आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261
श्लोक 262 से 271 विहार की शोभा और प्रभाव
देवांगनाएँ नृत्य करती हैं, और किन्नर गायन करते हैं। इंद्र उनके चारों ओर चमकते हैं। दिशाएँ निर्मल और पृथ्वी सुभिक्ष से भरी होती है। वृक्ष असमय फूलते हैं, और प्राणी मित्रता बढ़ाते हैं। सुवर्णमय कमल उनके चरणों के नीचे सुशोभित होते हैं। भव्य जीव आनंदित होते हैं, और चार सौ कोश तक कल्याण व्याप्त होता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 25 – Shlok 262 to 271
श्लोक ( Shlok ) 262
नभारङ्गे नटन्ति स्म प्रोल्लसद् भ्रूपताकिकाः। सुराङ्गना विलिम्पत्यः स्वदेहप्रमया दिशः ॥२६२॥
जिनकी भौंहरूपी पताकाएं उड़ रही हैं ऐसी देवांगनाएं अपने शरीर की प्रभा से दिशाओं को लुप्त करती हुई आकाशरूपी रंगभूमि में नृत्य कर रही थी ।।262।।
The celestial maidens, whose flag-like tresses were fluttering, were dancing in the sky-like stage, their radiance extinguishing the directions as they moved. ||262||
श्लोक ( Shlok ) 263
विबुधाः पेठुरुत्साहात् किन्नरा मधुरं जगुः। वाणावादनमातेनुर्गन्धर्वाः सहखेचरैः ॥२६३॥
देव लोग बड़े उत्साह के साथ पुण्य-पाठ पढ़ रहे थे, किन्नरजाति के देव मनोहर आवाज से गा रहे थे और गंधर्व विद्याधरों के साथ मिलकर वीणा बजा रहे थे ।।263।।
The gods, with great enthusiasm, were reciting sacred hymns. The Kinnara gods were singing with enchanting voices, and along with the Gandharvas and Vidyadharas, they were playing the veena. ||263||
श्लोक ( Shlok ) 264
प्रभामयमिवाशेषं जगत्कर्तुं समुद्यताः । प्रतस्थिरे सुराधीशा ज्वलन्मुकुटकोट्यः ॥२६४॥
जिनके मुकुटों के अग्रभाग दैदीप्यमान हो रहे हैं ऐसे इंद्र समस्त जगत् को प्रभामय करने के लिए तत्पर हुए के समान भगवान के इधर-उधर चल रहे थे ।।264।।
The Lord, moving here and there, appeared like Indra, whose crowns were glowing brightly, ready to illuminate the entire world with His radiance. ||264||
श्लोक ( Shlok ) 265
दिशः प्रसेदुरुन्मुक्तधूलिकाः प्रमदादिव । बभ्राजे धृतवैमल्यमनभ्रं वत्र्म वार्मुचाम् ॥२६५॥
उस समय समस्त दिशाएँ मानो आनंद से ही धूमरहित हो निर्मल हो गयी थीं और मेघरहित आकाश अतिशय निर्मलता को धारण कर सुशोभित हो रहा था ।।265।।
At that time, all the directions seemed to be free of smoke and pure, filled with joy, and the sky, devoid of clouds, was adorned with an extraordinary purity and beauty. ||265||
श्लोक ( Shlok ) 266
परिनिष्पन्नशाल्या दिसस्यसंपन्मही तदा । उद्भूतहर्षरोमाञ्चा स्वामिलाभा दिवाभवत् ॥ २६६॥
भगवान् के विहार के समय पके हुए शालि आदि धान्यों से सुशोभित पृथ्वी ऐसी जान पड़ती थी मानो स्वामी का लाभ होने में उसे हर्ष के रोमांच ही उठ आये हों ।।266।।
During the Lord’s journey, the earth, adorned with ripened crops like rice and barley, seemed as if it were trembling with joy, thrilled by the benefit of having its Lord present. ||266||
श्लोक ( Shlok ) 267
ववुः सुरभयो वाताः स्वर्धुनीशीकरस्पृशः । आकीर्णपङ्कजरजः पटवासपटावृताः ॥२६७॥
जो आकाशगंगा के जलकणों का स्पर्श कर रही थी और जो कमलों के पराग-रज से मिली हुई होने से सुगंधित वस्त्रों से ढकी हुई-सी जान पढ़ती थी ऐसी सुगंधित वायु बह रही थी ।।267।।
A fragrant breeze was blowing, as if it were touching the droplets of the Milky Way and draped in scented garments, mingled with the pollen dust of lotuses. ||267||
श्लोक ( Shlok ) 268
मही समतला रेजे सम्मुखीन तलोज्ज्वला । सुरैर्गन्धाम्बुभिः सिक्ता स्नातेव विरजाः सती ॥२६८
उस समय पृथ्वी भी दर्पणतल के समान उज्ज्वल तथा समतल हो गयी थी, देवों ने उस पर सुगंधित जल की वर्षा की थी जिससे वह धूलिरहित होकर ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो रजोधर्म से रहित तथा स्नान की हुई पतिव्रता स्त्री ही हो ।।268।।
At that time, the earth became bright and level like the surface of a mirror. The gods had showered fragrant water upon it, making it dust-free and so beautifully adorned, as if it were a chaste woman, devoid of any impurity and bathed in purity. ||268||
श्लोक ( Shlok ) 269
अकालकुसुमोद्भेदं दर्शयन्ति स्म पादपाः । ऋतुभिः सममागत्य संरुद्धाः साध्वसादिव ॥२६९॥
वृक्ष भी असमय में फूलों के उद्भेद को दिखला रहे थे अर्थात् वृक्ष पर बिना समय के ही पुष्प आ गये थे और उनसे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो सब ऋतुओं ने भय से एक साथ आकर ही उनका आलिंगन किया हो ।।269।।
The trees were displaying the premature blossoming of flowers, meaning flowers bloomed on the trees out of season. It seemed as if all the seasons, in fear, had gathered together to embrace them. ||269||
श्लोक ( Shlok ) 270
सुभिक्षं क्षेममारोग्यं गन्यूतीनां चतुःशती। भेजे भूर्जिनमाहात्म्यादजातप्राणिहिंसना ॥२७०॥
भगवान के माहात्म्य से चार सौ कोश पृथ्वी तक सुभिक्ष था, सब प्रकार का कल्याण था, आरोग्य था और पृथ्वी प्राणियों की हिंसा से रहित हो गयी थी ।।270।।
Due to the Lord’s grandeur, the earth up to four hundred kos was abundant with prosperity, all kinds of welfare, and health. The earth had become free from the violence of living beings. ||270||
श्लोक ( Shlok ) 271
अकस्मात् प्राणिनो भेजुः प्रमदस्य परम्पराम् । तेनुः परस्परां मैत्री बन्धु भूयमिवाश्रिताः ।॥२७१।।
समस्त प्राणी अचानक आनंद की परंपरा को प्राप्त हो रहे थे और भाईपने को प्राप्त हुए के समान परस्पर की मित्रता बढ़ा रहे थे ।।271।।
All living beings were suddenly attaining a state of continuous joy and, like siblings, were increasing their friendship with one another. ||271||
श्लोक 272 से 281
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 | ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 | श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 | श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 | श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 | श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 | श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 | भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 | भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 | भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 | भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 |भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 | भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 | धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 | नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192 | भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 261 | ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 316
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन पर्व 23 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 196
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन पर्व 24 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 172 | श्लोक 173 से 181 | श्लोक 182 से 186
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के विहार का दर्शन करने वाला पर्व 25 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 110 | श्लोक 111 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 143 | श्लोक 144 से 155 | श्लोक 156 से 167 | श्लोक 168 से 178 | श्लोक 179 से 190 | श्लोक 191 से 203 | श्लोक 204 से 217 | श्लोक 218 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 261