आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 222 to 232
श्लोक ( Shlok ) 222
सप्रभा चन्द्रलेखेव सह तत्र’ प्रभावती । गुणवत्या सभागंस्त सङ्गतिः स्याद्यदृच्छया ॥२२२॥
प्रभासहित चन्द्रमाकी कलाके समान आर्यिका-प्रभावती भी वहाँ आई और गुणवती-गणिनी के साथ मिलकर रहने लगी सो ठीक ही है क्योंकि समागम अपनी इच्छानुसार ही होता है ।॥ २२२॥
Just as a digit of the moon accompanied by its effulgence, so too did the venerable Aryika Prabhavati arrive there and, joining company with the noble Ganini Gunavati, began to dwell together. And rightly so, for all union comes to pass in accordance with one’s own will. ॥222॥
श्लोक ( Shlok ) 223 – 227
गुणवत्यार्यिकां दृष्ट्वा नत्वोक्ता प्रियदत्तया । “कुतोऽसौ’ ‘गणिनीत्याख्यत् स्वर्ग तेति प्रभावती ॥२२३॥ तच्छ्रु त्वा नेत्रभूता’ नौ सैवेति शुचमागता । कुतः प्रीतिस्तयेत्युक्ता साऽब्रवीत् प्रियदत्तया ॥२२४॥न स्मरिप्यसि किं पारावतद्वन्द्वं भवद्गृहे । “तत्राहं रतिषेणेति तच्छ्रुत्वा विस्मिताऽवदत् ॥२२५॥क्वासौ रतिवरोऽद्येति सोऽपि विद्याधराधिपः । हिरण्यवर्मा कर्मारिर्यतिरत्रेति “साब्रवीत् ॥२२६॥ प्रियदत्ताऽपि तं गत्वा वन्दित्वैत्य महामुनिम् । प्रभावती परिप्रश्नात् पत्युरित्याह वृत्तकम् ॥ २२७॥
गुणवती-गणिनीको देखकर प्रियदत्ताने नमस्कार कर पूछा कि संघाधिकारिणी अमितमति कहां हैं ? तब उसने कहा कि ‘वह तो स्वर्ग चली गई है’ यह सुनकर प्रभावती कुछ शोक करने लगी और कहने लगी कि ‘हम दोनोंकी आंखें वहीं थी,’ तब प्रियदत्ताने पूछा कि उनके साथ तुम्हारा प्रेम कैसे हुआ ? उत्तरमें प्रभावती कहने लगी कि आपको क्या स्मरण नहीं है आपके घरमें जो कबूतर-कबूतरीका जोड़ा रहता था उनमेंसे मैं रतिषेणा नामकी कबूतरी हूँ, यह सुनकर प्रियदत्ता आश्चर्यसे चकित होकर कहने लगी कि ‘वह रतिवर कबूतर आज कहाँ है तब प्रभावतीने कहा कि वह भी विद्याधरोंका राजा हिरण्यवर्मा हुआ है और कर्मरूपी शत्रुओंको नाश करनेवाला वह आज इसी पुण्डरीकिणी नगरी में विराजमान है। प्रियदत्ताने भी जाकर महामुनि-हिरण्यवर्माकी वन्दना की और फिर प्रभावती के पूछनेपर अपने पतिका वृत्तान्त इस प्रकार कहने लगी ॥ २२३-२२७।।
Beholding the noble Ganini Gunavati, Priyadatta offered his salutations and inquired, “Where is the Sanghadhikarini Amitamati?” To this, she replied, “She has departed for heaven.” Hearing these words, Prabhavati was seized with sorrow and said, “Our very eyes were fixed upon her.” Then Priyadatta asked, “How did such deep affection arise between you and her?”In response, Prabhavati spoke: “Do you not recall the pair of pigeons who once dwelt in your home? Among them, I was the female pigeon named Ratisheṇa.” Hearing this, Priyadatta was astonished and asked in wonder, “Where now is that beloved male pigeon?” Prabhavati replied, “He has become none other than Hiranyavarma, the king of the Vidyadharas, who, having vanquished the enemies in the form of karmic bonds, now reigns in this very city of undarikini.”Priyadatta too went forth and offered reverent homage to the great sage Hiranyavarma, and then, at Prabhavati’s inquiry, began to recount the tale of her own husband in this manner. ॥223–227॥
श्लोक ( Shlok ) 228
विजयार्द्धगिरेरस्य गान्धारनगराविह” । विहर्तु रतिषेणोऽमा गान्धार्या प्रिययाऽगमत् ॥२२८॥
एक रतिषेण नामका विद्याधर अपनी स्त्री गांधारीके साथ साथ इसी विजयार्ध पर्वतके गांधार नगरसे विहार करनेके लिये यहां आया था ॥ २२८॥
A Vidyadhara by the name of Ratisheṇa, together with his wife Gandhari, had come here from the city of Gandhara on the victorious peak of Mount Vijayardha, journeying forth for their pleasure. ॥228॥
श्लोक ( Shlok ) 229 – 232
गान्धारी सर्पदष्टाऽहमिति तत्र मृषा स्थिता । मन्त्रौषधीः प्रयोज्यास्याः श्रेष्ठी विद्याधरश्च सः ॥२२९llमायया नास्मि शान्तेति तद्वाक्यात् खेदमागतौ’ । आह तु स्वपतौ याते वनं शक्तिमदौषधम् ॥२३०।। गान्धारीं” बन्धकीभावमुपेत्य स्मरविक्रियाम् । ‘दर्शयन्तीं निरीक्ष्याह वणिग्वर्यो दृढव्रतः ॥२३१॥अहं “वर्षवरो वेत्सि न कि मामित्युपायवित् । व्यधाद् विरक्तचित्तां तां तदेव हि धियः फलम् ॥२३२॥
मुझे सर्पने काट खाया है इस प्रकार झूठ झूठ बहानाकर गांधारी यहां पड़ रही, सेठ कुबेरकान्त और विद्याधरने बहुत सी औषधियोंका प्रयोग किया परन्तु गांधारीने मायाचारीसे कह दिया कि ‘अभी मुझे शान्ति नहीं हुई है, यह सुनकर उसके पति रतिषेणको बहुत दुःख हुआ। वह अधिक शक्तिवाली औषधि लानेके लिये वनमें चला गया, इधर उसके चले जानेपर गांधारीने कुलटापन धारण कर कामकी चेष्टाएं दिखाई, यह देखकर उपायको जाननेवाले और अपने व्रतमें दृढ रहनेवाले सेठ कुबेरकान्तने कहा कि अरे, मैं तो नपुंसक हूं-क्या तुझे मालूम नहीं ? ऐसा कहकर सेठने उसे अपनेसे विरक्तचित्त कर दिया सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिका फल यही है ॥२२९-२३२।।
Feigning a false pretext, Gandhari lay there claiming, “I have been bitten by a serpent.” The wealthy merchant Kuberkant and the Vidyadhara tried many remedies, yet Gandhari, with cunning deceit, insisted, “I have found no relief as yet.” Hearing this, her husband Ratisheṇa was overcome with sorrow and set forth into the forest to procure a more potent medicine.
Meanwhile, in his absence, Gandhari, adopting wanton ways, began to display lewd and lustful gestures. Observing this, the discerning and steadfast Kuberkant, unwavering in his vow, declared, “Ah! Do you not know that I am impotent?” By these words, the wise merchant caused her heart to turn away from him—and rightly so, for such is the true fruit of intelligence. ॥229–232॥
श्लोक 233 से 241
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 170 | श्लोक 171 से 181 | श्लोक 182 से 194 | श्लोक 195 से 211 | श्लोक 212 से 221