भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
श्लोक 282 से 292 ललितांगदेव की देवियाँ
ललितांगदेव की चार हजार देवियाँ और चार महादेवियाँ (स्वयंप्रभा, कनकप्रभा, कनकलता, विद्युल्लता) थीं। आयु समाप्त होने पर स्वयंप्रभा उसकी प्रिय पत्नी बनी, जो लक्ष्मी समान थी। वह उसके साथ मेरु, नील, विजयार्ध आदि स्थानों पर भोग करता रहा।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 282 to 292
श्लोक ( Shlok ) 282
सहस्त्राण्यभवन् देव्यः चत्वार्यस्य परिग्रहः । चतस्त्रश्च महादेव्यः चारुलावण्यविभ्रमाः ॥२८२॥
उस देव के चार हजार देवियां थीं तथा सुंदर लावण्य और विलास-चेष्टाओं से सहित चार महादेवियाँ थीं ।।282।।
That deity had four thousand celestial consorts and four chief goddesses adorned with exceptional beauty, charm, and graceful playful gestures. ॥282॥
श्लोक ( Shlok ) 283
स्वयंप्रभाग्रिमा देवी द्वितीया कनकप्रभा । कनकादिकताम्यासीद देवी विद्युल्लतापरा ॥२८३॥
उन चारों महादेवियों में पहली स्वयंप्रभा, दूसरी कनकप्रभा, तीसरी कनकलता और चौथी विद्युल्लता थी ।।283।।
Among those four chief goddesses, the first was Swayamprabha, the second Kanakaprabha, the third Kanakalata, and the fourth Vidyullata. ॥283॥
श्लोक ( Shlok ) 284
रामाभिरभिरामानिराभिर्भोगाननारतम् । भुञ्जानस्पास्य कालोऽगादनल्पः पुण्यपाकजान् ॥२८४॥
इन सुंदर स्त्रियों के साथ पुण्य के उदय से प्राप्त होने वाले भोग को निरंतर भोगते हुए इस ललितांगदेव का बहुत काल बीत गया ।।284।।
hile continuously enjoying the pleasures obtained through the fruition of his merits with these beautiful women, a long period passed for Lalitangdeva. ॥284॥
श्लोक ( Shlok ) 285
तदायुर्जलधेमंध्ये ‘वीचीमाला इवाकुलाः । विलीयन्ते स्म भूयस्यो दे व्यःस्वायुःस्थितिच्युतेः ॥२८५॥
उसके आयुरूपी समुद्र में अनेक देवियाँ अपनी-अपनी आयु की स्थिति पूर्ण हो जाने से चंचल तरंगों के समान विलीन हो चुकी थीं ।।285।
In the ocean of his lifespan, many celestial women, having reached the completion of their own lifespans, vanished like fleeting waves. ॥285॥
श्लोक ( Shlok ) 286
पल्योपम पृथक्त्वा वशिष्टमायुर्यदास्य च । तदोदपादि पुण्यैः स्वैः प्रेयस्यस्य स्वयंप्रभा ॥२८६॥
जब उसकी आयु पृथक्त्वपल्य के बराबर अवशिष्ट रह गयी तब उसके अपने पुण्य के उदय से एक स्वयंप्रभा नाम को प्रिय पत्नी प्राप्त हुई ।।286।।
When his remaining lifespan was equivalent to a Prithaktvapalya (a specific measure of time), he obtained a beloved wife named Swayamprabha through the fruition of his own merits. ॥286॥
श्लोक ( Shlok ) 287
अथ सा कृतनेपथ्या प्रभातरलविग्रहा। पत्युर ङ्गगता रेजे कस्पश्रीरिव रूपिणी ॥ २८७॥
वेष-भूषा से सुसज्जित तथा कांतियुक्त शरीर को धारण करने वाली वह स्वयंप्रभा पति के समीप ऐसी सुशोभित होती थी मानो रूपवती स्वर्ग की लक्ष्मी ही हो ।।287।।
Adorned with elegant attire and ornaments, and possessing a radiant body, Swayamprabha appeared near her husband with such splendor, as if she were the goddess of beauty and prosperity from heaven herself. ॥287॥
श्लोक ( Shlok ) 288
सैषा स्वयंप्रभाऽस्यासीत् परा सौहार्य भूमिका । चिरं मधुकरस्येव “प्रत्यग्रा चूतमम्जरी ॥२८८॥
जिस प्रकार आम की नवीन मंजरी भ्रमर को अतिशय प्यारी होती है उसी प्रकार वह स्वयंप्रभा ललितांगदेव को अतिशय प्यारी थी ।।288।।
Just as a fresh mango blossom is deeply beloved by a bumblebee, in the same way, Swayamprabha was exceedingly dear to Lalitangdeva. ॥288॥
श्लोक ( Shlok ) 289
स्वयंप्रमानना लोकतद्ङ्गात्रस्पर्शनोत्सवैः । स रेमे करिणीसक्तः करीव सुचिरं सुरः ॥ २८९॥
वह देव स्वयंप्रभा का मुख देखकर तथा उसके शरीर का स्पर्श कर हस्तिनी में आसक्त रहने वाले हस्ती के समान चिरकाल तक क्रीड़ा करता रहता था ।।289।।
That deity, gazing at Swayamprabha’s face and touching her body, remained engrossed in playful activities for a long time, like an elephant in love with a female elephant. ॥289॥
श्लोक ( Shlok ) 290 – 292
स तया मन्दरे ‘कान्तचन्द्रकान्तशिलातले । भृङ्गकोकिलवाचालनन्दनादिवनाञ्चिते ॥२९०।।
नीलादिष्वचलेन्द्रेषु खचराचरुसानुषु । कुण्डले रुचके चाद्रौ मानुषोत्तरपर्वते ।।२९१।।
नन्दीश्वरमहाद्वीपे द्वीपेष्वन्येषु सान्धिषु । मोगभूम्यादिदेशेषु दिव्यं देवोऽवसत् सुखम् ।।२९२
वह देव उस स्वयंप्रभा के साथ कभी मनोहर चंद्रकांत शिलाओं से युक्त तथा भ्रमर, कोयल आदि पक्षियों द्वारा वाचालित नंदन आदि वनों से सहित मेरुपर्वत पर, कभी नील निषध आदि बड़े-बड़े पर्वतों पर, कभी विजयार्ध के शिखरों पर, कभी कुंडलगिरि पर, कभी रुचकगिरि पर, कभी मानुषोत्तर पर्वत पर, कभी नंदीश्वर महाद्वीप में, कभी अन्य अनेक द्वीपसमुद्रों में और कभी भोगभूमि आदि प्रदेशों में दिव्यसुख भोगता हुआ निवास करता था ।।290-292।।
That deity, along with Swayamprabha, resided and enjoyed divine pleasures in various splendid places: sometimes on Mount Meru, adorned with beautiful moonstone and surrounded by forests like Nandan, filled with the songs of bees, cuckoos, and other birds; at times on large mountains like the Nilnishadha; sometimes on the peaks of Vijayaradha, on Kundalagir, or Ruchakagir; occasionally on the Manushottara Mountain; sometimes in the Nandishvara Mahadweep and other numerous islands and seas; and sometimes in the realms of the divine pleasure grounds, enjoying all the blissful experiences. ॥290-292॥
श्लोक 293 से 296
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
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