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श्लोक 272 से 281 श्रीमंडप
तीसरे कोट के गोपुरद्वार मंगलद्रव्यों से युक्त थे। व्यंतर और अन्य देव द्वारपाल थे। सोलह दीवालें सभाओं को विभाजित करती थीं। श्रीमंडप रत्नों से बना था। यह तीनों लोकों को स्थान देता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272
खगेन्द्रै रुप सेव्य त्वा तुङ्गत्वादचलत्वतः । रूप्याद्रिरिव ताद्रूप्यमापन्नः पर्यगाद् विभुम् ॥२७२॥
अथवा वह कोट बड़े-बड़े विद्याधरों के द्वारा सेवनीय था, ऊँचा था, और अचल था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो विजयार्ध पर्वत ही कोट का रूप धारण कर भगवान की प्रदक्षिणा दे रहा हो ।।272।।
“Or, that fortress was served by great Vidyadharas, was lofty, and immovable. Therefore, it appeared as if the Vijayardha Mountain itself had taken the form of a fortress and was circumambulating the Lord.”272
श्लोक ( Shlok ) 273
दिक्षु सालोत्तमस्यास्य गोपुराण्युदशिश्रियन् । पद्म रागमयान्युच्चैर्भव्य रागमयानि वा ॥२७३॥
उस उत्तम कोट की चारों दिशाओं में चार ऊँचे गोपुर-द्वार थे जो पद्मरागमणि के बने हुए थे, और ऐसे मालूम पड़ते थे मानो भव्य जीवों के अनुराग से ही बने हों ।।273।।
“On all four sides of that excellent fortress, there were four lofty gopura gates made of Padmaraga gems, which appeared as if they were formed out of the devotion and love of noble souls.”273
श्लोक ( Shlok ) 274
ज्ञेयाः पूर्ववदत्रापि मङ्गलद्रव्यसंपदः । द्वारोपान्ते च निधयो ज्वलद्गम्भीरमूर्तयः ॥२७४॥
जिस प्रकार पहले कोटों के गोपुर-द्वारों पर मंगलद्रव्यरूपी संपदाएँ रखी हुई थी उसी प्रकार इन गोपुर-द्वारों पर भी मंगलद्रव्यरूपी संपदाएं जानना चाहिए । और पहले की तरह ही इन गोपुर-द्वारों के समीप में भी दैदीप्यमान तथा गंभीर आकार वाली निधियां रखी हुई थीं ।।274।।
“Just as auspicious treasures were placed at the gopura gates of the previous fortresses, similar auspicious treasures should be understood to be present at these gopura gates as well. And, like before, radiant and grand in form, the treasures were placed near these gopura gates.”274
श्लोक ( Shlok ) 275
सतालमङ्गलच्छत्रचामरध्वजदर्पणाः । सुप्रतिष्ठकभृङ्गार कलशाः प्रतिगोपुरम् ॥२७५॥
प्रत्येक गोपुर-द्वार पर पंखा, छत्र, चामर, ध्वजा, दर्पण, सुप्रतिष्ठक (ठौना) मुकर और कलश ये आठ-आठ मंगल द्रव्य रखे हुए थे ।।275।।
“At each gopura gate, eight auspicious objects were placed: a fan, an umbrella, a chamara (fly whisk), a flag, a mirror, a well-positioned pedestal (thona), a gem-studded ornament, and a sacred pot (kalasha).”275
श्लोक ( Shlok ) 276
गदादिपाणयस्तेषु गोपुरेष्वभवन् सुराः । क्रमात् सालत्रये द्वाःस्था भौम भावनकल्पजाः ॥ २७६॥
तीनों कोटों के गोपुर-द्वारों पर क्रम से गदा आदि हाथ में लिये हुए व्यंतर भवनवासी और कल्पवासी देव द्वारपाल थे । भावार्थ―पहले कोट के दरवाजों पर व्यंतर देव पहरा देते थे, दूसरे कोट के दरवाजों पर भवनवासी पहरा देते थे और तीसरे कोट के दरवाजों पर कल्पवासी देव पहरा दे रहे थे । ये सभी देव अपने-अपने हाथों में गदा आदि हथियारों को लिये हुए थे ।।276।।
“At the gopura gates of all three fortresses, there stood divine gatekeepers, each holding weapons like maces in their hands.
Meaning – The entrances of the first fortress were guarded by Vyantara gods, the second fortress by Bhavanavasi gods, and the third fortress by Kalpavasi gods. All these deities held weapons like maces in their hands, ready to protect the gates.”276
श्लोक ( Shlok ) 277
ततः खस्फाटिकात् सालादापीठान्तं समायताः। भित्तयः षोडशाभूवन् महावीथ्यन्तराश्रिताः ॥ २७७॥
तदनंतर उस आकाश के समान स्वच्छ स्फटिकमणि के कोट से लेकर पीठ पर्यंत लंबी और महवीथियों (बड़े-बड़े रास्तों) के अंतराल में आश्रित सोलह दीवालें थीं । भावार्थ―चारों दिशाओं की चारों महावीथियों के अगल बगल दोनों ओर आठ दीवालें थीं और दो-दो के हिसाब से चारों विदिशाओं में भी आठ दीवालें थीं इस प्रकार सब मिलाकर सोलह दीवालें थी । ये दीवालें स्फटिक कोट से लेकर पीठ पर्यंत लंबी थीं और बारह सभाओं का विभाग कर रही थी ।।277।।
“After that, there were sixteen walls extending from the crystal-like fortress, as clear as the sky, up to the base, situated in the spaces between the grand avenues (Mahavithis).
Meaning – On all four sides, there were eight walls placed alongside the four grand avenues, with two on each side. Similarly, in the four intermediate directions, there were also eight walls, making a total of sixteen. These walls stretched from the crystal fortress to the base and served to divide the twelve grand assembly halls.”277
श्लोक ( Shlok ) 278
नमःस्फटिकनिर्माणः प्रसरनिर्मलत्विषः। साद्यपीठतटालग्ना ज्योत्स्नायन्ते स्म भित्तयः ॥२७८॥
जो आकाशस्फटिक से बनी हुई है; जिनकी निर्मल कांति चारों ओर फैल रही है और जो प्रथम पीठ के किनारे तक लगी हुई हैं ऐसी वे दीवालें चाँदनी के समान आचरण कर रही थीं ।।278।।
“Those walls, made of sky-clear crystal, radiated a pure brilliance in all directions and extended up to the edge of the first base. They appeared to be performing the role of moonlight, spreading serenity and splendor all around.”278
श्लोक ( Shlok ) 279
शुचयो दर्शिताशेषवस्तुविम्बा महोदयाः । भित्तयस्ता जगद्भर्तुरधिविद्या इवाबभुः ॥२७९॥
वे दीवालें अतिशय पवित्र थीं, समस्त वस्तुओं के प्रतिबिंब दिखला रहीं थीं और बड़े भारी ऐश्वर्य से सहित थी इसलिए ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो जगत् के भर्ता भगवान् वृषभदेव की श्रेष्ठ विद्याएं हो ।।279।।
“Those walls were exceedingly pure, reflecting the images of all objects, and were endowed with immense grandeur. Thus, they appeared so magnificent as if they were the supreme divine sciences of Lord Rishabhadeva, the protector of the universe.”279
श्लोक ( Shlok ) 280
तासामुपरि विस्तीर्णो रत्नस्तम्भैः समुद्धृतः । वियत्स्फटिकनिर्माणः सश्रीः श्रीमण्डपोऽभवत् ॥२८०॥
उन दीवालों के ऊपर रत्नमय खंभों से खड़ा हुआ और आकाशस्फटिकमणि का बना हुआ बहुत बड़ा भारी शोभायुक्त श्रीमंडप बना हुआ था ।।280।।
“Above those walls stood a grand and magnificent pavilion, supported by jewel-adorned pillars and made of sky-clear crystal, enhancing its splendor.”280
श्लोक ( Shlok ) 281
सत्यं श्रीमण्डपः सोऽयं यत्रासौ परमेश्वरः । नृसुरासुरसानिध्ये स्वीचक्रे त्रिजगच्छ्रियम् ॥२८१॥
वह श्रीमंडप वास्तव में श्रीमंडप था क्योंकि वहाँ पर परमेश्वर भगवान् वृषभदेव ने मनुष्य, देव और धरणेंद्रों के समीप तीनों लोकों की श्री (लक्ष्मी) स्वीकृत की थी ।।281।।
“That pavilion was truly a Shri Mandap, for it was there that Lord Rishabhadeva, in the presence of humans, deities, and Dharanendra, accepted the prosperity (Shri) of all three worlds.”281
श्लोक 282 से 291
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