आदिपुराण सप्तदशं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 17 by Acharya Jinasena
पर्व 17 में भगवान् वृषभदेव के वैराग्य और दीक्षा ग्रहण करने की घटना का विस्तृत वर्णन है। यहाँ भगवान् का संसार से विरक्ति और मोक्ष मार्ग की ओर प्रस्थान काव्यात्मक और आध्यात्मिक रूप से प्रस्तुत किया गया है।
सैकड़ों राजाओं से घिरे भगवान् वृषभदेव विशाल सभामंडप में सिंहासन पर विराजमान थे, मानो निषध पर्वत पर सूर्य। इंद्र, अप्सराओं और देवों के साथ उनकी सेवा में उपस्थित हुआ। भक्ति से अभिभूत इंद्र ने अप्सराओं और गंधर्वों से नृत्य करवाया, जिसने भगवान् के मन को भी क्षणिक रूप से आकर्षित किया। इंद्र ने भगवान् को भोगों से विरक्त करने के लिए नीलांजना नामक सुंदरी नर्तकी को नृत्य के लिए नियुक्त किया, जिसकी आयु समाप्त होने से वह नृत्य करते-करते अदृश्य हो गई। इंद्र ने तुरंत दूसरी नर्तकी को उसी स्थान पर खड़ा कर दिया, पर भगवान् ने अंतर पहचान लिया। इससे उनके मन में वैराग्य जागृत हुआ।
भगवान् ने चिंतन किया कि यह संसार नश्वर है—लक्ष्मी चंचल, यौवन क्षणभंगुर, और शरीर दुर्गंधित है। सुख दुर्लभ और दुःख प्रबल है। जीव नरकों, तिर्यंच योनियों और मनुष्य जन्म में दुःख भोगता है। नीलांजना के नृत्य ने उन्हें यह बोध कराया कि भोग धोखा हैं। वे भोगों से विरक्त हो गए और मुक्ति के लिए उद्यत हुए।
लौकांतिक देव ब्रह्मलोक से आए और भगवान् की तप-दीक्षा की स्तुति की। उन्होंने भगवान् को जगद्गुरु, स्वयंभू, और मोक्षमार्ग का प्रणेता बताया। देवों ने पुष्पांजलि अर्पित की और भगवान् को तप के लिए प्रेरित किया। भगवान् ने राज्य भरत को और युवराज पद बाहुबली को सौंपा। निष्क्रमण कल्याणक और भरत का राज्याभिषेक एक साथ संपन्न हुआ। देवों ने भगवान् का क्षीरसागर के जल से अभिषेक किया और दिव्य वस्त्र-अलंकारों से सजाया।
भगवान् इंद्र द्वारा निर्मित सुदर्शन पालकी पर सवार होकर सिद्धार्थक वन पहुँचे। वहाँ चंद्रकांत शिला पर उतरकर उन्होंने परिवार से दीक्षा की अनुमति माँगी। फिर, वस्त्र-आभूषण त्यागकर पंचमुष्टि केशलोंच किया और चैत्र कृष्ण नवमी को उत्तराषाढ़ नक्षत्र में दिगंबर दीक्षा ग्रहण की। इंद्र ने उनके केश क्षीरसमुद्र में स्थापित किए। चार हजार राजाओं ने भी भक्ति से दीक्षा ली।
देवों और भरत ने भगवान् की पूजा की। भरत अयोध्या लौटे और राज्य संभाला। भगवान् वृषभदेव तप के मार्ग पर अग्रसर हुए, जो संसार के लिए मोक्ष का प्रतीक बना।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 17
भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन
श्लोक 1 से 11 नीलांजना का नृत्य और भगवान की विरक्ति
भगवान वृषभदेव सैकड़ों राजाओं से घिरे सभामंडप में सिंहासन पर निषध पर्वत के सूर्य से विराजमान थे। इंद्र अप्सराओं और देवों के साथ पूजा सामग्री लेकर उनकी सेवा हेतु आया। भक्ति से इंद्र ने अप्सराओं और गंधर्वों का नृत्य शुरू किया। नृत्य ने भगवान के मन को अनुरक्त किया। इंद्र ने उनकी विरक्ति हेतु क्षीणायु नीलांजना को नृत्य के लिए चुना। नीलांजना नृत्य करते हुए आयु क्षय से बिजली सी नष्ट हो गई। इंद्र ने दूसरी देवी खड़ी की, पर भगवान ने अंतर जान लिया। इससे भगवान भोगों से विरक्त हो वैराग्य चिंतन में लीन हुए।
श्लोक 12 से 21 संसार की विनश्वरता पर चिंतन
भगवान ने सोचा कि यह जगत विनश्वर और लक्ष्मी चंचल है। रूप, यौवन, और ऐश्वर्य स्थिर मानने वाला अज्ञानी है। रूप संध्या की लाली सा और यौवन पल्लव सा क्षणिक है। भोग विषवेल से और जीवन नश्वर है। आयु घटीयंत्र के जल सी घटती है, शरीर दुर्गंधित है। संसार में सुख दुर्लभ और दुःख भारी है। नरक के दुःख स्मरण से भोग इच्छा समाप्त हो। आर्तध्यान से भोग नरक में दुःख बनते हैं। नरक में सुख नहीं, केवल दुःख है। जीव तिर्यंच गति में दुःख भोगता है।
श्लोक 22 से 31 जीव की दुःखमय यात्रा
जीव पृथ्वीकायिक आदि योनियों में खोदा, तपाया, और छेदा जाकर दुःख भोगता है। सूक्ष्म अवस्था में परिभ्रमण करता है। त्रस पर्याय में मारा और बंधा जाता है। जन्म, वृद्धावस्था, और मृत्यु के दुःख भोगता है। क्षण में नष्ट, जीर्ण, और पुनर्जन्म लेता है। तिर्यंच योनि में अनंत दुःख भोगता है। अशुभ कर्म मंद होने पर मनुष्य पर्याय पाता है। वहाँ भी कर्म से शारीरिक-मानसिक दुःख भोगता है। सेवा, दरिद्रता, और शोक नरक से हैं।
श्लोक 32 से 41 संसार का असार स्वरूप
शरीर दुःख से भरी गाड़ी सा नष्ट होता है। देवपर्याय में सुख है, पर पतन से दुःख होता है। अल्प विभूति वाले देव दुःखी रहते हैं। जीव संसार चक्र में दुःख भोगता है। नीलांजना का शरीर देखते-देखते नष्ट हुआ। स्त्री रूप से कामीजन पतंग से नष्ट होते हैं। इंद्र ने यह कपट नाटक बोध हेतु किया। भोग भंगुर और धोखे से हैं। आभूषण, चंदन, नृत्य, और गीत व्यर्थ हैं। शरीर की शोभा न हो तो अलंकार बेकार हैं।
श्लोक 42 से 51 वैराग्य और तप की ओर प्रेरणा
भगवान ने रूप, संसार, भोग, और लक्ष्मी को धिक्कारा। वे भोगों से विरक्त हो मुक्ति हेतु उद्यत हुए। उनके हृदय में विशुद्धियाँ मुक्तिलक्ष्मी की सखियाँ सी आईं। वे मुक्ति के लिए चिंतित हुए, जगत शून्य लगा। इंद्र ने उनकी विरक्ति अवधिज्ञान से जानी। लौकांतिक देव ब्रह्मलोक से तप पूजा हेतु आए। ये आठ प्रकार के उत्तम देव शांत, शुभ, और ऋद्धिमान हैं। वे हंस से मुक्ति तट पर उत्कंठित थे।
श्लोक 52 से 61 लौकांतिक देवों की स्तुति
लौकांतिक देवों ने पुष्पांजलि से भगवान की पूजा की। उन्होंने कल्पवृक्ष पुष्पों से चरण पूजे और स्तुति की। कहा कि आप मोह को जीत भव्यजीवों के भाई हैं। आप ज्योतिस्वरूप और उद्धारक हैं। आपके धर्म से भव्य संसार पार करेंगे। आपके वचन सूर्यकिरण से भव्य कमलों को प्रफुल्लित करेंगे। आप ब्रह्मा, विजेता, और जगद्गुरु हैं। आप मोह कीचड़ से जगत का उद्धार करेंगे। आप स्वयंभू और करुणामय हैं।
श्लोक 62 से 71 भगवान की महिमा और प्रेरणा
देवों ने कहा कि आप सन्मार्ग जानते हैं, प्रबोध की आवश्यकता नहीं। आप सूर्य से स्वयं प्रकाशित करते हैं। आप दीपक से प्रबोधित कर प्रबोध देते हैं। आप गर्भ में सद्योजात, जन्म में वाम, तप में अघोर हैं। आप संसार उपकार हेतु उद्यत हों। काल आपके धर्म अमृत हेतु योग्य है। आप तप से कर्म और मोह को जीतें। मोक्ष हेतु भोग छोड़ें। भगवान ने तप हेतु दृढ़ बुद्धि लगाई। लौकांतिक देव स्वर्ग लौटे।
श्लोक 72 से 81 निष्क्रमण कल्याणक का उत्सव
देव अपने इंद्रों के साथ अयोध्या आए। इंद्रादिक ने क्षीरसागर जल से भगवान का अभिषेक किया। दिव्य आभूषण, वस्त्र, और चंदन से अलंकार हुआ। भगवान ने भरत को सम्राट और बाहुबली को युवराज बनाया। निष्क्रमण और राज्याभिषेक से स्वर्ग-पृथ्वी हर्षित हुए। भगवान तपराज्य हेतु और कुमार राज्यलक्ष्मी हेतु तैयार थे। देव शिल्पी पालकी और मनुष्य शिल्पी मंडप बना रहे थे।
श्लोक 82 से 91 उत्सव की भव्यता
इंद्राणी और यशस्वती-सुनंदा ने रंगावली सजाई। दिक्कुमारियाँ और वारांगनाएँ मंगल द्रव्य लिए थीं। भगवान देवों से, कुमार राजाओं से घिरे थे। देव पुष्पांजलि और पुरवासी शेषाक्षत छोड़ रहे थे। अप्सराएँ आकाश में, वारांगनाएँ पृथ्वी पर नृत्य कर रही थीं। देव बाजे और मंगल बाजे बज रहे थे। किन्नर और अंतःपुर स्त्रियाँ गीत गा रही थीं। देवों और मनुष्यों का जय-ध्वनि कोलाहल था। राजमंदिर हर्ष से व्याप्त था। भगवान का दीक्षा उद्योग निराकुल हुआ।
श्लोक 92 से 101 पालकी पर प्रस्थान
भगवान ने शेष पुत्रों में पृथ्वी बाँटी। नाभिराज से पूछकर सुदर्शन पालकी पर बैठे। इंद्र ने हाथ से सहारा दिया। भगवान दीक्षा अंगना के आलिंगन हेतु पालकी पर आरूढ़ हुए। माला, चंदन, और वस्त्रों से शोभित थे। वे विशुद्धता और पालकी पर चढ़े। राजा और विद्याधरों ने पालकी सात-सात पैड ले जाई। वैमानिक-भवनत्रिक देवों ने आकाश में ले गए। इंद्र भी पालकी ढो रहे थे। यक्ष फूल बरसा रहे थे, शीतल वायु बह रही थी।
श्लोक 102 से 111 भगवान का प्रस्थान और उत्सव
देवों के बंदीजन प्रस्थान का मंगलपाठ पढ़ रहे थे। देव भेरियाँ बजा रहे थे। इंद्र की आज्ञा से देव घोषणा कर रहे थे कि भगवान वृषभदेव मोह को जीतने का उद्योग करेंगे। सुर-असुर जय-जय कोलाहल कर रहे थे। मंगलगीत, जय-घोष, और नगाड़ों से आकाश शब्दायमान था। इंद्रों की प्रभा और दुंदुभि शब्द संसार को व्याप्त कर रहे थे। चमर हंसों से आकाश में लहरा रहे थे। करोड़ों दुंदुभि बाजे बज रहे थे। देवांगनाएँ छत्रबंध सहित नृत्य कर रही थीं। किन्नर देवियाँ तप कल्याण का मधुर गान कर रही थीं।
श्लोक 112 से 131 प्रस्थान की शोभा
व्यंतर देव पताकाओं संग नृत्य कर रहे थे। देव शंख-तुरही बजा रहे थे। लक्ष्मी आदि देवियाँ कमल और दिक्कुमारियाँ मंगल द्रव्य लिए आगे चल रही थीं। भगवान रत्नमयी पालकी पर अयोध्या से निकले। उनका तेज मेरु, सूर्य, चंद्र, और अग्निकुमारों को तिरस्कृत कर रहा था। मुकुट, हार, भुजाएँ, और जघनस्थल से वे सुमेरु और जंबूद्वीप सी शोभायमान थे। पैरों की किरणें और शरीर की दीप्ति दिशाएँ व्याप्त कर रही थीं। छत्र और चमर से वे चंद्रमा और क्षीरसागर से सेवा प्राप्त करते दिखे। नगरवासी उनकी स्तुति कर रहे थे।
श्लोक 132 से 141 नगरवासियों की प्रार्थना
नगरवासियों ने कहा कि आप कल्याणमय मार्ग पर जाएँ और शीघ्र लौटें। आप अनाथों के रक्षक हैं, हमारी रक्षा करें। आप बिना कारण उपकार करते हैं। वे मस्तक झुकाकर प्रार्थना कर रहे थे। कुछ बोले कि देव भगवान को दूर ले जा रहे हैं, शायद यह क्रीड़ा हो। पहले भी जन्मोत्सव हेतु सुमेरु गए थे। कुछ ने कहा कि भगवान सूर्य से चमक रहे हैं। वे कुलाचलों में सुमेरु से शोभायमान थे। इंद्र उनकी सेवा में था।
श्लोक 142 से 151 नगरवासियों का विस्मय
देवों की प्रभा बिजलियों सी फैली थी। भगवान का पुण्य वर्णनातीत था। नगाड़े, मृदंग, नृत्य, गीत, और चमर शोभायमान थे। कुछ बोले कि यह स्वर्ग चल रहा है या चित्र है। यह इंद्रजाल या भ्रम हो सकता है। नगरवासी विस्मय से बातें कर रहे थे। कुछ बोले कि भगवान के अवतार से देवों का आना-जाना लगा है। नीलांजना के नृत्य से वैराग्य हुआ। लौकांतिक देवों ने वैराग्य दृढ़ किया। भगवान भोग और शरीर से निःस्पृह हुए।
श्लोक 152 से 161 भगवान की यात्रा और शोक
भगवान स्वातंत्र्य सुख हेतु वन जाना चाहते थे। उनका सुख अधीन था, पुत्रों को राज्य सौंपा। उनकी यात्रा सुखद हो। भगवान चिरंजीव हों और लौटें। भरत महादान दे रहे थे। स्वर्ण, घोड़े, और हाथी बाँटे गए। भगवान ने नगर पार किया। यशस्वती आदि रानियाँ शोक से पीछे चलीं। उनकी शोभा म्लान हुई, आभूषण उतरे। वे डगमगाते हुए भगवान के पीछे गईं।
श्लोक 162 से 171 रानियों का विलाप
कई रानियाँ मूर्च्छित हो बोलीं कि नाथ कहाँ जा रहे हैं। वे शोक से हृदय धड़कन, म्लानता, और आँसुओं से भरी थीं। कुछ ने रोना रोका, पर आँसू रुके। कुछ के हार टूटे, मोती बिखरे। केश खुले, मालाएँ गिरीं, वस्त्र शिथिल हुए। कुछ को पालकी में रखकर सांत्वना दी गई। धीर रानियाँ संतुष्ट हो चलीं। वे बोलीं कि यह मंगल है, शोक न करें। शीघ्र चलें, भगवान दिख रहे हैं।
श्लोक 172 से 181 भगवान का प्रस्थान और पीछे चलना
वृद्ध स्त्रियों ने समझाकर यशस्वती और सुनंदा को पैदल चलने को प्रेरित किया। समाचार सुनते ही देवियों ने छत्र-चमर छोड़ भगवान के पीछे चलना शुरू किया। वृद्ध पुरुषों ने भगवान की व्याकुलता रोकने हेतु रानियों को रोका। रानियाँ निराश हो घर लौटीं। यशस्वती और सुनंदा पूजा सामग्री संग चलीं। नाभिराज, मरुदेवी, और राजा उनके पीछे गए। भरत नगरवासियों और भाइयों संग चले। भगवान आकाश में थोड़ी दूर गए। वे सिद्धार्थक वन पहुँचे।
श्लोक 182 से 191 सिद्धार्थक वन और शिला
इंद्रों की सेना सिद्धार्थक वन पहुँची। वन पक्षियों से शब्दायमान था। वहाँ चंद्रकांत मणि की विशाल, पवित्र शिला थी। शिला भगवान के यश और सिद्धक्षेत्र सी शोभायमान थी। वृक्षों की छाया और फूलों से सजी थी। इंद्राणी ने रत्न चूर्ण से सजाया। मंडप, पताकाएँ, धूप, और मंगल द्रव्य थे। भगवान पालकी से उतरे। शिला देख पांडुकशिला स्मरण हुआ।
श्लोक 192 से 201 दीक्षा की तैयारी
भगवान ने शिला पर बैठ सभा को उपदेश दिया। बंधुओं से दीक्षा की आज्ञा ली। कोलाहल शांत होने पर परिग्रह त्यागा। वस्त्र, आभूषण, और माला छोड़े। आभूषण कांतिहीन हुए। चेतन-अचेतन परिग्रह का परित्याग किया। पूर्व दिशा में पद्मासन लगाया। सिद्धों को नमस्कार कर केशलोंच किया। दिगंबर रूप में दीक्षा धारण की।
श्लोक 202 से 211 दीक्षा और पूजा
भगवान ने सामायिक-चारित्र और व्रत ग्रहण किए। चैत्र कृष्ण नवमी को दीक्षा ली। इंद्र ने केश रत्न पिटारे में रखे। केश चंद्र चिह्न से शोभायमान थे। इंद्र ने केश क्षीरसमुद्र में स्थापित किए। महापुरुषों के आश्रय से केश पूज्य बने। देवों ने त्यागे वस्त्रों की पूजा की।
श्लोक 212 से 221 अन्य राजाओं की दीक्षा
चार हजार राजाओं ने स्वामिभक्ति से दीक्षा ली। वे भाव के बिना द्रव्यलिंगी साधु बने। स्वामी के अभिप्राय से निर्ग्रंथ हुए। कच्छ आदि राजा भक्ति से दीक्षित हुए। कुछ स्नेह, मोह, या भय से दीक्षित हुए। भगवान द्रव्यलिंगियों संग कल्पवृक्ष से शोभायमान थे। उनका तेज तप से और दैदीप्यमान हुआ।
श्लोक 222 से 231 इंद्रों की स्तुति
भगवान का रूप इंद्र को तृप्त न कर सका। इंद्रों ने उनकी स्तुति की। कहा कि आप स्रष्टा और अनिष्ट नाशक हैं। आपके गुण असंख्य हैं। कर्म मल हटने से गुण स्फुरित हैं। आपकी दीक्षा पुण्यरूप और संतापहर है। आप स्वयंबुद्ध हैं।
श्लोक 232 से 241 दीक्षा की महिमा
इंद्रों ने कहा कि आपने राज्यलक्ष्मी छोड़ निर्वाणदीक्षा ली। आप मत्त हस्ती से बंधन तोड़ वन गए। भोग स्वप्न से हैं, आपने मोक्ष चुना। आप चंचल लक्ष्मी और धन त्याग मुक्ति पाएँगे। आप राजलक्ष्मी में विरक्त, तप में अनुरक्त हैं। यह व्याजस्तुति से आपकी महिमा है।
श्लोक 242 से 251 भगवान के गुण
आप सुखी हैं, तीन ज्ञानों से कर्म जीतते हैं। आप मोह अंधकार नष्ट करते हैं। ध्यान से कर्म भट्टी जलाते हैं। रत्नत्रय से कर्म वन नष्ट करते हैं। आपकी ज्ञान-वैराग्य संपत्ति मोक्षदायी है। इंद्र स्वर्ग लौटे। भरत ने वचन मालाओं से पूजा की। भरत ने जल, गंध, और फल से पूजा की।
श्लोक 252 से 257 भरत की पूजा और लौटना
भरत ने चरण प्रक्षालन कर नमस्कार किया। स्तुतियों से भक्ति दिखाई। सूर्य पश्चिम में था जब भरत अयोध्या लौटे। भरत ने राज्य पालते हुए भगवान की परिचर्या की। वे भाइयों को हर्षित और गुरुओं का सम्मान करते थे। भगवान की तरह दिशाओं का पालन किया।
पर्व 18
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47
Download PDF
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena