भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
श्लोक 102 से 111 वज्रदंत का निर्णय और अवधिज्ञान
वज्रदंत ने श्रीमती को आश्वासन के लिए पंडिता धाय नियुक्त की और लक्ष्मीमती के साथ उठे। उनके सामने दो कार्य आए: यशोधर गुरु के केवलज्ञान की पूजा और चक्ररत्न के साथ दिग्विजय। व्याकुल होकर उन्होंने पहले गुरु पूजा को प्राथमिकता दी, क्योंकि निकटवर्ती पुण्य कार्य पहले करना चाहिए। यशोधर की पूजा कर अवधिज्ञान प्राप्त किया, जिससे उन्हें पता चला कि वे अच्युत स्वर्ग के इंद्र थे और श्रीमती उनकी प्रिया स्वयंप्रभा थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
इति बुवाण एवासौ उत्तस्थौ सह कान्तया । नियोज्य पण्डितां धात्री कन्याश्वासनसंविधौ ॥१०२॥
यह कहते-कहते वज्रदंत महाराज कन्या को आश्वासन देने के लिए पंडिता नामक धाय को नियुक्त कर लक्ष्मीमती के साथ उठ खड़े हुए ।।102।।
Saying this, King Vajradanta appointed a nurse named Pandita to reassure the maiden and stood up along with Lakshmimati.”
श्लोक ( Shlok ) 103
तदा कार्यद्वयं तस्य युगपत् समुपस्थितम् । कैवल्यं स्वगुरोश्चक्रसंभूतिश्चायुधालये ॥ १०३॥
कन्या के पास से वापस आने पर महाराज वज्रदंत के सामने एक साथ दो कार्य आ उपस्थित हुए । एक तो अपने गुरु यशोधर महाराज को केवलज्ञान की प्राप्ति हुई थी अतएव उनकी पूजा के लिए जाना और दूसरा आयुधशाला में चक्ररत्न उत्पन्न हुआ था अतएव दिग्विजय के लिए जाना ।।103।।
“Upon returning from the maiden, two tasks simultaneously presented themselves before King Vajradanta. First, his guru, Maharaj Yashodhara, had attained Kevalgyan (absolute knowledge), and he needed to visit him for worship. Second, the Chakraratna (divine wheel) had appeared in the armory, signifying the call to embark on a world conquest.”
श्लोक ( Shlok ) 104
तत्कार्य द्वैतमासाद्य बभूव क्षणमाकुलः । प्राग्विधेयं किमत्रेति स निश्चेतुमशक्नुवन् ॥१०४॥
महाराज वज्रदंत एक साथ इन दोनों कार्यों का प्रसंग आने पर निश्चय नहीं कर सके कि इनमें पहले किसे करना चाहिए और इसीलिए वे क्षण-भर के लिए व्याकुल हो उठे ।।104।।
“King Vajradanta, faced with the simultaneous occurrence of these two tasks, could not decide which one to undertake first. As a result, he became restless for a moment.”
श्लोक ( Shlok ) 105
ततः किमत्र कर्तव्यमित्यसौ संप्रधारयन्। गुरोः कैवल्यसंपूजामादौ निश्चितवान् सुधीः ॥१०५॥
तत्पश्चात् इनमें पहले किसे करना चाहिए इस बात का विचार करते हुए बुद्धिमान् वज्रदंत ने निश्चय किया कि सबसे पहले गुरुदेव-यशोधर महाराज के केवलज्ञान की पूजा करनी चाहिए ।।105।।
“Subsequently, while contemplating which task should be undertaken first, the wise Vajradanta decided that worshiping his revered Guru, Maharaj Yashodhara, for attaining Kevalgyan should take precedence.”
श्लोक ( Shlok ) 106
यतो दूरात् समासन्नं कार्य कार्य मनीषिभिः । * व्यतिपाति ततस्तस्मात् प्रधानं कार्यमाचरेत् ॥ १०६।:
क्योंकि बुद्धिमान् पुरुषों को दूरवर्ती कार्य की अपेक्षा निकटवर्ती कार्य ही पहले करना चाहिए, उसके बाद दूरवर्ती मुख्य कार्य करना चाहिए ।
For wise individuals, it is appropriate to first undertake the immediate task rather than the distant one, and only thereafter attend to the primary distant task.”
श्लोक ( Shlok ) 107
ततः शक्यं शुभं तस्मात् तस्माच्च विपुलोदयम् । धर्मात्मकं च यत् कार्यमर्हत्पूजादिलक्षणम् ॥ १०७॥
इसलिए जिस अर्हंत पूजा से पुण्य होगा है, जिससे बड़े-बड़े अभ्युदय प्राप्त होते हैं, तथा जो धर्ममय आवश्यक कार्य हैं ऐसे अर्हंतपूजा आदि प्रधान कार्य को ही पहले करना चाहिए ।।107।।
Therefore, the worship of the Arihant, which generates merit, brings about great prosperity, and is a righteous and essential task, should be undertaken first as the primary duty.”
श्लोक ( Shlok ) 108
मनसीत्याकलय्या सौ यशोधरगुरोः पराम् । पूजां कर्तुं सममुत्तस्थौ नृपः पुण्यानुबन्धिनीम् ॥१०८
मन में ऐसा विचार कर वह राजा वज्रदंत पुण्य बढ़ाने वाली यशोधर महाराज की उत्कृष्ट पूजा करने के लिए उठ खड़ा हुआ ।।108।।
With this thought in mind, King Vajradanta rose to perform the exalted worship of Maharaj Yashodhara, which would enhance his merit.”
श्लोक ( Shlok ) 109
ततः पृतनया सार्द्धसुपसृत्य जगद्गुरुम् । पूजयामास संप्रीतिप्रोत्फुल्लमुखपङ्कजः १०९॥
तदनंतर सेना के साथ जाकर उसने जगद्गुरु यशोधर महाराज की पूजा की । पूजा करते समय उसका मुखकमल अत्यंत प्रफुल्लित हो रहा था ।।109।।
“Afterward, he went with his army and worshipped the World Teacher, Maharaj Yashodhara. While performing the worship, his lotus-like face was radiantly joyful.”
श्लोक ( Shlok ) 110
तत्पादौ प्रणमन्नेव सोऽलब्धावधिमिदधीः । विशुद्धपरिणामेन भक्तिः किं न फलिष्यति ॥११०
प्रकाशमान बुद्धि के धारक वज्रदंत ने ज्यों ही यशोधर गुरु के चरणों में प्रणाम किया त्यों ही उसे अवधिज्ञान प्राप्त हो गया, सो ठीक ही है, विशुद्ध परिणामों से की गयी भक्ति क्या फलीभूत नहीं होगी? अथवा क्या-क्या फल नहीं देगी ? ।।110।।
“As soon as the brilliant and wise Vajradanta bowed at the feet of Guru Yashodhara, he attained Avadhi Gyan (clairvoyant knowledge). And rightly so—how could devotion performed with pure intentions not bear fruit? Or rather, what fruits would it not yield?”
श्लोक ( Shlok ) 111
तेनाबुद्धाच्युतेन्द्रत्यमात्मनः प्राक्तने भवे । ललिताङ्गप्रियायाश्च दुहितृत्वमिहाञ्जसा ॥111॥
उस अवधिज्ञान से राजा ने जान लिया कि पूर्वभव में मैं अच्युत स्वर्ग का इंद्र था और यह मेरी पुत्री श्रीमती ललितांगदेव की स्वयंप्रभा नामक प्रिया थी ।।111।।
“Through that Avadhi Gyan (clairvoyant knowledge), the king realized that in a previous life, he had been the Indra of Achyuta heaven, and the maiden, Shrimati Lalitangadeva, had been his beloved, named Swayamprabha.”
श्लोक 112 से 122
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
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