आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 |
श्लोक 152 से 161 समवसरण का वैभव और स्तुति
दुंदुभि और पुष्पवर्षा से समवसरण गूंजता था, मयूर शब्द करते थे। चमरें कांति बढ़ाती थीं। भगवान की दिव्यध्वनि सर्वभाषारूपी और तत्त्वज्ञान देने वाली थी। उनकी वाणी तीर्थ और मोक्षमार्ग है। वे सर्वज्ञ, सर्वजित् और तीर्थंकर हैं। इंद्रों ने उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप में पूजा।
English translation of Ādi purāṇa parv 23 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
स्वदमरपट हैर्विशङ्क्य धनागमं पटुजलदघटानिरुद्धनभोङ्गणम् । विरचितरुचिमत्कलापसु मन्थरा मदकलमधुना रुवन्ति “शिखाबलाः ॥१५२॥
हे भगवन्, आपके देव-दुंदुभियों के कारण बड़े-बड़े मेघों की घटाओं से आकाशरूपी आंगन को रोकने वाली वर्षाऋतु की शंका कर ये मयूर इस समय अपनी सुंदर पूँछ फैलाकर मंद-मंद गमन करते हुए मद से मनोहर शब्द कर रहे हैं ।।152।।
O Bhagavan, due to the celestial drums (divine dundubhis) resounding in the sky, the peacocks, mistaking it for the arrival of the monsoon, are spreading their beautiful tails wide. At this moment, they move gracefully with slow and charming steps, producing delightful and melodious cries, intoxicated with joy. (152)
श्लोक ( Shlok ) 153
तव जिन ततदेहरुचिशरवण चमररुहततिः सितविह गरुचिम् । इयमनुतनुते रुचिरतरतनुर्मणिमुकुटसमिद्धरुचिसुरधुता ॥१५३॥
हे जिनेंद्र, मणिमय मुकुटों की दैदीप्यमान कांति को धारण करने वाले देवों के द्वारा ढोरी हुई तथा अतिशय सुंदर आकार वाली यह आपके चमरों की पंक्ति आपके शरीर की कांतिरूपी सरोवर में सफेद पक्षियों (हंसों) की शोभा बढ़ा रही है ।।153।।
O Jinendra, this radiant row of white yak-tail fans (chamaras), waved by the gods adorned with resplendent jeweled crowns, enhances the beauty of your divine luster. Just as a serene lake is graced by the presence of pure white swans, similarly, these chamaras add to the splendor of your luminous form. ( 153)
श्लोक ( Shlok ) 154
त्वद्दव्यवागियमशेषपदार्थगर्भा भाषान्तराणि सकलानि निदर्शयन्ती । तत्वा वबोधमचिरात् कुरुते बुधानां स्याद्वादनीति विहतान्धमतान्धकारा ॥१५४॥
हे भगवन्, जिसमें संसार के समस्त पदार्थ भरे हुए हैं, जो समस्त भाषाओं का निदर्शन करती है अर्थात् जो अतिशय विशेष के कारण समस्त भाषाओंरूप परिणमन करती है और जिसने स्याद्वादरूपी नीति से अन्यमतरूपी अंधकार को नष्ट कर दिया है ऐसी आपकी यह दिव्यध्वनि विद्वान् लोगों को शीघ्र ही तत्त्वों का ज्ञान करा देती है ।।154।।
O Bhagavan, your divine speech, which encompasses all the elements of the universe and reflects the essence of all languages, is extraordinary. With the guiding principle of Syadvada (the doctrine of conditional predication), it dispels the darkness of one-sided views. This celestial voice swiftly grants true knowledge of the fundamental principles to the wise. (154)
श्लोक ( Shlok ) 155
प्रक्षालयत्वखिलमेव मनोभलं नस्त्वद्भारतीमयमिदं शुचिपुण्यमम्बु । तीर्थं तदेव हि विनेयजनाजवञ्ज वावारसन्तरणवर्त्म भवत्प्रणीतम् ॥१५५॥
हे भगवन आपकी वाणीरूपी यह पवित्र पुण्य जल हम लोगों के मन के समस्त मल को धो रहा है, वास्तव में यही तीर्थ है और यही आपके द्वारा कहा हुआ धर्मरूपी तीर्थ भव्यजनों को संसाररूपी समुद्र से पार होने का मार्ग है ।।155।।
O Bhagavan, your speech, like sacred and meritorious water, washes away all impurities of our minds. Truly, this alone is the supreme pilgrimage. Indeed, the dharma-pilgrimage revealed through your words serves as the path for noble souls to cross the vast ocean of worldly existence. ( 155)
श्लोक ( Shlok ) 156
स्वं सर्वगः सकलवस्तु गतावबोधस्त्वं सर्ववित्प्रमितविश्वपदार्थसार्थः । त्वं सर्वजिद् विदितमन्मथमोहशत्रुस्त्वं सर्वदृङ् निखिलभावविशेषदर्शी ॥१५६
हे भगवन्, आपका ज्ञान संसार की समस्त वस्तुओं तक पहुँचा है―समस्त वस्तुओं को जानता है इसलिए आप सर्वग अर्थात् व्यापक है, आपने संसार के समस्त पदार्थों के समूह जान लिये हैं इसलिए आप सर्वज्ञ हैं, आपने काम और मोहरूपी शत्रु को जीत लिया है इसलिए आप सर्वजित् अर्थात् सबको जीतने वाले हैं और आप संसार के समस्त पदार्थों को विशेषरूप से देखते हैं इसलिए आप सर्वदृक् अर्थात् सबको देखने वाले हैं ।।156।।
O Bhagavan, your knowledge has reached all objects of the world—you perceive everything; therefore, you are Sarvaga (omnipresent). You have realized the entirety of existence; thus, you are Sarvajna (omniscient). You have conquered the enemies of desire and delusion; hence, you are Sarvajit (the ultimate victor). And you distinctly perceive all substances of the universe; thus, you are Sarvadrik (the all-seeing one). ( 156)
श्लोक ( Shlok ) 157
त्वं तीर्थ कृत्सकलपापमलापहारिसद्धर्मतीर्थ विमलीकरणैकनिष्ठः । त्वं मन्त्रकृन्निखिल पापविषापहारिपुण्यश्रुति प्रवरमन्त्रविधानचुञचुः ॥१५७॥
हे भगवन् आप समस्त पापरूपी मल को नष्ट करने वाले समीचीन धर्मरूपी तीर्थ के द्वारा जीवों को निर्मल करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं इसलिए आप तीर्थंकर हैं और आप समस्त पापरूपी विष को अपहरण करने वाले पवित्र शास्त्ररूपी उत्तम मंत्र के बनाने में चतुर हैं इसलिए आप मंत्रकृत् हैं ।।157।।
O Bhagavan, you are always engaged in purifying living beings through the true Dharma Tirtha, which destroys all impurities of sin; therefore, you are Tirthankara. You are also skilled in composing the sacred scriptures, which act as a supreme mantra to remove the poison of sins; hence, you are Mantrakrit. (157)
श्लोक ( Shlok ) 158
स्वामामनन्ति मुनयः पुरुषं पुराणं त्वां प्राहुरच्युतमृषीश्वरमक्षयर्द्धिम् । तस्माद्भवान्तक भवन्तमचिन्त्ययोगं योगीश्वरं जगदु पास्य मुपास्महे स्म ॥ १५८॥
हे भगवन, मुनि लोग आपको ही पुराणपुरुष अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष (पक्ष में ब्रह्मा) मानते हैं, आपको ही ऋषियों के ईश्वर और अक्षय ऋद्धि को धारण करने वाले अच्युत अर्थात् अविनाशी (पक्ष में विष्णु) कहते हैं तथा आपको ही अचिंत्य योग को धारण करने वाले, और समस्त जगत् के उपासना करने योग्य योगीश्वर अर्थात् मुनियों के अधिपति (पक्ष में महेश) कहते हैं इसलिए हे संसार का अंत करने वाले जिनेंद्र ! ब्रह्मा, विष्णु और महेशरूप आपकी हम लोग भी उपासना करते हैं ।।158।।
O Bhagavan, the sages consider you as the Purāṇa Puruṣa, the Supreme Being (akin to Brahma); they regard you as Achyuta, the eternal and indestructible one who possesses infinite spiritual wealth (akin to Vishnu); and they see you as Yogīśvara, the Lord of ascetics, embodying unfathomable yogic power and worthy of worship by the entire universe (akin to Mahesh). Therefore, O Jinendra, who brings an end to the cycle of existence, we too worship you as Brahma, Vishnu, and Mahesh. ( 158)
श्लोक ( Shlok ) 159
तुभ्यं नमः सकलघातिमलव्यपायसंभूतकेवलमयामललोचनाय । तुभ्यं नमो दुरितबन्धनशङ्कलानां छेत्त्रे भवार्गलभिदे जिनकुञ्जराय ॥१५९॥
हे नाथ, समस्त घातियाकर्मरूपी मल के नष्ट हो जाने से जिनके केवलज्ञानरूपी निर्मल नेत्र उत्पन्न हुआ है ऐसे आपके लिए नमस्कार हो । जो पापबंधरूपी सांकल को छेदने वाले हैं, संसाररूपी अर्थ को भेदने वाले हैं और कर्मरूपी शत्रुओं को जीतने वाले जिनों में हाथी के समान श्रेष्ठ हैं ऐसे आपके लिए नमस्कार हो ।।159।।
O Nātha, salutations to you, whose pure omniscient vision has arisen by the complete destruction of all Ghātiyā Karmas (destructive karmas). Salutations to you, who shatter the chains of sinful bondage, pierce through the meaning of worldly existence, and conquer the enemies of karma, just as the mighty elephant stands supreme among all beings. ( 159)
श्लोक ( Shlok ) 160
तुभ्यं नमस्त्रिभुवनैकपितामहाय तुभ्यं नमः परमनिर्वृतिकारणाय । तुभ्यं नमोऽधिगुरवे गुरवे गुणोघैस्तुभ्यं नमो विदितविश्वजगत्त्रयाय ॥ १६०॥
हे भगवन्, आप तीनों लोकों के एक पितामह हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप परम निवृत्ति अर्थात् मोक्ष अथवा सुख के कारण हैं इसलिए आपको नमस्कार हो, आप गुरुओं के भी गुरु हैं तथा गुणों के समूह से भी गुरु अर्थात् श्रेष्ठ हैं इसलिए भी आपको नमस्कार हो, इसके सिवाय आपने समस्त तीनों लोकों को जान लिया है इसलिए भी आपको नमस्कार हो ।।160।।
O Bhagavān, salutations to you, for you are the sole grandfather of the three worlds. Salutations to you, as you are the cause of ultimate liberation and supreme bliss. You are the Guru of all Gurus and superior even to the ocean of virtues, hence, salutations to you. Moreover, you have completely known the entire three worlds, and for this too, I bow to you with reverence. ( 160)
श्लोक ( Shlok ) 161
इत्युच्चकैः स्तुतिमुदारगुणानुरागादस्माभिरीश रचितां त्वयि चित्रवर्णाम् । देव प्रसीद परमेश्वर भक्तिपूतां पात्रार्पितां स्त्रजमिवानुगृहाण चार्वीम् ॥१६१॥
हे ईश, आपके उदार गुणों में अनुराग होने से हम लोगों ने आपकी यह अनेक वर्षा (अक्षरों अथवा रंगों) वाली उत्तम स्तुति की है इसलिए हे देव, हे परमेश्वर, हम सब पर प्रसन्न होइए और भक्ति से पवित्र तथा चरणों में अर्पित की हुई सुंदर माला के समान इसे स्वीकार कीजिए ।।161।।
O Bhagavān, O sole Lord of the three worlds, being deeply devoted to your noble and boundless virtues, we have composed this exquisite hymn, adorned with a shower of countless words (letters or colors). Therefore, O Divine One, O Supreme Lord, may you be pleased with us and graciously accept this hymn, which is as pure and beautiful as a garland lovingly offered at your holy feet. ( 161)
श्लोक 162 से 171
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 |