भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 211 विवाह की स्वीकृति और उत्साह
वज्रदंत ने कहा कि श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह पहले से नियत था। वज्रबाहु अत्यंत प्रसन्न हुआ, वसुंधरा को हर्ष हुआ, और सभी ने विवाह की प्रशंसा की। दोनों सुंदर थे, मानो कामदेव और रति। नगर और राजमहल शोभायमान हुए। विश्वकर्मा ने रत्न-सुवर्ण से मंडप बनाया, जिसमें सुवर्ण खंभे और रत्न तलकुंभ थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
प्रागेव चिन्तितं कार्य मयेदमतिमानुषम् । विधिस्तु प्राक्तरामेव सावधानोऽत्र के वयम् ।।२०२।।
इस लोकोत्तर कार्य का मैंने पहले से ही विचार कर लिया था । अथवा इन दोनों का दैव (कर्मों का उदय) इस विषय में पहले से ही सावधान हो रहा है । इस विषय में हम लोग कौन हो सकते हैं ? ।।202।।
I had already contemplated this divine task. Alternatively, the fate (the rise of their actions) of these two has been alert to this matter from the beginning. In this regard, who are we to intervene? ||202||
श्लोक ( Shlok ) 203
इति चक्रधरेणोक्तां वाचं संपूज्य पुण्यधीः । वज्रबाहुः परां कोटिं प्रीतेरध्यारुरोह सः ॥ २०३॥
इस प्रकार चक्रवर्ती के द्वारा कहे हुए वचनों का सत्कार कर वह पवित्र बुद्धि का धारक राजा वज्रबाहु प्रीति की परम सीमा पर आरूढ़ हुआ―अत्यंत प्रसन्न हुआ ।।203।।
Thus, King Vajrabahu, the possessor of pure intellect, honored the words spoken by the emperor and was filled with the utmost joy and love—he became exceedingly happy. ||203||
श्लोक ( Shlok ) 204
वसुन्धरा महादेवी पुत्रकल्याणसंपदा । तया प्रमदपूर्णाङ्गी न स्वाङ्गे नन्वमात्तताः
उस समय वज्रजंघ की माता वसुंधरा महादेवी अपने पुत्र की विवाहरूप संपदा से इतनी अधिक हर्षित हुई कि अपने अंग में भी नहीं समा रही थी ।।204।।
At that time, Vajrajangha’s mother, Vasundhara Mahadevi, was so overjoyed by the marriage-related prosperity of her son that she was overflowing with happiness, unable to contain it even within herself. ||204||
श्लोक ( Shlok ) 205
सा तदा सुतकल्याणमहोत्सवसमुद्गतम् । रोमाञ्चमन्वितं भेजे प्रमदाकुरसन्निभम् ।।२०५॥
उस समय वसुंधरा के शरीर में पुत्र के विवाहरूप महोत्सव से रोमांच उठ आये थे जो ऐसे जान पड़ते थे मानो हर्ष के अंकुर ही हो ।।205।।
At that moment, Vasundhara’s body was filled with a thrill from her son’s marriage celebrations, and it seemed as though the very sprouts of joy had awakened within her. ||205||
श्लोक ( Shlok ) 206
मन्त्रि मुख्यमहामात्यसेनापतिपुरोहिताः । “सामन्ताश्च सपौरास्तकल्याणं बहुमेनिरे ।।२०६।।
मंत्री, महामंत्री, सेनापति, पुरोहित, सामंत तथा नगरवासी आदि सभी लोगों ने उस विवाह की प्रशंसा की ।।206।।
The ministers, chief ministers, commanders, priests, nobles, and townspeople, along with others, all praised the marriage. ||206||
श्लोक ( Shlok ) 207
कुमारी वज्रजङ्घोऽयमनङ्गसदृशाकृतिः । श्रीमतीयं रतिं रूपसंपदा निर्जिगीषति ||२०७।।
यह कुमार वज्रजंघ कामदेव के समान सुंदर आकृति का धारक है और यह श्रीमती अपनी सौंदर्य-संपत्ति से रति को जीतना चाहती है ।।207।।
This prince Vajrajangha possesses a form as beautiful as that of Kamadeva, and Shrimati, with her wealth of beauty, desires to win over Rati, the goddess of love. ||207||
श्लोक ( Shlok ) 208
अभिरूपः कुमारोऽयं सुरूपा कन्यकानयोः । अनुरूपोऽस्तु संबन्ध सुरदम्पतिलीलयोः ॥२०८॥
यह कुमार सुंदर है और यह कन्या भी सुंदरी है इसलिए देव-देवांगनाओं की लीला को धारण करने वाले इन दोनों का योग्य समागम होना चाहिए ।।208।।
This prince is handsome, and this maiden is also beautiful. Therefore, the union of these two, who embody the divine play of gods and goddesses, should be fitting. ||208||
श्लोक ( Shlok ) 209
इति प्रमदविस्तारमुद्वहत् तत्पुरं तदा । राजवेश्म च संवृत्तं श्रियमन्यामिवाश्रितम् ।।209।।
इस प्रकार आनंद के विस्तार को धारण करता हुआ वह नगर बहुत ही शोभायमान हो रहा था और राजमहल का तो कहना ही क्या था ? वह तो मानो दूसरी ही शोभा को प्राप्त हो रहा था, उसकी शोभा ही बदल गयी थी ।।209।।
Thus, the city, filled with the expansion of joy, was becoming exceedingly beautiful, and as for the royal palace, it was as if it had acquired a completely new radiance—its splendor had transformed. ||209||
श्लोक ( Shlok ) 210
विवाहमण्डपारम्भं चक्रवर्ति निदेशतः । महास्थपतिरातेने परायमणिकाञ्जनैः ॥२१०॥
चक्रवर्ती की आज्ञा से विश्वकर्मा नामक मनुष्य रत्न ने महामूल्य रत्नों और सुवर्ण से विवाहमंडप तैयार किया था ।।210।।
By the command of the emperor, a man named Vishvakarma, a gem among humans, prepared the wedding pavilion with precious gems and gold. ||210||
श्लोक ( Shlok ) 211
चामीकरमयाः स्तम्भाः ‘तलकुम्भैर्महोदयैः। रत्नोज्ज्वलैः श्रियं तेनुनृपा इव नृपासनैः ।।२११
उस विवाहमंडप में सुवर्ण के खंभे लगे हुए थे और उनके नीचे रत्नों से शोभायमान बड़े-बड़े तलकुंभ लगे हुए थे, उन तलकुंभों से वे सुवर्ण के खंभे ऐसे सुशोभित हो रहे थे जैसे कि सिंहासनों से राजा सुशोभित होते हैं ।।211।।
In the wedding pavilion, there were golden pillars, and beneath them were large, gem-adorned vessels. These pillars were adorned in such a way by the vessels that they appeared as magnificent as a king seated on a throne. ||211||
श्लोक 212 से 221
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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