आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 342 to 361
श्लोक ( Shlok ) 342
श्रेष्ठ्यहिंसाफलालोकान्मयाऽप्यग्राहि तव्रतम् । तस्मात्त्वं न हतोऽसीति’ ‘ततस्तुष्टाव’ “सोऽपि तम्’ ।।
वह चाण्डाल कहने लगा कि सेठके अहिंसा व्रतका फल देखकर मैंने भी अहिंसा व्रत ले लिया था यही कारण है कि मैंने तुम्हें नहीं मारा है यह सुनकर उस विद्युच्चर चोरने भी उसकी बहुत प्रशंसा की ॥३४२॥
The chandala said, “Having witnessed the fruits of the merchant’s vow of nonviolence, I too embraced the vow of ahimsa. That is why I did not kill you.” Hearing this, the lightning-swift thief praised him profusely. ॥342॥
श्लोक ( Shlok ) 343 – 346
इत्युक्त्वा सोऽव्रवीदेवं प्राक् मृणालवतीपुरे । भूत्वा त्वं भवदेवाख्यो रतिवेगासुकान्तयोः ॥३४३॥ बद्धवैरो निहन्ताऽभूः पारावतभवेऽप्यनु। मार्जारः सन्मृति गत्वा पुनः “खचरजन्मनि ॥३४४।॥विद्युच्चोरत्वमासाद्य सोपसर्गा मृति व्यधाः । तत्पापान्नरके दुःखम् अनुभूयागतस्ततः । ३४५।।अत्रेत्याखिलदवेद्युक्तं” व्यक्तवाग् विसरः स्फुटम् । व्यधात् सुधीः स्ववृत्तान्तं भीमसाधुः सुधाशिनोः ।
इतना कहकर वे भीम मुनि सामने बैठे हुए देव-देवियोंसे फिर कहने लगे कि सर्वज्ञ-देवने मुझसे स्पष्ट अक्षरोंमें कहा है कि ‘तू पहले मृणालवती नगरी में भवदेव नामका वैश्य हुआ था वहां तूने रतिवेगा और सुकान्तसे वैर बांधकर उन्हें मारा था, मरकर वे दोनों कबूतर कबू-तरी हुए सो वहां भी तूने बिलाव होकर उन दोनोंको मारा था, वे मरकर विद्याधर विद्याधरी हुए थे सो उन्हें भी तूने विद्युच्चोर होकर उपसर्ग द्वारा मारा था, उस पापसे तू नरक गया था’ और वहांके दुःख भोगकर वहांसे निकलकर यह भीम हुआ हूं इस प्रकार उन बुद्धिमान् भीम मुनिने सामने बैठे हुए देव-देवियोंके लिये अपना सब वृत्तान्त कहा ॥३४३-३४६॥
Having said this much, the venerable ascetic Bhima then addressed the assembled celestial beings and goddesses once more, recounting: “The Omniscient Lord has revealed to me in clear terms: ‘In a previous birth, you were a merchant named Bhavadeva in the city of Mrinalavati, where you harbored enmity toward Rativega and Sukanta and slew them. Reborn as doves thereafter, you became a cat and killed them again. When they were reborn as a vidyadhara and a vidyadhari, you afflicted them yet again as a lightning-swift thief. Owing to these sins, you fell into hell and suffered its torments. Having emerged from there, you have now taken birth as Bhima.’”Thus did the wise ascetic Bhima narrate the entirety of his past deeds before the gathered celestial beings. ॥343–346॥
श्लोक ( Shlok ) 347
त्रिः प्राक् त्वत्मारितावावामिति” शुद्धित्रयान्वितौ । जातसद्धर्म सद्भावावभिवन्द्य मुनि गतौ ॥३४७॥
जिन्हें आपने पहले तीन बार मारा है वे दोनों हम ही हैं ऐसा कहकर जिनके मन, वचन, काय -तीनों शुद्ध हो गये हैं और जिन्हें सद्धर्मकी सद्भावना उत्पन्न हुई है ऐसे वे दोनों देव-देवी उन भीममुनिकी वन्दना कर अपने स्थानपर चले गये ।।३४७।।
“We are the very ones whom you slew thrice before,” they declared. And with minds, words, and bodies now purified, and hearts filled with reverence for the true Dharma, those two celestial beings bowed to the ascetic Bhima and then departed for their respective abodes. ॥347॥
श्लोक ( Shlok ) 348 – 360
इति व्याहृत्य” हेमाङ्गदानुजेदं च साऽब्रवीत् । भीम साधुः पुरे पुण्डरीकिण्यां घातिघातनात् ॥३४८॥ रम्ये शिवङ्करोद्याने पञ्चमज्ञानपूजितः। तस्थिवांस्तं समागत्य चतस्रो देवयोषितः ॥३४९॥वन्दित्वा धर्ममाकण्यं पापादस्मत्पतिर्मृतः । त्रिलोकेश वदास्माकं पतिः कोऽन्यो भविष्यति ॥३५०॥इत्यपुच्छन्नसौ चाह पुरेऽस्मिन्नेव भोजकः । सुरदेवा ह्वयस्तस्य वसुषेणा वसुन्धरा ॥३५१॥धारिणी पृथिवी चेति चतस्रो योषितः प्रियाः । श्रीमती वीतशोकाख्या विमला सवसन्तिका ॥३५२॥चतस्रश्चेटिकास्तासामन्येद्युस्ता बनान्तरे । सर्वा यतिवराभ्याशे धर्म दानादिनाऽऽददुः ॥३५३।।तत्फलेनाच्युते कल्पे प्रतीन्द्रस्य प्रियाः क्रमात् । रतिषेणा सुसीमाख्या मुख्यान्या च सुखावती ॥३५४॥सुमगेति च देव्यस्ता यूयं ताश्चेटिकाः पुनः । चित्रषेणा क्रमाच्चित्रवेगा धनवती सती ॥३५५॥ धनश्रीरित्यजायन्त वनदेवेषु कन्यकाः । सुरदेवेऽप्यभून्मृत्वा पिङ्गलः पुररक्षकः ॥३५६॥स तत्र निजदोषेण प्रापनिगलबन्धनम् । मातुस्तत्सुरदेवस्य प्राप्ता या राजसूनुताम् ॥३५७।।श्रीपालाख्यकुमारस्य ग्रहणे बन्धमोक्षणे । सर्वेषां पिङ्गलाख्योऽपि मुक्तः संन्यस्य सम्प्रति ॥३५८॥भूत्वा बुधविमानेऽसौ इहागत्य भविष्यति । ‘स्वामी युष्माकमित्येतत्तच्चेतो हरणं तदा ॥३५९॥परमार्थ कृतं तेन तथा ‘गत्य मुनेर्वचः । पृष्ट्वानु कन्य काश्चैनमात्मनो भाविनं पतिम् ॥३६०॥
यह कहकर हेमाङ्गदकी छोटी बहिन सुलोचना फिर कहने लगी कि एक समय पुण्डरी-किणी नगरीके शिवंकर नामके सुन्दर उद्यानमें घातिया कर्म नष्ट करनेसे जिन्हें केवलज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे भीममुनिराज विराजमान थे, सभी लोग उनकी पूजा कर रहे थे, उसी समय वहांपर चार देवियोंने आकर उनकी वन्दना की, धर्मका स्वरूप सुना और पूछा कि हे तीन लोकके स्वामी, हम लोगोंके पापसे हमारा पति मर गया है। कहिये — अब दूसरा पति कौन होगा ? तब सर्वज्ञ-भीम मुनिराज कहने लगे कि इसी नगरमें सुरदेव नामका एक राजा था उसकी वसुषेणा, वसुंधरा, धारिणी और पृथिवी ये चार रानियां थीं तथा श्रीमती, वीतशोका, विमला और वसन्तिका ये चार उन रानियोंकी दासियां थीं। किसी एक दिन उन सबने वनमें जाकर किन्हीं मुनिराजके समीप दान आदिके द्वारा धर्म करना स्वीकार किया था । उस धर्मके फलसे वे अच्युत स्वर्गमें प्रतीन्द्रकी देवियां हुई हैं। क्रमसे उनके नाम इस प्रकार हैं-रतिषेणा, सुसीमा, सुखावती और सुभगा । वह देवियां तुम्हीं सब हो, तथा तुम्हारी दासियां चित्रषेणा, चित्रवेगा, धनवती और धनश्री नामकी व्यन्तर देवोंकी कन्याएं हुई हैं। राजा सुरदेव मरकर पिङ्गल नामका कोतवाल हुआ है और वह अपने ही दोषसे कारागारको प्राप्त हुआ था, सुरदेवकी माता राजाकी पुत्री हुई है और श्रीपालकुमारके साथ उसका विवाह हुआ है । विवाहोत्सवके समय सब कैदी छोड़े गये थे उनमें पिङ्गल भी छूट गया था, अब संन्यास लेकर अच्युत स्वर्गमें उत्पन्न होगा और वही तुम सबका पति होगा ! इधर मुनिराज ऐसे मनोहर वचन कह रहे थे कि उधर पिङ्गल संन्यास धारणकर अच्युत स्वर्गमें उत्पन्न हुआ और वहांसे आकर उसने मुनिराजके वचन सत्य कर दिखाये । इतनेमें ही चारों व्यन्तर कन्याएँ आकर सर्वज्ञदेवसे अपने होनहार पतिको पूछने लगीं ॥३४८-३६०॥
Having spoken thus, Hemangada’s younger sister, Sulochana, continued:“Once, in the splendid garden named Shivankara in the city of Pundarikini, the venerable ascetic Bhima, who had attained omniscience through the destruction of his obstructing karmas, was seated in serene majesty. All the people were engaged in revering him. At that moment, four celestial goddesses arrived, offered their obeisance, listened to the nature of Dharma, and asked:‘O Lord of the three worlds, our husband has died due to our past sins. Tell us, who shall be our next husband?’The Omniscient Bhima Muni then revealed: ‘In this very city, there once ruled a king named Suradeva. He had four queens—Vasusheṇa, Vasundharā, Dhāriṇī, and Pṛthivī—and four maidservants—Shrīmatī, Vītaśokā, Vimalā, and Vasantikā. One day, all of them went to a forest and undertook acts of charity and righteousness in the presence of a muni. By the merit of that virtuous deed, they were reborn as goddesses in the Achyuta heaven, known respectively as Ratisheṇā, Susīmā, Sukhāvatī, and Subhagā.These goddesses are you four. And your maidservants were reborn as the daughters of Vyantara deities, named Chitraśeṇā, Chitravegā, Dhanavatī, and Dhanshrī. King Suradeva, after death, took birth as Pingala, a prison-warden, who was himself imprisoned due to his own misdeeds. Suradeva’s mother was reborn as a princess and was married to Prince Shrīpāla. At the time of their wedding celebration, all prisoners were released, and thus Pingala too regained his freedom. He shall now renounce the world, be reborn in the Achyuta heaven, and there he will become your husband!’As the muni uttered these auspicious words, Pingala renounced the household life, was reborn in the Achyuta heaven, and thereby fulfilled the prophecy of the muni.Meanwhile, the four Vyantara maidens came and asked the Omniscient Lord about their destined husbands.” ॥348–360॥
श्लोक ( Shlok ) 361
पूर्वोक्तपिङ्गलाख्यस्य सूनुर्नाम्नाऽतिपिङ्गलः । सोऽपि संन्यस्य युष्माकं रतिदायी भविष्यति ॥३६१॥
मुनिराज कहने लगे कि पूर्वोक्त पिङ्गल नामक कोतवालके एक अतिपिङ्गल नामका पुत्र है वही संन्यास धारणकर तुम्हारा पति होगा ॥ ३६१।।
The venerable muni then declared: “The son of the aforementioned warden Pingala, named Atipingala, shall renounce the world and become your husband.” ॥361॥
श्लोक 362 से 369
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 255 | श्लोक 256 से 271 | श्लोक 272 से 286 | श्लोक 287 से 296 | श्लोक 297 से 313 | श्लोक 314 से 322 | श्लोक 323 से 331 | श्लोक 332 से 341