भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102
श्लोक 103 से 111 वज्रदंत का श्रीमती को आश्वासन
वज्रदंत ने श्रीमती को बताया कि जब उनकी आयु में 50,000 पूर्व वर्ष बाकी थे, वे स्वर्ग से च्युत हुए। श्रीमती और ललितांग भी च्युत होकर इस देश में राजपुत्र और राजपुत्री बने। तीसरे दिन श्रीमती का ललितांग (वज्रजंघ) से मिलन होगा, और पंडिता आज समाचार लाएगी। ललितांग उनकी बुआ का पुत्र है। वज्रदंत मामी को लाने गए, तभी पंडिता प्रसन्न मुख से आई और श्रीमती से बोली।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 103 to 111
श्लोक ( Shlok ) 103
“नियुवार्द्धप्रसंख्यानि” पूर्वाण्यायुःस्थितौ यदा । भवतोः परिशिष्टानि तदाहं प्रच्युतो दिवः ॥१०३॥
जब आप दोनों की आयु में पचास हजार पूर्व वर्ष बाकी थे तब मैं स्वर्ग से च्युत हुआ था ।।103।।
“When fifty thousand purva years of your lifespan remained, I descended from heaven.” 103
श्लोक ( Shlok ) 104
युवां च परिशिष्टायुर्भुक्त्वान्ते त्रिदिवाच्च्युतौ । जातौ यथास्वमत्रेव विषये राजदारकौ ॥१०४॥
तुम दोनों भी अपनी बाकी आयु भोगकर स्वर्ग से च्युत हुए और इसी देश में यथायोग्य राजपुत्र और राजपुत्री हुए हो ।।104।।
“Both of you, after completing your remaining lifespan, descended from heaven and were born in this land as a noble prince and princess, respectively.” 104
श्लोक ( Shlok ) 105
“जनितेतस्तृतीयेऽह्नि ललिताङ्गचरेण ते । संगमोद्यैव तद्वार्ता पण्डित्तानेष्यति स्फुटम् ॥ १०५ ॥
आज से तीसरे दिन तेरा ललितांग के जीव राजपुत्र के साथ समागम हो जायेगा । तेरी पंडिता सखी आज ही उसके सब समाचार स्पष्ट रूप से लायेगी ।।105।।
“On the third day from today, you will reunite with Lalitanga’s soul, who is now a prince. Your wise friend will bring you detailed news about him today itself.” 105
श्लोक ( Shlok ) 106
पैतृष्वयस्त्रीय एवायं तव मर्ता भविष्यत्ति । तदियं मृग्यमाणैव वल्ली पादेऽवसज्यते ॥१०६॥
हे पुत्रि, वह ललितांग तेरी बुआ के ही पुत्र उत्पन्न हुआ है और वही तेरा भर्ता होगा । यह समागम ऐसा आ मिला है मानो जिस बेल को खोज रहे हों वह स्वयं ही अपने पाँव में आ लगी हो ।।106।।
“O daughter, Lalitanga has been born as the son of your aunt, and he will be your husband. This union is so perfectly aligned, as if the very vine one is seeking has willingly entwined around one’s feet.” 106
श्लोक ( Shlok ) 107
मातुलान्यास्तवायान्त्या वयमप्यद्य पुत्रिके । प्रत्युद्गच्छाम इत्युक्त्वा राजोत्थाय ततोऽगमत् ॥१०७॥
हे पुत्रि तेरी मामी आज आ रही हैं इसलिए उन्हें लाने के लिए हम लोग भी उनके सम्मुख जाते हैं ऐसा कहकर राजा वज्रदंत उठकर वहाँ से बाहर चले गये ।।107।।
“O daughter, your aunt is arriving today, so we shall go to receive her.” Saying this, King Vajradanta stood up and left the place.” 107
श्लोक ( Shlok ) 108
पण्डिता तत्क्षणं प्राप्ता प्रफुल्लवदनाम्बुजा । मुखरागेण संलक्ष्यकार्यसिद्धिरुवाचताम् ॥१०८॥
राजा गये ही थे कि उसी क्षण पंडिता सखी आ पहुँची । उस समय उसका मुख प्रफुल्लित हो रहा था और मुख की प्रसन्न कांति कार्य की सफलता को सूचित कर रही थी । वह आकर श्रीमती से बोली ।।108।।
“As soon as the king had left, the wise friend arrived. Her face was radiant with joy, and the cheerful glow on her face hinted at the success of her mission. Approaching Shrimati, she spoke.” 108
श्लोक ( Shlok ) 109
त्वं दिष्ट्या बर्द्धसे कन्ये पूर्णस्तेऽद्य मनोरथः । सप्रपञ्चं च तद्वच्मि सावधानमितः शृणु ॥१०९॥
हे कन्ये, तू भाग्य से बढ़ रही है (तेरा भाग्य बड़ा बलवान् है) । आज तेरा मनोरथ पूर्ण हुआ है । मैं विस्तार के साथ सब समाचार कहती हूँ, सावधान होकर सुन ।।109।।
“O maiden, your fortune is truly great! Today, your desire has been fulfilled. I will tell you everything in detail, so listen carefully.” 109
श्लोक ( Shlok ) 110
यदा पट्टकमादाय गताहं त्वन्निदेशतः । तदास्थां विपुलाश्रये महापूतजिनालये ॥ ११०॥
उस समय मैं तेरी आज्ञा से चित्रपट लेकर यहाँ से गयी और अनेक आश्चर्यों से भरे हुए महापूत नामक जिनालय में जा ठहरी ।।110।।
“At that time, following your command, I took the painting and departed from here. I stayed at the Mahaputa Jinalaya, which was filled with numerous wonders.” 110
श्लोक ( Shlok ) 111
मया तत्र विचित्रस्य पट्टकस्य प्रसारणे । बहवस्तदविज्ञाय गताः पण्डितमानिनः ॥
मैंने वहाँ जाकर तेरा विचित्र चित्रपट फैलाकर रख दिया । अपने-आपको पंडित मानने वाले कितने ही मूर्ख लोग उसका आशय नहीं समझ सके । इसलिए देखकर ही वापस चले गये थे ।।111।।
“There, I spread out your marvelous painting. Many foolish individuals, who considered themselves wise, were unable to grasp its meaning. As a result, they simply looked at it and left.” 111
श्लोक 112 से 121
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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