आदिपुराण द्वाविंशं पर्व सारांश
Summary of Ādi purāṇa Parv 22 by Acharya Jinasena
पर्व 22 में जिनेंद्र का केवलज्ञान, समवसरण की शोभा, और गौतम का उपदेश का वर्णन हैं।
संक्षिप्त सारांश (श्लोक 1 से 316)
जिनेंद्र भगवान ने घातिया कर्मों पर विजय प्राप्त की। संसार में शांति छा गई। केवलज्ञान से तीनों लोकों में क्षोभ हुआ। देवों के घंटे, सिंहनाद, और नगाड़े गूंजे। इंद्र आनंद से नतमस्तक हुआ और पूजा के लिए निकला। बलाहकदेव ने रत्नमय विमान बनाया। नागदत्त ने विशाल ऐरावत हाथी बनाया। इंद्र अप्सराओं और देवों के साथ प्रस्थान किया। देवों के दस भेद बताए गए। ऐरावत की शोभा पर्वत-सी थी। समवसरण बारह योजन का और इंद्रनीलमय था। रत्नों का धूलीसाल इंद्रधनुष-सा था। चार मानस्तंभ आकाश को स्पर्श करते थे। बावड़ियाँ कमलों से सुशोभित थीं। परिखा आकाशगंगा-सी थी। लतावन फूलों और भ्रमरों से युक्त था। सुवर्णमय कोट निषध-सा था। गोपुरद्वार चाँदी के और ऊँचे थे। नाट्यशालाओं में देवांगनाएँ नृत्य करती थीं। चार वन अशोक आदि के थे। चैत्यवृक्ष शोकरहित करते थे। वृक्ष राजाओं-से फलयुक्त थे। वनवेदिका भव्य बुद्धि-सी थी। ध्वजाएँ दस चिह्नों से फहराती थीं। दूसरा चाँदी का कोट था। कल्पवृक्ष वन अभिलषित फल देता था। मकान चंद्रकांत दीवारों से बने थे। नौ-नौ स्तूप मेरु-से थे। तीसरा स्फटिक कोट आकाश-सा था। श्रीमंडप तीनों लोकों को स्थान देता था। पहली वैडूर्य पीठिका थी। दूसरा सुवर्ण और तीसरा रत्नमय पीठ था। समवसरण का विस्तार एक-एक योजन था। गौतम ने इसका वर्णन किया। श्रेणिक और सभा प्रसन्न हुई। इंद्र समवसरण देखकर हर्षित हुआ। यह सदा जयवंत रही।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 22
श्लोक 1 से 11 जिनेंद्र का केवलज्ञान और संसार का आनंद
जिनेंद्र भगवान ने घातिया कर्मों पर विजय प्राप्त की। संसार में शांति छा गई। केवलज्ञान से तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न हुआ। देवों के घंटे, सिंहनाद, और नगाड़े गूंजे। भवनवासी देवों को दर्शन का आह्वान हुआ। इंद्रों के आसन कंपायमान हुए। देवों के हाथी नृत्य करने लगे। कल्पवृक्ष फूल बरसाते सुशोभित हुए। दिशाएँ प्रसन्न हुईं। केवलज्ञानरूपी चंद्रमा ने संसार को आनंदित किया। अवधिज्ञानी इंद्र ने इसे जाना।
श्लोक 12 से 21 इंद्र का प्रस्थान
इंद्र आनंद से नतमस्तक होकर भगवान को नमस्कार करता उठा। उसने इंद्राणी को केवलज्ञान का समाचार बताया। नगाड़ों की सूचना पर वह देवों के साथ पूजा के लिए निकला। बलाहकदेव ने रत्नमय विमान बनाया। नागदत्त ने ऐरावत हाथी बनाया। सौधर्मेंद्र उस पर सवार हुआ। किल्विषिक और अन्य देव अपनी सवारियों पर पीछे चले। अप्सराएँ नृत्य करती गईं।
श्लोक 22 से 31 देवों के भेद
इंद्र ऐश्वर्यशाली होते हैं। सामानिक इंद्र के समान गुणी होते हैं। त्रायस्त्रिंश सभा में तैंतीस होते हैं। पारिषद मित्र के समान होते हैं। आत्मरक्ष अंगरक्षक होते हैं। लोकपाल स्वर्ग की रक्षा करते हैं। अनीक सात प्रकार की सेना होते हैं। प्रकीर्णक नगरवासी और आभियोग्य नौकर होते हैं। किल्विषिक पापकर्मी होते हैं। व्यंतर और ज्योतिषी कुछ भेदों से रहित होते हैं।
श्लोक 32 से 41 ऐरावत हाथी का वर्णन
ऐरावत का शरीर विशाल और बलवान था। उसके अनेक मुख, दाँत, और सूँडें थीं। वह शक्तिशाली और शूरवीर था। उसकी सूँड लंबी और चिकनी थी। उसका वक्ष चौड़ा और कान मनोहर थे। नख अर्धचंद्राकार थे। वह पर्वत के समान ऊँचा था। उसका शब्द गंभीर और सुगंधित था। वह सात प्रतिष्ठाओं से युक्त था। भ्रमर उसकी सेवा करते थे।
श्लोक 42 से 51 ऐरावत की शोभा
ऐरावत का तालू लाल था। उसके कानों से मृदंग-सा शब्द होता था। वह मदजल और सूँड से पर्वत-सा लगता था। दाँत चंद्रमा जैसे थे। वह सरोवर और कल्पवृक्ष की शोभा धारण करता था। सोने की साँकल और माला से सुशोभित था। वह घंटाओं से पूजा की घोषणा करता था। उसका शरीर जंबूद्वीप-सा और सफेदी कैलाश-सी थी।
श्लोक 52 से 61 इंद्र और अप्सराओं का वैभव
ऐरावत पर इंद्र सुशोभित था। इसके बत्तीस मुखों पर सरोवर और अप्सराएँ नृत्य करती थीं। नृत्य हास्य और शृंगार से भरा था। किन्नरियाँ विजयगीत गाती थीं। बत्तीस इंद्रों की सेनाएँ फैलीं। चमर हंसों-से लगते थे। आकाश आभूषणों से चित्रित था।
श्लोक 62 से 71 आकाश की शोभा
आकाश मणियों की कांति से व्याप्त था। वह संध्या, समुद्र, और मोतियों से सुशोभित था। देवांगनाएँ कल्पलताओं-सी लगती थीं। उनके मुख सरोवर-से थे। भ्रमर कामदेव की डोरी-से थे। देवों का आगमन समुद्र-सा था। वह ज्योतिषी सृष्टि-सा प्रतीत होता था।
श्लोक 72 से 81 देवों का आगमन और समवसरण
आकाश चित्रपट और वर्षा की शोभा धारण करता था। स्वर्ग शून्य हो गया। देवों से जगत दूसरा स्वर्ग-सा लगा। देवों ने समवसरण देखा। यह बारह योजन का और इंद्रनीलमय था। यह दर्पण-सा सुशोभित था। इंद्र ने इसकी रचना की। इसकी शोभा भव्य जीवों को प्रसन्न करती है।
श्लोक 82 से 91 धूलीसाल का वर्णन
समवसरण के बाहर रत्नों का धूलीसाल था। यह इंद्रधनुष-सा लगता था। यह काला, पीला, और लाल था। हरित मणियों से कमलिनी-सा था। चंद्रकांत और अन्य मणियों से चित्रित था। यह काम-क्रोध को चूर्ण करने वाला था। सुवर्ण धूलि से अग्नि-सा था। चार तोरणद्वार इससे सुशोभित थे।
श्लोक 92 से 102 मानस्तंभ की शोभा
धूलीसाल के भीतर चार मानस्तंभ थे। ये गोपुरद्वारों से घिरी पीठिका पर थे। अभिषेक जल से पवित्र थे। ये आकाश को स्पर्श करते थे। घंटाओं और ध्वजाओं से युक्त थे। इनके मूल में जिन प्रतिमाएँ थीं। मिथ्यादृष्टि का मान नष्ट करते थे। इंद्रध्वज कहलाते थे।
श्लोक 103 से 111 बावड़ियों की शोभा
मानस्तंभों के पास कमलयुक्त बावड़ियाँ थीं। ये भव्य जीवों की शुद्धता-सी लगती थीं। नीले-सफेद कमलों से ढकी थीं। चार-चार बावड़ियाँ दिशाओं में थीं। मणियों की सीढ़ियाँ और स्फटिक किनारे वाली थीं। ये भगवान के गुण गाती और नृत्य करती प्रतीत होती थीं। आगे परिखा कमलों से घिरी थी।
श्लोक 112 से 121 परिखा और लतावन
परिखा स्वच्छ जल से भरी थी। यह आकाशगंगा-सी सेवा करती लगती थी। इसमें तारों का प्रतिबिंब था। पक्षियों की माला करधनी-सी लगती थी। लहरें नृत्य करती थीं। मछलियाँ कटाक्षों का अभ्यास करती प्रतीत होती थीं। लतावन फूलों और लताओं से सुशोभित था। लताएँ हास्य और नील वस्त्र धारण करती थीं।
श्लोक 122 से 131 लतावन का वैभव
आकाश केसर से सुगंधित था। भ्रमर फूलों पर गूंजते थे। वायु लताओं को हिलाता था। क्रीड़ा पर्वत और लतागृह संतोष देते थे। चंद्रकांत शिलाएँ विश्राम के लिए थीं। सुवर्णमय कोट निषध पर्वत-सा था। यह इंद्रधनुषों से चित्रित था। मोती और मूँगे इसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 132 से 141 कोट की शोभा
कोट विभिन्न रंगों से वर्षा-सा लगता था। इसमें जानवरों और लताओं के आकार थे। यह चमकता और सिंहनाद करता था। चार चाँदी के गोपुरद्वार आकाश को स्पर्श करते थे। ये निर्मल और लाल किरणों से युक्त थे।
श्लोक 142 से 151 गोपुरद्वार और नाट्यशालाएँ
गोपुरद्वारों पर देव गीत गाते थे। इनमें मंगलद्रव्य और तोरण थे। निधियाँ भगवान के प्रभाव को दर्शाती थीं। दो-दो नाट्यशालाएँ थीं। ये तीन खंडों वाली और मोक्ष मार्ग बताती थीं। सुवर्ण खंभों और स्फटिक दीवारों से बनी थीं। देवांगनाएँ नृत्य करती थीं।
श्लोक 152 से 161 नाट्यशालाओं का संगीत
नाट्यशालाओं में वीणा और मृदंग बजते थे। ये सफेद बादलों-सी थीं। किन्नर संगीत से चित्त आकर्षित होता था। धूपघटों से सुगंध फैलती थी। धुआँ मेघों-सा लगता था। भ्रमर सुगंध सूँघते थे। मृदंग और पुष्पवर्षा से वर्षाकाल प्रतीत होता था।
श्लोक 162 से 171 वनों का वर्णन
चार वन वीथियाँ नंदन-सी थीं। अशोक, सप्तपर्ण, चंपक, और आम के वृक्ष फूलों से हँसते थे। ये अर्घ लेकर खड़े थे। शाखाएँ नृत्य करती थीं। वृक्ष राजाओं-से सुखद थे। भ्रमर गुणगान करते थे। फूलों की भेंट होती थी। कोयलें इंद्रों को बुलाती थीं।
श्लोक 172 से 181 वनों की रमणीयता
वन प्रकाश से दिन-रात रहित थे। सूर्य किरणें संकोच करती थीं। बावड़ियाँ पीली थीं। तालाब, पर्वत, और महल थे। वन स्त्रियों-से मनोहर और सुखद थे। अशोक वन लाल फूलों से प्रेम वमन करता था। सप्तपर्ण सात स्थानों को दिखाता था।
श्लोक 182 से 191 चैत्यवृक्षों की महिमा
चंपक वन दीपांग-सा था। आम्र वन स्तुति करता था। अशोक वृक्ष पीठिका पर था। तीन कोटों से घिरा था। यह शोकरहित करता था। नीले पत्ते और लाल फूलों से युक्त था। भ्रमर कामदेव की तर्जना करते थे। यह प्रभावशाली था।
श्लोक 192 से 201 चैत्यवृक्ष का वैभव
चैत्यवृक्ष घंटों से घोषणा करता था। ध्वजाएँ पाप पोंछती थीं। तीन छत्र ऐश्वर्य दिखाते थे। चार प्रतिमाएँ थीं। देव पूजा करते थे। ये निर्मल थीं। अन्य वनों में भी चैत्यवृक्ष थे। ये इंद्र पूजित और शोभायमान थे।
श्लोक 202 से 211 वृक्ष और वनवेदिका
वृक्ष राजाओं-से फल, तेज, और पत्तों से युक्त थे। ये प्रेम और प्रसन्नता प्रकट करते थे। भगवान का केवलज्ञान अनुपम था। वनों के अंत में सुवर्णमयी वनवेदिका थी। यह भव्य बुद्धि-सी ऊँची और सुरक्षित थी। गोपुरद्वारों में घंटे और मालाएँ थीं। ध्वजाएँ महावीथी को अलंकृत करती थीं।
श्लोक 212 से 221 ध्वजाओं का वर्णन
ध्वजाओं के खंभे राजाओं-से ऊँचे थे। इनकी चौड़ाई 88 अंगुल और अंतर 25 धनुष था। ये तीर्थंकर की ऊँचाई से बारह गुने थे। ध्वजाओं में दस चिह्न थे। एक दिशा में 108 ध्वजाएँ थीं। ये वायु से हिलकर पूजा का आह्वान करती थीं। मालाएँ सौमनस्य दिखाती थीं।
श्लोक 222 से 231 ध्वजाओं की शोभा
वस्त्र ध्वजाएँ लहरों-सी थीं। मयूर साँप की काँचली निगलते थे। कमल आकाश में खिलते थे। भ्रमर कमलों पर भ्रमित होते थे। हंस द्रव्यलेश्या दिखाते थे। गरुड़ आकाश उल्लंघन करते थे। सिंह हाथियों को जीतना चाहते थे।
श्लोक 232 से 241 ध्वज और दूसरा कोट
बैल विजयपताका धारण करते थे। हाथी पर्वत-से थे। चक्र सूर्य से स्पर्धा करते थे। ध्वजाएँ आकाश साफ करती थीं। ये तीनों लोकों का स्वामित्व दिखाती थीं। दूसरा चाँदी का कोट था। इसके गोपुरद्वार हास्य-से थे। निधियाँ कुबेर को लज्जित करती थीं।
श्लोक 242 से 251 कल्पवृक्ष वन
दूसरे कोट में नाट्यशालाएँ और धूपघट थे। कल्पवृक्ष वन रत्नों से दैदीप्यमान था। ये राजाओं-से ऊँचे और फलयुक्त थे। ये देवकुरु-से लगते थे। फल आभूषण-से थे। देव वहाँ क्रीड़ा करते थे। सिद्धार्थ वृक्ष सूर्य-से थे।
श्लोक 252 से 261 वन और मकान
कल्पवृक्ष वनों में बावड़ियाँ और सभागृह थे। वनवेदिका चार गोपुरद्वारों से घिरी थी। आगे सुवर्ण खंभों वाले मकान थे। ये चंद्रकांत दीवारों से चित्रित थे। देव संगीत और नृत्य से आराधना करते थे।
श्लोक 262 से 271 स्तूप और तीसरा कोट
महावीथियों में नौ-नौ स्तूप थे। ये मेरु-से ऊँचे थे। सिद्ध प्रतिमाएँ चित्रित थीं। छत्र और पताकाएँ थीं। भव्य लोग पूजा करते थे। तीसरा स्फटिक कोट आकाश-सा था। यह भव्य जीव-सा विशुद्ध था।
श्लोक 272 से 281 श्रीमंडप
तीसरे कोट के गोपुरद्वार मंगलद्रव्यों से युक्त थे। व्यंतर और अन्य देव द्वारपाल थे। सोलह दीवालें सभाओं को विभाजित करती थीं। श्रीमंडप रत्नों से बना था। यह तीनों लोकों को स्थान देता था।
श्लोक 282 से 291 श्रीमंडप की शोभा
श्रीमंडप में फूल तारों-से लगते थे। मालाएँ कभी मुरझाती नहीं थीं। भ्रमर गुंजार से प्रकट होते थे। हंस शब्दों से पहचाने जाते थे। दीवालों में प्रतिबिंब चित्र-से थे। पहली वैडूर्य पीठिका थी।
श्लोक 292 से 301 पीठों का वर्णन
प्रथम पीठिका पर सोलह सीढ़ियाँ थीं। धर्मचक्र सूर्य-से थे। दूसरा सुवर्ण पीठ था। इसमें आठ ध्वजाएँ थीं। तीसरा रत्नमय पीठ सुमेरु-सा था। भ्रमर सुवर्ण-से लगते थे।
श्लोक 302 से 311 पीठ और समवसरण
तीसरा पीठ सुमेरु-सा लोक को नीचा करता था। भगवान इसमें सिद्ध-से विराजते थे। समवसरण का विस्तार एक-एक योजन था। महावीथियाँ एक कोश चौड़ी थीं। पीठों की ऊँचाई आठ, चार, और चार धनुष थी।
श्लोक 312 से 316 गौतम का उपदेश
गौतम ने समवसरण का वर्णन किया। श्रेणिक का मुख प्रफुल्लित हुआ। सभा में प्रीति बढ़ी। इंद्र प्रसन्न हुआ। समवसरण जयवंत रही।
पर्व 23
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