आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 संसारी और मुक्त जीव का अंतर
संसारी जीव चार गतियों में भटकता है, और इसके गुण परिवर्तनशील हैं, जो असिद्धता है। कर्मरूपी रज से युक्त संसारी जीव के सुख-दुख, बल, और शरीर बदलते रहते हैं, जबकि मुक्त जीव के अविनाशी भाव आत्मस्वरूप, अचंचलता, अक्षयपना, अव्याबाधपना, अनंतज्ञान, अनंतदर्शन, अनंतवीर्य, अनंतसुख, नीरजसपना, और निर्मलपना हैं। कोई अन्य पुरुष स्वभाव से निर्मल और सिद्ध नहीं।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 42- Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
क्षुभितत्वं च संक्षोभः क्रोधाद्याविष्टचेतसः । भवेद् विविधयोगोऽस्य नानायोनिषु संक्रमः ॥९२॥
क्रोध आदिसे आक्रान्त चित्तमें जो क्षोभ उत्पन्न होता है वह इसका क्षुभितपना है, और नाना योनियोंमें परिभ्रमण करना इसका विविध योग कहलाता है ॥९२॥
“The agitation that arises in the mind overwhelmed by anger and other emotions is its restlessness, and the wandering through various wombs is called its diverse connections.” 92
श्लोक ( Shlok ) 93
संसारावास एषोऽस्य चतुर्गतिविवर्तनम् । प्रतिजन्मान्यथाभावो ज्ञानादीनामसिद्धता ॥९३॥
चारों गतियों में परिवर्तन करते रहना इस जीवका संसारावास कहलाता है और प्रत्येक जन्ममें ज्ञानादि गुणोंका अन्य अन्य रूप होते रहना असिद्धता कहलाती है ।॥९३॥
“The continuous transformation through the four states of existence is called the soul’s worldly abode, and the varying forms of qualities like knowledge in each birth is called imperfection.”93
श्लोक ( Shlok ) 94
सुखासुखं बलाहारौ देहावासौ च देहिनाम्। विवर्तन्ते तथा ज्ञानं दृक्रशक्ती च रजोजुषाम् ॥९४॥
कर्मरूपी रजसे युक्त रहने-वाले इन संसारी जीवोंके जिस प्रकार सुख दुःख, बल, आहार, शरीर और घर बदलते रहते हैं उसी प्रकार उनके ज्ञान, दर्शन, सुख और वीर्य भी बदलते रहते हैं ।॥ ९४।।
“Just as these worldly souls, associated with the dust of karma, experience changes in pleasure, pain, strength, nourishment, body, and dwelling, similarly their knowledge, perception, happiness, and vitality also keep changing.”94
श्लोक ( Shlok ) 95
एवं प्रायास्तु ये भावाः संसारिषु विनश्वराः । मुक्तात्मनां न सन्त्येते भावास्तेषां ह्यनश्वराः ॥९५॥
इस प्रकार संसारी जीवोंके जो विनश्वरभाव हैं वे मुक्त जीवोंके नहीं हैं, उनके सब भाव अविनश्वर हैं ।।९५।।
“Thus, the perishable attributes of worldly souls are not present in liberated souls; all their attributes are imperishable.”95
श्लोक ( Shlok ) 96
मुक्तात्मनां भवेद् भावः स्वप्रधानत्वमग्रिमम् । प्रतिलब्धात्मलाभत्वात् परद्रव्यानपेक्षणम् ॥९६।।
मुक्त जीवोंके उन भावोंमें आत्मस्वरूपकी प्राप्ति होनेसे परद्रव्यकी अपेक्षासे रहित जो सर्व श्रेष्ठ स्वतन्त्रपना है वही पहला भाव है ।। ९६।।
“In the attributes of liberated souls, the attainment of the soul’s true nature results in the supreme independence, free from dependence on external substances, and this is the first attribute.”96
श्लोक ( Shlok ) 97
वेदनाभिभयाभावाद चलत्वं गभीरता । स्यादक्षयत्वमक्षय्यं क्षयिकातिशयोदयः ॥९७॥
सुख दुःख आदिकी वेदनासे होनेवाले परभाव का अभाव होनेसे जो अचञ्चलता होती है वही उनकी गंभीरता है और कर्मोंके क्षयसे जो अतिशयोंकी प्राप्ति होती है वही उनका अविनाशी अक्षयपना है ॥९७॥
“The steadfastness that arises from the absence of external influences due to the cessation of feelings like pleasure and pain is their profundity, and the attainment of supreme qualities due to the destruction of karmas is their imperishable, inexhaustible nature.” 97
श्लोक ( Shlok ) 98
अव्याबाधत्वमस्येष्टं जीवाजीवैर “बाध्यता । भवेदनन्तज्ञानत्वं विश्वार्थाक्रमबोधनम् ॥९८॥
किसी भी जीव अथवा अजीवसे इन्हें बाधा नहीं पहुंचती यही इनका अव्याबाधपना है और संसारके समस्त पदार्थोंको एक साथ जानते हैं यही इनका अनन्तज्ञानीपन है ।। ९८।।
He is not disturbed by any living or non-living being; this is His inseparable nature; and He knows all things in the world simultaneously; this is His infinite knowledge. 98.
श्लोक ( Shlok ) 99
अनन्तदर्शनत्वं च विश्वतत्त्वा ‘क्रभेक्षणम् । योऽन्यैरप्रतिघातोऽस्य सा मतानन्तवीर्यता ॥९९॥
समस्त तत्त्वोंको एक साथ देखना ही इनका अनन्तदर्शनपन है और अन्य पदार्थोंके द्वारा प्रतिघातका न होना अनन्तवीर्यपना है ।॥९९॥
“Seeing all substances simultaneously is their infinite perception, and the absence of obstruction by other entities is their infinite energy.”99
श्लोक ( Shlok ) 100
भोग्येष्वर्थेष्वनौत्सुक्यमनन्तसुखता मता। नीरजस्त्वं भवेदस्य व्यपायः पुण्यपापयोः ॥१००॥
भोग करने योग्य पदार्थोंमें उत्कंठा न होना अनन्तसुखपना माना जाता है और पुष्य तथा पापका अभाव हो जाना नीरजसपन कहलाता है ।। १००।।
“The absence of desire for objects of enjoyment is considered infinite happiness, and the complete absence of merit and demerit is called purity.” 100
श्लोक ( Shlok ) 101
निर्मलत्वं तु तस्येष्टं बहिरन्तर्मलच्युतिः । स्वभावविमलोऽनादिसिद्धो नास्तीह कश्चन ॥१०१॥
बहिरङ्ग और अन्तरङ्ग मलका नाश होना ही इसका निर्मलपना कहलाता है क्योंकि इस संसारमें ऐसा कोई भी पुरुष नहीं है जो स्वभावसे ही निर्मल हो और अनादि कालसे सिद्ध हो ।॥ १०१ ॥
“The destruction of external and internal impurities is called its purity, for there is no person in this world who is naturally pure and has been perfected since beginningless time.”101
श्लोक 102 से 111
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 158
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
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