भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 175 मेरु पर्वत का वर्णन
मेरु पर्वत समवसरण, श्रुतस्कंध, महाराज, वृषभदेव, और इंद्र समान है। चार वनों (भद्रशाल आदि) से शोभित, सुवर्णमय, रत्नखचित, और जिनमंदिरों से युक्त है। यह लवणसमुद्र के वस्त्र और जंबूद्वीप का मुकुट समान है। जगत् को सरोवर और मेरु को केशर समूह माना। यह पर्वतों का राजा है, रत्नजड़ित शिखरों और चूलिका से सुशोभित।
English translation of Adi purana parv 5- Shlok 162 to 175
श्लोक ( Shlok ) 162 – 175
वनैश्चतुर्भिरायान्तं ‘ जिनस्येव शुभोदयम् श्रुततस्कन्धमिवानादिनिधनं सप्रमाणकम् ।।१६२।।
महीभृतामधीशत्वात् सद्वृत्तत्वात् सदास्थितेः । । प्रवृदुकटकत्वाच्च सुराजानमिवोन्नतम् ॥१६३।
सर्वलोकोत्तरत्वाष्ण ज्येष्ठत्वात् सर्वभूभृताम् । महत्वात् स्वर्णवर्णत्वात् तमाद्यमिव पूरुषम् ॥ १६४
समासादितवज्रत्वादप्सरः संश्रयादपि । ज्योतिःपरीतमूत्तित्वात् सुरराजमिवापरम् ।।१६५ः।
चूलिका ग्रसमा सन्नश्सौधर्मेन्द्रविमानकम् । स्वर्लोकधारणे न्यस्तमिनैकं स्तम्ममुच्छितम् ।।१६६।।
मेखलाभिर्वनश्रेणीर्दधानं कुसुमोज्ज्वलाः । स्पर्द्धयेव कुरुक्ष्माजैः सर्वर्तुफलदायिनीः ॥॥१६७।।
हिरण्मयमहोदग्रवपुषं रत्नमाजुषम् । जिनजन्माभिषेकाय बद्धं पीठमिवामरैः ॥१६८॥
जिनाभिषेकसंबन्धाज्जिनायतनधारणात् । स्वीकृतेनेव पुण्येन प्राप्तं स्वर्गमनर्गलम् ॥१६९।
‘लवणाम्भोधिवेलाम्भोवलयश्लक्ष्णवाससः । जम्बूद्वीपमहीभर्तुः तिरीटमिव सुस्थितम् ॥ १७० ॥
कुलाचलपृथ्तुङ्गवीची मङ्गोपशोभिनः । संगीतप्रहतः तोधविहङ्गरुत शालिनः ॥१७१॥
महानदोजला लोलमृणालव सद्द्युतेः । नन्दनादिमहोद्यानविसर्पत्पत्रसंपदः ॥ १७२॥
“सुरासुरसभावास भासितामरसश्रियः । । “सुखास वरसासक्तजीव भृङ्गावलीभृतः ॥१७३॥
जगत् पद्माकरस्थास्य मध्ये कालानिलोद्धतम् । विवृद्धमिव किञ्जल्कपुञ्जमापिञ्जरच्छविम् ॥ १७४॥
सरत्नकटकं भास्वच्चूलिकामुकुटोज्ज्वलम् । सोऽदर्शद् गिरिराजं तं राजन्तं जिनमन्दिरैः ॥१७५॥
वह पर्वत जिनेंद्र भगवान् के समवसरण के समान शोभायमान हो रहा है क्योंकि जिस प्रकार समवसरण (अशोक, सप्तच्छद, आम्र और चंपक) चार वनों से सुशोभित होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी चार (भद्रशाल, नंदन, सौमनस और पांडुक) वनों से सुशोभित है । वह अनादि-निधन है तथा प्रमाण से (एक लाख योजन) सहित है इसलिए श्रुतस्कंध के समान है क्योंकि आर्यदृष्टि से श्रुतस्कंध भी अनादिनिधन है और प्रत्यक्ष परोक्ष प्रमाणों से सहित है । अथवा वह पर्वत किसी उत्तम महाराज के समान है क्योंकि जिस प्रकार महाराज अनेक महीभृतों (राजाओं) का अधीश होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी अनेक महीभृतों (पर्वतों) का अधीश है । महाराज जिस प्रकार सुवृत्त (सदाचारी) और सदास्थिति (समीचीन सभा से युक्त) होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी सुवृत्त (गोलाकार) और सदास्थिति (सदा विद्यमान) रहता है । तथा महाराज जिस प्रकार प्रवृद्धकटक बड़ी सेना का नायक) होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी प्रवृद्धकटक (ऊँचे शिखर वाला) है । अथवा वह पर्वत आदि पुरुष श्री वृषभदेव के समान जान पड़ता है क्योंकि सुधार वृषभदेव जिस प्रकार सर्वलोकोत्तर हैं―लोक में सबसे श्रेष्ठ हैं उसी प्रकार वह पर्वत भी सर्वलोकोत्तर है―सब देशों से उत्तर दिशा में विद्यमान है । भगवान् जिस प्रकार सब मध्य को (सब राजाओं में) ज्येष्ठ थे उसी प्रकार वह पर्वत भी सब भूभृतों (पर्वतों में) ज्येष्ठ-उत्कृष्ट है । भगवान् जिस प्रकार महान् थे उसी प्रकार वह पर्वत भी महान् है और भगवान् जिस प्रकार सुवर्ण वर्ण के थे उसी प्रकार वह पर्वत भी सुवर्ण वर्ण का है । अथवा वह मेरु पर्वत इंद्र के समान सुशोभित है क्योंकि इंद्र जिस प्रकार वज्र (वज्रमयी शस्त्र) से सहित होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी वज्र (हीरों) से सहित होता है । इंद्र जिस प्रकार अप्सरःसंश्रय (अप्सराओं का आश्रय) होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी अप्सरःसंश्रय (जल से भरे हुए तालाबों का आधार) है । और इंद्र का शरीर जैसे चारों और फैलती हुई ज्योति (तेज) से सुशोभित होता है उसी प्रकार उस पर्वत का शरीर भी चारों ओर फैले हुए ज्योतिषी देवों से सुशोभित है । सौधर्म स्वर्ग का इंद्रक विमान इस पर्वत की चूलिका के अत्यंत निकट है (बालमात्र के अंतर से विद्यमान है) इसलिए ऐसा मालूम होता है मानो स्वर्गलोक को धारण करने के लिए एक ऊँचा खंभा ही खड़ा हो । वह पर्वत अपनी कटनियों से जिन वन-पंक्तियों को धारण किये हुए है वे हमेशा फूलों से उज्ज्वल रहती हैं तथा ऐसी मालूम होती हैं मानो कल्पवृक्षों के साथ स्पर्धा करके ही सब ऋतुओं के फल फूल दे रही हों । वह पर्वत सुवर्णमय है ऊंचाई और अनेक रत्नों की कांति से सहित है इसलिए ऐसा जान पड़ता है मानो जिनेंद्रदेव के अभिषेक के लिए देवों के द्वारा बनाया हुआ सुवर्णमय ऊँचा और रत्नखचित सिंहासन ही हो । उस पर्वत पर श्री जिनेंद्रदेव का अभिषेक होता है तथा अनेक चैत्यालय विद्यमान हैं मानो इन्हीं दो कारणों से उत्पन्न हुए पुण्य के द्वारा वह बिना किसी रोक-टोक के स्वर्ग को प्राप्त हुआ है अर्थात् स्वर्ग तक ऊँचा चला गया है । अथवा वह पर्वत लवणसमुद्र के नीले जलरूपी सुंदरवस्त्रों को धारण किये हुए जंबूद्वीपरूपी महाराज के अच्छी तरह लगाये गये मुकुट के समान मालूम होता है । अथवा यह जगत् एक सरोवर के समान है क्योंकि यह सरोवर की भाँति ही कुलाचलरूपी बड़ी ऊँची लहरों से शोभायमान है, संगीत के लिए बजते हुए बाजों के शब्दरूपी पक्षियों के शब्दों से सुशोभित है, गंगा, सिंधु आदि महानदियों के जलरूपी मृणाल से विभूषित है, नंदनादि महावनरूपी कमलपत्रों से आच्छन्न है, सुर और असुरों के सभाभवनरूपी कमलों से शोभित है, तथा सुखरूप मकरंद के प्रेमी जीवरूपी भ्रमरावली को धारण किये हुए है । ऐसे इस जगत्रूपी सरोवर के बीच में वह पीत वर्ण का सुवर्णमय मेरु पर्वत ऐसा जान पड़ता है मानो प्रलयकाल के पवन से बड़ा हुआ तथा एक जगह इकट्ठा हुआ कमलों की केशर का समूह हो । वास्तव में वह पर्वत, पर्वतों का राजा है क्योंकि राजा जिस प्रकार रत्नजड़ित कटकों (कड़ों) से युक्त होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी रत्नजड़ित कटकों (शिखरों) से युक्त है और राजा जिस प्रकार मुकुट से शोभायमान होता है उसी प्रकार वह पर्वत भी चूलिकारूपी दैदीप्यमान मुकुट से शोभायमान है । इस प्रकार वर्णन युक्त तथा जिनमंदिरों से शोभायमान वह मेरु पर्वत स्वयंबुद्ध मंत्री ने देखा ।।162-175।।
The mountain appears as resplendent as the Samavasarana of Lord Jina because, just as the Samavasarana is adorned with four groves (Ashoka, Sapta-Chhada, Amra, and Champaka), this mountain is similarly adorned with four groves (Bhadrasala, Nandana, Soumanasa, and Panduka). It is eternal and immeasurable, with a span of one lakh yojanas, and thus resembles the Shrutaskandha (the scripture), which is also considered eternal and boundless by Arya vision, encompassing both direct and indirect proofs.
Alternatively, the mountain resembles a great emperor. Just as an emperor is the sovereign ruler of numerous kings, this mountain is the ruler of many other mountains. An emperor is righteous and steadfast in noble assemblies, and likewise, the mountain is circular (symmetrical) and perpetually present. Just as an emperor is the leader of a great army, the mountain is adorned with towering peaks.
Or the mountain appears akin to the first man, Lord Rishabhadeva. Just as Rishabhadeva is supreme and the highest in the world, this mountain too is extraordinary, being located to the north of all regions. Lord Rishabhadeva was the eldest among all kings, and similarly, this mountain is the greatest and most excellent among all mountains. Lord Rishabhadeva was magnificent, and so is this mountain, which is golden in hue like the Lord.
Alternatively, Mount Meru resembles Indra (the king of gods). Just as Indra is adorned with a thunderbolt, this mountain is adorned with diamonds. Indra is the abode of celestial nymphs, while this mountain serves as the foundation of water-filled ponds. Just as Indra’s body glows with radiance all around, this mountain too shines with celestial beings (Jyotishi Devas) spread across its surface. The celestial plane of Saudharma Indra is situated extremely close to the mountain’s peak, as if the mountain serves as a lofty pillar holding up the heavens.
The rows of forests supported by the mountain’s ridges are always bright with flowers and seem to compete with the Kalpavriksha trees in offering fruits and flowers across all seasons. The mountain, being golden and adorned with the radiance of numerous jewels, appears as though it is a jewel-studded, golden throne crafted by the gods for the consecration of Lord Jina. Upon this mountain, the Lord Jina is consecrated, and numerous temple complexes are present, as if the mountain’s elevation to heaven is the result of the merits accumulated through these sacred deeds.
Alternatively, the mountain, adorned with the blue waters of the Lavana Ocean, appears like a crown carefully placed on the head of King Jambudvipa. Or, this universe resembles a vast lake, with the towering peaks of Kulachal serving as its massive waves, the sounds of musical instruments as the chirping of birds, and the waters of great rivers like the Ganga and Sindhu as its stalks of lotuses. The great forests like Nandana act as its lotus leaves, the celestial halls of gods and asuras serve as its lotuses, and the souls—who enjoy the nectar of bliss—are its bees. Amid this lake-like universe, Mount Meru, golden in color, appears like a cluster of lotus filaments, gathered and magnified by the winds of the cosmic dissolution.
Indeed, this mountain is the king of mountains. Just as a king is adorned with jewel-studded armlets, this mountain is adorned with peaks encrusted with jewels. Just as a king shines with his crown, this mountain glows with its radiant peak. Thus, adorned with descriptions and beautified by temples of the Jina, Mount Meru was observed by the wise wayambudha minister . ||162-175||
श्लोक 176 से 181
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 |
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