भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
श्लोक 202 से 208 वज्रदंत का शासन
वज्रदंत के 14 महारत्न और 9 निधियाँ थीं। वह छह खंडों का पालन करता हुआ भोग भोगता रहा। दिग्विजय कर वह इंद्र समान नगर में लौटा, पर श्रीमती के विवाह की चिंता रही। उसने समुद्र, पर्वत, और नदियाँ जीतीं, जिनशासन का पालन किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 202 to 208
श्लोक ( Shlok ) 202
पुण्यकल्पतरोरुच्चैः फलानीव महान्त्यलम् । बभूवुस्तस्य रत्नानि चतुर्दश ‘विशां विभोः ॥२०२॥
पुण्य-रूपी कल्पवृक्ष के बड़े से बड़े फल इतने ही होते हैं यह वात सूचित करने के लिए ही मानो उस चक्रवर्ती के चौदह महारत्न प्रकट हुए थे ।।202।।
“The largest fruits of the tree of virtues, symbolizing the Kalpavriksha (wish-fulfilling tree), are only as great as these. It seems that the fourteen jewels of the Chakravarti (universal monarch) appeared just to convey this message.” ( 202)
श्लोक ( Shlok ) 203
निधयो नव तस्यासन् पुण्यानामिव राशयः । यैरक्षयैरमुप्यासीद् गृहवार्ता महोदया ॥ २०३॥
उसके यहाँ पुण्य की राशि के समान नौ अक्षय निधियाँ प्रकट हुई थीं, उन निधियों से उसका भंडार हमेशा भरा रहता था ।।203।।
Nine inexhaustible treasures, like the amount of virtues, had appeared at his place. These treasures kept his vault always filled.” ( 203)
श्लोक ( Shlok ) 204
षट्खण्डमण्डितां पृथ्त्रीमिति संपालयन्नसौ । दशाङ्गयोगसंभूतिम भुक्त सुकृती चिरम् ॥२०४॥
इस प्रकार वह पुण्यवान चक्रवर्ती छह खंडों से शोभित पृथिवी का पालन करता हुआ चिरकाल तक दस प्रकार के भोग, भोगता रहा ।।204।।
“In this way, the virtuous Chakravarti, adorned with six divisions, ruled the earth and enjoyed ten kinds of pleasures for a long time.” (204)
श्लोक ( Shlok ) 205
इति कतिपयैरेवाहोभिः कृती कृतदिग्जयो जयपृतनया सार्द्धं चक्री निवृत्य पुरीं विशन् । सुरपृत्तनया “साकं शक्रो विशन्नमरावतीमिव स रुरुचे भास्वम्मौलिर्ज्वंलन्मणिकुण्डलः ॥२०५॥
इस प्रकार दैदीप्यमान मुकुट और प्रकाशमान रत्नों के कुंडल धारण करने वाला वह कार्यकुशल चक्रवर्ती कुछ ही दिनों में दिग्विजय कर लौटा और अपनी विजय सेना के साथ राजधानी में प्रविष्ट हुआ । उस समय वह ऐसा शोभायमान हो रहा था जैसा कि दैदीप्यमान मुकुट और रत्न-कुंडलों को धारण करने वाला कार्यकुशल इंद्र अपनी देवसेना के साथ अमरावती में प्रवेश करते समय शोभित होता है ।।205।।
Thus, the efficient Chakravarti, wearing a radiant crown and glowing gem-studded earrings, returned after a short period having conquered the world. He entered the capital city accompanied by his victorious army. At that moment, he appeared as splendid as the efficient Indra, adorned with a radiant crown and gem-studded earrings, when he enters Amravati with his divine army.” (205)
श्लोक ( Shlok ) 206
विहितनिखिलकृत्योऽप्यात्मपुत्रीविवाह व्यतिकरकरणीये किंचिदन्तः सचिन्तः । पुरमविशदुदारश्रीपराध्यं पुरुश्रीमृदुपवनविधृतप्रोल्लसत्केतुमालम् ॥२०६॥
समस्त कार्य कर चुकने पर भी जिसके ह्रदय में पुत्री―श्रीमती के विवाह की कुछ चिंता विद्यमान है, ऐसे उत्कृष्ट शोभा के धारक उस वज्रदंत चक्रवर्ती ने मंद-मंद वायु के द्वारा हिलती हुई पताकाओं से शोभायमान तथा अन्य अनेक उत्तम-उत्तम शोभा से श्रेष्ठ अपने नगर में प्रवेश किया था ।।206।।
“After completing all tasks, even though his heart was still concerned about the marriage of his daughter, the illustrious Chakravarti, adorned with supreme brilliance, entered his city. His arrival was marked by flags fluttering in the gentle breeze and many other magnificent decorations, adding to the splendor of the moment.” ( 206)
श्लोक ( Shlok ) 207
धुन्दन्तो लवलीलतास्तटवने सिन्धोर्लवङ्गातते तत्रासीन सुराङ्गनालसलसन्नेत्रैः शनैर्वीताः । आभेजुर्विजयाद्धं कन्दरदरीरामृज्य सेनाचरा यस्यासौ विजयी स्वपुण्यफलितां दीर्घ भुनक्ति स्म गाम् ॥२०७॥
जिसकी सेना के लोगों ने लवंग की लताओं से व्याप्त समुद्रतट के वनों में चंदन लताओं का चूर्ण किया है, उन वनों में बैठी हुई देवांगनाओं ने जिन्हें अपने आलस्य भरे सुशोभित नेत्रों से धीरे-धीरे देखा है और जिन्होंने विजयार्ध पर्वत की गुफाओं को स्वच्छ कर उनमें आश्रय प्राप्त किया है ऐसा वह सर्वत्र विजय प्राप्त करने वाला वज्रदंत चक्रवर्ती अपने पुण्य के फल से प्राप्त हुई पृथिवी का चिरकाल तक पालन करता रहा ।।207।।
“The army of which the people had ground sandalwood vines in the forests along the seashore, where the heavenly nymphs, sitting in those forests, had slowly gazed with their lazy, adorned eyes, and who had purified the caves of the Vijayaridhi mountain and taken shelter there, that victorious Chakravarti, adorned with the glory of Vajradanta, continued to protect the earth, gained through the fruits of his virtues, for a long time.” (Verse 207)
श्लोक ( Shlok ) 208
आक्रामन् वनवेदिकान्तरगतस्तां बेजयार्द्धी तटी मुल्लङ्घयाब्धिवधूं तरङ्गतरलां गङ्गां च सिन्धुं ‘धुनीम् । *जित्वाशाः कुलभूभृदुन्नतिमपि न्यक्कृत्य चक्राङ्कितां लेभेऽसौ जिनशासनार्पितमतिः श्रीवज्रदन्तः श्रियम् ॥२०८॥
दिग्विजय के समय जो समुद्र के समीप वन वेदिका के मध्यभाग को प्राप्त हुआ, जिसने विजयार्ध पर्वत के तटों का उल्लंघन किया जिसने तरंगों से चंचल समुद्र की स्त्रीरूप गंगा और सिंधु नदी को पार किया और हिमवत् कुलाचल की ऊँचाई को तिरस्कृत किया―उस पर अपना अधिकार किया ऐसा वह जिनशासन का ज्ञाता वज्रदंत चक्रवर्ती समस्त दिशाओं को जीतकर चक्रवर्ती की पूर्ण लक्ष्मी को प्राप्त हुआ ।।208।।
“During his conquests, the Chakravarti, who reached the central part of the forest altar near the sea, crossed the shores of the Vijayaridhi mountain, traversed the waves of the restless sea, crossed the female-formed rivers, Ganga and Sindhu, and disregarded the heights of the Himalayan peaks, took control over them. Thus, the one who knew the Jain teachings, the Vajradanta Chakravarti, having won all directions, attained the complete prosperity of a Chakravarti.” ( 208)
इत्यार्षे भगवज्जिनसेनाचार्यप्रणीत त्रिषष्टिलक्षणमहापुराण संमहे ललिताङ्गस्वर्गच्यवनवर्णनं नाम षष्ठं पर्व ॥६॥
इस प्रकार आर्ष नाम से प्रसिद्ध, मगवज्जिनसेनाचार्य विरचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराणसंग्रह में ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन करने वाला छठा पर्व पूर्ण हुआ ।।6।।
“In this way, the sixth chapter of the Triṣaṣṭilakṣaṇa Mahāpurāṇa Saṅgraha, composed by the revered Magavijjinasenācārya and famous by the name Ārṣa, which describes the descent of Lalitāngadeva from heaven, was completed.” (Verse 6)
आदिपुराण पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 |
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201
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