शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 55 | श्लोक 56 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
English translation of Uttar Puran parv 56- shlok 92 to 96
श्लोक ( Shlok ) 92
सुवीजमल्पमप्युप्तं सुक्षेत्रे कालवेदिना । तत्सहस्त्रगुणीभूतं वापकस्य फलं भवेत् ॥ ९२ ॥
इसके विपरीत उत्तम बीज थोड़ा भी क्यों न हो, यदि समयको जाननेवाले मनुष्यके द्वारा उत्तम क्षेत्रमें बोया जाता है तो बोनेवाले के लिए उससे हजारगुना फल प्राप्त होता है ॥ ९२ ॥
“On the contrary, no matter how small the quantity of excellent seeds may be, if they are sown in fertile soil (Uttam Kshetra) by a person who understands the right timing, they yield a thousand-fold harvest for the sower.”92
श्लोक ( Shlok ) 93
इति भक्तेन तेनोक्तमुदाहरणकोटिभिः । धीमता तन्महीभर्तुरुपकाराय नाभवत् ॥ ९३ ॥
इस प्रकार उस बुद्धिमान् एवं भक्त मंत्रीने यद्यपि करोड़ों उदाहरण देकर उस राजाको समझाया परन्तु उससे राजाका कुछ भी उपकार नहीं हुआ ॥ ९३ ॥
“In this manner, although that wise and devoted Minister tried to enlighten the King by providing millions of examples, it did not result in even the slightest benefit for the King.”93
श्लोक ( Shlok ) 94
कालदष्टस्य वा मन्त्रो भैषज्यं वा गतायुषः । आजन्मान्धस्य वादर्शों विपरीतस्य सद्वचः ॥ ९४ ॥
सो ठीक ही है क्योंकि विपरीत बुद्धिवाले मनुष्यके लिए सत्-पुरुषोंके वचन ऐसे हैं जैसे कि कालके काटेके लिए मंत्र, जिसकी आयु पूर्ण हो चुकी है उसके लिए औषधि, और जन्मके अन्धेके लिए दर्पण ॥ ९४ ॥
“And this is only fitting; for a person possessed of a perverted intellect (Vipreet-buddhi), the words of the virtuous are as futile as a mantra to one bitten by a deadly serpent, medicine to one whose life-span is already exhausted, or a mirror to one who has been blind since birth.”94
श्लोक ( Shlok ) 95
विहायादिक्रमायातं दानमार्ग कुमार्गगः । मूर्खप्रलपितं दानमारातीयमवीवृतत् ॥ ९५ ॥
उस कुमार्गगामी राजाने प्रारम्भसे ही चले आये दानके मार्गको छोड़कर मूर्ख मुण्डशालायनके द्वारा कहे हुए आधुनिक दानके मार्गको प्रचलित किया ।॥ ९५ ॥
“That King, now fully committed to the misguided path (Kumarga), abandoned the traditional principles of charity that had been followed since time immemorial. Instead, he established and popularized the modern, distorted path of charity as prescribed by the foolish Mundashalayan.”95
श्लोक ( Shlok ) 96
कन्याहस्तिसुवर्णवाजिकपिलादासीतिलस्यन्दन-क्ष्मागेहप्रतिबद्धमत्र दशधा दानं दरिद्रेप्सितम् । तीर्थान्ते जिनशीतलस्य सुतरामाविश्वकार स्वयं लुब्धो वस्तुषु भूतिशर्मतनयोऽसौ मुण्डशालायनः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार लौकिक वस्तुओंके लोभी, भूतिशर्माके पुत्र मुण्डशालायनने श्री शीतलनाथ जिनेन्द्र के तीर्थ के अन्तिम समयमें दरिद्रोंको अच्छा लगनेवाला-कन्यादान, हस्तिदान, सुवर्णदान, अश्वदान, गोदान, दासीदान, तिलदान, रथदान, भूमिदान और गृहदान यह दश प्रकारका दान स्वयं ही अच्छी तरह प्रकट किया – चलाया ॥९६ ॥
“In this manner, Mundashalayan—the son of Bhutisharma and a man greedy for worldly possessions—took advantage of the declining period of Lord Shitalnath Jinendra’s era (Teertha) to introduce and popularize ten types of charity that are pleasing to the destitute. These were: the gift of a daughter (Kanya-daan), elephants (Hasti-daan), gold (Suvarna-daan), horses (Ashwa-daan), cows (Go-daan), female servants (Daasi-daan), sesame seeds (Til-daan), chariots (Ratha-daan), land (Bhumi-daan), and houses (Griha-daan).” 96
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे शीतलपुराणं नाम परिसमाप्तं षट्पञ्चाशत्तमं पर्व ॥ ५६ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें शीतलपुराणका वर्णन करनेवाला छप्पनवाँ पर्व पूर्ण हुआ ।
“Thus ends the fifty-sixth chapter (Parva), describing the ‘Shital-Purana’ within the ‘Trishashti-Lakshana Mahapurana Sangraha’—the celebrated work of Rishi-like authority composed by Bhagavad Gunabhadracharya.”
पर्व 57 – श्लोक 1 से 11
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