भाई थे और अब अपने कर्मों के फलस्वरूप पक्षी बने हैं। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि गीध के पीछे एक देव उसकी परीक्षा लेने के लिए आया है। इसके बाद उन्होंने दान, दाता और देय के वास्तविक स्वरूप का विवेचन किया।
श्लोक 272 से 281 सच्चे दान का उपदेश और पक्षियों का उद्धार
मेघरथ ने समझाया कि आहार, औषधि, शास्त्र और अभयदान—ये चार प्रकार के श्रेष्ठ दान हैं। मांस जैसे हिंसात्मक पदार्थ न तो देय हैं, न उनके इच्छुक पात्र हैं और न उन्हें देने वाला सच्चा दाता है। इस प्रकार उन्होंने सिद्ध किया कि कबूतर को गीध को सौंपना धर्मसम्मत नहीं है। उनकी युक्तियुक्त वाणी सुनकर परीक्षा लेने वाला देव प्रसन्न हो गया और उनकी प्रशंसा कर चला गया। कबूतर और गीध भी उपदेश से प्रभावित होकर आगे चलकर व्यन्तर देव बने और मेघरथ के प्रति कृतज्ञता प्रकट की
श्लोक 282 से 293 मेघरथ और प्रियमित्रा की परीक्षा
नन्दीश्वर पूजा और प्रतिमायोग में स्थित मेघरथ की सम्यग्दृष्टि और धैर्य की प्रशंसा ईशानेन्द्र ने देवसभा में की। उनकी परीक्षा लेने के लिए दो देवियाँ आईं और विविध रूपों से उनका मन विचलित करने का प्रयास किया, किन्तु वे असफल रहीं। बाद में ईशानेन्द्र ने रानी प्रियमित्रा के अनुपम सौन्दर्य की प्रशंसा की। इसे सत्यापित करने के लिए दो देवियाँ कन्याओं का वेश धारण कर उसके पास पहुँचीं। उन्होंने उसकी रूप-शोभा को देखा और फिर यह कहकर कि सौन्दर्य भी नश्वर है, उसका वैराग्य जाग्रत किया।
श्लोक 294 से 301 प्रियमित्रा का वैराग्य और श्रावकधर्म की जिज्ञासा
देवियों के उपदेश से प्रियमित्रा को संसार की नश्वरता का बोध हुआ और उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। राजा मेघरथ ने उसे नित्यानित्यात्मक जगत् का तत्त्व समझाकर सांत्वना दी। कुछ समय बाद मेघरथ अपने परिवार सहित उद्यान में गए, जहाँ उन्होंने अपने पिता घनरथ तीर्थंकर के दर्शन किए। श्रद्धापूर्वक वंदना करने के बाद उन्होंने श्रावकों की आचार-पद्धति और धर्म का विवेचन सुनने की इच्छा व्यक्त की। तब घनरथ तीर्थंकर ने उपासकाध्ययन के माध्यम से श्रावकधर्म का उपदेश प्रारम्भ किया।
श्लोक 302 से 311 श्रावकधर्म की क्रियाएँ और मेघरथ का वैराग्य
घनरथ तीर्थंकर ने बताया कि श्रावकों की क्रियाएँ गर्भान्वय, दीक्षान्वय और क्रियान्वय—इन तीन प्रकार की होती हैं। गर्भान्वय की 53, दीक्षान्वय की 48 और क्रियान्वय की 7 क्रियाएँ मानी गई हैं। इनका उद्देश्य सम्यग्दर्शन की शुद्धि और मोक्षमार्ग की सिद्धि है। श्रावकधर्म का विस्तृत उपदेश सुनकर मेघरथ का चित्त अत्यन्त निर्मल हो गया। उन्होंने संसार, शरीर और भोगों की नश्वरता का चिंतन कर राज्यत्याग का निश्चय किया। छोटे भाई दृढ़रथ ने भी राज्य ग्रहण करने से इनकार कर दिया, इसलिए मेघसेन को राज्य देकर मेघरथ ने सात हजार राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 312 से 321 दर्शनविशुद्धि और उसके आठ अंग
मेघरथ मुनि ने तीर्थंकर-नामकर्म के बन्ध का कारण बनने वाली सोलह भावनाओं का चिंतन किया। इनमें प्रथम दर्शनविशुद्धि है, जिसके आठ अंग बताए गए हैं—निःशंकता, निःकांक्षितता, निर्विचिकित्सा, अमूढ़दृष्टि, उपबृंहण, स्थितिकरण, वात्सल्य और प्रभावना। इनका आशय मोक्षमार्ग में दृढ़ श्रद्धा, भोगों की आकांक्षा का त्याग, मिथ्यात्व से विमुखता, आत्मधर्म की वृद्धि, धर्म की रक्षा, सहधर्मियों के प्रति प्रेम तथा जिनमार्ग के प्रभाव के प्रसार से है। इन गुणों से सम्यग्दर्शन निर्मल और दृढ़ बनता है।
श्लोक 322 से 331 तीर्थंकर-नामकर्म के सोलह कारण
घनरथ तीर्थंकर ने आगे शीलव्रतानतीचार, अभीक्ष्णज्ञानोपयोग, संवेग, त्याग, तप, साधुसमाधि, वैयावृत्त्य, अर्हद्भक्ति, आचार्यभक्ति, बहुश्रुतभक्ति, प्रवचनभक्ति, आवश्यकापरिहाणि, मार्गप्रभावना और वात्सल्य जैसी भावनाओं का वर्णन किया। ये सभी भावनाएँ आत्मशुद्धि, धर्मरक्षा, ज्ञानार्जन, तप और भक्ति को पुष्ट करती हैं। जिनेन्द्र भगवान ने इन्हें सामूहिक अथवा पृथक् रूप से तीर्थंकर-नामकर्म के बन्ध का कारण बताया है।
श्लोक 332 से 341 मेघरथ की तपस्या और अहमिन्द्र पद की प्राप्ति
मेघरथ मुनिराज ने इन सोलह भावनाओं के द्वारा निर्मल तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। वे विभिन्न देशों में विहार करते हुए अनेक राजाओं को धर्मोपकार का अवसर प्रदान करते रहे। अंततः दृढ़रथ के साथ नभस्तिलक पर्वत पर एक मास का प्रायोपगमन संन्यास धारण किया। शांतचित्त होकर देह त्यागने पर दोनों सौमनस स्वर्ग में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ उन्होंने अत्यन्त दिव्य सुख, अवधिज्ञान और विशिष्ट देववैभव का अनुभव किया तथा आगे एक भव लेकर मोक्ष प्राप्त करने के अधिकारी बने।
श्लोक 342 से 351 कुरुजाङ्गल देश का प्राकृतिक वैभव
इसके बाद भरत क्षेत्र के मध्य स्थित कुरुजाङ्गल देश का वर्णन किया गया है। यह अत्यन्त उर्वर, समृद्ध और धान्य-सम्पन्न प्रदेश था। वहाँ सुपारी, चोच, केला, आम और कटहल के वृक्ष प्रचुर मात्रा में फलते-फूलते थे। पुष्पों और फलों से लदी लताएँ तथा वृक्ष सम्पूर्ण प्रदेश की शोभा बढ़ाते थे। भूमि समतल, उपजाऊ और भयमुक्त थी। स्वच्छ जल से भरे सरोवर अनेक प्रकार के पुष्पों से सुशोभित होकर प्रदेश को स्वर्गोपम बनाते थे।
श्लोक 352 से 361 समृद्धि, सदाचार और लोककल्याण
कुरुजाङ्गल के वृक्ष और लताएँ अपने सौन्दर्य एवं उपयोगिता के कारण श्रेष्ठ राजाओं और रमणीय स्त्रियों के समान प्रतीत होते थे। वहाँ ईख की खेती, कृषि और व्यापार भरपूर था। समाज में अपराध, निर्धनता, अन्याय और दुष्टता का अभाव था। लोग मर्यादा और धर्म का पालन करते थे। समय पर वर्षा होती थी, गायें पर्याप्त दूध देती थीं और वृक्ष सदा फल-फूलों से लदे रहते थे। सम्पूर्ण प्रदेश समृद्धि, शांति और सदाचार का आदर्श उदाहरण था।
श्लोक 362 से 371 हस्तिनापुर नगरी की भव्यता
कुरुजाङ्गल देश के मध्य हस्तिनापुर नामक भव्य नगरी स्थित थी। वह विशाल परिखाओं, ऊँची प्राचीरों, गोपुरों, अट्टालिकाओं और सुन्दर राजमार्गों से युक्त थी। नगर की गलियाँ सुव्यवस्थित थीं और भवन अत्यन्त मनोहर थे। सुगन्धित वातावरण, अलंकृत राजप्रासाद और सौन्दर्य से सम्पन्न युवक-युवतियाँ उसकी शोभा बढ़ाते थे। यह नगरी भौतिक वैभव और सांस्कृतिक उन्नति का केन्द्र थी।
श्लोक 372 से 381 धर्मप्रधान समाज और राजमहलों का वैभव
हस्तिनापुर के निवासी अहिंसा को ही धर्म मानते थे। श्रावक देवपूजा, स्वाध्याय, दान और धर्मकार्य में तत्पर रहते थे। न्यायप्रिय शासन और धार्मिक वातावरण के कारण मुनिराज भी वहाँ निवास करना पसंद करते थे। नगर के उपवन नन्दनवन की शोभा को भी मात देते थे। वहाँ धन और भोग की प्रचुरता होते हुए भी त्याग और दान की भावना विद्यमान थी। नगर के मध्य स्थित राजमहल मेरु पर्वत के समान भव्य और दिव्य प्रतीत होता था।
श्लोक 382 से 393 विश्वसेन का जन्म और ऐरा के शुभ स्वप्न
हस्तिनापुर में कश्यपगोत्रीय राजा अजितसेन राज्य करते थे। उनकी रानी प्रियदर्शना से विश्वसेन का जन्म हुआ। विश्वसेन की पत्नी ऐरा अत्यन्त पुण्यशालिनी और देवियों द्वारा सेवित थी। एक रात्रि उसने तीर्थंकर-माता को प्राप्त होने वाले सोलह शुभ स्वप्न देखे। स्वप्नों के उपरान्त मेघरथ का जीव स्वर्ग से च्युत होकर उसके गर्भ में अवतीर्ण हुआ। प्रातःकाल ऐरा ने राजसभा में जाकर अपने स्वप्न राजा को सुनाए और उनके फल के विषय में पूछा।
श्लोक 394 से 404 तीर्थंकर का गर्भावतार और जन्मकल्याणक
राजा द्वारा स्वप्नों का फल विचारते ही इन्द्र और अन्य देवगण गर्भकल्याणक मनाने के लिए उपस्थित हुए। रानी ऐरा का गर्भ दिव्य प्रभाव से बढ़ने लगा और देवताओं द्वारा उसकी निरन्तर पूजा की जाने लगी। नवें महीने ज्येष्ठ कृष्ण चतुर्दशी के दिन उसने एक दिव्य पुत्र को जन्म दिया, जो तीन ज्ञानों से विभूषित और अनुपम तेज से युक्त था। देवों ने शंख, भेरी और घंटानाद से जन्मोत्सव मनाया। इन्द्राणी ने मायामयी निद्रा द्वारा जिनमाता को सुलाकर जिनबालक को इन्द्र के हाथों में सौंपा। तत्पश्चात् इन्द्र ने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर क्षीरसागर के जल से उनका जन्माभिषेक किया और जन्मकल्याणक का भव्य उत्सव सम्पन्न किया।
श्लोक 405 से 412 शान्तिनाथ नामकरण और धर्म की पुनः स्थापना
इन्द्र ने जन्माभिषेक के पश्चात् केवल परम्परा के निर्वाह हेतु भगवान् को आभूषणों से अलंकृत किया, क्योंकि वे स्वयं ही समस्त आभूषणों के आभूषण थे। समस्त जीवों को शान्ति प्रदान करने वाले होने के कारण उनका नाम शान्तिनाथ रखा गया। इन्द्र ने उन्हें माता को सौंपकर जन्मकल्याणक सम्पन्न किया और देवगण अपने-अपने लोक लौट गये। धर्मनाथ तीर्थंकर के निर्वाण के बाद धर्म के विच्छेद की अवधि बीतने पर शान्तिनाथ भगवान् का अवतार हुआ, जिन्होंने पुनः धर्म की ज्योति प्रज्वलित की।
श्लोक 413 से 421 शान्तिनाथ का बाल्यकाल और दिव्य स्वरूप
भगवान् शान्तिनाथ की आयु एक लाख वर्ष, शरीर की ऊँचाई चालीस धनुष और वर्ण सुवर्ण के समान था। उनके शरीर पर अनेक शुभ चिह्न विद्यमान थे। दूसरी ओर दृढ़रथ का जीव भी पुनर्जन्म लेकर चक्रायुध के रूप में उत्पन्न हुआ। शान्तिनाथ बाल्यावस्था से ही असाधारण गुणों, सौन्दर्य, कीर्ति और वैभव से सम्पन्न थे। उनका यौवन, मुखमण्डल, केश, ललाट और भौंहें दिव्य शोभा से युक्त होकर सबको आकर्षित करती थीं।
श्लोक 422 से 431 भगवान् के मुखमण्डल और ऊर्ध्वांग की महिमा
भगवान् के नेत्र अत्यन्त विशाल और मनोहर थे, मानो नेत्रों की आदर्श परिभाषा ही उनसे बनी हो। उनके कान समस्त शास्त्रों के धारक होने योग्य थे और नासिका तेजस्विता का प्रतीक थी। कपोल, दन्तपंक्ति, अधर, चिबुक और मुखमण्डल अनुपम सौन्दर्य से युक्त थे। उनका कण्ठ दिव्यध्वनि का आधार बनने योग्य था तथा उनके कन्धे और ऊपरी अंग अलौकिक बल, सौन्दर्य और गौरव के प्रतीक थे।
श्लोक 432 से 441 वक्षस्थल से चरणों तक दिव्य लक्षण
भगवान् का वक्षस्थल विशाल, मध्यभाग सुडौल और नाभि शुभलक्षणों से युक्त थी। कमर, जंघाएँ, घुटने और चरण सभी अद्भुत समरूपता और सौन्दर्य से विभूषित थे। उनके चरणों में ऐसी दिव्यता थी कि वे समस्त इन्द्रों के लिए वन्दनीय थे। उनके प्रत्येक अंग में आध्यात्मिक महिमा और भावी तीर्थंकरत्व की झलक स्पष्ट दिखाई देती थी।
श्लोक 442 से 451 चरणवैभव, तेज और कीर्ति
भगवान् के चरणों, अँगुलियों और नखों का वर्णन अत्यन्त मंगलकारी रूप में किया गया है। उनके चरण मानो जीवों को स्वर्ग और मोक्ष का मार्ग दिखाने वाले थे। उनका तेज सूर्य और चन्द्रमा की उपमा से भी परे था। उनकी कान्ति और कीर्ति जन्म से पूर्व ही लोकव्यापी हो चुकी थी। उनका वचन सिंहनाद के समान प्रभावशाली और शत्रुओं के अहंकार को नष्ट करने वाला था।
श्लोक 452 से 462 राज्यप्राप्ति, चक्रवर्ती पद और वैराग्य की भूमिका
यौवन प्राप्त करने पर उनका विवाह अनेक गुणसम्पन्न राजकन्याओं से हुआ। उन्होंने दीर्घकाल तक राजवैभव और भोगों का उपभोग किया। बाद में पिता विश्वसेन ने उन्हें राज्य सौंप दिया। समय आने पर चौदह रत्न और नौ निधियाँ प्रकट हुईं तथा वे चक्रवर्ती सम्राट बने। पच्चीस हजार वर्ष तक साम्राज्य का संचालन करने के बाद एक दिन दर्पण में दो प्रतिबिम्ब देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ और वैराग्य जागृत हो गया।
श्लोक 463 से 475 वैराग्य, दीक्षा और संयम ग्रहण
पूर्वभवों का स्मरण होने पर भगवान् ने समझ लिया कि सम्पत्ति, शरीर, आयु और सांसारिक सम्बन्ध सभी नश्वर हैं। तभी लौकान्तिक देवों ने उन्हें धर्मतीर्थ के प्रवर्तन का समय उपस्थित होने का संकेत दिया। उन्होंने पुत्र नारायण को राज्य देकर दीक्षा ग्रहण करने का निश्चय किया। इन्द्र ने उनका दीक्षाभिषेक किया। सहस्राम्रवन में पहुँचकर उन्होंने केशलोंच किया, दिगम्बर मुद्रा धारण की, सामायिक चारित्र और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। उनके साथ चक्रायुध सहित एक हजार राजाओं ने भी संयम धारण किया।
श्लोक 476 से 491 तप, केवलज्ञान और समवसरण की स्थापना
दीक्षा के बाद भगवान् शान्तिनाथ ने कठोर तप द्वारा कषायों का क्षय किया और पृथ्वी को पवित्र बनाया। सहस्राम्रवन में नन्द्यावर्त वृक्ष के नीचे गहन ध्यान करते हुए उन्होंने क्रमशः मोहनीय तथा अन्य घातिया कर्मों का नाश किया। सोलह वर्षों की छद्मस्थ अवस्था के पश्चात् पौष शुक्ल दशमी को उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवगणों ने समवसरण की रचना की और भगवान् के समक्ष असंख्य जीव धर्मश्रवण के लिए उपस्थित हुए। उनके समवसरण में छत्तीस गणधर तथा विशाल मुनिसंघ विद्यमान था।
श्लोक 492 से 501 धर्मसंघ, निर्वाण और मोक्षप्राप्ति
भगवान् शान्तिनाथ के संघ में हजारों केवलज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, ऋद्धिधारी मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक और श्राविकाएँ सम्मिलित थे। वे बारह गणों सहित धर्म का प्रचार करते हुए विहार करते रहे। आयु के अन्त में वे सम्मेदशिखर पहुँचे और वहाँ शुक्लध्यान में स्थित होकर समस्त कर्मों का क्षय कर सिद्धपद को प्राप्त हुए। उनके निर्वाणकल्याणक का उत्सव देवों ने श्रद्धापूर्वक मनाया। चक्रायुध सहित नौ हजार मुनियों ने भी उसी समय मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 502 से 510 शान्तिनाथ की महिमा और उपसंहार
शान्तिनाथ भगवान् ने समस्त कर्मों का उच्छेद कर अनन्त ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य से सम्पन्न सिद्धपद प्राप्त किया। उनके पूर्वभवों की महान आध्यात्मिक प्रगति का वर्णन करते हुए ग्रन्थकार बताते हैं कि वे अनेक जन्मों में क्रमशः उन्नति करते हुए अन्ततः सोलहवें तीर्थंकर बने। चक्रायुध भी अनेक भवों की साधना के पश्चात् उनके प्रमुख गणधर बनकर मोक्ष को प्राप्त हुए। भगवान् शान्तिनाथ द्वारा प्रवर्तित मोक्षमार्ग अखण्ड रूप से चलता रहा और इसलिए उन्हें इस युग का आद्यगुरु कहा गया। अन्त में आचार्य गुणभद्र इस पर्व का समापन करते हुए शान्तिनाथ भगवान् की शरण ग्रहण करने का उपदेश देते हैं।
उत्तरपुराण पर्व 64 – कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन
श्लोक 1 से 11 : पूर्वभव में राजा सिंहरथ और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध
कुन्थुनाथ भगवान् की स्तुति के साथ वर्णन आरम्भ होता है। पूर्वविदेह क्षेत्र के वत्स देश में सुसीमा नगर के राजा सिंहरथ न्यायप्रिय, पराक्रमी और धर्मनिष्ठ शासक थे। एक दिन उल्कापात देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने यतिवृषभ मुनि से धर्मश्रवण किया और मोह त्यागकर राज्य पुत्र को सौंप दिया। अनेक राजाओं के साथ संयम ग्रहण कर उन्होंने ग्यारह अंगों का ज्ञान प्राप्त किया तथा सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। अन्त में समाधिमरण कर वे सर्वार्थसिद्धि अनुत्तर विमान में देव हुए और वहाँ वीतरागता से उत्पन्न दिव्य सुख का अनुभव करने लगे।
श्लोक 12 से 21 : श्रीकान्ता के शुभ स्वप्न और गर्भकल्याणक
भरतक्षेत्र के हस्तिनापुर में राजा सूरसेन और उनकी रानी श्रीकान्ता राज्य करते थे। सर्वार्थसिद्धि के देव का जीव आयु पूर्ण होने पर रानी श्रीकान्ता के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। गर्भधारण के समय रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे। प्रातःकाल उन्होंने राजा को स्वप्न सुनाए और उनके मंगलकारी फल जानकर अत्यन्त प्रसन्न हुईं। उसी समय देवों ने गर्भकल्याणक का उत्सव मनाकर राजा और रानी का अभिषेक तथा पूजन किया। गर्भधारण के पश्चात् रानी श्रीकान्ता की शोभा अत्यन्त बढ़ गई।
श्लोक 22 से 31 : जन्मकल्याणक और कुमारकाल
नव मास पूर्ण होने पर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन रानी श्रीकान्ता ने दिव्य पुत्र को जन्म दिया। इन्द्र सहित देवगण बालक को सुमेरु पर्वत पर ले गए, क्षीरसागर के जल से जन्माभिषेक किया, उसका नाम ‘कुन्थु’ रखा और पुनः माता-पिता को सौंप दिया। भगवान् शान्तिनाथ के निर्वाण के आधे पल्य बाद कुन्थुनाथ का अवतार हुआ। उनकी आयु पचानवे हजार वर्ष, शरीर की ऊँचाई पैंतीस धनुष तथा वर्ण तप्त सुवर्ण के समान था। कुमारकाल पूर्ण होने पर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ और आगे चलकर चक्रवर्ती पद की भी प्राप्ति हुई। वे अपार वैभव और दस प्रकार के भोगों का उपभोग करते हुए सुखपूर्वक राज्य करने लगे।
श्लोक 32 से 41 : वैराग्य, दीक्षा और तपश्चर्या
वन-विहार से लौटते समय कुन्थुनाथ ने एक मुनि को कठोर तप करते देखा। मंत्री के प्रश्न पर उन्होंने बताया कि ऐसे मुनि कर्मक्षय कर इसी जन्म में मोक्ष प्राप्त कर सकते हैं अथवा देव और चक्रवर्ती पद का सुख भोगकर अन्ततः मोक्ष प्राप्त करेंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि परिग्रह ही संसार का कारण है और उसका त्याग मोक्ष का मार्ग है। पूर्वभव का स्मरण होने पर उनके भीतर वैराग्य जागृत हुआ। लौकान्तिक देवों ने उनकी स्तुति की। उन्होंने पुत्र को राज्य सौंपकर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा के दिन एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। उसी समय उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ। अगले दिन धर्ममित्र राजा ने उन्हें आहारदान दिया। इसके बाद उन्होंने सोलह वर्षों तक कठोर तपश्चर्या की।
श्लोक 42 से 50 : केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
सोलह वर्ष की तपस्या के पश्चात् भगवान् कुन्थुनाथ तिलक वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ हुए। चैत्र शुक्ल तृतीया के दिन उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। देवों ने आकर चतुर्थ कल्याणक का महोत्सव मनाया। उनके पैंतीस गणधर हुए तथा विशाल मुनिसंघ और आर्यिकासंघ उनकी शरण में रहा। हजारों अवधिज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी, केवलज्ञानी और ऋद्धिधारी साधु उनके संघ में थे। तीन लाख श्राविकाएँ, दो लाख श्रावक तथा असंख्य देव-देवियाँ उनके उपदेश से लाभान्वित होते थे। भगवान् दिव्यध्वनि द्वारा समस्त जीवों को धर्मोपदेश देते हुए विहार करते रहे।
श्लोक 51 से 55 : निर्वाण और मंगलाशंसाएँ
आयु का केवल एक मास शेष रहने पर भगवान् कुन्थुनाथ एक हजार मुनियों के साथ सम्मेदशिखर पहुँचे। वहाँ प्रतिमायोग धारण कर वैशाख शुक्ल प्रतिपदा की रात्रि में कृत्तिका नक्षत्र के समय उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक का उत्सव मनाया। ग्रन्थकार उनकी महिमा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि पूर्वभव में सिंहरथ राजा, फिर सर्वार्थसिद्धि के देव, तत्पश्चात् तीर्थंकर और चक्रवर्ती बने भगवान् कुन्थुनाथ समस्त जीवों को अविनाशी मोक्षलक्ष्मी प्रदान करें। उनकी ज्ञानज्योति अज्ञानरूपी अन्धकार को नष्ट करने वाली है और वे मोक्ष के निश्चय तथा व्यवहार मार्ग के महान् प्रदर्शक हैं।
उत्तरपुराण पर्व 65 – अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा धनपति का वैराग्य और देवगति
कच्छ देश के क्षेमपुर नगर में धनपति नामक धर्मप्रिय और प्रजावत्सल राजा राज्य करते थे। उन्होंने अर्हन्नन्दन तीर्थंकर की दिव्यध्वनि से धर्मोपदेश सुनकर संसार से विरक्ति प्राप्त की और राज्य पुत्र को सौंपकर दीक्षा ग्रहण कर ली। ग्यारह अंगों का अध्ययन तथा सोलह कारण भावनाओं का आराधन कर उन्होंने तीर्थंकर-नामकर्म का बन्ध किया। अंत में प्रायोपगमन संन्यासपूर्वक देह त्यागकर वे जयन्त विमान में अहमिन्द्र देव हुए और वहाँ दिव्य सुख तथा अवधिज्ञान का उपभोग करने लगे।
श्लोक 12 से 21 : अरनाथ भगवान् का गर्भ और जन्म कल्याणक
जयन्त विमान के देव की आयु पूर्ण होने पर उनका जीव हस्तिनापुर के राजा सुदर्शन और रानी मित्रसेना के यहाँ अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और उनके शुभ फल सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुई। देवों ने गर्भकल्याणक का उत्सव मनाया। मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी के दिन रानी ने तीन ज्ञानों से विभूषित दिव्य पुत्र को जन्म दिया, जिसके जन्मोत्सव में देवगण भी सम्मिलित हुए और समस्त लोक आनन्द से भर उठा।
श्लोक 22 से 34 : कुमारकाल, चक्रवर्ती पद और दीक्षा
भगवान् अरनाथ का जन्म कुन्थुनाथ भगवान् के तीर्थकाल में हुआ। उनकी आयु चौरासी हजार वर्ष, शरीर की ऊँचाई तीस धनुष और वर्ण सुवर्ण के समान था। इक्कीस हजार वर्ष की कुमारावस्था के बाद उन्हें राज्य प्राप्त हुआ और तत्पश्चात् चक्रवर्ती पद मिला। एक दिन शरद्कालीन मेघों की क्षणभंगुरता देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। लौकान्तिक देवों की प्रेरणा से उन्होंने पुत्र अरविन्दकुमार को राज्य सौंप दिया और एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा धारण कर चार ज्ञानों के अधिकारी बन गए।
श्लोक 35 से 50 : केवलज्ञान, धर्मसंघ और निर्वाण
दीक्षा के बाद भगवान् अरनाथ ने सोलह वर्षों तक कठोर तप किया। कार्तिक शुक्ल द्वादशी के दिन आम्रवृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर उन्होंने घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके विशाल धर्मसंघ में गणधर, पूर्वधारी, अवधिज्ञानी, केवलज्ञानी तथा अनेक साधु-साध्वियाँ सम्मिलित थीं। उन्होंने अनेक देशों में धर्मप्रचार किया। आयु के अन्त में सम्मेदशिखर पर एक हजार मुनियों सहित प्रतिमायोग धारण कर चैत्र कृष्ण अमावस्या को मोक्ष प्राप्त किया। देवों ने उनके निर्वाण कल्याणक की भव्य पूजा की। ग्रन्थकार ने उनकी महिमा का स्तवन करते हुए उन्हें संसार-सागर से पार लगाने वाला बताया है।
श्लोक 51 से 64 : राजा भूपाल, निदान और पुनर्जन्म
अरनाथ भगवान् के तीर्थ में सुभौम नामक चक्रवर्ती हुआ, जो पूर्वजन्म में भूपाल राजा था। युद्ध में पराजित होकर उसने वैराग्यवश दीक्षा ग्रहण की, किन्तु तप करते समय चक्रवर्ती पद की आकांक्षा का निदान कर लिया। इस कामनापूर्ण तप के कारण उसका तप कलुषित हो गया। मृत्यु के पश्चात् वह महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ। उसी काल में अयोध्या के राजा सहस्रबाहु, उनकी रानी चित्रमती और उनके पुत्र कृतवीर का वर्णन किया गया है। साथ ही जमदग्नि तापस तथा दृढ़ग्राही और हरिशर्मा की पूर्वकथा भी कही गई है, जिसमें सम्यक्त्व और मिथ्यात्व के फल का निरूपण किया गया है।
श्लोक 65 से 83 : जमदग्नि तापस का मोह और पतन
दृढ़ग्राही देव ने हरिशर्मा के जीव को सम्यक्त्व का उपदेश देने के लिए चिड़े का रूप धारण किया। दोनों पक्षियों के संवाद से जमदग्नि तापस के तप की वास्तविकता प्रकट हुई। पक्षियों ने उसके क्रोध और मिथ्या मान्यताओं को उजागर किया तथा बताया कि केवल बाह्य तप मोक्ष का कारण नहीं है। उनके वचनों से प्रभावित होकर जमदग्नि का वैराग्य डगमगा गया। वह कन्याकुब्ज के राजा पारत के पास विवाह की इच्छा से पहुँचा। परीक्षा में रागयुक्त आसन चुन लेने से उसकी आसक्ति स्पष्ट हो गई और अंततः वह एक बालिका को साथ लेकर वन में चला गया।
श्लोक 84 से 92 : रेणुकी से विवाह और पुत्रोत्पत्ति
राजा पारत ने जमदग्नि की स्थिति पर खेद व्यक्त किया, परन्तु अपनी पुत्रियों में से इच्छुक कन्या चुनने की अनुमति दी। अधिकांश कन्याएँ उससे दूर भाग गईं, किन्तु एक छोटी बालिका उसके साथ जाने को तैयार हो गई। जमदग्नि ने उसका नाम रेणुकी रखा और उससे विवाह कर लिया। उनके यहाँ इन्द्र तथा श्वेतराम नामक दो तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुए, जो लोगों को अत्यन्त प्रिय थे और परिवार सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा।
श्लोक 93 से 104 : रेणुकी को सम्यक्त्व की प्राप्ति और कामधेनु विद्या
एक दिन रेणुकी के भाई मुनि अरिषञ्जय उसके घर आए। रेणुकी के प्रश्न पर उन्होंने उसे सम्यक्त्व रूपी अमूल्य आध्यात्मिक धन प्रदान किया, जिसे उसने श्रद्धापूर्वक स्वीकार किया। प्रसन्न होकर मुनि ने उसे कामधेनु विद्या और मन्त्रयुक्त फरसा भी दिया। बाद में राजा सहस्रबाहु और उनका पुत्र कृतवीर वहाँ आए। रेणुकी से कामधेनु विद्या का महत्व जानकर कृतवीर उस पर लोभ करने लगा और उसे प्राप्त करने की इच्छा प्रकट की। रेणुकी ने उसे अनुचित बताया, किन्तु मोह और अहंकार से प्रेरित कृतवीर ने यह मानते हुए कि श्रेष्ठ सम्पत्ति राजाओं की ही होनी चाहिए, उस दिव्य विद्या को प्राप्त करने का आग्रह किया।
श्लोक 105 से 117 : जमदग्नि की मृत्यु का प्रतिशोध और सुभौम का जन्म
कृतवीर कामधेनु को बलपूर्वक ले जाने लगा तो जमदग्नि ने उसका विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप कृतवीर ने उनका वध कर दिया। यह समाचार सुनकर जमदग्नि के दोनों पुत्र अत्यन्त क्रोधित हुए और पिता की मृत्यु का प्रतिशोध लेने का संकल्प किया। उन्होंने सहस्रबाहु और कृतवीर पर आक्रमण कर सहस्रबाहु का वध कर दिया। इसी बीच गर्भवती रानी चित्रमती को उसके भाई शाण्डिल्य तापस ने सुरक्षित स्थान पर पहुँचाकर मुनि सुबन्धु की शरण में रखा, जहाँ भावी चक्रवर्ती का जन्म होने वाला था।
श्लोक 118 से 131 सुभौम का पालन-पोषण और शत्रु की भविष्यवाणी
चित्रमती ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसकी वनदेवियों ने रक्षा की। मुनि सुबन्धु ने भविष्यवाणी की कि यह बालक सोलहवें वर्ष में चक्रवर्ती बनेगा। उसका नाम सुभौम रखा गया और वह गुप्त रूप से शास्त्रों का अध्ययन करता हुआ बड़ा होने लगा। दूसरी ओर परशुराम और उसके भाई क्षत्रिय वंश का बार-बार संहार करते रहे। एक निमित्तज्ञानी ने परशुराम को बताया कि जिस व्यक्ति के लिए संचित राजाओं के दाँत भोजन में परिवर्तित हो जाएँगे, वही उसका भावी शत्रु होगा।
श्लोक 132 से 143 : सुभौम की पहचान और परशुराम की चिंता
परशुराम ने अपने शत्रु की पहचान के लिए दानशाला खुलवाई, जहाँ आने वालों को राजाओं के दाँत दिखाए जाते थे। जब सुभौम परिव्राजक के वेश में वहाँ पहुँचा, तब उसके प्रभाव से वे दाँत चावल के भोजन में बदल गए। यह देखकर सेवकों ने परशुराम को सूचना दी। परशुराम ने उसे बुलाना चाहा, किन्तु सुभौम ने निर्भीकता से उसकी आज्ञा अस्वीकार कर दी। उसके तेज और प्रभाव से परशुराम के सेवक भयभीत होकर लौट गए।
श्लोक 144 से 151 : परशुराम का वध और सुभौम का चक्रवर्ती पद
सुभौम को चुनौती देने के लिए परशुराम स्वयं सेना सहित आया। युद्ध के समय देवों ने सुभौम की रक्षा की और उसके लिए दिव्य हाथी तथा चक्ररत्न प्रकट हुए। सुभौम ने चक्ररत्न के प्रहार से परशुराम का वध कर दिया तथा शेष सेना को अभयदान दिया। इस प्रकार वह विजयी होकर प्रकट हुआ और अरनाथ भगवान् के निर्वाण के पश्चात् आठवें चक्रवर्ती के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
श्लोक 152 से 161 : सुभौम का वैभव और रसोइये का वैर
सुभौम चक्रवर्ती अत्यन्त तेजस्वी, ऐश्वर्यवान और छहों खण्डों का अधिपति बना। उसने चक्रवर्ती के समस्त भोगों का दीर्घकाल तक उपभोग किया। एक दिन उसके रसोइये अमृतरसायन ने ‘रसायना’ नामक व्यंजन प्रस्तुत किया। नाम मात्र सुनकर राजा क्रोधित हो गया और शत्रुओं की प्रेरणा से उसने रसोइये को कठोर दण्ड दिया, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। मरते समय रसोइये ने प्रतिशोध का संकल्प किया और अगले जन्म में ज्योतिषी देव बनकर सुभौम का शत्रु बन गया।
श्लोक 162 से 171 : रसना-लोभ और सुभौम का पतन
ज्योतिषी देव व्यापारी का वेश धारण कर सुभौम को स्वादिष्ट फलों का लोभ देने लगा। जब राजा उन फलों का अत्यधिक आसक्त हो गया, तब उसने उसे दूरस्थ वन में चलने के लिए प्रेरित किया। मंत्रियों के मना करने पर भी सुभौम रसना-लोभवश उसके साथ समुद्र यात्रा पर निकल पड़ा। मार्ग में उसके समस्त रत्न और निधियाँ उसका साथ छोड़ गईं। समुद्र के मध्य उस देव ने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर पूर्व वैर का बदला लिया और सुभौम की हत्या कर दी। रौद्रध्यान में मृत्यु होने से सुभौम नरकगति को प्राप्त हुआ। इस प्रसंग से राग और द्वेष को पतन का कारण बताया गया है।
श्लोक 172 से 184 : सुभौम का पूर्वभव और पुण्डरीक–निशुम्भ युद्ध
ग्रन्थकार सुभौम के अनेक भवों का वर्णन करते हुए बताते हैं कि वह भूपाल राजा, महाशुक्र स्वर्ग का देव, चक्रवर्ती सुभौम और अन्ततः नरकवासी बना। इसके बाद नन्दिषेण बलभद्र और पुण्डरीक नारायण का चरित्र आरम्भ होता है। पुण्डरीक का विवाह पद्मावती से हुआ। पूर्वजन्म का शत्रु सुकेतु अनेक भवों के बाद निशुम्भ प्रतिनारायण बना और उसने पुण्डरीक पर आक्रमण किया। दोनों के बीच भीषण युद्ध हुआ, जिसमें पुण्डरीक ने अपने चक्र से निशुम्भ का वध कर दिया और वह नरकगति को प्राप्त हुआ।
श्लोक 185 से 192: नन्दिषेण और पुण्डरीक का अंतिम परिणाम
नन्दिषेण और पुण्डरीक दोनों भाई अत्यन्त प्रेमपूर्वक राज्य करते थे। उनका पारस्परिक स्नेह राज्य और ऐश्वर्य से भी अधिक था। किन्तु पुण्डरीक भोगों, आरम्भ और परिग्रह में अत्यधिक आसक्त हो गया। मृत्यु के समय रौद्रध्यान और मिथ्यात्व के कारण वह छठे नरक में उत्पन्न हुआ। दूसरी ओर भाई के वियोग से वैराग्य प्राप्त कर नन्दिषेण ने शिवघोष मुनि के पास दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप किया और कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। इस प्रकार एक ही कुल में उत्पन्न दो भाइयों में से एक भोगासक्ति के कारण नरकगामी हुआ और दूसरा संयम एवं तप के द्वारा मोक्ष को प्राप्त हुआ।
उत्तरपुराण पर्व 66 – मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 13 वैश्रवण राजा का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म का बंध
मल्लिनाथ भगवान की स्तुति के उपरान्त वैश्रवण नामक धर्मनिष्ठ राजा का परिचय दिया गया है। एक विशाल वटवृक्ष के अचानक नष्ट हो जाने की घटना से उन्हें संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने राज्य पुत्र को सौंपकर श्रीनाग मुनि से दीक्षा ग्रहण की, कठोर तप एवं सोलह कारण-भावनाओं का अभ्यास किया तथा तीर्थंकर नामकर्म का बंध कर अपराजित अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 14 से 21 देव से मानव जन्म की भूमिका
अपराजित विमान में आयु पूर्ण होने पर वह देव भरत क्षेत्र की मिथिला नगरी के राजा कुम्भ और रानी प्रजावती के गर्भ में अवतीर्ण होने के लिए तत्पर हुआ। देवों ने गर्भकल्याणक के अवसर पर दिव्य वैभव प्रकट किया और रानी प्रजावती का जीवन मंगलमय बना दिया।
श्लोक 22 से 32 : शुभ स्वप्न, गर्भकल्याणक और जन्म
रानी प्रजावती ने सोलह शुभ स्वप्न देखे जिन्हें राजा ने तीर्थंकर जन्म का संकेत बताया। देवों ने गर्भकल्याणक उत्सव मनाया। नौ माह पूर्ण होने पर रानी ने शुभ नक्षत्र में तेजस्वी एवं सर्वलक्षणयुक्त बालक को जन्म दिया, जो आगे चलकर मल्लिनाथ तीर्थंकर बने।
श्लोक 33 से 42 : जन्माभिषेक और वैराग्य
देवों ने सुमेरु पर्वत पर बालक का जन्माभिषेक कर उनका नाम मल्लिनाथ रखा। कुमारावस्था में विवाह की तैयारियाँ देखकर उन्हें पूर्वभव का स्मरण हुआ और उन्होंने सांसारिक भोगों की नश्वरता का विचार कर विवाह का त्याग तथा दीक्षा लेने का निश्चय कर लिया।
श्लोक 43 से 52 : दीक्षा और केवलज्ञान
लौकान्तिक देवों ने मल्लिनाथ की स्तुति कर उनके वैराग्य का अनुमोदन किया। उन्होंने तीन सौ राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। अल्पकालीन तपस्या के उपरान्त अशोक वृक्ष के नीचे घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 53 से 62 : समवसरण, धर्मप्रचार और निर्वाण
केवलज्ञान के पश्चात देवों ने समवसरण की रचना की। भगवान मल्लिनाथ के विशाल धर्मसंघ में गणधर, मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक एवं श्राविकाएँ सम्मिलित थे। उन्होंने अनेक प्रदेशों में विहार कर धर्म का प्रचार किया तथा अंत में सम्मेदशिखर पर पाँच हजार मुनियों सहित मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 63 से 71 : मल्लिनाथ की महिमा और पद्म चक्रवर्ती का पूर्वभव
देवों ने मल्लिनाथ भगवान के निर्वाण का उत्सव मनाया और उनकी मोक्षप्राप्ति की महिमा का वर्णन किया। इसके बाद पद्म चक्रवर्ती के पूर्वभव का वर्णन आरम्भ होता है। प्रजापाल नामक राजा ने उल्कापात देखकर संसार की असारता का अनुभव किया, राज्य त्यागकर संयम धारण किया और अच्युत स्वर्ग में देव हुए।
श्लोक 72 से 81 : पद्म चक्रवर्ती का जन्म और वैराग्य का उदय
अच्युत स्वर्ग से च्युत होकर वे वाराणसी के राजा पद्मनाभ के पुत्र पद्म बने और चक्रवर्ती पद प्राप्त किया। उन्होंने धर्मपूर्वक राज्य किया, परन्तु एक क्षणभंगुर मेघ को देखकर संसार की अनित्यता का पुनः अनुभव किया और वैराग्य की भावना जागृत हुई।
श्लोक 82 से 92 : आत्मा के अस्तित्व पर दार्शनिक संवाद
जब पद्म चक्रवर्ती दीक्षा लेने लगे तो शून्यवादी मन्त्री ने उन्हें तप एवं परलोक का निषेध करते हुए रोकना चाहा। पद्म ने तर्कपूर्वक आत्मा, चेतना, कर्म और परलोक के अस्तित्व को सिद्ध किया तथा स्पष्ट किया कि जीव शरीर से भिन्न एवं शाश्वत है।
श्लोक 93 से 101 : पद्म चक्रवर्ती का संयम और मोक्ष
आत्मतत्त्व की स्थापना के बाद पद्म ने राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण की। तप एवं साधना से उन्होंने घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त किया और अंततः मोक्ष को प्राप्त हुए। उनके पूर्वभव से लेकर सिद्धपद तक की सम्पूर्ण आध्यात्मिक यात्रा का गौरवपूर्ण वर्णन किया गया है।
श्लोक 102 से 111 : नन्दिमित्र, दत्त और बलीन्द्र का पूर्वभव
इसके पश्चात सातवें बलभद्र नन्दिमित्र और नारायण दत्त के पूर्वभव का वर्णन किया गया है। अयोध्या के राजकुमार होने पर उपेक्षित होकर दोनों ने दीक्षा ली और स्वर्ग गए। पुनर्जन्म में वे वाराणसी के राजकुमार बने। पूर्वजन्म का वही मन्त्री संसार में भटककर बलीन्द्र नामक विद्याधर राजा बना और उनसे वैर करने लगा।
श्लोक 112 से 121 : बलीन्द्र के साथ युद्ध और विजय
बलीन्द्र ने प्रसिद्ध गजराज की माँग की, जिसे अस्वीकार करने पर युद्ध छिड़ गया। विद्याधरों की सहायता से नन्दिमित्र और दत्त ने युद्ध किया। बलभद्र ने शतबलि का वध किया तथा दत्त नारायण ने बलीन्द्र का संहार कर तीनों खण्डों पर विजय प्राप्त की और राज्य में अभय की घोषणा की।
श्लोक 122 से 125 : भिन्न-भिन्न कर्मफल और उपसंहार
दीर्घकाल तक राज्य करने के पश्चात दत्त नारायण हिंसात्मक कर्मों के कारण सातवें नरक में गए, जबकि बलभद्र नन्दिमित्र ने वैराग्य लेकर दीक्षा धारण की, केवलज्ञान प्राप्त किया और मोक्ष को प्राप्त हुए। बलीन्द्र भी वैर के कारण दुर्गति को प्राप्त हुआ। अंत में यह निष्कर्ष दिया गया है कि वैर का त्याग ही कल्याण का मार्ग है और इसी के साथ उत्तरपुराण का छियासठवाँ पर्व पूर्ण होता है।
उत्तरपुराण पर्व 67 – मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : हरिवर्मा को तत्त्वज्ञान एवं मोक्षमार्ग का उपदेश
भगवान मुनिसुव्रतनाथ की स्तुति के पश्चात चम्पापुर के राजा हरिवर्मा का वर्णन किया गया है। वे अनन्तवीर्य मुनिराज के दर्शन कर जीव, कर्म, बन्ध, संवर, निर्जरा तथा मोक्ष का यथार्थ स्वरूप जानने की जिज्ञासा प्रकट करते हैं। मुनिराज उन्हें बताते हैं कि कर्मों से बँधा जीव संसारी तथा कर्मों से मुक्त जीव सिद्ध कहलाता है। कर्मों के प्रकार, उनके बन्ध के कारण, संवर-निर्जरा के उपाय तथा मोक्ष के स्वरूप का विस्तार से उपदेश दिया जाता है। इस तत्त्वज्ञान से राजा हरिवर्मा के हृदय में वैराग्य जागृत हो जाता है।
श्लोक 12 से 23 : हरिवर्मा का संयम, तीर्थंकर नामकर्म का बंध और गर्भकल्याणक
राजा हरिवर्मा अपने पुत्र को राज्य सौंपकर बाह्य और आभ्यन्तर परिग्रह का त्याग करते हैं तथा अनेक राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण कर कठोर तपस्या करते हैं। ग्यारह अंगों का अध्ययन और दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं के प्रभाव से वे तीर्थंकर नामकर्म का बंध करते हैं। समाधिमरण के उपरान्त वे प्राणत स्वर्ग में इन्द्र पद को प्राप्त होते हैं। आयु पूर्ण होने पर वे राजगृह के राजा सुमित्र और रानी सोमा के गर्भ में अवतीर्ण होने के लिए आते हैं। रानी सोलह शुभ स्वप्न देखकर राजा से उनका फल पूछती हैं।
श्लोक 24 से 33 : मुनिसुव्रतनाथ का जन्म, जन्माभिषेक और राज्याभिषेक
राजा सुमित्र रानी के स्वप्नों का फल बताते हैं कि उनके गर्भ से तीर्थंकर का जन्म होगा। देवगण गर्भकल्याणक एवं जन्मकल्याणक का उत्सव मनाते हैं और सुमेरु पर्वत पर बालक का जन्माभिषेक कर उनका नाम मुनिसुव्रतनाथ रखते हैं। वे दिव्य लक्षणों से युक्त होकर बड़े होते हैं और कुमारावस्था पूर्ण होने पर राज्याभिषेक प्राप्त कर धर्मपूर्वक राज्य संचालन करते हैं। एक दिन उनके राजहाथी के असामान्य व्यवहार से एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक प्रसंग आरम्भ होता है।
श्लोक 34 से 43 : हाथी का पूर्वभव, वैराग्य और भगवान की दीक्षा
भगवान बताते हैं कि वह हाथी पूर्वजन्म में नरपति नामक राजा था, जिसने मिथ्यात्व, अभिमान और कुपात्र दान के कारण हाथी की योनि प्राप्त की। भगवान के उपदेश से हाथी को जातिस्मरण हो जाता है और उसमें संयम की भावना जागृत होती है। इस घटना से स्वयं मुनिसुव्रतनाथ को भी संसार की नश्वरता का गहन अनुभव होता है। लौकान्तिक देव उनकी स्तुति करते हैं और वे राज्य त्यागकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण करते हैं। दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हो जाता है और वे कठोर तप में प्रवृत्त हो जाते हैं।
श्लोक 44 से 52 : तप, केवलज्ञान और विशाल धर्मसंघ
दीक्षा के बाद भगवान गोचरचर्या करते हुए तपस्या में निरत रहते हैं। ग्यारह माह की साधना के उपरान्त चम्पक वृक्ष के नीचे शुक्लध्यान द्वारा वे केवलज्ञान प्राप्त करते हैं। देवगण समवसरण की रचना करते हैं जहाँ गणधर, पूर्वधारी मुनि, अवधिज्ञानी, केवलज्ञानी, मनःपर्ययज्ञानी तथा अनेक तपस्वी मुनि उपस्थित होकर धर्म का श्रवण करते हैं। भगवान का धर्मसंघ अत्यन्त विशाल एवं प्रभावशाली बनता है।
श्लोक 53 से 64 : धर्मप्रचार, मोक्ष और हरिषेण चक्रवर्ती का पूर्वभव
भगवान मुनिसुव्रतनाथ दीर्घकाल तक आर्यखण्ड में विहार कर असंख्य जीवों को सम्यग्दर्शन एवं मोक्षमार्ग का उपदेश देते हैं। आयु पूर्ण होने पर वे सम्मेदशिखर पर एक हजार मुनियों सहित प्रतिमायोग धारण कर मोक्ष प्राप्त करते हैं। देवगण निर्वाण महोत्सव सम्पन्न करते हैं और उनकी ज्ञानमहिमा का स्तवन करते हैं। इसके पश्चात हरिषेण चक्रवर्ती के पूर्वभव का वर्णन आरम्भ होता है, जिसमें बताया गया है कि पूर्वभव के तप के प्रभाव से वे स्वर्ग में देव बने और फिर हरिषेण के रूप में जन्म लिया।
श्लोक 65 से 83 : हरिषेण का चक्रवर्ती पद, दिग्विजय और वैराग्य
हरिषेण युवावस्था में अपने पिता पद्मनाभ के साथ जिनेन्द्र भगवान के उपदेश का श्रवण करते हैं। उनके पिता संयम ग्रहण कर लेते हैं और हरिषेण आदर्श श्रावक बनकर राज्य का संचालन करते हैं। समय आने पर उन्हें चक्ररत्न सहित चौदह रत्न प्राप्त होते हैं और वे दिग्विजय कर चक्रवर्ती बनते हैं। समस्त दिशाओं को जीतकर वे सुखपूर्वक राज्य करते हैं। नन्दीश्वर पर्व के अवसर पर चन्द्रग्रहण देखकर उन्हें संसार की अनित्यता का बोध होता है। वे सभा में अनुप्रेक्षाओं का उपदेश देकर ऐश्वर्य की क्षणभंगुरता तथा धर्म की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं और वैराग्य धारण करने का निश्चय करते हैं।
श्लोक 84 से 92 : हरिषेण का त्याग और राम-लक्ष्मण के पूर्वभव का प्रारम्भ
हरिषेण अपने पुत्र महासेन को राज्य सौंपकर दीन-दुःखियों को दान देते हैं और श्रीनाग मुनि के पास जाकर दीक्षा ग्रहण करते हैं। कठोर तप, चार प्रकार की आराधना तथा समाधिमरण के फलस्वरूप वे सर्वार्थसिद्धि अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र बनते हैं। इसके बाद आठवें बलभद्र राम और नारायण लक्ष्मण के पूर्वभव का वर्णन प्रारम्भ होता है। रत्नपुर के राजा प्रजापति के पुत्र चन्द्रचूल तथा मन्त्रीपुत्र विजय अत्यधिक स्नेह, अभिमान और दुराचार के कारण उच्छृंखल स्वभाव के हो जाते हैं।
श्लोक 93 से 101 : चन्द्रचूल का अपराध और न्यायप्रिय राजा
चन्द्रचूल अपने मित्र विजय के साथ एक वैश्य कन्या का बलपूर्वक हरण करने का प्रयास करता है। नगर के व्यापारी न्याय की याचना लेकर राजा के पास पहुँचते हैं। प्रजा की पीड़ा और पुत्र के दुराचार को देखकर राजा क्रोधित हो उठते हैं। वे पक्षपात न करते हुए राजकुमार को बन्दी बनाने और शूली पर चढ़ाकर मृत्युदण्ड देने का आदेश देते हैं। नगररक्षक राजकुमार को पकड़कर राजा के समक्ष प्रस्तुत करता है और पुनः श्मशान ले जाने लगता है। इसी समय प्रधान मन्त्री राजा के समक्ष उपस्थित होकर न्याय और दया के समन्वय की भावना से अपना निवेदन प्रारम्भ करता है, जिससे आगे की कथा का आधार तैयार होता है
श्लोक 102 से 112 : मन्त्री का उपदेश और राजा का न्यायसंगत निर्णय
प्रधान मन्त्री ने राजा को समझाया कि बालक जन्म से न तो सदाचारी होता है और न दुराचारी; उसके संस्कारों और शिक्षा का उत्तरदायित्व माता-पिता तथा अभिभावकों पर होता है। जैसे बाल्यावस्था में प्रशिक्षित न किया गया हाथी आगे चलकर वश में नहीं आता, उसी प्रकार अनुशासनहीन बालक भी ऐश्वर्य प्राप्त होने पर उच्छृंखल बन जाता है। मन्त्री ने निवेदन किया कि राजकुमार अभी सुधार योग्य है, इसलिए उसे मृत्युदण्ड देना उचित नहीं होगा। उसने यह भी स्मरण कराया कि राजकुमार राज्य का एकमात्र उत्तराधिकारी है और उसके वध से राज्य तथा प्रजा दोनों को हानि होगी। किन्तु राजा ने स्पष्ट कहा कि न्याय के मार्ग में पुत्र और पराये का कोई भेद नहीं होता। राजा का धर्म दुष्टों का दमन और सज्जनों का संरक्षण करना है। यदि मोह, स्नेह अथवा भय के कारण राजा न्याय से विचलित हो जाए तो समस्त राज्य में अधर्म फैल जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यदि अपना दाहिना हाथ भी दोषपूर्ण हो जाए तो उसे भी त्याग देना चाहिए। राजा के इस अटल न्यायनिष्ठ निर्णय के सामने सभी लोग मौन होकर लौट गए।
श्लोक 113 से 121: मन्त्री की दूरदर्शिता और राजकुमारों का संयम ग्रहण
राजा की अनुमति प्राप्त कर मन्त्री राजकुमार चन्द्रचूल और अपने पुत्र विजय को वनगिरि पर्वत पर ले गया। वहाँ उसने दोनों की धैर्य और मृत्यु के प्रति भावना की परीक्षा ली। राजकुमार ने निर्भीक होकर स्वीकार किया कि यदि मृत्यु का भय होता तो वह ऐसा अपराध कभी न करता। मन्त्री उनकी निर्भीकता और आन्तरिक क्षमता को देखकर उन्हें महाबल गणधर के पास ले गया। मनःपर्ययज्ञान से सम्पन्न गणधर ने भविष्यवाणी की कि यही दोनों जीव आगे चलकर भरत क्षेत्र में बलभद्र और नारायण होंगे। इस शुभ भविष्य को जानकर मन्त्री अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने दोनों को धर्मोपदेश सुनाया और उनमें वैराग्य जाग्रत कर संयम ग्रहण करा दिया। इस प्रकार मृत्युदण्ड का अवसर उनके जीवन का आध्यात्मिक मोड़ बन गया।
श्लोक 122 से 135 : राजा का संतोष, मन्त्री की नीति और राजकुमारों की दीक्षा
मन्त्री राजा के पास लौटकर पहले संकेत रूप में यह निवेदन करता है कि दोनों कुमारों ने अपने अपराध का दण्ड स्वीकार कर लिया है और मृत्यु के लिए तैयार हो गए थे। यह सुनकर राजा अत्यन्त शोकाकुल हो जाता है। तब मन्त्री उचित अवसर देखकर वास्तविकता बताता है कि दोनों राजकुमारों को वन में स्थित महान् मुनियों का उपदेश प्राप्त हुआ और वे संसार से विरक्त होकर दीक्षित हो गए हैं। यह सुनकर राजा का शोक तत्काल आनन्द में परिवर्तित हो जाता है। वह मन्त्री की बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता की प्रशंसा करता है तथा स्वीकार करता है कि उसने दोनों लोकों का कल्याण करने वाला कार्य किया है। राजा स्वयं वनगिरि जाकर नवदीक्षित मुनियों से क्षमा माँगता है। मुनि विनयपूर्वक कहते हैं कि वास्तव में संयम का मार्ग दिखाने वाले राजा ही उनके उपकारी हैं। इस घटना से प्रभावित होकर राजा भी राज्य त्यागकर अनेक राजाओं सहित संयम ग्रहण कर लेता है तथा आगे चलकर केवलज्ञान प्राप्त करता है।
श्लोक 136 से 152 : पूर्वभव की समाप्ति और राम-लक्ष्मण का जन्म
राजा तप और साधना द्वारा मोह तथा घातिया कर्मों का क्षय कर केवलज्ञान प्राप्त करते हैं। दूसरी ओर दोनों नवदीक्षित मुनि कठोर तप एवं आराधना में स्थित रहते हैं। एक अवसर पर खड्गपुर के राजा सोमप्रभ के पुत्र पुरुषोत्तम नारायण का भव्य वैभव देखकर चन्द्रचूल मुनि के मन में निदान (भविष्य में वैभव प्राप्त करने की इच्छा) उत्पन्न हो जाती है। जीवन के अंत में दोनों मुनि चार प्रकार की आराधना सहित देवलोक में जन्म लेते हैं। कालान्तर में वे अयोध्या के राजा दशरथ के यहाँ पुनर्जन्म लेते हैं। मन्त्रीपुत्र का जीव राम बलभद्र तथा राजकुमार चन्द्रचूल का जीव लक्ष्मण नारायण बनता है। राम का जन्म रानी सुबाला से तथा लक्ष्मण का जन्म रानी कैकेयी से होता है। दोनों असाधारण तेज, दिव्य लक्षणों और महान् सामर्थ्य से युक्त होते हैं।
श्लोक 153 से 162: राम-लक्ष्मण का यौवन और सगर की कथा
राम और लक्ष्मण दिव्य लक्षणों, अतुल बल और अनुपम तेज से सम्पन्न होकर युवावस्था को प्राप्त होते हैं। इसी प्रसंग में सगर राजा की कथा का उल्लेख किया गया है। सगर ने एक स्वयंवर में मधुपिङ्गल नामक राजकुमार का अपमान किया, जिसके कारण वह वैर भाव लेकर अंततः महाकाल नामक असुर बना। प्रतिशोध की भावना से उसने ब्राह्मण का वेश धारण कर सगर को हिंसात्मक यज्ञ करने के लिए प्रेरित किया। अज्ञानवश सगर ने उस उपदेश को स्वीकार कर प्राणिहिंसा से युक्त यज्ञ किया और उसके परिणामस्वरूप घोर पाप का बंध कर नरकगति को प्राप्त हुआ। इस प्रकार यह प्रसंग मिथ्यादर्शन, हिंसा और दुष्ट सलाह के विनाशकारी परिणामों को स्पष्ट करता है।
श्लोक 163 से 173 : जनक की सभा और यज्ञ पर विचार
सगर के विनाश का समाचार सुनकर राजा दशरथ अयोध्या का शासन सँभालते हैं। इसी समय मिथिला में राजा जनक की पुत्री सीता विवाह योग्य होती हैं। अनेक राजा विवाह प्रस्ताव भेजते हैं, किन्तु जनक उचित समय की प्रतीक्षा करते हैं। एक दिन सभा में प्राचीन यज्ञों की चर्चा होती है और यह प्रश्न उठता है कि यदि यज्ञ से स्वर्ग प्राप्त होता है तो उसे पुनः क्यों न किया जाए। सेनापति कुशलमति सावधानीपूर्वक समझाता है कि हिंसात्मक यज्ञों के पीछे असुरों की प्रेरणा रही है तथा ऐसे कर्म अनेक विघ्न और अनर्थ उत्पन्न करते हैं। वह संकेत करता है कि यदि यज्ञ किया गया तो रावण जैसे पराक्रमी विद्याधर भी उसमें विघ्न डाल सकते हैं।
श्लोक 174 से 181 : राम को आमंत्रित करने का निर्णय
सेनापति आगे बताता है कि नागकुमारों और विद्याधरों के कारण यज्ञ में अनेक बाधाएँ आ सकती हैं। इन सभी विघ्नों से रक्षा करने में यदि कोई समर्थ है तो वह केवल राम और लक्ष्मण हैं। सभा के सभी सदस्य इस विचार का समर्थन करते हैं। राजा जनक निश्चय करते हैं कि यदि राम यज्ञ की रक्षा करेंगे तो सीता का विवाह उन्हीं के साथ किया जाएगा। वे राजा दशरथ के पास सम्मानपूर्वक दूत, पत्र और उपहार भेजते हैं तथा अन्य राजकुमारों को भी आमंत्रित करने की व्यवस्था करते हैं।
श्लोक 182 से 192 : यज्ञ की वास्तविक व्याख्या
राजा दशरथ मन्त्रिपरिषद् से इस प्रस्ताव पर विचार-विमर्श करते हैं। एक मन्त्री यज्ञ का समर्थन करता है, किन्तु अतिशयमति नामक विद्वान मन्त्री उसका खण्डन करता है। वह प्रमाणपूर्वक सिद्ध करता है कि हिंसात्मक यज्ञ धर्म नहीं है, क्योंकि सत्य आगम वही है जो सर्वज्ञ भगवान द्वारा प्रतिपादित हो और जो समस्त जीवों का हित करे। वेद के परस्पर विरोधी कथनों का उल्लेख करते हुए वह बताता है कि हिंसा धर्म का साधन नहीं हो सकती। वह स्पष्ट करता है कि ‘यज्ञ’ का वास्तविक अर्थ देवपूजा, दान, सत्कार, समागम और पुण्यकर्म है, न कि प्राणियों की हत्या। इस प्रकार वह यज्ञ की अहिंसामूलक व्याख्या प्रस्तुत करता है।
श्लोक 193 से 203 : यज्ञ का जैन स्वरूप और आत्मयज्ञ की महिमा
अतिशयमति आगे स्पष्ट करता है कि यज्ञ, याग, पूजा, सपर्या, इज्या, अध्वर और मख आदि सभी शब्द पूजाविधि और पुण्यकर्म के पर्याय हैं। दान, देवपूजा और सदाचार से ही महान् पुण्य की प्राप्ति होती है, न कि हिंसा से। यदि हिंसा ही यज्ञ होती तो हिंसक स्वर्ग और अहिंसक नरक जाते, जो सर्वथा असंगत है। वह बताता है कि भगवान ऋषभदेव द्वारा प्रतिपादित धर्म में वास्तविक यज्ञ बाह्य पशुबलि नहीं, बल्कि क्रोध, काम और लोभ जैसी आन्तरिक अग्नियों में क्षमा, वैराग्य, तप और आत्मसंयम की आहुति देना है। ऐसे आत्मयज्ञ का पालन करने वाले मुनि ही कर्मों का क्षय कर मोक्षरूपी परम पद को प्राप्त करते हैं। इस प्रकार पर्व का यह भाग जैन दर्शन की अहिंसा, आत्मसंयम और आन्तरिक साधना की सर्वोच्च महिमा का प्रतिपादन करता है।
श्लोक 204 से 211 : आर्ष यज्ञ, जिनपूजा और यज्ञ का वास्तविक स्वरूप
इस प्रसंग में अतिशयमति मन्त्री यज्ञ का वास्तविक जैन स्वरूप स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि तीर्थंकरों, गणधरों तथा अन्य केवलज्ञानियों के उत्तम शरीरों के संस्कार से पूजित अग्नियों में श्रद्धापूर्वक दान, पूजा, अक्षत, गन्ध, पुष्प और फलादि अर्पित करना आर्ष यज्ञ कहलाता है। यह यज्ञ हिंसा रहित, ऋषियों द्वारा प्रतिपादित तथा धर्ममय है। ऐसे यज्ञ का अनुष्ठान करने वाले गृहस्थ और तपस्वी महान पुण्य अर्जित कर इन्द्र, सामानिक और लौकान्तिक देवों के पद को प्राप्त करते हैं तथा क्रमशः मोक्ष की ओर अग्रसर होते हैं। आगे बताया गया है कि श्रुतज्ञानरूपी वेद के अनुसार विभिन्न अवसरों पर जिनेन्द्र भगवान की पूजा और आराधना करना भी यज्ञ ही है। ऋषियों ने यज्ञ को दो प्रकार का बताया है—एक मुनियों का आत्मयज्ञ, जो प्रत्यक्ष मोक्ष का कारण है, और दूसरा गृहस्थों का देवपूजामय यज्ञ, जो परम्परा से मोक्ष का साधन बनता है। यही प्राचीन, अहिंसामय और लोक-परलोक का कल्याण करने वाला यज्ञ है।
श्लोक 212 से 222 : महाकाल असुर की कथा और सगर का स्वयंवर में जाना
अतिशयमति आगे बताते हैं कि हिंसात्मक यज्ञ की परम्परा ऋषियों द्वारा नहीं, बल्कि सगर के प्रति वैर रखने वाले महाकाल असुर द्वारा प्रारम्भ की गई थी। इसके कारण का वर्णन करते हुए चारणयुगल नगर के राजा सुयोधन, उनकी रानी अतिथि और पुत्री सुलसा की कथा कही जाती है। सुलसा के स्वयंवर में अनेक राजा आमन्त्रित हुए। अयोध्या के राजा सगर भी जाने वाले थे, परन्तु सिर में एक श्वेत बाल देखकर उन्हें वैराग्य उत्पन्न हो गया। उनकी धाय मन्दोदरी और मन्त्री विश्वभू ने उन्हें समझाया कि यह शुभ संकेत है और वे अवश्य स्वयंवर में जाएँ। मन्त्री ने आश्वासन दिया कि वह किसी भी प्रकार सुलसा का विवाह सगर से ही कराएगा। उनके परामर्श से सगर पुनः उत्साहित होकर विशाल सेना सहित चारणयुगल नगर की ओर प्रस्थान करता है।
श्लोक 223 से 231 : विश्वभू मन्त्री की कुटिल योजना
चारणयुगल पहुँचकर मन्दोदरी ने सुलसा के समक्ष राजा सगर के कुल, पराक्रम, सौन्दर्य, ऐश्वर्य और सद्गुणों का विस्तार से वर्णन किया, जिससे सुलसा उनके प्रति आकर्षित हो गई। जब उसकी माता अतिथि को यह ज्ञात हुआ तो उसने सगर की निन्दा करते हुए अपने भानजे मधुपिङ्गल को अधिक योग्य वर बताया और सुलसा को उसी का वरण करने के लिए प्रेरित किया। साथ ही उसने मन्दोदरी का सुलसा से मिलना-जुलना बन्द करा दिया। सगर ने यह बाधा मन्त्री विश्वभू को बताई। तब मन्त्री ने एक षड्यन्त्र रचा। उसने स्वयंवर-विधान नामक एक कृत्रिम ग्रन्थ तैयार कराया, जिसमें वरों के शुभ-अशुभ लक्षण लिखे गए। उस ग्रन्थ को एक सन्दूक में रखकर उद्यान में गुप्त रूप से गाड़ दिया, ताकि अवसर आने पर उसे प्राचीन शास्त्र बताकर प्रस्तुत किया जा सके।
श्लोक 232 से 242 : मधुपिङ्गल का अपमान और सगर का विवाह
कुछ समय बाद मन्त्री ने योजना के अनुसार वही सन्दूक भूमि से निकलवाकर उसे प्राचीन ग्रन्थ घोषित किया। सभा में उसका वाचन कराया गया, जिसमें लिखा था कि जिन वरों की आँखें विशेष प्रकार की हों अथवा जिनमें कुछ अशुभ लक्षण हों, उन्हें स्वयंवर में सम्मानित नहीं करना चाहिए। मधुपिङ्गल में वे लक्षण होने के कारण वह स्वयं को अपमानित अनुभव कर सभा से बाहर चला गया। उसके हटते ही सगर और उसके समर्थक अत्यन्त प्रसन्न हुए। दूसरी ओर मधुपिङ्गल के बन्धु और सज्जन लोग इस छल से दुःखी हुए। इसके बाद राजा सुयोधन ने जिनेन्द्र भगवान की पूजा सम्पन्न कर सुलसा को स्वयंवर मण्डप में लाया। सुलसा ने सभी राजाओं की उपेक्षा करते हुए सगर के गले में वरमाला डाल दी। उपस्थित सज्जनों ने इस विवाह की प्रशंसा की और सगर कुछ समय पश्चात् सुलसा को लेकर अयोध्या लौट आए।
श्लोक 243 से 254 : मधुपिङ्गल का निदान और महाकाल असुर का जन्म
सगर और सुलसा सुखपूर्वक जीवन बिताने लगे, जबकि मधुपिङ्गल ने लज्जा और विरक्ति के कारण संयम धारण कर लिया। एक दिन गोचर के समय किसी निमित्तज्ञानी ने उसके राजलक्षणों का उल्लेख करते हुए कहा कि वह छलपूर्वक राज्य से वंचित किया गया है। यह सुनकर मधुपिङ्गल के मन में तीव्र क्रोध उत्पन्न हुआ। उसने तप का उपयोग आत्मशुद्धि के स्थान पर प्रतिशोध के लिए करने का निश्चय किया और निदान बाँध लिया कि अगले जन्म में वह सगर के सम्पूर्ण वंश का विनाश करेगा। इसी अशुभ भावना के कारण मृत्यु के पश्चात् वह महाकाल नामक असुर बना। विभंगावधिज्ञान से उसे पूर्वभव का स्मरण हुआ और उसने सगर तथा उसके मन्त्री से प्रतिशोध लेने का निश्चय किया। वह उन्हें प्रत्यक्ष मारना नहीं चाहता था, बल्कि ऐसा महापाप कराना चाहता था जिससे वे स्वयं दुर्गति को प्राप्त हों।
श्लोक 255 से 273 : वसु, पर्वत और नारद का पूर्वचरित्र
उसी समय भरतक्षेत्र के स्वस्तिकावती नगर में राजा विश्वावसु, उनके पुत्र वसु तथा विद्वान् ब्राह्मण क्षीरकदम्ब का वर्णन आता है। क्षीरकदम्ब के आश्रम में उनका पुत्र पर्वत, राजकुमार वसु और ब्राह्मणकुमार नारद साथ-साथ शिक्षा ग्रहण करते थे। तीनों विद्या में प्रवीण थे, किन्तु पर्वत स्वभाव से मन्दबुद्धि और विपरीत अर्थ ग्रहण करने वाला था। एक दिन वे अपने गुरु के साथ वन में गए, जहाँ श्रुतधर मुनिराज अपने शिष्यों को निमित्तज्ञान का उपदेश दे रहे थे। परीक्षा के रूप में उन्होंने तीनों विद्यार्थियों के भविष्य के विषय में प्रश्न किया। मुनियों ने बताया कि वसु रागवश हिंसामय धर्म का आश्रय लेकर नरक जाएगा; पर्वत महाकाल के प्रभाव से हिंसात्मक अथर्ववेद का प्रचार करेगा और अनेक लोगों को मिथ्यामार्ग में लगाएगा; जबकि नारद धर्मध्यान में स्थित होकर आगे चलकर राजा बनेगा, संयम धारण करेगा और अन्तिम अनुत्तर विमान में जन्म लेगा। यह सब सुनकर क्षीरकदम्ब अत्यन्त दुःखी हुए, किन्तु उन्होंने इसे कर्मों का परिणाम मानकर धैर्य धारण किया।
श्लोक 274 से 281 : वसु का राज्यारोहण और स्फटिक सिंहासन
एक वर्ष बाद राजा विश्वावसु राज्य अपने पुत्र वसु को सौंपकर तपोवन चले गए। वसु न्यायपूर्वक राज्य करने लगा। एक दिन वन में उसने देखा कि पक्षी आकाश में उड़ते हुए किसी अदृश्य वस्तु से टकराकर नीचे गिर रहे हैं। कारण जानने के लिए उसने बाण चलाया, जो भी उसी स्थान से टकराकर गिर पड़ा। समीप जाकर उसने देखा कि वहाँ आकाश के समान पारदर्शी एक विशाल स्फटिक स्तम्भ विद्यमान है। वह उसे अपने साथ ले आया और उसके चार पायों का एक अद्भुत सिंहासन बनवाया। उस सिंहासन पर बैठने पर ऐसा प्रतीत होता था मानो राजा वसु आकाश में विराजमान हों। प्रजा उसकी इस विलक्षण विभूति को सत्य और पुण्य के प्रभाव का फल मानकर उसकी प्रशंसा करने लगी।
श्लोक 282 से 292 : नारद की सूक्ष्म दृष्टि और पर्वत की ईर्ष्या
इधर एक दिन नारद और पर्वत वन में समिधा और पुष्प लेने गए। मार्ग में नारद ने केवल पदचिह्न देखकर बता दिया कि मयूरों के समूह में एक नर और सात मादाएँ हैं। आगे चलकर उसने हाथिनी के चिह्न देखकर कहा कि वह बाईं आँख से कानी है। जब दोनों बातें सत्य सिद्ध हुईं तो पर्वत आश्चर्यचकित होने के स्थान पर ईर्ष्या से भर गया। उसने समझा कि गुरु नारद को विशेष ज्ञान देते हैं और उससे पक्षपात करते हैं। घर पहुँचकर उसने अपनी माता से गुरु के विरुद्ध शिकायत की। माता भी पुत्र के मोह में पड़कर दुःखी हो गई और उसके मन में भी गुरु के प्रति संदेह उत्पन्न हो गया।
श्लोक 293 से 304 : नारद की युक्ति और गुरु का निष्पक्ष निर्णय
भोजन के पश्चात् ब्राह्मणी ने क्षीरकदम्ब से पर्वत की शिकायत कही। तब विद्वान् ब्राह्मण ने स्पष्ट किया कि वे सभी शिष्यों को समान रूप से शिक्षा देते हैं; अन्तर केवल ग्रहण करने की क्षमता का होता है। सत्य प्रमाणित करने के लिए उन्होंने नारद से वन की घटनाएँ बताने को कहा। नारद ने विनम्रतापूर्वक समझाया कि उसने सभी निष्कर्ष सूक्ष्म निरीक्षण और तर्क से निकाले थे। मयूर के पंखों की स्थिति, हाथिनी के पदचिह्न, टूटी हुई लताओं, मूत्र के चिह्न, स्त्री के पैरों के निशान, वस्त्र के तन्तु और अन्य संकेतों के आधार पर उसने क्रमशः हाथिनी के काने होने, उसके साथ गर्भवती स्त्री के होने तथा अन्य बातों का अनुमान किया था। उसकी बातें सुनकर क्षीरकदम्ब ने ब्राह्मणी को समझाया कि ज्ञान परिश्रम, विवेक और सूक्ष्म अवलोकन से प्राप्त होता है, पक्षपात से नहीं। इस प्रकार पर्वत की भ्रान्ति दूर करने का प्रयास किया गया और कथा में विवेक, तर्क तथा सम्यक् ज्ञान की महत्ता का प्रतिपादन किया गया।
श्लोक 305 से 321 नारद की सूक्ष्म बुद्धि एवं पर्वत की मूढ़ता का परीक्षण
क्षीरकदम्ब ब्राह्मण ने अपनी पत्नी के मन में पुत्र पर्वत और शिष्य नारद की वास्तविक योग्यता का विश्वास उत्पन्न करने के लिए दोनों की परीक्षा लेने का निश्चय किया। उन्होंने आटे के दो बकरे बनाकर दोनों को दिए और आदेश दिया कि जहाँ कोई देखने वाला न हो, वहाँ ले जाकर उनकी पूजा करें, उनके कान काटें और उन्हें वापस ले आएँ। पर्वत ने बिना किसी विचार के वन में जाकर यह मान लिया कि वहाँ कोई नहीं है। उसने दोनों कान काट दिए और प्रसन्नतापूर्वक पिता के पास लौटकर अपने कार्य की सफलता का वर्णन किया। उसके लिए गुरु की आज्ञा का बाह्य पालन ही पर्याप्त था, उसने उसके गूढ़ आशय पर विचार नहीं किया।
नारद जब वन पहुँचे तो उन्होंने गम्भीरतापूर्वक विचार किया कि संसार में ऐसा कोई स्थान नहीं जहाँ कोई देखने वाला न हो। सूर्य, चन्द्र, नक्षत्र, देवगण, वन के जीव तथा स्वयं अपनी आत्मा सब कुछ देख रहे हैं। इसलिए गुरु की आज्ञा का वास्तविक पालन करना सम्भव नहीं है। उन्होंने यह भी विचार किया कि नाम, स्थापना, द्रव्य और भाव—इन चारों दृष्टियों से किसी भी प्रकार की हिंसा उचित नहीं है। अतः उन्होंने बकरे को बिना क्षति पहुँचाए ही वापस लौटा दिया। नारद की इस सूक्ष्म दृष्टि से क्षीरकदम्ब अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने समझाया कि केवल एक पक्ष पर आधारित एकान्तवाद सत्य नहीं होता, जबकि स्याद्वाद वस्तु की यथार्थता को अनेक दृष्टियों से स्वीकार करता है। उन्होंने उदाहरण देकर कहा कि दयालु पिता से भी निर्दयी पुत्र उत्पन्न हो सकता है, इसलिए केवल कारण देखकर ही परिणाम का निर्णय नहीं किया जा सकता।
क्षीरकदम्ब ने नारद की प्रखर बुद्धि, विवेक, करुणा और तत्त्वज्ञान की प्रशंसा करते हुए उन्हें समस्त शास्त्रों का व्याख्याता और उपाध्याय पद के योग्य घोषित किया। दूसरी ओर उन्होंने पर्वत को समझाया कि केवल शास्त्र पढ़ लेने से लाभ नहीं, जब तक विवेक और धर्म का यथार्थ निर्णय न हो। परन्तु पर्वत ने इस शिक्षा को स्वीकार करने के स्थान पर नारद के प्रति और अधिक ईर्ष्या और द्वेष धारण कर लिया।
श्लोक 322 से 332 क्षीरकदम्ब का संयम ग्रहण एवं यज्ञ की वास्तविक व्याख्या
समय आने पर क्षीरकदम्ब ने संसार का परित्याग कर संयम धारण करने का निश्चय किया। उन्होंने राजा वसु से निवेदन किया कि उनके पश्चात् उनकी पत्नी और पुत्र पर्वत का यथोचित पालन किया जाए। राजा वसु ने श्रद्धापूर्वक यह उत्तर दिया कि यह कार्य तो उनका कर्तव्य है और वे इसमें कोई कमी नहीं आने देंगे। क्षीरकदम्ब ने प्रसन्न होकर दीक्षा ग्रहण की और अन्त में समाधिमरण द्वारा उत्तम स्वर्ग में उत्पन्न हुए।
पिता के पश्चात् पर्वत भी शास्त्रों का अध्यापन करने लगा, किन्तु उसकी बुद्धि का दोष यथावत् बना रहा। दूसरी ओर नारद अपनी यथार्थ व्याख्याओं और गहन ज्ञान के कारण विद्वानों में विशेष सम्मान प्राप्त करने लगे। एक अवसर पर ‘अजैर्होतव्यम्’ इस वैदिक वाक्य के अर्थ को लेकर विद्वानों में विवाद उत्पन्न हुआ। नारद ने गुरु परम्परा के अनुसार स्पष्ट किया कि ‘अज’ का अर्थ तीन वर्ष पुराना, अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति खो चुका जौ है। उसी से निर्मित पदार्थों द्वारा अग्नि में आहुति देना ही यज्ञ है। इसके विपरीत पर्वत ने ‘अज’ का अर्थ बकरा या पशु मानते हुए पशुबलि को ही यज्ञ का अंग सिद्ध करने का प्रयास किया। इस प्रकार उसने शब्द के वास्तविक अर्थ को छोड़कर हिंसा का समर्थन किया और धर्म के स्वरूप को विकृत कर दिया।
श्लोक 333 से 343 पर्वत का तिरस्कार और महाकाल से भेंट
पर्वत की हिंसापरक व्याख्या सुनकर साधु एवं विद्वान अत्यन्त दुःखी हुए। उन्होंने कहा कि यह व्यक्ति केवल ईर्ष्या और द्वेषवश धर्म का स्वरूप बिगाड़ रहा है तथा प्राणियों की हत्या को धर्म सिद्ध करना चाहता है। ऐसे व्यक्ति के साथ धर्मचर्चा करना भी उचित नहीं है। सभा में उपस्थित सभी लोगों ने पर्वत की निन्दा की और उसे समाज से बहिष्कृत कर दिया। अपमानित होकर वह वन की ओर चला गया। उसी समय पूर्वजन्म का मधुपिङ्गल असुर महाकाल ब्राह्मण का वेश धारण कर उसी वन में विचरण कर रहा था। वृद्ध, निर्बल और तपस्वी का रूप धारण करके वह अपने प्रतिशोध की पूर्ति के लिए उपयुक्त साधन खोज रहा था। उसकी सम्पूर्ण वेशभूषा छल और कपट से भरी हुई थी।
महाकाल ने पर्वत को देखा और अत्यन्त विनम्रता से उससे परिचय किया। पर्वत ने भी सरलता से अपना समस्त जीवन-वृत्तान्त उसे सुना दिया। महाकाल ने तत्काल समझ लिया कि यही व्यक्ति उसके प्रतिशोध की योजना को पूर्ण करने का सर्वोत्तम साधन बन सकता है।
श्लोक 344 से 353 महाकाल द्वारा हिंसात्मक यज्ञ का निर्माण
महाकाल ने पर्वत को विश्वास में लेते हुए स्वयं को उसके पिता का धर्मभाई बताया और उसके प्रति सहानुभूति प्रकट की। उसने कहा कि वह उसके अपमान का प्रतिशोध लेने में सहायता करेगा। इसके बाद महाकाल ने अपनी मायावी बुद्धि से अथर्ववेद के नाम पर साठ हजार नई ऋचाओं की रचना की। इन मन्त्रों में शान्ति, पुष्टि तथा अभिचार के नाम पर पशुहिंसा को धर्म सिद्ध किया गया। उसने पर्वत को यह मिथ्या शिक्षा दी कि यज्ञ में पशुओं की बलि देने से इच्छित फल तथा स्वर्ग की प्राप्ति होती है। दोनों ने मिलकर निश्चय किया कि वे अयोध्या जाकर इस नवीन हिंसात्मक यज्ञ का प्रचार करेंगे और राजा सगर को अपने प्रभाव में लेकर अपने उद्देश्य को पूरा करेंगे।
श्लोक 354 से 370 राजा सगर का मोह और हिंसात्मक यज्ञ का आरम्भ
महाकाल ने अपने असुरों को आदेश दिया कि वे सगर के राज्य में रोग और उपद्रव फैलाएँ। राज्य में संकट उत्पन्न होते ही पर्वत ने राजा सगर के सामने उपस्थित होकर दावा किया कि वह विशेष यज्ञ द्वारा इन सबका निवारण कर सकता है। उसने राजा को विश्वास दिलाया कि पशुओं की सृष्टि ही यज्ञ के लिए हुई है और उनकी बलि देने से पाप नहीं, बल्कि महान् पुण्य और स्वर्ग की प्राप्ति होती है। राजा उसके छलपूर्ण तर्कों में फँस गया और यज्ञ के लिए असंख्य पशुओं तथा अन्य सामग्री की व्यवस्था करा दी।
यज्ञ आरम्भ हुआ। महाकाल अपनी मायावी शक्ति से यज्ञ में मारे गए पशुओं को स्वर्ग जाते हुए दिखाने लगा। इससे जनता को भ्रम हो गया कि पशुबलि वास्तव में स्वर्ग का साधन है। अनेक लोग स्वयं भी यज्ञ में मरने की इच्छा करने लगे। यज्ञ की समाप्ति पर पर्वत ने राजा की आज्ञा से श्रेष्ठ अश्व और रानी सुलसा तक की आहुति दे दी। रानी के वियोग से राजा अत्यन्त दुःखी हुआ और उसके मन में पहली बार यह संशय उत्पन्न हुआ कि कहीं यह सब पाप तो नहीं है। सत्य जानने के लिए वह यतिवर मुनि के पास पहुँचा। मुनिराज ने स्पष्ट कहा कि यह सम्पूर्ण कर्म अधर्म है और इसका फल सातवें नरक की प्राप्ति है। उन्होंने यह भी कहा कि सातवें दिन वज्रपात होगा, वही इस सत्य का प्रमाण होगा। राजा ने यह बात पर्वत को बताई, परन्तु पर्वत ने मुनियों को झूठा कहकर राजा का संशय दूर करने का प्रयास किया और यज्ञ पुनः प्रारम्भ करा दिया।
श्लोक 371 से 390 तपस्वियों द्वारा अहिंसा का उपदेश
सातवें दिन महाकाल ने अपनी माया से सुलसा तथा अन्य बलि दिए गए प्राणियों को देवस्वरूप में आकाश में दिखाया। वे राजा से कहने लगे कि यज्ञ के कारण उन्हें स्वर्ग मिला है। राजा इस छल को सत्य मान बैठा और उसके मोह के कारण घोर कर्मबन्ध हुआ। तत्पश्चात् वज्रपात हुआ और राजा सगर अपने सहयोगियों सहित सातवें नरक में चला गया। बाद में महाकाल ने यही छल विश्वभू मन्त्री के साथ भी किया, जिसके परिणामस्वरूप उसने भी हिंसात्मक यज्ञ आरम्भ कर दिया। जब नारद और अन्य तपस्वियों को इसका समाचार मिला तो वे अयोध्या पहुँचे। उन्होंने मन्त्री को समझाया कि अर्थ और काम के लिए लोग हिंसा करते हैं, परन्तु धर्म के लिए कभी भी प्राणियों का वध नहीं किया जाता। प्राचीन ऋषियों ने वेद में अहिंसा को ही धर्म का मूल बताया है।
उन्होंने आग्रह किया कि कर्मबन्ध का कारण बनने वाले इस हिंसात्मक यज्ञ का तत्काल परित्याग किया जाए और वास्तविक धर्म का अनुसरण किया जाए।
श्लोक 391 से 401 नारद और पर्वत का दार्शनिक विवाद
विश्वभू मन्त्री ने प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले कथित स्वर्गफल का आधार लेकर यज्ञ का समर्थन किया। तब नारद ने स्पष्ट किया कि यह सब किसी मायावी शत्रु की रचना है, जिससे लोगों को भ्रमित किया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि यदि हिंसा धर्म मानी जाएगी तो दान, शील, तप और अहिंसा सब व्यर्थ सिद्ध हो जाएँगे। पर्वत ने अपने गुरु और ज्ञान का अभिमान करते हुए महाकाल द्वारा बताए गए मत का समर्थन किया तथा राजा वसु को निर्णायक मानने का प्रस्ताव रखा।
नारद ने यह स्वीकार किया कि राजा वसु से निर्णय कराया जा सकता है, परन्तु उन्होंने पहले ही चेतावनी दी कि यदि हिंसा को धर्म कहा जाएगा तो समस्त धर्मशास्त्रों की नींव ही नष्ट हो जाएगी।
श्लोक 402 से 411 हिंसा के विरुद्ध नारद के तर्क
नारद ने अत्यन्त तर्कपूर्ण ढंग से सिद्ध किया कि यदि हिंसा धर्म है तो शिकारी और मछुआरे भी पुण्यात्मा माने जाने चाहिए, जबकि तपस्वी और सत्याचारी अधोगति को प्राप्त होंगे। यह निष्कर्ष स्वयं असंगत है। उन्होंने कहा कि यदि पशुओं की हत्या यज्ञ में पुण्य और अन्यत्र पाप है तो यह भी अनुचित है, क्योंकि हत्या से होने वाला दुःख दोनों स्थानों पर समान है। कर्म का नियम किसी स्थान विशेष से नहीं बदलता।
उन्होंने यह भी सिद्ध किया कि यदि ब्रह्मा ने पशुओं को केवल यज्ञ के लिए बनाया है तो उनका अन्य कार्यों में उपयोग भी अनुचित होना चाहिए। साथ ही उन्होंने सृष्टिवाद की भी तार्किक समीक्षा करते हुए प्रश्न किया कि यदि ब्रह्मा नवीन सृष्टि करता है तो असम्भव वस्तुएँ क्यों नहीं बना देता, और यदि केवल प्रकट करता है तो पहले उन्हें किसने छिपा रखा था।
इस प्रकार नारद ने युक्ति, अनुभव और धर्मशास्त्र—तीनों के आधार पर हिंसात्मक यज्ञ का पूर्ण खण्डन किया।
श्लोक 412 से 426 राजा वसु को निर्णायक बनाने की तैयारी
नारद के तर्कों की सभा में व्यापक प्रशंसा हुई और यह निश्चय किया गया कि अंतिम निर्णय राजा वसु देंगे। सभी लोग उनके नगर की ओर चल पड़े। उधर पर्वत की माता ने राजा वसु को स्मरण कराया कि उसके गुरु क्षीरकदम्ब ने पर्वत को उनकी संरक्षण में छोड़ा था। उसने प्रार्थना की कि यदि पर्वत इस वाद में हार गया तो उसका जीवन संकट में पड़ जाएगा। गुरु के प्रति कृतज्ञता के कारण राजा वसु ने पहले ही वचन दे दिया कि वह पर्वत की विजय कराएगा।
अगले दिन विशाल राजसभा में राजा वसु आकाश में स्थित स्फटिक सिंहासन पर विराजमान हुए। सभा में अनेक विद्वान, मन्त्री और तपस्वी उपस्थित हुए तथा धर्म-विवाद प्रारम्भ हुआ।
श्लोक 427 से 443 राजा वसु का पतन और सत्य की विजय
राजा वसु ने बिना निष्पक्ष विचार किए पर्वत के पक्ष का समर्थन किया और कहा कि राजा सगर यज्ञ के प्रभाव से ही स्वर्ग गया है। इस प्रकार उन्होंने हिंसात्मक यज्ञ को धर्म घोषित कर दिया।
उनके असत्य भाषण के साथ ही प्रकृति में अनेक भयंकर अपशकुन प्रकट हुए। पृथ्वी फट गई, नदियाँ उलटी बहने लगीं, रक्तवर्षा होने लगी और देवताओं ने आकाश से चेतावनी दी कि धर्म का विनाश मत करो।
फिर भी राजा वसु अपने मत पर अड़े रहे। परिणामस्वरूप उनका सिंहासन पृथ्वी में धँस गया और वे अन्ततः सातवें नरक में चले गए। महाकाल ने पुनः माया रचकर लोगों को भ्रमित करने का प्रयास किया, किन्तु समाज में इस घटना को लेकर मतभेद उत्पन्न हो गया।
विश्वभू मन्त्री ने बाद में भी यज्ञ जारी रखा, जबकि अनेक विवेकी राजाओं ने इस हिंसात्मक मार्ग की निन्दा करते हुए जिनधर्म के अहिंसामय मार्ग का अनुसरण किया।
श्लोक 444 से 461 महाकाल का रहस्योद्घाटन और मिथ्यामार्ग का परिणाम
नारद के प्रयासों से धर्म की मर्यादा सुरक्षित रही। उनके सम्मान में उन्हें गिरितट नगर प्रदान किया गया। तपस्वी भी अहिंसा की रक्षा के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहे। विद्याधर दिनकरदेव ने महाकाल के यज्ञ में विघ्न डालने का प्रयास किया, परन्तु महाकाल ने जिनप्रतिमाओं की आड़ लेकर अपनी माया से उसे निष्फल कर दिया। अन्ततः यज्ञ सम्पन्न हुआ और विश्वभू तथा पर्वत दोनों मृत्यु के बाद नरकगति को प्राप्त हुए।
महाकाल ने अन्त में अपना वास्तविक परिचय देते हुए स्वीकार किया कि वह पूर्वजन्म का मधुपिङ्गल है और प्रतिशोध की भावना से उसने सम्पूर्ण हिंसात्मक यज्ञ की परम्परा चलाई। उसने अपने पाप का प्रायश्चित्त स्वीकार किया तथा कहा कि जिनेन्द्र भगवान द्वारा प्रतिपादित अहिंसा ही वास्तविक धर्म है। ग्रन्थकार बताते हैं कि मोहवश किया गया पापकर्म छोड़ देना ही वास्तविक प्रायश्चित्त है। अनेक विवेकी लोगों ने मुनियों के उपदेश से मिथ्या मार्ग स्वीकार नहीं किया, जबकि मोहग्रस्त लोग उसी हिंसात्मक मार्ग में फँसे रहे।
श्लोक 462 से 471 दशरथ की सभा और मिथ्यामार्ग का निष्कर्ष
द्वितीय मन्त्री के द्वारा सुनाई गई इस कथा की सभा में अत्यधिक प्रशंसा हुई। सेनापति महाबल ने सुझाव दिया कि अब यज्ञ-विवाद छोड़कर राम और लक्ष्मण के पराक्रम पर विचार करना चाहिए। राजा दशरथ ने पुरोहित से जनक के यज्ञ में दोनों कुमारों की सफलता के विषय में पूछा। पुरोहित ने भविष्यवाणी की कि दोनों कुमार महान् ऐश्वर्य प्राप्त करेंगे तथा भविष्य में वे आठवें बलभद्र और नारायण बनकर रावण का वध करेंगे। यह सुनकर राजा अत्यन्त प्रसन्न हुए।
अन्त में ग्रन्थकार स्पष्ट निष्कर्ष देते हैं कि महाकाल ने क्रोध और प्रतिशोधवश शास्त्रविरुद्ध हिंसात्मक यज्ञ का प्रचार किया। इसी मिथ्या मार्ग के कारण राजा वसु, पर्वत, विश्वभू और अन्य अनेक लोग नरकगति को प्राप्त हुए। जो लोग दूसरों को पापकर्म में प्रवृत्त करते हैं, उनके लिए घोर दुर्गति निश्चित है।
श्लोक 472 से 473 नारद की सिद्धि एवं पर्व का उपसंहार
राजा सगर, रानी सुलसा और विश्वभू मन्त्री मोहवश हिंसात्मक कर्मों में प्रवृत्त होकर अधोगति को प्राप्त हुए। यह उदाहरण बताता है कि यदि राजा जैसे समर्थ व्यक्ति भी विवेक खो दें तो उनका भी पतन निश्चित है। इसके विपरीत नारद ने अपने गुरु की शिक्षाओं का निष्ठापूर्वक पालन किया, शास्त्रार्थ में सत्य की स्थापना की, अहिंसा धर्म का प्रचार किया और महान् तप द्वारा जीवन को सफल बनाया। अन्ततः वे सर्वार्थसिद्धि स्वर्ग को प्राप्त हुए।
उत्तरपुराण पर्व 68 – राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन
श्लोक 1–16 : रावण के पूर्वभव और सीता के जन्म का कारण
पुरोहित राजा दशरथ को रावण के पूर्वजन्म की कथा सुनाते हैं। धातकीखण्ड द्वीप के सारसमुच्चय देश के राजा नरदेव वैराग्य लेकर तपस्या करते हैं, परन्तु निदान के कारण देवगति प्राप्त करते हैं। आगे वे सहस्रग्रीव के रूप में जन्म लेकर लंका के राजा बनते हैं और उनके वंश में पुलस्त्य तथा फिर रावण का जन्म होता है। एक दिन रावण विद्यासाधना में लीन मणिमती का अपमान कर उसकी विद्या नष्ट कर देता है। इससे क्रोधित मणिमती संकल्प करती है कि अगले जन्म में रावण की पुत्री बनकर उसी के विनाश का कारण बनेगी।
श्लोक 17–30 : सीता का परित्याग, जनक द्वारा पालन और राम को मिथिला भेजने का निर्णय
मणिमती रावण और मन्दोदरी के यहाँ कन्या रूप में जन्म लेती है। उसके जन्म के समय अशुभ निमित्त देखकर ज्योतिषी बताते हैं कि यही कन्या रावण के विनाश का कारण बनेगी। भयभीत रावण उसे त्यागने का आदेश देता है। मारीच उसे सन्दूक में रखकर मिथिला के समीप भूमि में गाड़ देता है। राजा जनक उसे प्राप्त कर उसका नाम सीता रखते हैं और रानी वसुधा के संरक्षण में उसका पालन-पोषण कराते हैं। पुरोहित बताते हैं कि रावण को सीता अथवा जनक के यज्ञ की जानकारी नहीं है, इसलिए वह वहाँ नहीं आएगा। यह सुनकर राजा दशरथ राम और लक्ष्मण को सेना सहित मिथिला भेज देते हैं।
श्लोक 31 से 42 : राम-सीता विवाह, अयोध्या आगमन और वसन्त ऋतु का वर्णन
राजा जनक आदरपूर्वक राम और लक्ष्मण का स्वागत करते हैं। यज्ञ सम्पन्न होने पर वे सीता का विवाह राम से कर देते हैं। कुछ समय मिथिला में रहने के बाद राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौटते हैं, जहाँ उनका भव्य स्वागत होता है। राम माता-पिता का आशीर्वाद लेकर सुखपूर्वक रहने लगते हैं। इसी समय वसन्त ऋतु का आगमन होता है, जो प्रकृति की शोभा बढ़ाकर प्रेमियों को आनन्द और विरहियों को अधिक व्याकुल करने वाला बताया गया है।
श्लोक 43 से 50 : वसन्त की शोभा और राम-लक्ष्मण के अन्य विवाह
वसन्त के प्रभाव से वनस्पतियाँ अंकुरित, पल्लवित और पुष्पित हो उठती हैं। चन्द्रमा की शीतल चाँदनी और सुगन्धित दक्षिण पवन सम्पूर्ण वातावरण को मनोहर बना देते हैं। इसी शुभ समय में राजा दशरथ जिनेन्द्र पूजा के उपरान्त राम का सात अन्य राजकुमारियों तथा लक्ष्मण का सोलह राजकुमारियों के साथ विवाह कराते हैं। दोनों भाई अपनी पत्नियों के साथ पुण्यफलस्वरूप प्राप्त सुख का उपभोग करते हुए एक अवसर पर काशी के शासन की इच्छा प्रकट करते हैं।
श्लोक 51 से 61 : दशरथ का उत्तर और राज्यनीति में शक्ति का विवेचन
दशरथ पहले राम और लक्ष्मण को अयोध्या छोड़कर जाने से रोकते हैं, किन्तु दोनों राजधर्म और पुरुषार्थ का महत्व बताते हैं। वे कहते हैं कि जब तक उत्साह और पुण्य साथ हों, तब तक पुरुष को उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए। इसके बाद बुद्धि के दो प्रकार तथा शक्ति के तीन प्रकार—मन्त्रशक्ति, उत्साहशक्ति और प्रभुत्वशक्ति—का विवेचन किया जाता है। साथ ही शासन में उचित योजना, सहयोग, समय, स्थान और साधनों के महत्व को स्पष्ट किया गया है।
श्लोक 62 से 71 : चार उपाय, षाड्गुण्य नीति और राजकीय आचरण
नीतिशास्त्र के अनुसार राज्य संचालन के चार उपाय—साम, दान, भेद और दण्ड—का विस्तार से वर्णन किया गया है। इनके माध्यम से राजा अपने उद्देश्यों की सिद्धि करता है। आगे सन्धि, विग्रह, आसन, यान, संश्रय और द्वैधीभाव नामक छह राजकीय नीतियों का स्वरूप एवं उपयोग समझाया गया है। इन नीतियों को राज्य की समृद्धि और विजय का आधार बताया गया है।
श्लोक 72–83 : राज्य के सात अंग, पुरुषार्थ का महत्व और राम का वाराणसी प्रस्थान
राज्य के सात प्रमुख अंग—स्वामी, मन्त्री, देश, कोश, सेना, दुर्ग और मित्र—का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि राज्य की स्थिरता इन पर निर्भर करती है। उद्योग और उत्साह को सफलता का मूल कारण बताया गया है तथा आलस्य को लक्ष्मी का शत्रु कहा गया है। दशरथ राम को राज्याभिषेक योग्य मुकुट और लक्ष्मण को युवराज पद देकर वाराणसी भेजते हैं। वहाँ दोनों भाई न्याय, दान, मर्यादा और प्रजावत्सलता से आदर्श शासन स्थापित करते हैं।
श्लोक 84–92 : रावण का वैभव और नारद का आगमन
उधर रावण त्रिखण्ड भरतक्षेत्र का स्वामी होने के अहंकार में डूबा अपने राजवैभव का प्रदर्शन कर रहा था। सामन्तों से घिरा वह सिंहासन पर अत्यन्त प्रभावशाली दिखाई देता था। उसी समय देवर्षि नारद वहाँ पहुँचते हैं। रावण उनका सम्मानपूर्वक स्वागत कर उनके आगमन का उद्देश्य पूछता है, तब नारद उससे महत्वपूर्ण समाचार कहने के लिए तैयार होते हैं।
श्लोक 93–104 : नारद द्वारा सीता का वर्णन और रावण में कामासक्ति का उदय
नारद रावण को बताते हैं कि अयोध्या के राजकुमार राम ने मिथिला में राजा जनक की अनुपम सुन्दरी पुत्री सीता से विवाह किया है। वे सीता के अद्वितीय सौन्दर्य, गुण और आकर्षण का ऐसा वर्णन करते हैं कि रावण के मन में तीव्र कामासक्ति उत्पन्न हो जाती है। अहंकार और वासना से अन्धा होकर रावण यह निश्चय करता है कि वह बलपूर्वक सीता का हरण कर उसे अपनी पत्नी बनाएगा। यही संकल्प आगे चलकर उसके विनाश का कारण बनता है।
श्लोक 105 से 123 रावण की कुटिल योजना और मारीच का परामर्श
कामासक्ति से अंधा रावण सीता-हरण का निश्चय करता है। नारद उसके अहंकार और क्रोध को भड़काते हुए राम-लक्ष्मण की बढ़ती प्रतिष्ठा का वर्णन करते हैं। रावण बल प्रयोग के स्थान पर उपाय से कार्य सिद्ध करने का विचार करता है और मंत्रियों से सलाह मांगता है। मारीच परस्त्री-हरण को महापाप, अपकीर्तिकर तथा कुलविनाशक बताकर रावण को रोकने का प्रयास करता है, परन्तु रावण उसकी बात नहीं मानता। अंततः मारीच पहले दूतिका भेजकर सीता के मन का परीक्षण करने की सलाह देता है, जिसे रावण स्वीकार कर शूर्पणखा को भेजता है।
श्लोक 124 से 132 शूर्पणखा का प्रस्थान और राम-सीता का वन-विहार
रावण की आज्ञा पाकर शूर्पणखा सीता को रावण के प्रति अनुरक्त करने के उद्देश्य से बनारस के समीप चित्रकूट वन पहुँचती है। उस समय राम और सीता वसंत ऋतु की रमणीयता का आनंद ले रहे होते हैं। एक पुष्पित लता को देखकर सीता के मन में हल्का मान उत्पन्न होता है। तब राम मधुर वचनों और प्रेमपूर्ण व्यवहार से उसे प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं तथा पुष्पों से एक-दूसरे का श्रृंगार करने की बात कहते हैं।
श्लोक 133 से 141 राम द्वारा सीता का मान-भंग
राम अत्यंत चातुर्य और प्रेम से सीता की प्रत्येक इन्द्रिय की तृप्ति का वर्णन करते हुए उसे क्रोध त्यागने के लिए प्रेरित करते हैं। उनके मधुर वचनों से सीता प्रसन्न हो जाती है और दोनों पुनः प्रेमपूर्वक विहार करते हैं। लक्ष्मण भी अपनी पत्नियों के साथ आनंदपूर्वक समय बिताते हैं। कुछ समय बाद राम प्रकृति के विविध दृश्य दिखाकर सीता का मनोरंजन करते हैं और वन-विहार का सुख बढ़ाते हैं।
श्लोक 142 से 151 जल-विहार और शूर्पणखा का आकर्षण
राम वन और सरोवर में सीता के साथ प्रेमपूर्वक जल-विहार करते हैं। भ्रमरों के सीता के मुख पर मंडराने जैसे मनोरम प्रसंगों से उनका प्रेम और प्रगाढ़ होता है। इसी समय शूर्पणखा वहाँ पहुँचकर राम और लक्ष्मण के अनुपम रूप पर मोहित हो जाती है। अशोक वृक्ष के नीचे सखियों से घिरी सीता को देखकर वह समझ जाती है कि रावण का उसके प्रति आकर्षण स्वाभाविक है।
श्लोक 152 से 163 शूर्पणखा का छल और सीता की करुणा
रूप-परिवर्तन विद्या से शूर्पणखा वृद्धा का वेश धारण कर रानियों के बीच पहुँचती है। वह उनके सौभाग्य का कारण पूछकर उनके मन की परीक्षा लेना चाहती है। रानियाँ उसकी बातों पर हँसी करती हैं, पर सीता करुणा दिखाते हुए उसे समझाती है कि स्त्री-जीवन केवल भोग का साधन नहीं है। वह उसे सांसारिक आसक्ति छोड़कर अपने वास्तविक हित पर विचार करने की प्रेरणा देती है।
श्लोक 164 से 174 सीता द्वारा स्त्रीजीवन की कठिनाइयों का विवेचन
सीता स्त्रीजीवन में आने वाले अनेक दुःखों—कुल-मर्यादा का भार, पुत्रहीनता, विधवापन, सपत्नी-दुःख, पराधीनता, गर्भ एवं प्रसूति की पीड़ा तथा सामाजिक बंधनों—का विस्तार से वर्णन करती है। वह बताती है कि स्त्रीपर्याय अनेक कष्टों से युक्त है और केवल विषय-सुख की कामना करना उचित नहीं। अंत में वह शूर्पणखा को अपने भावी कल्याण का विचार करने की प्रेरणा देती है।
श्लोक 175 से 184 सतीत्व की महिमा और शूर्पणखा की असफलता
सीता सतीत्व को स्त्री का सर्वोच्च धर्म बताते हुए कहती है कि सच्ची पतिव्रता अपने पति के अतिरिक्त किसी अन्य पुरुष की इच्छा नहीं करती। सतीत्व की शक्ति से वह बड़े से बड़े प्रलोभन और बल का भी सामना कर सकती है। इन दृढ़ वचनों से शूर्पणखा समझ जाती है कि सीता को विचलित करना असंभव है। वह रावण के पास लौटकर अपनी असफलता और सीता के अटल शील का वर्णन करती है, किन्तु रावण उसकी बातों पर विश्वास नहीं करता।
श्लोक 185 से 193 रावण का हठ और मारीच के साथ प्रस्थान
रावण शूर्पणखा को डाँटते हुए उसकी असफलता का कारण उसकी अयोग्यता बताता है। शूर्पणखा स्पष्ट करती है कि राम के वैभव, शौर्य, गुण और सीता के अटल शील के सामने किसी उपाय की सफलता संभव नहीं थी। वह कहती है कि शीलवती स्त्री का मन काम से विचलित नहीं किया जा सकता। फिर भी पापकर्म के उदय से प्रेरित रावण मारीच के साथ पुष्पक विमान पर बैठकर स्वयं सीता-हरण के लिए प्रस्थान करता है।
श्लोक 194 से 203 – मायामृग की योजना और राम का वनगमन
पुष्पक विमान से चित्रकूट पहुँचकर रावण की आज्ञा से मारीच रत्नों से बने अद्भुत हरिण का मायावी रूप धारण करता है। उस विलक्षण हरिण को देखकर सीता उसे लाने की इच्छा प्रकट करती है। सीता की इच्छा पूर्ण करने के लिए राम उसके पीछे चल पड़ते हैं। मायामृग कभी निकट आता, कभी दूर भागता और अंत में आकाश में उड़ जाता है। तब राम समझ जाते हैं कि यह मायावी मृग था, किन्तु तब तक वे सीता से दूर जा चुके होते हैं और आश्चर्य तथा असहाय भाव से वहीं ठहर जाते हैं।
श्लोक 204 से 211 : रावण द्वारा मायापूर्वक सीता का हरण और लंका आगमन
रावण ने राम का रूप धारण कर सीता को यह विश्वास दिलाया कि स्वर्णमृग पकड़ लिया गया है और संध्या होने से अब नगर लौटना उचित है। उसने पुष्पक विमान को पालकी का रूप देकर छलपूर्वक सीता को उसमें बैठा लिया और लंका ले गया। वहाँ पहुँचकर उसने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट किया, जिससे सीता भय, लज्जा और राम-विरह के कारण मूर्छित हो गई।
श्लोक 212 से 221 : सीता का अटल सतीत्व और रावण का अस्वीकार
रावण ने शीलवती सीता का स्वयं स्पर्श न कर विद्याधरियों से उनकी सेवा कराई। विद्याधरियों ने सीता को रावण की पत्नी बनने के लिए प्रेरित किया, परन्तु सीता ने स्पष्ट कहा कि शील और सद्गुण प्राणों से भी अधिक मूल्यवान हैं। उन्होंने किसी भी परिस्थिति में रावण को स्वीकार करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर दिया।
श्लोक 222 से 235 : सीता का व्रत, अशुभ उत्पात और रावण का अहंकार
सीता ने संकल्प किया कि जब तक राम की कुशल का समाचार नहीं मिलेगा, तब तक वे न बोलेंगी और न भोजन करेंगी। लंका में अनेक अशुभ उत्पात होने लगे तथा चक्ररत्न प्रकट हुआ। मंत्रियों ने रावण को सीता लौटाने और अनर्थ से बचने की सलाह दी, किन्तु रावण ने इसे अपने सौभाग्य का संकेत मानकर उनका हितकारी परामर्श अस्वीकार कर दिया।
श्लोक 236 से 252 : राम का शोक और दशरथ का संदेश
मायामृग का पीछा करते हुए राम मार्ग भूल गए और लौटने पर सीता को न पाकर अत्यन्त शोकाकुल हो गए। खोज के दौरान सीता के वस्त्र का एक अंश मिला, जिससे अपहरण का संकेत मिला। तभी दशरथ का दूत आया और स्वप्न तथा पुरोहित के कथन के आधार पर सीता-हरण का समाचार तथा राजा का पत्र राम को सौंपा।
श्लोक 253 से 262 : दशरथ का परामर्श और राम का क्रोध
दशरथ ने पत्र में लंका, रावण के स्वभाव तथा नारद द्वारा उत्पन्न परिस्थितियों का वर्णन करते हुए पहले दूत भेजकर सीता को धैर्य देने की सलाह दी। पत्र पढ़कर राम का शोक संयमित हुआ, परन्तु वे रावण के छल और अपराध पर अत्यन्त क्रोधित हो उठे तथा उसके विनाश का निश्चय किया।
श्लोक 263 से 276 : सहयोगियों का आगमन और सुग्रीव–हनुमान का परिचय
लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न और जनक ने राम को धैर्य बँधाते हुए सीता की खोज का उपाय करने के लिए प्रेरित किया। उसी समय विद्याधर कुमार सुग्रीव और अणुमान (हनुमान) उपस्थित हुए। सुग्रीव ने अपने राज्य से निष्कासन का वृत्तांत तथा अणुमान के असाधारण पराक्रम और विद्या का परिचय दिया।
श्लोक 277 से 291 : नारद की भविष्यवाणी और हनुमान का दूत बनना
सुग्रीव ने बताया कि सम्मेदशिखर पर नारद ने भविष्यवाणी की थी कि राम और लक्ष्मण महान् ऐश्वर्य प्राप्त करेंगे तथा उनके कार्य में सहयोग देने से उनका मनोरथ भी पूर्ण होगा। इस प्रेरणा से दोनों राम के पास आए। हनुमान ने स्वयं सीता की खोज हेतु दूत बनने का निवेदन किया और पहचान के लिए कोई चिह्न माँगा।
श्लोक 292 से 302 : मुद्रिका प्राप्त कर हनुमान का लंका प्रवेश
राम ने हनुमान पर पूर्ण विश्वास व्यक्त करते हुए उन्हें अपनी मुद्रिका और सीता का परिचय दिया। हनुमान लंका पहुँचे, भ्रमर का रूप धारण कर नगर, राजमहल और रावण के परिवार का निरीक्षण करते हुए सभा तक पहुँचे। रावण के वैभव को देखकर उन्होंने विचार किया कि महान् सामर्थ्य होने पर भी अधर्म और परस्त्री-लालसा ने उसे विनाश के मार्ग पर पहुँचा दिया है।
श्लोक 303 से 317 : अणुमान द्वारा सीता का दर्शन
अणुमान ने रावण की सभा में सीता को न देखकर नन्दन वन में उनकी खोज की। वहाँ उसने शिंशपा वृक्ष के नीचे शोकमग्न, पतिव्रत धर्म में अडिग बैठी सीता को पहचान लिया। सीता की दयनीय अवस्था देखकर वह व्यथित हुआ, किन्तु नीति का पालन करते हुए उचित अवसर की प्रतीक्षा करने लगा और चन्द्रमा के उदय तक धैर्यपूर्वक वहीं स्थित रहा।
श्लोक 318 से 332 : रावण का प्रलोभन और सीता की अडिग निष्ठा
सात दिन बीतने पर रावण सीता की स्थिति देखने आया। उसने अपनी दूती मञ्जरिका द्वारा वैभव, राज्य और रानी-पद का प्रलोभन दिलाया, परन्तु सीता मौन और अचल रहीं। तब रावण ने स्वयं राम को असहाय बताकर उन्हें अपनी आशा छोड़ने का आग्रह किया, किन्तु सीता का पतिव्रत और धैर्य तनिक भी विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 333 से 353 : रावण का क्रोध और मन्दोदरी का उपदेश
रावण ने सीता को धमकी देकर भी झुकाने का प्रयास किया, परन्तु उसकी सारी बातें निष्फल रहीं। क्रोधित रावण को मन्दोदरी ने समझाया कि सती स्त्री का अपमान विनाश का कारण बनता है और पूर्व उदाहरण देकर उसे मोह त्यागने की सलाह दी। रावण ने यह उपदेश स्वीकार नहीं किया और क्रोधित होकर वहाँ से चला गया। उसके बाद मन्दोदरी ने करुणा से अभिभूत होकर सीता के प्रति मातृस्नेह प्रकट किया और उन्हें अपनी पुत्री के समान मानते हुए सतीत्व की रक्षा करने का ही उपदेश दिया।
श्लोक 354 से 364 : मन्दोदरी की करुणा और अणुमान का आगमन
मन्दोदरी की करुणा और वात्सल्य देखकर सीता का हृदय भी द्रवित हो गया। मन्दोदरी ने शरीर की रक्षा के लिए आहार ग्रहण करने का आग्रह किया और स्वयं भी उपवास की बात कहकर उन्हें समझाया। इसके बाद वह दुःखी होकर लौट गई। अवसर पाकर अणुमान ने वानर रूप धारण किया, रक्षकों को निद्रित किया और सीता के सम्मुख उपस्थित हुआ।
श्लोक 365 से 382 : अणुमान का संदेश और राम की तैयारी
अणुमान ने राम का संदेश, पत्र और मुद्रिका सीता को सौंपकर अपना परिचय दिया। प्रारम्भ में सीता को संदेह हुआ, किन्तु पत्र और मुद्रिका देखकर उनका विश्वास दृढ़ हो गया। अणुमान ने उन्हें आश्वस्त किया कि राम स्वयं आकर उनका उद्धार करेंगे। सीता ने आहार ग्रहण करना स्वीकार किया और अणुमान को शीघ्र लौटने के लिए विदा किया। अणुमान ने लौटकर राम को सीता की कुशल, लङ्का की स्थिति तथा युद्ध की आवश्यक जानकारी दी। राम ने प्रसन्न होकर अणुमान को सेनापति और सुग्रीव को युवराज नियुक्त किया।
श्लोक 383 से 401 : विभीषण के माध्यम से सामोपाय का निर्णय
मन्त्री अङ्गद ने नीति के अनुसार पहले सामोपाय अपनाने की सलाह दी और अणुमान को पुनः दूत बनाकर भेजने का प्रस्ताव रखा। राम ने अणुमान को निर्देश दिया कि वे पहले विभीषण को समझाएँ और उनके माध्यम से रावण को सीता लौटाने का हितकारी संदेश पहुँचाएँ। साथ ही लङ्का की स्थिति और शत्रु की शक्ति का भी पूर्ण समाचार प्राप्त करने को कहा। अणुमान पुनः लङ्का पहुँचे, विभीषण से मिले और अत्यन्त विनयपूर्वक राम का संदेश तथा अपना निवेदन प्रस्तुत किया कि यदि रावण न माने तो उसका विनाश निश्चित है।
श्लोक 402 से 412 : विभीषण द्वारा दूत-परिचय और राम का सन्देश
विभीषण ने रावण को बताया कि रामचन्द्र की विशाल भूमिगोचरी एवं विद्याधर सेनाएँ उनके साथ आ मिली हैं और वे शीघ्र ही लङ्का पहुँचने वाले हैं। उन्होंने अणुमान् का परिचय राम के दूत के रूप में कराया। अणुमान् ने विनम्रतापूर्वक रावण का अभिवादन कर रामचन्द्र का सन्देश सुनाया कि सीता उनकी धर्मपत्नी हैं, अतः भूलवश लायी गई सीता को सम्मानपूर्वक लौटा देना ही उचित होगा।
श्लोक 413 से 422 | : अणुमान् की नीति-युक्त सलाह और रावण का अहंकार
अणुमान् ने रावण को समझाया कि परस्त्री-हरण उसके यश, धर्म और कुल-गौरव पर कलंक है तथा सीता को लौटाकर ही वह अपने सम्मान की रक्षा कर सकता है। रावण ने अहंकारपूर्वक उत्तर दिया कि समस्त रत्नों पर उसका अधिकार है और यदि राम में सामर्थ्य है तो युद्ध करके सीता को ले जाएँ। अणुमान् ने पुनः धर्म, न्याय और अपयश का स्मरण कराते हुए हितकारी सलाह दी, परन्तु रावण अपने अभिमान से विचलित नहीं हुआ।
श्लोक 423 से 435 : दूत का अपमान और युद्ध की अनिवार्यता
रावण ने जनक द्वारा बिना सूचना सीता का विवाह करने को अपना अपमान मानते हुए उसके हरण को उचित ठहराया। अणुमान् ने स्पष्ट कहा कि यह पराक्रम नहीं, चोरी है और वीरता का प्रमाण युद्ध में ही मिलेगा। रावण तथा उसके योद्धाओं ने क्रोधपूर्वक अणुमान् को ललकारा, किन्तु विभीषण ने दूत की मर्यादा की रक्षा करते हुए उसे सम्मानपूर्वक विदा किया। अणुमान् पुनः सीता से मिलकर उनकी स्थिति देखता हुआ लौटने की तैयारी करता है।
श्लोक 436 से 452 : युद्ध की तैयारी और बाली का प्रस्ताव
अणुमान् ने लौटकर रामचन्द्र को सूचित किया कि रावण किसी भी स्थिति में सीता को नहीं छोड़ेगा, इसलिए अब युद्ध ही उपाय है। वर्षा ऋतु समाप्त होने तक राम ने चित्रकूट में निवास किया। इसी बीच बाली ने दूत भेजकर स्वयं अकेले लङ्का जाकर सीता को वापस लाने का प्रस्ताव रखा। मंत्रियों से विचार-विमर्श के बाद राम ने बाली से सहयोग के स्थान पर उसका श्रेष्ठ हाथी माँगते हुए साथ चलने का संदेश भेजा, जिससे बाली अत्यन्त क्रोधित हो गया।
श्लोक 453 से 462 : बाली का विरोध और युद्ध का आरम्भ
बाली ने राम के प्रस्ताव को अपमान मानकर कटु वचन कहे और रावण के प्रति अपनाई गई नीति की आलोचना की। राम के दूत ने उत्तर दिया कि रावण को उसके अपराधानुसार दण्ड अवश्य मिलेगा तथा बाली को अहंकार त्यागकर सहयोग करना चाहिए। बाली ने युद्ध की चुनौती स्वीकार कर ली। परिणामस्वरूप लक्ष्मण के नेतृत्व में सेना खदिरवन पहुँची और दोनों पक्षों के मध्य भीषण युद्ध प्रारम्भ हो गया।
श्लोक 463 से 472 : बाली-वध और लङ्का-प्रयाण
युद्ध के अन्त में लक्ष्मण ने अपने तीक्ष्ण बाण से बाली का वध कर दिया। इसके बाद सुग्रीव को राज्य तथा अणुमान् को उनका यथोचित पद प्राप्त हुआ। रामचन्द्र किष्किन्धा पहुँचे, जहाँ विशाल सेना एकत्रित हुई। लक्ष्मण ने तप और उपासना द्वारा प्रज्ञप्ति विद्या सिद्ध की तथा सुग्रीव सहित अन्य विद्याधरों ने भी अपनी-अपनी विद्याओं की आराधना की। तत्पश्चात् विशाल भूमिगोचरी और विद्याधर सेना लङ्का विजय के लिए प्रस्थान कर गई।
श्लोक 473 से 484 : विभीषण का धर्मोपदेश
कुम्भकर्ण आदि ने भी रावण को सीता लौटाने की सलाह दी, किन्तु वह कामासक्ति के कारण नहीं माना। तब विभीषण ने स्पष्ट कहा कि परस्त्री-हरण वीरता नहीं, अधर्म और कुल-विनाश का कारण है। उन्होंने रावण को उसके व्रत, धर्म, यश, राज्य और लक्ष्मी की रक्षा के लिए सीता लौटाने का आग्रह किया तथा समझाया कि इस पाप से उसका वैभव और भाग्य दोनों नष्ट हो जाएँगे।
श्लोक 485 से 493 : पाप के परिणाम और भविष्यवाणी का स्मरण
विभीषण ने रावण को चेताया कि परस्त्री-हरण महान् पाप है, जो नरक और अपयश का कारण बनेगा। उन्होंने उसे अपने व्रत, शील, निमित्तज्ञों की भविष्यवाणी तथा चक्ररत्न के संकेतों का स्मरण कराया। साथ ही बताया कि राम आठवें बलभद्र और लक्ष्मण नौवें नारायण हैं, इसलिए उनके विरुद्ध जाना विनाश को आमंत्रित करना है। उन्होंने पुनः आग्रह किया कि सीता को सम्मानपूर्वक रामचन्द्र को सौंप देना ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
श्लोक 494 से 501: विभीषण का निष्कासन और राम की शरणागति
विभीषण के हितकारी उपदेश से रावण अत्यन्त क्रोधित हो गया। उसने आरोप लगाया कि विभीषण दूत के साथ मिलकर उसका अपमान कर रहा है और उसे राज्य से निष्कासित कर दिया। विभीषण ने समझ लिया कि रावण का विनाश निश्चित है और उसके साथ रहना भी अधर्म होगा। उन्होंने इस निष्कासन को अपने लिए शुभ अवसर मानकर लङ्का छोड़ दी और समुद्र पार कर रामचन्द्र की शरण में पहुँच गए।
श्लोक 502 से 515 अणुमान द्वारा लंका पर आक्रमण और वन-विनाश
रामचन्द्र ने विभीषण का सम्मानपूर्वक स्वागत कर उसे अपने साथ मिला लिया। समुद्र तट पर पहुँचने के बाद अणुमान ने लंका जाकर शत्रु का मानभंग करने तथा वन जलाकर रावण को युद्ध के लिए बाहर निकालने की अनुमति माँगी। आज्ञा मिलने पर उसने वानर-सेना और विद्याधरों के साथ लंका पहुँचकर वन का विनाश किया, रक्षकों को परास्त किया तथा अपनी महाज्वाल विद्या से राक्षस-सेना का दहन कर विजयी होकर लौट आया। इस बीच रामचन्द्र ने भी अपनी सेना को युद्ध के लिए तैयार कर लिया।
श्लोक 516 से 531 रावण की विद्यासिद्धि और अहंकार
विभीषण ने बताया कि रावण इस समय आदित्यपाद पर्वत पर उपवास और साधना द्वारा महाविद्याओं की सिद्धि कर रहा है, इसलिए उसकी साधना में विघ्न डालना आवश्यक है। राम की सेना ने लंका का घेरा डाल दिया तथा विद्याधर वीरों को रावण की साधना भंग करने भेजा। इन्द्रजित् ने देवताओं को युद्ध का आदेश दिया, परन्तु उन्होंने रावण का पुण्य क्षीण होने के कारण सहायता करने से असमर्थता व्यक्त कर दी। देवताओं के त्यागने पर भी रावण अपने पुरुषार्थ के अहंकार में डूबा रहा और शत्रुओं को तुच्छ समझकर युद्ध की तैयारी में नगर लौट आया।
श्लोक 532 से 542 रावण की युद्ध-तैयारी
रावण ने रणभेरी बजवाकर अपनी विशाल सेना को विभिन्न दलों में विभाजित किया और अनेक बलशाली भाइयों, पुत्रों तथा विद्याधर वीरों के साथ युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया। चक्ररत्न, ध्वजाओं, हाथियों और नगाड़ों से सुसज्जित उसकी सेना अत्यन्त भव्य और भयावह दिखाई दे रही थी। वह अहंकारपूर्वक राम और लक्ष्मण को तुच्छ बताकर उनके विनाश की घोषणा करता हुआ युद्ध के लिए अग्रसर हुआ।
श्लोक 543 से 551 राम-लक्ष्मण का धर्मपूर्वक युद्ध-प्रस्थान
रावण के आगमन का समाचार सुनकर राम और लक्ष्मण क्रोध से उद्दीप्त हुए, किन्तु युद्ध से पूर्व उन्होंने जिनेन्द्र भगवान को नमस्कार कर धर्म का स्मरण किया। दोनों भाई अपने-अपने हाथियों पर आरूढ़ होकर सुग्रीव, अणुमान तथा अन्य वीरों के साथ युद्धभूमि में पहुँचे। उन्होंने सुव्यवस्थित रूप से सेना का विभाजन किया और उनके नगाड़ों, हाथियों तथा घोड़ों की गर्जना से सम्पूर्ण रणभूमि गूँज उठी।
श्लोक 552 से 560 सेना का अद्भुत वैभव
युद्धभूमि में धनुर्धर, तलवारधारी और अनेक प्रकार के शस्त्रों से सुसज्जित वीर उत्साहपूर्वक एकत्र हुए। तीव्र गति से दौड़ते घोड़े अपने सौन्दर्य, कवच और स्वामिभक्ति से सेना की शोभा बढ़ा रहे थे। विविध देशों के उत्कृष्ट घोड़े और सुसज्जित रथ युद्ध के लिए पूर्णतः तैयार थे तथा सम्पूर्ण सेना विजय के उत्साह से भरकर आगे बढ़ रही थी।
श्लोक 561 से 575 हाथियों और रथों से सुसज्जित विशाल सेना
विशाल हाथियों, वेगवान रथों तथा विविध आयुधों से युक्त सेना का दृश्य अत्यन्त प्रभावशाली था। पर्वतों के समान विशाल हाथी, कुशल महावतों और श्रेष्ठ योद्धाओं को लेकर युद्धभूमि की ओर बढ़ रहे थे। सम्पूर्ण सेना अनुशासन, सामर्थ्य और उत्साह के साथ युद्ध के लिए अग्रसर होकर शत्रु का सामना करने हेतु तैयार हो गई।
श्लोक 576 से 585 युद्धारम्भ और बाणवर्षा
फहराती ध्वजाओं, उड़ती धूल और रणभेरी के बीच दोनों सेनाएँ आमने-सामने आ खड़ी हुईं। धूल के कारण कुछ समय तक दृश्य अस्पष्ट हो गया, किन्तु उसके शांत होते ही सेनापतियों के आदेश से दोनों पक्षों के वीरों ने घोर बाणवर्षा आरम्भ कर दी। उत्साह और पराक्रम से ओतप्रोत योद्धा अपने-अपने स्वामी के लिए पूर्ण समर्पण के साथ युद्ध करने लगे।
श्लोक 586 से 594 वीरों का कर्तव्य और घमासान संघर्ष
योद्धाओं ने युद्ध को अपने कर्तव्य, यश और श्रेष्ठ गति का साधन मानकर प्राणों की परवाह किए बिना संघर्ष किया। दोनों पक्षों से छोड़े गए तीक्ष्ण बाणों ने असंख्य वीरों का संहार किया। अनेक विद्याधर और योद्धा परस्पर भीषण युद्ध में लिप्त होकर अपने प्राणों का उत्सर्ग करते हुए अद्भुत शौर्य का परिचय देने लगे।
श्लोक 595 से 604 रणभूमि का भीषण दृश्य और रामसेना की बढ़त
युद्ध अत्यन्त उग्र हो गया। असंख्य हाथी, रथ और वीर बाणों से घायल होकर धराशायी हुए तथा रणभूमि रक्तरंजित हो उठी। मृत शरीरों, विच्छिन्न अंगों और भयावह वातावरण के बीच भी वीर युद्धरत रहे। अन्ततः रामचन्द्र की सेना ने अपने पराक्रम और संगठन के बल पर रावण की सेना को पीछे हटने पर विवश कर दिया और युद्ध में स्पष्ट बढ़त प्राप्त की।
श्लोक 605 से 622: युद्ध की भीषणता, रावण की माया और मायायुद्ध का आरम्भ
युद्धभूमि में असंख्य योद्धा, हाथी, घोड़े और रथ नष्ट होकर बिखरे पड़े थे। अनेक दिनों तक चले युद्ध में जब रावण अपनी सेना को पराजित होता देख निराश हुआ, तब उसने माया से सीता का कटा हुआ मस्तक प्रकट कर राम को शोकाकुल करने का प्रयास किया। विभीषण ने इसे रावण की मायावी चाल बताकर राम का भ्रम दूर किया। इसके बाद रावण आकाश में जाकर मायायुद्ध करने लगा, जिसके प्रत्युत्तर में राम, लक्ष्मण तथा उनके प्रमुख सहयोगी भी अपनी-अपनी विद्याओं के प्रभाव से आकाशमार्ग में विभिन्न राक्षस वीरों से युद्ध करने लगे।
श्लोक 623 से 631 : लक्ष्मण द्वारा रावण-वध
जब राम रावण पर भारी पड़ने लगे, तब इन्द्रजित् बीच में आया, किन्तु राम ने उसे परास्त कर दिया। इसके बाद लक्ष्मण ने रावण का सामना किया। रावण ने मायावी अस्त्रों से लक्ष्मण को घेर लिया, परन्तु लक्ष्मण अपनी विद्या के प्रभाव से मुक्त हो गए। उसी समय चक्ररत्न उनके अधिकार में आया और उन्होंने उसी से रावण का मस्तक काटकर उसका वध कर दिया। रावण अपने पापकर्मों के कारण नरकगति को प्राप्त हुआ तथा लक्ष्मण ने विजयशंख बजाकर शत्रुओं को अभय प्रदान किया।
श्लोक 632 से 641 : विभीषण का राज्याभिषेक और राम-सीता मिलन
रावण के पतन के बाद उसके मंत्री तथा शेष प्रमुखजन राम और लक्ष्मण की शरण में आ गए। दोनों भाइयों ने विभीषण को लंका का राजा बनाकर समस्त राजवैभव सौंप दिया। विभीषण, सुग्रीव और हनुमान अशोकवाटिका जाकर सीता को विजय का समाचार सुनाते हैं और उन्हें आदरपूर्वक राम के पास ले आते हैं। दीर्घ विरह के बाद राम और सीता का हर्षपूर्ण मिलन होता है तथा वे एक-दूसरे से अपने वियोगकाल के समस्त वृत्तांत सुनाते हैं।
श्लोक 642 से 651 : सीता की स्वीकृति और विजय के उपरान्त दिग्विजय का प्रारम्भ
राम ने विचारपूर्वक यह स्वीकार किया कि दोष केवल रावण का था, सीता पूर्णतः निष्कलंक हैं। इसके बाद दोनों भाई सुन्दरपीठ पर्वत पर पहुँचे, जहाँ देवों और विद्याधरों ने उनका भव्य अभिषेक किया। यक्ष सुनन्द ने लक्ष्मण को सौनन्दक तलवार भेंट की। आगे चलकर गंगाद्वार और समुद्रतट पर लक्ष्मण ने मागध देव तथा वैजयन्त गोपुर के वरतनु देव को वश में कर उनसे बहुमूल्य उपहार प्राप्त किए।
श्लोक 652 से 661 : लक्ष्मण की दिग्विजय और अयोध्या प्रवेश
लक्ष्मण ने पश्चिम दिशा में प्रभास देव को वश में कर अनेक दिव्य रत्न प्राप्त किए। इसके पश्चात् उन्होंने पश्चिम और पूर्व के म्लेच्छ प्रदेशों तथा विजयार्ध पर्वत के निवासियों को अधीन कर अनेक राजाओं, विद्याधरों और देवों को अपनी आज्ञा का पालन करने वाला बनाया। बयालीस वर्षों में उनकी दिग्विजय पूर्ण हुई और वे चक्ररत्न के साथ विजयी होकर राम के अग्रगामी रूप में अयोध्या लौटे।
श्लोक 662 से 672 : साम्राज्याभिषेक और राज्यवैभव
शुभ मुहूर्त में देव, मनुष्य और विद्याधरों ने राम और लक्ष्मण का एक साथ सहस्र आठ सुवर्ण कलशों से अभिषेक कर उन्हें तीन खण्डों का सम्राट बनाया। दोनों भाइयों को विशाल साम्राज्य, असंख्य रानियाँ, नगर, ग्राम, हाथी, घोड़े, रथ, सैनिक तथा देव-सेवकों सहित अनुपम ऐश्वर्य प्राप्त हुआ। उनका राज्य वैभव, समृद्धि और शक्ति से परिपूर्ण था।
श्लोक 673 से 681 : महारत्न और धर्मोपदेश की प्राप्ति
राम और लक्ष्मण अपने-अपने दिव्य महारत्नों से विभूषित होकर सुखपूर्वक राज्य करते रहे। एक समय शिवगुप्त जिनेन्द्र मनोहर उद्यान में पधारे। राम और लक्ष्मण ने उनकी विनयपूर्वक पूजा कर धर्म का स्वरूप जानना चाहा। तब जिनेन्द्र ने जीव, कर्म, मोक्ष तथा अनेक तत्त्वों का गूढ़ उपदेश देना आरम्भ किया।
श्लोक 682 से 691 : श्रावकधर्म, लक्ष्मण का निदान और वाराणसी गमन
शिवगुप्त जिनेन्द्र के उपदेश से राम सहित अनेक लोगों ने श्रावक धर्म के व्रत ग्रहण किए। किन्तु भोगासक्ति और निदान शल्य के कारण लक्ष्मण सम्यग्दर्शन ग्रहण नहीं कर सके और उन्होंने नरकायु का बन्ध कर लिया। कुछ समय बाद दोनों भाइयों ने राज्य भरत और शत्रुघ्न को सौंपकर वाराणसी में निवास किया। वहाँ उनके पुत्र उत्पन्न हुए और वे परिवार सहित सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे।
श्लोक 692 से 701 : लक्ष्मण के अशुभ स्वप्न और मृत्यु
लक्ष्मण ने तीन अशुभ स्वप्न देखे, जिनका अर्थ पुरोहित ने रोग, आयु-क्षय और वैराग्य के रूप में बताया। राम ने धैर्यपूर्वक यह सुनकर प्रजा में अहिंसा की घोषणा कराई, जिनपूजा की तथा व्यापक दान दिया। कुछ समय बाद लक्ष्मण असाध्य रोग से ग्रस्त हुए और माघ कृष्ण अमावस्या के दिन देह त्यागकर चौथे नरक में उत्पन्न हुए।
श्लोक 702 से 711 : राम का वैराग्य और दीक्षा
लक्ष्मण की मृत्यु से राम अत्यन्त शोकाकुल हुए, परन्तु ज्ञान के बल से स्वयं को स्थिर कर उन्होंने उनका अंतिम संस्कार कराया। तत्पश्चात् लक्ष्मण के पुत्र को राज्य सौंप दिया तथा अपने पुत्रों में से अजितञ्जय को उत्तराधिकारी बनाकर स्वयं संसार से विरक्त हो गए। शिवगुप्त केवली से मोक्षमार्ग का उपदेश सुनकर तथा लक्ष्मण की नरकगति का कारण जानकर राम ने सुग्रीव, हनुमान, विभीषण और अनेक राजाओं के साथ संयम एवं मुनि दीक्षा धारण कर ली।
श्लोक 712 से 721 | : राम का केवलज्ञान और मोक्ष
सीता तथा अनेक रानियों ने भी आर्यिका दीक्षा ग्रहण की। राम और हनुमान ने कठोर साधना कर श्रुतकेवली पद प्राप्त किया। दीर्घकालीन तप और शुक्लध्यान से राम को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। छह सौ वर्ष तक धर्मोपदेश देने के पश्चात् उन्होंने सम्मेदशिखर पर अंतिम शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मों का क्षय कर हनुमान आदि के साथ सिद्धपद प्राप्त किया। विभीषण आदि अनेक मुनि उच्च देवगति को तथा सीता आदि आर्यिकाएँ अच्युत स्वर्ग को प्राप्त हुईं।
श्लोक 722 से 732 : उपसंहार, पूर्वभव और शिक्षा
अन्य रानियाँ प्रथम स्वर्ग में उत्पन्न हुईं तथा लक्ष्मण भविष्य में नरक से निकलकर क्रमशः संयम धारण कर मोक्ष प्राप्त करेंगे। ग्रंथ में राम और लक्ष्मण के जीवन का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया गया है कि समान वैभव के उपभोग के बाद भी भिन्न भावों के कारण राम सिद्धपद को और लक्ष्मण नरकगति को प्राप्त हुए। इसके पश्चात् रावण, लक्ष्मण, सीता और राम के पूर्वभवों का वर्णन किया गया है तथा अंत में यह शिक्षा दी गई है कि निदान (भोगों की आकांक्षा) आध्यात्मिक पतन का कारण है, इसलिए विवेकी पुरुष को उससे सदैव दूर रहना चाहिए। यही इस पर्व का प्रमुख नैतिक संदेश है।
उत्तरपुराण पर्व 69 – नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : राजा पार्थिव का वैराग्य और सिद्धार्थ का राज्यारोहण
वत्स देश की कौशाम्बी नगरी में राजा पार्थिव राज्य करते थे। मुनिवर मुनि से धर्म का यथार्थ स्वरूप सुनकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ और वैराग्य उत्पन्न हो गया। उन्होंने समझा कि रत्नत्रय ही मृत्यु और दुःखों से मुक्ति का साधन है। इसलिए उन्होंने पुत्र सिद्धार्थ को राज्य सौंपकर जिनदीक्षा ग्रहण कर ली। सिद्धार्थ ने सम्यग्दर्शन और अणुव्रतों को धारण कर धर्मपूर्वक राज्य का संचालन किया।
श्लोक 12 से 21 : सिद्धार्थ का संयम और तीर्थंकर-नामकर्म का बंध
पिता पार्थिव मुनि के समाधिमरण का समाचार सुनकर सिद्धार्थ के मन में भी वैराग्य जागृत हुआ। उन्होंने महाबल केवली से तत्त्वज्ञान प्राप्त किया, पुत्र श्रीदत्त को राज्य देकर संयम धारण किया और क्षायिक सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। सोलह कारण भावनाओं के प्रभाव से उन्होंने तीर्थंकर-नामकर्म का बंध किया। समाधिमरण के पश्चात वे अपराजित अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 22 से 31 : विजय राजा के यहाँ भगवान नमिनाथ का गर्भ और जन्म कल्याणक
अपराजित विमान से च्युत होकर वह जीव वंगदेश की मिथिला नगरी में राजा विजय और रानी वप्पिला के यहाँ अवतरित हुआ। विजय के राज्य में धर्म, सुख और समृद्धि का साम्राज्य था। रानी वप्पिला ने तीर्थंकर गर्भ के सूचक सोलह स्वप्न देखे और राजा ने उनके गर्भ में भावी तीर्थंकर के आगमन की घोषणा की। देवों ने गर्भकल्याणक मनाया। आषाढ़ कृष्ण दशमी को भगवान नमिनाथ का जन्म हुआ और देवों ने जन्मकल्याणक उत्सव संपन्न किया।
श्लोक 32 से 41: नमिनाथ का राज्यकाल और देवों द्वारा भविष्यवाणी
भगवान नमिनाथ का जन्म मुनिसुव्रतनाथ की तीर्थपरम्परा में हुआ। उन्होंने युवावस्था में राज्य प्राप्त कर दीर्घकाल तक शासन किया। वन-विहार के समय दो देवकुमारों ने आकर उन्हें पूर्व विदेह क्षेत्र के तीर्थंकर अपराजित भगवान के समवसरण में हुई चर्चा सुनाई, जिसमें उन्हें भरतक्षेत्र के भावी तीर्थंकर के रूप में घोषित किया गया था। यह सुनकर भगवान के अंतःकरण में वैराग्य की भावना और प्रबल हुई।
श्लोक 42 से 51: संसार की नश्वरता का चिंतन और वैराग्य
देवकुमारों की बात सुनकर नमिनाथ ने अपने पूर्वभवों और संसार के दुःखों का गंभीर चिंतन किया। उन्होंने अनुभव किया कि आत्मा कर्मबंधनों से बंधकर शरीररूपी कारागार में दुःख भोग रही है और मोहवश विषयों में आसक्त बनी रहती है। जीव दुःखों से बचना चाहता है, पर उन्हीं के कारणों का संचय करता है। इस प्रकार गहन आत्मचिंतन से उनके भीतर प्रबल वैराग्य उत्पन्न हुआ और लौकान्तिक देवों ने उनकी पूजा की।
श्लोक 52 से 65 : दीक्षा, केवलज्ञान और धर्मसंघ की स्थापना
रत्नत्रय की प्राप्ति के बाद भगवान ने पुत्र सुप्रभ को राज्य सौंप दिया। आषाढ़ कृष्ण दशमी को एक हजार राजाओं के साथ उन्होंने दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया। वीरपुर में राजा दत्त ने उन्हें प्रथम आहार दिया। नौ वर्ष की साधना के बाद बकुल वृक्ष के नीचे ध्यान करते हुए उन्हें केवलज्ञान प्राप्त हुआ। उनके तीर्थ में सत्रह गणधर, बीस हजार मुनि, पैंतालीस हजार आर्यिकाएँ, एक लाख श्रावक और तीन लाख श्राविकाएँ थीं। इस प्रकार उनका विशाल धर्मसंघ स्थापित हुआ।
श्लोक 66 से 82 : मोक्ष, स्तुति और जयसेन चक्रवर्ती का पूर्वचरित
भगवान नमिनाथ ने धर्मोपदेश देते हुए विहार किया और आयु के अंतिम माह में सम्मेदशिखर पर पहुँचकर एक हजार मुनियों सहित प्रतिमायोग धारण किया। वैशाख कृष्ण चतुर्दशी को उन्होंने मोक्ष प्राप्त किया और देवों ने निर्वाणकल्याणक मनाया। इसके बाद जयसेन चक्रवर्ती के पूर्वभव का वर्णन आरम्भ होता है। पूर्व जन्म में वसुन्धर राजा ने वैराग्य ग्रहण कर संयम धारण किया, तप किया और महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे कौशाम्बी के राजा विजय के पुत्र जयसेन बने, जो ग्यारहवें चक्रवर्ती हुए।
श्लोक 83 से 92: जयसेन का वैराग्य, संयम और अहमिन्द्र पद
एक दिन जयसेन ने आकाश में उल्कापात देखा। उससे उन्हें संसार की अनित्यता और वैभव की क्षणभंगुरता का बोध हुआ। उन्होंने विचार किया कि जो मनुष्य परलोक-साधना छोड़कर विषयों में आसक्त रहता है, वह अंततः पतन को प्राप्त होता है। अतः उन्होंने साम्राज्य त्यागकर छोटे पुत्र को राज्य सौंपा और वरदत्त केवली से दीक्षा ग्रहण कर ली। तप और साधना से अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कर उन्होंने सम्मेदशिखर पर संन्यासपूर्वक आराधना की तथा अंत में जयन्त अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव के रूप में उत्पन्न हुए। इस प्रकार जयसेन चक्रवर्ती के चार भवों का वर्णन पूर्ण होता है।
उत्तरपुराण पर्व 70 – नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन
श्लोक 1 से 11 अपराजित का जन्म और बाल्यकाल
सिंहपुर नगर के राजा अर्हद्दास और रानी जिनदत्ता ने अष्टाह्निका महापूजा के पश्चात् पुत्र-प्राप्ति की कामना की। उसी रात्रि रानी ने पाँच शुभ स्वप्न देखे और एक पुण्यात्मा जीव उनके गर्भ में अवतीर्ण हुआ। नौ माह बाद एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ जिसका नाम अपराजित रखा गया, क्योंकि उसके जन्म के बाद राजा शत्रुओं द्वारा अजेय हो गया था। अपराजित रूप, गुण और वैभव से युक्त होकर युवावस्था में इन्द्र के समान शोभायमान हुआ।
श्लोक 12 से 21 विमलवाहन तीर्थंकर के प्रति भक्ति
राजा अर्हद्दास ने विमलवाहन तीर्थंकर के दर्शन कर वैराग्य ग्रहण किया और राज्य पुत्र अपराजित को सौंप दिया। अपराजित ने श्रावक धर्म स्वीकार कर धर्मपूर्वक राज्य संचालन किया। जब उसे ज्ञात हुआ कि विमलवाहन भगवान मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं, तब उसने उनके दर्शन के बिना भोजन न करने का संकल्प लिया। आठ दिन उपवास के बाद यक्ष ने उसे भगवान का दिव्य दर्शन कराया। पूजा-वंदना करने के पश्चात् उसका संकल्प पूर्ण हुआ और उसने भोजन ग्रहण किया।
श्लोक 22 से 31 चारण ऋद्धिधारी मुनियों का आगमन और पूर्वजन्म का परिचय
अष्टाह्निका पर्व में अपराजित जिनपूजा कर धर्मोपदेश दे रहा था तभी दो चारण ऋद्धिधारी मुनि वहाँ आए। राजा ने विनयपूर्वक उनका सम्मान किया। मुनियों ने बताया कि पूर्वजन्म में वे तीन भाई थे—चिन्तागति, मनोगति और चपलगति। उसी प्रदेश में अरिञ्जय राजा की पुत्री प्रीतिमती रहती थी, जिसने अपनी विद्या से अनेक विद्याधरों को पराजित किया था।
श्लोक 32 से 43 वैराग्य, दीक्षा और पुनर्जन्म का वृत्तांत
प्रीतिमती ने केवल विजेता को ही पति स्वीकार करने का निश्चय किया। चिन्तागति के वचनों से उसे वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने आर्यिका दीक्षा धारण कर ली। उसके प्रभाव से अनेक लोग विरक्त हुए। चिन्तागति और उसके दोनों भाइयों ने भी संयम ग्रहण किया तथा चौथे स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से आयु पूर्ण कर दोनों छोटे भाई अमितमति और अमिततेज के रूप में जन्मे। स्वयंप्रभ तीर्थंकर से उन्हें अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान हुआ और उन्होंने जाना कि उनका बड़ा भाई सिंहपुर में अपराजित राजा के रूप में जन्मा है।
श्लोक 44 से 52 अपराजित का संन्यास और स्वर्गगमन
दोनों मुनियों ने अपराजित को बताया कि उसकी आयु केवल एक माह शेष है, अतः आत्मकल्याण का विचार करे। राजा ने उनका आभार व्यक्त किया, राज्य पुत्र प्रीतिकर को सौंप दिया, अष्टाह्निका पूजा सम्पन्न की और प्रायोपगमन संन्यास धारण कर लिया। संन्यास के प्रभाव से वह सोलहवें स्वर्ग के अच्युतेन्द्र पद को प्राप्त हुआ। वहाँ से च्युत होकर हस्तिनापुर में राजा श्रीचन्द्र और रानी श्रीमती के पुत्र सुप्रतिष्ठ के रूप में जन्मा।
श्लोक 53 से 61 सुप्रतिष्ठ का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म का बंध
राजा श्रीचन्द्र ने राज्य सुप्रतिष्ठ को सौंपकर दीक्षा धारण कर ली। सुप्रतिष्ठ ने धर्मपूर्वक राज्य किया और यशोधर मुनि को आहारदान देकर महान पुण्य अर्जित किया। एक दिन उल्कापात देखकर उसे संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उसने पुत्र सुदृष्टि को राज्य देकर संयम ग्रहण किया। ग्यारह अंगों का अध्ययन तथा सोलह कारण भावनाओं का चिंतन करके उसने तीर्थंकर नामकर्म का बंध किया। समाधिपूर्वक मृत्यु के बाद वह जयन्त अनुत्तर विमान में अहमिन्द्र देव हुआ।
श्लोक 62 से 71 वीरदत्त का वैराग्य
अहमिन्द्र देव रूप में दीर्घकाल तक दिव्य सुख भोगने के पश्चात् आगे उसके वंश का वर्णन किया गया। कौशाम्बी में सुमुख नामक धनवान सेठ रहता था। कलिंग देश का वैश्य वीरदत्त अपनी पत्नी वनमाला सहित वहाँ आकर रहने लगा। सुमुख वनमाला पर मोहित हो गया और छलपूर्वक वीरदत्त को व्यापार हेतु दूर भेजकर वनमाला को अपने पास रख लिया। बारह वर्ष बाद लौटकर जब वीरदत्त ने यह स्थिति देखी, तब संसार की दुःखमयता का विचार कर उसने प्रोष्ठिल मुनि के पास दीक्षा ग्रहण कर ली।
श्लोक 72 से 83 चित्रांगद देव और सिंहकेतु–विद्युन्माला की रक्षा
वीरदत्त संन्यास-मरण कर सौधर्म स्वर्ग में चित्रांगद देव हुआ। दूसरी ओर सुमुख और वनमाला ने पश्चात्तापपूर्वक धर्मसिंह मुनि को आहारदान दिया, किन्तु अगले ही दिन वज्रपात से उनकी मृत्यु हो गई। पुनर्जन्म में सुमुख सिंहकेतु और वनमाला विद्युन्माला के रूप में उत्पन्न हुए। चित्रांगद देव ने पूर्व वैर के कारण उन्हें मारने का विचार किया, परन्तु सूर्यप्रभ देव ने उसे समझाकर ऐसा करने से रोक दिया। अंततः दोनों को सुरक्षित रूप से चम्पापुर के वन में पहुँचा दिया गया।
श्लोक 84 से 94 माकण्डेय का राज्यारोहण और हरिवंश की परंपरा
चम्पापुर का राजा पुत्रहीन मर गया था। योग्य उत्तराधिकारी की खोज के लिए शुभलक्षणयुक्त हाथी छोड़ा गया। वह हाथी सिंहकेतु और विद्युन्माला को अपने ऊपर बैठाकर नगर ले आया। मंत्रियों ने सिंहकेतु का राज्याभिषेक किया। उसके माता-पिता के नाम जानकर लोगों ने उसका नाम माकण्डेय रखा। माकण्डेय ने दीर्घकाल तक राज्य किया। उसके वंश में अनेक राजा हुए और अंततः शौर्यपुर के पराक्रमी राजा शूरसेन का जन्म हुआ। शूरसेन के पुत्र वीर और उसकी पत्नी धारिणी से अन्धकवृष्टि तथा नरवृष्टि नामक दो पुत्र उत्पन्न हुए।
श्लोक 95 से 111 यदुवंश, कौरव वंश और कर्ण का जन्म
अन्धकवृष्टि और सुभद्रा से समुद्रविजय, वसुदेव आदि दस पुत्र तथा कुन्ती और माद्री नामक दो पुत्रियाँ उत्पन्न हुईं। नरवृष्टि से उग्रसेन, देवसेन और महासेन नामक पुत्र हुए। दूसरी ओर कौरव वंश में पराशर, व्यास, धृतराष्ट्र, पाण्डु और विदुर की वंशपरम्परा का वर्णन किया गया। एक विद्याधर की चमत्कारी अंगूठी पाण्डु को प्राप्त हुई, जिससे वे इच्छानुसार अदृश्य हो सकते थे। उसी अंगूठी के प्रभाव से कुन्ती के साथ उनके संसर्ग से कर्ण का जन्म हुआ। लोकलज्जा के कारण नवजात कर्ण को कुण्डल और कवच सहित एक संदूक में रखकर यमुना नदी के प्रवाह में बहा दिया गया।
श्लोक 112 से 124 पाण्डवों का जन्म और सुप्रतिष्ठ का केवलज्ञान
कर्ण के पालन-पोषण के बाद पाण्डु का कुन्ती और माद्री के साथ विधिपूर्वक विवाह हुआ। कुन्ती से युधिष्ठिर, भीमसेन और अर्जुन उत्पन्न हुए, जो धर्म, अर्थ और काम के समान श्रेष्ठ माने गए। माद्री से सहदेव और नकुल का जन्म हुआ। धृतराष्ट्र और गांधारी से दुर्योधन सहित सौ पराक्रमी पुत्र उत्पन्न हुए। इसी समय गन्धमादन पर्वत पर सुप्रतिष्ठ मुनिराज विराजमान हुए। राजा शूरवीर ने उनके उपदेश से वैराग्य प्राप्त कर राज्य अन्धकवृष्टि को सौंप दिया और स्वयं संयम धारण कर लिया। बारह वर्ष बाद सुप्रतिष्ठ मुनि ने घोर उपसर्ग सहकर घातिया कर्मों का क्षय किया और केवलज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 125 से 131 सूरदत्त और सुदत्त की लोभजनित भूल
अन्धकवृष्टि के प्रश्न पर सुप्रतिष्ठ भगवान् ने बताया कि कलिंग देश के काञ्चीपुर में सूरदत्त और सुदत्त नामक दो वैश्य भाई रहते थे। उन्होंने विदेशों से बहुत धन कमाया, किन्तु कर देने के भय से उसे नगर के बाहर गाड़ दिया। अगले दिन एक व्यक्ति को वह धन मिल गया और वह उसे लेकर चला गया। जब दोनों भाइयों ने अपना धन नहीं पाया, तब वे एक-दूसरे पर चोरी का आरोप लगाकर वैरभाव में पड़ गए।
श्लोक 132 से 144 वैर के दुष्परिणाम और सुप्रतिष्ठ का पूर्वभव
धन के मोह और क्रोध से दोनों भाइयों ने परस्पर युद्ध कर प्राण त्याग दिए तथा नरकगति को प्राप्त हुए। वहाँ से निकलकर वे अनेक जन्मों में मेढ़े, बैल और वानर बने, किन्तु प्रत्येक जन्म में पूर्व वैर के कारण संघर्ष करते रहे। वानर योनि में एक वानर ने चारण ऋद्धिधारी मुनियों से नमोकार मंत्र सुना और शुभ परिणामों से सौधर्म स्वर्ग में चित्रांगद देव बना। बाद में वही जीव पोदनपुर के राजा सुस्थित के पुत्र सुप्रतिष्ठ के रूप में जन्मा। पूर्वजन्म का स्मरण होने पर उसने दीक्षा ग्रहण की। उसका पूर्वभव का भाई सुदत्त आगे चलकर सुदर्शन देव बना और पूर्व वैर के कारण उसने सुप्रतिष्ठ पर उपसर्ग किया था। यह जानकर सुदर्शन देव ने वैर त्याग दिया और धर्म का आश्रय लिया।
श्लोक 145 से 153 धर्मशील सेठ और विश्वासघाती मित्र
अन्धकवृष्टि ने अपने पूर्वभव का वृत्तांत जानना चाहा। तब सुप्रतिष्ठ भगवान् ने बताया कि अयोध्या में सुरेन्द्रदत्त नामक धर्मशील सेठ रहता था, जो नियमित रूप से जिनपूजा, दान, शील और उपवास करता था। व्यापार के लिए विदेश जाते समय उसने बारह वर्षों की पूजा हेतु आवश्यक धन अपने मित्र रुद्रदत्त ब्राह्मण को सौंप दिया। किन्तु रुद्रदत्त ने उस धन को परस्त्रीगमन, जुआ और अन्य दुर्व्यसनों में नष्ट कर दिया।
श्लोक 154 से 164 रुद्रदत्त का पतन और दुःखद पुनर्जन्म
धन समाप्त होने पर रुद्रदत्त चोरी में प्रवृत्त हो गया। पकड़े जाने पर उसे नगर से निकाल दिया गया, परन्तु उसने दुष्कर्म नहीं छोड़ा। मृत्यु के बाद वह अनेक बार नरक, मछली, सिंह, सर्प, व्याघ्र, गरुड़ और भील आदि योनियों में जन्म लेकर घोर दुःख भोगता रहा। अंततः हस्तिनापुर में कपिष्टल गोत्र के ब्राह्मण के घर गौतम नामक अत्यन्त दरिद्र और दुःखी पुत्र के रूप में जन्मा। उसका जीवन भूख, अभाव, रोग और अपमान से भरा हुआ था।
श्लोक 165 से 181 गौतम का उद्धार और अन्धकवृष्टि का पूर्वभव
गौतम भिक्षा के लिए भटकता रहता था और अत्यन्त दीन अवस्था में जीवन व्यतीत कर रहा था। एक दिन उसे समुद्रसेन मुनिराज के पीछे चलने का अवसर मिला। वैश्रवण सेठ ने उसे भोजन कराया। उसके मन में वैराग्य जागा और उसने मुनिराज से दीक्षा की प्रार्थना की। परीक्षण के बाद उसे संयम प्रदान किया गया। एक वर्ष में उसने उत्कृष्ट आध्यात्मिक प्रगति प्राप्त की और अंत में समाधिमरण कर उच्च स्वर्ग में अहमिन्द्र देव हुआ। वहीं से च्युत होकर वह वर्तमान जन्म में अन्धकवृष्टि राजा बना। यह सुनकर अन्धकवृष्टि ने अपने पुत्रों के पूर्वभव का विवरण पूछना आरम्भ किया।
श्लोक 182 से 202 अन्धकवृष्टि के पुत्रों और पुत्रियों का पूर्वजन्म
भगवान् ने बताया कि भद्रिलपुर नगर में मेघरथ राजा और धनदत्त सेठ रहते थे। धनदत्त के नौ पुत्र और दो पुत्रियाँ थीं। मन्दिरस्थविर मुनि के उपदेश से राजा मेघरथ, धनदत्त तथा उनका परिवार वैराग्य को प्राप्त हुआ और सभी ने संयम धारण कर लिया। क्रमशः वे सब केवलज्ञान प्राप्त कर सिद्ध पद को प्राप्त हुए। धनदत्त की पत्नी नन्दयशा ने निदान किया कि अगले जन्म में भी यही पुत्र-पुत्रियाँ उसे प्राप्त हों। उसी भाव के कारण वह स्वर्ग से च्युत होकर अन्धकवृष्टि की रानी सुभद्रा बनी। उसके पूर्वजन्म के पुत्र ही वर्तमान जन्म में समुद्रविजय, वसुदेव आदि पुत्र बने तथा दोनों पुत्रियाँ प्रसिद्ध कुन्ती और माद्री बनीं। इसके बाद अन्धकवृष्टि ने विशेष रूप से वसुदेव की भवावली पूछी।
श्लोक 203 से 211 वसुदेव का पूर्वभव और महान भविष्य
भगवान् ने बताया कि कुरुदेश के पलाशकूट ग्राम में नन्दी नामक एक निर्धन ब्राह्मण-पुत्र रहता था। वह अपने मामा की पुत्रियों से विवाह करना चाहता था, परन्तु उसे सफलता नहीं मिली। इस कारण वह अत्यन्त दुःखी हो गया। एक दिन अपमान और निराशा से व्यथित होकर वह पर्वत से कूदकर आत्महत्या करने का विचार करने लगा। उसी समय द्रुमषेण मुनि के शिष्यों ने उसे समझाया कि तप और धर्म से ही वास्तविक सौभाग्य प्राप्त होता है। उनके उपदेश से नन्दी ने संयम और तप का मार्ग ग्रहण किया। तप के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ और वहाँ से च्युत होकर वर्तमान जन्म में वसुदेव के रूप में उत्पन्न हुआ। भगवान् ने घोषणा की कि इसी वसुदेव से आगे चलकर बलभद्र और नारायण की महान परम्परा का प्रादुर्भाव होगा।
श्लोक 212 से 222 अन्धकवृष्टि का मोक्ष और वसुदेव का यौवन वैभव
पूर्वभवों का विस्तृत वर्णन सुनकर राजा अन्धकवृष्टि को संसार से वैराग्य हो गया। उन्होंने राज्य समुद्रविजय को सौंपकर सुप्रतिष्ठ जिनेन्द्र के समीप दीक्षा ग्रहण की और अंततः कर्मक्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। समुद्रविजय धर्मपूर्वक राज्य करने लगे। उनके शासन में सभी वर्ण और आश्रम के लोग सुखपूर्वक धर्माचरण करते थे। सबसे छोटे और अत्यन्त रूपवान वसुदेव प्रतिदिन हाथी पर सवार होकर नगर भ्रमण करते थे। उनके तेज, सौन्दर्य और वैभव को देखकर नगर की स्त्रियाँ मोहित हो जाती थीं और अपने कार्यों तक को भूल जाती थीं।
श्लोक 223 से 243 वसुदेव का गृहत्याग
नगरवासियों ने समुद्रविजय से निवेदन किया कि वसुदेव के अनुपम रूप के कारण नगर की स्त्रियाँ विचलित हो रही हैं। समुद्रविजय ने प्रेमपूर्वक उन्हें नगर के बाहर जाने से रोककर राजमहल के उद्यानों में ही विहार करने की सलाह दी। बाद में निपुणमति नामक सेवक ने वसुदेव को इस व्यवस्था का वास्तविक कारण बताया। जब वसुदेव ने स्वयं बाहर जाने का प्रयास किया और द्वारपालों ने उन्हें रोक दिया, तब उन्हें अत्यन्त अपमान का अनुभव हुआ। उन्होंने माता के नाम पत्र लिखकर यह भ्रम उत्पन्न किया कि वे अग्नि में प्रवेश कर मर गए हैं और रात्रि में गुप्त मार्ग से नगर छोड़कर निकल पड़े।
श्लोक 244 से 252 वसुदेव की खोज और श्यामला से विवाह
प्रातःकाल वसुदेव के न मिलने पर उनकी खोज आरम्भ हुई। श्मशान में घोड़े के गले से बँधा पत्र मिलने पर समुद्रविजय और समस्त परिवार शोकाकुल हो गया, किन्तु निमित्तज्ञानी ने उनके सुरक्षित होने का संकेत दिया। दूसरी ओर वसुदेव विजयपुर ग्राम पहुँचे। वहाँ एक अशोक वृक्ष की स्थिर छाया देखकर निमित्तज्ञानी की भविष्यवाणी सत्य मानी गई और मगधदेश के राजा ने अपनी पुत्री श्यामला का विवाह वसुदेव से कर दिया। कुछ समय वहाँ रहने के बाद वे आगे बढ़ गए और वन में हाथी के साथ क्रीड़ा करते हुए यात्रा जारी रखी।
श्लोक 253 से 273 विद्याधर प्रदेश की यात्रा और गन्धर्वदत्ता का स्वयंवर
एक विद्याधर वसुदेव को विजयार्ध पर्वत पर ले गया। वहाँ किन्नरगीत नगर के राजा अशनिवेग ने अपनी रूपवती पुत्री शाल्मलिदत्ता का विवाह उनसे कर दिया। कुछ समय बाद विभिन्न घटनाओं से होते हुए वसुदेव चम्पापुर पहुँचे और गन्धर्वविद्या के आचार्य मनोहर के आश्रम में रहने लगे। वहाँ उन्होंने जानबूझकर स्वयं को संगीत में अयोग्य प्रदर्शित किया। इसी बीच गन्धर्वदत्ता के स्वयंवर की तैयारी होने लगी। जब वीणाओं की परीक्षा का अवसर आया, तब वसुदेव ने उनमें विद्यमान सूक्ष्म दोषों को पहचानकर अपनी असाधारण विद्वत्ता का परिचय दिया और एक विशेष वीणा की मांग की।
श्लोक 274 से 283 विष्णुकुमार और वलि मन्त्री की कथा का प्रारम्भ
वसुदेव ने अपनी इच्छित वीणा का इतिहास सुनाते हुए बताया कि हस्तिनापुर के राजा मेघरथ के पुत्र विष्णुकुमार और पद्मरथ थे। राजा के तपस्वी बनने के बाद पद्मरथ राज्य करने लगे। उनके मन्त्री वलि ने राज्य को संकट से बचाया, जिससे प्रसन्न होकर राजा ने उसे सात दिनों के लिए राज्य सौंप दिया। उसी समय अकम्पन गुरु और अन्य मुनि सौम्य पर्वत पर तप कर रहे थे। वलि को पूर्व वैर के कारण उन मुनियों से द्वेष था और उसने उनके तप में बाधा पहुँचाने का षड्यन्त्र रचा।
श्लोक 284 से 292 विष्णुकुमार द्वारा उपसर्ग का निवारण
वलि ने यज्ञ और रसोई के बहाने पर्वत के चारों ओर धुआँ और अग्नि फैलाकर मुनियों को कष्ट पहुँचाया। विष्णुकुमार मुनि ने राजा पद्मरथ से उपसर्ग रोकने का अनुरोध किया, किन्तु राजा अपने वचनबद्ध होने के कारण असमर्थ रहे। तब विष्णुकुमार स्वयं वामन ब्राह्मण का रूप धारण कर वलि के पास पहुँचे और तीन पग भूमि माँगी। वलि के दान देते ही मुनि ने अपनी विक्रिया ऋद्धि से विराट रूप धारण कर एक चरण मानुषोत्तर पर्वत और दूसरा सुमेरु पर्वत पर रख दिया। उनकी अद्भुत शक्ति देखकर समस्त लोक आश्चर्यचकित हो गया।
श्लोक 293 से 301 वलि का पराभव और घोषवती वीणा का इतिहास
विद्याधरों और भूमिगोचरियों ने स्तुति करके विष्णुकुमार को शांत किया। प्रसन्न होकर उन्होंने अपना विराट रूप समेट लिया। देवों ने उनकी महिमा से प्रसन्न होकर घोषा, सुघोषा, महाघोषा और घोषवती नामक चार दिव्य वीणाएँ प्रदान कीं। इसके बाद विष्णुकुमार ने वलि को वश में कर उसके द्वारा उत्पन्न उपसर्ग समाप्त कर दिया और उसे धर्ममार्ग पर लगाया। कथा समाप्त कर वसुदेव ने बताया कि उन्हीं दिव्य वीणाओं में से घोषवती वीणा गन्धर्वदत्ता के वंश में सुरक्षित है और वही वीणा वे बजाना चाहते हैं।
श्लोक 302 से 311 गन्धर्वदत्ता और रोहिणी का वरण
घोषवती वीणा प्राप्त होने पर वसुदेव ने अपने अनुपम संगीत कौशल से सभी श्रोताओं को मुग्ध कर दिया। गन्धर्वदत्ता ने प्रसन्न होकर स्वयं अपने हाथों से वसुदेव के गले में वरमाला डाल दी। उनका कल्याणाभिषेक हुआ और विजयार्ध पर्वत के अनेक विद्याधर राजाओं ने सम्मानपूर्वक अपनी कन्याएँ भी उन्हें समर्पित कीं। बाद में वसुदेव पृथ्वी पर लौटे और अरिष्टपुर की राजकुमारी रोहिणी के स्वयंवर में सम्मिलित हुए। रोहिणी ने भी अन्य सभी राजाओं को छोड़कर वसुदेव का वरण किया। यह देखकर अन्य राजा क्रोधित हो उठे और बलपूर्वक रोहिणी का हरण करने का प्रयास करने लगे, जिससे युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो गई।
श्लोक 312 से 321 वसुदेव का पुनर्मिलन और पद्म बलभद्र का जन्म
युद्ध की स्थिति उत्पन्न होने पर वसुदेव ने अपने नाम से अंकित एक बाण समुद्रविजय की ओर छोड़ा। बाण पर लिखे नाम को पढ़कर समुद्रविजय आश्चर्यचकित और आनंदित हो उठे कि उनका बिछुड़ा हुआ भाई वसुदेव मिल गया है। उन्होंने तत्काल युद्ध रुकवा दिया और अपने भाइयों सहित वसुदेव से मिलने पहुँचे। वसुदेव ने विनयपूर्वक बड़े भाइयों को प्रणाम किया। इसके बाद उनकी पूर्व विवाहित पत्नियाँ भी उनसे मिला दी गईं और सभी आनंदपूर्वक नगर लौट आए। कुछ समय पश्चात् रोहिणी के गर्भ से पद्म नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो आगे चलकर नवम बलभद्र बना। वह असाधारण बुद्धि, तेज और प्रताप से युक्त था।
श्लोक 322 से 331 वशिष्ठ तापस का अज्ञान दूर होना
गंगा और गन्धावती नदियों के संगम पर वशिष्ठ नामक तापस पंचाग्नि तप करता था। वहाँ गुणभद्र और वीरभद्र नामक चारण मुनि आए और उन्होंने उसके तप को अज्ञानपूर्ण बताया। वशिष्ठ ने इसका कारण पूछा तो गुणभद्र मुनि ने उसके तप से होने वाली हिंसा का प्रत्यक्ष प्रमाण दिखाया। उन्होंने जटाओं में उत्पन्न जीवों, स्नान के समय मरी हुई मछलियों और अग्नि में जलते कीटों की ओर संकेत कर समझाया कि यह तप वास्तविक धर्म नहीं है। सत्य को समझकर वशिष्ठ को वैराग्य उत्पन्न हुआ और उसने दीक्षा ग्रहण कर कठोर तप आरम्भ कर दिया। उसके तप से प्रसन्न होकर सात व्यन्तर देवियाँ उपस्थित हुईं, किन्तु उसने उनसे किसी प्रकार की सहायता स्वीकार नहीं की। बाद में वह मथुरा पहुँचा और एक मास के उपवास सहित आतापन योग धारण किया।
श्लोक 332 से 341 उग्रसेन के प्रति वैरभाव और कंस के रूप में जन्म
मथुरा के राजा उग्रसेन ने घोषणा कर दी कि वशिष्ठ मुनि को केवल राजमहल से ही आहार मिलेगा। किन्तु प्रत्येक बार कोई न कोई विघ्न उपस्थित हो जाता और मुनि निराहार लौट जाते। लगातार उपवास और दुर्बलता के बीच जब उन्होंने लोगों को यह कहते सुना कि राजा स्वयं भी आहार नहीं देता और दूसरों को भी नहीं देने देता, तब उनके भीतर क्रोध उत्पन्न हो गया। मोहवश उन्होंने निदान किया कि तप के प्रभाव से अगले जन्म में वे उग्रसेन के पुत्र बनकर उसका राज्य छीनेंगे। इसी कषाययुक्त भाव से मृत्यु होने पर वे उग्रसेन की रानी पद्मावती के गर्भ में उत्पन्न हुए।
श्लोक 342 से 351 कंस का परित्याग और प्रारम्भिक जीवन
गर्भावस्था में ही रानी पद्मावती को राजा के हृदय का मांस खाने की इच्छा हुई, जिसे मंत्रियों ने युक्तिपूर्वक पूरा कराया। समय आने पर एक क्रूर स्वभाव वाला बालक उत्पन्न हुआ, जिसके लक्षण अशुभ प्रतीत होते थे। माता-पिता ने उसके भविष्य को अशुभ मानकर उसे एक कांसे की संदूक में रखकर यमुना में बहा दिया। कौशाम्बी की मण्डोदरी नामक गणिका ने उस बालक को पाया और उसका पालन-पोषण किया। बड़ा होने पर वह अन्य बालकों को पीड़ा देने लगा, जिससे तंग आकर मण्डोदरी ने भी उसे घर से निकाल दिया। इसके बाद वह शौर्यपुर जाकर वसुदेव की सेवा में रहने लगा।
श्लोक 352 से 363 कंस की वास्तविक पहचान
उसी समय जरासन्ध ने घोषणा की कि जो उसके शत्रु सिंहरथ को पराजित कर बंदी बनाएगा, उसे आधा राज्य और पुत्री जीवद्यशा प्रदान की जाएगी। वसुदेव ने युद्ध में सिंहरथ को परास्त कर दिया, किन्तु विनम्रतावश उसका श्रेय अपने सेवक कंस को दे दिया। जब जरासन्ध ने कंस का कुल जानना चाहा, तब मण्डोदरी स्वयं कांसे की संदूक लेकर उसके पास पहुँची और सारी घटना सुनाई। संदूक में रखे पत्र से ज्ञात हुआ कि कंस वास्तव में उग्रसेन और पद्मावती का पुत्र है। यह जानकर जरासन्ध ने अपनी पुत्री जीवद्यशा और आधा राज्य कंस को प्रदान कर दिया।
श्लोक 364 से 375 कंस का अत्याचार और भविष्यवाणी
अपनी वास्तविक जन्मकथा जानकर कंस के मन में माता-पिता के प्रति तीव्र वैरभाव जाग उठा। उसने मथुरा जाकर उग्रसेन और पद्मावती को बंदी बना लिया। बाद में उसने अपनी बहन देवकी का विवाह वसुदेव से करा दिया। एक दिन अतिमुक्त मुनि भिक्षा के लिए राजमहल आए। जीवद्यशा ने उनका उपहास किया, जिससे क्रोधित होकर मुनि ने भविष्यवाणी की कि देवकी का पुत्र उसके पति कंस और पिता जरासन्ध दोनों का विनाश करेगा। जीवद्यशा के बढ़ते क्रोध के साथ मुनि ने बार-बार उसी भविष्यवाणी को और अधिक स्पष्ट रूप में दोहराया कि देवकी का पुत्र महान सम्राट बनेगा और पृथ्वी पर राज्य करेगा।
श्लोक 376 से 392 देवकी के पुत्रों का रहस्य और सातवें पुत्र की रक्षा
जीवद्यशा ने सारी बात कंस को बताई। भविष्यवाणी से भयभीत होकर कंस ने अनुरोध किया कि देवकी की प्रत्येक प्रसूति उसके ही महल में हो। बाद में देवकी और वसुदेव ने अतिमुक्त मुनि से पूछा कि क्या वे कभी दीक्षा ग्रहण कर सकेंगे। मुनि ने बताया कि उनके सात पुत्र होंगे; छह पुत्र अंततः मोक्षमार्ग के अधिकारी होंगे और सातवाँ पुत्र चक्रवर्ती बनेगा। देवकी के प्रथम छह पुत्रों को इन्द्र की प्रेरणा से नैगमेष देव गुप्त रूप से भद्रिलपुर पहुँचा देता और वहाँ के मृत शिशुओं को देवकी के पास रख देता था। कंस उन्हें मृत समझकर निश्चिंत रहता, यद्यपि उसकी शंका बनी रहती थी। सातवें गर्भ में महाशुक्र स्वर्ग से च्युत एक महान जीव आया। तब वसुदेव और पद्म बलभद्र ने निश्चय किया कि इस बालक को गुप्त रूप से नन्दगोप के यहाँ सुरक्षित रखा जाएगा। रात्रि में वे बालक को लेकर निकले और उसके पुण्य के प्रभाव से मार्ग में अनेक चमत्कार घटित हुए।
श्लोक 393 से 402 यमुना पारगमन और नन्दगोप से भेंट
बालक के चरण-स्पर्श से कारागार के द्वार स्वयं खुल गए। उग्रसेन ने यह देखकर आश्चर्य प्रकट किया, तब बलभद्र ने उन्हें आश्वासन दिया कि यही बालक भविष्य में उन्हें बन्धन से मुक्त करेगा। वसुदेव और बलभद्र बालक को लेकर यमुना तट पहुँचे। चक्रवर्ती के पुण्य-प्रभाव से यमुना दो भागों में विभक्त हो गई और उन्हें मार्ग मिल गया। दूसरी ओर नन्दगोप अपनी नवजात कन्या को लेकर जा रहा था, क्योंकि उसकी पत्नी पुत्री-जन्म से दुःखी होकर उसे त्याग देना चाहती थी। जब नन्दगोप ने पूरी बात बताई, तब वसुदेव और बलभद्र अत्यन्त प्रसन्न हुए, क्योंकि उनकी योजना पूर्ण करने का उपयुक्त अवसर उन्हें मिल गया।
श्लोक 403 से 411 कृष्ण का नन्दगोप के यहाँ पालन और विन्ध्यवासिनी की कथा
वसुदेव और बलदेव ने नन्दगोप को सम्पूर्ण रहस्य बताकर अपना पुत्र उसे सौंप दिया तथा उसकी कन्या को साथ ले आए। उन्होंने नन्दगोप को बताया कि यह बालक भविष्य में महान चक्रवर्ती बनेगा। नन्दगोप बालक को घर ले आया और अपनी पत्नी को यह कहकर दे दिया कि देवताओं ने प्रसन्न होकर उसे यह पुण्यशाली पुत्र प्रदान किया है। इधर कंस ने देवकी के यहाँ कन्या-जन्म का समाचार सुनकर उसे अपने संरक्षण में रखवाया। बड़ी होने पर कन्या ने अपने विकृत रूप से दुःखी होकर आर्यिका दीक्षा ग्रहण कर ली। बाद में वन में एक व्याघ्र द्वारा उसका शरीर नष्ट हो गया, किन्तु लोकमान्यता के कारण लोग उसकी तीन अंगुलियों की पूजा करने लगे और उसे विन्ध्यवासिनी देवी के रूप में मानने लगे।
श्लोक 412 से 421 पूतना और अन्य देवियों के असफल प्रयास
मथुरा में अनेक उत्पात देखकर कंस चिंतित हुआ। निमित्तज्ञानी वरुण ने बताया कि उसका महान शत्रु जन्म ले चुका है। तब कंस ने अपने पूर्वभव से सम्बद्ध सात व्यन्तर देवताओं को उस शत्रु की खोज और वध का आदेश दिया। पूतना नामक देवी ने कृष्ण को पहचानकर उसकी माता का रूप धारण किया और विषैले स्तनों से उसे मारने का प्रयास किया, किन्तु एक रक्षक देवी ने उसके स्तनों में असह्य पीड़ा उत्पन्न कर दी जिससे वह भाग गई। बाद में गाड़ी, उलूखल और अर्जुन वृक्षों के रूप में आई अन्य देवियाँ भी कृष्ण को हानि नहीं पहुँचा सकीं। बालक कृष्ण ने सहज ही उनके सभी प्रयास विफल कर दिए।
श्लोक 422 से 431 बालक कृष्ण का अद्भुत पराक्रम
कृष्ण के वध हेतु देवियाँ ताड़ वृक्ष, गधी और घोड़े के रूप में भी आईं, किन्तु कृष्ण ने उन्हें भी परास्त कर दिया। सातों देवियाँ अंततः कंस के पास जाकर अपनी असफलता स्वीकार कर लौटीं। एक अवसर पर अरिष्ट नामक असुर बैल का रूप धारण कर कृष्ण की शक्ति परखने आया, परन्तु कृष्ण उसे भी पराजित करने के लिए तत्पर हो गए। यद्यपि माता यशोदा उन्हें बार-बार ऐसे साहसिक कार्यों से रोकती थीं, फिर भी उनका पराक्रम निरन्तर बढ़ता गया। जब देवकी और वसुदेव ने कृष्ण के अद्भुत कार्यों की चर्चा सुनी, तब वे उन्हें देखने की तीव्र इच्छा से व्रज पहुँचे।
श्लोक 432 से 441 देवकी का वात्सल्य और दिव्य रत्नों का प्रादुर्भाव
व्रज में पहुँचकर देवकी और बलदेव ने कृष्ण का सम्मान किया। कृष्ण को देखकर देवकी के स्तनों से स्वतः दूध प्रवाहित होने लगा, जिससे उनके मातृत्व का भाव प्रकट हुआ। स्थिति की गोपनीयता बनाए रखने के लिए बलदेव ने इसे उपवासजनित दुर्बलता बताकर ढँक दिया। सबने मिलकर उत्सवपूर्वक भोजन किया और मथुरा लौट आए। कुछ समय बाद भारी वर्षा के समय कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उठाकर गौओं की रक्षा की। उनके पुण्य के प्रभाव से मथुरा के एक देवालय में नागशय्या, धनुष और शंख नामक तीन दिव्य रत्न प्रकट हुए, जो उनके भावी वैभव और साम्राज्य के सूचक थे।
श्लोक 442 से 455 तीन दिव्य रत्नों की सिद्धि
कंस ने उन रत्नों के महत्व के विषय में वरुण निमित्तज्ञानी से पूछा। वरुण ने बताया कि जो पुरुष इन्हें सिद्ध कर लेगा, वही महान राज्य का अधिकारी बनेगा। कंस स्वयं उन्हें सिद्ध करने में असफल रहा। तब उसने घोषणा करवाई कि जो नागशय्या पर चढ़कर शंख बजाए और धनुष चढ़ा दे, उसे राजकन्या प्रदान की जाएगी। अनेक राजा मथुरा आए। स्वर्भानु राजा भी अपने पुत्र भानु के साथ आया और मार्ग में कृष्ण को साथ ले लिया। मथुरा पहुँचकर कृष्ण ने गुप्त रूप से तीनों कार्य सम्पन्न कर दिए, किन्तु श्रेय भानु को मिलने दिया और स्वयं व्रज लौट गए।
श्लोक 456 से 471 सहस्रदल कमल और नागराज पर विजय
जब इस कार्य के वास्तविक कर्ता के विषय में मतभेद उत्पन्न हुआ, तब कंस ने उसकी खोज का आदेश दिया। नन्दगोप को ज्ञात हो गया कि यह कार्य कृष्ण ने किया है, इसलिए वह भयभीत हो गया। बाद में कंस ने परीक्षा लेने के लिए सहस्रदल कमल मँगवाया, जिसकी रक्षा भयंकर नाग करते थे। नन्दगोप के अनुरोध पर कृष्ण निर्भय होकर उस सरोवर में गए। वहाँ नागराज ने उन्हें रोकने का प्रयास किया, किन्तु कृष्ण ने उसकी फण को वस्त्र पटकने के समान साधन बनाकर उसका अभिमान नष्ट कर दिया। नागराज भयभीत होकर अदृश्य हो गया और कृष्ण सहस्रदल कमल लेकर लौट आए।
श्लोक 472 से 481 मथुरा प्रवेश और कंस-वध की तैयारी
कृष्ण द्वारा सहस्रदल कमल लाने पर कंस को निश्चित हो गया कि उसका शत्रु नन्दगोप के यहाँ ही पल रहा है। उसने नन्दगोप और उसके मल्लों को मल्लयुद्ध देखने के लिए मथुरा बुलाया। मथुरा में प्रवेश करते ही एक उन्मत्त हाथी कृष्ण पर छोड़ दिया गया, किन्तु कृष्ण ने उसका दाँत उखाड़कर उसी से उसे परास्त कर दिया। इसके बाद वे रंगभूमि में पहुँचे। वसुदेव भी गुप्त रूप से अपनी सेना तैयार रखे हुए थे। बलदेव ने कृष्ण को संकेत दिया कि अब कंस का अंत करने का समय आ गया है।
श्लोक 482 से 491 रंगभूमि में कृष्ण का वीर रूप
रंगभूमि में गोपबालक और कंस के मल्ल आमने-सामने खड़े हुए। चाणूर आदि प्रमुख मल्ल अपने बल और अहंकार के कारण अत्यन्त भयानक प्रतीत हो रहे थे। दूसरी ओर कृष्ण का व्यक्तित्व अद्वितीय तेज और आत्मविश्वास से युक्त था। उनका शरीर युद्ध के लिए पूर्णतः उपयुक्त था, उनकी भुजाएँ वज्र के समान सुदृढ़ थीं और उनका उत्साह अदम्य था। वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सम्पूर्ण वीरता और शक्ति ने मानव रूप धारण कर लिया हो। उनके सिंहनाद और पराक्रम से सम्पूर्ण रंगभूमि कम्पायमान हो उठी।
श्लोक 492 से 497 चाणूर और कंस का वध तथा कृष्ण की विजय
कृष्ण ने युद्ध में पहले चाणूर मल्ल का वध किया और फिर स्वयं कंस क्रोधपूर्वक रंगभूमि में उतर आया। कृष्ण ने उसे पकड़कर आकाश में घुमाया और भूमि पर पटककर उसका अंत कर दिया। कंस के वध के साथ ही देवताओं ने पुष्पवर्षा की और दुन्दुभियाँ बजाईं। बलदेव ने भी शत्रु राजाओं को परास्त कर विजय सुनिश्चित की। इस प्रकार कृष्ण ने अपने महान पराक्रम से शत्रुओं का नाश किया और वीरलक्ष्मी को प्राप्त किया। उनकी विजय के साथ नेमिनाथ स्वामी के चरित्र में वर्णित श्रीकृष्ण की महिमा का यह प्रसंग पूर्ण हुआ तथा उत्तरपुराण का सत्तरवाँ पर्व समाप्त हुआ।
उत्तरपुराण पर्व 71 –नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन
श्लोक 1 से 11 : कंस-वध के बाद जरासन्ध का प्रतिशोध और कालयवन का प्रस्थान
कंस-वध के उपरान्त श्रीकृष्ण ने उग्रसेन को बन्धनमुक्त कर राज्य की व्यवस्था स्थापित की तथा नन्द आदि गोपालों का सम्मानपूर्वक सत्कार कर उन्हें विदा किया। इसी बीच कंस की रानी जीवद्यशा अपने पति की मृत्यु से दुःखी होकर मगधराज जरासन्ध के पास पहुँची और सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाया। यह समाचार सुनकर क्रोधित जरासन्ध ने पहले अपने पुत्रों को यादवों पर आक्रमण के लिए भेजा, किन्तु वे पराजित हो गये। तत्पश्चात् उसने अपराजित नामक पुत्र को विशाल सेना सहित भेजा, परन्तु वह भी अनेक युद्धों के बाद सफलता प्राप्त न कर सका। अन्ततः कालयवन ने यादवों को जीतने का दृढ़ संकल्प लेकर युद्ध के लिए प्रस्थान किया।
श्लोक 12 से 21 : कालयवन का भ्रम और द्वारावती की स्थापना की भूमिका
कालयवन के आक्रमण की सूचना मिलने पर यादवों ने शौर्यपुर, हस्तिनापुर और मथुरा का परित्याग कर दिया। उनके कुलदेवता ने वृद्धा का रूप धारण कर अग्नि प्रज्वलित की और कालयवन को यह विश्वास दिलाया कि यादव उसके भय से अग्नि में जलकर नष्ट हो गये हैं। इस भ्रम में पड़कर कालयवन विजयी होने का मिथ्या अभिमान लेकर लौट गया। उधर यादव समुद्रतट पर पहुँचे। वहाँ श्रीकृष्ण ने तप और मन्त्र-जाप के साथ अष्टोपवास किया। नैगम देव ने घोड़े के रूप में प्रकट होकर उन्हें समुद्र के भीतर उपयुक्त स्थान तक पहुँचाया, जहाँ भविष्य में एक महान नगरी की स्थापना होने वाली थी।
श्लोक 22 से 32: द्वारावती नगरी की रचना और नेमिनाथ के गर्भकल्याणक
नैगम देव के निर्देशानुसार श्रीकृष्ण समुद्र के भीतर पहुँचे। उसी समय श्रीकृष्ण और भावी तीर्थंकर नेमिनाथ के पुण्य के प्रभाव से इन्द्र की आज्ञा पाकर कुबेर ने समुद्र के मध्य भव्य द्वारावती नगरी का निर्माण किया। उसमें सर्वप्रथम एक विशाल जिनमन्दिर तथा दुर्ग, प्राकार, गोपुर और अट्टालिकाओं से युक्त अद्भुत नगर बनाया गया। श्रीकृष्ण, बलराम और वसुदेव सहित समस्त यादव वहाँ निवास करने लगे। इसी काल में नेमिनाथ भगवान् के जीव ने जयन्त विमान से अवतीर्ण होकर राजा समुद्रविजय की रानी शिवदेवी के गर्भ में प्रवेश किया। रानी ने शुभ सोलह स्वप्नों तथा दिव्य हाथी के दर्शन कर तीर्थंकर गर्भावतरण का संकेत प्राप्त किया।
श्लोक 33 से 51 : नेमिनाथ भगवान् का जन्म और अभिषेक महोत्सव
प्रातःकाल रानी शिवदेवी ने अपने स्वप्नों का फल राजा समुद्रविजय से पूछा। राजा ने आगमज्ञान के आधार पर बताया कि उनके गर्भ में भावी तीर्थंकर अवतीर्ण हुए हैं। यह सुनकर रानी अत्यन्त प्रसन्न हुई। देवों ने गर्भकल्याणक का महोत्सव मनाया। समय आने पर श्रावण शुक्ल षष्ठी को भगवान् नेमिनाथ का जन्म हुआ। इन्द्रों ने मेरु पर्वत पर ले जाकर उनका दिव्य अभिषेक किया और उन्हें “नेमि” नाम प्रदान किया। तत्पश्चात् भगवान् को पुनः माता-पिता को सौंप दिया गया। नेमिनाथ एक हजार वर्ष की आयु वाले, दश धनुष ऊँचे, उत्तम संहनन एवं संस्थान से युक्त, तीनों लोकों द्वारा पूजित महापुरुष थे और द्वारावती में दीर्घकाल तक विराजमान रहे।
श्लोक 52 से 64 : वैश्य-पुत्रों द्वारा द्वारावती का वैभव वर्णन
समय बीतने पर समुद्री व्यापार करने वाले कुछ वैश्य-पुत्र मार्ग भटककर द्वारावती पहुँच गये। वहाँ के अद्भुत वैभव और समृद्धि को देखकर वे चकित रह गये तथा बहुमूल्य रत्न लेकर मगध लौटे। जब उन्होंने राजा जरासन्ध को वे रत्न भेंट किये, तब उसके पूछने पर उन्होंने समुद्र के मध्य स्थित द्वारावती नगरी का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने बताया कि यह नगरी अत्यन्त सुरक्षित, वैभवशाली, रत्नसमृद्ध तथा श्रीकृष्ण के प्रताप से आलोकित है। साथ ही यह भगवान् नेमिनाथ की जन्मभूमि होने से विशेष गौरवशाली है।
श्लोक 65 से 81 : जरासन्ध का आक्रमण और महायुद्ध की तैयारी
द्वारावती के वैभव का वर्णन सुनकर अहंकारी जरासन्ध क्रोध से भर उठा और यादवों के विनाश के लिए विशाल सेना लेकर चल पड़ा। नारद ने यह समाचार श्रीकृष्ण को दिया। श्रीकृष्ण ने बिना विचलित हुए नेमिकुमार से द्वारावती की रक्षा का अनुरोध किया। नेमिनाथ ने अपनी दिव्य दृष्टि से यादवों की विजय निश्चित जानकर मौन स्वीकृति प्रदान की। इसके बाद श्रीकृष्ण, बलराम, पाण्डवों तथा अनेक मित्र-राजाओं के साथ युद्ध के लिए कुरुक्षेत्र पहुँचे। दूसरी ओर जरासन्ध भी भीष्म, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, दुर्योधन तथा अन्य राजाओं के साथ वहाँ उपस्थित हुआ। दोनों पक्षों की सेनाएँ आमने-सामने आ खड़ी हुईं और रणभेरियों की गूँज से युद्धभूमि उत्साह और वीररस से भर उठी।
श्लोक 82 से 93 : युद्धपूर्व वातावरण और श्रीकृष्ण की जिनपूजा
युद्ध के नगाड़े सुनकर अनेक राजाओं ने देवपूजा, व्रतग्रहण और धार्मिक कृत्य आरम्भ किये। अनेक योद्धा अपने सेवकों को शस्त्र, रथ, हाथी और घोड़े तैयार करने की आज्ञा देने लगे। विभिन्न प्रेरणाओं—स्वामीभक्ति, पराक्रम, यश, ईर्ष्या और कुलगौरव—से प्रेरित होकर वे युद्ध के लिए प्रस्तुत हुए। श्रीकृष्ण भी पूर्ण युद्ध-वेश में अलंकृत होकर रणभूमि के लिए तैयार हुए। उन्होंने पहले आचमन कर श्रद्धापूर्वक जिनेन्द्र भगवान् की पूजा-अर्चना की और नमस्कार किया। तत्पश्चात् गुरुजनों, सामन्तों और सहयोगियों से घिरे हुए वे शत्रु-संघार के उद्देश्य से युद्धभूमि की ओर अग्रसर हुए।
श्लोक 94 से 101 : सेनाओं की व्यूह-रचना और युद्ध का प्रारम्भ
श्रीकृष्ण के आदेश से उनकी सेना का सुव्यवस्थित व्यूह बनाया गया। दूसरी ओर जरासन्ध ने भी अपने सेनापतियों द्वारा सेना की योजना करवाई। दोनों पक्षों की व्यूह-रचना पूर्ण होते ही युद्ध के नगाड़े बज उठे। धनुर्धरों के बाणों से आकाश ढक गया और रणभूमि में ऐसा अन्धकार छा गया कि योद्धा एक-दूसरे को देख नहीं सकते थे। हाथियों के दाँतों की टक्कर से उत्पन्न अग्नि के प्रकाश में युद्ध पुनः तीव्र गति से चलने लगा। वीरों ने रक्त की नदियाँ बहा दीं और असंख्य योद्धा तथा घोड़े युद्ध में घायल होकर धराशायी होने लगे। इस प्रकार महाभयंकर संग्राम का आरम्भ हुआ।
श्लोक 102 से 111: भीषण युद्ध का विकराल स्वरूप
कुरुक्षेत्र का युद्ध अत्यन्त भयंकर रूप धारण कर चुका था। कटे हुए पैरों वाले हाथी विशाल पर्वतों के समान भूमि पर गिरे पड़े थे और वीरगति को प्राप्त योद्धाओं के मुखमण्डल अभी भी प्रसन्नता से शोभायमान थे। योद्धा अपनी युद्धकुशलता से एक-दूसरे के शस्त्र तोड़ रहे थे, किन्तु उनके टूटे हुए टुकड़े भी अनेक लोगों के प्राण ले रहे थे। कुछ वीर न तो क्रोध, ईर्ष्या अथवा यश-लाभ की इच्छा से, बल्कि कर्तव्य और न्याय की भावना से युद्ध कर रहे थे। अनेक योद्धा घोर घावों से आहत होकर हाथियों से लटक गये थे। दीर्घकाल तक चले इस युद्ध में असंख्य प्राणियों का विनाश हुआ और अन्ततः शत्रु-सेना ने श्रीकृष्ण की सेना को दबाना प्रारम्भ कर दिया।
श्लोक 112 से 121 : जरासन्ध-वध और श्रीकृष्ण की दिग्विजय
जब अपनी सेना को संकट में देखा तो श्रीकृष्ण सिंह के समान क्रोधपूर्वक शत्रु-सेना पर टूट पड़े। उनके पराक्रम से शत्रु-दल विचलित हो गया। यह देखकर स्वयं जरासन्ध युद्धभूमि में आया और अपने चक्ररत्न का प्रयोग श्रीकृष्ण के विरुद्ध किया। किन्तु वह चक्र श्रीकृष्ण की प्रदक्षिणा कर उनकी भुजा पर आकर ठहर गया। तब उसी चक्र से श्रीकृष्ण ने जरासन्ध का मस्तक काट दिया। विजय के उपलक्ष्य में देवों ने पुष्पवृष्टि की और विजय-नगाड़े बज उठे। इसके पश्चात् श्रीकृष्ण ने दिग्विजय आरम्भ की, अनेक देवों, विद्याधरों और म्लेच्छ राजाओं को अपने अधीन किया तथा आधे भरतक्षेत्र के अधिपति बनकर पुनः द्वारावती लौटे।
श्लोक 122 से 130 : चक्रवर्ती श्रीकृष्ण का वैभव और जलक्रीड़ा
द्वारावती पहुँचने पर देवों और विद्याधरों ने श्रीकृष्ण का चक्रवर्ती के रूप में राज्याभिषेक किया। उनका शरीर नीलकमल के समान कान्तिमान था और वे सात महान् रत्नों के स्वामी थे। बलराम भी अपने विशिष्ट महारत्नों से विभूषित थे। श्रीकृष्ण की प्रमुख आठ पटरानियाँ थीं तथा कुल मिलाकर उनकी सोलह हजार रानियाँ थीं। बलराम की भी आठ हजार रानियाँ थीं। दोनों भाई दिव्य सुखों का उपभोग करते हुए जीवन व्यतीत कर रहे थे। एक बार शरद् ऋतु में अन्तःपुर सहित जलविहार करते समय नेमिकुमार और सत्यभामा के मध्य विनोदपूर्ण वार्तालाप हुआ, जिसने आगे की घटनाओं की भूमिका तैयार की।
श्लोक 131 से 141: नेमिकुमार का पराक्रम और विवाह का विचार
सत्यभामा के विनोदी कटाक्षों से प्रेरित होकर नेमिकुमार ने अपने सामर्थ्य का परिचय देने का निश्चय किया। वे आयुधशाला में गये, नागशय्या पर चढ़े, महान् धनुष को सहजता से चढ़ाया और दिव्य शंख बजाकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन किया। इस कार्य से उनमें क्षणिक गौरव और उत्साह का भाव उत्पन्न हुआ। जब यह समाचार श्रीकृष्ण तक पहुँचा तो वे अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने विचार किया कि नेमिकुमार अब यौवनावस्था को प्राप्त हो चुके हैं और उनके लिए विवाह का समय उपयुक्त है।
श्लोक 142 से 151 : राजीमती के साथ विवाह की तैयारी
श्रीकृष्ण ने यह अनुमान लगाया कि नेमिकुमार के मन में सांसारिक अनुराग का उदय हुआ है, इसलिए उनका विवाह कर देना चाहिए। उन्होंने राजा उग्रसेन की रूपवती एवं गुणवती पुत्री राजीमती को नेमिकुमार के लिए उपयुक्त वधू माना। स्वयं उग्रसेन के पास जाकर उन्होंने विवाह का प्रस्ताव रखा। उग्रसेन ने अत्यन्त सम्मानपूर्वक इसे स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात् भव्य विवाहोत्सव की तैयारियाँ प्रारम्भ हुईं। रत्नों से निर्मित मण्डप, सुशोभित वेदिका और सुवर्ण चौकी से युक्त अत्यन्त मनोहर विवाह व्यवस्था की गई तथा नेमिकुमार और राजीमती ने विवाह-पूर्व की विधियाँ सम्पन्न कीं।
श्लोक 152 से 162 : वैराग्य का कारण और पशुओं की करुण दशा
विवाह के अगले दिन श्रीकृष्ण के मन में यह आशंका उत्पन्न हुई कि कहीं भविष्य में नेमिकुमार राज्य पर अधिकार न कर लें। उन्होंने विचार किया कि यदि वैराग्य का कोई कारण उपस्थित हो जाए तो नेमिकुमार स्वयं संसार त्याग देंगे। इस उद्देश्य से उन्होंने अनेक पशुओं और मृगों को विवाह-भोज के लिए एकत्र कर बाड़े में बन्द करवा दिया और रक्षकों को निर्देश दिया कि यदि नेमिकुमार पूछें तो सत्य बता देना। जब नेमिकुमार विवाह-यात्रा के पूर्व नगर-दर्शन के लिए निकले, तब उन्होंने भयभीत, प्यासे और करुण स्वर में रोते हुए उन पशुओं को देखा और उनके विषय में पूछताछ की।
श्लोक 163 से 171 : नेमिनाथ का वैराग्य और दीक्षा
रक्षकों से यह सुनकर कि इन निर्दोष पशुओं का वध उनके विवाहोत्सव के लिए किया जाएगा, नेमिकुमार का हृदय करुणा से भर उठा। उन्होंने विचार किया कि जो प्राणी किसी का अहित नहीं करते, उन्हें केवल भोग-विलास के लिए मारना अत्यन्त निन्दनीय है। उन्होंने श्रीकृष्ण की योजना को भी समझ लिया और संसार की नश्वरता तथा हिंसा के दुःख का गहन अनुभव किया। उसी क्षण उनके भीतर वैराग्य जागृत हो गया। लौकान्तिक देवों ने आकर उन्हें संयम के लिए प्रेरित किया। श्रावण शुक्ल षष्ठी के दिन उन्होंने एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की और मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त किया।
श्लोक 172 से 181 : राजीमती का त्याग, आहारदान और केवलज्ञान
नेमिकुमार के संयम ग्रहण करने पर राजीमती ने भी उनके मार्ग का अनुसरण करने का निश्चय किया। यह आदर्श पतिव्रता के त्याग और निष्ठा का उत्कृष्ट उदाहरण था। देवों और राजाओं ने भगवान् की स्तुति कर उन्हें प्रणाम किया। बाद में द्वारावती में राजा वरदत्त ने नवधा भक्ति सहित उन्हें शुद्ध आहार प्रदान किया, जिसके फलस्वरूप अनेक दिव्य आश्चर्य प्रकट हुए। छप्पन दिन की तपस्या के उपरान्त रैवतक (गिरनार) पर्वत पर भगवान् नेमिनाथ को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई। देवों ने केवलज्ञान कल्याणक का भव्य उत्सव मनाया।
श्लोक 182 से 190 : धर्मसभा और श्रीकृष्ण का आगमन
केवलज्ञान प्राप्त होने के बाद भगवान् नेमिनाथ की विशाल धर्मसभा स्थापित हुई, जिसमें असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक, श्राविकाएँ, देव और तिर्यंच उपस्थित रहते थे। भगवान् अपने धर्मोपदेश से भव्य जीवों को सम्यक् मार्ग की ओर प्रेरित करते हुए विभिन्न प्रदेशों में विहार करते रहे। अन्ततः वे द्वारावती के समीप रैवतक पर्वत के उद्यान में विराजमान हुए। जब श्रीकृष्ण और बलराम को यह समाचार मिला, तब वे अपनी समस्त विभूति सहित भगवान् के दर्शनार्थ पहुँचे, वन्दना की और धर्मोपदेश सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
श्लोक 191 से 200 : जीवतत्त्व का उपदेश और देवकी का प्रश्न
भगवान् नेमिनाथ के समक्ष श्रीकृष्ण ने जीव के स्वरूप के विषय में विभिन्न दार्शनिक मतों से उत्पन्न अपने संशय को प्रकट किया। उत्तर में भगवान् ने स्पष्ट किया कि जीव न तो केवल नित्य है, न क्षणिक, न सर्वव्यापी और न ही निराकार कल्पना मात्र। जीव उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त चेतन सत्ता है, जो कर्मों का भोक्ता और ज्ञाता है। वह शरीर के अनुरूप विस्तार वाला है, अनादिकाल से कर्मबन्धन में बँधा हुआ संसार में भ्रमण करता है और सम्यक्त्व तथा कर्मक्षय के द्वारा मोक्ष प्राप्त कर सकता है। भगवान् के इस तत्त्वज्ञान को सुनकर भव्य जीवों ने उसे स्वीकार किया, जबकि अभव्य जीव मिथ्यात्ववश संशय में बने रहे। इसी प्रसंग में देवकी ने गणधर वरदत्त से उन छह मुनियों के प्रति अपने विशेष स्नेह का कारण पूछा, जिन्होंने पूर्व में उनके घर भिक्षा ग्रहण की थी।
श्लोक 201 से 213 : भानुदत्त के सात पुत्र और मंगी की विषदुर्घटना
गणधर ने देवकी के प्रश्न का उत्तर देते हुए एक प्राचीन कथा का वर्णन किया। मथुरा में भानुदत्त सेठ और यमुनादत्ता के सात पुत्र थे। माता-पिता ने वैराग्य ग्रहण कर दीक्षा ले ली, किन्तु उनके पुत्र दुर्व्यसनों में पड़कर धन और प्रतिष्ठा खो बैठे तथा राज्य से निष्कासित कर दिए गए। वे उज्जयिनी पहुँचे। उसी समय वहाँ वज्रमुष्टि की पत्नी मंगी को उसकी ईर्ष्यालु सास वप्रश्री ने षड्यन्त्रपूर्वक विषैले सर्प से डसवा दिया, जिससे वह अचेत होकर मृत्यु-समान अवस्था में पहुँच गई।
श्लोक 214 से 221 : मंगी का पुनर्जीवन और शूरसेन का परीक्षण
वप्रश्री मंगी को श्मशान में छोड़ आई। जब वज्रमुष्टि को यह ज्ञात हुआ तो वह उसे खोजते हुए श्मशान पहुँचा। वहाँ योगस्थ वरधर्म मुनिराज के दर्शन कर उसने अपनी पत्नी के मिलने पर सहस्रदल कमलों से पूजा करने का संकल्प लिया। उसे मंगी मिल गई और वह उसे मुनिराज के पास ले आया। मुनिराज के चरण-स्पर्श के प्रभाव से मंगी विषमुक्त होकर जीवित हो गई। वज्रमुष्टि कमल लाने चला गया, जबकि शूरसेन यह सम्पूर्ण घटना छिपकर देख रहा था।
श्लोक 222 से 231 : मंगी की चंचलता और शूरसेन का वैराग्य
शूरसेन ने मंगी की परीक्षा लेने के लिए उससे मधुर वार्तालाप किया। मंगी शीघ्र ही उसके प्रति आसक्त हो गई और उसके साथ चलने की इच्छा व्यक्त करने लगी। इसी बीच वज्रमुष्टि लौट आया। उसने श्रद्धापूर्वक मुनिराज की पूजा करनी चाही, तब मंगी ने तलवार से उस पर प्रहार करने का प्रयास किया। शूरसेन ने समय रहते तलवार रोक ली, किन्तु उसकी अपनी अंगुलियाँ कट गईं। बाद में जब उसके भाई चोरी का धन लेकर आए, तब शूरसेन ने संसार की नश्वरता और छलपूर्ण प्रवृत्तियों से विरक्त होकर संयम ग्रहण करने का निश्चय किया।
श्लोक 232 से 241 : संसार से विरक्ति का उदय
शूरसेन के अनुभव को सुनकर उसके बड़े भाई सुभानु ने संसारिक आसक्ति, विषय-विकार और मोह की तीव्र निन्दा की। उसने बताया कि बाह्य आकर्षण और क्षणिक सुख मनुष्य को पतन की ओर ले जाते हैं तथा विवेक को नष्ट कर देते हैं। इस घटना ने सभी भाइयों के मन में संसार के प्रति गहन वैराग्य उत्पन्न कर दिया और उन्होंने आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का निश्चय किया।
श्लोक 242 से 257 : दीक्षा, देवगति और पुनर्जन्मों की श्रृंखला
सुभानु और उसके छहों भाइयों ने वरधर्म मुनिराज से दीक्षा ग्रहण कर ली तथा उनकी पत्नियों ने भी आर्यिका दीक्षा स्वीकार कर ली। वज्रमुष्टि और मंगी ने भी धर्ममार्ग अपनाया। तप और आराधना के उपरान्त सातों भाई प्रथम स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर वे धातकीखण्ड द्वीप में चन्द्रचूल राजा के पुत्रों के रूप में जन्मे। आगे चलकर विभिन्न घटनाओं और संसार की अनित्यता को देखकर उन्होंने पुनः वैराग्य धारण किया और भूतानन्द तीर्थंकर के चरणों में संयम स्वीकार किया। पुनः देवगति प्राप्त करने के बाद वे हस्तिनापुर में शङ्ख तथा गंगदेव के छह पुत्रों के रूप में जन्मे।
श्लोक 258 से 272 : निर्नामक की कथा और पूर्वकर्म का रहस्य
राजा गंगदेव की रानी नन्दयशा अपने सातवें पुत्र से किसी अज्ञात कारण से विरक्त हो गई और उसे धाय रेवती के माध्यम से अपनी बहन बन्धुमती को दे दिया। उस बालक का नाम निर्नामक रखा गया। एक अवसर पर नन्दयशा ने उसे अपमानित किया, जिससे शङ्ख और निर्नामक दोनों दुःखी हुए। बाद में अवधिज्ञानी द्रुमसेन मुनि से कारण पूछने पर उन्होंने पूर्वजन्म की कथा सुनाई, जिसमें एक मांसाहारी रसोइए, राजा चित्ररथ और सुधर्म मुनि से संबंधित कर्मबन्ध का वर्णन किया गया।
श्लोक 273 से 282 : रसोइए का पाप और निरनुकम्प की क्रूरता
द्रुमसेन मुनि ने बताया कि राजा चित्ररथ के वैराग्य ग्रहण करने से क्रोधित रसोइए ने द्वेषवश मुनि को कष्ट पहुँचाया और घोर पापकर्म बाँध लिया। अनेक जन्मों के बाद वही जीव यक्षदत्त के घर निरनुकम्प नामक पुत्र हुआ। उसका छोटा भाई सानुकम्प दयालु था। एक दिन मार्ग में बैठे अन्धे साँप को बचाने का प्रयास करने पर भी निरनुकम्प ने उसे गाड़ी से कुचल दिया। यह हिंसात्मक कर्म उसके भावी दुःखों का कारण बना।
श्लोक 283 से 292 : कर्मफल, दीक्षा और देवकी का पूर्वजन्म
वही साँप अगले जन्म में नन्दयशा बना और निरनुकम्प आगे चलकर निर्नामक के रूप में जन्मा। पूर्वकर्मों के प्रभाव से नन्दयशा को निर्नामक के प्रति अकारण क्रोध उत्पन्न होता था। यह रहस्य जानकर शङ्ख, निर्नामक और अन्य राजकुमारों ने दीक्षा ग्रहण कर ली। नन्दयशा और रेवती ने भी संयम धारण किया, किन्तु पुत्र-स्नेहवश भविष्य में पुनः सम्बन्ध प्राप्त करने का निदान कर लिया। तपस्या के बाद वे सभी महाशुक्र स्वर्ग में देव हुए। वहाँ से च्युत होकर शङ्ख का जीव बलदेव और नन्दयशा का जीव देवकी के रूप में उत्पन्न हुआ। इस प्रकार देवकी के वर्तमान जीवन का कर्म-संबंध स्पष्ट किया गया।
श्लोक 293 से 301 : देवकी के पुत्रों का रहस्य और सत्यभामा का प्रश्न
गणधर ने आगे बताया कि रेवती का जीव अलका सेठानी बनी, जिसके यहाँ देवकी के छह पुत्रों का पालन-पोषण हुआ। ये छहों पुत्र आगे चलकर मोक्षमार्ग के अधिकारी बने। देवकी को उनके प्रति जो विशेष स्नेह था, वह पूर्वजन्म के मातृत्व-संबंध का परिणाम था। पूर्वजन्म का निर्नामक ही आगे चलकर श्रीकृष्ण बना, जिसने स्वयंभू नारायण के ऐश्वर्य की इच्छा का निदान किया था। गणधर ने निष्कर्ष रूप में कहा कि कर्म का उदय अत्यन्त विचित्र और गहन है, जिसे समझना सरल नहीं है। यह कथा सुनकर देवकी ने श्रद्धापूर्वक गणधर को वन्दना की। इसके पश्चात् सत्यभामा ने भी अपने पूर्वभवों का वृत्तान्त जानने की इच्छा से गणधर भगवान् से प्रश्न किया।
श्लोक 302 से 315 : सत्यभामा के पूर्वभव का वर्णन
गणधर भगवान् ने सत्यभामा को उनके पूर्वजन्मों का वृत्तांत सुनाया। शीतलनाथ भगवान् के तीर्थ के विच्छेदकाल में मुण्डशालायन नामक एक विद्वान् ब्राह्मण तप और संयम का विरोध करता था तथा लोगों को केवल दान और भोगों का महत्त्व बताता था। उसके मिथ्योपदेश के कारण उसे नरक और तिर्यंच योनियों में अनेक दुःख भोगने पड़े। बाद में वह काल नामक भील बना और वरधर्म मुनिराज के उपदेश से कुछ सदाचार ग्रहण किया। उसके पुण्य के प्रभाव से वह हरिबल नामक राजकुमार बना, जिसने संयम धारण किया और स्वर्ग में देव हुआ। वहीं से च्युत होकर वह सत्यभामा के रूप में उत्पन्न हुई। एक निमित्तज्ञानी ने उसके पिता को बताया था कि वह भविष्य में अर्धचक्रवर्ती श्रीकृष्ण की महादेवी बनेगी। यह सुनकर सत्यभामा अत्यन्त प्रसन्न हुई।
श्लोक 316 से 324 : लक्ष्मीमति के पाप और दुःखद पुनर्जन्म
रुक्मिणी के पूर्वभव का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि लक्ष्मीमति नामक ब्राह्मणी ने समाधिगुप्त मुनि की घोर निन्दा की थी। मुनि-निन्दा के फलस्वरूप उसे भयंकर कुष्ठरोग हुआ और समाज में अपमान सहना पड़ा। मृत्यु के बाद वह दुर्गन्धयुक्त कुतिया, फिर साँप, गधा, अन्धा साँप और अन्धा सुअर जैसी अनेक दुःखद योनियों में जन्म लेती रही। प्रत्येक जन्म में उसे अपने पूर्व पापों के कारण कष्ट और तिरस्कार का सामना करना पड़ा।
श्लोक 325 से 341 : पूतिका का धर्ममार्ग और रुक्मिणी के रूप में जन्म
अनेक दुःखद जन्मों के बाद वही जीव पूतिका नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुई। संयोगवश उसे पुनः समाधिगुप्त मुनिराज के दर्शन हुए और उनके प्रति श्रद्धा उत्पन्न हुई। उसने मुनिराज की सेवा की, धर्मोपदेश सुना, उपवास तथा सदाचार का पालन किया और आर्यिकाओं के मार्गदर्शन में धर्ममय जीवन व्यतीत किया। एक श्राविका ने उसे पूर्वकर्मों के फल और धर्म के महत्त्व का बोध कराया। अंत में समाधिमरण करके वह अच्युत स्वर्ग में देवी बनी और वहाँ से च्युत होकर विदर्भ देश में राजा वासव और रानी श्रीमती की पुत्री रुक्मिणी के रूप में जन्मी।
श्लोक 342 से 351 : शिशुपाल के जन्म और भविष्यवाणी
कोशल देश के राजा भेषज और रानी मद्री के यहाँ तीन नेत्रों वाला शिशुपाल उत्पन्न हुआ। ज्योतिषियों ने भविष्यवाणी की कि जिस व्यक्ति को देखकर उसका तीसरा नेत्र लुप्त हो जाएगा, वही उसके वध का कारण बनेगा। बाद में जब वह श्रीकृष्ण के दर्शन के लिए द्वारावती पहुँचा, तो उसका तीसरा नेत्र तत्काल अदृश्य हो गया। यह देखकर मद्री भयभीत हो गई और उसने कृष्ण से अपने पुत्र की रक्षा की याचना की। कृष्ण ने वचन दिया कि शिशुपाल के सौ अपराध पूर्ण होने तक वे उसका वध नहीं करेंगे। कालांतर में शिशुपाल अत्यन्त पराक्रमी, अभिमानी और क्रूर शासक बन गया।
श्लोक 352 से 362 : शिशुपाल-वध और रुक्मिणी का विवाह
अहंकार से प्रेरित होकर शिशुपाल ने बार-बार श्रीकृष्ण का अपमान किया और उनके विरुद्ध शत्रुता बढ़ाई। उसके सौ अपराध पूर्ण होने पर उसका विनाश निश्चित हो गया। इसी समय रुक्मिणी के पिता उसका विवाह शिशुपाल से करने के लिए तैयार हुए। नारद ने यह समाचार श्रीकृष्ण को दिया। तब श्रीकृष्ण ने सेना सहित जाकर शिशुपाल का वध किया और रुक्मिणी को अपने साथ लाकर महादेवी के पद पर प्रतिष्ठित किया। अपने पूर्वभवों का यह वृत्तांत सुनकर रुक्मिणी अत्यन्त हर्षित हुई।
श्लोक 363 से 372 : जाम्बवती के पूर्वजन्म और आध्यात्मिक उन्नति
जाम्बवती के पूर्वभव का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि वह पहले देविला नामक कन्या थी, जिसने वैधव्य के पश्चात् व्रत ग्रहण किए और व्यंतर देवी बनी। अगले जन्म में वह बन्धुयशा बनी और धर्मानुष्ठानों के प्रभाव से स्वर्ग में देवांगना हुई। पुनः सुमति नामक कन्या बनकर उसने आर्यिका और मुनियों की सेवा की, दान दिया तथा कठिन उपवास किए। इन पुण्यकर्मों के फलस्वरूप वह अनेक उच्च गतियों को प्राप्त करती हुई अंततः विजयार्ध पर्वत के राजा जाम्बव की पुत्री जाम्बवती बनी।
श्लोक 373 से 382 : जाम्बवती का कृष्ण से विवाह
जाम्बवती के सौन्दर्य पर मोहित होकर नमि नामक विद्याधर उसे प्राप्त करना चाहता था, परन्तु उसके प्रयास विफल हो गए। नारद ने जाम्बवती के रूप और गुणों का वर्णन श्रीकृष्ण से किया। तब कृष्ण ने उसे प्राप्त करने का निश्चय किया। कठिन परिस्थिति देखकर उन्होंने विशेष विद्याओं की साधना की। पूर्वभव के पुण्य के प्रभाव से उन्हें दिव्य विद्याएँ सिद्ध हुईं। उन विद्याओं की सहायता से उन्होंने युद्ध में जाम्बव को पराजित किया और जाम्बवती को द्वारावती लाकर महादेवी के पद पर प्रतिष्ठित किया।
श्लोक 383 से 391 : सुसीमा के प्रारम्भिक पूर्वभव
इसके बाद सुसीमा ने अपने पूर्वजन्मों का विवरण पूछा। गणधर ने बताया कि पूर्व विदेह क्षेत्र में विश्वदेव नामक राजा की रानी अनुन्दरी पति-वियोग के शोक में अग्नि में प्रवेश कर व्यंतर देवी बनी। अनेक जन्मों के बाद वही जीव यक्षदेवी नामक कन्या के रूप में उत्पन्न हुई। उसने धर्मसेन मुनि से व्रत ग्रहण किए और तपस्वी मुनि को आहारदान देकर महान् पुण्य अर्जित किया।
श्लोक 392 से 403 : सुसीमा और लक्ष्मणा के पूर्वभव
यक्षदेवी आगे चलकर अनेक शुभ जन्मों में धर्म, तप और उपवास का पालन करती रही। कनकावली जैसे कठिन व्रतों के प्रभाव से वह माहेन्द्र स्वर्ग में देवी बनी और वहाँ से च्युत होकर सुराष्ट्रवर्धन राजा की पुत्री सुसीमा बनी, जो बाद में श्रीकृष्ण की पट्टरानी हुई। इसके पश्चात् गणधर ने लक्ष्मणा के पूर्वभव का वर्णन आरम्भ किया। पूर्व विदेह क्षेत्र में वसुमती नामक रानी पुत्र-मोह के कारण संयम ग्रहण न कर सकी और भीलनी बनी। बाद में उसने श्रावक धर्म अपनाया, स्वर्ग में देवांगना हुई और पुनः कनकमाला नामक राजकुमारी के रूप में जन्म लेकर पुण्य और धर्म के मार्ग पर अग्रसर हुई।
श्लोक 404 से 413 : लक्ष्मणा का पूर्वभव और श्रीकृष्ण से विवाह
कनकमाला ने पूर्वजन्मों का स्मरण प्राप्त कर मुक्तावली उपवास किया, जिसके प्रभाव से वह तृतीय स्वर्ग में इन्द्राणी बनी। वहाँ से च्युत होकर वह राजा शम्बर और रानी श्रीमती की पुत्री लक्ष्मणा के रूप में उत्पन्न हुई। लक्ष्मणा रूप, गुण और शुभ लक्षणों से सम्पन्न थी। पवनवेग विद्याधर ने उसके सौन्दर्य और योग्यता का वर्णन श्रीकृष्ण से किया। कृष्ण की आज्ञा से वह लक्ष्मणा को उसके माता-पिता की स्वीकृति सहित द्वारावती ले आया और कृष्ण को समर्पित कर दिया। इस प्रकार लक्ष्मणा का विवाह श्रीकृष्ण से हुआ।
श्लोक 414 से 421 : लक्ष्मणा का सम्मान और गान्धारी के पूर्वभव का आरम्भ
श्रीकृष्ण ने लक्ष्मणा को महादेवी का पद देकर सम्मानित किया। अपने पूर्वजन्मों का वृत्तांत सुनकर लक्ष्मणा अत्यन्त प्रसन्न हुई। इसके बाद कृष्ण ने गान्धारी, गौरी और पद्मावती के पूर्वभव जानने की इच्छा प्रकट की। गणधर भगवान् ने गान्धारी की कथा आरम्भ करते हुए बताया कि अयोध्या के राजा रुद्र की रानी विनयश्री ने एक मुनिराज को श्रद्धापूर्वक आहारदान दिया था। उस पुण्य के प्रभाव से वह उत्तम गतियों को प्राप्त करती हुई आगे अनेक शुभ जन्मों में उत्पन्न हुई।
श्लोक 422 से 431 : गान्धारी के पूर्वजन्म और विवाह
सुरूपा और उसके पति महेन्द्रविक्रम ने सुमेरु पर्वत पर चारण ऋद्धिधारी मुनियों का धर्मोपदेश सुना। उसके प्रभाव से राजा ने दीक्षा धारण कर ली और रानी ने आर्यिका के समीप संयम ग्रहण किया। संयम और पुण्य के प्रभाव से वह सौधर्म स्वर्ग में देवी बनी तथा बाद में गान्धार देश के राजा इन्द्रगिरि की पुत्री गान्धारी के रूप में जन्मी। जब उसके विवाह का अन्यत्र निर्णय हुआ, तब नारद ने यह समाचार श्रीकृष्ण को दिया। कृष्ण ने युद्ध में इन्द्रगिरि और उसके सहयोगियों को पराजित कर गान्धारी को प्राप्त किया और उसे पट्टरानी बनाया।
श्लोक 432 से 441 : गौरी के पूर्वभव और पुण्य का प्रभाव
गौरी के पूर्वभव का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि पूर्वजन्म में वह आनन्दयशा नामक वैश्यकन्या थी, जिसने मुनिराज को आहारदान देकर महान् पुण्य अर्जित किया। उसके फलस्वरूप वह उत्तरकुरु और देवगति में जन्मी। बाद में यशस्वती रानी के रूप में उत्पन्न होकर उसने पुनः मुनियों के प्रति श्रद्धा रखी, उपवास और धर्माचरण किया। आगे चलकर वह कौशाम्बी में धार्मिकी नामक कन्या बनी और जिनगुणसम्पत्ति व्रत का पालन किया। इन पुण्यों के प्रभाव से वह महाशुक्र स्वर्ग में देवी बनी और अंततः वीतशोक नगर के राजा मेरुचन्द्र की पुत्री गौरी के रूप में जन्मी। बाद में वह श्रीकृष्ण की पट्टरानी बनी।
श्लोक 442 से 459 : पद्मावती के पूर्वभव और आध्यात्मिक साधना
पद्मावती के पूर्वजन्मों का वर्णन करते हुए गणधर ने बताया कि वह पहले विनयश्री नामक राजकुमारी थी, जिसने समाधिगुप्त मुनिराज को आहारदान दिया था। इसके फलस्वरूप उसने अनेक शुभ गतियाँ प्राप्त कीं। बाद में पद्मदेवी नामक कन्या के रूप में उसने यह दृढ़ व्रत लिया कि संकट में भी अनजाना फल ग्रहण नहीं करेगी। भीलों के आक्रमण के समय जब अन्य लोगों ने विषैले फल खाकर प्राण त्याग दिए, तब भी उसने अपने व्रत का उल्लंघन नहीं किया और उपवासपूर्वक मृत्यु को प्राप्त हुई। इस महान् धर्मनिष्ठा के कारण वह उच्च भोगभूमियों, देवगति और पुनः मनुष्य जन्मों को प्राप्त करती रही। आगे चलकर विमलश्री के रूप में उसने संयम ग्रहण किया और कठोर तप किए। इन पुण्यों के प्रभाव से वह सहस्त्रार स्वर्ग में देवी बनी तथा अंततः अरिष्टपुर के राजा हिरण्यवर्मा की पुत्री पद्मावती के रूप में जन्मी। स्वयंवर में उसने श्रीकृष्ण का वरण किया और महादेवी का पद प्राप्त किया।
श्लोक 460 से 462 : धर्म की महिमा और नेमिनाथ के उपदेश की स्वीकृति
गणधर भगवान् ने श्रीकृष्ण की आठों रानियों के पूर्वभवों का विस्तृत और स्पष्ट वर्णन किया। इन कथाओं को सुनकर श्रीकृष्ण तथा उनकी रानियाँ अपने कर्मों के प्रभाव, पुण्य और पाप के परिणाम तथा धर्म की महत्ता को भलीभाँति समझ सके। सभी रानियों ने गणधर के उपदेशों को हृदयंगम किया और अर्हन्त भगवान् के कल्याणकारी धर्म में अपनी दृढ़ श्रद्धा स्थापित की। सभा में उपस्थित सभी जनों ने भी यह स्वीकार किया कि संसार में धर्म से बढ़कर कोई कल्याणकारी साधन नहीं है। इस प्रकार सभी ने भगवान् नेमिनाथ द्वारा प्रतिपादित धर्म को श्रद्धापूर्वक अंगीकार किया और भवान्तरों के इस उपदेश से आत्मकल्याण का मार्ग ग्रहण किया।
उत्तरपुराण पर्व 72 -नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म नामक बलभद्र, कृष्ण नामक अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन
श्लोक 1 से 22 : अग्निभूति-वायुभूति का सम्यक्त्व ग्रहण
समवसरण में बलदेव के प्रश्न पर गणधर वरदत्त ने प्रद्युम्न के पूर्वभवों का वर्णन आरम्भ किया। मगध देश के शालिग्राम ग्राम में सोमदेव ब्राह्मण और उसकी पत्नी अनिला के अग्निभूति तथा वायुभूति नामक दो पुत्र थे। वे मिथ्यात्व से प्रेरित होकर मुनियों से वाद-विवाद करने पहुँचे, परन्तु सत्यक मुनि के तर्कपूर्ण स्याद्वाद उपदेश से पराजित हो गए। क्रोधवश उन्होंने मुनि की हत्या का प्रयास किया, किन्तु यक्ष ने उन्हें स्तम्भित कर दिया। भयभीत परिवार ने जैन धर्म स्वीकार करने का वचन दिया। यद्यपि माता-पिता ने बाद में धर्म त्यागने को कहा, फिर भी दोनों भाइयों ने सन्मार्ग नहीं छोड़ा और दृढ़ता से धर्म में स्थित रहे।
श्लोक 23 से 34 : माता-पिता की दुर्गति और पुत्रों की आध्यात्मिक उन्नति
माता-पिता ने धर्म का विरोध किया, जिसके परिणामस्वरूप वे मृत्यु के बाद अनेक दुर्गतियों में भटके। दूसरी ओर अग्निभूति और वायुभूति ने व्रतों का पालन कर स्वर्ग में देवत्व प्राप्त किया। वहाँ से च्युत होकर वे अयोध्या में अर्हद्दास सेठ के पुत्र पूर्णभद्र और मणिभद्र बने। महेन्द्र मुनि के उपदेश से राजा अरिंजय ने संयम धारण किया। पूर्णभद्र ने अपने पूर्वजन्म के माता-पिता का समाचार पूछा तो ज्ञात हुआ कि पिता चाण्डाल और माता कुतिया के रूप में जन्म ले चुके हैं। उनके उपदेश से दोनों ने वैराग्य ग्रहण किया, जिससे पिता कुबेर यक्ष बने और माता आगे चलकर सुप्रबुद्धा नामक राजकुमारी के रूप में जन्मी।
श्लोक 35 से 46: मधु-क्रीडव का जीवन और प्रद्युम्न के जन्म का कारण
सुप्रबुद्धा ने वैराग्य धारण कर आर्यिका दीक्षा ली और बाद में स्वर्ग में मणिचूला देवी बनी। पूर्णभद्र और मणिभद्र ने भी उत्कृष्ट श्रावक धर्म का पालन कर स्वर्ग प्राप्त किया। वहाँ से वे हस्तिनापुर में मधु और क्रीडव नामक राजकुमार बने। मधु ने कामवश कनकमाला को स्वीकार कर अनुचित आचरण किया, जिससे कनकरथ राजा को वैराग्य हुआ। बाद में मधु और क्रीडव ने अपने दोषों का प्रायश्चित्त कर संयम ग्रहण किया और महाशुक्र स्वर्ग में इन्द्र पद प्राप्त किया। उसी पुण्य के प्रभाव से मधु का जीव आगे चलकर रुक्मिणी के पुत्र प्रद्युम्न के रूप में उत्पन्न हुआ।
श्लोक 47 से 61 : प्रद्युम्न का अपहरण और देवदत्त के रूप में पालन
पूर्वजन्म का वैर रखने वाला कनकरथ का जीव धूमकेतु ज्योतिषी देव बना। उसने प्रद्युम्न को पहचानकर शत्रुभाव से उसका अपहरण कर लिया और दूर वन में शिला के नीचे छोड़ दिया। उसी समय कालसंवर नामक विद्याधर राजा और उसकी पत्नी काञ्चनमाला वहाँ पहुँचे। उन्होंने बालक की अद्भुत आभा देखकर उसे अपनाया और युवराज घोषित कर दिया। उसका नाम देवदत्त रखा गया। राजा और रानी ने अत्यन्त स्नेहपूर्वक उसका पालन-पोषण किया और वह उनके परिवार का प्रिय पुत्र बन गया।
श्लोक 62 से 71 : कृष्ण-रुक्मिणी का शोक और नारद का आश्वासन
प्रद्युम्न के वियोग में रुक्मिणी अत्यन्त दुःखी रहने लगी और श्रीकृष्ण भी पुत्र-वियोग से शोकाकुल हो गए। तभी नारद मुनि वहाँ आए। कृष्ण ने उनसे पुत्र की खोज का अनुरोध किया। नारद ने बताया कि उन्होंने पूर्वविदेह क्षेत्र में स्वयंप्रभ तीर्थंकर से प्रद्युम्न का भविष्य जाना है। उन्होंने आश्वस्त किया कि बालक सुरक्षित है, महान् उन्नति प्राप्त करेगा और सोलह वर्ष बाद माता-पिता से पुनः मिल जाएगा। यह सुनकर कृष्ण और रुक्मिणी के हृदय में पुनः आशा और आनंद का संचार हुआ।
श्लोक 72 से 81 : प्रद्युम्न का पराक्रम और विद्या-सिद्धि
देवदत्त नाम से पले-बढ़े प्रद्युम्न ने युवावस्था में असाधारण पराक्रम दिखाया। उसने शत्रु राजा को पराजित कर अपने पिता कालसंवर की प्रतिष्ठा बढ़ाई। उसके शौर्य से प्रसन्न होकर राजा ने उसका विशेष सम्मान किया। प्रद्युम्न के तेज और सौन्दर्य से प्रभावित होकर काञ्चनमाला उसके प्रति आसक्त हो गई। उसने उसे प्रज्ञप्ति विद्या देने का बहाना बनाया, किन्तु प्रद्युम्न ने उसे माता के रूप में सम्मान दिया। विद्या-साधना हेतु वह सिद्धकूट चैत्यालय गया, मुनियों से धर्मोपदेश ग्रहण किया और संजयन्त मुनि की प्रतिमा के समक्ष साधना कर विद्या सिद्ध की। इसके पश्चात वह और भी तेजस्वी होकर लौटा।
श्लोक 82 से 91 : काञ्चनमाला का आरोप और कालसंवर का भ्रम
विद्या-सिद्धि के बाद प्रद्युम्न की शोभा और बढ़ गई, जिससे काञ्चनमाला की आसक्ति तीव्र हो गई। जब प्रद्युम्न ने उसके अनुचित प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया, तब उसने क्रोधवश कालसंवर से उसकी झूठी शिकायत कर दी। उसने प्रद्युम्न को दुराचारी और अकुलीन बताया। विवेकहीन कालसंवर ने बिना जाँच-पड़ताल के पत्नी की बात पर विश्वास कर लिया और अपने पाँच सौ पुत्रों को प्रद्युम्न की हत्या का आदेश दे दिया। इस प्रसंग के माध्यम से ग्रन्थकार ने दुष्ट प्रवृत्तियों और अविवेकपूर्ण निर्णयों के दुष्परिणामों का संकेत किया है।
श्लोक 92 से 101 : विचारपूर्वक निर्णय लेने की शिक्षा
इन श्लोकों में आचार्य ने किसी भी कथन या आरोप को बिना परीक्षण स्वीकार न करने की शिक्षा दी है। मनुष्य को वक्ता के आचरण, ज्ञान, उद्देश्य और परिस्थितियों की परीक्षा करनी चाहिए। यह समझना आवश्यक है कि कोई व्यक्ति भय, लोभ, स्नेह, क्रोध, ईर्ष्या, अज्ञान अथवा अन्य किसी कारण से भी कथन कर सकता है। विवेकशील व्यक्ति प्रत्येक कथन की सत्यता और सम्भावना का परीक्षण करता है, इसलिए वह छल और भ्रम से बच जाता है। अंत में यह शिक्षा दी गई है कि उत्तम व्यक्ति भी कभी-कभी भूल कर सकते हैं, अतः केवल किसी के कथन के आधार पर निर्णय नहीं लेना चाहिए, बल्कि विचारपूर्वक सत्य का अन्वेषण करना चाहिए।
श्लोक 102 से 111 : प्रद्युम्न की अद्भुत वीरता और दिव्य उपहार
कालसंवर के पुत्र प्रद्युम्न को मारने के उद्देश्य से उसे अनेक संकटों में डालते रहे। उन्होंने उसे अग्निकुण्ड में कूदने के लिए प्रेरित किया, किन्तु वहाँ की देवी ने उसका सम्मान कर दिव्य वस्त्र और आभूषण प्रदान किए। इसके बाद दो पर्वतों के बीच फँसाने पर भी उसने अपने बल से उन्हें रोक दिया और देवी से दिव्य कुण्डल प्राप्त किए। वराह रूपी देव को वश में कर उसने विजयघोष शंख तथा महाजाल प्राप्त किया। आगे महाकाल राक्षस को जीतकर उसने वृषभ रथ और रत्नमय कवच प्राप्त किया। इस प्रकार प्रत्येक संकट उसके लिए नई उपलब्धियों का कारण बनता गया।
श्लोक 112 से 123 : विद्याओं और दिव्य आयुधों की प्राप्ति
प्रद्युम्न ने एक बन्धित विद्याधर को मुक्त कर उसके उपकारस्वरूप अनेक विद्याएँ प्राप्त कीं। नागकुमार के भवन में जाकर उसने ध्वजा, धनुष, खड्ग और कामरूपिणी अंगूठी प्राप्त की। विभिन्न देवताओं और दिव्य स्थलों से उसे पादुकाएँ, पाँच विशेष बाण, मुकुट, औषधिमाला, छत्र, चँवर तथा नागपाश प्राप्त हुए। जब विद्याधर कुमार उसे पातालमुखी बावड़ी में छलपूर्वक मारना चाहते थे, तब उसने अपनी प्रज्ञप्ति विद्या का उपयोग कर उनकी योजना विफल कर दी और स्वयं सुरक्षित रहा।
श्लोक 124 से 141 : शत्रुओं की पराजय और द्वारका की ओर प्रस्थान
प्रद्युम्न ने षड्यंत्र का पता लगने पर विद्युदंष्ट्र आदि राजकुमारों को नागपाश से बाँधकर बावड़ी में लटका दिया तथा ज्योतिप्रभ को समाचार देने भेज दिया। तभी नारद मुनि वहाँ पहुँचे और प्रद्युम्न को उसके वास्तविक जीवन का परिचय दिया। इसके पश्चात् कालसंवर की सेना से युद्ध हुआ, जिसमें प्रद्युम्न विजयी रहा। उसने सबको मुक्त कर सत्य परिस्थिति बताई और कालसंवर की अनुमति लेकर नारद के साथ द्वारका की ओर चल पड़ा। मार्ग में उसने विभिन्न स्थानों पर अपनी विद्या और विनोदपूर्ण चातुर्य का परिचय देते हुए लोगों को आश्चर्यचकित किया।
श्लोक 142 से 153 : रुक्मिणी से पुनर्मिलन
द्वारका पहुँचकर प्रद्युम्न ने विभिन्न रूप धारण कर अनेक हास्यपूर्ण लीलाएँ कीं। अंततः वह क्षुल्लक का वेश धारण कर अपनी माता रुक्मिणी के महल पहुँचा और भोजन माँगा। रुक्मिणी ने उसका सत्कार किया। उसी समय प्रकृति में असामान्य शुभ संकेत दिखाई दिए, जिससे रुक्मिणी को अपने पुत्र के आगमन का आभास हुआ। जब उसने पूछा कि क्या वह उसका पुत्र है, तब प्रद्युम्न ने अपना वास्तविक स्वरूप प्रकट कर दिया। माता-पुत्र का यह मिलन अत्यन्त भावपूर्ण था और प्रद्युम्न ने अपने जीवन का सम्पूर्ण वृत्तान्त सुनाकर रुक्मिणी को अपार आनन्द प्रदान किया।
श्लोक 154 से 161 : सत्यभामा की शर्त और प्रद्युम्न की चतुरता
एक नाई ने आकर रुक्मिणी को सत्यभामा के साथ हुई पुरानी शर्त का स्मरण कराया, जिसके अनुसार बड़े पुत्र की माता दूसरी के केश कटवाएगी। रुक्मिणी से वास्तविक स्थिति जानकर प्रद्युम्न ने नाई तथा उसके साथियों को दण्डित किया और उन्हें उपहास का पात्र बना दिया। उसने विभिन्न रूप धारण कर नगरवासियों और सेवकों को चकित किया तथा अपनी चतुराई और अद्भुत सामर्थ्य का परिचय दिया।
श्लोक 162 से 171 : पिता से मिलन और विवाह
प्रद्युम्न ने रुक्मिणी के समान रूप बनाकर उसे विमान में बैठाया और कृष्ण तथा बलराम को चुनौती दी कि यदि सामर्थ्य हो तो उसे छुड़ा लें। अपनी विद्याओं के प्रभाव से उसने दोनों को पराजित कर दिया। तभी नारद ने उसका परिचय प्रकट किया। प्रद्युम्न ने अपना वास्तविक रूप दिखाकर कृष्ण और बलराम को प्रणाम किया। कृष्ण ने अत्यन्त स्नेह से उसका आलिंगन किया और उसका भव्य स्वागत किया। बाद में प्रद्युम्न का विवाह उन कन्याओं से सम्पन्न हुआ जो भानुकुमार के लिए आई थीं। इसी समय यह भविष्यवाणी भी हुई कि उसका पूर्वजन्म का भाई आगे चलकर कृष्ण के पुत्र रूप में जन्म लेगा।
श्लोक 172 से 183 : शम्भव का जन्म और नेमिनाथ की भविष्यवाणी
रुक्मिणी के अनुरोध पर प्रद्युम्न ने जाम्बवती को कामरूपिणी अंगूठी दी। उसके प्रभाव से जाम्बवती को शम्भव नामक पुत्र प्राप्त हुआ, जबकि सत्यभामा को सुभानु नामक पुत्र हुआ। दोनों में प्रतिस्पर्धा हुई, परन्तु शम्भव विजयी रहा। इसके बाद रुक्मिणी और सत्यभामा के बीच की ईर्ष्या समाप्त हो गई। आगे बलदेव ने भगवान् नेमिनाथ से श्रीकृष्ण के राज्य का भविष्य पूछा। नेमिनाथ ने भविष्यवाणी की कि बारह वर्ष बाद द्वारका का विनाश होगा, कृष्ण का देहावसान होगा और आगे चलकर वे तीर्थंकर नामकर्म के कारण महान आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त करेंगे। बलदेव के भविष्य का भी वर्णन किया गया।
श्लोक 184 से 191 : वैराग्य, दीक्षा और मोक्ष
भगवान् नेमिनाथ की वाणी सुनकर द्वीपायन ने तत्काल संयम ग्रहण कर लिया। श्रीकृष्ण ने सम्यग्दर्शन प्राप्त कर तीर्थंकर प्रकृति के कारणभूत सोलह कारण भावनाओं का चिन्तन किया। उन्होंने घोषणा की कि जो लोग संयम धारण करना चाहें, उन्हें कोई रोक नहीं है। यह सुनकर प्रद्युम्न, रुक्मिणी तथा अनेक राजकुमारों और रानियों ने दीक्षा ग्रहण कर ली। आगे शम्भव, अनिरुद्ध और प्रद्युम्न मुनि गिरनार पर्वत पर प्रतिमायोग में स्थित हुए, शुक्लध्यान द्वारा घातिया कर्मों का नाश किया, केवलज्ञान प्राप्त किया और अन्ततः मोक्ष को प्राप्त हुए।
श्लोक 192 से 201 : नेमिनाथ का विहार और द्रौपदी प्रसंग का आरम्भ
भगवान् नेमिनाथ दिव्य प्रभावों और प्रातिहार्यों से विभूषित होकर विभिन्न देशों में धर्मोपदेश देते हुए विहार करने लगे। देव, विद्याधर और शिष्यगण उनकी सेवा करते हुए साथ चल रहे थे। अनेक प्रदेशों में धर्मामृत की वर्षा करते हुए वे पल्लव देश पहुँचे। इसके बाद आचार्य गुणभद्र ने पाण्डवों के चरित्र का संक्षिप्त वर्णन आरम्भ किया। उन्होंने बताया कि कम्पिला नगरी के राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी गुण, सौन्दर्य और सदाचार से सम्पन्न थी। उसके विवाह के विषय में विचार करते समय मन्त्रियों ने पाण्डवों को सर्वश्रेष्ठ पात्र बताया और दुर्योधन द्वारा पाण्डवों के विरुद्ध रचे गए लाक्षागृह षड्यंत्र का उल्लेख करते हुए उनकी महानता का वर्णन आरम्भ किया।
श्लोक 202 से 211 : द्रौपदी का स्वयंवर और अर्जुन का वरण
राजा द्रुपद ने मंत्रियों की सलाह पर द्रौपदी का स्वयंवर आयोजित किया। अनेक राजाओं के साथ पाण्डव भी वहाँ पहुँचे और अपने-अपने पराक्रम से पहचाने गए। स्वयंवर मण्डप में प्रवेश करने के बाद द्रौपदी ने पुरोहित द्वारा परिचित कराए गए सभी राजाओं को देखा, परन्तु अंततः उसने अपनी वरमाला अर्जुन के गले में डालकर उनका वरण किया। इस प्रकार अर्जुन को योग्य वर मानकर द्रौपदी ने अपना जीवनसाथी चुना।
श्लोक 212 से 222 : पाण्डवों का राज्यसुख और नेमिनाथ की भविष्यवाणी की सिद्धि
द्रौपदी के अर्जुन को वरण करने पर उपस्थित राजाओं ने इस सम्बन्ध को उचित और अनुकूल माना। पाण्डव अपने नगर लौटकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगे। अर्जुन से अभिमन्यु तथा द्रौपदी से पाँच पुत्र उत्पन्न हुए। आगे अनेक प्रसिद्ध घटनाएँ—जुए का प्रसंग, कीचक-वध, विराट-निवास और कुरुक्षेत्र युद्ध—घटित हुईं। युद्ध में युधिष्ठिर ने विजय प्राप्त कर राज्य संभाला। इसी काल में भगवान नेमिनाथ द्वारा द्वारका के विनाश, कृष्ण की मृत्यु और बलदेव के संयम ग्रहण की जो भविष्यवाणी की गई थी, वह अक्षरशः सत्य सिद्ध हुई।
श्लोक 223 से 234 : पाण्डवों द्वारा पूर्वभव का प्रश्न और नागश्री का पाप
द्वारका-विनाश और श्रीकृष्ण के वियोग का समाचार सुनकर पाण्डव वैराग्य को प्राप्त हुए। वे भगवान नेमिनाथ के पास जाकर अपने पूर्वभवों के विषय में पूछने लगे। भगवान ने बताया कि अंगदेश की चम्पापुरी में सोमदेव ब्राह्मण के तीन पुत्र—सोमदत्त, सोमिल और सोमभूति—थे। इनका विवाह धनश्री, मित्रश्री और नागश्री से हुआ था। एक दिन धर्मरुचि मुनि को भिक्षा देने के लिए भेजी गई नागश्री ने क्रोधवश विषमिश्रित आहार दे दिया। मुनि ने समता सहित आराधना कर उच्च देवगति प्राप्त की, किन्तु नागश्री ने घोर पाप बाँध लिया।
श्लोक 235 से 248 : दीक्षा, पुण्यफल और सुकुमारी का दुःखमय जीवन
नागश्री के अपराध का पता चलने पर तीनों भाइयों ने दीक्षा ग्रहण कर ली। नागश्री को छोड़कर अन्य दोनों स्त्रियों ने भी आर्यिका दीक्षा धारण कर ली और सभी ने उत्कृष्ट आराधना द्वारा स्वर्गगति प्राप्त की। नागश्री अपने पाप के कारण नरक, तिर्यंच और अन्य दुर्गतियों में भटकती रही। बाद में वह चम्पापुर में सुकुमारी नामक कन्या के रूप में जन्मी, किन्तु उसके शरीर से दुर्गन्ध आती थी। इसी कारण उसका वैवाहिक जीवन दुःखमय रहा। उसका पति जिनदत्त उससे विरक्त रहा और सुकुमारी निरन्तर अपने दुर्भाग्य पर खेद करती रही।
श्लोक 249 से 259 : सुकुमारी का वैराग्य और द्रौपदी के रूप में जन्म
सुकुमारी ने आर्यिकाओं से उनके वैराग्यपूर्ण जीवन की कथा सुनी और स्वयं भी संसार से विरक्त हो गई। उसने दीक्षा ग्रहण कर ली, परन्तु बाद में वसन्तसेना वेश्या को देखकर उसके मन में भोग-सौभाग्य की इच्छा उत्पन्न हो गई। इस निदान के प्रभाव से वह अगले जन्म में एक देवांगना बनी। भगवान नेमिनाथ ने बताया कि वही जीव आगे चलकर राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी के रूप में जन्मा। इस प्रकार द्रौपदी का जन्म उसके पूर्व संस्कारों और कर्मों का परिणाम था।
श्लोक 260 से 271 : पाण्डवों का संयम और अन्तिम साधना
भगवान नेमिनाथ से अपने पूर्वभव सुनकर पाण्डवों ने अनेक लोगों के साथ दीक्षा ग्रहण कर ली। कुन्ती, सुभद्रा और द्रौपदी ने भी राजिमती गणिनी के पास आर्यिका दीक्षा ली। पाण्डव दीर्घकाल तक नेमिनाथ के साथ विहार करते रहे। अन्ततः वे शत्रुञ्जय पर्वत पर कठोर तप में स्थित हुए। वहाँ दुर्योधन के भानजे कुर्यवर ने उन पर भयंकर उपसर्ग किया, किन्तु उन्होंने समता नहीं छोड़ी। युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन शुक्लध्यान द्वारा कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त कर गए, जबकि नकुल और सहदेव सर्वार्थसिद्धि विमान में देव हुए।
श्लोक 272 से 281 : भगवान नेमिनाथ का निर्वाण और महान व्यक्तियों के पूर्वभव
भगवान नेमिनाथ ने दीर्घकाल तक धर्मप्रभावना करने के पश्चात गिरनार पर्वत पर योगनिरोध धारण किया और आषाढ़ शुक्ल सप्तमी के दिन मोक्ष प्राप्त किया। इन्द्रादि देवों ने उनके निर्वाण महोत्सव का आयोजन किया। इसके उपरान्त आचार्य ने नेमिनाथ, बलदेव और कृष्ण के अनेक पूर्वभवों का वर्णन किया। नेमिनाथ के जीव ने अनेक श्रेष्ठ जन्मों के बाद तीर्थंकरत्व प्राप्त किया। बलदेव के जीव का भी क्रमशः उत्कर्ष होता हुआ भविष्य में तीर्थंकर बनने का संकेत दिया गया। कृष्ण के जीव ने भी अनेक उतार-चढ़ाव भोगे और अंततः भविष्य में तीर्थंकर बनने की योग्यता अर्जित की।
श्लोक 282 से 288 : कर्मफल का उपदेश और पर्व का उपसंहार
आचार्य गुणभद्र ने समझाया कि मुनियों के प्रति द्रोह का फल अत्यन्त भयंकर होता है। कृष्ण जैसा विश्वविजयी और अपार वैभव का स्वामी पुरुष भी अपने कर्मों के प्रभाव से दुःख और पतन का भागी बना। संसार में वैभव, शक्ति और विजय स्थायी नहीं हैं; प्रत्येक जीव को अपने कर्मों का फल अवश्य भोगना पड़ता है। इसलिए बुद्धिमान पुरुष को सदैव शुभ कर्मों और सम्यक् आचरण का आश्रय लेना चाहिए। अंत में नेमिनाथ तीर्थंकर, बलभद्र, कृष्ण, जरासन्ध और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के चरित्रों का वर्णन पूर्ण कर बहत्तरवें पर्व का समापन किया गया।
उत्तरपुराण पर्व 73 -पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन
उत्तरपुराण पर्व 74 -अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन
उत्तरपुराण पर्व 75 -चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन
उत्तरपुराण पर्व 76 -राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा
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