आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 : सुभद्रा से विवाह और म्लेच्छ खंड की विजय
नमि और विनमि की भेंट से भरत की इच्छाएँ पूर्ण हुईं। उन्होंने नमि की बहन सुभद्रा से मंगलाचारपूर्वक विवाह किया, जिससे उनका जन्म सफल हुआ। सेनापति ने म्लेच्छ राजाओं को जीतकर जयलक्ष्मी के साथ दर्शन किए। भरत ने उनका सत्कार किया, म्लेच्छ राजाओं को विदा किया, और दक्षिण पृथिवी की ओर प्रस्थान किया। सेना ने काण्डकप्रपात गुफा पार की, और नाट्यमाल देव ने मंगलद्रव्यों से उनकी अगवानी की।
English translation of Ādi purāṇa Part – 2 parv 32 – Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
तदुपाकृतरत्नोघै कन्यारत्नपुरः संरै। सरिदोघैरिवोदन्वानापूर्यत तदा प्रभुः ॥१८२॥
जिरा प्रकार नदियों के प्रवाहसे समुद्र पूर्ण हो जाता है उसी प्रकार उस समय नमि और विनमि के द्वारा उपहारमें लाये हुए कन्यारत्न आदि अनेक रत्नोंके समूहसे महाराज भरतकी इच्छा पूर्ण हो गई थी ॥१८२॥
“Just as the ocean is filled by the myriad streams of flowing rivers, even so was the desire of the great King Bharata fulfilled at that time by the countless treasures—maidens of rare beauty and other precious gifts—brought as offerings by Nami and Vinami.” (Verse 182)
श्लोक ( Shlok ) 183
स्वसारं च नमेर्धन्यां सुभद्रां नामकन्यकाम् । उदुवाह स लक्ष्मीवान् कल्याणैः खचरोचितैः ॥१८३॥
श्रीमान् भरत ने राजा नमि की बहिन सुभद्रा नाम की उत्तम कन्याके साथ विद्याधरों के योग्य मंगलाचार पूर्वक विवाह किया ॥१८३॥
“The illustrious Bharata, with rites most auspicious and worthy of the Vidyādharas, was wedded to Subhadrā—the noble maiden and sister of King Nami.” (Verse 183)
श्लोक ( Shlok ) 184
तां मनोज’ रसस्येव स्रुति संप्राप्य चक्रभृत् । स्वं मेने सफलं जन्म परमानन्दनिर्भरः ॥१८४।॥
रसकी धाराके समान मनोहर उस सुभद्राको पाकर उत्कृष्ट आनन्दसे भरे हुए चक्रवर्ती ने अपना जन्म सफल माना था ।।१८४।।
“Having won the enchanting Subhadrā, as graceful as a stream of nectar, the Emperor, overflowing with supreme delight, deemed his very birth to have been rendered blessed and fulfilled.” (Verse 184)
श्लोक ( Shlok ) 185
तावान्निर्जितनिःशेषम्लेच्छराजबलो बलैः । जयलक्ष्मी पुरस्कृत्य सेनानीः प्रभुमैक्षत ॥१८५।।
इतने में ही जिसने अपनी सेनाके द्वारा समस्त म्लेच्छ राजाओंकी सेना जीत ली है ऐसे सेनापति ने जयलक्ष्मीको आगे कर महाराज भरतके दर्शन किये ।।१८५।।
“Just then, the commander—he who had vanquished the armies of all the Mleccha kings by the might of his own forces—appeared before the great King Bharata, with the goddess of victory herself leading the way.” (Verse 185)
श्लोक ( Shlok ) 186
कृतकार्य च सत्कृत्य तं तांश्च म्लेच्छनायकान् । विसर्ज्य सम्राट् सज्जोऽभूत् प्रत्यायातुमपाङ्महीम् ॥१८६॥
जिसने अपना कार्य पूर्ण किया है ऐसे सेनापतिका सन्मान कर और आये हुए म्लेच्छ राजाओंको बिदाकर सम्राट् भरतेश्वर दक्षिणकी पृथिवीकी ओर आनेके लिये तैयार हुए ॥ १८६॥
“Honouring the commander who had accomplished his mission, and bidding farewell to the assembled Mleccha kings, the mighty Emperor Bharateshvara then prepared to advance toward the southern realms of the earth.” (Verse 186)
श्लोक ( Shlok ) 187
जयप्रयाणशंसिन्यस्तदा भेर्यः प्रदध्वनुः । विष्वग्बलार्णवे क्षोभमातन्वन्त्यो महीभृताम् ॥१८७॥
उस समय विजयके लिये प्रस्थान करनेकी सूचना देनेवाली भेरियाँ राजाओंकी सेनारूपी समुद्रमें क्षोभ उत्पन्न करती हुई चारों ओर बज रही थीं ।।१८७॥
“At that moment, the war drums—heralds of the impending march to victory—resounded on all sides, stirring tumult in the ocean-like armies of the kings.” (Verse 187)
श्लोक ( Shlok ) 188
तां काण्डकप्रपाताख्यां प्रागेवोद्धाटितां गुहाम्। प्रविवेश बलं जिष्णोश्च क्ररत्नपुरोगमाम् ॥१८८॥
चक्ररत्न जिसके आगे चल रहा है ऐसी भरतकी सेनाने पहलेसे ही उघाड़ी हुई काण्डकप्रपात नामकी प्रसिद्ध गुफामें प्रवेश किया ।।१८८।।
“With the divine Discus-jewel leading the way, the army of Bharata entered the famed cave known as Kāṇḍakaprapāta, whose mouth stood already open before them.” (Verse 188)
श्लोक ( Shlok ) 189
गङ्गापगोभयप्रान्तमहावीथीद्वयेन सा । व्यतीयाय गुहां सेना कृतद्वारां चमूभृता ॥१८९।॥
उस सेनाने गङ्गा नदीके दोनों किनारोंपर की दो बड़ी बड़ी गलियोंमेंसे, सेनापतिके द्वारा जिसका द्वार पहलेसे ही खोल दिया गया है ऐसी उस गुफाको पार किया ।।१८९।।
“That mighty army passed through the great cave—its entrance already opened by the commander—via the two vast corridors flanking the banks of the Ganga on either side.” (Verse 189)
श्लोक ( Shlok ) 190
मुच्यमाना गुहा सैन्यै श्चिरादुच्छ्वसितेव सा । चमूरपि गुहारोधान्निःसृत्योज्जीवितेव सा ॥१९०॥
सेनाके द्वारा छोड़ी हुई वह गुफा ऐसी जान पड़ती थी मानो चिरकालसे उच्छ्वास ही ले रही हो और वह सेना भी गुफाके रोध से निकलकर ऐसी मालूम होती थी मानो फिरसे जीवित हुई हो ।। १९०।।
“That cave, once cleared by the army, seemed as though it had been heaving a long and weary sigh for ages; and the army, emerging from its dark confines, appeared as if reborn into life once more.” (Verse 190)
श्लोक ( Shlok ) 191
नाट्यमालामरस्तत्र रत्नार्घैः प्रभुमर्घयन् । प्रत्यगृह्णाद् गुहाद्वारि पूर्णकुम्भादिमंगलैः ॥१९१॥
वहाँ नाट्यमाल नामके देवने दक्षिण गुफाके द्वारपर पूर्णकलश आदि मंगलद्रव्य रखकर तथा रत्नोंके अर्धसे अर्घ देकर भरत महाराजकी अगवानी की थी-सामने आकर सत्कार किया था ॥१९१।।
“There, at the southern mouth of the cave, the celestial being Nāṭyamāla came forth to receive King Bharata with due reverence—placing auspicious vessels brimming with holy water and other sacred offerings, and presenting a ceremonial welcome with handfuls of gleaming jewels.” (Verse 191)
श्लोक 192 से 199
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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आदिपुराण भाग – 2 :
भरतराज की दिग्विजय के उद्योग का वर्णन पर्व 26 – श्लोक 1 से 150 | भरतराज का राजाओं की विजय के लिये प्रयाण का वर्णन पर्व 27 – श्लोक 1 से 152 पूर्व समुद्र के द्वार को विजय करने का वर्णन पर्व 28 – श्लोक 1 से 221 दक्षिण समुद्र के द्वार के विजय करने का वर्णन वाला पर्व 29 – श्लोक 1 से 169 पश्चिम समुद्र के द्वार का विजय वर्णन पर्व 30 – श्लोक 1 से 129
आदिपुराण पर्व 31 – विजयार्ध पर्वत की गुफा का द्वार उघाड़ने का वर्णन पर्व 31 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 159
आदिपुराण पर्व 32 -उत्तरार्ध भरत की विजय का वर्णन पर्व 32 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 154 | श्लोक 155 से 171 | श्लोक 172 से 181
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