विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
अमुस्मिन् भारते वर्षे कुणालविषये पुरम् । श्रावस्ती तत्र राजाऽभूत्सुकेतुर्भोगतत्परः ॥ ७२ ॥
इसी भारतवर्ष के कुणाल देशमें एक श्रावस्ती नामका नगर था वहाँ पर भोगोंमें तल्लीन हुआ सुकेतु नामका राजा रहता था ।। ७२ ।।
In this very land of Bharatvarsha, in the Kunala province, there was a city named Shravasti. There lived a king named Suketu, who remained deeply immersed in worldly pleasures. [72]
श्लोक ( Shlok ) 73 – 74
कामजे व्यसने द्यूते संसक्तः कर्मचोदितः । निषिद्धो मन्त्रिभिर्बन्धुवरैश्च बहुशो हितैः ॥ ७३ ॥चोदितो वा स तैर्भूयो दीव्यन् दैवविलोमतः । राष्ट्र वित्तं बलं देवी सर्वमस्यापहारितम् ॥ ७४ ॥
अशुभ कर्मके उदयसे वह बहुत कामी था, तथा द्यूत व्यसनमें आसक्त था। यद्यपि हित चाहनेवाले मन्त्रियों और कुटुम्बियोंने उसे बहुत बार रोका पर उसके बदले उनसे प्रेरित हुएके समान वह बार-बार जुआ खेलता रहा और कर्मोदयके विपरीत होनेसे वह अपना देश-धन-बल और रानी सब कुछ हार गया ॥ ७३-७४ ।।
Due to the rise of inauspicious karma, he was intensely lustful and deeply addicted to the vice of gambling. Although his well-wishing ministers and kinsmen restrained him many times, he continued to gamble repeatedly as if driven by an external force. Consequently, due to the adverse turn of his karmic fortune, he lost his kingdom, his wealth, his army, and even his queen. [73-74]
श्लोक ( Shlok ) 75
क्रोधजेषु त्रिषूक्तेषु कामजेषु चतुषु च । नापरं व्यसनं धूतान्निकृष्टं प्राहुरागमाः ॥ ७५ ॥
क्रोधसे उत्पन्न होनेवाले मद्य, मांस और शिकार इन तीन व्यसनोंमें तथा कामसे उत्पन्न होनेवाले जुआ, चोरी, वेश्या और पर-स्त्रीसेवन इन चार व्यसनोंमें जुआ खेलनेके समान कोई नीच व्यसन नहीं है ऐसा सब शास्त्रकार कहते हैं ।। ७५ ।।
All the authors of the scriptures declare that among the three vices born of anger—liquor, meat-eating, and hunting—and the four vices born of lust—gambling, theft, prostitution, and adultery—there is no vice as base as gambling. [75]
श्लोक ( Shlok ) 76 – 80
महागुणेषु यत्सत्थमुक्तं प्राग् हार्यते हि तत् । द्यूतासक्तेन लज्जाभिमानं पश्चात्कुलं सुखम् ॥ ७६ ॥सौजन्यं बन्धवो धर्मो द्रव्यं क्षेत्रं गृहं यशः । पितरौ दारका दाराः स्वयं चातिप्रसङ्गतः ॥ ७७ ॥न स्नानं भोजनं स्वापो निरोधाद्रोगसृच्छति । न यात्यर्थान् वृथा क्लेशी बहुदोषं चिनोत्यधम् ॥ ७८ ॥ करोति कुत्सितं कर्म जायते पारिपन्थिकः । याचतेऽन्येषु ‘वार्थार्थमकार्येषु प्रवर्तते ॥ ७९ ॥बन्धुभिः स परित्यक्तो राजभिर्याति यातनाम् । इति यूतस्य को दोषानुद्देष्टुमपि शक्नुयात् ॥ ८० ॥
जो सत्य महागुणोंमें कहा गया है जुआ खेलनेमें आसक्त मनुष्य उसे सबसे पहले हारता है। पीछे लज्जा, अभिमान, कुल, सुख, सज्जनता, बन्धुवर्ग, धर्म, द्रव्य, क्षेत्र, घर, यश, माता-पिता, बाल-बच्चे, स्त्रियाँ और स्वयं अपने आपको हारता है- नष्ट करता है। जुआ खेलनेवाला मनुष्य अत्यासक्तिके कारण न स्नान करता है, न भोजन करता है, न सोता है और इन आवश्यक कार्योंका रोध हो जानेसे रोगी हो जाता है। जुआ खेलनेसे धन प्राप्त होता हो सो बात नहीं, वह व्यर्थ ही क्लेश उठाता है, अनेक दोष उत्पन्न करनेवाले पापका संचय करता है, निन्य कार्य कर बैठता है, सबका शत्रु बन जाता है, दूसरे लोगोंसे याचना करने लगता है और धनके लिए नहीं करने योग्य कर्मोंमें प्रवृत्ति करने लगता है। बन्धुजन उसे छोड़ देते हैं- घरसे निकाल देते हैं, एवं राजाकी ओरसे उसे अनेक कष्ट प्राप्त होते हैं। इस प्रकार जुआके दोषोंका नामोल्लेख करनेके लिए भी कौन समर्थ है ? ।॥ ७६-८० ॥
Among the great virtues, Truth is the first thing a man addicted to gambling loses. Subsequently, he forfeits—and ultimately destroys—his shame, pride, lineage, happiness, gentility, kin, religion, wealth, land, home, reputation, parents, children, wives, and even his own self.
Driven by extreme obsession, the gambler neither bathes, nor eats, nor sleeps; by obstructing these essential activities, he falls prey to disease. It is not that gambling brings any real wealth; rather, he suffers in vain, accumulates sins that give rise to numerous flaws, commits despicable acts, and becomes an enemy to all. He is reduced to begging from others and engages in forbidden deeds for the sake of money.
His kinsmen abandon him—casting him out of the house—and he suffers many hardships at the hands of the king. In this manner, who is truly capable of even listing all the various evils of gambling? [76-80]
श्लोक ( Shlok ) 81
सुकेतुरेव दृष्टान्तो येन राज्यं च हारितम् । तस्माल्लोकद्वयं वाल्छन् दूरतो द्यूतमुत्सृजेत् ॥ ८१ ॥
राजा सुकेतु ही इसका सबसे अच्छा दृष्टान्त है क्योंकि वह इस जुआके द्वारा अपना राज्य भी हरा बैठा था। इसलिए जो मनुष्य अपने दोनों लोकोंका भला चाहता है वह जुआको दूरसे ही छोड़ देवे ॥ ८१ ॥
King Suketu serves as the most striking example of this, for through gambling, he lost even his own kingdom. Therefore, a person who desires well-being in both this world and the next should renounce gambling from afar. [81]
श्लोक 82 से 91
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