आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31
श्लोक 32 से 41 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 1)
भरत भगवान् को ब्रह्मा, परमज्योति, सृष्टिकर्ता, सर्वदर्शी, और आत्मभू कहकर स्तुति करते हैं। वे उन्हें हिरण्यगर्भ, परमात्मा, शंकर, और सर्वज्ञ बताते हैं। भगवान् को योगी, सिद्ध, और धर्म के अधिपति कहते हुए उनकी महिमा का वर्णन करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 24- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
विश्वव्यापी जगद्भर्ता विश्वदृगविश्वभु द्विभुः । विश्वतोऽक्षिमयं ज्योतिर्विश्व योनिर्वि योनिकः ॥३२॥
आप समस्त संसार में व्याप्त हैं, जगत् के भर्ता हैं, समस्त पदार्थों को देखने वाले हैं, सबकी रक्षा करने वाले हैं, विभु हैं, सब ओर फैली हुई आत्मज्योति को धारण करने वाले हैं, सबकी योनिस्वरूप हैं―सबके ज्ञान आदि गुणों को उत्पन्न करने वाले हैं और स्वयं अयोनिरूप हैं―पुनर्जन्म से रहित हैं ।।32।।
“You pervade the entire universe, are the sustainer of the world, the observer of all beings, and the protector of all. You are the all-pervading Supreme Being, possessing the divine light that extends in all directions. You are the ultimate source of all beings, the originator of knowledge and other virtues, and yet you yourself are unborn and free from rebirth.” ( 32)
श्लोक ( Shlok ) 33
हिरण्यगर्भो भगवान् वृषभो वृषभध्वजः । परमेष्ठी परं तत्त्वं परमात्मात्म भूरसि ॥३३॥
आप ही हिरण्यगर्भ अर्थात् ब्रह्मा हैं, भगवान् हैं, वृषभ हैं, वृषभ चिह्न से युक्त हैं, परमेष्ठी हैं, परमतत्त्व हैं, परमात्मा हैं, और आत्मभू―अपने आप उत्पन्न होने वाले हैं ।।33।।
“You alone are Hiranyagarbha (Brahma), the Supreme Lord, the righteous one, the one marked with the symbol of righteousness, the highest being, the ultimate reality, the Supreme Soul, and the self-born—one who manifests by Himself.” ( 33)
श्लोक ( Shlok ) 34
त्वमिनस्त्वमधिज्योति स्त्वमीशस्त्वमयोनिजः । अजरस्त्वमनादिस्त्वमनन्तस्त्वं त्वमच्युतः ॥३४॥
आप ही स्वामी हैं, उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप हैं, ईश्वर हैं, अयोनिज―योनि के बिना उत्पन्न होने वाले हैं, जरारहित हैं, आदिरहित है, अंतरहित हैं और अच्युत हैं ।।34।।
“You alone are the Lord, the supreme embodiment of divine light, the Almighty, the unborn one beyond a womb, free from decay, without a beginning, without an end, and the infallible one.” ( 34)
श्लोक ( Shlok ) 35
त्वमक्षर स्त्वमक्षय्यस्त्वमनक्षोऽस्यनक्षरः । विष्णुर्जिष्णुर्विजिष्णुश्च त्वं स्वयंभूः स्वयंप्रभः ॥३५॥
आप ही अक्षर अर्थात् अविनाशी हैं, अक्षम्य अर्थात् क्षय होने के अयोग्य हैं, अनक्ष अर्थात् इंद्रियों से रहित हैं, अनक्षर अर्थात् शब्दागोचर हैं, विष्णु अर्थात् व्यापक हैं, विष्णु अर्थात् कर्मरूप शत्रुओं को जीतने वाले हैं, विजिष्णु अर्थात् सर्वोत्कृष्ट स्वभाव वाले हैं, स्वयंभू अर्थात् स्वयं बुद्ध हैं, और स्वयंप्रभ अर्थात् अपने-आप ही प्रकाशमान हैं―असहाय, केवलज्ञान के धारक हैं ।।35।।
“You alone are Akshara—the imperishable one, Akshamya—beyond decay, Anaksha—free from sensory limitations, Anakshara—beyond verbal expression. You are Vishnu—the all-pervading one, Vishnu—the conqueror of karmic enemies, Vijishnu—of supreme nature. You are Swayambhu—the self-existent, and Swayamprabha—self-illuminating, independent, and the bearer of absolute knowledge.” ( 35)
श्लोक ( Shlok ) 36
त्वं शंभुः शंभवः शंयुः शंवदः शंकरो हरः । हरिर्मोहासुरारिश्च तमोऽरिर्भव्यभास्करः ॥३६॥
आप ही शंभु हैं, शंभव हैं, शंयु-सुखी हैं, शंवद हैं―सुख या शांति का उपदेश देने वाले हैं, शंकर हैं―शांति के करने वाले हैं, हर हैं, मोहरूपी असुर के शत्रु हैं, अज्ञानरूप अंधकार के अरि हैं और भव्य जीवों के लिए उत्तम सूर्य हैं ।।36।।
“You alone are Shambhu, the self-existent; Shambhava, the source of all; Shanyu, the embodiment of bliss; and Shamvada, the one who imparts peace and wisdom. You are Shankara, the bestower of tranquility; Hara, the remover of sorrows; the enemy of the demon of delusion; the destroyer of the darkness of ignorance; and the supreme sun for the enlightened beings.” ( 36)
श्लोक ( Shlok ) 37
पुराणः कविराद्यस्त्वं योगी योगविदां वरः । त्वं शरण्यो वरेण्योऽग्य्रस्त्वं पूतः पुण्यनायकः ॥३७॥
आप पुराण हैं―सबसे पहले के हैं, आद्य कवि हैं, योगी हैं, योग के जानने वालों में श्रेष्ठ हैं, सबको शरण देने वाले हैं, श्रेष्ठ हैं, अग्रसर हैं, पवित्र हैं, और पुण्य के नायक हैं ।।37।।
“You are Purana—the most ancient one, the primordial poet, the supreme yogi, the greatest among those who know yoga. You are the refuge of all, the most excellent, the foremost, the purest, and the leader of righteousness.” ( 37)
श्लोक ( Shlok ) 38
त्वं योगास्मा सयोगश्च सिद्धो बुद्धो निरुद्धवः। सूक्ष्मो निरंजनः कन्जसंजातो जिनकुंजरः ।॥३८॥
आप योगस्वरूप हैं―ध्यानमय हैं, योगसहित हैं―आत्मपरिस्पंद से सहित हैं, सिद्ध हैं―कृतकृत्य हैं, बुद्ध हैं―केवलज्ञान से सहित हैं, सांसारिक उत्सवों से रहित हैं, सूक्ष्म हैं―छद्मस्थज्ञान के अगम्य हैं, निरंजन हैं―कर्मकलंक से रहित हैं, गर्भ में कमलकर्णिका पर उत्पन्न हुए हैं अत: ब्रह्मरूप हैं और जिनवरों में श्रेष्ठ हैं ।।38।।
“You are the embodiment of yoga—immersed in deep meditation. You are united with yoga—resonating with self-awareness. You are Siddha—one who has attained perfection, and Buddha—endowed with absolute knowledge. You are free from worldly festivities, subtle—beyond the grasp of deceptive knowledge, and Niranjana—untainted by karmic impurities. Born on the lotus within the cosmic womb, you are of the nature of Brahman and the supreme among the enlightened ones.” (38)
श्लोक ( Shlok ) 39
छन्दो विच्छन्दसां” कर्ता वेदविद्वदतां वरः । वाचस्पतिरधर्मारिर्धर्मादिर्धर्मनायकः ॥३९॥
आप द्वादशांगरूप वेदों के जानने वाले हैं, द्वादशांगरूप वेदों के कर्ता हैं, आगम के जानने वाले हैं, वक्ताओं में सर्वश्रेष्ठ हैं, वचनों के स्वामी हैं, अधर्म के शत्रु हैं, धर्मों में प्रथम धर्म हैं और धर्म के नायक हैं ।।39।।
“You are the knower of the Vedas in their twelvefold form, the creator of the Vedas, the knower of the sacred scriptures, and the supreme among orators. You are the master of divine words, the enemy of unrighteousness, the foremost among all dharmas, and the leader of righteousness.” ( 39)
श्लोक ( Shlok ) 40
त्वं जिनः कामजिज्जेता त्वमर्हन्नरि हाऽरहाः । धर्मध्वजो धर्मपतिः कर्मारातिनिशुम्भनः ॥४०॥
आप जिन हैं, काम को जीतने वाले हैं, अर्हंत हैं―पूज्य हैं, मोहरूपशत्रु को नष्ट करने वाले हैं, अंतरायरहित हैं, धर्म की ध्वजा हैं, धर्म के अधिपति हैं, और कर्मरूपी शत्रुओं को नष्ट करने वाले हैं ।।40।।
“You are Jina—the conqueror of desires, Arhant—the venerable one, the destroyer of the enemy in the form of delusion, and free from all obstacles. You are the banner of dharma, the lord of righteousness, and the annihilator of karmic enemies.” ( 40)
श्लोक ( Shlok ) 41
त्वं ह भव्याब्जिनी बन्धुस्त्वं हवि र्भुक्त्वमध्वरः । त्वं मखाङ्ग मखज्येष्ठस्वं होता हव्य मेव च ॥४१॥
आप भव्यजीवरूपी कमलिनियों के लिए सूर्य के समान हैं, आप ही अग्नि हैं, यज्ञकुंड हैं, यज्ञ के अंग हैं, श्रेष्ठ यज्ञ हैं, होम करने वाले हैं और होम करने योग्य द्रव्य हैं ।।41।।
“You are like the sun for the lotus-like noble souls. You are the fire, the sacrificial altar, the components of the sacred ritual, the supreme sacrifice, the performer of the offering, and the sacred oblation itself.” ( 41)
श्लोक 42 से 51
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31