भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 सुख और समानता
आयु तीन पल्य, आहार तीन दिन में। न रोग, न शोक, न कामज्वर। सभी समान सुखी, वज्रवृषभनाराच संहनन वाले, दीर्घायु, और कांतिमान हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
पल्यत्रयमितं यत्र देहिनामायुरिष्यते । दिनत्रयेण चाहारः कुवलीफलमात्रकः ॥७२॥
जहाँ जीवों की आयु तीन पल्य प्रमाण होती है और आहार तीन दिन के बाद होता है, वह भी बदरीफल (छोटे बेर के) बराबर ।।72।।
The lifespan of beings there is three palyas, and they consume food only once every three days, which is merely the size of a small ber (jujube fruit).
श्लोक ( Shlok ) 73 – 74
“यभ्दुवां न जरातङ्का न वियोगो न शोचनम् । नानिष्टसंप्रयोगश्च न चिन्ता दैन्यमेव च ॥७३॥
न निद्रा नातितन्द्राणं नात्युन्मेषनिमेषणम् । न शारीरमलं यत्र न लालास्त्वेदसंभवः ॥७४॥
जहां उत्पन्न हुए जीवों के न बुढ़ापा आता है, न रोग होता है, न विरह होता है, न शोक होता है, न अनिष्ट का संयोग होता है, न चिंता होती है, न दीनता होती है, न नींद आती है, न आलस्य आता है, न नेत्रों के पलक झपकते हैं, न शरीर में मल होता है, न लार बहती है और न पसीना ही आता है ।।73-74।।
The beings born there never experience old age, disease, separation, sorrow, or any adverse circumstances. They are free from worry, humility, sleep, and laziness. Their eyes never blink, their bodies remain free from impurities, there is no drooling, and they never sweat.
श्लोक ( Shlok ) 75
न यत्र विरहोन्मादो न यन्त्र मदनज्वरः । न यन्त्र खण्डना भोगे सुखं यत्र निरन्तरम् ॥७५॥
जहाँ न विरह का उन्माद है, न कामज्वर है, न भोगों का विच्छेद है किंतु निरंतर सुख-ही-सुख रहता है ।।75।।
Where there is neither the madness of separation nor the fever of desire, nor any interruption in pleasures — only continuous and unending bliss prevails.
श्लोक ( Shlok ) 76
न विषादो भयं ग्लानि र्नारुचिः कुपितं च न । न कार्पण्यमनाचारो न बली यन्त्र नाबलः ॥७६।।
जहाँ न विषाद है, न भय है, न ग्लानि है, न अरुचि है, न क्रोध है, न कृपणता है, न अनाचार है, न कोई बलवान् है और न कोई निर्बल है ।।76।।
Where there is no sorrow, fear, remorse, aversion, anger, miserliness, or wrongdoing. There, no one is strong, and no one is weak — all exist in harmony.
श्लोक ( Shlok ) 77
बालार्कसमनिर्भाषा निःस्वेदा नीरजोऽम्बराः । यत्र पुण्योदयान्नित्यं रंरम्यन्ते नराः सुखम् ॥७७॥
जहाँ के मनुष्य बालसूर्य के समान दैदीप्यमान, पसीनारहित और स्वच्छ वस्त्रों के धारक होते हैं तथा पुण्य के उदय से सदा सुखपूर्वक क्रीड़ा करते रहते हैं ।।77।।
The people there shine like the rising sun, are free from sweat, wear clean garments, and, blessed by the rise of virtue, always engage joyfully in playful activities.
श्लोक ( Shlok ) 78
दशाङ्गतरुसंभूत भोगानुभवनोद्भवम् । सुखं यत्रातिशेते तां चक्रिणो भोगसंपदम् ॥७८॥
जहाँ दश प्रकार के कल्पवृक्षों से उत्पन्न हुए भोगों के अनुभव करने से उत्पन्न हुआ सुख चक्रवर्ती की भोग संपदाओं का भी उल्लंघन करता है अर्थात् वहाँ के जीव चक्रवर्ती की अपेक्षा अधिक सुखी रहते हैं ।।78।।
Where the pleasures derived from the ten types of Kalpavrikshas (wish-fulfilling trees) surpass even the luxuries enjoyed by an emperor, meaning the beings there are far happier than a Chakravarti (universal monarch).
श्लोक ( Shlok ) 79
यत्र दीर्घायुषां नॄणां नाकाण्डे” मृत्युसंभवः । निरुपद्रवमायुः स्वं जीवन्त्युक्तप्रमाणकम् ॥79॥
जहाँ मनुष्य बड़ी लंबी आयु के धारक होते हैं उनकी असमय में मृत्यु नहीं होती । वे अपनी तीन पल्य प्रमाण आयु तक निर्विघ्न रूप से जीवित रहते हे ।।79।।
Where humans possess a very long lifespan, never facing untimely death. They live peacefully without any obstacles for their full lifespan of three palyas.
श्लोक ( Shlok ) 80
सर्वेऽपि समसंभोगाः सर्वे समसुखोदयाः । सर्वे सर्वर्तुजान् भोगान् यत्र विन्दन्त्य नामयाः ॥८०॥
जहाँ सब जीव समान रूप से भोग का अनुभव करते हैं, सबके एक समान सुख का उदय होता है, सभी नीरोग रहकर छहों ऋतुओं के भोगोपभोग प्राप्त करते हैं ।।80।।
Where all beings equally experience pleasures, enjoy the same level of happiness, remain free from diseases, and delight in the enjoyment of all six seasons.
श्लोक ( Shlok ) 81
सर्वेऽपि सुन्दराकाराः सर्वे वज्रास्थिबन्धनाः । सर्वै चिरायुषः कान्त्या गोर्वाव्या इव यद्भुवः ॥८१॥
जहाँ उत्पन्न हुए सभी जीव एक सुंदर आकार के धारक हैं, सभी वज्रवृषभनाराचसंहनन से सहित हैं, सभी दीर्घ आयु के धारक है और सभी कांति से देवों के समान हैं ।।81।।
Where all beings possess beautiful forms, are endowed with the strong and indestructible Vajra-Vrushabha-Naracha body structure, have long lifespans, and radiate brilliance comparable to the gods.
श्लोक 82 से 91
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71