आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 अर्ककीर्ति की हठधर्मिता
अर्ककीर्ति ने अनवद्यमति के उपदेश को ठुकरा दिया। उसने स्वीकार किया कि स्वयंवर प्राचीन विधि है और अकम्पन मान्य हैं, लेकिन जयकुमार के प्रति पक्षपात का आरोप लगाया। उसने कहा कि अकम्पन ने कपट से सुलोचना को जयकुमार को दिया। वह जयकुमार को नष्ट करने और अन्याय का निराकरण करने की बात कहता है, यह दावा करते हुए कि उसका पराक्रम और धर्म नष्ट नहीं होगा।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 44- Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok )52
ननु न्यायेन बन्धोस्ते बन्धुपुत्री समर्पिता । उत्सवे का पराभूतिरक्षमा’ऽत्र पराभवः ॥५२॥
निश्चय से तेरे एक भाईकी पुत्री तेरे दूसरे भाईके लिये न्यायपूर्वक समर्पण की गई है, ऐसे उत्सवमें तुम्हारा क्या तिरस्कार हुआ ? हां, तुम्हारी असहनशीलता ही तिरस्कार हो सकती है ? भावार्थ – हितकारी होनेसे जिस प्रकार जयकुमार तुम्हारा भाई है उसी प्रकार अकंपन भी तुम्हारा भाई है। एक भाईकी पुत्री दूसरे भाईके लिये न्यायपूर्वक दी गई है इसमें तुम्हारा क्या अपमान हुआ ? हां, यदि तुम इस बातको सहन नहीं कर सकते हो तो यह तुम्हारा अपमान हो सकता है ।॥५२॥
Surely, the daughter of one brother has been rightfully offered in marriage to another brother—what dishonour, then, has befallen you in this noble celebration? Nay, it is only your own intolerance that may be deemed disgraceful.
Bhāvārtha (Interpretative Meaning):
Just as Jayakumāra is your brother by virtue of familial affection and righteousness, even so is Akampana your brother. When the daughter of one brother is justly given in marriage to another, what insult can there be to you in such an honourable alliance? If anything seems bitter to you in this, it is but your own inability to accept it—that alone may be called your dishonour.52
श्लोक ( Shlok )53
कन्यारत्नानि सन्त्येव बहून्यन्यानि भूभुजाम् । इह तानि सरत्नानि सर्वाण्यद्यन’ यामि ते ॥५३॥
सुलोचनाके सिवाय राजाओंके और भी तो बहुतसे कन्यारत्न हैं, रत्ना-लंकार सहित उन सभी कन्याओंको मैं आज तुम्हारे लिये यहां ला देता हूँ ॥५३॥
Apart from Sulochanā, there are many other princesses—peerless gems among women—adorned with every ornament of virtue and beauty. This day, I shall bring them all before you, arrayed in splendour, for your choosing.53
श्लोक ( Shlok )54
इति नीतिलतावृद्धिविधाय्यपि वचः पयः । “व्यघात् तच्चेतसः क्षोभं तप्ततैलस्य वा भृशम् ॥५४॥
इस प्रकार अनवद्यमति मंत्रीका वचनरूपी जल यद्यपि नीतिरूपी लताको बढ़ानेवाला था तथापि उसने तपे हुए तेलके समान अर्ककीर्तिके चित्तको और भी अधिक क्षोभित कर दिया था ।॥५४॥
Thus, though the minister of unblemished intellect spoke words that were like water—meant to nourish the vine of righteous counsel—yet, to the seething heart of Arkakīrti, they acted rather like boiling oil, deepening the turmoil within.54
श्लोक ( Shlok )55
सर्वमेतत् समाकर्ण्य बुद्धिं कर्मानुसारिणीम् । स्पष्टयन्निव दुर्बुद्धिरिति प्रत्याह भारतीम् ॥५५।।
यह सब सुनकर ‘बुद्धि कर्मोंके अनुसार ही होती है,’ इस बातको स्पष्ट करता हुआ वह दुर्बुद्धि इस प्रकार वचन कहने लगा ॥५५॥
Hearing all this, that misguided one—his very words revealing the truth that wisdom follows the path of one’s deeds—thus began to speak in his folly.55
श्लोक ( Shlok )56 – 58
अस्ति स्वयंवरः पन्थाः परिणीतौ’ चिरन्तनः । पितामहकृतो मान्यो वयोज्येष्ठस्त्वकम्पनः ॥५६॥ किन्तु सोऽयं जयस्नेहात्तस्योत्कर्ष चिकीर्पुकः । स्वसुतायाश्च सौभाग्यप्रतीतिप्रविधित्सुकः ॥५७।।सर्वभूपालसन्दोह सभाविर्भावितोदयात् । स्वयं चक्रीयितु चैव व्यधत्त कपटं शठः ॥५८॥
मैं मानता हूँ कि विवाहकी विधियोंमें स्वयंवर ही पुरातन मार्ग है और यह भी स्वीकार करता हूँ कि हमारे पितामह भगवान् वृषभदेवके द्वारा स्थापित होने तथा वयमें ज्येष्ठ होनेके कारण अकम्पन महाराज मेरे मान्य हैं परन्तु वह जयकुमारपर स्नेह होनेसे उसीका उत्कर्ष करना चाहता है और सबपर अपनी पुत्रीके सौभाग्यकी प्रतीति करना चाहता है। समस्त राजाओंके समूहके द्वारा प्रकट हुए बड़प्पनसे अपने आपको चक्रवर्ती बनानेसे लिये ही उस मूर्खने यह कपट किया है ।।५६-५८।।
I do concede that among the rites of marriage, the svayaṃvara is indeed the ancient and noble path; and I acknowledge as well that King Akampana, by virtue of his seniority and his descent from the venerable Lord Ṛṣabhadeva, is worthy of my reverence.
Yet it is clear that, moved by fondness for Jayakumāra, he seeks to elevate him alone—desiring to bestow the prestige of his daughter’s fortune solely upon him.
Indeed, blinded by affection and ambition, that foolish king has feigned fairness—crafting this entire deception in the name of a svayaṃvara—merely to crown himself a cakravartin by the gathered grandeur of assembled kings.56 – 58
श्लोक ( Shlok )59
प्राक्समर्थितमन्त्रेण “प्रदायास्मै स्वचेतसा । कृतसंकेतया माला सुतयाऽऽरोपिता मृषा ॥५९॥
‘यह कन्या जयकुमारको ही देनी है’ ऐसी सलाह अकंपन पहले ही कर चुका था और उसी सलाहके अनुसार अपने हृदयसे जयकुमारके लिये कन्या दे भी चुका था परन्तु यह सब छिपानेके लिये जिसे पहले ही संकेत किया गया है ऐसी पुत्रीके द्वारा उसने यह माला झूठमूठ ही डलवाई है ।॥५९॥
Let this maiden be given to Jayakumāra”—such was the counsel Akampana had resolved upon long before. And in accordance with that very resolve, he had already, in his heart, bestowed his daughter upon him.
Yet to conceal this preordained choice, he orchestrated this garland-bestowal as a mere pretense—placing it in the hands of a daughter who had already been instructed beforehand.59
श्लोक ( Shlok )60
युगादौ कुलवृद्धेन’ मायेय सम्प्रवर्तिता । मयाद्य यद्युपेक्ष्येत कल्पान्ते नैव वार्यते ॥६०॥
युगके आदि में उच्चकुलीन अकम्पनके द्वारा की हुई इस मायाकी यदि आज मैं उपेक्षा कर दूँ तो फिर कल्प-कालके अन्ततक भी इसका निवारण नहीं हो सकेगा ॥६०॥
If I now turn a blind eye to this deceit—wrought at the very dawn of the age by Akampana, though born of a noble line—then never, even until the end of the cosmic cycle, shall its consequences be undone.60
श्लोक ( Shlok )61
न चक्रिणोऽपि कोपाय स्यादन्यायनिषेधनम् । प्रवर्तयत्यसौ दण्डं मय्यप्यन्यायवर्तिनि ॥६१॥
अन्यायका निराकरण करना चक्रवर्तीके भी क्रोधके लिये नहीं हो सकता क्योंकि जब मैं अन्यायमें प्रवृत्ति कर बैठता हूं तब वे मुझे भी तो दण्ड देते हैं । भावार्थ-चक्रवर्ती अन्यायको पसन्द नहीं करते हैं, और में भी अन्यायका ही निराकरण कर रहा हूं इसलिये वे मेरे इस कार्यपर क्रोध नहीं करेंगे ॥६१।।
Even the universal monarch does not kindle wrath when one acts to vanquish injustice—for when I myself am found treading the path of unrighteousness, is it not he who metes out punishment unto me as well?
How then could he take offense when I now seek only to destroy that which is unjust?61
श्लोक 62 से 72
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 43 – सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 46 | श्लोक 47 से 69 | श्लोक 70 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 264 | श्लोक 265 से 275 | श्लोक 276 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 339
आदिपुराण पर्व 44 – जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
