आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 46- Shlok 152 to 162
श्लोक ( Shlok )152 – 153
शशिप्रभा स्वसा देव्या भ्रातादित्यगतिस्तथा । परे च खचराधीशाः प्रीत्या ऽयाचन्त कन्यकाम् ॥१५२॥ततः स्वयंवरो युक्तो विरोधस्तन्न केनचित् । इत्यभाषन्त निश्चित्य ‘तद्भूपोऽप्यभ्युपागमत् ॥१५३॥
मंत्रियोंने परस्परमें निश्चय कर कहा कि ‘शशिप्रभा आपकी बहिन है, और आदित्यगति आपकी पट्टराज्ञीका भाई है। ये दोनों तथा इनके सिवाय और भी अनेक विद्याधर राजा बड़े प्रेमसे कन्याकी याचना कर रहे हैं इसलिये स्वयंवर करना ठीक होगा क्योंकि ऐसा करनेसे किसी के साथ विरोध नहीं होगा।’ मन्त्रियोंकी यह बात राजाने भी स्वीकार की ॥१५२-१५३॥
After consulting among themselves, the ministers resolved and said, “Shashiprabhā is your sister, and Ādityagati is the brother of your principal queen. Both of them—and indeed many other Vidyādhara kings as well—are earnestly seeking the hand of this maiden. Therefore, it would be best to hold a svayaṁvara, for in doing so, you will avoid inciting enmity with any of them.”The king accepted the counsel of his ministers.॥152–153॥
श्लोक ( Shlok )154
ततः सर्वेऽपि तद्वार्ताकर्णनादागमन् वराः । कमप्येतेषु सा कन्या नाग्रहीद् रत्नमालया ॥१५४॥
तदनन्तर स्वयंवरकी बात सुनकर सभी राजकुमार आये परन्तु कन्या प्रभावतीने इन सबमें से किसीको भी रत्नमालाके द्वारा स्वीकार नहीं किया-किसी के भी गलेमें रत्नमाला नहीं डाली ॥१५४।।
Thereafter, upon hearing news of the svayaṁvara, all the royal princes arrived. Yet among them all, the maiden Prabhāvatī did not choose a single one—she placed the garland of jewels around none of their necks.॥154॥
श्लोक ( Shlok )155 – 156
मातापितृभ्यां तद् दृष्ट्वा सम्पृष्टा प्रियकारिणी । यो जयेद् गतियुद्धे मां मालां संयोजयाम्यहम् ॥१५५॥कण्ठे तस्येति वक्त्येषा प्रागित्याह सखी तयोः । श्रुत्वा तत्र दिने सर्वानुचितोक्त्या व्यसर्जयत् ॥१५६॥
यह देखकर माता-पिताने उसकी सखी प्रियकारिणीसे इसका कारण पूछा, सखीने उन दोनोंसे कहा कि यह पहले कहती थी कि ‘जो मुझे गतियुद्धमें जीतेगा मैं उसीके गलेमें माला डालूंगी’ यह सुनकर राजाने उस दिन यथायोग्य कहकर सबको बिदा किया ।।१५५-१५६।।
Witnessing this, her parents questioned her companion Priyakāriṇī about the cause of their daughter’s refusal. The companion replied to them, “She used to say, ‘I shall place the garland around the neck of him who triumphs over me in a contest of speed.’” Hearing this, the king suitably addressed the assembly and dismissed everyone for the day.॥155–156॥
श्लोक ( Shlok )157 – 159
अन्येद्युः खचराधीशो घोषयित्वा स्वयंवरम् । सिद्धकूटाख्यचैत्यालयस्य मालां पुरःस्थिताम् ॥१५७॥अपातयन्महामेरुं त्रिः परीत्य महीतलम् । अस्पृष्टां खेचराः केचित्तां ग्रहीतुमनीश्वराः ॥१५८॥ त्रपां गताः समादाय प्रभावत्या विनिर्जिताः । समो ननु न मृत्युश्च मानभङ्गेन मानिनाम् ॥१५९॥
दूसरे दिन राजाने स्वयंवरकी घोषणा कराकर कहा कि ‘एक माला सिद्धकूट नामक चैत्यालयके द्वारसे नीचे छोड़ी जायगी’ जो कोई विद्याधर माला छोड़ने के बाद महामेरु पर्वतकी तीन प्रद-क्षिणाएं देकर प्रभावती के पहले उसे जमीनपर पड़ने के पहले ही ले लेगा वही इसका पति होगा’ यह सुनकर बहुतसे विद्याधरोंने प्रयत्न किया परन्तु पूर्वोक्त प्रकारसे माला न ले सके इसलिये प्रभावतीसे हारकर लज्जित होते हुए चले गये सो ठीक ही है क्योंकि मृत्यु भी अभिमानी लोगों के मानभंग की बराबरी नहीं कर सकती है ॥ १५७-१५९॥
On the following day, the king made a proclamation regarding the svayaṁvara, declaring: “A garland shall be dropped from the gate of the Siddhakuṭa shrine. Whoever, after the garland is released, completes three circumambulations of the great Mount Meru and seizes the garland before it touches the ground shall win the hand of Prabhāvatī.”Hearing this, many Vidyādharas made the attempt, but none could fulfill the feat as proclaimed; thus, they departed in defeat, humbled before Prabhāvatī. And rightly so—for even death itself does not equal the humiliation that prideful men feel upon having their arrogance laid bare.॥157–159॥
श्लोक ( Shlok )160
ततो हिरण्यवर्माऽयाद् गतियुद्धविशारदः । मालामासञ्जयामास तत्कण्ठे तेन निर्जिता ॥१६०॥
तदनन्तर गतियुद्ध करनेमें चतुर हिरण्यवर्मा आया और उससे हारकर प्रभावतीने वह माला उसके गलेमें डाल दी ।।१६०।।
Then arrived Hiraṇyavarmā, masterful in the contest of speed; and, upon being bested by him, Prabhāvatī placed the garland around his neck.॥160॥
श्लोक ( Shlok )161 – 162
तयोर्जन्मान्तरस्नेहसमृद्धसु खसम्पदा । काले गच्छति कस्मिँश्च (चित्) कपोतद्वयदर्शनात् ॥१६१॥ज्ञातप्राग्भवसम्बन्धा सुविरक्ता प्रभावती । स्थिताशोकाकुलेकैव चिन्तयन्ती किमप्यसौ ॥१६२॥
पूर्व जन्मके स्नेहसे बढ़ी हुई सुखरूप सम्पत्तिसे जब उन दोनोंका कितना ही समय व्यतीत हो गया तब किसी एक दिन कबूतर-कबूतरीका जोड़ा देखनेसे प्रभावतीको पूर्वभवका सम्बन्ध याद आ गया, वह विरक्त होकर शोकसे व्याकुल होती हुई अकेली बैठकर कुछ सोचने लगी ॥१६१-१६२।।
As time passed in great happiness, their wealth and comforts growing ever more abundant, the deep affection carried over from their former lives only strengthened their bond. Then one day, upon seeing a pair of doves, Prabhāvatī was suddenly struck by memories of her connection from a previous birth. Overcome with detachment and agitated by sorrow, she withdrew to sit alone, lost in contemplation.॥161–162॥
श्लोक 163 से 170
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268 | समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 316 | समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 196 | भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 186 | भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 281
आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 | पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 | दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 | पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129 | विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 159 | उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 199 | भरतराज का कैलाश पर्वत पर जाने का वर्णन पर्व 33 – श्लोक 1 से 202 | भरतराज के छोटे भाइयों की दीक्षा का वर्णन पर्व 34 – श्लोक 1 से 223 कुमार बाहुबली के युद्ध का उद्योग वर्णन पर्व 35 – श्लोक 1 से 249 | बाहुबली का जल-युद्ध, मल्ल-युद्ध और नेत्र-युद्ध में विजय प्राप्त करना, दीक्षा धारण करना, और केवलज्ञान उत्पन्न होनेका वर्णन पर्व 36 – श्लोक 1 से 212 | भरतेश्वर के वैभव का वर्णन पर्व 37 – श्लोक 1 से 205 | द्विजों की उत्पत्ति तथा गर्भान्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 38 – श्लोक 1 से 313 | दीक्षान्वय और कर्त्रन्वय क्रियाओं का वर्णन पर्व 39 – श्लोक 1 से 211 | द्विजों की उत्पत्ति में क्रियामन्त्रों का वर्णन पर्व 40 – श्लोक 1 से 211 | भरतराज के स्वप्न तथा उनके फल का वर्णन पर्व 41 – श्लोक 1 से 158 |भरतराज की वर्णाश्रम की रीति का प्रतिपादन करने वाला पर्व 42 – श्लोक 1 से 208 | सुलोचनाके स्वयंवरका वर्णन पर्व 43 – श्लोक 1 से 339 | जयकुमार की विजय का वर्णन पर्व 44 – श्लोक 1 से 367
आदिपुराण पर्व 45 – जय-कुमार और सुलोचना के सुखभोग का वर्णन पर्व 45 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 103 | श्लोक 104 से 113 | श्लोक 114 से 123 | श्लोक 124 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 160 | श्लोक 161 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 219
आदिपुराण पर्व 46 – जयकुमार और सुलोचना के भवान्तर वर्णन पर्व 46 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 100 | श्लोक 101 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151