विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152 – 153
भद्रमित्रोऽपि पूत्कारं सर्वतो नगरेऽकरोत् । सत्यघोषोऽपि पापिष्ठैरेष चौरैरभिद्रुतः ॥ १५२॥सर्वस्वहरजोद्भूतशोकव्याकुलिताशयः । प्रलापीति जनानेतत् स्वप्रामाण्यादजिग्रहत् ॥ १५३ ॥
तब भद्रमित्रने सब नगरमें रोना-चिल्लाना शुरू किया और सत्यघोषने भी अपनी प्रामाणिकता बनाये रखनेके लिए लोगोंको यह बतलाया कि पापी चोरोंने इसका सब धन लूट लिया है। इसी शोकसे इसका चित्त व्याकुल हो गया है और उसी दशा में वह यह सब बक रहा है । ।। १५२-१५३ ।।
Then Bhadramitra began to weep and cry out throughout the city, while Satyaghosha, in order to maintain his reputation for integrity, told the people, “Sinful thieves have plundered all his wealth. His mind has become distressed due to this grief, and in that state, he is uttering all this nonsense.” [152-153]
श्लोक ( Shlok ) 154
समक्षं भूपतेरात्मशुद्धयर्थ शपथं च सः । धर्माधिकृतनिर्दिष्टं चकाराचारदूरगः ॥ १५४ ॥
सदाचारसे दूर रहने वाले उस सत्यघोषने अपनी शुद्धता प्रकट करनेके लिए राजाके समक्ष धर्माधिकारियों -न्यायाधीशोंके द्वारा बतलाई हुई शपथ खाई ।। १५४ ॥
In order to prove his innocence before the King, that Satyaghosha—who lived far from the path of virtuous conduct—swore a solemn oath as prescribed by the legal authorities and judges. [154]
श्लोक ( Shlok ) 155
भद्रमित्रोऽपि पापेन वञ्चितोऽहं निजातिना । द्विजातिनेत्यनाथोऽपि नामुञ्चत् पुत्कृतिं मुहुः ॥ १५५ ॥
भद्रमिन्त्र यद्यपि अनाथ रह गया था तो भी उसने अपना रोना नहीं छोड़ा, वह बार-बार यही कहता था कि इस पापी विजाति ब्राह्मणने मुझे ठग लिया ।। १५५ ॥
Even though Bhadramitra was left helpless and destitute, he did not cease his lamentation; he repeatedly cried out, “This sinful, low-born Brahman has utterly deceived me!” [155]
श्लोक ( Shlok ) 156 – 158
चतुविधोपधा शुद्धं युक्तं जात्यादिभिर्गुणैः । त्वां सत्यं सत्यघोषाङ्क मत्वा मन्त्रिगुणोत्तमम् ।। १५६ ।।यथा न्यासीकृतं हस्ते तव रत्नकरण्डकम् । किमेवमपलापेन हेतुं तद्ब्रूहि युज्यते ॥ १५७ ॥सिंहसेनमहाराजप्रसादेन न तेऽस्ति किम् । छत्रसिंहासने मुक्त्वा ननु राज्यमिदं तव ॥ १५८ ॥
हे सत्यघोष ! मैंने तुझे चारों तरहसे शुद्ध जाति आदि गुणोंसे युक्त मंत्रियोंके उत्तम गुणोंसे विभूषित तथा सचमुच ही सत्यघोष समझा था इसलिए ही मैंने अपना रत्नोंका पिटारा तेरे हाथमें सौंप दिया था, अब इस तरह तूं क्यों बदल रहा है, इस बदलनेका कारण क्या है और यह सब करना क्या ठीक है? महाराज सिंहसेनके प्रसादसे तेरे क्या नहीं है ? छत्र और सिंहासनको छोड़कर यह सारा राज्य तेरा ही तो है ।। १५६-१५८ ॥
“O Satyaghosha! I entrusted my chest of gems into your hands only because I considered you to be truly worthy of your name—pure in lineage, endowed with the fourfold noble qualities of a minister, and a man of genuine integrity. Why are you now betraying that trust? What is the reason for this change, and is such conduct proper? By the grace of King Simhasena, what is it that you lack? Barring only the royal umbrella and the throne, this entire kingdom is effectively yours!” [156-158]
श्लोक ( Shlok ) 159
धर्म यशो महत्त्वं च किं वृथैव विघातयेः । न्यासापह्नवदोषं किं न वेत्सि ‘स्मृतिषूदितम् ॥ १५९ ॥
फिर धर्म, यश और बड़प्पनको व्यर्थ ही क्यों नष्ट कर रहा है? क्या तू स्मृतियोंमें कहे हुये न्यासापहारके दोषको नहीं जानता ? ॥१५९॥
“Why then are you needlessly destroying your righteousness, your reputation, and your nobility? Do you not know the grave sin of Nyasapahara (misappropriation of a trust) as described in the Smritis?” [159]
श्लोक ( Shlok ) 160
एतदेवार्थशास्त्रस्य नित्यमध्ययने फलम् । यत्परानतिसन्धत्ते नातिसन्धीयते परैः ॥ १६० ॥
तूने जो निरन्तर अर्थशास्त्रका अध्ययन किया है क्या उसका यही फल है कि तू सदा दूसरोंको ठगता है और दूसरोंके द्वारा स्वयं नहीं ठगाया जाता ॥ १६० ॥
“Is this the only fruit of your constant study of the Arthashastra—that you forever deceive others while ensuring you are never deceived by them?” [160]
श्लोक ( Shlok ) 161
इत्यत्र परशब्दार्थे विपर्येषि परो मतः । तत्र शत्रुरहं किं भोः सत्यघोष रिपुस्तव ॥ १६१ ॥
अथवा तू पर शब्द का अर्थ विपरीत समझता है- पर का अर्थ दूसरा न लेकर शत्रु लेता है सो हे सत्यघोष ! क्या सचमुच ही मैं तुम्हारा शत्रु हूँ ? ।। १६१ ॥
“Or perhaps you interpret the word ‘Para‘ in a contrary way—taking it to mean ‘enemy’ instead of ‘another.’ Tell me, Satyaghosha, am I truly your enemy?” [161]
श्लोक 162 से 171
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 100
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 124
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |