आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 158 भरत की महिमा
बुद्धिपरक कुलकर भरत लोकाचार के सूत्रधार थे। वे राजशास्त्र, धर्मशास्त्र, और कलाओं में श्रेष्ठ थे। उनका प्रथम राज्य, सार्वभौम पद, और यश आश्चर्यजनक था। विद्वानों में चक्रवर्ती के रूप में उनकी कीर्ति फहराती थी। समस्त तत्त्वों को जानकर वे जिनेंद्रदेव के धर्ममार्ग का स्मरण और प्रचार करते थे। शत्रुरहित पृथ्वी का पालन कर भोगों के साथ क्रीड़ा करते थे। लक्ष्मी और सरस्वती के समागम से सुख स्वामी, शास्त्र-शस्त्र निपुण, और जिनेंद्रदेव की सेवा में अग्रेसर थे। इस प्रकार इकतालीसवाँ पर्व समाप्त हुआ।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 41- Shlok 152 to 158
श्लोक ( Shlok ) 152
इत्थं सर्वेषु शास्त्रेष कलासु सकलासु च । लोक स संमति प्राप्य तद्विद्यानां मतोऽभवत् ॥१५२॥
इस प्रकार समस्त शास्त्र और समस्त कलाओंमें प्रतिष्ठा पाकर वे भरत उन विद्याओंके जानने-वालों में मान्य हुए थे ॥ १५२॥
Thus, having attained eminence in all the sciences and all the arts, Bharata was revered among the scholars of these disciplines. ॥152॥
श्लोक ( Shlok ) 153
किमत्र बहुनोक्तेन प्रज्ञापारमितो मनुः । कृत्स्नस्य लोकवृत्तस्य स भेजे सूत्रधारताम् ॥१५३॥
इस विषयमें बहुत कहनेसे क्या लाभ है ? इतना कहना ही पर्याप्त है कि बुद्धिके पारगामी कुलकर भरत समस्त लोकाचारके सूत्रधार हो रहे थे ।॥१५३॥
What benefit is there in saying more on this matter? It suffices to state that Bharata, the most accomplished of intellect, was the very architect of all worldly conduct. ॥153॥
श्लोक ( Shlok ) 154
राजसिद्धान्ततत्त्वज्ञो धर्मशास्त्रार्थतत्त्ववित् । परिख्यातः कलाज्ञाने सोऽभून्मूर्ध्नि सुमेधसाम् ॥१५४।॥
वे राजशास्त्रके तत्त्वोंको जानते थे, धर्मशास्त्रके तत्त्वोंके जानकार थे, और कलाओंके ज्ञानमें प्रसिद्ध थे । इस प्रकार उत्तम विद्वानोंके मस्तकपर सुशोभित हो रहे थे अर्थात् सबमें श्रेष्ठ थे ।।१५४।।
They were well-versed in the principles of statecraft, knowledgeable in the tenets of dharmaśāstra, and renowned for their mastery of the arts; thus, they adorned the crowns of the finest scholars—that is, they excelled above all. ॥154॥
श्लोक ( Shlok ) 155
इत्यादिराजं तत्सत्राडहो राजर्षिनायकम्। तत्सार्वभौममित्यस्य दिशासूच्छलितं यशः ॥१५५।।
अहो, इनका प्रथम राज्य कैसा आश्चर्य करनेवाला है, यह सम्म्राट् हैं, राजर्षियों-में मुख्य हैं, इनका सार्वभौम पद भी आश्चर्यजनक है इस प्रकार उनका यश समस्त दिशाओंमें उछल रहा था ।। १५५।।
Ah! How wondrous was their first reign! They were the emperor among kings, foremost among royal sages, and their imperial sovereignty was truly astonishing—thus, their fame resounded with vigor in all directions. ॥155॥
श्लोक ( Shlok ) 156
इति सकलकलानामेकमोकः स चक्री कृतमतिभिरजर्य सङ्गतं संविधित्सन् । बुधसदसि सदस्यान् बोधयन् विश्वविद्या व्यवृणुत बुधचक्रीत्युच्छलत्कीर्तिकेतुः ॥१५६॥
इस प्रकार जो समस्त कलाओंका एकमात्र स्थान है, जो बुद्धिमान् पुरुषोंके साथ अविनाशी मित्रता करना चाहता है और ‘यह विद्वानोंमें चक्रवर्ती है अथवा विद्वान् चक्रवर्ती है’ इस प्रकार जिसकी कीर्तिरूपी पताका फहरा रही है ऐसा वह चक्रवर्ती भरत विद्वानोंकी सभामें समस्त विद्याओंका उपदेश देता हुआ समस्त विद्याओंका व्याख्यान करता था ।।१५६।।
Thus, he who is the sole abode of all the arts, who desires eternal friendship with the wise, and whose banner of fame waves with the acclaim—“Is he the Chakravartin among scholars, or the scholar among Chakravartins?”—this very Chakravartin Bharata, in assemblies of learned men, would teach and expound upon all branches of knowledge. ॥156॥
श्लोक ( Shlok ) 157
जिनविहितमनूनं संस्मरन् धर्ममार्ग स्वयमधिगततत्त्वो बोधयन् मार्गमन्यान् । कृतमतिरखिलां क्ष्मां पालयन्निःसपत्नां चिरमरमत भोगैर्भूरिसारैः स सम्राट् ।।१५७।।
जिसने समस्त तत्त्वोंको जान लिया है और जिसकी बुद्धि परिपक्व है ऐसा सम्राट् भरत, जिनेन्द्रदेव के कहे हुए न्यूनतारहित धर्ममार्गका स्मरण करता हुआ तथा वही मार्ग अन्य लोगोंको समझाता हुआ और शत्रुरहित सम्पूर्ण पृथिवीका पालन करता हुआं सारपूर्ण भोगोंके द्वारा चिरकालतक क्रीड़ा करता रहा था।। १५७।।
Having comprehended all principles and possessing a mature intellect, Emperor Bharata, recalling the flawless path of righteousness taught by Jinendra, would not only uphold that path himself but also impart it to others. While governing a world free of enemies, he engaged in joyful pursuits, indulging in wholesome pleasures for a long time. ॥157॥
श्लोक ( Shlok ) 158
लक्ष्मीवाग्वनितासमागमसुखस्यैकाधिपत्यं दधत् दूरोत्सारितदुर्णयः प्रशमिनीं तेजस्वितामुद्वहन् । न्यायोपार्जितवित्तकामघटनः शस्त्रे च शास्त्रे कृती राजर्षिः परमोदयो जिनजुषा मग्रसरः सोऽभवत् ।।१५८॥
जो लक्ष्मी और सरस्वतीके समागमसे उत्पन्न हुए सुखके एक स्वामित्वको धारण कर रहा है, जिसने समस्त दुष्ट नय दूर हटा दिये हैं, जो शान्तियुक्त तेजस्वीपनेको धारण कर रहा है, जिसने न्यायपूर्वक कमाये हुए धनसे काम-का संयोग प्राप्त किया है, जो शस्त्र और शास्त्र दोनोंमें ही निपुण है, राषि है और जिसका अभ्यदय अतिशय उत्कृष्ट है ऐसा वह भरत जिनेन्द्रदेवकी सेवा करनेवालोंमें अग्रेसर अर्थात् सबसे श्रेष्ठ था ।।१५८।।
He who embodies the union of Lakshmi and Sarasvati—possessing the sole mastery over such bliss; who has dispelled all wicked doctrines; who bears a serene and radiant brilliance; who, through justly earned wealth, has attained the fulfillment of desires; who is skilled in both arms and scriptures; a sovereign whose valor is unmatched and whose gentleness is supreme—that Bharata was foremost among the devotees of Jinendra, the most exalted of all. ॥158॥
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षण महा-पुराणसङ्ग्रहे भरतराजस्वप्नदर्शनतत्फलोपवर्णनं नाम एकचत्वारिंशत्तमं पर्व ॥४१॥
इस प्रकार भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रहके भाषानुवादमें भरतराजके स्वप्न तथा उनके फलका वर्णन करनेवाला इकतालीसवां पर्व समाप्त हुआ ।
Thus concludes the forty-first canto of the Bhāṣā translation of the Triṣaṣṭi Lakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the venerable Bhagavajjinasena Acharya, which narrates the dreams of King Bharata and their outcomes.
आदिपुराण पर्व 42 – भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला
पर्व 42 – श्लोक 1 से 12
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211
आदिपुराण पर्व 40 – द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 31 | श्लोक 32 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 223
आदिपुराण पर्व 41 – भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
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