द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
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हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 1
आदिपुराण प्रथमं पर्व सारांश
श्लोक 1: अर्हंतदेव को नमस्कार
अनंतचतुष्टय और अष्टप्रातिहार्य से युक्त जिन्होंने केवलज्ञानरूपी साम्राज्य प्राप्त किया, जो धर्मचक्र धारक, लोकत्रय के अधिपति, और संसार के भय को नष्ट करने वाले हैं, ऐसे श्री अर्हंतदेव को नमस्कार है।
श्लोक 2 से 15 जिनेंद्र की महिमा
जिनेंद्रदेव को सूर्य के समान प्रकाशक और नमस्कार योग्य बताया गया। उनकी महिमा अजेय है, वे मिथ्यादृष्टि का खंडन करते हैं। भगवान वृषभदेव ने साम्राज्य को तुच्छ मानकर मुनिदीक्षा ली। उनके साथ हजारों राजाओं ने दीक्षा ली। कच्छ आदि राजाओं ने वल्कल पहने, तप सहे, और कर्मनिर्जरा की। उनकी जटाएँ ध्यानाग्नि से शोभायमान थीं। सुर-असुर उन्हें चलते मेरु पर्वत मानते थे। श्रेयांस के दान से रत्नवर्षा हुई। केवलज्ञान से वे सभा में सूर्य समान हुए और समीचीन धर्म का उपदेश दिया।
श्लोक 16 से 25 तीर्थंकर और पुराण का संकल्प
अजितनाथ से महावीर तक 23 तीर्थंकरों और गणधरों को नमस्कार। श्रुतस्कंधरूपी वृक्ष की उपासना की प्रेरणा। त्रेसठ शलाकापुरुषों (तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण आदि) के पुराण का संग्रह करने का संकल्प। यह ग्रंथ प्राचीन, महान्, और कल्याणकारी है, इसलिए महापुराण कहलाता है। यह आर्ष, सूक्त, और इतिहास रूप है।
श्लोक 26 से 35 ग्रंथकार का विनय
गणधरदेव द्वारा रचित महापुराण को अल्पज्ञानी कवि भक्ति से कहने का प्रयत्न करता है। यह गंभीर समुद्र है, जिसमें वह तैरने की हास्यास्पद कोशिश करता है। प्राचीन कवियों ने मार्ग सुगम बनाया, जैसे सिंह के बाद हिरण, हाथी के बाद बच्चे चलते हैं। वह उनकी सहायता से इस समुद्र को पार करना चाहता है।
श्लोक 36 to 45 कवियों की प्रशंसा
यदि प्रमाद से भूल हो तो विद्वान् क्षमा करें। सज्जन गुण ग्रहण करें, जैसे समुद्र से रत्न लेते हैं। सिद्धसेन आदि कवियों की समानता कांच और मणि जैसी। समंतभद्र, श्रीदत्त आदि महाकवियों को नमस्कार, जो मिथ्यामत को नष्ट करते हैं और यशस्वी हैं।
श्लोक 46 से 55 महाकवियों का सम्मान
यशोभद्र, प्रभाचंद्र, शिवकोटि, जटासिंहनंदि, काणभिक्षु, देवाचार्य आदि कवियों की स्तुति। ये विद्वानों में श्रेष्ठ, तपोलक्ष्मी से युक्त, और काव्य के मर्मज्ञ हैं। उनके वचन शास्त्रों को प्रकाशित करते हैं। भट्टाकलंक, वादिसिंह आदि के गुण मणिमाला समान हैं।
श्लोक 56 से 65 वीरसेन और कविता की महत्ता
वीरसेन, जयसेन आदि गुरुओं की प्रशंसा, जो धवलाटीका रचते हैं और शास्त्रज्ञ हैं। कविता धर्म से संबंधित होनी चाहिए, अन्यथा पाप का कारण बनती है। मिथ्यादृष्टि काव्य सज्जनों को संतुष्ट नहीं करता। कुछ कवि हास्यास्पद प्रयास करते हैं।
श्लोक 66 से 75 कवियों की कमियाँ
अयोग्य कवि दूसरों की नकल करते हैं या अधूरी रचना करते हैं। कुछ शब्दों से सुंदर, पर अर्थहीन काव्य रचते हैं। शास्त्रज्ञान बिना काव्य करना साहस है। बुद्धिमानों को धर्मोपदेशी काव्य करना चाहिए। उत्तम कवि दोषों से नहीं डरता, जैसे सूर्य उलूक से।
श्लोक 76 से 85 सज्जन-दुर्जन का स्वभाव
कवि को अपना प्रयोजन सिद्ध करना चाहिए, सबको संतुष्ट करना असंभव। लोग शब्द, अर्थ, समास आदि में भिन्न रुचि रखते हैं। सज्जन गुण, दुर्जन दोष ग्रहण करते हैं। दुर्जन निर्दोष कथा को दूषित करते हैं, सज्जन दोषयुक्त को निर्दोष बनाते हैं।
श्लोक 86 से 95 काव्य का स्वरूप
दुर्जन धर्मकथा से दुखी, सज्जन प्रसन्न होते हैं। मिथ्यादृष्टि को ओषधि अरुचिकर लगती है। दुर्जन स्वभाव से टेढ़े, सज्जन जगत को सज्जन नहीं बना पाते। सज्जनता-दुर्जनता का स्वभाव बताया। कवि सज्जनों के आश्रय से काव्य समुद्र पार करना चाहता है।
श्लोक 96 से 105 महाकाव्य की परिभाषा
काव्य अलंकार, रस, और मौलिक होना चाहिए। रीति, लालित्य, रसहीन काव्य ग्रामीण भाषा है। महाकवि प्राचीन इतिहास और धर्म रचते हैं। शब्द, रस, छंद सुलभ होने से कविता में दरिद्रता नहीं। कवि को महाकवियों की छाया लेनी चाहिए। प्रतिभा और गुणों से काव्य यश देता है।
श्लोक 106 से 116 काव्य और धर्मकथा की महिमा
धर्मकथा यश और पुण्य का मूलधन है। यह कथा धर्मशास्त्र से संबंधित है। इसमें ऋषभनाथ जैसे महापुरुषों का चरित्र है। यह कल्पलता-सी फलदायी, सरोवर-सी गंभीर, आकाशगंगा-सी पवित्र, और दर्पण-सी प्रतिबिंबित है। यह मिथ्यामत नष्ट करती और वैराग्य बढ़ाती है। इसे सज्जन सुनें।
श्लोक 117 से 126 कथा और वक्ता के लक्षण
कथा में धर्म, अर्थ, काम का वर्णन होता है। धर्मयुक्त सत्कथा है। अधर्मकथा पाप का कारण है। सद्धर्मकथा स्वर्ग-मोक्ष देती है। इसके सात अंग हैं। द्रव्य, क्षेत्र, तीर्थ, काल, भाव, फल, और प्रकृत इनका विस्तार होगा।
श्लोक 127 से 136 वक्ता की योग्यताएँ
वक्ता सदाचारी, स्थिरबुद्धि, और इंद्रिय-नियंत्रक हो। उसकी वाणी स्पष्ट, निर्मल, और प्रिय हो। वह उदाहरणों और भाषाओं में निपुण हो। वक्ता अंग न हिलाए, न हँसे, और हितकारी वचन बोले। वह चार प्रकार की कथाएँ कहे।
श्लोक 137 से 146 श्रोता के लक्षण
श्रोता धर्म सुनने में तत्पर हो। चौदह प्रकार के श्रोता हैं। गाय और हंस जैसे उत्तम, मिट्टी और तोता जैसे मध्यम, अन्य अधम हैं। श्रोता गुण-दोष बताए। उसे सांसारिक फल न चाहें। शुश्रूषा आदि आठ गुण श्रोताओं में हों।
श्लोक 147 से 156 कथावतार का प्रारंभ
कथा से पुण्य, स्वर्ग, और मोक्ष मिलता है। तृतीय काल में ऋषभदेव कैलास पर आए। देवों ने उनकी पूजा की। केवलज्ञान प्राप्त हुआ। इंद्र ने समवसरण बनाया। भरत ने भगवान को नमस्कार कर स्तुति की। सभा संतुष्ट हुई।
श्लोक 157 से 166 भरत की प्रशंसा
सभा भगवान से प्रबोध पाकर शोभित हुई। उनकी वाणी अज्ञान नष्ट करती है। भरत उनके दर्शन और वचन से कृतार्थ हुए। धर्मोपदेश मेघवर्षा-सा है। भगवान सब तत्त्व बताते हैं। भरत और प्रश्न पूछना चाहते हैं।
श्लोक 167 से 171 भरत का प्रश्न
भक्ति से भरत भगवान से पूछते हैं। वे तीर्थंकर, चक्रवर्ती, नारायण, बलभद्र, और प्रतिनारायणों का चरित्र सुनना चाहते हैं। उनके नाम, गोत्र, लक्षण, और संख्या जानना चाहते हैं।
श्लोक 172 से 180 प्रश्न का विस्तार
भरत युगों, मनुओं, लोक, काल, और वंशों का स्वरूप जानना चाहते हैं। वे संशय नष्ट करने की प्रार्थना करते हैं। सभा ने प्रश्न की प्रशंसा की। देवों ने भरत पर पुष्पवृष्टि की।
श्लोक 181 से 190 भगवान का उपदेश
इंद्र ने भरत को धन्य कहा। भगवान प्रश्न समझकर वाणी से पुराण कहने लगे। उनकी ध्वनि आश्चर्यकारी थी। यह एकरूप होकर भी अनेकरूप हुई। उनकी वाणी सभा को संतुष्ट करती है। भरत के प्रश्नों का क्रमशः उत्तर दिया।
श्लोक 191 से 200 पुराण की परंपरा
भगवान ने शलाकापुरुषों का चरित्र कहा। वृषभसेन ने इसे पुराण बनाया। यह अजितनाथ से महावीर तक प्रकाशित हुआ। चतुर्थ काल में महावीर विपुलाचल पर आए। श्रेणिक ने पूछा। गौतम ने वर्णन किया। गौतम, सुधर्म, जंबू ने परंपरा चलाई।
श्लोक 201 से 210 ग्रंथ की प्रामाणिकता
महावीर मूलकर्ता और गौतम उत्तरकर्ता हैं। यह पुराण प्रमाणभूत और कल्याणकारी है। इसका अध्ययन से शांति, आरोग्य, कर्मनिर्जरा होती है। यह पुण्य, यश, और मोक्ष देता है। ग्रंथकर्ता वृषभसेन के मार्ग पर चलता है। यह पुराण सूर्य-सा मिथ्यामत नष्ट कर मोक्षमार्ग प्रकाशित करता है।
आदिपुराण पर्व 2 – कथामुखवर्णन
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 2
आदिपुराण द्वितीयं पर्व सारांश
श्लोक 1 से 10 गौतम से प्रश्न और उनकी महिमा
ग्रंथकर्ता वृषभदेव को नमस्कार कर पुराण का विस्तार करता है। श्रेणिक ने गौतम से धर्म का स्वरूप पूछा। वे महावीर से सुना पुराण ग्रंथरूप में सुनना चाहते हैं। गौतम अकारण बंधु और वैद्य हैं। उनकी किरणें अभिषेक-सी हैं। वे सूर्य-से जगत को प्रबोधित करते हैं। उनकी वचन-किरणें अज्ञान नष्ट करती हैं। उनकी बुद्धि अग्नि-शिखाओं-सी है। समवसरण तपोवन-सा पवित्र है।
श्लोक 11 से 20 समवसरण की शोभा
समवसरण में पशु धन्य और पुष्ट हैं। हरिण अमृत-सा जल पीते हैं। हथिनियाँ सिंह के बच्चों को दूध पिलाती हैं। हरिण मुनियों-से चरणों का आश्रय लेते हैं। वृक्ष फल-पुष्पों से शोभित हैं। लताएँ कर-बाधा से मुक्त हैं। तपोवन दयावन-सा आनंदित करता है। दिगंबर तपस्वी मोक्षमार्ग की उपासना करते हैं। गौतम का माहात्म्य प्रकट है। वे तीनों लोकों को जानते हैं।
श्लोक 21 से 30 श्रेणिक की प्रार्थना
श्रेणिक ने अज्ञानवश पाप किए। उन्होंने हिंसा, झूठ आदि से घोर पाप संचित किए। मुनि-वध में आनंद लिया। वे पुराण सुनकर पाप-निराकरण चाहते हैं। दांतों की कांति से स्तुति कर चुप हुए। मुनियों ने श्रेणिक की प्रशंसा की। वे प्रश्न में श्रेष्ठ हैं। उन्होंने चित्त हर्षित किया। वे वही पुराण पूछते हैं जो मुनि चाहते थे। श्रेणिक का प्रश्न पुराण पूछने वालों से मेल खाता। धर्म स्वरूप जानने से संसार स्वरूप की इच्छा प्रकट की।
श्लोक 31 से 40 धर्म का माहात्म्य
श्रेणिक ने धर्म जानकर संसार जानना चाहा। धर्म वृक्ष है, अर्थ फल और काम रस है। धर्म से अर्थ, काम, स्वर्ग मिलते हैं। धर्म कामधेनु और कल्पवृक्ष है। यह संकटों से बचाता है। विचार, ज्ञान से इसका माहात्म्य जाना जाता है। यह नरक से रक्षा कर मोक्ष देता है। पुराण ही धर्म है। इसमें क्षेत्र, काल, तीर्थ, सत्पुरुष, और चेष्टाएँ हैं। श्रेणिक ने प्रश्न में पुराण का अर्थ समाविष्ट किया।
श्लोक 41 से 50 प्रश्न की महत्ता
गौतम महायोगी और संघाधिपति हैं। वे उत्कृष्ट वाणी जानते हैं। नाम “गौतम” सार्थक (उत्कृष्ट वाणी जानने वाला)। इंद्रभूति (विभूति प्राप्त), और बुद्ध कहलाते हैं। उनकी ज्ञान-ज्योति अनोखी है। उनकी दीपिका संसार प्रकाशित करती है। उनके वचन मिथ्यात्व नष्ट करते हैं। उनकी प्रज्ञा नदी-सी है, द्वादशांग जहाज। उन्होंने श्रुतज्ञान अवतरित किया। वे दो ज्ञानों से श्रुतकेवली हैं।
श्लोक 51 से 60 गौतम की स्तुति
श्रेणिक का प्रश्न सरल पर गंभीर और तत्त्वपूर्ण है। भरत और सगर ने भी यही पूछा था। श्रेणिक ने परंपरा सुशोभित की। वे प्रश्नकर्ता, महावीर उत्तरदाता, और मुनि श्रोता हैं। गौतम पुराण कहें। मुनि गौतम की स्तुति करने लगे। उनकी स्तुति आश्चर्यकारी है। वे चौदह पूर्वों के पारगामी हैं। उनकी कीर्ति चंद्र-सी है।
श्लोक 61 से 70 गौतम के गुण
गौतम से मोक्ष द्वार की प्रार्थना। वे ब्रह्मसुत, सिद्ध पद अधीन। मुनि सम्यग्दर्शन आदि की उपासना करते। गौतम को बार-बार नमस्कार (महायोगी, बुद्धिमान, रक्षक, ऋद्धि धारक)। अवधिज्ञान, कोष्ठबुद्धि, बीजबुद्धि, पदानुसारी, संभिन्नश्रोतृ ऋद्धियाँ धारक। ऋजुमति, विपुलमति, प्रत्येक बुद्ध। दश पूर्व धारक, तपस्वी, ब्रह्मचारी, तेजस्वी।
श्लोक 71 से 80 गौतम की ऋद्धियाँ
गौतम आठ विक्रिया ऋद्धियों से युक्त हैं। वे आमर्ष, क्ष्वेल आदि ऋद्धियों से सुशोभित हैं। वे रस और बल ऋद्धियों से संपन्न हैं। वे चारण और अक्षीण ऋद्धियों के धारक हैं। वे परम हितकारी और गुरु हैं। उनकी सेवा से ज्ञान मिलता है। वे धर्मशास्त्र वर्णन करते हैं। उनकी स्तुति से गुप्तियाँ भंग होती हैं। वे शलाकापुरुषों का पुराण सुनाएँ।
श्लोक 81 से 95 गौतम का संबोधन
मुनियों की स्तुति से कोलाहल हुआ। गौतम प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रार्थना पर ध्यान दिया। श्रोता चुपचाप बैठे। गौतम गंभीर वाणी से बोले। उनकी किरणें सरस्वती-सी थीं। वे भक्ति से रत्न दिखाते थे। तप माहात्म्य से शोभित। बिना परिश्रम सरस्वती प्रकट।वे वैराग्य और विनय प्रकट करते थे।
श्लोक 96 से 105 पुराण का प्रारंभ और अनुयोग
गौतम स्वामी ने भव्यजनों से पुराण सुनने को कहा। उन्होंने वृषभदेव द्वारा भरत को कहा पुराण श्रेणिक के लिए कहा। श्रुतस्कंध के चार अनुयोग हैं। प्रथमानुयोग में सत्पुरुषों का चरित्र है। करणानुयोग में लोकों का वर्णन है। चरणानुयोग में चारित्र-शुद्धि है। द्रव्यानुयोग में द्रव्यों का निर्णय है। उपक्रम के पाँच भेद हैं। प्रथमानुयोग पहला और अंतिम दोनों हो सकता है।
श्लोक 106 से 115 ग्रंथ का प्रमाण
नाम उपक्रम प्रथमानुयोग का पहला भाग है। ग्रंथ-विस्तार के भय से प्रमाण बताया गया। प्रथमानुयोग शब्दों से परिमेय है। इसमें 2554423107500 अनुष्टुप् श्लोक हैं। पदों की संख्या 5000 और अक्षर 16348307888 हैं। यह द्रव्यश्रुत का प्रमाण है। द्वादशांग इसका अभिधेय है।
श्लोक 116 से 125 पुराण का अभिधेय
पुराण से सुभाषित रत्न उत्पन्न होते हैं। इसमें तीर्थंकरों और मुनियों की संपदा का वर्णन है। जीव, बंध, मोक्ष, द्रव्य, और पदार्थ इसमें हैं। तीनों लोक और काल का संग्रह है। सत्यदर्शन, मोक्ष, और पुरुषार्थ इसमें हैं। यह समस्त धर्म-सृष्टि को वर्णित करता है। यह कसौटी-सा पदार्थों की परीक्षा करता है। इसमें 63 अधिकार हैं।
श्लोक 126 से 135 अधिकारों का विस्तार
पुराण के 63 अधिकार हैं। अवांतर अधिकार अमर्यादित हैं। कुछ आचार्य 24 तीर्थंकरों के पुराण मानते हैं। ये वृषभनाथ से महावीर तक हैं। यह समूह महापुराण है। अवसर्पिणी युग के अंत में यह अल्प होगा।
श्लोक 136 से 145 पुराण का प्रकाश
दुःषम काल में बुद्धि और पुराण घटेंगे। सुधर्माचार्य और जंबूस्वामी इसे पूर्ण प्रकाशित करेंगे। तीन श्रुतकेवली 62 वर्ष तक रहेंगे। इसके बाद 100 वर्ष में पाँच आचार्य ग्यारह अंग और चौदह पूर्व धारण करेंगे। फिर 183 वर्ष तक ग्यारह आचार्य दश पूर्व धारक होंगे।
श्लोक 146 से 155 पुराण का ह्रास
220 वर्ष तक पाँच मुनि ग्यारह अंग धारक होंगे। पुराण तीन चतुर्थांश रहेगा। फिर चार आचार्य एक चौथाई धारण करेंगे। 683 वर्ष बाद पुराण घटेगा। जिनसेन जैसे कवि इसे स्मरण करेंगे। वर्धमान का पुराण ही प्रामाणिक है। पंचपरमेष्ठियों का नाम पवित्र करता है।
श्लोक 156 से 162 कथा की शुरुआत
भव्यजनों को पुराण में अवगाहन करना चाहिए। वृषभनाथ का पुराण पहले कहा जाएगा। इसमें काल, कुलकर, वंश, और निर्वाण हैं। यह उपोद्धात है। सभा श्रेणिक के साथ सुनने को सावधान हुई। यह पुराण पाप धोकर शुद्धि देता है।
आदिपुराण पर्व 3 – पीठिकावर्णन
यह पर्व महापुराण की पीठिका के रूप में कालद्रव्य, उत्सर्पिणी-अवसर्पिणी काल, और चौदह कुलकरों के कार्यों का वर्णन करता है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 3
श्लोक 1 से 10: कालद्रव्य का स्वरूप
ग्रंथकर्ता वृषभनाथ को नमस्कार कर पीठिका का व्याख्यान करता है। कालद्रव्य अनादिनिधन और सूक्ष्म है। यह लोकाकाश में भरा है। यह पदार्थों के परिणमन में सहकारी है। जीव, पुद्गल आदि पाँच अस्तिकाय हैं। काल एकप्रदेशी होने से अस्तिकाय नहीं है। यह व्यवहारकाल का मूल है। इसमें गुण और पर्याय हैं। यह अनस्तिकाय सिद्ध होता है। व्यवहारकाल मुख्य काल से उत्पन्न है।
श्लोक 11 से 20 व्यवहारकाल और उसके भेद
व्यवहारकाल समय, आवलि आदि भेदों से जाना जाता है। यह सूर्यादि के चक्र से प्रकट होता है। भव और आयु का समय अगत होता है। इसके दो भेद हैं—उत्सर्पिणी और अवसर्पिणी। प्रत्येक का प्रमाण दस कोड़ाकोड़ी सागर है। दोनों के छह-छह भेद हैं। अवसर्पिणी के भेद सुषमासुषमा से दुःषमदुःषमा हैं। उत्सर्पिणी इसके विपरीत है। ये नाम सार्थक हैं। दोनों कालचक्र से घूमते हैं।
श्लोक 21 से 30 सुषमासुषमा काल
भरतक्षेत्र में सुषमासुषमा काल चार कोड़ाकोड़ी सागर का था। यहाँ भोगभूमि जैसी स्थिति थी। मनुष्यों की आयु तीन पल्य और ऊँचाई छह हजार धनुष थी। उनके शरीर सुवर्ण-से थे। वे आभूषण धारण करते थे। पुण्य से उन्हें सौंदर्य मिलता था। वे बलवान और तेजस्वी थे। वे तीन दिन बाद भोजन करते थे।
श्लोक 31 से 40 सुषमासुषमा की व्यवस्था
उन्हें रोग या परिश्रम नहीं था। स्त्रियाँ भी समान आयु और ऊँचाई की थीं। दोनों भोगों में अनुरक्त थे। उनका रूप और वचन सुंदर थे। कल्पवृक्ष उन्हें भोग देते थे। ये वृक्ष प्रकाशमान थे। ये दस प्रकार के थे। ये पुण्यात्माओं को भोग देते थे।
श्लोक 41 से 51 सुषमा काल
आयु अंत में पुरुष जम्हाई और स्त्री छींक से स्वर्ग जाते थे। वे भद्र थे। सुषमासुषमा का वर्णन हुआ। इसके बाद सुषमा काल तीन कोड़ाकोड़ी सागर का था। यहाँ मध्यम भोगभूमि थी। मनुष्यों की आयु दो पल्य और ऊँचाई चार हजार धनुष थी। वे दो दिन बाद भोजन करते थे। फिर सुषमादुःषमा काल शुरू हुआ।
श्लोक 52 से 62 सुषमादुःषमा काल
सुषमादुःषमा दो कोड़ाकोड़ी सागर का था। मनुष्यों की आयु एक पल्य और ऊँचाई एक कोश थी। वे एक दिन बाद भोजन करते थे। पल्य का आठवाँ भाग शेष रहने पर कल्पवृक्ष कमजोर हुए। आषाढ़ पूर्णिमा को सूर्य और चंद्रमा दिखे। वे आकाश में सुवर्ण-से शोभते थे। वे साधुओं और राजाओं का अनुकरण करते थे।
श्लोक 63 से 71 प्रतिश्रुति कुलकर
प्रतिश्रुति पहले कुलकर थे। उनकी आयु पल्य का दसवाँ भाग और ऊँचाई 1800 धनुष थी। वे आभूषणों से शोभित थे। वे अवधिज्ञान धारक थे। उन्होंने प्रजा को अमृत-से वचन दिए। सूर्य-चंद्रमा को देख भयभीत प्रजा को उन्होंने आश्वस्त किया। वे ग्रहों का स्वरूप समझाते थे।
श्लोक 72 से 81 सन्मति कुलकर
प्रतिश्रुति ने व्यवस्थाएँ बताईं। प्रजा ने उनकी स्तुति की। असंख्यात वर्ष बाद सन्मति कुलकर हुए। वे आभूषणों से शोभित थे। उनकी आयु संख्यात वर्ष और ऊँचाई 1300 धनुष थी। ज्योतिरंग वृक्ष मंद हुए। रात्रि में तारे दिखे।
श्लोक 82 से 91 सन्मति का उपदेश
तारों को देख प्रजा भयभीत हुई। सन्मति ने उन्हें भयमुक्त किया। उन्होंने तारों और ज्योतिश्चक्र का स्वरूप बताया। वे सूर्यग्रहण आदि समझाते थे। प्रजा ने उनकी प्रशंसा की। असंख्यात वर्ष बाद क्षेमंकर मनु हुए। वे मेरु-से शोभित थे।
श्लोक 92 से 101 क्षेमंकर मनु
क्षेमंकर की आयु अटट और ऊँचाई 800 धनुष थी। पशु विकारग्रस्त हुए। प्रजा ने भयभीत होकर उनसे पूछा। क्षेमंकर ने पशुओं के बदलाव को कालदोष बताया। उन्होंने दुष्ट पशुओं को छोड़ने की सलाह दी। प्रजा ने गाय-भैंस के साथ रहना शुरू किया।
श्लोक 102 से 111 क्षेमंधर और सीमंकर
क्षेमंकर की आयु समाप्त होने पर असंख्यात वर्षों बाद क्षेमंधर चौथे मनु हुए। उनकी आयु तुटिक वर्ष और ऊँचाई 775 धनुष थी। इन्होंने दुष्ट पशुओं से रक्षा के लिए लाठी का उपदेश दिया। इसके बाद सीमंकर पाँचवें मनु हुए। उनकी आयु कमल वर्ष और ऊँचाई 750 धनुष थी। इन्होंने कल्पवृक्षों की सीमा नियत की।
श्लोक 112 से 124 सीमंधर और विमलवाहन
सीमंधर छठे मनु हुए। उनकी आयु नलिन वर्ष और ऊँचाई 725 धनुष थी। इन्होंने कल्पवृक्षों की सीमाएँ चिह्नित कीं। इसके बाद विमलवाहन सातवें मनु हुए। उनकी आयु पद्म वर्ष और ऊँचाई 700 धनुष थी। इन्होंने सवारी के लिए पशुओं पर उपकरण लगाने का उपदेश दिया। फिर चक्षुष्मान आठवें मनु हुए। उनकी आयु पद्मांग वर्ष और ऊँचाई 675 धनुष थी। इन्होंने पुत्र-मुख देखने का भय दूर किया।
श्लोक 125 से 138 यशस्वान से चंद्राभ
यशस्वान नौवें मनु हुए। उनकी आयु कुमुद वर्ष और ऊँचाई 650 धनुष थी। इन्होंने संतानों को आशीर्वाद देने की प्रथा शुरू की। अभिचंद्र दसवें मनु हुए। उनकी आयु कुमुदा वर्ष और ऊँचाई 625 धनुष थी। इन्होंने चंद्रमा के साथ क्रीड़ा सिखाई। चंद्राभ ग्यारहवें मनु हुए। उनकी आयु नयुत वर्ष और ऊँचाई 600 धनुष थी। ये संतानों के साथ जीवित रहने की प्रथा लाए।
श्लोक 139 से 151 मरुदेव और प्रसेनजित
मरुदेव बारहवें मनु हुए। उनकी आयु नयुत वर्ष और ऊँचाई 575 धनुष थी। इन्होंने नाव और सीढ़ियाँ बनाने का उपदेश दिया। प्रसेनजित तेरहवें मनु हुए। उनकी आयु एक पर्व और ऊँचाई 550 धनुष थी। इन्होंने जरायु हटाने का उपदेश दिया। ये सूर्य-से शोभित थे।
श्लोक 152 से 163 नाभिराज का स्वरूप
नाभिराज चौदहवें मनु हुए। उनकी आयु एक करोड़ पूर्व और ऊँचाई 525 धनुष थी। वे आभूषणों से शोभित थे। उनका मुख चंद्रमा को लज्जित करता था। उनकी भुजाएँ सर्प-सी थीं। उनका कटि स्थिर और नाभि सुंदर थी। उनका शरीर इंद्र से भी श्रेष्ठ था।
श्लोक 164 से 171 मेघों का आगमन
नाभिराज के समय मेघ प्रकट हुए। वे बिजली और गर्जना से युक्त थे। ठंडी वायु बहने लगी। चातक और मोर हर्षित हुए। मेघ पर्वतों का अभिषेक करते थे।
श्लोक 172से 183 धान्य की उत्पत्ति
मेघों से नदियाँ बहीं। वे शोक-से रोते थे। बिजली नटी-सी नृत्य करती थी। चातक मेघों से प्रेम करते थे। मेघों से धान्य उत्पन्न हुए। ये पुण्य से पक गए।
श्लोक 184 से 192 प्रजा की व्याकुलता
धान्य मध्यम वृष्टि से फले। चावल, गेहूँ आदि उत्पन्न हुए। प्रजा उपयोग नहीं जानती थी। कल्पवृक्ष नष्ट होने से वे व्याकुल हुए। भूख से चित्त अशांत हुआ। वे नाभिराज से प्रार्थना करने लगे।
श्लोक 193 से 201 नाभिराज का उपदेश
प्रजा ने वृक्षों और झाड़ियों के उपयोग पूछा। नाभिराज ने उन्हें भयमुक्त किया। इन्होंने कहा कि ये वृक्ष भोग्य हैं। विषवृक्षों को छोड़ना चाहिए। ओषधियाँ स्वाद बढ़ाती हैं।
श्लोक 202 से 212 प्रजा का हित
नाभिराज ने रस निकालने और बर्तन बनाने का उपदेश दिया। प्रजा प्रसन्न हुई। भोगभूमि नष्ट हो गई। चौदह कुलकर विदेह से आए थे। इन्होंने पुण्य से सम्यग्दर्शन प्राप्त किया। ये कुल और वंश स्थापित करते थे।
नाभिराज ने रस निकालने, बर्तन बनाने का उपदेश। प्रजा प्रसन्न, भोगभूमि समाप्त। कुलकर विदेह से उत्पन्न, सम्यग्दर्शन धारक। कार्यों हेतु कुलकर नाम।
श्लोक 213 से 221 दंड और संख्याएँ
वृषभदेव और भरत भी कुलकर थे। कुलकरों ने दंड व्यवस्था बनाई। प्रथम पांच (हा), अगले पांच (हा, मा), शेष (हा, मा, धिक)। भरत ने शारीरिक दंड शुरू किए। आयु की संख्याएँ पूर्व, पर्व आदि हैं। इनका गुणाकार से निश्चय होता है।
श्लोक 222 से 239 कुलकरों का कार्य
संख्याएँ संख्यात और असंख्यात हैं। कुलकरों के नाम प्रतिश्रुति से नाभिराज तक हैं। इन्होंने भय दूर करने से लेकर नाल काटने तक के कार्य किए। गौतम ने यह कथन किया। सभा आनंदित हुई। वे वृषभदेव का पुराण कहने को तत्पर हुए।
आदिपुराण पर्व 4 – श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन
लोक की संरचना, सृष्टिवाद का खंडन, और जंबूद्वीप के गंधिल देश व विजयार्ध पर्वत ,अलकापुरी, अतिबल, महाबल, और उनके राज्य-तप का विस्तृत वर्णन शामिल है।
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 4
श्लोक 1 से 11 पुराण का स्वरूप
तीन पर्वों का अध्ययन करने वाला आनंद प्राप्त करता है। अब वृषभदेव का चरित कहा जाएगा। पुराण में आठ आख्यान होते हैं। लोकाख्यान में लोक का वर्णन होता है। देशाख्यान में देश का विस्तार बताया जाता है। नगर और राजा का वर्णन क्रमशः पुराख्यान और राजाख्यान है। तीर्थाख्यान में तीर्थंकर का चरित्र है। तपदान और गति-फल का वर्णन भी होता है।
श्लोक 12 से 21 लोक का स्वरूप और सृष्टिवाद
यहाँ लोक की परिभाषा और उसकी प्रकृति पर प्रकाश डाला गया है। लोक वह है जहाँ जीव आदि पदार्थ अपनी पर्यायों सहित दिखाई देते हैं और इसे क्षेत्र भी कहा जाता है। लोक अकृत्रिम (किसी द्वारा निर्मित नहीं), नित्य (अविनाशी), और अनादि (आदि रहित) है, जो आकाश के मध्य में स्थित है। सृष्टिवाद की परीक्षा करते हुए यह तर्क दिया गया कि लोक का कोई बनाने वाला नहीं है। यदि ईश्वर को सृष्टिकर्ता माना जाए, तो प्रश्न उठता है कि वह सृष्टि से पहले कहाँ था, उसने क्या सामग्री से लोक बनाया, और उसका प्रयोजन क्या था। ईश्वर को अमूर्तिक, निष्क्रिय, और विकाररहित मानने से उसका सृष्टिकर्ता होना असंभव है। इस प्रकार, लोक स्वतः सिद्ध माना गया है।
श्लोक 22 से 31 सृष्टिवाद की परीक्षा
इस खंड में सृष्टिवाद के खिलाफ तर्कों को और गहराई से प्रस्तुत किया गया है। यदि ईश्वर कृतकृत्य (सब कार्य पूर्ण) है, तो उसे सृष्टि की इच्छा नहीं होगी; और यदि अकृतकृत्य है, तो वह समर्थ नहीं होगा। सृष्टि से ईश्वर को कोई फल नहीं मिलता, और यदि यह उसकी क्रीड़ा मात्र है, तो यह निरर्थक है। यदि ईश्वर कर्मों के अनुसार सृष्टि करता है, तो वह परतंत्र हो जाता है, जो ईश्वरत्व के विपरीत है। अतः सृष्टि स्वतः सिद्ध है, कर्मों से उत्पन्न होती है, और ईश्वर का अस्तित्व व्यर्थ है। लोक अकृत्रिम, नित्य, और जीव-अजीव का आधार है।
श्लोक 32 से 41 कर्म ही कर्ता
यहाँ यह स्थापित किया गया कि शरीर आदि की विशेष रचना ईश्वर से नहीं, बल्कि जीवों के कर्मों से होती है। संसारी जीव अपने कर्मों से सृष्टि का निर्माण करते हैं। विधि, स्रष्टा, और ईश्वर जैसे शब्द कर्मों के पर्याय हैं। लोक अकृत्रिम, अनादि, और नित्य है, जिसमें तीन भेद हैं: अधोलोक, मध्यलोक, और ऊर्ध्वलोक। इनका आकार क्रमशः वेत्रासन (नीचे चौड़ा, ऊपर संकरा), झल्लरी (सब ओर फैला), और मृदंग (बीच में चौड़ा, सिरों पर संकरा) जैसा है।
श्लोक 42 से 51 लोक का ढांचा
लोक आकाश के मध्य में स्थित है और तीन वातवलयों (घनोदधि, घनवात, तनुवात) से घिरा है। इसकी संरचना इस प्रकार है: अधोलोक 7 राजु, मध्यलोक 1 राजु, और ऊर्ध्वलोक 5 + 1 राजु चौड़ा। मध्यलोक में असंख्य द्वीप-समुद्र हैं, जिनमें केंद्र में जंबूद्वीप है, जो 1 लाख योजन चौड़ा है। इसमें मेरु पर्वत, 6 कुलाचल, 7 क्षेत्र (जैसे भरत), और 14 नदियाँ (जैसे गंगा-सिंधु) हैं। जंबूद्वीप लवण समुद्र से घिरा है और मेरु इसके मध्य में नाभि की तरह स्थित है।
श्लोक 52 से 61 गंधिल देश
जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में गंधिल देश का वर्णन है, जो स्वर्ग के समान सुंदर है। इसकी सीमाएँ हैं: पूर्व में मेरु, पश्चिम में ऊर्मिमालिनी नदी, दक्षिण में सीतोदा नदी, और उत्तर में नीलगिरि। यहाँ मुनि कर्म नष्ट कर निर्वाण प्राप्त करते हैं। गंधिल देश की प्रजा प्रसन्न रहती है, उत्सव मनाती है, और भोगों में स्वर्ग से श्रेष्ठ है। यहाँ के घरों में सुंदर स्त्रियाँ, चतुर पुरुष, और मधुर बालक हैं। लोगों की चतुराई उनके वेषों से, संपत्ति आभूषणों से, और यौवन भोग-विलास से प्रकट होता है।
श्लोक 62 से 71 देश की समृद्धि
गंधिल देश में लोग पात्रदान, जिनपूजा, शील रक्षा, और प्रोषधोपवास में रुचि रखते हैं। जिनेंद्र के प्रभाव से मिथ्यादृष्टि नहीं है। यहाँ बागों में कोकिलाएँ, खेतों में धान, और तोतों की पंक्तियाँ हैं। पथिक ईख का रस पीते हैं, गाँव समीप हैं, और उनकी सीमाएँ धान खेतों से शोभित हैं। नगर स्वर्ग समान, गाँव भोगभूमि समान, घर विमान समान, और मनुष्य देव समान हैं। हाथी दिग्गज, स्त्रियाँ दिक्कुमारियाँ, और राजा दिक्पाल जैसे हैं।
श्लोक 72 से 81 प्राकृतिक सौंदर्य
यहाँ बावड़ियाँ, कुएँ, और तालाब जल से भरे हैं। नदियाँ वेश्याओं समान हैं: विपंका (कीचड़रहित), ग्राहवती (मगरमच्छ युक्त), स्वच्छ, कुटिलवृत्ति (टेढ़ी), अलंघ्य (गहरी), सर्वभोग्या (सबके लिए), विचित्रा (विविध), और निम्नगा (नीचे बहने वाली)। तालाबों में हंस, वनों में हाथी, और खेतों में बैल हैं। जिनमंदिरों में संगीत से मयूर नृत्य करते हैं। गायें और मेघ दूध व जल से पोषण करते हैं। सुयोग्य राजा के शासन में कोई बाधा नहीं है।
श्लोक 82 से 91 विजयार्ध पर्वत
गंधिल देश में विजयार्ध पर्वत है, जो चाँदीमय, 25 योजन ऊँचा, और 50-30-10 योजन चौड़ा है, जिसमें सवा 6 योजन जमीन में है। इसकी उत्तर-दक्षिण श्रेणियों में विद्याधर निवास करते हैं। विद्याधरियों का महावर इसे शोभित करता है। यह अभेद्य, अविनाशी, निर्मल, और सिद्ध समान है। चारण मुनि यहाँ विहार करते हैं, और यह पंख फैलाकर उड़ने को तत्पर प्रतीत होता है।
श्लोक 92 से 101 पर्वत की शोभा
यहाँ किन्नर और नागकुमार क्रीड़ा करते हैं। पर्वत पर श्वेत बादल, सिद्धायतन, और मुकुट समान कूट हैं। यह वज्रमय कपाटों से युक्त है और गंगा-सिंधु इसके चरणों में हैं। वन, कल्पवृक्ष, और सुगंधित वायु इसे अलंकृत करते हैं। यह दिशाओं का मर्दन करता हुआ अपने माहात्म्य को प्रकट करता है।
श्लोक 102 से 111 विजयार्ध और अलकापुरी
विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में अलकापुरी है, जो चंद्रमा की शोभा को भी फीका करती है। यह ऊँचे गोपुरों, कमलयुक्त परिखा, और फहराती पताकाओं से शोभित है। घरों में वापिकाएँ और कलहंस हैं। यह नगरी नाना भाषाओं से युक्त और विद्याधर नरेश द्वारा सुरक्षित है।
श्लोक 112 से 121 अलकापुरी की समृद्धि
इस खंड में अलकापुरी की समृद्धि और शोभा का वर्णन है। यहाँ की वापिकाएँ (जलाशय) स्त्रियों के समान हैं: स्वच्छ जल उनका वस्त्र, नील कमल कर्णफूल, कमल मुख, और कुवलय नेत्र हैं। नगरी में कोई अज्ञानी, शीलहीन स्त्री, बगीचे रहित घर, या फलहीन बगीचा नहीं है। उत्सव जिनपूजा के बिना नहीं होते, और मृत्यु संन्यास विधि से होती है। धान के खेत बिना बोए पकते हैं और पुण्य समान फल देते हैं। उपवनों में छोटे पौधों की रक्षा बालकों की तरह की जाती है। बाजार सागर समान हैं: शब्दमय, रत्नों से चमकते, और मनुष्यों से भरे। यहाँ विकोशत्व (खजाने का अभाव), भीरुता, अधरता (नीचता), निस्त्रिंशता (क्रूरता), यांचा (भिक्षा), म्लानता (उदासीनता), और बंधन केवल प्राकृतिक संदर्भों में हैं, मनुष्यों में नहीं। उपवन दंपति समान प्रिय हैं, और अलकापुरी विजयार्ध पर्वत पर तिलक समान शोभित है।
श्लोक 122 से 131 अतिबल राजा
अलकापुरी का राजा अतिबल विद्याधर था, जो शत्रुओं के बल का नाशक और समस्त विद्याधरों का अधिपति था। वह धर्म से विजयी, शूरवीर, और छह गुणों (संधि, विग्रह, यान, आसन, संश्रय, द्वैधीभाव) से शत्रुओं को परास्त करने वाला था। वृद्धों की संगति से वह इंद्रियों पर विजय पाकर शत्रुओं को नष्ट करता था। वह दिग्गज समान था: उदय (वैभव), उच्च कुल, लंबी भुजाएँ, और दानशील। उसके दाँतों की किरणें और भौंहें चंद्रमा को जीतती थीं। उसका मस्तक त्रिकूटाचल समान था, और वक्षस्थल लक्ष्मी का क्रीड़ाद्वीप। उसकी भुजाएँ सूँड समान, जाँघें तरकस समान, और चरण कमल समान थे। उसकी रानी मनोहरा कामदेव के बाण समान सुंदर थी।
श्लोक 132 से 141 महाबल का जन्म
अतिबल और मनोहरा का पुत्र महाबल उत्पन्न हुआ, जिसके जन्म से सहोदरों में प्रेम बढ़ा। उसके स्वाभाविक गुण थे: कला-कुशलता, शूरवीरता, दान, बुद्धि, क्षमा, दया, धैर्य, सत्य, और शौच। उसका शरीर और गुण एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हुए बढ़ते थे। उसने चार विद्याओं (आन्वीक्षिकी आदि) का अध्ययन किया और पूर्वभव के संस्कारों से तेजस्वी बना। अतिबल ने उसके विनय आदि गुण देखकर उसे युवराज पद दिया। राज्यलक्ष्मी पिता-पुत्र में बँटकर हिमालय-समुद्र समान विस्तृत हुई। अन्य पुत्र होने पर भी अतिबल महाबल को ही अपना उत्तराधिकारी मानते थे।
श्लोक 142 से 152 अतिबल की दीक्षा
अतिबल विषयभोगों से विरक्त होकर दीक्षा लेने को उद्यमी हुए। उन्होंने राज्य को विषपुष्प, दृष्टिविष सर्प, व्यभिचारिणी स्त्री, और उच्छिष्ट माला समान हेय माना। संसार को मिथ्यात्व की जड़, जन्म-मरण के पुष्प, और दुःख के फल वाली बेल मानकर, उन्होंने इसे उखाड़ने का संकल्प लिया। शरीर को नश्वर, बंधुओं को बंधन, धन को दुःखकारक, और लक्ष्मी को चंचल समझकर, उन्होंने राज्य पुत्र महाबल को सौंपकर वन में विद्याधरों संग दीक्षा ली।
श्लोक 153 से 161 अतिबल का तप
अतिबल ने जिनलिंग धारण कर कठिन तप किया, जो सेना समान तीन गुप्तियों (मन, वचन, काय) और पाँच समितियों (ईर्या आदि) से सुरक्षित था। यह तप सर्प के फणरत्न, कल्पवृक्ष, गुरुवचन, पक्षी मंडल, सिद्धस्थान, वातवलय, और रत्नत्रय समान था। उनके तप से आत्मबल बढ़ा। उनके बाद महाबल ने राज्य संभाला, जिसमें विद्याधर उनके चरणों की पूजा करते थे। वह दैव और पुरुषार्थ से संपन्न, वीर, और शत्रुनाशक था। उसकी मंत्रशक्ति से शत्रु वशीभूत होते थे।
श्लोक 162 से 171 महाबल का शासन
महाबल पर प्रजा का प्रेम आम्रवृक्ष पर समान था। वह न कठोर था, न कोमल, बल्कि मध्यम वृत्ति से जगत को वश में करता था। उसने अंतरंग (काम, क्रोध आदि) और बाह्य शत्रुओं को शांत किया। धर्म, अर्थ, काम का संतुलित पालन करते हुए, वह शुद्ध बुद्धि वाला रहा। जवानी, रूप, ऐश्वर्य आदि से वह गर्वित नहीं हुआ। उसके शासन में अन्याय, भय, और क्षोभ नष्ट हुए। गुप्तचर और विचारशक्ति उसके नेत्र थे। यौवन में उसका रूप चंद्रमा समान लोकप्रिय हुआ।
श्लोक 172 से 181 महाबल का रूप
महाबल का रूप कामदेव से श्रेष्ठ था। उसके घुँघराले बाल मेघ समान मेरु शिखर जैसे थे। ललाट लक्ष्मी के विश्राम हेतु सुवर्ण शिला समान, भौंहें कामदेव के धनुष समान, और आँखें बाण यंत्र समान थीं। कान सरस्वती के झूले, नाक नेत्रों की स्पर्धा रोकने वाला पुल, और मुख सुगंधित कमल समान थे। वक्षस्थल लक्ष्मी का स्नानगृह, और कंधे क्रीड़ाचल समान शोभित थे।
श्लोक 182 से 191 महाबल के अंग
महाबल की भुजाएँ कल्पवृक्ष की शाखा समान, मध्य भाग समुद्र समान, नितंब जंबूद्वीप समान, जाँघें निशाने समान, पिंडरियाँ शाण समान, और चरण लक्ष्मी के घर समान थे। उसने रूप और मंत्रशक्ति से जगत जीता। उसके चार मंत्री—महामति, संभिन्नमति, शतमति, स्वयंबुद्ध—बाह्य प्राण समान थे। स्वयंबुद्ध सम्यग्दृष्टि था, शेष मिथ्यादृष्टि, पर सभी स्वामी के हित में तत्पर थे।
श्लोक 192 से 198 मंत्रियों और शासन
चारों मंत्रियों की योजना से राज्य समवृत्त छंद समान विस्तृत हुआ। महाबल स्वयं निर्णय लेता, और मंत्री प्रशंसा करते थे। वह मंत्रियों के साथ उपवनों में विहार करता, जहाँ मंदार वृक्षों की शीतल वायु उसे सुख देती थी। विद्याधरों के मुकुट उसके चरणों को स्पर्श करते थे। वह मेरु पर इंद्र समान विजयार्ध पर्वत पर क्रीड़ा करता रहा, और उसे तीर्थंकर की विभूति प्राप्त होने वाली थी।
आदिपुराण पर्व 5 – ललितांग स्वर्गभोग वर्णन
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 5
श्लोक 1 से 12 महाबल के जन्मदिन का उत्सव
इस खंड में राजा महाबल के जन्मदिन के उत्सव का वर्णन है। उत्सव मंगलगीत, वादित्र, और नृत्य से परिपूर्ण था। महाबल सिंहासन पर विराजमान थे, जहाँ वारांगनाएँ श्वेत चामर ढो रही थीं। तरुण स्त्रियाँ कामदेव की मंजरियाँ, सौंदर्य की तरंगें, और सुंदरता की कलिकाएँ प्रतीत होती थीं। विद्याधर राजाओं ने उन्हें घेरा था, और महाबल सुमेरु पर्वत समान शोभित थे। उनके वक्ष पर श्वेत हार हिमवत के झरने और इंद्रनीलमणि की कंठी हंसों की पंक्ति समान थी। मंत्री, सेनापति, पुरोहित आदि उपस्थित थे। महाबल हँसकर, संभाषण कर, सम्मान देकर सभी को संतुष्ट करते थे। वे संगीतज्ञों की गोष्ठी का आनंद लेते, सामंतों के दूतों का सत्कार करते, और अन्य राजाओं की भेंट स्वीकार करते थे, इस प्रकार आनंद और विभव के साथ सभा में विराजमान थे।
श्लोक 13 से 21 स्वयंबुद्ध का धर्मोपदेश
स्वयंबुद्ध मंत्री ने महाबल को प्रसन्न देखकर उनके कल्याण हेतु वचन कहे। उन्होंने कहा कि विद्याधर लक्ष्मी पुण्य का फल है। धर्म से संपत्ति, सुख, और प्रसन्नता मिलती है। राज्य, भोग, सुंदरता, पांडित्य, आयु, और आरोग्य पुण्य के फल हैं। कारण के बिना कार्य, दीपक के बिना प्रकाश, या धर्म के बिना संपदा असंभव है। अधर्म से सुख नहीं मिलता। धर्म वह है जो स्वर्ग और मोक्ष देता है, जिसका मूल दया और संपूर्ण प्राणियों पर अनुकंपा है। क्षमा आदि गुण दया की रक्षा करते हैं।
श्लोक 22 से 31 धर्म के लक्षण और मिथ्यादृष्टि की शुरुआत
स्वयंबुद्ध ने धर्म के लक्षण बताए: इंद्रिय दमन, क्षमा, अहिंसा, तप, ज्ञान, शील, ध्यान, और वैराग्य। अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और परिग्रह त्याग सनातन धर्म हैं। राज्य आदि को धर्म का फल जानकर दृष्टि धर्म में स्थिर रखनी चाहिए। चंचल लक्ष्मी को स्थिर करने के लिए अहिंसादि धर्म का पालन आवश्यक है। स्वयंबुद्ध के ये वचन सुनकर मिथ्यादृष्टि मंत्री महामति ने चार्वाक मत का समर्थन करते हुए जीव के अस्तित्व पर प्रश्न उठाया। उसने कहा कि आत्मा सिद्ध नहीं, इसलिए धर्म का फल कैसे हो सकता है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि के संयोग से चेतना उत्पन्न होती है, जैसे महुआ आदि से मादक शक्ति।
श्लोक 32 से 41 महामति और संभिन्नमति के तर्क
महामति ने कहा कि शरीर से पृथक् चेतना नहीं, क्योंकि यह प्रत्यक्ष नहीं। शरीर नष्ट होने पर जीव बुलबुले समान विलीन हो जाता है। परलोक की आशा व्यर्थ है। संभिन्नमति ने विज्ञानवाद का समर्थन करते हुए कहा कि जीव पृथक् नहीं, जगत् विज्ञानमात्र और क्षणभंगुर है। विज्ञान निरंश, स्वतः नष्ट होने वाला, और संतान छोड़ने वाला है। प्रत्यभिज्ञान भ्रांत है, जैसे नये नख-केशों का पुराना समझना। स्कंध (विज्ञान, वेदना आदि) दुःख हैं, और क्षणिक नैरात्म्य से मोक्ष मिलता है। परलोक का भय टिटिहरी के आकाश भय समान है।
श्लोक 42 से 51 शतमति का शून्यवाद और स्वयंबुद्ध का प्रतिवाद
शतमति ने शून्यवाद का समर्थन करते हुए कहा कि जगत् शून्य और मिथ्या है, जैसे स्वप्न या इंद्रजाल। जीव और परलोक असत् हैं। परलोक के लिए तप व्यर्थ है। स्वयंबुद्ध ने भूतवाद का खंडन करते हुए कहा कि ज्ञान-दर्शनरूप चैतन्य भूतचतुष्टय से पृथक् है। शरीर जड़ और चैतन्य चित्स्वरूप हैं, दोनों का स्वभाव विरुद्ध है। चैतन्य तलवार और शरीर म्यान समान हैं। चैतन्य भूतों का कार्य या गुण नहीं, क्योंकि दोनों विजातीय हैं।
श्लोक 52 से 61 भूतवाद का खंडन
स्वयंबुद्ध ने कहा कि चैतन्य अतींद्रिय और शरीर का विकार नहीं। शरीर आधार और चैतन्य आधेय है, जैसे घर और दीपक। भूतवाद के अनुसार प्रत्येक अंग में पृथक् चैतन्य होना चाहिए, पर एक ही चैतन्य सबमें है। मूर्त शरीर से अमूर्त चैतन्य असंभव। कर्मसहित आत्मा ही शरीर का निमित्त है। जीव शरीर के साथ उत्पन्न-नष्ट नहीं, क्योंकि दोनों विलक्षण हैं। चैतन्य का उपादान जीव ही है।
श्लोक 62 से 71 भूतवाद का पूर्ण खंडन
स्वयंबुद्ध ने कहा कि मदशक्ति का दृष्टांत असंगत है, क्योंकि मादक शक्ति जड़ है। भूतवादी अपिशाचग्रस्त हैं। चैतन्य अचेतन में नहीं। पूर्वभव संस्कारों से जीव का अस्तित्व सिद्ध है। परलोक और पुण्य-पाप भोगने वाला जीव पृथक् है। जातिस्मरण, आगम, और शरीर की चेष्टाएँ जीव को प्रमाणित करते हैं। भूतचतुष्टय से बटलोई में जीव नहीं बनता, अतः भूतवाद मूर्खों का प्रलाप है।
श्लोक 72 से 81 विज्ञानवाद का खंडन
स्वयंबुद्ध ने विज्ञानवाद का खंडन करते हुए कहा कि विज्ञान से विज्ञान की सिद्धि असंभव। वाक्य प्रयोग से बाह्य पदार्थ सिद्ध होते हैं। ज्ञान विषयों के बिना नहीं। एक विज्ञान दूसरे को ग्रहण करे तो अद्वैत नष्ट, न करे तो संतान कैसे सिद्ध होगी। विज्ञानमय जगत् में सत्य-असत्य व्यवस्था असंभव। बाह्य पदार्थों की सत्ता आवश्यक है। विज्ञानाद्वैत बालकों की बोली है।
श्लोक 82 से 91 शून्यवाद का खंडन और सभा का समाधान
स्वयंबुद्ध ने शून्यवाद का खंडन करते हुए कहा कि शून्यत्व को सिद्ध करने वाले वचन-ज्ञान हों तो पदार्थ मानने पड़ेंगे, न हों तो शून्यता असिद्ध। शून्यवाद उन्मत्त के रोने समान है। जीव और धर्म सिद्ध हैं। सर्वज्ञ के वचन ही सत्य हैं। सभा ने आत्मा का अस्तित्व स्वीकार किया, महाबल प्रसन्न हुए, और परवाद म्लान हो गए। स्वयंबुद्ध ने कथा शुरू की।
श्लोक 92 से 101 अरविंद की कथा
स्वयंबुद्ध ने अरविंद नामक विद्याधर राजा की कथा शुरू की। वह अलकापुरी का शासक था, जिसने रौद्रध्यान से नरक आयु बाँधी। मृत्यु निकट आने पर दाहज्वर से संतप्त हुआ। कोई उपाय काम न आया। उसने पुत्र हरिचंद्र से उत्तरकुरु के शीतल वनों में भेजने को कहा, पर पुण्यक्षय से विद्या विफल रही। हरिचंद्र समझ गया कि पिता की बीमारी असाध्य है।
श्लोक 102 से 111 अरविंद की मृत्यु
दो छिपकलियों के लड़ने से एक की पूँछ टूटने पर रक्त की बूँदें राजा अरविंद पर गिरीं, जिससे उसका दाहज्वर शांत हुआ। उसने इसे ओषधि माना और पुत्र कुरुविंद से खून से भरी बावड़ी बनाने को कहा। उसने मृगों का रक्त उपयोग करने का सुझाव दिया। कुरुविंद, पाप से डरकर और मुनि से पिता की नरकायु की जानकारी पाकर, असली रक्त की जगह लाख के रंग से बावड़ी बनवाई। अरविंद ने इसे रुधिर समझकर हर्षित होकर क्रीड़ा की, पर कृत्रिमता जानकर क्रोधित हुआ। कुरुविंद को मारने दौड़ा, पर गिरकर अपनी तलवार से मर गया।
श्लोक 112 से 121 अरविंद की नरकगति और दंड की कथा
अरविंद पाप के योग से नरक गया। यह कथा अलकापुरी में प्रसिद्ध है। पिता की मृत्यु से कुरुविंद शोकाकुल हुआ। स्वयंबुद्ध ने दूसरी कथा शुरू की: दंड नामक प्रतापी विद्याधर ने शत्रुओं को दंडित किया। उसके पुत्र मणिमाली को युवराज बनाकर वह विषयासक्त हुआ। आर्तध्यान से तिर्यंच आयु बाँधी और मृत्यु पर अजगर बना। जातिस्मरण से वह भंडार में केवल मणिमाली को प्रवेश देता था।
श्लोक 122 से 131 मणिमाली का पिता को उपदेश
मणिमाली ने मुनि से पिता के अजगर होने का वृत्तांत जाना और भंडार में जाकर उन्हें संबोधित किया। उसने कहा कि धन और विषयासक्ति से वे कुयोनि में आए। विषय कटु, दुर्जर, और धिक्कार योग्य हैं। वे संसार में परिभ्रमण कराते हैं, शिकारी के गाने समान ठगते हैं, और राग बढ़ाते हैं। विषय चंचल और विचित्र हैं, आत्मा को अटवी में भटकाते हैं। मुनियों को नमस्कार है जो इनसे विमुख रहते हैं।
श्लोक 132 से 141 अजगर का उद्धार और शतबल की कथा
मणिमाली के उपदेश से अजगर का मोह नष्ट हुआ। उसने पश्चाताप कर विषयासक्ति छोड़ी, आहार त्यागा, और मृत्यु पर देव बना। उसने मणिमाली को रत्नहार दिया, जो महाबल के कंठ में है। स्वयंबुद्ध ने तीसरी कथा शुरू की: शतबल, महाबल के दादा, ने प्रजा को सुशासित किया। राज्य पुत्र को सौंपकर वे भोगों से विरक्त हुए, श्रावक व्रत लिए, और समाधिमरण से देव बने।
श्लोक 142 से 151 शतबल का देवत्व और सहस्त्रबल की कथा
शतबल महेंद्रस्वर्ग में ऋद्धियों सहित देव बने। एक बार महाबल को सुमेरु पर जैन धर्म का उपदेश दिया। स्वयंबुद्ध ने चौथी कथा शुरू की: सहस्त्रबल, शतबल के पिता, ने पुत्र को राज्य देकर जिनदीक्षा ली। तप से पृथ्वी को प्रकाशित किया, केवलज्ञान प्राप्त किया, और मोक्ष पाया। महाबल के पिता ने भी राज्य सौंपकर दीक्षा ली और मोक्ष की ओर अग्रसर हैं।
श्लोक 152 से 161 चार ध्यानों का फल और धर्म की महिमा
स्वयंबुद्ध ने चार दृष्टांतों को चार ध्यानों से जोड़ा: अरविंद का रौद्रध्यान से नरक, दंड का आर्तध्यान से अजगर, शतबल का धर्मध्यान से देवत्व, और सहस्त्रबल का शुक्लध्यान से मोक्ष। आर्त-रौद्र अशुभ, धर्म-शुक्ल शुभ हैं। धर्म से स्वर्ग-मोक्ष संभव हैं। सभा ने स्वयंबुद्ध के वचनों से जैन धर्म को सत्य माना और उनकी प्रशंसा की। महाबल ने सत्कार किया। स्वयंबुद्ध मेरु पर चैत्यालय वंदन के लिए गए।
श्लोक 162 से 175 मेरु पर्वत का वर्णन
मेरु पर्वत समवसरण, श्रुतस्कंध, महाराज, वृषभदेव, और इंद्र समान है। चार वनों (भद्रशाल आदि) से शोभित, सुवर्णमय, रत्नखचित, और जिनमंदिरों से युक्त है। यह लवणसमुद्र के वस्त्र और जंबूद्वीप का मुकुट समान है। जगत् को सरोवर और मेरु को केशर समूह माना। यह पर्वतों का राजा है, रत्नजड़ित शिखरों और चूलिका से सुशोभित।
श्लोक 176 से 181 मेरु की शोभा
स्वयंबुद्ध ने मेरु की शोभा देखी। इसके शिखर आकाश को घेरते हैं। देव-देवियाँ यहाँ निवास करते हैं। प्रत्यंत पर्वत निषध-नील तक फैले हैं, गजदंत पर्वत भक्ति से फैले हैं। सीता-सीतोदा नदियाँ दो कोस दूर समुद्र की ओर जाती हैं।
श्लोक 182 से 191 मेरु के वन और चैत्यालय
भद्रशाल वन देवकुरु-उत्तरकुरु को तिरस्कृत करता है। नंदन, सौमनस, पांडुक वन फूले वृक्षों से मनोहर हैं। देवकुरु, उत्तरकुरु, जंबू, और शाल्मली वृक्ष शोभित हैं। चैत्यालय रत्नकांति से आकाश प्रकाशित करते हैं। पर्वत पुण्यजनों, बागों, और नदियों से नगर समान है। यह जंबूद्वीप के कमल की कर्णिका है। स्वयंबुद्ध ने चैत्यालयों की वंदना की।
श्लोक 192 से 201 मुनियों से भविष्यवाणी
स्वयंबुद्ध ने सौमनसवन में बैठकर आदित्यगति और अरिंजय मुनियों को देखा। उनकी पूजा कर पूछा कि महाबल भव्य है या अभव्य, और उनके वचनों पर श्रद्धा करेगा या नहीं। आदित्यगति ने कहा कि महाबल भव्य है, उनके वचनों पर विश्वास करेगा, और दसवें भव में जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में प्रथम तीर्थंकर बनेगा।
श्लोक 202 से 221 महाबल का पूर्वभव और स्वप्न
स्वयंबुद्ध ने मुनि से महाबल के वैभव का वर्णन सुना। जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में गंधिला देश के सिंहपुर में श्रीषेण राजा था, जिसकी पत्नी सुंदरी थी। उनके दो पुत्र थे: जयवर्मा और श्रीवर्मा। श्रीषेण ने छोटे पुत्र श्रीवर्मा को राजपट्ट दिया, जिससे जयवर्मा को वैराग्य हुआ। उसने दीक्षा ली, पर भोगों की इच्छा करते हुए सर्पदंश से मृत्यु पाई और महाबल बना। स्वयंबुद्ध के वचनों से वह विरक्त होगा। महाबल ने स्वप्न देखा: तीन दुष्ट मंत्रियों ने उसे कीचड़ में फँसाया, स्वयंबुद्ध ने उसे बचाकर अभिषेक किया; दूसरा स्वप्न अग्नि ज्वाला का था। मुनि ने कहा कि पहला स्वप्न भविष्य की विभूति और दूसरा आयुक्षय (एक माह शेष) का सूचक है। स्वयंबुद्ध को शीघ्र प्रयत्न करने को कहा।
श्लोक 222 से 231 महाबल का संन्यास
मुनि अंतर्धान हो गए। स्वयंबुद्ध महाबल के पास लौटा और मुनि के वचन सुनाए। उसने उपदेश दिया कि जिनेंद्र का धर्म दुःख नाशक है। महाबल ने समाधिमरण का निर्णय लिया, राज्य पुत्र अतिबल को सौंपा, और सिद्धकूट चैत्यालय में संन्यास लिया। उसने आहार और शरीर से ममत्व त्यागने की प्रतिज्ञा की, स्वयंबुद्ध को निर्यापकाचार्य बनाया, और संसार सागर पार करने की तैयारी की।
श्लोक 232 से 241 महाबल की सल्लेखना
महाबल ने समता, मैत्री, और परिग्रह त्याग धारण किया। प्रायोपगमन संन्यास में उसने शरीर रक्षा की इच्छा छोड़ी। तप से शरीर कृश, पर परिणाम विशुद्ध हुए। उपवास से शिथिलता आई, पर प्रतिज्ञा अडिग रही। शरीर दुर्बल, पर चेहरा कांतिमान रहा। उदर झुक गया, जैसे सूखता तालाब।
श्लोक 242 से 251 महाबल की समाधि और मृत्यु
तप से महाबल शुद्ध और प्रकाशमान हुआ। उसने परीषहों को जीता, पंचपरमेष्ठियों का ध्यान किया। 22 दिन सल्लेखना कर, अंतिम समय में नमस्कार मंत्र जपते हुए शुद्ध आत्मभावना के साथ स्वयंबुद्ध के समक्ष प्राण छोड़े। स्वयंबुद्ध ने मंत्रशक्ति से उसका आत्मबल बनाए रखा।
श्लोक 252 से 261 महाबल का देवत्व
महाबल ऐशानस्वर्ग में ललितांगदेव बना। उपपाद शय्या पर उसका वैक्रियिक शरीर नवयौवन और आभूषणों से शोभित हुआ। उसका रूप मछलियों वाले सरोवर और कल्पवृक्ष समान था। पुष्पवर्षा और दुंदुभि से स्वागत हुआ। सुहावना पवन बहा।
श्लोक 262 से 271 ललितांगदेव का आश्चर्य और ज्ञान
ललितांगदेव ने देवों को नमस्कार करते देखा और आश्चर्यचकित हुआ। अवधिज्ञान से उसने स्वयंबuddha और पूर्वभव जाना। उसने स्वर्ग, विमान, देवियाँ, और भोगों को पहचाना। देवों ने उसकी जय-जयकार की।
श्लोक 272 से 281 ललितांगदेव के भोग
देवों ने ललितांगदेव को स्नान, जिनपूजा, और नृत्य-दर्शन के लिए प्रेरित किया। वह सात हाथ ऊँचा, सुगंधित, और ऋद्धियों से युक्त था। वह एक हजार वर्ष में मानसिक आहार, एक पक्ष में श्वास, और शरीर से संभोग करता था। उसकी माला और वस्त्र निर्मल थे।
श्लोक 282 से 292 ललितांगदेव की देवियाँ
ललितांगदेव की चार हजार देवियाँ और चार महादेवियाँ (स्वयंप्रभा, कनकप्रभा, कनकलता, विद्युल्लता) थीं। आयु समाप्त होने पर स्वयंप्रभा उसकी प्रिय पत्नी बनी, जो लक्ष्मी समान थी। वह उसके साथ मेरु, नील, विजयार्ध आदि स्थानों पर भोग करता रहा।
श्लोक 293 से 296 धर्म की महिमा
ललितांगदेव ने एक सागर तक भोग भोगे। पूर्वभव के तप से यह सुख मिला। स्वयंबuddha ने कहा कि सुख के लिए धर्म उपार्जन करें, भोग-तृष्णा छोड़ें, जिनवचन में श्रद्धा करें, और मिथ्यामतों से बचें। जैन धर्म कर्म नाशक और पुरुषार्थ देने वाला है।
आदिपुराण पर्व 6 – ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन
हिन्दी-भाषानुवाद पर्व 6
श्लोक 1 से 11 ललितांगदेव का आयुक्षय और शोक
ललितांगदेव के आभूषण और माला निस्तेज हो गए। विमान के कल्पवृक्ष काँपने लगे, उसकी कांति मंद पड़ी, क्योंकि पुण्य क्षीण हो गया था। ऐशानस्वर्ग के देव और सेवक शोक में डूब गए। उसके सुख दुःख बन गए। उसकी म्लानता का समाचार स्वर्ग में फैल गया। सामानिक देवों ने उसे धैर्य बंधाया, कहा कि जन्म-मरण सबको प्राप्त होते हैं, और स्वर्ग से च्युति साधारण है।
श्लोक 12 से 21 सामानिक देवों का उपदेश
देवों ने कहा कि पुण्य के अभाव में स्वर्ग अंधकारमय हो जाता है। पुण्य से प्रीति, क्षय से अप्रीति होती है। आयु के अंत में माला, शरीर, और लक्ष्मी नष्ट हो जाते हैं। पाप से अस्नेह, जँभाई, और विषयों में अरुचि बढ़ती है। स्वर्ग से च्युति का दुःख नारकी से भी अधिक है। सूर्य के अस्त की तरह अभ्युदय का पतन निश्चित है। उन्होंने शोक छोड़कर धर्म में मन लगाने और पुण्य साधने को कहा।
श्लोक 22 से 31 ललितांगदेव की मृत्यु और पुनर्जन्म
ललितांगदेव ने धैर्य लिया, 15 दिन तक जिन-चैत्यालयों की पूजा की, और अच्युत स्वर्ग में चैत्यवृक्ष के नीचे नमस्कार मंत्र जपते हुए अदृश्य हुआ। जंबूद्वीप के विदेह क्षेत्र में पुष्कलावती देश के उत्पलखेटक नगर में बज्रबाहु और वसुंधरा के पुत्र वज्रजंघ के रूप में जन्म लिया। वह शत्रुओं को संकुचित और बंधुओं को हर्षित करता हुआ यौवन तक बढ़ा।
श्लोक 32 से 41 वज्रजंघ का रूप वर्णन (भाग 1)
वज्रजंघ के काले, कुटिल बाल कामदेव के सर्प समान थे। उसका मुख नेत्रों और हास्य से कमल समान था। नेत्र कानों के समीप शास्त्रज्ञान लेते प्रतीत होते थे। कंठ का हार तारों समान, वक्ष पर चंदन मेरु समान था। मस्तक मुकुट से, भुजाएँ नील-निषध समान, नाभि भँवर समान, कटि सुवर्ण वेदिका समान, और जांघें स्तंभ समान थीं।
श्लोक 42 से 51 वज्रजंघ का रूप और गुण (भाग 2)
वज्रजंघ के चरण लक्ष्मी-आश्रित कमलों समान थे। उसकी रूपसंपत्ति शरद् चंद्रमा समान थी। बुद्धि शास्त्रों में दीपिका समान, वह कलाओं का ज्ञाता, विनयी, जितेंद्रिय, और राज्यलक्ष्मी का पात्र था। उसके गुण और प्रेम योग्यता को बढ़ाते थे। वह सरस्वती, कीर्ति, और राज्य में अनुरक्त था, पर स्वयंप्रभा के प्रति निस्पृह था। स्वयंप्रभा का वर्णन शुरू हुआ।
श्लोक 52 से 61 स्वयंप्रभा का वियोग और संन्यास
ललितांगदेव के च्युत होने पर स्वयंप्रभा वियोग से खिन्न हुई, जैसे चकवी, पृथ्वी, या कोयल। उसे मानसिक व्यथाएँ सताने लगीं। दृढ़धर्म देव ने उसका शोक दूर कर धर्म में लगाया। वह भोगों से निस्पृह होकर छह माह जिनपूजा करती रही, और सौमनस वन में पंचपरमेष्ठियों का स्मरण कर समाधि से च्युत हुई। वह पुंडरीकिणी नगरी में वज्रदंत और लक्ष्मीमती की पुत्री श्रीमती बनी।
श्लोक 62 से 71 श्रीमती का रूप वर्णन (भाग 1)
श्रीमती का सौंदर्य कामदेव की पत्नी समान था। उसके नख कुरवक, चरण अशोक को जीतते थे। नूपुर भ्रमर समान, जंघाएँ तरकस समान, नितंब सरसी समान थे। उसका मध्यभाग त्रिवलियों और नाभि से नदी समान, रोमराजि सर्प मार्ग समान था। वह लता समान, भुजाएँ शाखा, नख फूल समान थे।
श्लोक 72 से 81 श्रीमती का रूप वर्णन (भाग 2)
श्रीमती के स्तन नील रत्न कलश समान, चोली शैल समान, हार फेन समान था। ग्रीवा शंख, कंधे हंसी समान थे। मुख चंद्रमा और कमल दोनों की शोभा धारता था। नेत्र कानों को पार करते, कर्णफूल हँसते थे। केश काले सर्प समान थे। वह देवांगनाओं के सार से बनी प्रतीत होती थी।
श्लोक 82 से 91 श्रीमती का केवलज्ञान दर्शन
श्रीमती माता-पिता को आनंदित करती थी। एक दिन राजभवन में सोते हुए उसे केवलज्ञानी यशोधर गुरु के दर्शन का शोर सुनाई दिया। स्वर्ग से आए देवों की पुष्पवर्षा, मंदार की केशर, और दुंदुभि से कोलाहल हुआ। वह भयभीत होकर उठी, ललितांगदेव का स्मरण कर मूर्छित हो गई।
श्लोक 92 से 101 श्रीमती की मूर्छा और माता-पिता का शोक
सखियों ने श्रीमती को शीतल उपचार से सचेत किया, पर वह मौन रही। सखियों ने माता-पिता को बताया। वज्रदंत और लक्ष्मीमती शोकाकुल होकर आए। उसे समझाने पर भी वह चुप रही। वज्रदंत ने कहा कि यह यौवन और पूर्वभव स्मरण से मूर्छित हुई है, इसमें दोष या रोग की शंका नहीं।
श्लोक 102 से 111 वज्रदंत का निर्णय और अवधिज्ञान
वज्रदंत ने श्रीमती को आश्वासन के लिए पंडिता धाय नियुक्त की और लक्ष्मीमती के साथ उठे। उनके सामने दो कार्य आए: यशोधर गुरु के केवलज्ञान की पूजा और चक्ररत्न के साथ दिग्विजय। व्याकुल होकर उन्होंने पहले गुरु पूजा को प्राथमिकता दी, क्योंकि निकटवर्ती पुण्य कार्य पहले करना चाहिए। यशोधर की पूजा कर अवधिज्ञान प्राप्त किया, जिससे उन्हें पता चला कि वे अच्युत स्वर्ग के इंद्र थे और श्रीमती उनकी प्रिया स्वयंप्रभा थी।
श्लोक 112 से 122 दिग्विजय और पंडिता का प्रयास
वज्रदंत ने श्रीमती को पंडिता को सौंपकर चक्ररत्न पूजा की और षडंग सेना के साथ दिग्विजय को निकले। पंडिता ने एकांत में श्रीमती को समझाया। अशोकवाटिका में चंद्रकांत शिलातल पर बैठकर, उसने श्रीमती को माता और सखी कहकर मौन का कारण पूछा। श्रीमती ने लज्जा से मुख नीचा किया, पर पंडिता के प्रेम से बोली कि वह दुःखी है और पूर्वभव स्मरण से मौन है।
श्लोक 123 से 133 श्रीमती का पूर्वभव स्मरण
श्रीमती ने पंडिता से कहा कि देवों के आगमन से पूर्वभव स्मृत हुआ। उसने धातकीखंड के गंधिला देश में पाटली ग्राम के वैश्य नागदत्त और सुमति की पुत्री निर्नामा के रूप में जन्म लिया था। चारणचरित वन में पिहितास्रव मुनि से पूछा कि वह दरिद्र कुल में क्यों जन्मी। मुनि ने उसकी कथा सुनाई।
श्लोक 134 से 141 निर्नामा का पूर्व कर्म
मुनि ने बताया कि निर्नामा पूर्व में पलालपर्वत ग्राम में पटेल देविलमाम और सुमति की पुत्री धनश्री थी। उसने समाधिगुप्त मुनि के पास मृत कुत्ते का शव डालकर अपमान किया। मुनि के उपदेश पर क्षमा माँगी, जिससे थोड़ा पुण्य मिला और वह मनुष्य योनि में दरिद्र कुल में जन्मी। मुनि ने जिनेंद्रगुणसंपत्ति और श्रुतज्ञान व्रत लेने को कहा।
श्लोक 142 से 151 व्रतों का स्वरूप
मुनि ने कहा कि अनशन तप कर्म नष्ट करता है। जिनेंद्रगुणसंपत्ति व्रत में तीर्थंकर के 63 गुणों (16 कारण भावनाएँ, 5 कल्याणक, 8 प्रातिहार्य, 34 अतिशय) के लिए 63 उपवास होते हैं। श्रुतज्ञान व्रत में ज्ञान के 158 भेदों (28 मतिज्ञान, 11 अंग, आदि) के लिए 158 उपवास होते हैं। इनका फल केवलज्ञान और स्वर्ग है।
श्लोक 152 से 161 मुनि सम्मान और स्वर्ग
मुनि ने कहा कि उनका अपमान दुःख देता है—वचन से गूँगापन, मन से स्मृति नाश, शरीर से तिरस्कार होता है। निर्नामा ने व्रत लेकर स्वर्ग प्राप्त किया, ललितांगदेव की स्वयंप्रभा बनी, फिर यहाँ श्रीमती हुई। वह ललितांग का अन्वेषण कर रही है, इसलिए मौन है।
श्लोक 162 से 171 श्रीमती की व्यथा और अनुरोध
श्रीमती ने कहा कि ललितांग उसके मन में बसा है। उसका दिव्य शरीर न होने पर भी वह स्मृति में है। वह उसकी प्राप्ति के बिना कृश है। अश्रु उसकी खोज के लिए बह रहे हैं। उसने पंडिता से ललितांग को खोजने को कहा, उसे चित्रपट बनाकर दिया, जिसमें गूढ़ विषय हैं।
श्लोक 172 से 181 पंडिता का आश्वासन और चैत्यालय
श्रीमती ने कहा कि चित्रपट से धूर्तों को लज्जित करें। पंडिता ने हास्य के साथ आश्वासन दिया कि वह ललितांग को खोजेगी। वह चित्रपट लेकर महापूत जिनमंदिर गई, जो रत्न-शिखरों, चित्रित दीवालों, और ऊँचे शिखरों से शोभित था।
श्लोक 182 से 191 चैत्यालय का वर्णन और पंडिता की परीक्षा
चैत्यालय मुनियों के स्तोत्र, पताकाओं, धूम, और ताराओं से सुशोभित था। वह महाकाव्य और हाथी समान था। पंडिता ने जिनेंद्र वंदना की और चित्रशाला में चित्रपट फैलाकर लोगों की परीक्षा शुरू की। वह गंभीर भाव से उत्तर देती रही।
श्लोक 192 से 201 वज्रदंत का दिग्विजय और वैभव
वज्रदंत दिग्विजय से लौटा। 32,000 राजाओं ने उसका अभिषेक किया। वह पुण्य से पूज्य, अनुपम शरीर, सौम्य मुख, और सुंदर नेत्रों वाला था। उसके पाँवों में शंख-चक्र चिह्न थे। वह लक्ष्मी, सरस्वती धारण करता था, कीर्ति लोक में फैली थी।
श्लोक 202 से 208 वज्रदंत का शासन
वज्रदंत के 14 महारत्न और 9 निधियाँ थीं। वह छह खंडों का पालन करता हुआ भोग भोगता रहा। दिग्विजय कर वह इंद्र समान नगर में लौटा, पर श्रीमती के विवाह की चिंता रही। उसने समुद्र, पर्वत, और नदियाँ जीतीं, जिनशासन का पालन किया।
आदिपुराण पर्व 7 – श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन
श्लोक 1 से 11 वज्रदंत का श्रीमती को उपदेश
चक्रवर्ती वज्रदंत ने शोकग्रस्त श्रीमती को बुलाकर उपदेश दिया कि शोक और मौन छोड़कर स्नान, अलंकार, भोजन करे और सखियों से बात करे, क्योंकि उसका पति शीघ्र मिलेगा। यशोधर के केवलज्ञानोत्सव से उन्हें अवधिज्ञान मिला, जिससे वे श्रीमती, स्वयं, और उसके पति के पूर्वभव जानते हैं। पाँचवें भव में वे पुंडरीकिणी नगरी में चंद्रकीर्ति थे, जयकीर्ति उनका मित्र था। गृहस्थ के रूप में राज्य भोगकर समाधि से माहेंद्र स्वर्ग में देव बने।
श्लोक 12 से 21 चंद्रकीर्ति और जयकीर्ति का पुनर्जन्म
माहेंद्र स्वर्ग में वे और जयकीर्ति सामानिक देव बने। वहाँ से च्युत होकर पुष्कर द्वीप के रत्नसंचय नगर में श्रीधर के पुत्र श्रीवर्मा (बलभद्र) और विभीषण (नारायण) बने। श्रीधर ने दीक्षा ली और सिद्ध हुए। माता मनोहरा ने व्रत कर स्वर्ग में ललितांगदेव बनी। विभीषण की मृत्यु पर ललितांगदेव ने श्रीवर्मा को शोक छोड़ने का उपदेश दिया।
श्लोक 22 से 32 श्रीवर्मा का वैराग्य और ललितांग का जन्म
श्रीवर्मा ने युगंधर मुनि से 5,000 राजाओं के साथ दीक्षा ली, सिंहनिष्क्रीडित और सर्वतोभद्र तप कर अच्युत स्वर्ग में इंद्र बने। वहाँ उन्होंने माता ललितांग का सत्कार किया। ललितांग च्युत होकर गंधर्वपुर में वासव और प्रभावती का पुत्र महीधर बना। वासव और प्रभावती ने तप कर मोक्ष और स्वर्ग प्राप्त किया। महीधर विद्याओं में निपुण हुआ।
श्लोक 33 से 41 महीधर का वैराग्य और अजितंजय का जन्म
वज्रदंत (अच्युत इंद्र) ने प्रभाकरी नगरी में महीधर को उपदेश दिया कि वह उनकी माता का जीव है और भोगों से विरक्त हो। महीधर ने राज्य पुत्र को सौंपकर जंगनंदन मुनि से दीक्षा ली, कनकावली तप कर प्राणत स्वर्ग में इंद्र बना। वहाँ से च्युत होकर अयोध्या में जयवर्मा और सुप्रभा का पुत्र अजितंजय हुआ।
श्लोक 42 से 54 अजितंजय का चक्रवर्तित्व और पिहितास्रव
जयवर्मा ने दीक्षा ले अभिनंदन मुनि से मोक्ष प्राप्त किया। सुप्रभा ने रत्नावली व्रत कर स्वर्ग गयी। अजितंजय चक्रवर्ती बना और अभिनंदन की वंदना से पिहितास्रव नाम पाया। वज्रदंत ने उसे भोगों से विरक्ति का उपदेश दिया। पिहितास्रव ने मंदिरस्थविर से दीक्षा ली और श्रीमती को व्रत दिए थे।
श्लोक 55 से 71 ललितांग और युगंधर का परिचय
वज्रदंत ने बताया कि 22वाँ ललितांग (महाबल) श्रीमती का पति था, जो स्वयंबुद्ध के उपदेश से देव बना और अब मनुष्यलोक में है। अच्युत स्वर्ग में उन्होंने ब्रह्मेंद्र, लांतव इंद्रों, और ललितांग-स्वयंप्रभा को युगंधर का चरित्र सुनाया। वत्सकावती देश के सुसीमा नगर में प्रहसित और विकसित विद्वान् थे, जो अजितंजय के मंत्री अमितमति के पुत्र और मित्र थे। दोनों ने मतिसागर मुनि से जीवतत्त्व पूछा और अभाव का तर्क दिया।
श्लोक 72 से 82 जीवतत्त्व का निरूपण
मतिसागर ने प्रहसित और विकसित के तर्क का खंडन किया कि अनुपलब्धि से जीव का अभाव नहीं सिद्ध होता, क्योंकि सूक्ष्म, दूरवर्ती पदार्थ भी उपलब्ध नहीं होते, पर उनका अस्तित्व है। पितामह को न देखने पर भी उनका सद्भाव मानते हैं। जीव शब्द संज्ञावाचक है, अतः जीव का अस्तित्व है। दोनों ने तप कर महाशुक्र स्वर्ग में इंद्र और प्रतींद्र बने, फिर पुंडरीकिणी में महाबल और अतिबल बने।
श्लोक 83 से 91 महाबल का आध्यात्मिक पथ
महाबल ने अतिबल की मृत्यु पर समाधिगुप्त से दीक्षा ली, प्राणत स्वर्ग में इंद्र बना। वहाँ से प्रभाकरी नगरी में महासेन और वसुंधरा का पुत्र जयसेन बना, चक्रवर्ती हुआ, दीक्षा ली, और ग्रैवेयक में अहमिंद्र बना। फिर रत्नसंचय नगर में अजितंजय और वसुमती का पुत्र युगंधर बना, जो तीर्थंकर हुआ।
श्लोक 92 से 102 युगंधर की महिमा और श्रीमती का जवाब
युगंधर ने 66 सागर तक सुख भोगकर अरहंत पद पाया। वे तीर्थंकर हैं, जो भव्यों को विकसित करते हैं। उनके चरित्र से कई जीव सम्यग्दर्शी बने। श्रीमती ने कहा कि वह पिहितास्रव की पूजा और विहार याद करती है, पर ललितांग के जन्म का पता नहीं। वज्रदंत ने बताया कि वे अच्युत से च्युत हो वज्रदंत बने।
श्लोक 103 से 111 वज्रदंत का श्रीमती को आश्वासन
वज्रदंत ने श्रीमती को बताया कि जब उनकी आयु में 50,000 पूर्व वर्ष बाकी थे, वे स्वर्ग से च्युत हुए। श्रीमती और ललितांग भी च्युत होकर इस देश में राजपुत्र और राजपुत्री बने। तीसरे दिन श्रीमती का ललितांग (वज्रजंघ) से मिलन होगा, और पंडिता आज समाचार लाएगी। ललितांग उनकी बुआ का पुत्र है। वज्रदंत मामी को लाने गए, तभी पंडिता प्रसन्न मुख से आई और श्रीमती से बोली।
श्लोक 112 से 121 पंडिता की खोज और वज्रजंघ का आगमन
पंडिता ने श्रीमती को बताया कि उसका मनोरथ पूर्ण हुआ। वह चित्रपट लेकर महापूत जिनalay गई, जहाँ मूर्ख लोग अर्थ न समझ सके। वासव और दुर्दांत ने झूठ बोला कि वे श्रीमती के पति हैं, पर गूढ़ प्रश्नों में चुप हो गए। फिर वज्रजंघ आया, जिनमंदिर की पूजा कर चित्रशाला में प्रवेश किया। उसने चित्रपट को देखा और कहा कि यह उसका पूर्वभव लगता है।
श्लोक 122 से 131 वज्रजंघ का चित्रपट विश्लेषण
वज्रजंघ ने चित्र की प्रशंसा की—यह मनोहर, रेखाओं से सुसंगत, और उसके पूर्वभव (ललितांग और स्वयंप्रभा) को दर्शाता है। उसने ऐशान स्वर्ग, श्रीप्रभविमान, कल्पवृक्ष, सरोवर, और स्वयंप्रभा के साथ क्रीड़ा देखी। स्वयंप्रभा का प्रणय-कोप, ताड़न, और नम्रता चित्रित थी, साथ ही अच्युत इंद्र से भेंट और पिहितास्रव की पूजा भी।
श्लोक 132 से 141 वज्रजंघ की स्मृति और मूर्छा
वज्रजंघ ने कहा कि कुछ घटनाएँ—स्वयंप्रभा का कर्णफूल से ताड़न, पैर की छाप, और कपोल पर पत्र-रचना—चित्र में नहीं हैं। उसने निश्चय किया कि यह स्वयंप्रभा का कौशल है। सोचते हुए वह मूर्छित हो गया। पंडिता और मूर्तियों को भी दुख हुआ। परिचारकों ने उसे सचेत किया, पर उसका चित्त श्रीमती में लगा रहा। उसने पंडिता से चित्र के रचयिता के बारे में पूछा।
श्लोक 142 से 151 पंडिता का वज्रजंघ को जवाब
पंडिता ने बताया कि श्रीमती, वज्रदंत की पुत्री, ने चित्र बनाया। वह सुंदर, यौवनवती, और दुर्लभ है। उसके कटाक्ष, मुख, चरण, और कर्णफूल की प्रशंसा की। श्रीमती वज्रजंघ को खोज रही है। वज्रजंघ ने कहा कि कर्मों का उदय अद्भुत है, जो जन्मांतर से मिलन कराता है।
श्लोक 152 से 162 चित्रों का आदान-प्रदान और श्रीमती की प्रसन्नता
वज्रजंघ ने अपना चित्र पंडिता को देकर चित्रपट लिया, जो रेखाओं और भावों से स्पष्ट था। वह चला गया, और पंडिता श्रीमती के पास आई। श्रीमती ने चित्र देखकर सुख की साँस ली, जैसे चातकी मेघ, हंसी किनारा, या कोयल आमवन देखकर प्रसन्न होती है। उसकी आकुलता दूर हुई।
श्लोक 163 से 173 पंडिता का श्रीमती को आश्वासन
पंडिता ने कहा कि श्रीमती शीघ्र वज्रजंघ से मिलेगी। वज्रजंघ का चित्त उसमें लगा था; वह दरवाजे पर रुका, स्खलित हुआ, और कामज्वर के लक्षण दिखाए। वह वज्रदंत का भानजा है, गुणी और योग्य वर है। श्रीमती लक्ष्मी-सरस्वती से श्रेष्ठ है, और उसके साथ सुख भोगेगी।
श्लोक 174 से 181 वज्रदंत और वज्रबाहु का मिलन
पंडिता ने श्रीमती को सुखी किया, पर वह वज्रजंघ की प्राप्ति तक निराकुल न हुई। वज्रदंत वज्रबाहु को ले आए। दोनों ने प्रीति से कुशल पूछी। वज्रदंत ने अतिथियों का सत्कार किया, जिससे वज्रबाहु प्रसन्न हुआ।
श्लोक 182 से 191 वज्रदंत और वज्रबाहु का संवाद
वज्रदंत ने वज्रबाहु से कहा कि वे जो चाहें ले लें। वज्रबाहु ने कहा कि उनके पास सब है; वज्रदंत की प्रीति ही पर्याप्त है। धन नष्ट होता है, पर स्नेह अमर है। वे परोपकारी पुरुषों की तरह धन धारण करते हैं।
श्लोक 192 से 201 श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह प्रस्ताव
वज्रबाहु ने धन न माँगकर श्रीमती को वज्रजंघ के लिए माँगा, जो भानजा, उच्चकुलजात, और योग्य है। वज्रदंत ने स्वीकार किया कि दोनों का प्रेम जन्मांतर से है, और उनका समागम चंद्र-चाँदनी समान होगा।
श्लोक 202 से 211 विवाह की स्वीकृति और उत्साह
वज्रदंत ने कहा कि श्रीमती और वज्रजंघ का विवाह पहले से नियत था। वज्रबाहु अत्यंत प्रसन्न हुआ, वसुंधरा को हर्ष हुआ, और सभी ने विवाह की प्रशंसा की। दोनों सुंदर थे, मानो कामदेव और रति। नगर और राजमहल शोभायमान हुए। विश्वकर्मा ने रत्न-सुवर्ण से मंडप बनाया, जिसमें सुवर्ण खंभे और रत्न तलकुंभ थे।
श्लोक 212 से 221 विवाह मंडप का वर्णन और पूजा
मंडप में स्फटिक दीवारें, नील रत्न भूमि, मोती मालाएँ, पद्मराग वेदी, और सफेद शिखर थे। गोपुर-द्वार और भीतरी दरवाजा रत्नों से बना था। वज्रदंत ने महापूत चैत्यालय में कल्पवृक्ष पूजा की। शुभ मुहूर्त में नगर सजा, चंदन-पुष्प बिखरे, और वधू-वर का अभिषेक हुआ।
श्लोक 222 से 231 विवाह समारोह का प्रारंभ
शंख-दुंदुभि बजे, सभी नृत्य करते थे। वारांगनाएँ और नगरवासी पुष्प-अक्षत से आशीष देते थे। दोनों ने रेशमी वस्त्र, चंदन तिलक, और मोती हार धारण किए।
श्लोक 232 से 241 वर-वधू का अलंकरण
दोनों ने पुष्पमाला, कर्णभूषण, कड़े, करधनी, और नुपूर पहने। लक्ष्मीमती और वसुंधरा ने उन्हें सजाया। रत्न-वेदी पर बैठे, वे मेरु तट समान शोभायमान हुए।
श्लोक 242 से 251 पाणिग्रहण और उत्सव
नगाड़े बजे, वारांगनाएँ गीत-नृत्य करती थीं। वज्रदंत ने शृंगार धारण किया। वज्रजंघ ने श्रीमती का पाणिग्रहण किया; दोनों के स्पर्श से संताप दूर हुआ। श्रीमती कल्प-लता समान शोभायमान हुई।
श्लोक 252 से 261 विवाह की प्रशंसा
श्रीमती और वज्रजंघ रति-कामदेव समान थे। लोग श्रीमती को लक्ष्मीमती कहते थे। दर्शक आनंदित हुए, वज्रदंत और वसुंधरा की प्रशंसा की। दोनों के पूर्व पुण्य का फल यह विवाह था।
श्लोक 262 से 271 पुण्य और धर्म की महिमा
लोगों ने कहा कि धर्म, तप, दान, और पूजा से यह फल मिला। अरहंत पूजा संपदा देती है। वज्रजंघ ने अगले दिन दीपक जलाकर महापूत चैत्यालय में पूजा की।
श्लोक 272 से 281 वज्रजंघ की जिन पूजा
वज्रजंघ और श्रीमती ने चैत्यालय की प्रदक्षिणा दी। वज्रजंघ ने ईर्यापथशुद्धि, मुनि दर्शन, और जिन प्रतिमा की पूजा की। उसने जिनेंद्र की स्तुति की—वे कर्म-विजेता, गुणों से युक्त, और भक्ति से कल्याणकारी हैं।
श्लोक 282 से 291 जिन गुणों की स्तुति
वज्रदंत ने कहा कि जिन धर्मोपदेश से चातकों को आनंदित करते हैं, मोक्षमार्ग दिखाते हैं, वैभव छोड़ मुक्ति पाते हैं, और तप से कर्म नष्ट करते हैं। उनकी दया से संसार नहीं बढ़ता।
श्लोक 292 से 301 जिन प्रातिहार्यों का वर्णन
जिन के प्रातिहार्य—अशोकवृक्ष, पुष्पवृष्टि, दिव्य ध्वनि, चमर, सिंहासन, भामंडल, दुंदुभि, छत्र—शोभायमान हैं। ये वैराग्य को नहीं रोकते।
श्लोक 302 से 311 जिन चरणों की शक्ति
जिन चरणों के स्मरण से हाथी, सिंह, अग्नि, सर्प, लुटेरे, समुद्र, रोग, और बंधन शांत होते हैं।
श्लोक 312 से 318 स्तुति समापन और राज्य
वज्रजंघ ने जिन को तीनों लोकों का स्वामी, गुरु, और तीर्थंकर कहा। भक्ति की याचना की। मुनियों की पूजा कर, श्रीमती के साथ पुंडरीकिणी नगरी में प्रविष्ट हुआ। 32,000 राजाओं ने उसका राज्याभिषेक किया। वह भोग भोगता रहा।
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन
श्लोक 1 से 12 वज्रजंघ और श्रीमती का भोग जीवन
विवाह के बाद वज्रजंघ ने चक्रवर्ती भवन में श्रीमती के साथ भोगोपभोगों का आनंद लिया। श्रीमती के स्पर्श और सौंदर्य से उसे प्रसन्नता मिलती थी। वह उसके मुख-कमल से कभी तृप्त न होता था। उसके कटाक्ष और मधुर भाषण ने उसका चित्त वश में किया। वह उसके पतली कमर, त्रिवलि-युक्त उदर, और नितंब पर रमण करता था। श्रीमती की भुजाओं और शरीर ने उसकी पांचों इंद्रियों को संतुष्ट किया।
श्लोक 13 से 21 प्रणय और क्रीड़ा
श्रीमती का कटिभाग अन्य पुरुषों को अप्राप्य था। प्रणय-कोप में वह वज्रजंघ के केश खींचती और कर्णोत्पल से ताड़न करती थी, जिससे उसे सुख मिलता था। रति-श्रम को झरोखे की वायु शांत करती थी। श्रीमती का मुख, नेत्र, और स्तन उसे आनंद देते थे। वह उद्यानों और लतागृहों में क्रीड़ा करता था।
श्लोक 22 से 31 जलक्रीड़ा और भोग
वज्रजंघ और श्रीमती नदीतट और बावड़ी में जलक्रीड़ा करते थे। वह पिचकारी से श्रीमती के मुख पर जल डालता था, और उसके स्तन भीगकर शोभायमान होते थे। धारागृह और रत्नमयी छतों पर चाँदनी में क्रीड़ा करते थे। दोनों स्वर्ग से बढ़कर भोगों में समय व्यतीत करते थे।
श्लोक 32 से 41 परिवार और विदाई
वज्रजंघ की बहन अनुंधरी का विवाह अमिततेज से हुआ। वज्रदंत ने वधू-वर को धन देकर विदा किया। पुरवासियों ने उनके प्रस्थान पर शोक किया। वज्रजंघ श्रीमती के साथ उत्पलखेटक नगर पहुँचा।
श्लोक 42 से 51 उत्पलखेटक में प्रवेश
नगर में उत्सव हुए। पुरसुंदरियों ने फूल बरसाए, प्रजाजन आशीर्वाद देते थे। वज्रजंघ राजभवन में श्रीमती के साथ सुख से रहा। पंडिता सखी उसे विनोद से प्रसन्न रखती थी। उनके 98 पुत्र हुए।
श्लोक 52 से 61 वज्रबाहु का वैराग्य
वज्रबाहु ने बादल के विलीन होने से वैराग्य पाया। उन्होंने राज्य वज्रजंघ को सौंपकर यमधरमुनि से दीक्षा ली। श्रीमती के 98 पुत्रों ने भी दीक्षा ली। वज्रबाहु ने केवलज्ञान प्राप्त कर मोक्ष पाया। वज्रजंघ भोग भोगता रहा।
श्लोक 62 से 71 वज्रदंत का वैराग्य
वज्रदंत ने कमल में मरे भ्रमर को देखकर वैराग्य पाया। उन्होंने विषयों को विषम, शरीर को क्षणभंगुर, और लक्ष्मी को चंचल माना। भोग संताप देते हैं, आयु नष्ट होती है।
श्लोक 72 से 82 संसार की अनित्यता
वज्रदंत ने यमराज को शत्रु, वृद्धावस्था को सेना, और विषयों को दुःखदायक कहा। संसार में सुख अल्प, दुःख अधिक है। विषय अर्जन, भोग, और वियोग में दुःख देते हैं। उन्होंने राज्य अमिततेज को देना चाहा, पर वह तैयार न हुआ।
श्लोक 83 से 91 वज्रदंत की दीक्षा
वज्रदंत ने राज्य पुंडरीक को सौंपा और गुणधर मुनि से 60,000 रानियों, 20,000 राजाओं, 1,000 पुत्रों, और पंडिता के साथ दीक्षा ली। लक्ष्मीमती और अनुंधरी शोकग्रस्त हुईं। प्रजा पुंडरीक को लेकर नगर लौटी।
श्लोक 92 से 104 लक्ष्मीमती का संदेश
लक्ष्मीमती ने राज्य की रक्षा के लिए वज्रजंघ को संदेश भेजा। उन्होंने चिंतागति और मनोगति को बुलाकर कहा कि वज्रदंत दीक्षित हो गए, पुंडरीक बालक है, राज्य संकट में है। दोनों विद्याधर आकाशमार्ग से उत्पलखेटक पहुँचे।
श्लोक 105 से 118 संदेश प्राप्ति और प्रस्थान का निर्णय
चिंतागति और मनोगति राजमंदिर पहुँचे, वज्रजंघ को प्रणाम कर भेंट और पत्र सौंपा। वज्रजंघ ने पत्र पढ़कर वज्रदंत और उनके पुत्रों की दीक्षा पर विस्मय किया। उन्होंने पुंडरीक के राज्यभार और लक्ष्मीमती की सहायता की माँग को समझा। श्रीमती को दुःख हुआ, पर वज्रजंघ ने उसे समझाया और पुंडरीकिणी पुरी जाने का निश्चय किया। विद्याधरों को सम्मानित कर आगे भेजा और प्रस्थान की तैयारी शुरू की।
श्लोक 119 से 135 प्रस्थान की तैयारियाँ
मंत्री, सेनापति आदि ने वज्रजंघ को घेरा। उसने उसी दिन प्रस्थान किया। कर्मचारियों में कोलाहल हुआ। वज्रजंघ ने सेवकों को हथिनियाँ, घोड़े, पालकियाँ, दासियाँ, सेना के लिए डेरे, भोजनशाला, और सुरक्षा की व्यवस्था करने के निर्देश दिए। ज्योतिषियों से शुभ मुहूर्त पूछा।
श्लोक 136 से 151 सेना का प्रस्थान और मार्ग
चौक सैनिकों से भर गया। छत्रों और पताकाओं से आकाश ढक गया। धूल और मद से पृथ्वी शांत हुई। सेना नदी समान शोभायमान हुई। भ्रमर हाथियों के मद में लीन हुए। मार्ग में वृक्ष सत्कार करते दिखे। सेना शष्प सरोवर पर पहुँची।
श्लोक 152 से 161 शष्प सरोवर पर विश्राम
सरोवर पीला और शीतल था, हरे वनों से घिरा। लहरें और पक्षी सेना को बुलाते थे। सेना तट पर ठहरी। निर्बल प्राणी डरकर भागे। सैनिकों ने वृक्षों को कल्पवृक्ष-सा सजाया। स्त्रियाँ स्नान करती शोभायमान हुईं। तंबू वनलक्ष्मी के भवन समान लगे।
श्लोक 162 से 171 सेना का ठहराव और मुनियों का आगमन
घोड़े और हाथी शोभायमान हुए। वज्रजंघ डेरे में पहुँचे। दमधर और सागरसेन मुनि वहाँ आए। वज्रजंघ ने उनकी कांति देखकर पादप्रणाम किया और श्रीमती के साथ भोजनशाला में उनकी सेवा की।
श्लोक 172 से 184 मुनियों की पूजा और पूर्वभव
वज्रजंघ ने मुनियों को आहार दिया, जिससे पंचाश्चर्य (रत्न-पुष्पवर्षा आदि) हुए। कंचुकी ने बताया कि मुनि उनके पुत्र हैं। वज्रजंघ ने धर्म सुना और पूर्वभव पूछा। दमधर मुनि ने बताया कि वज्रजंघ चौथे भव में श्रीषेण का पुत्र था, दीक्षा ली पर भोगों में मृत्यु पाई, फिर महाबल और ललितांगदेव हुआ, अब वज्रजंघ है।
श्लोक 185 से 201 श्रीमती और मंत्रियों का पूर्वभव
श्रीमती धातकीखंड में गृहस्थ पुत्री थी, फिर निर्नामिका हुई, उपवास किए, स्वयंप्रभा बनी, अब श्रीमती है। वज्रजंघ ने मंत्रियों का पूर्वभव पूछा। दमधर ने बताया कि मतिवर प्रभाकरी नगरी में अतिग्रंथ राजा था, नरक गया, व्याघ्र हुआ। प्रीतिवर्धन ने मुनिदान के लिए नगर सजाया, जिससे मुनि वहाँ आए।
श्लोक 202 से 211 मतिवर के पूर्वभव और सिंह की समाधि
पिहितास्रव मुनि ने प्रीतिवर्धन के घर आहार लिया। राजा ने दान दिया, जिससे रत्नवर्षा हुई। सिंह (अतिगृंध्र का जीव) ने यह देखकर जाति-स्मरण पाया, शांत हुआ, और समाधि में बैठ गया। मुनि ने प्रीतिवर्धन को बताया कि यह सिंह भविष्य में चक्रवर्ती और मोक्ष पाएगा। राजा ने सेवा की, मुनि ने नमस्कार मंत्र सुनाया। सिंह ने 18 दिन उपवास कर दिवाकरप्रभ देव बना। प्रीतिवर्धन के सहयोगी भी शांत हुए।
श्लोक 212 से 221 मंत्रियों के पूर्वभव
सेनापति, मंत्री, पुरोहित ने दान की अनुमोदना की, उत्तरकुरु में आर्य हुए, फिर स्वर्ग में देव बने—कनकाभ, प्रभंजन, प्रभाकर। ये ललितांगदेव के परिवार में थे। सिंह का जीव मतिवर, प्रभाकर का अकंपन, कनकप्रभ का आनंद, और प्रभंजन का धनमित्र बना। वज्रजंघ और श्रीमती धर्म से प्रभावित हुए। वज्रजंघ ने चार जानवरों के निर्भय होने का कारण पूछा।
श्लोक 222 से 231 सिंह और सूकर के पूर्वभव
मुनि ने बताया कि सिंह हस्तिनापुर में उग्रसेन था, क्रोधी, राजा के भंडार लूटा, मार खाकर व्याघ्र हुआ। सूकर विजय नगर में हरिवाहन था, मान से माता-पिता का अनादर किया, खंभे से टकराकर सूकर बना।
श्लोक 232 से 241 वानर और नकुल के पूर्वभव
वानर धन्यपुर में नागदत्त था, माया से बहन के विवाह में ठगी चाही, आर्तध्यान से मरकर वानर हुआ। नकुल सुप्रतिष्ठित नगर में लोलुप हलवाई था, लोभ से ईंटें चुराईं, पुत्र को मारा, राजा ने मार डाला, नकुल बना।
श्लोक 242 से 252 भविष्य और पुंडरीकिणी यात्रा
चारों जानवरों ने दान देखकर जाति-स्मरण पाया, भोगभूमि की आयु बाँधी। वज्रजंघ आठवें भव में वृषभनाथ, श्रीमती श्रेयान्स राजा बन मोक्ष पाएँगे। वज्रजंघ हर्षित हुआ, मुनियों को नमस्कार कर डेरे लौटा। मुनि आकाशमार्ग से गए। वज्रजंघ ने शष्प सरोवर पर समय बिताया, फिर पुंडरीकिणी पहुँच लक्ष्मीमती और अनुंधरी को सांत्वना दी, राज्य निष्कंटक किया।
श्लोक 253 से 257 उत्पलखेटक में वापसी
वज्रजंघ ने प्रजा को अनुरक्त कर पुंडरीक को सिंहासन पर बैठाया, व्यवस्था मंत्रियों को सौंपी, और उत्पलखेटक लौटा। नगरवासियों ने उसकी प्रशंसा की। वह श्रीमती के साथ भोग भोगता, जैन धर्म का पालन करता रहा।
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 से 11 ऋतुओं में भोग
वज्रजंघ ने श्रीमती के साथ छह ऋतुओं में भोग भोगा। शरद में तालाबों और वनों में क्रीड़ा की, हेमंत में धूप-सुगंधित शयनागार में सुख पाया, शिशिर में आलिंगन से प्रसन्न रहा, वसंत में आम्रवनों में रमण किया, ग्रीष्म में जलक्रीड़ा और चंदन से शीतलता पाई।
श्लोक 12 से 20 वर्षा और भोग का वर्णन
ग्रीष्म में श्रीमती को शिरीष फूलों से सजाया। वर्षा में बिजली से भयभीत श्रीमती ने आलिंगन किया। मेघ, वीरबहूटी, और मयूरों ने मन मोहा। कदंब सुगंध और महल में रमण किया। नदियों के पूर से संतोष मिला।
श्लोक 21 से 31 शयनागार और मृत्यु
वज्रजंघ सुगंधित, रत्नमय शयनागार में श्रीमती के साथ शयन करता था। धूप से सुगंध बढ़ी, पर झरोखा बंद रहने से दोनों मूर्च्छित हो मृत्यु को प्राप्त हुए। शरीर निष्प्रभ हो गए। भोग ही मृत्यु का कारण बने।
श्लोक 32 से 41 उत्तरकुरु और कल्पवृक्ष
पात्रदान के पुण्य से दोनों उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे। वहाँ दस कल्पवृक्ष (मद्यांग, वादित्रांग आदि) हैं, जो मधु, वाद्य, आभूषण आदि देते हैं। मद्य रस है, नशा नहीं करता।
श्लोक 42 से 51 कल्पवृक्षों का विस्तार
मालांग से मालाएँ, दीपांग से दीपक, गृहांग से भवन, भोजनांग से चार आहार और छह रस, भाजनांग से बर्तन, वस्त्रांग से वस्त्र मिलते हैं। ये वृक्ष अनादि, स्वाभाविक फलदायी हैं।
श्लोक 52 से 61 उत्तरकुरु की शोभा
उत्तरकुरु में रत्नमयी भूमि, चार अंगुल घास, कमल तालाब, कोमल वायु, और पुष्पपराग से शोभा है। न गरमी, न वर्षा, न दुष्ट जंतु हैं। सुख सदा एकरूप रहता है।
श्लोक 62 से 71 जीवन चक्र
वहाँ आर्य जन्म लेते हैं। सात दिन शय्या पर, फिर घुटनों पर चलते, तीसरे सप्ताह बोलते, सातवें में भोग भोगते हैं। गर्भ सुखद, माता-पिता की मृत्यु जन्म के साथ होती। छींक-जँभाई से मृत्यु होती है।
श्लोक 72 से 81 सुख और समानता
आयु तीन पल्य, आहार तीन दिन में। न रोग, न शोक, न कामज्वर। सभी समान सुखी, वज्रवृषभनाराच संहनन वाले, दीर्घायु, और कांतिमान हैं।
श्लोक 82 से 91 भोगभूमि और अन्य जीव
कलाओं में कुशल, मधुर कंठ वाले जीव क्रीड़ा करते हैं। पात्रदान से मनुष्य, अपात्र दान से तिर्यंच जन्म लेते। नकुल आदि वहाँ आर्य बने। मतिवर आदि ने दीक्षा ली।
श्लोक 92 से 101 जातिस्मरण और मुनि दर्शन
मतिवर आदि स्वर्ग गए। वज्रजंघ ने कल्पवृक्ष देखते हुए सूर्यप्रभ विमान देखा, जातिस्मरण पाया। चारण मुनियों को देख प्रणाम किया, अश्रुओं से चरण धोए, प्रश्न पूछने लगा
श्लोक 102 से 111 वज्रजंघ का प्रश्न और मुनि का परिचय
वज्रजंघ ने मुनियों से उनका परिचय, आगमन का कारण पूछा, उन्हें मित्र-बंधु माना। ज्येष्ठ मुनि प्रीतिंकर ने बताया कि वह स्वयंबुद्ध मंत्री था, जिसने महाबल भव में वज्रजंघ को ज्ञान दिया। स्वयं दीक्षा ली, स्वर्ग में मणिचूल बना, फिर पुंडरीकिणी में प्रीतिंकर हुआ। छोटा भाई प्रीतिदेव संग दीक्षा ली, चारण ऋद्धि पाई। वज्रजंघ को समझाने आए।
श्लोक 112 से 121 सम्यग्दर्शन का उपदेश
मुनि ने कहा कि वज्रजंघ पात्रदान से यहाँ जन्मा, पर सम्यग्दर्शन नहीं पाया। अब उसे देने आए हैं। समय उपयुक्त है। मिथ्यात्व दूर कर सम्यग्दर्शन प्राप्त होता है। यह ज्ञान-चारित्र का मूल है।
श्लोक 122 से 132 सम्यग्दर्शन के गुण और अंग
सम्यग्दर्शन सात तत्त्वों में श्रद्धा है। इसके चार गुण (प्रशम आदि) और आठ अंग (निःशंकित आदि) हैं। यह संसार का सर्वस्व, मोक्ष की सीढ़ी, और दुर्गति रोकने वाला है।
श्लोक 133 से 141 सम्यग्दर्शन की महिमा
यह रत्नहार समान है, संसार को सांत करता है। इसे ग्रहण करने वाला उत्तम जन्म पाता, नरक-तिर्यंच से मुक्त होता। यह मोक्ष का प्रधान अंग है। वज्रजंघ को इसे स्वीकारने का उपदेश दिया।
श्लोक 142 से 151 श्रीमती को उपदेश और स्वीकृति
मुनि ने श्रीमती को सम्यग्दर्शन ग्रहण करने, स्त्री पर्याय छोड़ने को कहा। वज्रजंघ और श्रीमती ने इसे स्वीकारा, संतुष्ट हुए। सम्यग्दर्शन मोक्ष का युवराज पद देता है।
श्लोक 152 से 161 अन्य जीव और मुनियों का प्रस्थान
सिंह आदि चार जीवों ने भी सम्यग्दर्शन पाया। मुनियों ने स्पर्श कर आशीर्वाद दिया। वज्रजंघ ने प्रणाम कर विदा की। मुनि गगनगामी हो गए। वज्रजंघ उत्कंठित हुआ, मुनियों के गुणों का चिंतन किया।
श्लोक 162 से 171 साधुओं की महिमा
वज्रजंघ ने सोचा कि साधु समागम पाप नष्ट करता, कल्याण बढ़ाता है। वे परोपकारी, निःस्वार्थ, और यति हैं। प्रीतिंकर ने अपार प्रीति दिखाई।
श्लोक 172 से 181 गुरु की महत्ता
प्रीतिंकर महाबल में स्वयंबुद्ध, अब गुरु बने। गुरु बिना गुण नहीं, संसार नहीं तिरता। वज्रजंघ की सम्यक्त्व भावना दृढ़ हुई। श्रीमती की भी। तीन पल्य काल बीता।
श्लोक 182 से 191 स्वर्ग में जन्म
दोनों ऐशान स्वर्ग गए। वज्रजंघ श्रीधर, श्रीमती स्वयंप्रभ बने। सिंह चित्रांगद, शूकर मणिकुंडली, वानर मनोहर, नकुल मनोरथ बने। पुण्य से स्वर्ग मिला।
श्लोक 192 से 195 स्वर्गीय भोग
छहों जीव ललितांगदेव समान भोग भोगते हैं। श्रीधर को देवांगनाएँ चरण दबातीं, कटाक्ष बाण चलातीं। वह संतुष्ट रहता था।
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन
श्लोक 1 से 11 श्रीधरदेव का गुरु दर्शन और प्रश्न
श्रीधरदेव को अवधिज्ञान से पता चला कि गुरु प्रीतिंकर को केवलज्ञान प्राप्त हुआ। वह श्रीप्रभ पर्वत पर उनकी पूजा करने गया, नमस्कार किया, और पूछा कि महाबल भव के तीन मिथ्यादृष्टि मंत्री कहाँ हैं। प्रीतिंकर ने बताया कि श्रीधर के स्वर्ग जाने और उनकी दीक्षा के बाद, तीनों दुर्गति को प्राप्त हुए—महामति और संभिन्नमति निगोद में, शतमति नरक में।
श्लोक 12 से 21 शतमति की दुर्गति और धर्म-अधर्म
शतमति दूसरी नरक में दुःख भोग रहा है। पाप से अधर्म और धर्म से सुख मिलता है। विषयासक्ति से पाप बढ़ता है, जो अधोगति का कारण बनता है। नरक का दुःख और कारण जानने के लिए श्रीधर को सुनने को कहा।
श्लोक 22 से 31 नरक के कारण और पृथ्वियाँ
हिंसा, झूठ, चोरी, व्यभिचार, मिथ्यात्व आदि पापों से जीव नरक जाते हैं। जलचर, सर्प, पक्षी, सिंह, स्त्रियाँ, और मनुष्य क्रमशः सात पृथ्वियों (रत्नप्रभा आदि) तक जाते हैं।
श्लोक 32 से 41 नरक में जन्म और पीड़ा
सात पृथ्वियों के नाम घर्मा आदि हैं। नारकी छत्ते जैसे स्थानों में जन्मते हैं, तीक्ष्ण हथियारों पर गिरते हैं, गरमी से उछलते हैं। क्रोधी नारकी उनके टुकड़े करते हैं, जो फिर जुड़ जाते हैं। असुरकुमार बैर बढ़ाते हैं।
श्लोक 42 से 51 नरक की यातनाएँ
गीध और कुत्ते शरीर चीरते हैं। खौलती धातुएँ पिलाई जाती हैं, कोल्हू में पेलते हैं। मांसभक्षियों को उनका मांस खिलाया जाता है। परस्त्रीगामियों को तप्त लोहे की पुतलियों से आलिंगन कराया जाता है।
श्लोक 52 से 61 नरक की और यातनाएँ
नारकियों को काँटेदार सेमर वृक्षों पर चढ़ाया जाता है, भिलावे की नदी में डुबोया जाता है, अग्नि शय्या पर सुलाया जाता है। असिपत्र वन में पत्तों से शरीर छिन्न-भिन्न होता है। शूल पर चढ़ाकर घुमाते हैं।
श्लोक 62 से 71 क्रूर यातनाएँ और चिंतन
नारकियों को चोटी से पटककर मुट्ठियों से पीटा जाता है, मुद्गरों से मस्तक फोड़ा जाता है। असुरकुमार लड़ाते हैं। नारकी सोचते हैं कि यह भूमि दुरासद, अग्नि वायु असह्य, और दिशाएँ जलती हैं।
श्लोक 72 से 81 नरक का भयंकर वातावरण
ऊँट, गधे निगलने दौड़ते हैं। भयंकर पुरुष तर्जना करते हैं। गीध, कुत्ते, कौवे, और शृगाल भय बढ़ाते हैं। असिपत्र वन और वैतरणी नदी संताप देते हैं। बिल जलते हैं।
श्लोक 82 से 92 असह्य दुःख और आयु
नारकी कहाँ जाएँ, यहाँ वेदना असह्य, आयु लंबी है। मानसिक संताप मृत्यु का संशय देता है। चार पृथ्वियों में उष्ण, पाँचवीं में उष्ण-शीत, छठी-सातवीं में शीत वेदना है। बिलों की संख्या और आयु क्रमशः बढ़ती है।
श्लोक 93 से 101 नारकियों का स्वरूप
आयु एक से 33 सागर तक। शरीर की ऊँचाई सात धनुष से 500 धनुष तक। नारकी विकलांग, काले, दुर्गंधयुक्त, कठोर स्पर्श वाले हैं। भावलेश्या कापोती से कृष्ण तक होती है।
श्लोक 102 से 111 नारकियों की स्थिति और धर्म की महिमा
नारकियों की विक्रिया विकृत और एकरूप होती है। पर्याप्तक पर उन्हें विभंगावधि ज्ञान मिलता है, जिससे पूर्व बैर स्मृत होते हैं। शतबुद्धि द्वितीय नरक में दुःख भोगता है। प्रीतिंकर ने कहा कि जैन धर्म दुःखों से बचाता, सुख और मोक्ष देता है। श्रीधरदेव धर्मप्रेम से प्रेरित हुआ।
श्लोक 112 से 122 शतबुद्धि का उद्धार और पुनर्जन्म
श्रीधरदेव ने शतबुद्धि को नरक में समझाया। शतबुद्धि ने सम्यग्दर्शन ग्रहण किया, नरक से मुक्त होकर जयसेन बना, दीक्षा ली, और ब्रह्मस्वर्ग में इंद्र हुआ। श्रीधरदेव स्वर्ग से च्युत होकर सुविधि राजा बना।
श्लोक 123 से 131 सुविधि का रूप वर्णन (भाग 1)
सुविधि बाल्य से धर्मज्ञ था। उसका मुख सूर्य-चंद्र-तारों या कमल समान था। नाक लंबी, गला हार से शोभित, वक्ष रत्नों से चमकता था।
श्लोक 132 से 141 सुविधि का रूप वर्णन (भाग 2)
सुविधि दिग्गज समान था। भुजाएँ वज्र अर्गल, हथेलियाँ तारा-चिह्न युक्त, मध्य कृश, ऊरुएँ तोरण-स्तंभ, चरण लक्ष्मी-सेवित थे। यौवन में छह शत्रुओं पर विजय पाई।
श्लोक 142 से 151 सुविधि का विवाह और पुत्र
सुविधि ने मनोरमा से विवाह किया। स्वयंप्रभ (श्रीमती) उनका पुत्र केशव बना। सुविधि को पुत्र पर प्रेम था। सिंह आदि चार जीव राजपुत्र बने।
श्लोक 152 से 161 राजपुत्र और दीक्षा
चार राजपुत्र—वरदत्त, वरसेन, चित्रांगद, प्रशांतमदन—समान संपत्ति के साथ भोग भोगे। सभी ने अभयघोष संग विमलवाह जिन की वंदना कर दीक्षा ली। सुविधि श्रावक बना।
श्लोक 162 से 171 सुविधि के व्रत और स्वर्ग
गृहस्थों के बारह व्रत—पाँच अणुव्रत, तीन गुणव्रत, चार शिक्षाव्रत—वर्णित। सुविधि ने उद्दिष्टत्याग प्रतिमा धारी हो दीक्षा ली, अच्युत स्वर्ग में इंद्र बना। केशव प्रतींद्र हुआ।
श्लोक 172 से 181 अच्युतेंद्र का रूप (भाग 1)
वरदत्त आदि सामानिक देव बने। अच्युतेंद्र का शरीर सुंदर, निर्मल था। मस्तक पुष्प-सेहरा, वक्ष हार, नितंब वस्त्र से शोभित था।
श्लोक 182 से 191 अच्युतेंद्र का रूप और स्वर्ग (भाग 2)
ऊरु कदली-स्तंभ, चरण तालाब समान थे। वह 159 विमानों, 33 त्रायस्त्रिंश, 10,000 सामानिक, 40,000 आत्मरक्षक देवों से युक्त था। तीन परिषदें थीं।
श्लोक 192 से 201 अच्युतेंद्र का परिवार
चार लोकपाल, आठ महादेवियाँ, 63 वल्लभिकाएँ, कुल 2,071 देवियाँ थीं। प्रत्येक देवी 10,24,000 रूप बना सकती थी। सात कक्षाओं वाली सेना थी।
श्लोक 202 से 208 अच्युतेंद्र के भोग
अच्युतेंद्र का मैथुन और आहार मानसिक, श्वास 11 माह में एक बार था। देवांगनाएँ उसे कटाक्ष, हास्य, स्पर्श से संतुष्ट करती थीं। वह विमान में भोग भोगता, जिन पूजा करता था।
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन
श्लोक 1 से 11 अच्युतेंद्र का स्वर्ग से च्युत होना
जिनेंद्र की स्तुति से रत्नत्रय प्राप्त होता है। अच्युतेंद्र की आयु समाप्ति पर उसकी माला मुरझाई। छह माह शेष रहने पर उसने अर्हंत पूजा की और पंचपरमेष्ठियों का चिंतन कर स्वर्ग छोड़ा। वह पुंडरीकिणी नगरी में वज्रनाभि बना। वरदत्त आदि भाई और मतिवर आदि भी पुत्र बने।
श्लोक 12 से 21 वज्रनाभि और अन्यों का जन्म
मतिवर सुबाहु, आनंद महाबाहु, अकंपन पीठ, धनमित्र महापीठ बने। केशव धनदेव हुआ। वज्रनाभि का यौवन सुवर्ण समान चमका। उसका शिर बादलों से ढके पर्वत, मुख कमल, नाक सीमा रेखा समान था।
श्लोक 22 से 31 वज्रनाभि का रूप वर्णन
वक्ष लक्ष्मी-आलिंगित, कंधे क्रीड़ा-पर्वत, भुजाएँ तोरण-खंभे, नाभि में वज्र चिह्न था। कटि सरोवर, ऊरु अर्गलदंड, जंघाएँ संधि-प्रतीक, चरण कमल समान थे। उसका रूप देवांगनाओं को मोहित करता था।
श्लोक 32 से 41 वज्रनाभि की विद्या और राज्याभिषेक
वज्रनाभि ने शास्त्र और राजविद्या सीखी। लक्ष्मी-सरस्वती उस पर प्रेम करती थीं। वज्रसेन ने उसे राज्य सौंपा। पट्टबंध में वह सिंहासन पर बैठा, चमर ढुलते थे।
श्लोक 42 से 51 राज्य और वज्रसेन की दीक्षा
राज्यलक्ष्मी वज्रनाभि से बंधी। वज्रसेन ने मुकुट उसे सौंपा। लौकांतिक देवों ने वज्रसेन को दीक्षा के लिए प्रेरित किया। वज्रसेन और 1,000 राजाओं ने दीक्षा ली। वज्रनाभि राज्य और वज्रसेन तप में संतुष्ट थे।
श्लोक 52 से 62 चक्रवर्ती और तीर्थंकर
वज्रनाभि ने चक्ररत्न से पृथ्वी जीती, वज्रसेन ने कर्म जीते। धनदेव तेजस्वी रत्न बना। वज्रनाभि ने वज्रसेन से रत्नत्रय जाना, राज्य त्यागकर पुत्र वज्रदंत को राज्य देकर दीक्षा ली।
श्लोक 63 से 71 वज्रनाभि की तपस्या
अन्य राजा भी तप को गए। वज्रनाभि ने पांच महाव्रत, समिति, गुप्तियाँ धारी एकाकी विहार किया। वज्रसेन के समीप सोलह भावनाओं का चिंतन किया—शुद्ध सम्यग्दर्शन, विनय, तप आदि।
श्लोक 72 से 81 सोलह भावनाएँ और ऋद्धियाँ
वज्रनाभि ने वैयावृत्य, भक्ति, समता, छह आवश्यकों का पालन किया। सोलह भावनाओं से तीर्थंकर प्रकृति बंधी। उसे चार बुद्धि ऋद्धियाँ प्राप्त हुईं, जिनसे परभव जाना।
श्लोक 82 से 91 अन्य ऋद्धियाँ और गुणस्थान
वज्रनाभि ने दीप्त, तप्त, उग्र, घोर ऋद्धियाँ पाईं। अणिमा, रस, बल, अक्षीण ऋद्धियाँ भी मिलीं। वह उपशम श्रेणी पर चढ़ा, 10वें-11वें गुणस्थान तक पहुँचा, फिर 7वें में लौटा।
श्लोक 92 से 102 प्रायोपवेशन और परिषह
वज्रनाभि ने श्रीप्रभ पर्वत पर प्रायोपवेशन संन्यास लिया। शरीर त्यागकर निश्चल बैठे। 22 परिषह (क्षुधा, शीत आदि) सहन किये।
श्लोक 103 से 111 वज्रनाभि की तपस्या और उपशम
वज्रनाभि ने दस धर्म (क्षमा, मार्दव आदि) और बारह अनुप्रेक्षाएँ (अनित्यता, अशरण आदि) धारण कीं। वह द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर चढ़े, शुक्लध्यान पूर्ण कर 11वें गुणस्थान में पहुँचे, और वहाँ से सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र बने।
श्लोक 112 से 121 सर्वार्थसिद्धि का वर्णन
सर्वार्थसिद्धि विमान लोक के अंत से 12 योजन नीचे, जंबूद्वीप के आकार का है। यहाँ मनोरथ सिद्ध होते हैं। नीलमणि भूमि, रत्न दीवारें, इंद्रधनुष कोट, सुगंधित मालाएँ इसे शोभायमान करती हैं। वज्रनाभि यहाँ उपपाद शय्या पर प्रकट हुए।
श्लोक 122 से 131 अहमिंद्र का रूप
वज्रनाभि का दोषरहित, यौवनयुक्त शरीर क्षण में प्रकट हुआ। यह शुभ परमाणुओं से बना, चाँदनी से घिरा, हंस समान शोभायमान था। वह सिंहासन पर बैठा, पुण्य से अभिषिक्त, फूलमाला और लक्ष्मी से सुशोभित था।
श्लोक 132 से 142 अहमिंद्र की शोभा और पूजा
अहमिंद्र का स्फटिक समान शरीर, मुकुट, आभूषण, मालाएँ, वस्त्र इसे कल्पवृक्ष समान बनाते थे। वह वैक्रियक शरीर से जिन प्रतिमाओं की पूजा करता, तत्त्वचर्चा और सरोवर किनारे विहार करता था। परक्षेत्र में उनकी क्रीड़ा नहीं होती।
श्लोक 143 से 151 अहमिंद्र की प्रकृति
अहमिंद्र असूया, निंदा, ईर्ष्या से मुक्त, सुखी रहते थे। वज्रनाभि का अहमिंद्र 33 सागर आयु, समचतुरस्र, हंस समान श्वेत शरीर, दिव्य वस्त्रों से युक्त था। उसकी वेषभूषा शांत, ललित, उदात्त थी।
श्लोक 152 से 161 अहमिंद्र का जीवन
वह 33,000 वर्ष में आहार, 16 माह 15 दिन में श्वास लेता था। अवधिज्ञान से त्रसनाडी के द्रव्यों को जानता था। उसका मुख कमल, नेत्र नीलकमल, गाल चंद्रमा समान थे। उनके आठ भाई और धनदेव भी अहमिंद्र बने।
श्लोक 162 से 171 सुख का स्वरूप
अहमिंद्रों का निर्बाध सुख प्रवीचारहित था। संसार में स्त्री-संभोग सुख नहीं, आकुलता है। यह मोह, शिथिलता, तृष्णा बढ़ाता है। रोगी जैसे औषधि लेता है, वैसे कामज्वर से संतप्त जीव संभोग करता है। सच्चा सुख संतोष से मिलता है।
श्लोक 172 से 182 विषय सुख की आलोचना
विषय सुख पराधीन, बाधायुक्त, कर्मबंधक है। यह विष समान, खाज खुजलाने जैसा है। चंदन लेप से अस्थायी राहत मिलती है, पर स्थायी सुख नहीं। कुत्ते, कीड़े आदि का प्रेम सुख नहीं। यह केवल रोग प्रतिकार है।
श्लोक 183 से 191 विषय सुख की मिथ्या प्रकृति
विषयी जीव को विषय निंद्य सुख प्रतीत होते हैं। संभोग से शरीर काँपता, श्वास तीव्र होती, पसीना आता है—यह सुख नहीं। कुत्ता हड्डी चबाकर, विषयी परिश्रम को सुख मानते हैं। स्वाभाविक आह्लाद ही सुख है। स्वर्गीय सुख भी सामग्री के उपभोग से नहीं, केवल सत्ता से नहीं मिलता। यह आर्तध्यान का कारण है।
श्लोक 192 से 201 विषयों का दुःखदायी स्वरूप
विषय संग्रह, रक्षा, नाश से दुःख होता है। ये अतृप्तिकर, विनाशी हैं। ईंधन अग्नि, नदियाँ समुद्र, खारा जल प्यास नहीं मिटाते—विषय भी तृष्णा बढ़ाते हैं। हाथी, मछली, भौंरा, पतंग विषय लालसा से दुःख पाते हैं।
श्लोक 202 से 211 विषयों का चक्र और परित्याग
हरिणी भी गीतों से मरती है। पाँचों इंद्रियों के विषय दुःख देते हैं। यह जीव धन की लालसा से क्लेश, शोक, असंतोष, राग-द्वेष, कर्मबंध, नरक दुःख भोगता है। विषय चक्र से दुःख बढ़ता है। इनका त्याग करना चाहिए।
श्लोक 212 से 221 सच्चा सुख और जिन आज्ञा
तीनों वेद (स्त्री, पुरुष, नपुंसक) संताप हैं, सुख नहीं। अहमिंद्र का प्रवीचाररहित सुख श्रेष्ठ है। सिद्धों का आत्मज सुख बाधारहित, अनुपम है। पुण्य से सर्वार्थसिद्धि, पाप से नरक मिलता है। वज्रनाभि ने शम, दम, यम से तीर्थंकरत्व पाया। श्रेणिक को भी जिन आज्ञा का चिंतन करने की सलाह दी।
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 गौतम स्वामी का कथन और नाभिराज का परिचय
गौतम स्वामी ने वज्रनाभि के पृथ्वी अवतार की कथा शुरू की। मुनियों ने पूछा कि कर्मभूमि में अंतिम कुलकर नाभिराज ने ऋषभदेव को कैसे उत्पन्न किया। गौतम ने बताया कि नाभिराज भरत क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत के दक्षिण, मध्यम-आर्य खंड में हुए। वे तेजस्वी, ऐश्वर्यशाली, सूर्य समान थे।
श्लोक 12 से 21 मरुदेवी का परिचय
नाभिराज की रानी मरुदेवी इंद्राणी समान थी। उसकी कांति चंद्रमा, शरीर कृश, ओठ बिंबफल, चरण लक्षणयुक्त थे। वह नाट्य-संगीत शास्त्र का आधार, सौंदर्य से अन्य स्त्रियों को पराजित करने वाली थी। उसके चरण कमल समान, हंसिनी गति से श्रेष्ठ थे।
श्लोक 22 से 31 मरुदेवी के अंगों की शोभा
मरुदेवी के चरण नुपूरों से शोभायमान, जंघाएँ एक-दूसरे की उपमा, घुटने सुंदर, ऊरु देवांगनाओं से स्पर्धायुक्त थे। नितंब कामदेव का स्थान, कटि किला, उदर रोमपंक्ति से शोभित थी।
श्लोक 32 से 41 मरुदेवी का ऊपरी शरीर
उसके स्तन क्रीडाचल, हार से शोभित, कंठ सूक्ष्म रेखाओं वाला, भुजाएँ कल्पवृक्ष शाखा, हस्त अशोक किसलय, कंधे हंसिनी पंख समान थे। वह विधाता की सुंदर रचना थी।
श्लोक 42 से 51 मरुदेवी का मुख वर्णन
मरुदेवी का मुख चंद्रमा से श्रेष्ठ, ओठ मूंगा से सुंदर, कंठ राग प्रसिद्ध, कपोल केश धारण करने वाले, नाक सुगंधित, नेत्र कमल, कान शास्त्रालंकृत, ललाट दर्पण, भौंहें धनुष समान थे।
श्लोक 52 से 61 मरुदेवी की महिमा
उसके केश राहु समान, चोटी फूल बिखेरती थी। वह यशस्विनी, दीर्घायु, संतानवती थी। गुणों की खान, पुण्यवती, सौभाग्य सीमा, पातिव्रत्य परम थी। इंद्र ने उसका विवाह कराया। वह नाभिराज को प्रिय थी।
श्लोक 62 से 71 नाभिराज और मरुदेवी का वैवाहिक जीवन
मरुदेवी की मुसकान नाभिराज के मन को विस्तृत करती थी। नाभिराज उसे लक्ष्मी मानते थे। वह संभोग में अनुकूल थी। दोनों पुण्यवान, भोगभूमि लक्ष्मी के प्रतीक थे। इंद्र ने उनके लिए नगरी रची।
श्लोक 72 से 81 अयोध्या नगरी की रचना
देवों ने अयोध्या बनाई, जो स्वर्गपुरी समान थी। मनुष्यों को बसाया, राजमहल बनाया। यह वप्र, प्राकार, परिखा से युक्त थी। इसके नाम—साकेत, सुकोशला, विनीता—गुणों से सार्थक थे। नाभिराज-मरुदेवी ने निवास शुरू किया।
श्लोक 82 से 91 ऋषभदेव के अवतरण की तैयारी
इंद्र ने नाभिराज-मरुदेवी की पूजा की। छह माह बाद ऋषभदेव के अवतार से पहले कुबेर ने रत्नवृष्टि की। यह वर्षा इंद्रधनुष, ऐरावत सूँड, कल्पवृक्ष अंकुर, सुवर्णमयी थी। लोग इसे निधि गर्भपात मानते थे।
श्लोक 92 से 101 गर्भावतरण उत्सव
रत्नवृष्टि नक्षत्र पंक्ति, बिजली समान थी। यह गर्भावतरण से 6 माह पहले से 9 माह बाद तक चली। पृथ्वी रत्नों, फूलों, सुगंधित जल से व्याप्त, गर्भिणी समान भारी हुई। वह मरुदेवी की तरह पुष्पवती थी।
श्लोक 102 से 111 मरुदेवी के सोलह स्वप्न (भाग 1)
मरुदेवी ने शुभ स्वप्न देखे: 1) ऐरावत हाथी (गरजता बादल समान), 2) सफेद बैल (अमृत राशि समान), 3) सिंह (चंद्र-संध्या निर्मित), 4) लक्ष्मी (कमल आसन पर अभिषिक्त), 5) दो पुष्पमालाएँ (भौंरे गूंजते), 6) पूर्ण चंद्र (मुख समान), 7) उदित सूर्य (सुवर्ण कलश), 8) दो कलश (कमल ढके)।
श्लोक 112 से 121 मरुदेवी के सोलह स्वप्न (भाग 2)
9) दो मछलियाँ (नेत्र समान), 10) तालाब (सुवर्ण जल), 11) समुद्र (अट्टहास करता), 12) सुवर्ण सिंहासन (मेरु शिखर), 13) स्वर्ग विमान (प्रसूतिगृह), 14) नागेंद्र भवन (स्पर्धायुक्त), 15) रत्न राशि (पृथ्वी खजाना), 16) निर्धूम अग्नि (प्रताप)। अंत में पीला बैल उसके मुख में प्रवेश करता दिखा। वह बाजों से जगी।
श्लोक 122 से 131 बंदीजनों का मंगल पाठ
बंदीजन मंगल गीत गाते हुए मरुदेवी को जगाते हैं: प्रभात समय है, चंद्र कांतिरहित, कमल प्रफुल्लित, सारस-भौंरे स्तुति करते, चकवा-चकवी सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं।
श्लोक 132 से 141 सूर्योदय और मंगल कामना
सूर्य अंधकार नष्ट करता, संध्या प्रकट होती, कमलिनी प्रस्फुरित, कुमुदिनी म्लान होती। सूर्य पूर्व से उदित, जगत प्रकाशित। बंदीजन कहते हैं: शय्या छोड़ो, मंगलमय प्रभात हो, पुत्र तीन लोक को प्रकाशित करे।
श्लोक 142 से 153 मरुदेवी का जागरण और स्वप्न कथन
मरुदेवी स्वप्न से पहले जागी, फिर बंदीजनों ने जगाया। रोमांचित होकर स्नान-शृंगार कर नाभिराज से स्वप्न कहे: हाथी, बैल, सिंह आदि। फल सुनने की उत्सुकता व्यक्त की।
श्लोक 154 से 161 नाभिराज का स्वप्न फल
नाभिराज ने कहा: हाथी—उत्तम पुत्र, बैल—ज्येष्ठ, सिंह—बलवान, मालाएँ—तीर्थ स्थापक, लक्ष्मी—अभिषिक्त, चंद्र—आनंददायक, सूर्य—प्रभायुक्त, कलश—निधियुक्त, मछलियाँ—सुखी, सरोवर—लक्षणयुक्त, समुद्र—केवली, सिंहासन—जगद्गुरु, विमान—स्वर्गावतीर्ण, नाग भवन—अवधिज्ञानी, रत्न—गुणवान, अग्नि—कर्मदाहक, बैल—वृषभदेव गर्भ में।
श्लोक 162 से 171 गर्भावतरण और देव सेवा
मरुदेवी हर्ष से रोमांचित। वज्रनाभि सर्वार्थसिद्धि से मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण। इंद्रादि देवों ने उत्सव मनाया। दिक्कुमारियाँ सेवा करने लगीं। श्री आदि देवियों ने शोभा, लज्जा आदि गुण दिए। गर्भ शोधन हुआ। मरुदेवी स्फटिक समान शोभित। देवियाँ मंगलद्रव्य, तांबूल, स्नान आदि देतीं।
श्लोक 172 से 181 देवियों की परिचर्या
देवियाँ रेशमी वस्त्र, मालाएँ, सुगंधित विलेपन, तलवार से रक्षा, पराग झाड़ना, चंदन सींचना, रंगावली बनाना, फूल चढ़ाना, दिव्य प्रभाव से सेवा करती थीं। अदृश्य होकर माला-आहार देतीं, आकाश से रक्षा का आह्वान करतीं।
श्लोक 182 से 191 सेवा और क्रीड़ा
देवियाँ वस्त्र उठातीं, आसन देतीं, दीपक जलातीं, आरती-रक्षाबंधन करतीं। जागरण कर पहरा देतीं। जल-वनक्रीड़ा, कथा-संगीत-नृत्य से संतुष्ट करतीं। नृत्य में बिजली समान चमकतीं, धनुर्वेद सीखती प्रतीत होतीं।
श्लोक 192 से 201 देवियों का नृत्य और संगीत
देवियाँ नृत्य में चौक बिखेरतीं, स्तन कमल-बोड़ियों सा हिलते, भौंह-कटाक्ष से कामदेव अभ्यास सा। मुस्कान, गीत, फिरकी से विलासमय। गीत-नृत्य से मरुदेवी का मन उत्कंठित। वीणा बजाती देवियाँ कमलिनी सा शोभित, हाथों से मन हर्षित करतीं।
श्लोक 202 से 211 वाद्य और सेवा की शोभा
वीणाएँ ताड़न से मधुर, बाँसुरी ओठों पर, मृदंग गंभीर ध्वनि से कौशल प्रकट करते। पणव, शंख, तुरही से मंगलगान। मरुदेवी तीन लोक लक्ष्मी सा शोभित। देवियों की सेवा से उत्कृष्ट शोभा धारण।
श्लोक 212 से 221 काव्य-गोष्ठी और पहेलियाँ
नौवें माह में देवियाँ गूढ़ काव्य से प्रसन्न करतीं। चंद्रमा से मुख श्रेष्ठ, भ्रमर मरुदेवी को सूँघते। पहेलियाँ: अधर (लाल, प्रिय), करेणुका (हाथ रेखा, हस्तिनी), साल-कानन (वन, मुख)।
श्लोक 222 से 231 काव्य और प्रश्नोत्तर
अमृत भोजन, सिंह चोटी पर, पुत्र से संताप नाश। वटवृक्ष-ऋक्ष भ्रम, स्तन-विरही श्लेष। पुत्र जयवंत, कल्याणकारी। इंद्र नंदीश्वर जाते, बिंदुच्युत से हाथी-श्रुति अर्थ।
श्लोक 232 से 241 बिंदु-मात्राच्युत श्लोक
परिखा जल विविध, सिंह-शीत प्रश्न, विरही गायन। एकाक्षरच्युत: शुक, काक, लोक, श्लोक। द्वयक्षरच्युत: केकी, केसर, केतकी, केवल। कोयल, कोटर, क्रोधी, विद्वान। वीणा, कामला, कामिनी, भेरी।
श्लोक 242 से 251 प्रश्नोत्तर और चित्रबद्ध श्लोक
तुक, शुक, रुक (पुत्र, शोक, रोग)। सूप, कूप, भूप (दाल, कुआँ, राजा)। पलाल, कुलाल, बिलाव (पियाल, कुम्हार, बिल्ली)। भवति (संबोधन, क्रिया, नक्षत्र)। सुरवरद (जिनेंद्र, हाथी)। केसरी शब्द-प्रहेलिका। नानागार-विराराजित से चार उत्तर। नृत्य चित्र।
श्लोक 252 से 261 रत्नवर्षा और गर्भ शोभा
रत्नधारा से आंगन शोभित, स्वर्ग लक्ष्मी सा। पुत्र तेजस्वी, मरुदेवी संतुष्ट। गर्भ तेज से पूर्व दिशा सा, रत्न खान सा। ऋषभदेव कष्ट न देते, त्रिवलियाँ यथावत।
श्लोक 262 से 273 मरुदेवी-नाभिराज की महिमा
नाभिराज सुगंध से संतुष्ट। ऋषभदेव स्फटिक दीपक सा। मरुदेवी लक्ष्मी सा, इंद्राणी सेवा करती। तीन लोक जननी। कल्पलता-कल्पवृक्ष सा दंपत्ति। मुख कमल-चंद्र सा, नाभिराज राजहंस-तृष्णायुक्त। तेजःपुंज धारण।
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन
श्लोक 1 से 11 ऋषभदेव का जन्म
मरुदेवी ने 9 माह बाद चैत्र कृष्ण नवमी, सूर्योदय, उत्तराषाढ़ नक्षत्र में ऋषभदेव को जन्म दिया। वह तीन ज्ञानों से युक्त, गुणों में वृद्ध, तीन लोक स्वामी बालक था। दिशाएँ स्वच्छ, प्रजा हर्षित, देव आश्चर्यचकित। कल्पवृक्ष फूल बरसाते, दुंदुभि बिना बजाये बजी, पृथ्वी-समुद्र आनंदित। इंद्र ने सिंहासन कंपन से जन्म जाना, अभिषेक का विचार किया।
श्लोक 12 से 21 देवों का आगमन
देवों के मस्तक नम्र, घरों में घंटा-शंख बजे। समुद्र लहरों सा शब्द सुन देवों ने जन्म पहचाना। सौधर्मेंद्र ऐरावत पर, सेनाएँ (हाथी, रथ आदि) निकलीं। सामानिक आदि देवों ने घेरा। जय-शब्द, नृत्य, गान से कोलाहल। विमानों से आकाश व्याप्त।
श्लोक 22 से 32 अयोध्या में उत्सव
आकाश अप्सराओं से कमलिनी सा, हाथियों से मगरमच्छ सा। सेनाएँ अयोध्या पहुँची, सैनिकों ने घेरा। इंद्राणी ने प्रसूतिगृह में मरुदेवी-जिनबालक के दर्शन किए। प्रेम से प्रदक्षिणा, स्तुति: मरुदेवी तीन लोक माता। माया से नींद देकर, मायामयी बालक रख, ऋषभदेव को उठाया।
श्लोक 33 से 41 इंद्राणी का हर्ष
इंद्राणी ने स्पर्श से तीन लोक ऐश्वर्य माना। बार-बार मुख देखा, सूँघा, नेत्र प्रफुल्लित। सूर्य सा जिनबालक लेकर शोभित। दिक्कुमारियाँ अष्ट मंगलद्रव्य लिए चलीं। भगवान की दीप्ति से दीपक मंद। इंद्राणी ने इंद्र को सौंपा। इंद्र ने स्तुति की: तीन लोक ज्योति, गुरु, स्वामी।
श्लोक 42 से 51 इंद्र की स्तुति और प्रस्थान
भगवान केवलज्ञान सूर्य, भव्य कमलों को प्रबोधक। गुरुओं के गुरु, गुण समुद्र। चरणों में मस्तक धर श्रद्धा। मुक्ति स्नेह रखती, गुण बढ़ते। इंद्र ने गोद में लिया, मेरु की ओर संकेत। जय-शब्द से दिशाएँ बहरी। अप्सराएँ नृत्य करतीं, आकाश नेत्र खोले सा।
श्लोक 52 से 62 मेरु यात्रा
बादल-पताकाएँ बगुला सा। मेघ विमानों से चूर, भौंरे मद से आकृष्ट। इंद्र कांति से सूर्य फीका। ऐरावत दाँतों पर अप्सराएँ नृत्य करतीं। किन्नर संगीत, देव नेत्र-कर्ण सफल। इंद्र ने छत्र-चमर सेवा की। सौधर्मेंद्र गोद में, ऐशानेंद्र छत्र, अन्य चमर ढोते।
श्लोक 63 से 71 मेरु का वर्णन (भाग 1)
मिथ्यादृष्टि देवों में श्रद्धा। नीली मणि सीढ़ियाँ आकाश सा। ताराएँ कुमुदिनी सा। मेरु 99,000 योजन ऊँचा। चूलिका मुकुट सा, भद्रशाल धोती सा, नंदन करधनी सा, सौमनस दुपट्टा सा, पांडुक फूलों से अलंकृत।
श्लोक 72 से 81 मेरु का वर्णन (भाग 2)
चार जिनमंदिर विमानों सा। सुवर्णमय, जंबूद्वीप मुकुट सा। अभिषेक से पवित्र, चारण मुनि सेवा करते। भोगभूमियाँ रक्षित। गुफाओं में देव-धरणेंद्र। पांडुक शिलाएँ स्फटिक सा। सौधर्मेंद्र सा तुंग, विबुध सेवित। प्रदक्षिणा देकर ऋषभदेव शिखर पर विराजित।
श्लोक 82 से 91 पांडुक शिला
ऐशान दिशा में पांडुक शिला: पवित्र, रमणीय, 100x50x8 योजन, अर्धचंद्राकार। क्षीर जल से प्रक्षालित, माता सा। मुक्ताफल सा उज्ज्वल, पुष्प छिपते। सिंहासन-आसन धारण। देव पूजा, मंगल संगीत से शोभित। अष्ट मंगलद्रव्य युक्त।
श्लोक 92 से 101 अभिषेक तैयारी
शिला शीलव्रत सा, पुण्य खान। रत्न प्रकाश से इंद्रधनुष। देव-दिक्पाल शिला घेरे। सेना पांडुक वन में व्याप्त, स्वर्ग खाली सा। सौधर्मेंद्र ने सिंहासन पर ऋषभदेव को रखा। दुंदुभि बजी, अप्सराएँ नृत्य करतीं।
श्लोक 102 से 112 अभिषेक का प्रारंभ
कालागुरु धूप से पुण्य शोभा। देवों ने अर्घ्य चढ़ाया। विशाल मंडप रचना, कल्पवृक्ष मालाएँ, भ्रमर संगीत से यश गान। सौधर्मेंद्र ने प्रथम कलश, ऐशानेंद्र ने चंदन कलश उठाया। इंद्र-इंद्राणियाँ परिचर्या में। क्षीरसागर जल लाने देव निकले, भगवान के लिए योग्य माना।
श्लोक 113 से 122 कलश और जलधारा
8 योजन गहरे सुवर्ण कलशों से अभिषेक। कलश पाप नाशक, मोतियों से शोभित। इंद्र ने बहु-भुजाएँ बनाई, कल्पवृक्ष सा शोभित। सौधर्मेंद्र ने पहली जलधारा छोड़ी, कोलाहल। जलधारा आकाशगंगा सा, अन्य इंद्रों ने एक साथ जल छोड़ा, भगवान स्थिर रहे।
श्लोक 123 से 131 जल की शोभा
जल बूँदें उछलकर पापरहित सी। दिशाओं में छींटे, कर्णफूल सा। भगवान पर प्रतिबिंबित धारा भाग्यशाली सी। क्षीर जल झरना सा, स्वर्ग को पवित्र करता। भगवान ने जल, संसार को पवित्र किया। सेना क्षीरसागर में डूबी सी।
श्लोक 132 से 141 जल का प्रभाव
कमलों संग जल मेरु पर बहस सा। अशोक पल्लवों से मूँगा सा। स्फटिक सिंहासन पर स्वच्छतर। रत्न किरणों से इंद्रधनुष सा, पद्मराग से संध्या बादल सा, इंद्रनील से अंधकार सा, मरकत से हरा वस्त्र सा। आकाश हँसता सा, बूँदें स्वर्ग से फाग खेलतीं।
श्लोक 142 से 151 मेरु पर जलप्रवाह
जलप्रवाह मेरु को नापता सा, शिखरों से खकारा, गुफाओं से उगला। झरनों से स्वर्ग को धिक्कार। आकाश, ज्योतिष, पृथ्वी ढका। वनों में विश्राम, फिर फैला। वृक्षों से रुककर शीघ्र विस्तृत। मेरु को सफेद वस्त्र सा ढका, आकाशगंगा सा, शब्दाद्वैत सिद्ध करता सा।
श्लोक 152 से 161 मेरु की नव शोभा
मेरु जल से अपरिचित सा, मृणाल सा सफेद, चाँदी पर्वत सा। अमृत, स्फटिक, लक्ष्मी महल संदेह। बूँदें छत्र सा, हार-कमल सा यश प्रवाह। कर्णफूल सा, स्वर्ग तक फैला। तारे मोती सा, ओले सा।
श्लोक 162 से 171 ज्योतिष पर प्रभाव
सूर्य ठंडा, लोह गोला सा। चंद्र हंस सा तैरता। ग्रह वक्रगति में। सूर्य को चंद्र समझ तारे सेवा करते। ज्योतिश्चक्र कांतिरहित, चक्कर सा। जलप्रवाह ने मनुष्यलोक पवित्र किया, प्रजा कल्याणमय। शांत जल दिशाएँ भरा।
श्लोक 172 से 181 उत्सव का समापन
मेरु गुफाएँ रिक्त, विश्राम। धूप, दीपक प्रज्वलित। बंदीजन स्तोत्र, किन्नरी गीत। मंगल गान से कान उत्सव। नृत्य, संगीत, मृदंग ध्वनि। अप्सराएँ केसर-हार संग नृत्य। जय-घोष से मेरु स्तुति सा।
श्लोक 182 से 191 सुगंधित जल अभिषेक
वायु स्वेद चुंबन करता। द्वारपाल सभा नियंत्रित करते। सुगंधित जल से अभिषेक, धारा लज्जित सी। सुवर्ण झारी से नमस्कार सा, प्रभा से अग्नि आहुति सा। भगवान गुणों से धारा चरितार्थ।
श्लोक 192 से 201 सुगंधित जल की महिमा
श्वेत धारा रत्नत्रय संतुष्ट करे, विघ्न नाशक, मुनियों को मान्य। शांति-मंत्र पाठ। देवों ने गंधोदक लगाया, स्वर्ग ले गए। चूर्ण जल से फाग। प्रदक्षिणा, पूजा (जल, गंध, अक्षत आदि) से अमंगल नाश।
श्लोक 202 से 211 अभिषेक समापन
इंद्र-इंद्राणी ने प्रदक्षिणा, नमस्कार। फूल-अश्रु वर्षा। वायु पराग बरसाता। भगवान मेरु सा, देव कुलाचल सा। पवनकुमार भक्ति, मेघकुमार जलवृष्टि। वायु प्रदक्षिणा सा। दुंदुभि से कल्याण घोषणा।
श्लोक 212 से 216 अंतिम स्तुति
फूल वर्षा भ्रमर खींचती, लक्ष्मी नेत्र सा। देवांगनाएँ नृत्य, इंद्र-धरणेंद्र अभिषेक। वृषभनाथ जयवंत हों। सूर्य उष्णता छोड़े, चंद्र शीतल, तारे क्रीड़ा करते। जलप्रवाह सबकी रक्षा करे।
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन
श्लोक 1 से 11 इंद्राणी द्वारा भगवान का अलंकरण
अभिषेक की विधि समाप्त होने के बाद इंद्राणी देवी ने हर्ष के साथ जगद्गुरु भगवान वृषभदेव को आभूषण पहनाने का प्रयत्न किया। जिनका अभिषेक हो चुका था, ऐसे पवित्र शरीर वाले भगवान वृषभदेव के शरीर पर लगे जलकणों को इंद्राणी ने स्वच्छ और निर्मल वस्त्र से पोंछा। भगवान के मुख पर उनके कटाक्षों की सफेद छाया पड़ रही थी, जिसे इंद्राणी जलकण समझकर बार-बार पोंछ रही थी। उसने तीनों लोकों को सुगंधित करने वाले गाढ़े सुगंधित द्रव्यों से भगवान के शरीर पर विलेपन किया। यद्यपि वे द्रव्य उत्कृष्ट सुगंध से युक्त थे, फिर भी भगवान की स्वाभाविक और दूर तक फैलने वाली सुगंध ने उन्हें तिरस्कृत कर दिया। इंद्राणी ने बड़े आदर से भगवान के ललाट पर तिलक लगाया, किंतु जगत के तिलक-स्वरूप भगवान क्या उस तिलक से शोभायमान हुए? उसने भगवान के मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला से बना मुकुट पहनाया, जिससे वे कीर्ति से अलंकृत से शोभायमान हो रहे थे। यद्यपि भगवान स्वयं जगत के चूड़ामणि और सज्जनों में मुख्य थे, फिर भी इंद्राणी ने भक्ति से उनके मस्तक पर चूड़ामणि रत्न रखा। भगवान के सघन बरौनियों वाले नेत्र बिना अंजन के ही श्यामवर्ण थे, परंतु इंद्राणी ने नियोग समझकर उनके नेत्रों में अंजन का संस्कार किया। उनके दोनों कान बिना छेद के ही छिद्रयुक्त थे, जिनमें इंद्राणी ने मणिमय कुंडल पहनाए, जिससे वे ऐसे प्रतीत हो रहे थे मानो सूर्य और चंद्रमा उनकी कांति देखने आए हों। मोक्ष-लक्ष्मी के हार जैसे सुंदर मणियों के हार से त्रिलोकीनाथ भगवान वृषभदेव के कंठ की शोभा बहुत बढ़ गई थी।
श्लोक 12 से 21 आभूषणों से शोभा
बाजूबंद, कड़े और अनंत आदि से शोभायमान भगवान की दोनों भुजाएँ ऐसी प्रतीत होती थीं मानो कल्पवृक्ष की दो शाखाएँ हों। उनके कटिप्रदेश में छोटी घंटियों से सुशोभित मणिमयी करधनी ऐसी शोभायमान थी मानो कल्पवृक्ष के अंकुर हों। गोमुख आकार के चमकीले मणियों से शब्दायमान उनके दोनों चरण ऐसे शोभायमान थे मानो सरस्वती देवी उनकी सेवा कर रही हो। उस समय अनेक आभूषणों से शोभायमान भगवान ऐसे लगते थे मानो लक्ष्मी का पुंज, ऊँची शिखा वाली रत्नों की राशि, या भोग्य वस्तुओं का समूह प्रकट हुआ हो। वे अलंकारों से युक्त ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो सौंदर्य का समूह, सौभाग्य का खजाना, या गुणों का निवासस्थान हों। उनका स्वाभाविक सुंदर और संगठित शरीर अलंकारों से ऐसा शोभायमान था मानो उपमा-रूपक आदि अलंकारों से युक्त कवि का काव्य हो। इंद्राणी द्वारा उनके प्रत्येक अंग में पहनाए गए मणिमय आभूषणों से वे ऐसे शोभायमान थे मानो प्रत्येक शाखा पर आभूषणों से सुशोभित कल्पवृक्ष हों। इंद्र की गोद में बैठे भगवान को इंद्राणी ने अनेक वस्त्राभूषणों से अलंकृत किया और उनकी रूप-संपदा देखकर स्वयं आश्चर्यचकित हो गई। इंद्र ने भी उनकी रूप-शोभा देखी, पर दो नेत्रों से संतुष्ट न होने के कारण विक्रिया से सहस्राक्ष बनकर उन्हें देखा। उस समय देव और असुरों ने अपने निर्मल नेत्रों से क्षणभर के लिए मेरु के शिखामणि जैसे शोभायमान भगवान को देखा।
श्लोक 22 से 31 इंद्र की स्तुति (भाग 1)
तदनंतर इंद्र आदि श्रेष्ठ देव भगवान की स्तुति करने के लिए तत्पर हुए, जो तीर्थंकर पुरुष के प्रभाव के अनुरूप ही था। इंद्र ने कहा कि हे देव, आप हमें परम आनंद देने के लिए उदित हुए हैं, क्योंकि सूर्य के बिना कमल कभी प्रबोधित नहीं होते। हे देव, आप मिथ्याज्ञानरूपी अंधकूप में पड़े जीवों के उद्धार के लिए धर्मरूपी हाथ का सहारा देने वाले हैं। हे देव, जैसे सूर्य की किरणें अंधकार को नष्ट करती हैं, वैसे ही आपके वचनरूपी किरणों ने हमारे हृदय का अंधकार नष्ट कर दिया है। हे देव, आप देवों के आदि देव, तीनों जगत के आदि गुरु, विधाता और धर्म के नायक हैं। हे देव, आप ही जगत के स्वामी, पिता, रक्षक और नायक हैं। हे देव, जैसे धवल चंद्रमा अपनी चाँदनी से लोक को धवल करता है, वैसे ही आप अपने उत्कृष्ट गुणों से संसार को पवित्र करते हैं। हे नाथ, संसाररूपी रोग से दुःखी प्राणी आपके वचनरूपी अमृत औषधि से नीरोग होकर कल्याण प्राप्त करेंगे। हे भगवान, आपने संपूर्ण कोश नष्ट कर तीर्थंकर पद प्राप्त किया है, इसलिए आप पवित्र, दूसरों को पवित्र करने वाले और अविनाशी ज्योतिःस्वरूप हैं। हे नाथ, यद्यपि आप कूटस्थ हैं, फिर भी हमें कूटस्थ नहीं लगते, क्योंकि आपके ध्यान से होने वाले गुण निरंतर बढ़ते हैं।
श्लोक 32 से 41 इंद्र की स्तुति (भाग 2)
हे देव, आप बिना स्नान के ही पवित्र हैं, फिर भी मेरु पर आपका अभिषेक इस मलिन जगत को पवित्र करने के लिए हुआ। हे देव, आपके जन्माभिषेक से हम ही नहीं, बल्कि मेरु पर्वत, क्षीरसागर और उनके वन-जल भी पवित्र हो गए। हे देव, आपके अभिषेक के जलकण सभी दिशाओं में ऐसे शोभायमान थे मानो आपके यश का घनीभूत समूह हों। हे देव, आप बिना लेप के सुगंधित और बिना आभूषण के कांतिवान हैं, फिर भी हमने भक्ति से सुगंधित द्रव्यों और आभूषणों से आपकी पूजा की। हे भगवान, आप तेजस्वी हैं और सबसे अधिक तेज के साथ प्रकट हुए हैं, इसलिए ऐसा प्रतीत होता है मानो मेरु के गर्भ से सूर्य उदित हुआ हो। हे देव, स्वर्गावतरण में आप ‘सद्योजात’, ‘अच्युत’ और सुंदरता में ‘वामदेव’ हैं, अर्थात् आप ब्रह्मा, विष्णु और महेश हैं। जैसे शुद्ध खानि का मणि संस्कार से दैदीप्यमान होता है, वैसे ही आप जन्माभिषेक से दैदीप्यमान हो रहे हैं। हे नाथ, ब्रह्माद्वैतवादी कहते हैं कि परं ज्योति को कोई साक्षात नहीं देख सकता, पर आप प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हैं। हे देव, योगिराज आपको पुराणपुरुष, पुरु, कवि और पुराण मानते हैं। हे भगवान, आपकी आत्मा पवित्र, गुण प्रसिद्ध, और जन्म-मरण भय नष्ट करने वाले हैं, इसलिए आपको नमस्कार है।
श्लोक 42 से 51इंद्र की स्तुति (भाग 3)
हे नाथ, आप पृथ्वी के समान क्षमाशील हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप जल के समान आनंददायक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप वायु के समान परिग्रहरहित और मोह नाशक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप अग्नि के समान कर्म जलाने वाले और तेजस्वी हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप आकाश के समान व्यापक और निर्विकार हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप याजक के समान कर्म का होम करते हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप चंद्रमा के समान निर्वाणदायक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आप सूर्य के समान केवलज्ञान से प्रकाशक हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। इस प्रकार आप आठ मूर्तियों—पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, याजक, चंद्र और सूर्य—को धारण करने वाले हैं। हे नाथ, आप महाबल, ललितांग, वज्रजंघ, आर्य, श्रीधर, सुविधि, अच्युतेंद्र, वज्रनाभि, सर्वार्थसिद्धि और दशावतारचरम हैं, इसलिए आपको नमस्कार है। आपकी स्तुति से हमारी भक्ति आप में ही रहे, यही हमारा फल है।
श्लोक 52 से 61 अयोध्या प्रस्थान
इंद्रों ने परम आनंद से भगवान ऋषभदेव की स्तुति की और उत्सव के साथ अयोध्या चलने का विचार किया। मेरु से अयोध्या तक मार्ग में उत्सव हुआ, दुंदुभि बजी, जय-शब्द गूंजे, और इंद्र ने भगवान को ऐरावत पर बिठाया। देव कोलाहल, गीत, नृत्य और जय-शब्दों के साथ आकाश को लाँघकर अयोध्या पहुँचे। वहाँ के गोपुर-पताकाएँ ऐसी शोभायमान थीं मानो स्वर्ग को बुला रही हों। अयोध्या की मणिमयी भूमि रात में तारों के प्रतिबिंब से कुमुद सरसी सी लगती थी। हिलती पताकाएँ स्वर्ग को बुलाती सी प्रतीत होती थीं। मणिमय महल विमानों की शोभा छीनते से लगते थे। चंद्रकांत मणियों से मेघ सा जल झरता था।
श्लोक 62 से 71 अयोध्या का वर्णन
अयोध्या के शिखरों में इंद्रनील मणियों से ज्योतिश्चक्र छिप जाता था। ऊँचे शिखर शरद मेघों का आश्रय थे। सुवर्ण परकोटा मेरु की शोभा का उपहास करता सा लगता था। परिखा समुद्र की लीला धारण करती थी। वृषभदेव की जन्मभूमि होने से यह शुद्ध खानि भूमि थी और महारत्न उत्पन्न करती थी। उपवन कल्पवृक्षों की शोभा तिरस्कृत करते थे। सरयू के किनारे सारस सोते और हंस शब्द करते थे। अयोध्या दुर्लंघ्य और योद्धाओं से भरी थी। देव सेनाएँ उसे घेरकर ऐसी शोभायमान थीं मानो तीनों लोक आए हों।
श्लोक 72 से 81 नाभिराज-मरुदेवी से भेंट
इंद्र ने भगवान को नाभिराज के घर में सिंहासन पर बिठाया। नाभिराज रोमांचित और प्रफुल्लित नेत्रों से उन्हें देखते थे। मरुदेवी निद्रा त्यागकर हर्षित हो भगवान को देखने लगीं। वे अपने पुत्र को तेज पुंज सा देख रही थीं और पूर्व दिशा सी शोभायमान थीं। माता-पिता प्रसन्न होकर इंद्र को देखने लगे। इंद्र ने उनकी आभूषण, माला और वस्त्रों से पूजा की। उसने उनकी स्तुति की कि आप पुण्यशाली, धन्य, महाभाग्यशाली, कल्याण प्राप्त करने वाले और उदयाचल-पर्व दिशा हैं।
श्लोक 82 से 91 जन्मोत्सव
इंद्र ने माता-पिता की स्तुति कर भगवान उन्हें सौंपे और जन्माभिषेक कथा कही। कथा सुनकर माता-पिता हर्ष और आश्चर्य की सीमा पर पहुँचे। उन्होंने पुरवासियों के साथ जन्मोत्सव मनाया। पताकाओं से अयोध्या स्वर्ग को बुलाती सी लगती थी। नगरी स्वर्गपुरी, पुरवासी देव और स्त्रियाँ अप्सराएँ सी प्रतीत होती थीं। धूप, सुगंध चूर्ण और संगीत से दिशाएँ भर गई थीं। गलियाँ रत्न चूर्ण से अलंकृत थीं। हिलती पताकाएँ नृत्य करती सी लगती थीं।
श्लोक 92 से 102 उत्सव और इंद्र का नृत्य
पुरवासी गीत, नृत्य और मंगल कार्यों में व्यस्त थे। नगरी में कोई दीन-निर्धन नहीं था। उत्सव मेरु सा आनंदित था। इंद्र ने आनंद देखकर नृत्य शुरू किया। गंधर्वों ने संगीत प्रारंभ किया। नाट्यशास्त्र के अनुसार यह नृत्य महात्माओं के देखने योग्य था। बाजे बजे, पृथ्वी रंगभूमि, इंद्र नर्तक, नाभिराज दर्शक, भगवान आराध्य और पुरुषार्थ सिद्धि फल था।
श्लोक 103 से 111 इंद्र का नृत्य प्रारंभ
उस समय इंद्र ने पहले त्रिवर्ग (धर्म, अर्थ, काम) रूपी फल को सिद्ध करने वाला गर्भावतार संबंधी नाटक प्रस्तुत किया। इसके बाद उन्होंने जन्माभिषेक संबंधी नाटक शुरू किया। फिर इंद्र ने भगवान के महाबल आदि दशावतारों के वृत्तांत पर आधारित अनेक रूप दिखाने वाले अन्य नाटकों को प्रारंभ किया। इन नाटकों का प्रयोग करते समय इंद्र ने सबसे पहले पापों का नाश करने के लिए मंगलाचरण किया और सावधानीपूर्वक पूर्वरंग शुरू किया। पूर्वरंग के दौरान उन्होंने पुष्पांजलि अर्पित करते हुए तांडव नृत्य प्रारंभ किया। तांडव नृत्य की शुरुआत में इंद्र ने नांदी मंगल प्रस्तुत किया और इसके बाद रंगभूमि में प्रवेश किया। उस समय नाट्यशास्त्र को जानने वाला और मंगलमय वस्त्राभूषणों से सुशोभित इंद्र बहुत शोभायमान हो रहा था। रंगभूमि में अवतरित होने पर वह वैशाख-आसन में खड़ा हुआ, अर्थात् पैर फैलाकर दोनों हाथ कमर पर रखे हुए था, और चारों ओर से मरुत् (देवों) से घिरा हुआ ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो वातवलयों से घिरा लोकस्कंध हो। रंगभूमि के मध्य में पुष्पांजलि बिखेरते हुए इंद्र ऐसा लग रहा था मानो अपने द्वारा अनुभव किए गए नाट्यरस को दूसरों के लिए बाँट रहा हो। वह उत्तम वस्त्राभूषणों और नेत्रों के समूह से शोभायमान था, जिससे वह पुष्पों और आभूषणों से युक्त कल्पवृक्ष के समान सुशोभित हो रहा था। उसकी पुष्पांजलि, जिसके पीछे मदोन्मत्त भौंरे दौड़ रहे थे, ऐसी शोभायमान थी मानो आकाश को चित्र-विचित्र करने वाला इंद्र के नेत्रों का समूह हो।
श्लोक 112 से 121 तांडव नृत्य की शोभा
इंद्र के बड़े-बड़े नेत्रों की पंक्ति अपनी फैलती प्रभा से, जो जवनि (परदा) की शोभा धारण किए हुए थी, रंगभूमि को चारों ओर से आच्छादित कर रही थी। वह ताल के साथ पैर रखकर रंगभूमि के चारों ओर घूमते हुए ऐसा शोभायमान था मानो पृथ्वी को नाप रहा हो। जब इंद्र ने पुष्पांजलि अर्पित कर तांडव नृत्य शुरू किया, तब उसकी भक्ति से प्रसन्न देवों ने स्वर्ग से पुष्पवर्षा की। उस समय दिशाओं के अंत तक प्रतिध्वनि को विस्तृत करते हुए पुष्कर आदि करोड़ों बाजे गंभीर शब्दों के साथ एक साथ बज रहे थे। वीणा मनोहर शब्द कर रही थी, मुरली मधुर शब्दों से बज रही थी, और इन बाजों के साथ तालबद्ध संगीत के शब्द गूंज रहे थे। वीणा बजाने वाले जिस स्वर और शैली में वीणा बजा रहे थे, उसी स्वर और शैली में अन्य बाजों के वादक अपने-अपने बाजे मिलाकर बजा रहे थे, जो उचित ही था क्योंकि एकसमान वस्तुओं में मिलाप होना चाहिए। उस समय किन्नर देवियाँ वीणा बजाते हुए कोमल, मनोहर, गंभीर, उच्च और सूक्ष्म स्वरों में गा रही थीं। जैसे उत्तम शिष्य गुरु के उपदेश से मधुर शब्द करता है और अपने कुल के योग्य कार्य बिना विवाद के करता है, वैसे ही वंशी आदि बांस के बाजे मुख के संबंध से मनोहर शब्द कर रहे थे और नृत्य-संगीत में बिना विरोध के अपने वंश (बांस) के योग्य कार्य कर रहे थे। इंद्र ने पहले शुद्ध पूर्वरंग का प्रयोग किया, फिर करण (हाथ हिलाना) और अंगहार (शरीर मटकाना) के माध्यम से उसका विविध रूपों में प्रदर्शन किया। वह पाँव, कमर, काठ और हाथों को अनेक प्रकार से घुमाकर उत्तम रस प्रस्तुत करते हुए तांडव नृत्य कर रहा था।
श्लोक 122 से 131 नृत्य का प्रभाव
जब इंद्र ने विक्रिया से हजार भुजाएँ बनाकर नृत्य किया, तब उसके पैरों के रखने से पृथ्वी हिलने लगी थी मानो फट रही हो। कुलपर्वत तृणों की राशि की तरह चंचल हो उठे थे, और समुद्र आनंद से शब्द करता हुआ लहराने लगा था। उसकी चंचल भुजाएँ अत्यंत मनोहर थीं, और वह ऊँचा शरीर, चंचल वस्त्रों और आभूषणों से युक्त ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो हिलती शाखाओं वाला, ऊँचा और वस्त्र-आभूषणों से सुशोभित कल्पवृक्ष नृत्य कर रहा हो। उसके हिलते मुकुट के रत्नों की किरणों से आकाश ऐसा व्याप्त था मानो हजारों बिजलियों से भरा हो। नृत्य के दौरान उसकी भुजाओं के विक्षेप से तारे चारों ओर बिखर रहे थे और फिरकी से टूटे हार के मोतियों जैसे प्रतीत हो रहे थे। उसकी भुजाओं के उल्लास से टकराते मेघ पानी की बूँदें छोड़ रहे थे, जो शोक से आँसू बहाते से लग रहे थे। फिरकी लेते समय उसके मुकुट की मणियों की पंक्तियाँ वेग से अलातचक्र की तरह भ्रमण करने लगती थीं। उसके नृत्य के होम से पृथ्वी और समुद्र क्षुभित हो उठे थे, और उछलते जलकण दिशाओं की भित्तियों को प्रक्षालित कर रहे थे। वह नृत्य करते हुए क्षणभर में एक, अनेक, सर्वव्यापी, छोटा, पास, दूर, आकाश में या जमीन पर दिखाई देता था, और अपनी विक्रिया से ऐसा नृत्य प्रस्तुत करता था मानो इंद्रजाल का खेल दिखा रहा हो।
श्लोक 132 से 141 देवियों का नृत्य
इंद्र की भुजारूपी शाखाओं पर मंद-मंद हँसती हुई अप्सराएँ लीलापूर्वक भौंरों जैसी लताएँ चलातीं, शरीर हिलातीं और सुंदरता से पैर उठाकर नृत्य कर रही थीं। कुछ देवनर्तकियाँ वर्द्धमान लय के साथ, कुछ तांडव नृत्य के साथ, और कुछ अनेक अभिनय दिखाते हुए नृत्य कर रही थीं। कुछ देवियाँ बिजली या इंद्र का रूप धारण कर नाट्यशास्त्र के अनुसार प्रवेश और निष्क्रमण प्रदर्शित कर रही थीं। इंद्र की भुजाओं पर नृत्य करती ये देवियाँ ऐसी शोभायमान थीं मानो कल्पवृक्ष की शाखाओं पर फैली कल्पलताएँ हों। जब श्रीमान् इंद्र इनके साथ फिरकी लगाता था, तो उसका मुकुट का सेहरा हिल जाता था और ऐसा शोभायमान होता था मानो चक्र घूम रहा हो। हजार आँखों वाला इंद्र फूले कमलों से सुशोभित तालाब सा लगता था, और उसकी भुजाओं पर नृत्य करती देवियाँ मंद हँसी के साथ कमलिनियों सी प्रतीत होती थीं। इनके मुख मंद हास्य की किरणों से ऐसे शोभायमान थे मानो अमृत प्रवाह में डूबे कमल हों। कुछ देवियाँ कुलाचलों सी शोभायमान इंद्र की भुजाओं पर नृत्य कर रही थीं और लक्ष्मी या वीर-लक्ष्मी सी लगती थीं।
श्लोक 142 से 151 नृत्य की सूक्ष्मता
कुछ देवियाँ इंद्र की अंगुलियों पर चरण-पल्लव रखकर लीलापूर्वक सूचीनाट्य (सुई की नोक पर नृत्य) कर रही थीं। कुछ सुंदर पर्वों वाली उसकी अंगुलियों के अग्रभाग पर नाभि रखकर बाँस की लकड़ी पर फिरकी लगाती सी प्रतीत होती थीं। ये देवियाँ उसकी प्रत्येक भुजा पर नृत्य करतीं और नेत्रों के कटाक्ष फैलाती हुई यत्नपूर्वक संचार कर रही थीं। उत्सव को बढ़ाने वाला नाट्यरस उनके शरीर में ऐसा बढ़ रहा था मानो कटाक्षों में प्रकट, कपोलों में स्फुरित, पाँवों में फैलता, हाथों में विलसित, मुख पर हँसता, नेत्रों में विकसित, अंगराग में लाल, नाभि में निमग्न, कटि पर चलता और मेखलाओं पर स्खलित हो रहा हो। इंद्र के प्रत्येक अंग की चेष्टाएँ सभी पात्रों में दिखती थीं, मानो उसने अपनी चेष्टाएँ बाँट दी हों। उसके नृत्य के रस, भाव, अनुभाव और चेष्टाएँ सभी पात्रों में समान थे, मानो उसने अपनी आत्मा उनमें प्रविष्ट कर दी हो। वह भुजदंडों पर देवनर्तकियों को नचाता हुआ ऐसा शोभायमान था मानो यंत्र की पटियों पर पुतलियाँ नचाने वाला यांत्रिक हो। वह उन्हें कभी आकाश में, कभी सामने, कभी अदृश्य करता था, और इंद्रजाल के खिलाड़ी सा प्रतीत होता था।
श्लोक 152 से 161 नृत्य का समापन
इंद्र एक ओर की भुजाओं पर तरुण देवों को और दूसरी ओर तरुण देवियों को नृत्य करा रहा था, और स्वयं अपनी भुजारूपी शाखाओं पर अद्भुत विक्रिया से नृत्य कर रहा था। उसकी भुजा-रंगभूमि में देव और देवांगनाएँ प्रदक्षिणा देती हुई नृत्य कर रही थीं, जिससे वह नाट्यशास्त्र के सूत्रधार सा लगता था। एक ओर दीप्त और उद्धत रस से भरा तांडव नृत्य हो रहा था, तो दूसरी ओर सुकुमार प्रयोगों से लास्य नृत्य हो रहा था। भिन्न-भिन्न रसों वाले इस आश्चर्यकारी नृत्य से इंद्र ने सभा में प्रेम उत्पन्न किया। गंधर्वों द्वारा बजाए गए बाजों के साथ उसने आनंद नृत्य को सजधज के साथ समाप्त किया। वह नृत्य उद्यान सा प्रतीत होता था, जिसमें झाँझों का ताल कांस-ताल वृक्ष सा, बाँसुरियों का शब्द ऊँचे बाँस सा, देवनर्तकियाँ जल सरोवर सा और शृंगार रस जल सा था। नाभिराज और मरुदेवी इस नृत्य को देखकर चकित हुए और इंद्र की प्रशंसा प्राप्त की। इंद्रों ने भगवान को वृषभदेव नाम दिया, क्योंकि वे धर्मरूपी अमृत की वर्षा करते हैं, श्रेष्ठ धर्म से शोभायमान हैं, और मरुदेवी ने गर्भ में वृषभ देखा था।
श्लोक 162 से 171 वृषभदेव नामकरण और बाल्यावस्था
इंद्र ने भगवान को पहले ‘पुरुदेव’ नाम से पुकारा, जिससे उसका पुरुहूत नाम सार्थक हुआ। फिर वे भगवान की सेवा के लिए समान अवस्था, रूप और वेष वाले देवकुमारों को नियुक्त कर अपने स्वर्ग लौट गए। इंद्र ने भगवान को स्नान, वस्त्राभूषण, दूध पिलाने, संस्कार और क्रीड़ा के लिए देवियों को धाय बनाया। भगवान वृषभदेव शैशव में कभी मंद-मंद हँसते और कभी मणिमयी भूमि पर चलते हुए माता-पिता का हर्ष बढ़ाते थे। उनकी बाल्यावस्था चंद्रमा की तरह जगत को आनंद देती, नेत्रों को प्रिय और कलाओं से उज्ज्वल थी। उनके मुख पर मंद हास्य निर्मल चाँदनी सा प्रकट होता था, जो माता-पिता के संतोष समुद्र को बढ़ाता था। उनका मंद हास्य सरस्वती का प्रथम राग, लक्ष्मी की शोभा और कीर्ति लता का विकास सा प्रतीत होता था। उनके मुखकमल से अस्पष्ट वाणी निकलती थी, मानो सरस्वती स्वयं उनकी नकल कर रही हो। इंद्रनील भूमि पर धीरे-धीरे चलते हुए वे पृथ्वी को लाल कमल उपहार देते से शोभायमान थे।
श्लोक 172 से 181 कौमार अवस्था
सुंदर आकार वाले भगवान माता-पिता के संतोष को बढ़ाते हुए देवबालकों के साथ रत्न धूलि में क्रीड़ा करते थे। वे चंद्रमा सा शोभायमान थे, अपने आह्लादकारी गुणों से प्रजा को आनंद देते थे, और कीर्तिरूपी चाँदनी से व्याप्त थे। उनकी बाल्यावस्था समाप्त होने पर इंद्रों द्वारा पूज्य और महाप्रतापी भगवान का कौमार शरीर अति सुंदर हो गया। जैसे चंद्रमा की वृद्धि से कांति-दीप्ति बढ़ती है, वैसे ही उनके शरीर की वृद्धि के साथ गुण बढ़ते थे। उनका मनोहर शरीर, प्यारी बोली, सुंदर अवलोकन और मुस्काते संभाषण संसार की प्रीति बढ़ाते थे। जैसे चंद्रमा की वृद्धि से उसकी कलाएँ बढ़ती हैं, वैसे ही जगत्पति भगवान की वृद्धि से उनकी कलाएँ बढ़ने लगीं। मति, श्रुत और अवधि ज्ञान उनके साथ उत्पन्न हुए, जिससे उन्होंने समस्त विद्याएँ और लोक स्थिति को जान लिया। वे समस्त विद्याओं के ईश्वर थे, इसलिए उन्हें विद्याएँ स्वतः प्राप्त हो गईं, क्योंकि जन्मांतर का अभ्यास स्मृति को पुष्ट करता है। शिक्षा के बिना ही वे कलाओं में कुशल, विद्याओं में चतुर और कार्यों में कर्मठ हो गए। वे सरस्वती के स्वामी थे, जिससे समस्त शास्त्र उन्हें प्रत्यक्ष हुए और वे लोक गुरु बन गए।
श्लोक 182 से 191 विद्या और गुण
भगवान पुराण (प्राचीन इतिहास के जानकार), कवि, उत्तम वक्ता, गमक और सबके प्रिय थे, क्योंकि कोष्ठबुद्धि आदि विद्याएँ उन्हें स्वभाव से प्राप्त थीं। उनके क्षायिक सम्यग्दर्शन ने चित्त के मल दूर किए, और स्वाभाविक सरस्वती ने उनके वचन दोष हर लिए। उनके शास्त्रज्ञान से परिणाम शांत रहते थे, जिससे उनकी चेष्टाएँ जगत हितकारी होती थीं और वे प्रजा का पालन करते थे। जैसे-जैसे उनके गुण बढ़ते थे, वैसे-वैसे जनसमूह और परिवार हर्षित होते थे। वे माता-पिता का आनंद, बंधुओं का सुख और जीवों की प्रीति बढ़ाते हुए वृद्धि पा रहे थे। उनकी आयु चौरासी लाख पूर्व की थी। वे दीर्घदर्शी, दीर्घायु, दीर्घ भुजाओं, दीर्घ नेत्रों और दृढ़ विचारों वाले थे, जिससे वे तीनों लोकों के सूत्रधार बने। वे लिपि, गणित, संगीत आदि का अभ्यास स्वयं करते और दूसरों को कराते थे। वे छंदशास्त्र, अलंकार, प्रस्तार और चित्रकला का मनन करते थे। वे वैयाकरणों से व्याकरण, कवियों से काव्य और वादियों से वाद चर्चा करते थे।
श्लोक 192 से 201 क्रीड़ा और विनोद
भगवान गीत, नृत्य, वादित्र और वीणा गोष्ठियों में समय व्यतीत करते थे। वे मयूर रूप में देवकिंकरों को ताल देकर नृत्य कराते थे। वे तोते के रूप में देवकुमारों को मधुर श्लोक पढ़ाते थे। वे हंस रूप में गद्गद बोली करते हुए हंसरूपी देवों को मृणाल देकर सम्मानित करते थे। वे हाथी शावकों के रूप में देवों के साथ क्रीड़ा करते थे। वे मुर्ग रूप में प्रतिबिंबों से युद्ध करने वाले देवों को देखते और प्रोत्साहित करते थे। वे मल्ल रूप में नृत्य करते देवों को प्रेरित करते थे। वे क्रौंच-सारस रूप में कर्णप्रिय शब्द सुनते थे। वे माला-चंदन धारी देव बालकों को दंड क्रीड़ा में नचाते थे। वे देवों की स्तुति में अपने निर्मल यश को सुनते थे।
श्लोक 202 से 209 प्रजा सत्कार और जलक्रीड़ा
भगवान घर के आंगन में देवियों द्वारा बनाई रत्नचूर्ण चित्रावली को आनंद से देखते थे। वे दर्शन हेतु आई प्रजा का मधुर, स्नेहयुक्त अवलोकन और हास्य-सहित संभाषण से सत्कार करते थे। वे बावड़ियों में देवकुमारों के साथ जलक्रीड़ा करते थे। वे सरयू नदी के जल में हंस शब्दों के साथ लकड़ी के यंत्रों से क्रीड़ा करते थे। जलक्रीड़ा में मेघकुमार धारागृह बनकर उनकी सेवा करते थे। वे नंदन वन में देवों के साथ वनक्रीड़ा करते थे। वनक्रीड़ा में पवनकुमार पृथ्वी को धूलिरहित करते और वृक्ष हिलाते थे। इस तरह वे देवकुमारों के साथ समयानुसार क्रीड़ा और विनोद करते हुए सुखपूर्वक रहते थे।
श्लोक 210 से 213 भगवान की महिमा
तीन लोकों के अधिपति इंद्रादि देवों द्वारा पूज्य भगवान वृषभदेव आश्रय योग्य थे और गुणरूपी मणियों की खान थे। वे नाभिराज के घर में देवकुमारों के साथ चिरकाल तक क्रीड़ा करते रहे। पुण्यकर्म के उदय से वे प्रतिदिन इंद्र द्वारा भेजे गए पुष्प, वस्त्र और आभूषणों का भोग प्रसन्नता से ग्रहण करते थे। उनके चरण मनुष्य, सुर और असुरों द्वारा पूजित थे। वे बाल्य में वृद्धों जैसे कार्य करते थे। उनकी लीला, आहार, विलास और वेष चतुर और उत्कृष्ट थे। वे वचन किरणों से आनंद विस्तृत करते थे और कीर्ति चाँदनी से शोभायमान थे। वे नक्षत्रों जैसे देवकुमारों के साथ चंद्रमा सा वृद्धि पाते थे।
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भगवान वृषभदेव का यौवन रूप
पूर्ण यौवन अवस्था प्राप्त करने पर भगवान वृषभदेव का शरीर बहुत ही मनोहर हो गया था, जो उचित ही था, क्योंकि जैसे शरद ऋतु में चंद्रमा की सुंदरता बढ़ जाती है, वैसे ही उनका रूप भी असाधारण हो गया था। उनका शरीर तपाये हुए सुवर्ण के समान कांतियुक्त, पसीना और धूलि-मल से रहित, दूध के समान सफेद रुधिर वाला, समचतुरस्र संस्थान से युक्त, वज्रवृषभनाराच संहनन से सुशोभित, सुंदरता और सुगंध की परम सीमा को धारण करने वाला, एक हजार आठ लक्षणों से अलंकृत, अप्रमेय, महाशक्तिशाली, और प्रिय तथा हितकारी वचनों से युक्त था। उनके काले-काले केशों और मुकुट से अलंकृत शिर ऐसे शोभायमान थे मानो नीलमणियों से युक्त मेरु पर्वत का शिखर हो। उनके मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों की माला ऐसी शोभायमान थी मानो हिमगिरि के शिखर पर पड़ी आकाशगंगा हो। उनके चौड़े ललाट की शोभा ऐसी थी मानो सरस्वती के उपवन की शोभा बढ़ा रही हो। उनके ललाटरूपी पर्वत पर भौंहरूपी लताएँ ऐसी शोभायमान थीं मानो कामदेवरूपी मृग को रोकने के लिए दो पाश हों। काली पुतलियों से युक्त उनके नेत्ररूपी कमल भ्रमरों से सुशोभित कमल की पंखुड़ियों जैसे थे। मणिमय कुंडलों से उनके कान ऐसे शोभायमान थे मानो चंद्रमा और सूर्य से अलंकृत आकाश के किनारे हों। उनके मुखरूपी चंद्रमा की कांति तीनों लोक में अद्वितीय थी, क्योंकि जैसे अमृत का संतोष कहीं और नहीं मिलता, वैसे ही उनकी कांति भी अनुपम थी।
श्लोक 12 से 21 शरीर की शोभा
भगवान का मुख मंद हास्य और लाल अधरों से मनोहर था, जो फेनयुक्त कमल की शोभा धारण कर रहा था। उनकी लंबी और ऊँची नाक सरस्वती के अवतरण की प्रणाली सी शोभायमान थी। उनका कंठ मनोहर रेखाओं से युक्त ऐसा प्रतीत होता था मानो विधाता ने मुखरूपी घर के लिए सुवर्ण का स्तंभ बनाया हो। उनके वक्षःस्थल पर श्रेष्ठ मणि से युक्त हारयष्टि ऐसी शोभायमान थी मानो गुणरूपी क्षत्रियों की सेना हो। जैसे सुमेरु पर्वत झरने धारण करता है, वैसे ही वे इंद्रच्छद हार से शोभायमान थे। उस हार से उनका वक्षःस्थल गंगा से युक्त हिमालय तट सा लगता था। उनका वक्षःस्थल सरोवर सा सुंदर था, जहाँ हार की किरणरूपी जल में लक्ष्मीरूपी हंसी क्रीड़ा करती थी। उनका वक्षःस्थल लक्ष्मी का घर था, और दोनों कंधे जयलक्ष्मी की अटारियाँ से प्रतीत होते थे। बाजूबंद से स्निग्ध उनकी भुजाएँ शोभारूपी लता से युक्त कल्पवृक्ष सी शोभायमान थीं। उनके हाथों के नख सुखदायक प्रकाश और सीधी अंगुलियों से युक्त थे, जो उनके दस अवतारों में भोगी लक्ष्मी के दर्पण से प्रतीत होते थे।
श्लोक 22 से 31 शरीर का मध्य और निचला भाग
महाराज नाभिराज के पुत्र भगवान वृषभदेव की नाभि लक्ष्मीरूपी हंसी से सेवित और आवर्त से युक्त सरोवर सी शोभायमान थी। करधनी और वस्त्र से युक्त उनका जघनभाग बिजली और शरद बादलों से युक्त पर्वत के नितंब सा शोभायमान था। उनकी सुवर्ण-कांतियुक्त ऊरुएँ लक्ष्मी के झूले के स्तंभ से प्रतीत होती थीं। उनकी जंघाएँ कामदेवरूपी हाथी के लिए अर्गल सी थीं, जो लक्ष्मी द्वारा उज्ज्वल की गई सी लगती थीं। उनके चरणकमल तीनों लोकों की लक्ष्मी के आलिंगन से सौभाग्य के गर्व से शोभायमान थे, जिनकी कोई उपमा नहीं थी। पैरों के नख से शिर के केशों तक उनकी कांति ऐसी थी मानो अनन्य गति से उनके शरीर में प्रकट हुई हो। उनका शरीर स्वाभाविक रूप से सुंदर, वज्रमय हड्डियों से युक्त, और अभेद्य था, जो मेरु की कांति को प्राप्त था। उनका वज्रवृषभनाराच संहनन वज्रमयी हड्डियों और कीलों से युक्त था। वात, पित्त, कफ से उत्पन्न व्याधियाँ उनके शरीर में स्थान नहीं पाती थीं, जैसे वायु मेरु को नहीं हिला सकती। उनके शरीर में न बुढ़ापा, न खेद, न असमय मृत्यु थी; वे सुख में पूजित थे।
श्लोक 32 से 44 शरीर और लक्षण
भगवान का परमौदारिक शरीर मोक्ष का मूल कारण था और अत्यंत शोभायमान था। उनका समचतुरस्र संस्थान हीनाधिकता से रहित था। उनकी रूप-संपत्ति और भोग सामग्री प्रसिद्ध थी, जैसे कल्पवृक्ष आभरणों से दैदीप्यमान होते हैं। जैसे सुमेरु के मणिमय तट से ज्योतिषी देव शोभायमान होते हैं, वैसे ही उनके निर्मल शरीर से सामुद्रिक लक्षण शोभायमान थे। वे आभूषणों से कल्पवृक्ष और लक्षणों से फूलों से सुशोभित थे। उनके शरीर में श्रीवृक्ष, शंख, कमल, स्वस्तिक, अंकुश, तोरण, चमर, छत्र, सिंहासन, पताका, मीन, कुंभ, कच्छप, चक्र, समुद्र, सरोवर, विमान, भवन, हाथी, मनुष्य, स्त्रियाँ, सिंह, बाण, धनुष, मेरु, इंद्र, देवगंगा, पुर, गोपुर, चंद्रमा, सूर्य, घोड़ा, तालवृंत, बाँसुरी, वीणा, मृदंग, मालाएँ, रेशमी वस्त्र, दूकान, कुंडल, चित्र-विचित्र आभूषण, उपवन, खेत, रत्नद्वीप, वज्र, पृथ्वी, लक्ष्मी, सरस्वती, कामधेनु, वृषभ, चूड़ामणि, निधियाँ, कल्पलता, सुवर्ण, जंबूद्वीप, गरुड़, नक्षत्र, तारे, राजमहल, ग्रह, सिद्धार्थ वृक्ष, आठ प्रातिहार्य, और आठ मंगलद्रव्य सहित 108 लक्षण और 900 व्यंजन विद्यमान थे।
श्लोक 45 से 61 लक्षणों की महिमा और विवाह चिंता
इन लक्षणों से व्याप्त उनका शरीर ज्योतिषी देवों से भरे आकाश सा शोभायमान था। उनके निर्मल शरीर के स्पर्श से इन लक्षणों के अंतर्लक्षण शुभ थे। रागद्वेषरहित भगवान के मन में लक्ष्मी कठिनाई से स्थान पा सकी, क्योंकि वे वीतराग थे। उन्हें सरस्वती और कीर्ति प्रिय थीं, पर लक्ष्मी पर उनका प्रेम कम था। उनके रूप-यौवन से आकृष्ट लोगों के नेत्र भौंरे से दूसरी जगह रमण नहीं करते थे। एक दिन नाभिराज ने उनकी यौवन अवस्था देखकर विवाह की चिंता की। उन्होंने सोचा कि ये सुंदर हैं, पर इनका चित्त हरण करने वाली स्त्री कौन होगी, और इनका विषयराग मंद होने से विवाह कठिन है। उनका धर्मतीर्थ में उद्योग है, अतः वे परिग्रह छोड़कर दीक्षा लेंगे। फिर भी, तपस्या की काललब्धि तक लोकव्यवहार के लिए योग्य स्त्री का विचार करना चाहिए। ऐसी कुलीन स्त्री उनके निर्मल मन में निवास करे। यह निश्चय कर नाभिराज ने भगवान से कहा कि आप जगत के अधिपति हैं, अतः उपकार करें। आप ब्रह्मा और स्वयंभू हैं; हम निमित्त मात्र हैं। आप गर्भ में कमल पर उत्पन्न हुए, अतः शरीररहित हैं। मैं निमित्त पिता हूँ, फिर भी आपसे कहता हूँ कि सृष्टि की ओर बुद्धि लगाएँ।
श्लोक 62 से 71 विवाह प्रस्ताव
नाभिराज ने कहा कि आप आदिपुरुष हैं, अतः लोग आपका अनुगमन करेंगे। किसी इष्ट कन्या से विवाह करें, ताकि प्रजा की संतति नष्ट न हो। इससे धर्म बढ़ेगा, अतः विवाहरूपी धर्म स्वीकार करें। इसे गृहस्थ धर्म मानें, क्योंकि संतान रक्षा आवश्यक है। यदि आप मुझे गुरु मानते हैं, तो मेरे वचनों का उल्लंघन न करें। यह कहकर नाभिराज चुप हुए, और भगवान ने हँसकर ओम कहकर विवाह स्वीकार किया। उनकी स्वीकृति पिता की चतुराई, प्रजा उपकार की इच्छा, या कर्म नियोग थी। नाभिराज ने हर्ष से विवाह उत्सव किया। उन्होंने इंद्र की अनुमति से सुशील, सुंदर, सती कन्याओं की याचना की। कच्छ-महाकच्छ की बहनें, यशस्वी और सुनंदा, शांत और यौवनवती थीं, जिनसे भगवान का विवाह हुआ। देवों ने उत्सव मनाए।
श्लोक 72 से 81 विवाह का आनंद
नाभिराज और परिवार पुत्रवधुओं से संतुष्ट हुए, क्योंकि लौकिक धर्म प्रिय होता है। मरुदेवी विवाह से संतुष्ट हुईं, जैसा पुत्र विवाह में स्त्रियों को प्रेम होता है। जैसे चंद्र कला से समुद्र बेला बढ़ती है, वैसे ही मरुदेवी विवाह संपदा से बढ़ीं। सभी आनंदित हुए, क्योंकि लोग भोग स्वामी को भोगते देख अनुसरण करते हैं। विवाह ने मनुष्यलोक और स्वर्ग में प्रीति विस्तृत की। भगवान की देवियाँ उत्कृष्ट ऊरुओं, जंघाओं और कोमल चरणों से युक्त थीं; उनका कटिभाग नीचा होने पर भी संसार को जीतने वाला था। उनका कृश उदर और रोमराजि कामदेव के मद की धारा सी थी। उनकी नाभि रस की कूपिका या रोमराजि की पाल सी थी। उनके स्तन कमलिनियों से शोभायमान थे, जिन पर चूचुक भौंरे से थे। उनके मुक्ताहार तप के फलस्वरूप कंठ और कुच के सुख को प्राप्त थे।
श्लोक 82 से 91 देवियों की शोभा
एकावली से वे सखी सी शोभायमान थीं, जो कंठ और स्तनों को स्पर्श करती थी। नक्षत्रमाला उनके स्तनों के बीच हँसती सी लगती थी। उनकी भुजलताएँ नखों की किरणों से शोभायमान थीं। उनके मुखरूपी चंद्रमा मंद हास्य से चाँदनी बढ़ाते थे। उनके नेत्र भ्रमरों से युक्त कमल से शोभायमान थे। उनकी भौंहें कामदेव के धनुष से सुंदर थीं। उनके कान नीलकमल कर्णभूषणों से शोभायमान थे। उनके ललाट के अलक सुवर्णपट्टक पर इंद्रनील से लगते थे। उनके केशपाश काले साँपों से सफेद साँपों को उगलते से प्रतीत होते थे। वे मधुर और आभूषणों से उज्ज्वल कल्पलताएँ सी थीं।
श्लोक 92 से 101 भगवान और देवियों का मिलन
लोगों को लगता था कि इन देवियों ने देवांगनाओं को जीत लिया। भगवान वृषभदेव इनसे कीर्ति और लक्ष्मी से शोभायमान थे, जैसे नदियाँ समुद्र से मिलती हैं। वे रूपवती और कामदेव की पताका सी थीं, जिन्होंने भगवान का मन हरण किया। भगवान ने उनकी इच्छा को प्रसन्न किया। कामदेव उनके सामने अपमानित होने पर भी गुप्त रूप से संचार करता था। वह शरीररहित होकर देवियों में प्रविष्ट हुआ और बाणों से भगवान को घायल करता था। उनके साथ भोगते हुए भगवान का समय उत्सवों में क्षणभर सा बीता। एक दिन यशस्वती ने स्वप्न में ग्रसी पृथ्वी, सुमेरु, चंद्र-सूर्य, हंस-सरोवर, और चंचल समुद्र देखा, और मंगल-पाठ से जागी।
श्लोक 102 से 111 बंदीजनों का मंगल-पाठ
बंदीजन यशस्वती देवी को जागने के लिए मंगल-पाठ पढ़ रहे थे। उन्होंने कहा कि हे कल्याणकारी देवी, तुम कमलिनी सी शोभायमान हो, अतः जागो। तुमने पृथ्वी, मेरु, समुद्र, सूर्य, चंद्र और सरोवर जैसे शुभ स्वप्न देखे, जो तुम्हारे आनंद के लिए हों। चंद्रमारूपी हंस और तारारूपी हंसियाँ अस्त हो रही हैं। चंद्रमा कांतिहीन हो गया है, मानो चकवियों की ईर्ष्या से दूषित हुआ हो। रात्रि नक्षत्रों को लपेटकर भाग रही है। चंद्रमा अस्त और सूर्य उदित हो रहा है, जो संसार की विचित्रता दिखाते हैं। तारे सूर्य से कांतिहीन होकर विलीन हो रहे हैं। चकवा चकवी को ढूँढ रहा है, और हंस मृणाल से खुजलाकर शयन चाहता है।
श्लोक 112 से 121 यशस्वती का जागरण और स्वप्न निवेदन
कमलिनी विकसित और कुमुदिनी मुरझा रही है। कुरर पक्षियाँ नूपुर सा शब्द कर रही हैं। पक्षी कोलाहल के साथ मंगल-पाठ पढ़ते हुए उड़ रहे हैं। दीपक प्रातःकाल में मंद पड़ रहे हैं। कुब्जक और वामन आदि यशस्वती की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बंदीजनों ने कहा कि हे भगवान की प्रिय, शय्या छोड़ो। मंगल-पाठ और दुंदुभियों से यशस्वती जागी। उसने स्नान कर भगवान वृषभदेव के पास स्वप्नों का फल पूछने पहुँची। वह सिंहासन पर बैठी, लक्ष्मी सी शोभायमान हुई। उसने स्वप्न भगवान को बताए।
श्लोक 122 से 131 स्वप्न फल और गर्भ
भगवान ने कहा कि सुमेरु से चक्रवर्ती पुत्र, सूर्य से प्रताप, चंद्र से कांति, सरोवर से पवित्र लक्षण, पृथ्वी ग्रसने से पृथ्वी का पालन, और समुद्र से संसार पार करने वाला ज्येष्ठ पुत्र होगा। यशस्वती हर्ष से बढ़ी। अतिगृद्ध का जीव, जो व्याघ्र, देव, सुबाहु, और अहमिंद्र था, यशस्वती के गर्भ में आया। वह गर्भ से सूर्य और प्रतिकूल छाया सहन नहीं करती थी। भगवान उसे मयूर सा उत्सुकता से देखते थे।
श्लोक 132 से 141 यशस्वती की गर्भावस्था
यशस्वती रत्नमयी भूमि सी शोभायमान थी। वह मंद गति से चलती थी, मानो पृथ्वी पर मुहर लगाती हो। गर्भ में भी उसकी वलीभंग नहीं हुई, जो पुत्र के अभंग दिग्विजय को सूचित करती थी। उसके स्तन काले हुए, जो शत्रु नाश का संकेत था। दोहला, आलस्य, और मिट्टी की सुगंध जैसे चिह्न भगवान को प्रसन्न करते थे। नौ माह बाद उसने तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। चैत्र कृष्ण नवमी, मीन लग्न, ब्रह्मयोग, धन चंद्रमा, और उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में ज्येष्ठ पुत्र उत्पन्न हुआ।
श्लोक 142 से 151 पुत्र का जन्म और उत्सव
पुत्र भुजाओं से पृथ्वी आलिंगन कर उत्पन्न हुआ, जो चक्रवर्ती होने का संकेत था। वह चंद्र सा सौम्य और सूर्य सा तेजस्वी था। मरुदेवी और नाभिराज हर्षित हुए। स्त्रियाँ आशीर्वाद दे रही थीं। नगाड़े, तुरही, शंख आदि बजे। फूल बरसे, सुगंधित वायु बही। देवों ने जय-जय और चिरंजीव शब्द कहे। नृत्य करने वाली स्त्रियाँ ताल पर नृत्य करने लगीं।
श्लोक 152 से 161 नगर का उत्सव और भरत नामकरण
गलियाँ चंदन जल से शोभायमान थीं। आकाश में इंद्रधनुष और तोरण शोभायमान थे। सुवर्ण कलश रखे गए। अयोध्या उत्सव से भर गई। भगवान ने दान बरसाया, कोई दरिद्र नहीं रहा। बालक भगवान से उदित चंद्रमा सा था। बंधुओं ने उसे भरत नाम दिया। इतिहासकारों ने कहा कि यह क्षेत्र भरत के नाम से भारतवर्ष कहलाया। भरत कुमुदों में आनंद बढ़ाता और अंधकार नष्ट करता था। वह दूध उगलकर यश बाँटता था।
श्लोक 162 से 171 भरत का विकास
भरत की मंद मुसकान आदि लीलाएँ माता-पिता को हर्षित करती थीं। उसके गुण उसकी सुंदरता के साथ बढ़ते थे। भगवान ने उसके अन्नप्राशन, चौल, और उपनयन संस्कार किए। भरत ने युवावस्था प्राप्त की। उसका गमन, शरीर, और हास्य पिता सा था। उसकी वाणी, कला, और विद्या भी पिता समान थी। प्रजा ने कहा कि आत्मा ही पुत्र है। वह सज्जनों को मान्य और कामदेव सा था। वह पिता के मन को प्रेम से अधीन करता था। उसका शरीर विजयलक्ष्मी से दैदीप्यमान था।
श्लोक 172 से 181 भरत का शारीरिक वर्णन (ऊपरी भाग)
भरत का बलिष्ठ शरीर तेज से शोभायमान था। उसका मुकुट मेरु शिखर सा था। उसका शिर लक्ष्मी के लिए छत्र सा था। काले केश इंद्रनील टोपी से लगते थे। उसकी कुटिलता केशों में सीमित थी। उसका मुखकमल दाँतों और सुगंध से शोभायमान था। उसका मुख चंद्रमा सा सुखद, गोल, और कांतियुक्त था। दाँतों की चाँदनी और कर्णभूषण से वह शोभायमान था। उसका मुख सूर्य, चंद्र, और कमल के गुणों से युक्त था। वह संकोचरहित और अनुपम था।
श्लोक 182 से 191 भरत का चेहरा
भरत का मुख लक्ष्मी से हारकर वन-जल में प्रस्थान करता सा था। उसका ललाट सूर्य किरणों से बना सा था। उसके कपोल चंद्रमा को पराजित करते थे। उसकी भौहें कामदेव की पताकाएँ सी थीं। उसके नीलकमल नेत्र दिशाओं को चित्रित करते थे। उसके कटाक्ष उसके कानों का उल्लंघन करते थे। उसके अर्धनेत्रों से स्त्रियाँ आसक्त होती थीं। कुंडलों से वह शास्त्र-अर्थ तुलना करता सा था। उसकी नाक कामदेव की अग्नि नाली सी थी। उसका अधरोष्ठ अमृत से सींचा सा था।
श्लोक 192 से 201 भरत का शरीर (मध्य और ऊपरी भाग)
भरत का कंठ हार से शंख सा शोभायमान था। उसका वक्षस्थल रत्नद्वीप सा था। हार लक्ष्मी के झूले की लता सी थी। बाजूबंद से उसकी भुजाएँ विजयलक्ष्मी की अधीन थीं। उसके बाहुदंड पृथ्वी नापने के दंड से थे। उसका हस्त-तल शुभ लक्षणों से शोभायमान था। यज्ञोपवीत से वह हिमालय सा था। उसका ऊपरी भाग आभूषणों से हँसता सा था। उसका अधोभाग भी ऊपरी भाग सा था। पुनरुक्ति से उसका वर्णन दोषरहित था।
श्लोक 202 से 211 भरत का अधोभाग
भरत की नाभि लावण्य की कूपिका थी। उसका जघन भाग इंद्रधनुष से युक्त मेरु सा था। उसके ऊरू कामदेव के खंभे से थे। उसकी जंघाएँ गोल और मनोहर थीं। उसके चरण कमल से थे, जहाँ लक्ष्मी निवास करती थी। उसके पैर कमल की शोभा पर हँसते थे। चरणों में चक्र आदि चिह्न थे। उसके चरण ही पृथ्वी पर आक्रमण करते थे। वह चरम शरीरी और दिग्विजयी था। उसकी भुजाओं में चक्रवर्ती बल था।
श्लोक 212 से 221 भरत के गुण
भरत के रूप में गुणरूपी संपदा थी। गुणों ने उसके सुंदर शरीर को स्वीकृत किया। सत्य, शौच, क्षमा आदि आत्मिक गुण और कांति, लावण्य आदि शारीरिक गुण उसके थे। वह गुणों से और सुशोभित था। वह दिव्य, तेजस्वी, और लक्ष्मी पुंज सा था। उसकी रूपसंपदा से लोग पुण्य की प्रशंसा करते थे। अभ्युदय पुण्य से प्राप्त होता है। पुण्य संचय आवश्यक है।
श्लोक 222 से 224 भरत की महिमा और पिता का संतोष
भरत चंद्रमा सा आनंद बढ़ाता और दुःख शांत करता था। वह उदयाचल सा सुवर्णमय, उदार, और दिग्विजयी था। भगवान वृषभदेव उसके मुख, वचन, और आलिंगन से संतोष प्राप्त करते थे।
आदिपुराण पर्व 16 – भगवान् के साम्राज्य का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भगवान वृषभदेव के पुत्र-पुत्रियाँ
सर्वार्थसिद्धि के अहमिंद्र स्वर्ग से अवतीर्ण होकर भगवान वृषभदेव की यशस्वती देवी से पुत्र उत्पन्न हुए। वज्रनाभि में पीठ नामक भाई अब वृषभसेन, महापीठ अब अनंतविजय, विजय अब अनंतवीर्य, वैजयंत अब अच्युत, जयंत अब वीर, और अपराजित अब वरवीर हुए। यशस्वती से भरत सहित 99 चरमशरीरी और प्रतापी पुत्र हुए। भगवान ने यशस्वती से ब्राह्मी नामक पुत्री उत्पन्न की। आनंद पुरोहित का जीव सुनंदा से बाहुबली और अनुंधरी सुनंदा से सुंदरी नामक पुत्री हुई। सुंदरी और बाहुबली से सुनंदा शोभायमान हुई। बाहुबली 24 कामदेवों में प्रथम था, जिसका रूप अनुपम था। उसके काले केश कामदेव के कवच से शोभायमान थे।
श्लोक 12 से 21 बाहुबली का शारीरिक वर्णन (ऊपरी भाग)
बाहुबली का ललाट अष्टमी चंद्रमा सा विस्तृत था। कुंडलों से उसका मुख चकवा-चकवी युक्त कमल सा था। मंद हास्य और लक्ष्मी से उसका मुखरूपी सरोवर नेत्र-कमलों से शोभायमान था। विजयछंद हार से उसका वक्षःस्थल मरकतमणि पर्वत सा था। उसके कंधे द्वीप के छोटे पर्वत से थे। लंबी भुजाओं से उसका बाहुबली नाम सार्थक था। वह नाभिमंडल को कुलाचल के सरोवर सा धारण करता था। करधनी से उसका कटिप्रदेश सर्प से घिरे सुमेरु सा था। उसके ऊरु केले के खंभे से थे। उसकी जंघाएँ प्रतिमायोग के कारण सी थीं।
श्लोक 22 से 31 बाहुबली का अधोभाग और प्रभाव
बाहुबली के चरण लाल कमल से शोभायमान थे, कोमल, अंगुलियों से युक्त, और लक्ष्मी से सुशोभित थे। वह उदार और चरमशरीरी होकर भी मानिनी स्त्रियों के हृदय में प्रवेश करता था। स्त्रियाँ उसके रूप को स्वप्न में देखती थीं। वे उसे मनोभव, मदन आदि नामों से पुकारती थीं। कामदेव की किंवदंती युक्तिरहित थी, पर बाहुबली बल से जगत् संहार कर सकता था। सभी राजकुमार भरत जैसे थे। वे क्रमशः युवावस्था को प्राप्त हुए। उनका यौवन वसंत से वृक्षों सा था। वे मंदहास्य, लाल हाथ, और ऊँची भुजाओं से वृक्ष से थे। उनके केश सुगंध से भ्रमरों को आकर्षित करते थे।
श्लोक 32 से 41 राजकुमारों की शारीरिक शोभा
राजकुमारों के शरीर से सुगंध फैलती थी, जिससे भ्रमर व्याकुल होते थे। उनके कान मकर चिह्नित कुंडलों से शोभायमान थे। कामदेव ने उनके नेत्र-कमल और भौंह-धनुष से स्त्रियों को वश में किया। उनका शरीर दैदीप्यमान, मुख सुंदर, और नेत्र मधुर थे। उनकी भौंहें विलासी, ललाट प्रशंसनीय, और कपोल चंद्रमा को लज्जित करते थे। उनके ओठ अनुराग से लाल और स्वर मृदंग सा था। कंठ के मोती अक्षर से थे। उनका वक्षस्थल लक्ष्मी से, कंधे विजयलक्ष्मी से, और भुजाएँ कठोर थीं। उनकी नाभि शोभा की भूमि थी। उनका कटिप्रदेश कामदेव के तंबू सा था।
श्लोक 42 से 51 राजकुमारों का अधोभाग और आभूषण
राजकुमारों के ऊरु सुंदर और जंघाएँ कामदेव के तरकश से थीं। उनके पैर लाल कमलों को तिरस्कृत करते थे। उनकी शोभा उनके शरीर में ही थी। वे आभूषणों से फूलों से वन से शोभायमान थे। उनके पास यष्टि, हार, और रत्नावली जैसे आभूषण थे। यष्टि पाँच प्रकार की थी: शीर्षक, उपशीर्षक, अवघाटक, प्रकांडक, और तरलप्रबंध। ये मणिमध्या और शुद्धा दो-दो प्रकार की थीं। मणिमध्या को सूत्र और रत्नावली भी कहते हैं। अंतर से गुँथी यष्टि अपवर्तिका थी।
श्लोक 52 से 61 हारों के प्रकार
शीर्षक में एक स्थूल मोती, उपशीर्षक में तीन क्रमिक मोती थे। प्रकांडक में पाँच मोती, अवघाटक में एक मणि और घटते मोती थे। तरलप्रबंध में एकसमान मोती थे। हार लड़ियों की संख्या से 11 प्रकार के थे। इंद्रच्छंद में 1008, विजयछंद में 504 लड़ियाँ थीं। 108 लड़ियों का हार, 81 का देवच्छंद था। 64 का अर्धहार, 54 का रश्मिकलाप, 32 का गुच्छ था। 27 का नक्षत्रमाला, 24 का अर्धगुच्छ, 20 का माणव, और 10 का अर्धमाणव था।
श्लोक 62 से 71 आभूषणों की विविधता
मणि लगाने पर हार माणव कहलाते थे। शीर्षक शुद्ध हार था, जो 11 भेदों में था। सभी हार 55 प्रकार के थे। अर्धमाणव में मणि से फलकहार, सोपान (3 फलक), और मणिसोपान (5 फलक) थे। भगवान ने पुत्रों के लिए ये आभूषण बनाए। राजकुमार इनसे ज्योतिषी देवों से शोभायमान थे। भरत सूर्य, बाहुबली चंद्रमा सा था। शेष पुत्र ग्रह-नक्षत्र से थे। ब्राह्मी दीप्ति, सुंदरी चाँदनी सी थी। भगवान मेरु सा शोभायमान थे।
श्लोक 72 से 81 ब्राह्मी और सुंदरी का आगमन
भगवान सिंहासन पर बैठे और कला-विद्या उपदेश में चित्त लगाया। ब्राह्मी और सुंदरी मांगलिक वेश में उनके पास पहुँची। वे किशोर अवस्था में स्तन-कुड्मलों से सुंदर थीं। वे बुद्धिमती, विनीत, और रूपवती थीं। उनकी चाल हंसी को तिरस्कृत करती थी। उनके नख दर्पण में प्रतिबिंब से दिक्कन्याओं को रौंदती सी थीं। नुपूरों से वे हंसियों को गति सिखाती सी थीं। उनके ऊरु और जंघाएँ कांति फेंकती सी थीं। उनका जघन भाग करधनी से सौभाग्य का घर सा था। उनकी नाभि होमकुंड सा थी।
श्लोक 82 से 93 ब्राह्मी और सुंदरी की शोभा
उनकी रोमराजी धूप की शिखा सी थी। उनका मध्यभाग कृश, भुजाएँ कोमल थीं। हार उनके स्तनों पर हँसता सा था। उनका कंठ सुंदर, स्वर कोयल सा, और मुख मंदहास्य से था। उनके दाँत, कटाक्ष, और नेत्र कामदेव के अस्त्र से थे। केशों से उनके कपोल चंद्रमा को लज्जित करते थे। उनका केशपाश यमुना सा था। उनकी कांति से आकृति सौंदर्य का समूह सी थी। लोग उन्हें दिव्य, नागकन्या, या लक्ष्मी मानते थे। वे भगवान को प्रणाम करने पहुँचीं।
श्लोक 94 से 101 भगवान का संबोधन
भगवान ने पुत्रियों को गोद में बैठाकर प्रेम से कहा कि देव अमरवन चले गए। उन्होंने कहा कि तुम शील और विनय से वृद्धा सी हो। विद्या से तुम्हारा जन्म सफल होगा। विद्या से सम्मान और यश मिलता है। विद्या कल्याणकारी, कामधेनु, और चिंतामणि है। यह बंधु, मित्र, और धन है।
श्लोक 102 से 111 विद्या का उपदेश
भगवान वृषभदेव ने पुत्रियों से कहा कि विद्या ग्रहण करो, क्योंकि यह इसके लिए उचित काल है। उन्होंने आशीर्वाद देकर श्रुतदेवता को सुवर्ण पट्ट पर स्थापित किया और वर्णमाला व संख्याओं का उपदेश दिया। ब्राह्मी ने अ से ह तक शुद्ध अक्षरावली और सुंदरी ने गणित शास्त्र धारण किया। वाङ्मय के बिना शास्त्र-कला नहीं होती, अतः भगवान ने पहले वाङ्मय सिखाया। दोनों कन्याओं ने दोषरहित वाङ्मय का अध्ययन किया। वाङ्मय में व्याकरण, छंद, और अलंकार शामिल हैं।
श्लोक 112 से 121 शास्त्रों का विस्तार
भगवान का व्याकरण शास्त्र सौ से अधिक अध्यायों वाला और गंभीर था। उन्होंने छंदशास्त्र के 26 भेदों का उपदेश दिया। प्रस्तार, नष्ट आदि छह प्रत्ययों का निरूपण किया। अलंकारों में उपमा, रूपक, यमक आदि और शब्दालंकार, अर्थालंकार व दश गुणों का वर्णन किया। ब्राह्मी और सुंदरी की विद्याएँ व्याकरण-ज्ञान से परिपक्व हुईं। वे सरस्वती के अवतार हेतु पात्र बनीं। भगवान ने भरत आदि पुत्रों को भी शास्त्र पढ़ाए। भरत को अर्थशास्त्र और नृत्यशास्त्र सिखाया।
श्लोक 122 से 131 पुत्रों को शास्त्र उपदेश
वृषभसेन को गंधर्व शास्त्र, अनंतविजय को चित्रकला, सूत्रधार और मकान निर्माण विद्या सिखाई। बाहुबली को कामनीति, आयुर्वेद, धनुर्वेद, और रत्नपरीक्षा आदि शास्त्र पढ़ाए। भगवान ने लोक उपकार हेतु सभी शास्त्र पुत्रों को सिखाए। उनकी विद्याएँ प्रकाशित होने से उनका तेज अद्भुत हुआ। पुत्रों से वे सूर्य किरणों सा शोभायमान थे। भोग भोगते हुए उनका 20 लाख पूर्व वर्षों का कुमारकाल पूर्ण हुआ।
श्लोक 132 से 141 कल्पवृक्षों का नाश और प्रजा की व्यथा
काल प्रभाव से औषधियाँ और बिना बोया धान्य विरल हो गया। कल्पवृक्ष रस-वीर्य रहित होने से प्रजा रोगग्रस्त हुई। व्याकुल प्रजा नाभिराज और फिर भगवान के पास गई। प्रजा ने कहा कि हे देव, कल्पवृक्ष नष्ट हो गए, धान्य नहीं फलते, भूख-प्यास और शीत-आतप से हम दुखी हैं। हे युगकर्ता, हमारी रक्षा के उपाय बताइए।
श्लोक 142 से 151 भगवान का चिंतन और समाधान
प्रजा के दीन वचन सुनकर भगवान ने सोचा कि विदेह क्षेत्र की स्थिति यहाँ लागू करनी चाहिए। असि, मषी आदि छह कर्म और क्षत्रिय आदि वर्ण यहाँ स्थापित हों। कल्पवृक्ष नष्ट होने से कर्मभूमि प्रकट हुई, अतः प्रजा को छह कर्मों से आजीविका करनी चाहिए। भगवान ने प्रजा को आश्वासन दिया। उनके स्मरण से इंद्र आया और प्रजा की जीविका के उपाय किए। इंद्र ने अयोध्या में जिनमंदिर और चार दिशाओं में मंदिर बनाए।
श्लोक 152 से 161 देशों और नगरों की रचना
इंद्र ने कौशल, अयोध्या आदि नगर, वन, और देशों की रचना की। सुकोशल, अवंती, कुरु आदि देश बनाए। कुछ देश नदी-वर्षा से सींचे गए। पृथ्वी स्वर्ग के टुकड़ों सी शोभायमान हुई। विजयार्ध से समुद्र तक देश जल और दुर्लभता से युक्त थे। सीमाओं पर अंतपाल किले बने। म्लेच्छ जातियाँ मध्य देशों की रक्षा करती थीं।
श्लोक 162 से 171 गाँव और नगरों का वर्णन
देशों में कोट, प्राकार से राजधानियाँ शोभायमान थीं। गाँव बाड़, शूद्र-किसानों, और तालाबों से युक्त थे। सौ घरों वाला छोटा, पाँच सौ वाला बड़ा गाँव था। छोटे गाँव की सीमा एक कोस, बड़े की दो कोस थी। नदी, पहाड़ आदि सीमा चिह्न थे। नगर बगीचे, तालाबों, और भवनों से युक्त था। नदी-पर्वत से घिरा नगर खेट, केवल पर्वत से घिरा खर्वट था।
श्लोक 172 से 182 नगरों और कर्मों की व्यवस्था
पाँच सौ गाँवों से घिरा नगर मडंब, समुद्र किनारे का पत्तन था। नदी किनारे का द्रोणमुख, धान्य ढेर वाला संवाह था। एक राजधानी में 800 गाँव थे। इंद्र ने नगर-गाँवों का विभाग कर पुरंदर नाम पाया। प्रजा को बसाकर वह स्वर्ग गया। भगवान ने असि, मषी, कृषि, विद्या, वाणिज्य, और शिल्प छह कर्मों का उपदेश दिया। असि शस्त्र सेवा, मषी लेखन, कृषि खेती थी।
श्लोक 183 से 192 वर्ण व्यवस्था और कृतयुग
भगवान ने क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र वर्ण बनाए। शास्त्र से जीविका करने वाले क्षत्रिय, खेती-व्यापार वाले वैश्य, सेवा करने वाले शूद्र थे। शूद्र कारु और अकारु थे। प्रजा अपने कर्म करती थी। भगवान की आज्ञा से कार्य होते थे। उन्होंने कर्मयुग शुरू कर कृतयुग कहलाया। आषाढ़ कृष्ण प्रतिपदा को प्रजापति बने। प्रजा सुखी हुई तो देवों ने उनका सम्राट अभिषेक किया।
श्लोक 193 से 208 राज्याभिषेक का वर्णन
देवों ने भगवान वृषभदेव का दिव्य जल से अभिषेक किया। संसार आनंद से भर गया, देव इंद्र के साथ अयोध्या आए। अयोध्या पताकाओं से सजाई गई। राजमंदिर में भेरियाँ बजीं, वारस्त्रियाँ मंगल गान गाईं, देवांगनाएँ नृत्य करने लगीं। बंदीजन पराक्रम पढ़ते थे, देव ‘जय जीव’ घोषणा करते थे। मिट्टी की वेदी पर रत्नों से आनंदमंडप बना। पुष्प, मणियाँ, और रेशमी चंदोवा शोभायमान थे। देवांगनाओं से मार्ग रुका, अप्सराएँ चमर ढोलीं। नुपूरों से दिशाएँ शब्दायमान हुईं। गंधर्व संगीत और किन्नर यश गाते थे। देवों ने सुवर्ण कलशों से अभिषेक शुरू किया।
श्लोक 209 से 221 अभिषेक के जल स्रोत
गंगा और सिंधु का हिमवत से गिरता जल लाया गया। गंगाकुंड और सिंधुकुंड का स्वच्छ जल आया। अन्य नदियों और सरोवरों का जल भी लाया गया। श्री-ह्री देवियाँ कमल-केसर युक्त जल लाईं। सुगंधित कमल और समुद्रों का जल आया। नंदीश्वर आदि का स्वच्छ जल सुवर्ण कलशों में लाया गया। भगवान का अभिषेक हुआ, उनका शरीर जल को पवित्र करता था। जल धारा राज्यलक्ष्मी सी शोभायमान थी। यह संताप नष्ट करती थी। इंद्र ने मनुष्यों के मन-शरीर को भी शुद्ध किया। देवांगनाओं के कटाक्ष जल में प्रतिबिंबित हुए।
श्लोक 222 से 231 अभिषेक की शोभा
पवित्र जल से पृथ्वी संतुष्ट सी बढ़ी। भगवान मेरु सा शोभायमान थे। नाभिराज आदि राजाओं ने अभिषेक किया। नगरवासियों ने सरयू जल से चरण धोए। व्यंतर इंद्रों ने प्रीतिपूर्वक पूजा की। तीर्थजल, कषाय जल, और सुगंधित जल से अभिषेक हुआ। भगवान ने गरम जल से स्नान किया। छोड़े गए माला-वस्त्र से पृथ्वी शोभायमान हुई। बंदीजन मंगल-पाठ पढ़ते थे। देवों ने स्वर्गीय माला-आभूषणों से अलंकृत किया।
श्लोक 232 से 241 भगवान का अलंकरण
नाभिराज ने भगवान के मस्तक पर मुकुट रखा। पट्टबंध राज्यलक्ष्मी को स्थिर करता सा था। भगवान माला, कुंडल, हार, और करधनी से सुशोभित थे। उनका मुकुट लक्ष्मी का क्रीड़ाचल सा था। यज्ञोपवीत हिमवान् की गंगा सा था। भुजाएँ कड़ों से कल्पवृक्ष सी थीं। चरण नुपूरों से कमल से थे। वे भूषणांग कल्पवृक्ष से शोभायमान थे। इंद्र ने आनंद नाटक कर स्वर्ग गया। देव-असुर अपने स्थानों को लौटे।
श्लोक 242 से 251 वर्ण और कर्म व्यवस्था
भगवान ने कर्मभूमि में प्रजा का पालन शुरू किया। प्रजा की सृष्टि, आजीविका, और मर्यादा के नियम बनाए। भुजाओं से क्षत्रिय, ऊरुओं से वैश्य, पैरों से शूद्र बनाए। भरत ब्राह्मणों की रचना करेंगे। विवाह व्यवस्था बनाई कि शूद्र केवल शूद्रकन्या से, वैश्य वैश्य-शूद्रकन्या से, क्षत्रिय क्षत्रिय-वैश्य-शूद्रकन्या से, ब्राह्मण मुख्यतः ब्राह्मणकन्या से विवाह करें। अन्य वर्ण की आजीविका करने वाले को दंडित करने का नियम बनाया। छह कर्मों से कर्मभूमि कहलाई। हा, मा, धिक्कार दंड व्यवस्था बनाई। दुष्टों का निग्रह और सज्जनों का पालन शुरू हुआ।
श्लोक 252 से 261 राजा और दंड
दंडहीनता में मात्स्यन्याय होगा। दंड से प्रजा कुमार्ग से बचेगी। राजा को गाय से दूध दुहने सा कर वसूल करना चाहिए। भगवान ने हरि, अकंपन, काश्यप, सोमप्रभ को महामांडलिक राजा बनाया। सोमप्रभ कुरुराज, हरि हरिकांत, अकंपन श्रीधर, काश्यप मधवा बने। ये चार हजार राजाओं के अधिपति थे।
श्लोक 262 से 271 भगवान के नाम और राज्य
भगवान ने कच्छ आदि को अधिराज बनाया। पुत्रों को महल-संपत्ति दी। इक्षु रस संग्रह का उपदेश देकर इक्ष्वाकु कहलाए। सर्वार्थसिद्धि से आए, अतः गौतम कहलाए। तेज के रक्षक होने से काश्यप, मनन करने से मनु-कुलधर कहलाए। प्रजा उन्हें विधाता, विश्वकर्मा आदि नामों से पुकारती थी। उनका 63 लाख पूर्व का राज्यकाल पुत्र-पौत्रों के सुख में बीता। वे साम्राज्यलक्ष्मी का सुख लेते थे। इंद्र भोग सामग्री भेजता था। पुण्य से सुख मिलता है।
श्लोक 272 से 275 पुण्य और धर्म की महिमा
पुण्य से भोग, लक्ष्मी, आयु, रूप, समृद्धि, चक्रवर्ती पद, अरहंत पद, और निर्वाण मिलता है। धर्म स्वर्ग-मोक्ष के सुख देता है। दान, नमस्कार, शील, और उपवास से पुण्य मिलता है। भगवान स्थिर भोगों का अनुभव करते थे और पृथ्वी का शासन करते थे।
आदिपुराण पर्व 17 – भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन
श्लोक 1 से 11 नीलांजना का नृत्य और भगवान की विरक्ति
भगवान वृषभदेव सैकड़ों राजाओं से घिरे सभामंडप में सिंहासन पर निषध पर्वत के सूर्य से विराजमान थे। इंद्र अप्सराओं और देवों के साथ पूजा सामग्री लेकर उनकी सेवा हेतु आया। भक्ति से इंद्र ने अप्सराओं और गंधर्वों का नृत्य शुरू किया। नृत्य ने भगवान के मन को अनुरक्त किया। इंद्र ने उनकी विरक्ति हेतु क्षीणायु नीलांजना को नृत्य के लिए चुना। नीलांजना नृत्य करते हुए आयु क्षय से बिजली सी नष्ट हो गई। इंद्र ने दूसरी देवी खड़ी की, पर भगवान ने अंतर जान लिया। इससे भगवान भोगों से विरक्त हो वैराग्य चिंतन में लीन हुए।
श्लोक 12 से 21 संसार की विनश्वरता पर चिंतन
भगवान ने सोचा कि यह जगत विनश्वर और लक्ष्मी चंचल है। रूप, यौवन, और ऐश्वर्य स्थिर मानने वाला अज्ञानी है। रूप संध्या की लाली सा और यौवन पल्लव सा क्षणिक है। भोग विषवेल से और जीवन नश्वर है। आयु घटीयंत्र के जल सी घटती है, शरीर दुर्गंधित है। संसार में सुख दुर्लभ और दुःख भारी है। नरक के दुःख स्मरण से भोग इच्छा समाप्त हो। आर्तध्यान से भोग नरक में दुःख बनते हैं। नरक में सुख नहीं, केवल दुःख है। जीव तिर्यंच गति में दुःख भोगता है।
श्लोक 22 से 31 जीव की दुःखमय यात्रा
जीव पृथ्वीकायिक आदि योनियों में खोदा, तपाया, और छेदा जाकर दुःख भोगता है। सूक्ष्म अवस्था में परिभ्रमण करता है। त्रस पर्याय में मारा और बंधा जाता है। जन्म, वृद्धावस्था, और मृत्यु के दुःख भोगता है। क्षण में नष्ट, जीर्ण, और पुनर्जन्म लेता है। तिर्यंच योनि में अनंत दुःख भोगता है। अशुभ कर्म मंद होने पर मनुष्य पर्याय पाता है। वहाँ भी कर्म से शारीरिक-मानसिक दुःख भोगता है। सेवा, दरिद्रता, और शोक नरक से हैं।
श्लोक 32 से 41 संसार का असार स्वरूप
शरीर दुःख से भरी गाड़ी सा नष्ट होता है। देवपर्याय में सुख है, पर पतन से दुःख होता है। अल्प विभूति वाले देव दुःखी रहते हैं। जीव संसार चक्र में दुःख भोगता है। नीलांजना का शरीर देखते-देखते नष्ट हुआ। स्त्री रूप से कामीजन पतंग से नष्ट होते हैं। इंद्र ने यह कपट नाटक बोध हेतु किया। भोग भंगुर और धोखे से हैं। आभूषण, चंदन, नृत्य, और गीत व्यर्थ हैं। शरीर की शोभा न हो तो अलंकार बेकार हैं।
श्लोक 42 से 51 वैराग्य और तप की ओर प्रेरणा
भगवान ने रूप, संसार, भोग, और लक्ष्मी को धिक्कारा। वे भोगों से विरक्त हो मुक्ति हेतु उद्यत हुए। उनके हृदय में विशुद्धियाँ मुक्तिलक्ष्मी की सखियाँ सी आईं। वे मुक्ति के लिए चिंतित हुए, जगत शून्य लगा। इंद्र ने उनकी विरक्ति अवधिज्ञान से जानी। लौकांतिक देव ब्रह्मलोक से तप पूजा हेतु आए। ये आठ प्रकार के उत्तम देव शांत, शुभ, और ऋद्धिमान हैं। वे हंस से मुक्ति तट पर उत्कंठित थे।
श्लोक 52 से 61 लौकांतिक देवों की स्तुति
लौकांतिक देवों ने पुष्पांजलि से भगवान की पूजा की। उन्होंने कल्पवृक्ष पुष्पों से चरण पूजे और स्तुति की। कहा कि आप मोह को जीत भव्यजीवों के भाई हैं। आप ज्योतिस्वरूप और उद्धारक हैं। आपके धर्म से भव्य संसार पार करेंगे। आपके वचन सूर्यकिरण से भव्य कमलों को प्रफुल्लित करेंगे। आप ब्रह्मा, विजेता, और जगद्गुरु हैं। आप मोह कीचड़ से जगत का उद्धार करेंगे। आप स्वयंभू और करुणामय हैं।
श्लोक 62 से 71 भगवान की महिमा और प्रेरणा
देवों ने कहा कि आप सन्मार्ग जानते हैं, प्रबोध की आवश्यकता नहीं। आप सूर्य से स्वयं प्रकाशित करते हैं। आप दीपक से प्रबोधित कर प्रबोध देते हैं। आप गर्भ में सद्योजात, जन्म में वाम, तप में अघोर हैं। आप संसार उपकार हेतु उद्यत हों। काल आपके धर्म अमृत हेतु योग्य है। आप तप से कर्म और मोह को जीतें। मोक्ष हेतु भोग छोड़ें। भगवान ने तप हेतु दृढ़ बुद्धि लगाई। लौकांतिक देव स्वर्ग लौटे।
श्लोक 72 से 81 निष्क्रमण कल्याणक का उत्सव
देव अपने इंद्रों के साथ अयोध्या आए। इंद्रादिक ने क्षीरसागर जल से भगवान का अभिषेक किया। दिव्य आभूषण, वस्त्र, और चंदन से अलंकार हुआ। भगवान ने भरत को सम्राट और बाहुबली को युवराज बनाया। निष्क्रमण और राज्याभिषेक से स्वर्ग-पृथ्वी हर्षित हुए। भगवान तपराज्य हेतु और कुमार राज्यलक्ष्मी हेतु तैयार थे। देव शिल्पी पालकी और मनुष्य शिल्पी मंडप बना रहे थे।
श्लोक 82 से 91 उत्सव की भव्यता
इंद्राणी और यशस्वती-सुनंदा ने रंगावली सजाई। दिक्कुमारियाँ और वारांगनाएँ मंगल द्रव्य लिए थीं। भगवान देवों से, कुमार राजाओं से घिरे थे। देव पुष्पांजलि और पुरवासी शेषाक्षत छोड़ रहे थे। अप्सराएँ आकाश में, वारांगनाएँ पृथ्वी पर नृत्य कर रही थीं। देव बाजे और मंगल बाजे बज रहे थे। किन्नर और अंतःपुर स्त्रियाँ गीत गा रही थीं। देवों और मनुष्यों का जय-ध्वनि कोलाहल था। राजमंदिर हर्ष से व्याप्त था। भगवान का दीक्षा उद्योग निराकुल हुआ।
श्लोक 92 से 101 पालकी पर प्रस्थान
भगवान ने शेष पुत्रों में पृथ्वी बाँटी। नाभिराज से पूछकर सुदर्शन पालकी पर बैठे। इंद्र ने हाथ से सहारा दिया। भगवान दीक्षा अंगना के आलिंगन हेतु पालकी पर आरूढ़ हुए। माला, चंदन, और वस्त्रों से शोभित थे। वे विशुद्धता और पालकी पर चढ़े। राजा और विद्याधरों ने पालकी सात-सात पैड ले जाई। वैमानिक-भवनत्रिक देवों ने आकाश में ले गए। इंद्र भी पालकी ढो रहे थे। यक्ष फूल बरसा रहे थे, शीतल वायु बह रही थी।
श्लोक 102 से 111 भगवान का प्रस्थान और उत्सव
देवों के बंदीजन प्रस्थान का मंगलपाठ पढ़ रहे थे। देव भेरियाँ बजा रहे थे। इंद्र की आज्ञा से देव घोषणा कर रहे थे कि भगवान वृषभदेव मोह को जीतने का उद्योग करेंगे। सुर-असुर जय-जय कोलाहल कर रहे थे। मंगलगीत, जय-घोष, और नगाड़ों से आकाश शब्दायमान था। इंद्रों की प्रभा और दुंदुभि शब्द संसार को व्याप्त कर रहे थे। चमर हंसों से आकाश में लहरा रहे थे। करोड़ों दुंदुभि बाजे बज रहे थे। देवांगनाएँ छत्रबंध सहित नृत्य कर रही थीं। किन्नर देवियाँ तप कल्याण का मधुर गान कर रही थीं।
श्लोक 112 से 131 प्रस्थान की शोभा
व्यंतर देव पताकाओं संग नृत्य कर रहे थे। देव शंख-तुरही बजा रहे थे। लक्ष्मी आदि देवियाँ कमल और दिक्कुमारियाँ मंगल द्रव्य लिए आगे चल रही थीं। भगवान रत्नमयी पालकी पर अयोध्या से निकले। उनका तेज मेरु, सूर्य, चंद्र, और अग्निकुमारों को तिरस्कृत कर रहा था। मुकुट, हार, भुजाएँ, और जघनस्थल से वे सुमेरु और जंबूद्वीप सी शोभायमान थे। पैरों की किरणें और शरीर की दीप्ति दिशाएँ व्याप्त कर रही थीं। छत्र और चमर से वे चंद्रमा और क्षीरसागर से सेवा प्राप्त करते दिखे। नगरवासी उनकी स्तुति कर रहे थे।
श्लोक 132 से 141 नगरवासियों की प्रार्थना
नगरवासियों ने कहा कि आप कल्याणमय मार्ग पर जाएँ और शीघ्र लौटें। आप अनाथों के रक्षक हैं, हमारी रक्षा करें। आप बिना कारण उपकार करते हैं। वे मस्तक झुकाकर प्रार्थना कर रहे थे। कुछ बोले कि देव भगवान को दूर ले जा रहे हैं, शायद यह क्रीड़ा हो। पहले भी जन्मोत्सव हेतु सुमेरु गए थे। कुछ ने कहा कि भगवान सूर्य से चमक रहे हैं। वे कुलाचलों में सुमेरु से शोभायमान थे। इंद्र उनकी सेवा में था।
श्लोक 142 से 151 नगरवासियों का विस्मय
देवों की प्रभा बिजलियों सी फैली थी। भगवान का पुण्य वर्णनातीत था। नगाड़े, मृदंग, नृत्य, गीत, और चमर शोभायमान थे। कुछ बोले कि यह स्वर्ग चल रहा है या चित्र है। यह इंद्रजाल या भ्रम हो सकता है। नगरवासी विस्मय से बातें कर रहे थे। कुछ बोले कि भगवान के अवतार से देवों का आना-जाना लगा है। नीलांजना के नृत्य से वैराग्य हुआ। लौकांतिक देवों ने वैराग्य दृढ़ किया। भगवान भोग और शरीर से निःस्पृह हुए।
श्लोक 152 से 161 भगवान की यात्रा और शोक
भगवान स्वातंत्र्य सुख हेतु वन जाना चाहते थे। उनका सुख अधीन था, पुत्रों को राज्य सौंपा। उनकी यात्रा सुखद हो। भगवान चिरंजीव हों और लौटें। भरत महादान दे रहे थे। स्वर्ण, घोड़े, और हाथी बाँटे गए। भगवान ने नगर पार किया। यशस्वती आदि रानियाँ शोक से पीछे चलीं। उनकी शोभा म्लान हुई, आभूषण उतरे। वे डगमगाते हुए भगवान के पीछे गईं।
श्लोक 162 से 171 रानियों का विलाप
कई रानियाँ मूर्च्छित हो बोलीं कि नाथ कहाँ जा रहे हैं। वे शोक से हृदय धड़कन, म्लानता, और आँसुओं से भरी थीं। कुछ ने रोना रोका, पर आँसू रुके। कुछ के हार टूटे, मोती बिखरे। केश खुले, मालाएँ गिरीं, वस्त्र शिथिल हुए। कुछ को पालकी में रखकर सांत्वना दी गई। धीर रानियाँ संतुष्ट हो चलीं। वे बोलीं कि यह मंगल है, शोक न करें। शीघ्र चलें, भगवान दिख रहे हैं।
श्लोक 172 से 181 भगवान का प्रस्थान और पीछे चलना
वृद्ध स्त्रियों ने समझाकर यशस्वती और सुनंदा को पैदल चलने को प्रेरित किया। समाचार सुनते ही देवियों ने छत्र-चमर छोड़ भगवान के पीछे चलना शुरू किया। वृद्ध पुरुषों ने भगवान की व्याकुलता रोकने हेतु रानियों को रोका। रानियाँ निराश हो घर लौटीं। यशस्वती और सुनंदा पूजा सामग्री संग चलीं। नाभिराज, मरुदेवी, और राजा उनके पीछे गए। भरत नगरवासियों और भाइयों संग चले। भगवान आकाश में थोड़ी दूर गए। वे सिद्धार्थक वन पहुँचे।
श्लोक 182 से 191 सिद्धार्थक वन और शिला
इंद्रों की सेना सिद्धार्थक वन पहुँची। वन पक्षियों से शब्दायमान था। वहाँ चंद्रकांत मणि की विशाल, पवित्र शिला थी। शिला भगवान के यश और सिद्धक्षेत्र सी शोभायमान थी। वृक्षों की छाया और फूलों से सजी थी। इंद्राणी ने रत्न चूर्ण से सजाया। मंडप, पताकाएँ, धूप, और मंगल द्रव्य थे। भगवान पालकी से उतरे। शिला देख पांडुकशिला स्मरण हुआ।
श्लोक 192 से 201 दीक्षा की तैयारी
भगवान ने शिला पर बैठ सभा को उपदेश दिया। बंधुओं से दीक्षा की आज्ञा ली। कोलाहल शांत होने पर परिग्रह त्यागा। वस्त्र, आभूषण, और माला छोड़े। आभूषण कांतिहीन हुए। चेतन-अचेतन परिग्रह का परित्याग किया। पूर्व दिशा में पद्मासन लगाया। सिद्धों को नमस्कार कर केशलोंच किया। दिगंबर रूप में दीक्षा धारण की।
श्लोक 202 से 211 दीक्षा और पूजा
भगवान ने सामायिक-चारित्र और व्रत ग्रहण किए। चैत्र कृष्ण नवमी को दीक्षा ली। इंद्र ने केश रत्न पिटारे में रखे। केश चंद्र चिह्न से शोभायमान थे। इंद्र ने केश क्षीरसमुद्र में स्थापित किए। महापुरुषों के आश्रय से केश पूज्य बने। देवों ने त्यागे वस्त्रों की पूजा की।
श्लोक 212 से 221 अन्य राजाओं की दीक्षा
चार हजार राजाओं ने स्वामिभक्ति से दीक्षा ली। वे भाव के बिना द्रव्यलिंगी साधु बने। स्वामी के अभिप्राय से निर्ग्रंथ हुए। कच्छ आदि राजा भक्ति से दीक्षित हुए। कुछ स्नेह, मोह, या भय से दीक्षित हुए। भगवान द्रव्यलिंगियों संग कल्पवृक्ष से शोभायमान थे। उनका तेज तप से और दैदीप्यमान हुआ।
श्लोक 222 से 231 इंद्रों की स्तुति
भगवान का रूप इंद्र को तृप्त न कर सका। इंद्रों ने उनकी स्तुति की। कहा कि आप स्रष्टा और अनिष्ट नाशक हैं। आपके गुण असंख्य हैं। कर्म मल हटने से गुण स्फुरित हैं। आपकी दीक्षा पुण्यरूप और संतापहर है। आप स्वयंबुद्ध हैं।
श्लोक 232 से 241 दीक्षा की महिमा
इंद्रों ने कहा कि आपने राज्यलक्ष्मी छोड़ निर्वाणदीक्षा ली। आप मत्त हस्ती से बंधन तोड़ वन गए। भोग स्वप्न से हैं, आपने मोक्ष चुना। आप चंचल लक्ष्मी और धन त्याग मुक्ति पाएँगे। आप राजलक्ष्मी में विरक्त, तप में अनुरक्त हैं। यह व्याजस्तुति से आपकी महिमा है।
श्लोक 242 से 251 भगवान के गुण
आप सुखी हैं, तीन ज्ञानों से कर्म जीतते हैं। आप मोह अंधकार नष्ट करते हैं। ध्यान से कर्म भट्टी जलाते हैं। रत्नत्रय से कर्म वन नष्ट करते हैं। आपकी ज्ञान-वैराग्य संपत्ति मोक्षदायी है। इंद्र स्वर्ग लौटे। भरत ने वचन मालाओं से पूजा की। भरत ने जल, गंध, और फल से पूजा की।
श्लोक 252 से 257 भरत की पूजा और लौटना
भरत ने चरण प्रक्षालन कर नमस्कार किया। स्तुतियों से भक्ति दिखाई। सूर्य पश्चिम में था जब भरत अयोध्या लौटे। भरत ने राज्य पालते हुए भगवान की परिचर्या की। वे भाइयों को हर्षित और गुरुओं का सम्मान करते थे। भगवान की तरह दिशाओं का पालन किया।
आदिपुराण पर्व 18 – धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भगवान का तप और कायोत्सर्ग
भगवान वृषभदेव ने शरीर से ममत्व छोड़कर मौन धारण किया। उन्होंने छह माह के उपवास की प्रतिज्ञा की। वे कायोत्सर्ग में खड़े हुए, पैरों में अंतर था। कठिन शिला पर पद्मासन से शोभायमान थे। वे अस्पष्ट पाठ पढ़ते हुए पर्वत से जान पड़ते थे। उनकी भुजाएँ लटक रही थीं। केशलोंच से उनका शिर सूर्य से स्पर्धा करता था। उनका मुख निश्चल और सुंदर था। भ्रमर उनकी श्वास से आकर्षित थे। वे कल्पवृक्ष से शोभायमान थे। तप से छत्र होने पर भी अपरिग्रही थे।
श्लोक 12 से 21 तप की महिमा और राजाओं का क्षोभ
हिलते वृक्ष चमर से क्लेश दूर करते दिखे। दीक्षा के बाद उन्हें मनःपर्यय ज्ञान प्राप्त हुआ। चार ज्ञानों से वे परलोक देखते थे। कच्छ आदि राजाओं का धैर्य टूटने लगा। दो-तीन माह में परीषह से उनका धैर्य छूट गया। वे भगवान के कठिन मार्ग पर चलने में असमर्थ थे। वे भगवान के धैर्य और बल की प्रशंसा करने लगे। वे सोचते थे कि भगवान कितने समय खड़े रहेंगे। उन्हें लगा कि भगवान उन्हें क्लेशित कर रहे हैं।
श्लोक 22 से 31 जाओं की शिकायतें
राजा सोचते थे कि भगवान भोजन कर खड़े रहते तो ठीक था। वे उनके उद्देश्य को नहीं समझते थे। उन्हें लगा कि भगवान नीति नहीं जानते। वे तप से खिन्न हो गए। वे कंद-मूल से जीवन निर्वाह करने को तैयार हुए। कुछ तप से उदासीन हो दीन वचन बोले। कुछ मूर्ख मुनि भगवान के समीप खड़े हुए। वे कहते थे कि राज्य में वे भगवान के साथ चलते थे, अब तप में असमर्थ हैं। उन्होंने जल-भोजन नहीं लिया। वे भगवान को निर्दयी मानने लगे।
श्लोक 32 से 41 राजाओं की चिंता
वे सोचते थे कि भगवान घर नहीं लौटेंगे। वे परिवार और प्रजा को याद करने लगे। कुछ घर जाने को भगवान को नमस्कार करते थे। कुछ उनकी धीरता की प्रशंसा करते थे। वे सोचते थे कि भगवान राज्य लौटकर उन्हें अपमानित करेंगे। कुछ डरते थे कि भरत उन्हें कष्ट देगा। वे योग समाप्ति तक सहन करने को तैयार हुए। वे मानते थे कि भगवान उन्हें अंगीकृत करेंगे। कुछ धैर्य से दुःखी नहीं हुए।
श्लोक 42 से 51 तप से विरक्ति
कई अभिमानी वहाँ रहे। कुछ अशक्त हो भगवान के चरण स्मरण करते थे। वे तप से विरक्त हो जीविका सोचने लगे। कुछ लज्जा से मुख फेरकर चले। कुछ प्रदक्षिणा कर प्राणयात्रा सोचने लगे। वे भगवान को शरण मानते थे। कुछ काँपते हुए व्रत छोड़ गए। कुछ रक्षा माँगते हुए चले गए। वे तप में असमर्थ हो भ्रष्ट हुए। वे फल-पानी के लिए वन में फैले।
श्लोक 52 से 61 द्रव्यलिंगियों का पाखंड
वन-देवताओं ने उन्हें फल-पानी से रोका। वे डरकर विभिन्न वेष धारण करने लगे। कुछ ने वल्कल, लंगोटी, भस्म, और दंड धारण किए। वे वन में छाल, जल, और कंद से जीवन चलाने लगे। भरत के डर से वे नगर नहीं गए। वे पाखंडी और परिव्राजक बन गए। वे भगवान की पूजा करते थे। मरीचिकुमार परिव्राजक बन मिथ्या शास्त्र सिखाने लगा।
श्लोक 62 से 72 भगवान का तप
मरीचि ने योग और सांख्य शास्त्र शुरू किए। भगवान तप करते रहे। वे मेरु से निष्कंप और समुद्र से क्षोभरहित थे। तप से उनका शरीर दैदीप्यमान था। तीन गुप्तियाँ उनकी रक्षा करती थीं। छह बाह्य और अंतरंग तप उनके थे। अट्ठाईस मूलगुण उनके सैनिक थे।
श्लोक 73 से 81 : तप का प्रभाव
छह माह उपवास में उनका शरीर दैदीप्यमान रहा। आहार न लेने पर भी परिश्रम नहीं हुआ। उनके केश जटाएँ बन गए। जटाएँ कालिमा सी फैलीं। वन में उनकी कांति सूर्य सी थी। वृक्ष और लताएँ उनकी भक्ति करती थीं। फूल उनके चरणों में गिरते थे। हरिण शांतता दिखाते थे।
श्लोक 82 से 92 वन की शांति
सिंह-हरिण बैर छोड़ साथ रहते थे। बाघ चमरियों के बाल सुलझाते थे। हरिण बाघनियों का दूध पीते थे। हाथी कमल चढ़ाते थे। शांति किरणों ने पशुओं को वश किया। उपवास में भूख न हुई। इंद्रों के आसन काँपने लगे। छह माह क्षणभर से व्यतीत हुए। नमि-विनमि सेवा को आए।
श्लोक 93 से 101 नमि-विनमि और धरणेंद्र
नमि-विनमि भोग माँगते हुए ध्यान में विघ्न करने लगे। वे भगवान से आग्रह करते थे। धरणेंद्र ने आसन कंपन से यह जाना। वह पूजा सामग्री लेकर आया। भगवान ध्यान में लवलीन थे। वे यज्वा और कुंजर से शोभायमान थे।
श्लोक 102 से 111 भगवान की तपस्थिति और धरणेंद्र का आगमन
भगवान वृषभदेव सुमेरु पर्वत से अकंपायमान और दृढ़ थे। उनके शरीर की शांति क्रूर जीवों और इंद्रों से उपासित थी। उनका अंतःकरण ध्यान में निश्चल था। वे समुद्र से गंभीर और दोषरहित थे। धरणेंद्र उनके पास पहुँचा। उसने प्रदक्षिणा, प्रणाम, और स्तुति की। उसने नमि-विनमि से कहा कि वे भयंकर हैं, तपोवन शांत है। उसने भोगों की निंदा की। उसने कहा कि भगवान भोगरहित हैं।
श्लोक 112 से 121 धरणेंद्र और कुमारों का संवाद
धरणेंद्र ने कहा कि भोग अंत में संताप देते हैं। उसने सुझाव दिया कि वे भरत से भोग माँगें। उसने भगवान को मोक्षगामी बताया। नमि-विनमि ने जवाब दिया कि धरणेंद्र उनके कार्य में हस्तक्षेप न करे। उन्होंने कहा कि वे योग्य-अयोग्य जानते हैं। उन्होंने अवस्था का भेद मिथ्या बताया। उन्होंने धरणेंद्र को ढीठ कहा।
श्लोक 122 से 131 कुमारों की प्रतिक्रिया
कुमारों ने धरणेंद्र को दुष्ट और चापलूस कहा। उन्होंने बुद्धिमानों की प्रशंसा की। उन्होंने धरणेंद्र के तेज और वेष की सराहना की। उन्होंने पूछा कि वह उनके कार्य में विघ्न क्यों डाल रहा है। उन्होंने कहा कि भगवान को प्रसन्न करना उनका लक्ष्य है। उन्होंने भगवान को कल्पवृक्ष बताया।
श्लोक 132 से 141 धरणेंद्र का प्रत्युत्तर
कुमारों ने भरत को तुच्छ माना। उन्होंने अभिमान से कहा कि वे उदार स्थान चाहते हैं। धरणेंद्र उनके धैर्य से संतुष्ट हुआ। उसने उनकी भक्ति की प्रशंसा की। उसने अपना परिचय नागकुमार इंद्र के रूप में दिया। उसने कहा कि वह भगवान की आज्ञा से भोग देने आया है।
श्लोक 142 से 151 कुमारों की प्रसन्नता और विजयार्ध यात्रा
कुमार प्रसन्न हो भगवान की सम्मति माँगने लगे। धरणेंद्र उन्हें लेकर आकाश में गया। वह सूर्य और योगिराज से शोभायमान था। वे विजयार्ध पर्वत पहुँचे। पर्वत लवण समुद्र में अवगाहन करता था। उसके शिखर रत्नों से चित्रित थे।
श्लोक 152 से 161 विजयार्ध पर्वत का वर्णन
पर्वत की मेखला मेघों से ढकी थी। सुवर्ण किनारे दावानल सी शोभा देते थे। झरनों से मेघ जर्जरित थे। लताएँ भ्रमरों से ढकी थीं। किन्नर गीतों से सुंदर प्रदेश थे। विद्याधरियाँ झूलों पर झूलती थीं। उनके मुख कमलों से पर्वत शोभायमान था।
श्लोक 162 से 171 पर्वत की शोभा
पर्वत स्फटिक भूमियों से लाल था। गुफाओं में सिंह निर्झर से थे। देव-देवियाँ संभोग और विनोद करते थे। शिखरों पर निर्झर पताकाएँ से थे। चंद्रकांतमणियाँ पानी बहाती थीं। पर्वत सुमेरु से हँसता था। वह विद्याधरों और नदियों से विजयी था।
श्लोक 172 से 181 पर्वत का माहात्म्य
पर्वत जिनेंद्र से अचल और शुद्ध था। वह दो गुफाओं से शोभायमान था। नौ कूट मुकुट से थे। वह पचास योजन चौड़ा और पचीस योजन ऊँचा था। रत्न पाषाण गरम थे। सिंह और कोयल शब्दायमान थे।
श्लोक 182 से 191 पर्वत की विविधता
इंद्रधनुष लता बनती थी। देवांगनाओं के नुपूर शब्द गूँजते थे। हाथी क्रीड़ा करते थे। सर्प और सुरागाएँ शब्द करते थे। पर्वत साँस लेता और झूमता था। विद्याधरियाँ विचार करती थीं। भौंरे संगीत करते थे।
श्लोक 192 से 202 विद्याधरियों का वर्णन
विद्याधरियाँ तरुणों संग विहार करती थीं। उनके मुख सुगंधित थे। नेत्र कामदेव के अस्त्र थे। केश काले और अस्त-व्यस्त थे। अधर बिंबफल से थे। स्तन नख चिह्नों से शोभित थे। भुजाएँ लता सी थीं। चरण कमल से झंकृत थे।
श्लोक 203 से 209 पर्वत और कुमारों की संतुष्टि
अकेली विद्याधरियाँ लता सी थीं। वे फल तोड़ती थीं। नमि-विनमि पर्वत से संतुष्ट हुए। पवन ने उनका परिश्रम हटाया। वन कोयल और भ्रमरों से शब्दायमान थे। धरणेंद्र पर्वत को देख प्रसन्न हुआ।
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन
श्लोक 1 से 11 विजयार्ध पर्वत और विद्याधर लोक का परिचय
धरणेंद्र विजयार्ध पर्वत की पहली मेखला पर उतरा। उसने नमि-विनमि को विद्याधर लोक दिखाया। पर्वत भारी होकर समुद्र में फैला था। इसकी श्रेणियाँ राजा और महादेवियों से शोभायमान थीं। दस योजन ऊँची मेखला स्वर्ग खंड सी थी। विद्याधर देवों से निवास करते थे। यह स्थान नागेंद्रों और भोगों से सेवित था। विद्याधरी कन्याएँ नागकन्याओं सी थीं। यहाँ भय, रोग, और ईतियाँ नहीं थीं। चतुर्थ काल की स्थिति यहाँ थी। कर्मभूमि के कर्म और ऋतुएँ यहाँ पूर्ण थे।
श्लोक 12 से 21 विद्याओं की सिद्धि और संपदा
विद्याधरों को महाप्रज्ञप्ति आदि विद्याएँ कामधेनु सी फल देती थीं। विद्याएँ कुल-परंपरा और तप से प्राप्त होती थीं। तप से सिद्धि हेतु पवित्र स्थान पर ब्रह्मचर्य और पूजा करनी पड़ती थी। सिद्ध विद्याधर भगवान की पूजा कर फल भोगते थे। वे धान्य आदि संपदा का भी उपभोग करते थे। यहाँ धान्य बिना बोये उत्पन्न होता था। बावड़ियाँ कमलों से, नदियाँ रत्नों से, और वन कोकिल-भ्रमरों से शोभायमान थे।
श्लोक 22 से 31 पर्वत की शोभा और नगरों का वर्णन
पर्वत पर कृत्रिम पर्वत लतागृहों से युक्त थे। पुर, खानें, और गाँव नदियों, तालाबों से सुंदर थे। स्त्री-पुरुष रति और कामदेव से शोभायमान थे। यहाँ स्वर्ग के दुर्लभ पदार्थ सुलभ थे। पर्वत विद्याधरों के लिए मनोहर था। इसकी दोनों श्रेणियाँ दस योजन चौड़ी और समुद्र तक लंबी थीं। उत्तर श्रेणी की लंबाई अधिक थी। दक्षिण में 50 और उत्तर में 60 नगर स्वर्ग विमानों से शोभायमान थे।
श्लोक 32 से 41 दक्षिण श्रेणी के नगरों का परिचय
पूर्व दिशा में किन्नामित नगर गगनचुंबी था। किन्नरगीत नगर किन्नर गीतों से सेवित था। नरगीत में उत्सव होते थे। बहुकेतुक पताकाओं से बुलाता सा था। पुंडरीक में हंस गाते थे। सिंहध्वज सिंह चिह्नों से शोभायमान था। श्वेतकेतु सफेद ध्वजाओं से था। गरुडध्वज आकाश को व्याप्त करता था। श्रीप्रभ और श्रीधर लक्ष्मी से सुंदर थे। लोहार्गल और अरिंजय दुर्गम और विजयी थे।
श्लोक 42 से 51 दक्षिण श्रेणी के अन्य नगर
वज्रार्गल और वज्राढ्य हीरे की खानों से थे। विमोच और पुरंजय भवनवासियों को पराजित करते थे। शकटमुखी और चतुर्मुखी आकाश को छूती थीं। बहुमुखी, अरजस्का, और विरजस्का तीनों लोकों की लक्ष्मी सी थीं। रथनूपुरचक्रवाल राजधानी थी। मेखलाग्र, क्षेमपुरी, अपराजित, और कामपुष्प मनोहर थे। गगनचरी, विनयचरी, और चक्रपुर सुशोभित थे। संजयंती और अन्य नगर चमकते थे।
श्लोक 52 से 61 दक्षिण श्रेणी की संरचना
दक्षिण श्रेणी में 50 नगर थे। इनके कोट और गोपुर ऊँचे थे। प्रत्येक नगरी तीन परिखाओं से घिरी थी। परिखाएँ सुवर्ण और रत्नों से बनी थीं। इनमें कमल कर्णाभरण से थे। कोट सुवर्ण धूलि का और छह धनुष ऊँचा था। परकोटा कंगूरों से युक्त था। यह बारह धनुष चौड़ा और चौबीस धनुष ऊँचा था।
श्लोक 62 से 71 नगरों की अट्टालिकाएँ और गोपुर
परकोटे पर अट्टालिकाएँ तीस धनुष ऊँची थीं। ये सुवर्ण और मणियों से चित्रित थीं। दो अट्टालिकाओं के बीच गोपुर थे। गोपुर पचास धनुष ऊँचे थे। इनके बीच बुरज और देवपथ थे। नगरियाँ वस्त्रधारी स्त्रियों सी थीं। प्रत्येक नगरी में एक हजार चौक और बारह हजार गलियाँ थीं। पाँच सौ दरवाजे श्रेष्ठ थे। नगरियाँ नौ योजन चौड़ी और बारह योजन लंबी थीं।
श्लोक 72 से 91 उत्तर श्रेणी के नगर
प्रत्येक नगरी के एक करोड़ गाँव थे। गाँव धानों और ईखों से हरे थे। नगरों का अंतर 195 योजन था। उत्तर श्रेणी में अंतर 178 योजन था। उत्तर में 60 नगर थे, जैसे अर्जुनी, वारुणी, और चंद्रपुर। ये स्वर्गीय थे। यहाँ के मनुष्य देवकुमार और स्त्रियाँ अप्सराएँ सी थीं। पर्वत तीनों लोकों की शोभा धारण करता था।
श्लोक 92 से 101 पर्वत की प्राकृतिक शोभा
पर्वत लतागृहों से रतिक्रीड़ा प्रकट करता था। देव और विद्याधर यहाँ संभोग करते थे। विद्याधरी कुपित हो पतियों को मनाती थीं। पर्वत नृत्य, गीत, और कोयल शब्दों से मनोहर था। यह शीतल वायु और मणियों से सुंदर था। मयूर नृत्य करते थे। सूर्य किरणें वन को दैदीप्यमान करती थीं। पर्वत इंद्रों का मन ललचाता था।
श्लोक 102 से 111 विजयार्ध पर्वत की प्राकृतिक शोभा
विजयार्ध पर्वत गंगा से सींचे वृक्षों और मेघ-चुंबित शिखरों से मेरु को जीतता था। इसके उपवन फूलों और भ्रमरों से शोभायमान थे। गंगा और सिंधु नदियाँ इसे पवित्र करती थीं। विद्याधर यहाँ भाग्य और पुरुषार्थ से फल पाते थे। यहाँ धान्य, रत्न, और फल असमय में उत्पन्न होते थे। सरोवरों पर हंस और कोयल शब्द करते थे। वायु विद्याधरियों को संतोष देता था। सिंह, हाथी, और हरिण वन में थे। हंसिनी अपने साथी के लिए रोती थी।
श्लोक 112 से 121 पर्वत का सौंदर्य और जीवन
चकवी अपने साथी को ढूंढती घूमती थी। शरद् का बादल विद्याधरियों द्वारा खेल में लिया जाता था। गंगा और सिंधु पर्वत को धारण करती थीं। यहाँ सब कुछ सुखद और लुभावना था। वन की पंक्ति धोती और बादल पगड़ी सी थीं। लतागृहों में विद्याधरियाँ क्रीड़ा करती थीं। बादल चंदोवा बन विद्याधरियों को ठंडक देते थे। मयूर बादलों को देख नृत्य करते थे। विद्याधरियाँ बादलों पर शय्या बनाती थीं।
श्लोक 122 से 131 वन्य जीवन और विद्याधरियाँ
हाथी तालाबों में प्रवेश करते थे। सूर्य मणियों से आच्छादित होता था। वृक्ष फूलों से रोते से थे। हंस और मयूर शब्द करते थे। बादल हाथियों से युद्ध करते से थे। वायु से ढकी भूमि भ्रमरों से प्रकट होती थी। वन हाथियों और भ्रमरों से सुंदर था। विद्याधरियाँ जघनों से शोभायमान थीं। वन भ्रमरों से विद्याधरियों को बुलाते थे। अंधेरे में वे दीपक जलाती थीं।
श्लोक 132 से 141 विद्याधरियों और वायु की लीला
विद्याधरियाँ फूल तोड़ती थीं। वे मंजरियों और भ्रमरों सी थीं। वायु भ्रमरों से वृक्ष हिलाता था। यह कल्पवृक्षों को कंपित करता था। वायु कमलवनों में लहरें उत्पन्न करता था। यह पत्तों को मसल चंदोवा बनाता था। किन्नर कंकणों से रति को प्रकट करते थे। मयूर और पक्षी शब्द करते थे। वन की पंक्ति नृत्य करती सी थी।
श्लोक 142 से 151 वन और शिखरों की महिमा
भ्रमर और कोयल वन में शब्द करते थे। मयूरों के प्रतिबिंब कमल सी शोभा देते थे। पर्वत की पवित्रता समुद्र को तिरस्कृत करती थी। वन की पंक्ति मेघ संदेह से मयूरों को नचाती थी। उपवन देवों से क्रीड़ा करते थे। सूर्य मणियों से रंगीन होता था। शिखर दिशाओं को आच्छादित करते थे। अजगर गुफा से वन जलाता था। संध्या की लालिमा मेरु सी थी।
श्लोक 152 से 161 पर्वत का जीवन और रूप
हाथी चट्टानों को तोड़ते थे। हरिण घास सूँघते थे। वे रत्नों से कांति पाते थे। हरिण मणियों को घास समझते थे। किन्नर संगीत से हरिण ठहरते थे। सूर्य शिखर में छिप चकवी को भय देता था। कमल, भ्रमर, और हाथी सदा शोभायमान थे। पर्वत बलभद्र की धोती सा था। यह ऐरावत हाथी सा सुंदर था।
श्लोक 162 से 171 : पर्वत का वैभव
वायु भ्रमरों से शोभायमान था। देवांगनाओं और यहाँ की स्त्रियों में अंतर था। हाथी मणियों से डर भागता था। मयूर नीलमणि से नृत्य करता था। हंस और वृक्ष कामदेव को बुलाते थे। किन्नर स्त्रियों संग विहार करते थे। पर्वत सिंह और रंगों से यश धारण करता था। देवों को यहाँ संतोष मिलता था। सिंह चट्टानों पर प्रहार करता था।
श्लोक 172 से 181 पर्वत और नमि-विनमि का राज्य
अजगर बिल में जीवों को खाता था। पर्वत समुद्र को स्पर्श करता था। गंगा-सिंधु इसके तट को विदीर्ण करती थीं। मेघ शिखरों पर गरजते थे। सारस और मेघ शब्द करते थे। विद्याधरी गीत गाती थी। यह वृषभजिनेंद्र सा था। धरणेंद्र ने नमि-विनमि की प्रशंसा की। उसने उन्हें रथनूपुरचक्रवाल में राज्याभिषेक किया। नमि दक्षिण और विनमि उत्तर श्रेणी के अधिपति बने।
श्लोक 182 से 192 विद्याधरों की स्वीकृति और पुण्य
धरणेंद्र ने विद्याधरों को आज्ञा दी। विद्याधरों ने कार्य स्वीकार किया। धरणेंद्र ने उन्हें विद्याएँ दीं। वे संतुष्ट हो भोग भोगते थे। विद्याधर उनकी सेवा करते थे। नमि और विनमि ने श्रेणियों को वश किया। पुण्य से उन्हें विभूति मिली। भगवान वृषभदेव की भक्ति से यह सुख प्राप्त हुआ।
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन
श्लोक 1 से 11 भगवान वृषभदेव का योग और विहार
भगवान वृषभदेव ने छह माह योग धारण किया। उन्होंने मुनियों को आहार विधि सिखाने का विचार किया। वे नवदीक्षित साधुओं के भ्रष्ट होने से चिंतित हुए। उन्होंने शरीर को न कृश और न पुष्ट करने का निर्णय लिया। इंद्रियों को वश में रखने के लिए मध्यम वृत्ति अपनाने का विचार किया। दोष दूर करने के लिए उपवास और प्राण धारण के लिए आहार की बात कही। कायक्लेश संक्लेश के बिना करना चाहिए, यह सोचा। संयम के लिए निर्दोष आहार लेने का निश्चय किया। योग समाप्त कर वे पृथ्वी को कंपाते हुए विहार करने लगे। उनकी चरणनिक्षेपों से पृथ्वी शोभायमान हुई।
श्लोक 12 से 21 भगवान का नगरों में विहार
ईर्यासमिति से गमन कर पृथ्वी को भार से बचाया। भगवान ने नगरों, ग्रामों में विहार किया। लोग प्रसन्न हो उन्हें प्रणाम करते थे। कुछ लोग पूछते थे कि क्या काम है। कुछ रत्न लाकर पूजा स्वीकारने को कहते थे। करोड़ों पदार्थ और सवारियाँ लाते थे, पर भगवान आगे बढ़ते थे। माला, वस्त्र, और कन्याएँ लाए गए, पर वे उदासीन रहे। लोग स्नान और भोजन के लिए प्रार्थना करते थे।
श्लोक 22 से 31 लोगों की मूर्खता और हस्तिनापुर आगमन
मूर्ख लोग अनुग्रह की प्रार्थना करते थे। कुछ चरण धूलि से पवित्र हो भोजन के लिए कहते थे। वे खाद्य-पेय पदार्थ लाते थे, पर भगवान चुपचाप आगे बढ़ते थे। लोग उनकी चर्या न समझ मूढ़ रहते थे। कुछ रोते हुए विघ्न डालते थे। छह माह और बीते। एक वर्ष पूर्ण होने पर वे हस्तिनापुर पहुँचे। वहाँ राजा सोमप्रभ और श्रेयान्सकुमार थे। श्रेयान्स गुणों और रूप से श्रेष्ठ था।
श्लोक 32 से 41 श्रेयान्स के स्वप्न और उनका फल
श्रेयान्स स्वर्ग से चय कर जन्मा था। भगवान के आगमन पर उसने सात स्वप्न देखे। उसने सुमेरु, कल्पवृक्ष, सिंह, बैल, सूर्य-चंद्र, समुद्र, और व्यंतर मूर्तियाँ देखीं। प्रातःकाल उसने सोमप्रभ को स्वप्न सुनाए। पुरोहित ने कहा कि कोई उदार देव आएगा। स्वप्न गुणों की उन्नति दिखाते थे। पुण्य उदय होगा, ऐसा कहा।
श्लोक 42 से 51 भगवान का हस्तिनापुर में प्रवेश
पुरोहित के वचनों से दोनों भाई प्रसन्न हुए। भगवान ने हस्तिनापुर में प्रवेश किया। लोग दर्शन के लिए कोलाहल करते थे। कुछ कहते थे कि भगवान पालन के लिए आए हैं। वे वन से लौटे हैं, ऐसा कहा। लोग दौड़ते थे। भगवान सुमेरु से ऊँचे और सुवर्ण से दैदीप्यमान थे। उनकी प्रशंसा करते थे। दर्शन से नेत्र सफल होते थे।
श्लोक 52 से 61 लोगों की भक्ति और उत्साह
भगवान तीन लोक के स्वामी होकर अकेले विहार करते थे। लोग उनकी वंदना करना चाहते थे। एक स्त्री दासी को बालक सौंप दर्शन को गई। दूसरी ने स्नान सामग्री छोड़ भगवान के दृष्टि जल से स्नान का विचार किया। तीसरी ने भोजन छोड़ अर्घ ले पूजा को गई। लोग स्नान-भोजन सामग्री हटाकर दर्शन को गए। भक्ति और कौतुक से लोग तत्पर हुए।
श्लोक 62 से 71 भगवान का राजमंदिर प्रवेश
लोग बातचीत कर नमस्कार करते थे। नगर राजमहल तक भर गया। भगवान वैराग्य के लिए भावना करते हुए विहार करते थे। वे चांद्रीचर्या से राजमंदिर पहुँचे। सिद्धार्थ ने सोमप्रभ को समाचार दिया। सोमप्रभ और श्रेयान्स अंतःपुर सहित बाहर आए। दोनों ने दूर से नमस्कार किया।
श्लोक 72 से 81 भगवान का स्वागत और श्रेयान्स का दान
दोनों ने अर्घ चढ़ाया और प्रदक्षिणा दी। वे हर्ष से रोमांचित हुए। भगवान के बीच वे सुमेरु से शोभायमान थे। श्रेयान्स को जातिस्मरण हुआ। उसने पूर्व भव और आहार दान स्मरण किया। उसने प्रातःकाल भगवान को आहार दान दिया। श्रद्धा सहित नवधा भक्ति से दान दिया।
श्लोक 82 से 101 दान के गुण और भगवान की महिमा
दान के सात गुण—श्रद्धा, शक्ति, भक्ति, विज्ञान, अक्षुब्धता, क्षमा, त्याग—कहे गए। नवधा भक्ति में पड़गाहन और शुद्धि शामिल थी। श्रेयान्स ने प्रासुक आहार दिया। भगवान पाणिपात्र से खड़े होकर आहार लेते थे। वे नग्न-दिगंबर, अस्नान, और केशलोंच करते थे। श्रेयान्स ने ईख का रस दान कर सुशोभित हुआ।
श्लोक 102 से 111 दान का उत्सव और भगवान का प्रस्थान
आकाश से देवों ने रत्नों की वर्षा की। फूलों की वर्षा भ्रमरों से व्याप्त थी। देवों के नगाड़े गंभीर शब्द करते थे। शीतल सुगंधित वायु चली। देवों ने ‘धन्य दान, पात्र, दाता’ का शब्द किया। सोमप्रभ और श्रेयान्स ने अपने को कृतकृत्य माना। अनुमोदना से लोग पुण्य प्राप्त करते थे। पुण्य शुभ परिणामों से मिलता है। भगवान ने आहार ग्रहण कर दोनों को हर्षित किया। वे वन को प्रस्थान कर गए।
श्लोक 112 से 121 भगवान के प्रस्थान और दोनों भाइयों की भक्ति
दोनों भाई भगवान को वन जाते हुए देखते रहे। वे उनकी दृष्टि और चित्त को रोक न सके। वे भगवान की कथा और गुणों की स्तुति करते थे। चरणों से पवित्र भूमि को नमस्कार करते थे। पुरवासी उनकी प्रशंसा करते थे। रत्नों से भरे राजांगण में लोग आनंदित थे। दोनों भाई नगर में प्रवेश कर सुशोभित हुए। भगवान पारणा कर वन को चले गए।
श्लोक 122 से 131 श्रेयान्स का यश और दान की शुरुआत
श्रेयान्स के यश से संसार भर गया। दान की प्रथा श्रेयान्स से शुरू हुई। भरत को आश्चर्य हुआ कि उसने भगवान का अभिप्राय कैसे जाना। देवों ने श्रेयान्स की पूजा की। भरत ने श्रेयान्स से अभिप्राय पूछा। श्रेयान्स ने कहा कि भगवान के रूप से उसे जातिस्मरण हुआ।
श्लोक 132 से 141 श्रेयान्स का पूर्वभव और दान की विशुद्धि
श्रेयान्स ने बताया कि वह वज्रजंघ के भव में श्रीमती थी। उसने चारणमुनियों को दान दिया था। दान और काव्य पुण्य से प्राप्त होते हैं। उसने भरत को दान की विशुद्धि बताई। दाता, देय, और पात्र की शुद्धि से दान फलदायी होता है। दाता श्रद्धा आदि गुणों से युक्त होता है।
श्लोक 142 से 151 पात्र और अपात्र का वर्णन
अपात्र को दान से कुभोगभूमि मिलती है। अपात्र दान को दूषित करता है। गुणों से युक्त ही पात्र होता है। दोषवान पात्र संसार से पार नहीं कर सकता। मुनिराज ही उत्तम पात्र हैं। श्रेयान्स ने दान से पंचाश्चर्य प्राप्त किए। उसने भरत को दान देने की प्रेरणा दी।
श्लोक 152 से 161 भरत का सम्मान और भगवान का तप
भरत ने श्रेयान्स के वचनों से प्रीति पाई। उन्होंने सोमप्रभ और श्रेयान्स का सम्मान किया। भगवान ने आहार से बल प्राप्त कर तप शुरू किया। उनके मन में ज्ञानदीप प्रकाशमान हुआ। वे गुण-दोष को जानते थे। उन्होंने पाप से विरक्ति धारण की। दया और व्रतों का पालन करते थे।
श्लोक 162 से 171 व्रतों की भावनाएँ
भगवान ने अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, और परिग्रह त्याग के लिए भावनाएँ धारण कीं। मनोगुप्ति आदि से अहिंसा की रक्षा की। क्रोध त्याग से सत्य पाला। संतोष से अचौर्य रखा। स्त्री कथा त्याग से ब्रह्मचर्य साधा। इंद्रिय विषयों से परिग्रह छोड़ा। मुनियों को भी व्रत पालन करना चाहिए।
श्लोक 172 से 183 भगवान का तपश्चरण
भगवान ने चारित्र के पाँच भेद साधे। उन्होंने बारह प्रकार का तप किया। अनशन और अवमौदर्य तप तपे। वृत्तिपरिसंख्यान और रसपरित्याग तप किए। कायक्लेश से इंद्रिय और मन को जिता। ज्ञान प्राप्त होने पर भी कायक्लेश तपा।
श्लोक 184 से 193 तप की महिमा और भगवान की स्थिति
भगवान कायक्लेश से कर्म जलाते थे। वे सूर्य से दैदीप्यमान थे। उनकी शय्या एकांत में होती थी। वे छह बाह्य और अंतरंग तप करते थे। प्रायश्चित्त उनके चारित्र में सिद्ध था। विनय भी उनमें अंतर्भूत था।
श्लोक 194 से 201 भगवान के अंतरंग तप
भगवान का वैयावृत्य तप रत्नत्रय में व्यापार था। उनकी शुभ कषाय मंद हो गई थी। वे प्रायश्चित्त, विनय, वैयावृत्य के स्वामी थे। धर्म-सृष्टि को उन्होंने उदाहरण स्वरूप धारण किया। वे स्वाध्याय करते थे। स्वाध्याय से मुनियों में यह परंपरा चली। स्वाध्याय से चित्त स्थिर होता है। उनका व्युत्सर्ग तप शरीर से ममत्व छोड़ने में था।
श्लोक 202 से 211 ध्यान तप की महिमा
भगवान का ध्यान तप व्युत्सर्ग से सिद्ध हुआ। ध्यान से वे कृतकृत्य हुए। ध्यान ही उत्तम तप है। मन, इंद्रिय, और काय के निग्रह से तप होता है। वे बारह तपों में प्रयत्नशील थे। संवर के लिए गुप्ति आदि धारण किए। वे एकांत, मनोहर स्थानों में ध्यान करते थे। गुफा, नदी किनारे आदि ध्यान के योग्य थे। वे पहाड़ों पर ध्यान लगाते थे।
श्लोक 212 से 221 ध्यान के स्थान
भगवान सुंदर शिखरों पर ध्यान करते थे। वे अगम्य वनों में विराजते थे। निर्झरों के पास ठंड में ध्यान करते थे। श्मशान में राक्षसों के बीच ध्यान लगाते थे। नदी, सरोवर, और वनों में विहार करते थे। वे पुरिमताल नगर के शकट उद्यान में ठहरे। वटवृक्ष की शिला पर पद्मासन से ध्यान लगाया।
श्लोक 222 से 231 धर्मध्यान की सिद्धि
भगवान ने सिद्धों के आठ गुणों का चिंतवन किया। अनंत सम्यक्त्व आदि गुणों का ध्यान किया। बारह अनुप्रेक्षाओं से धर्मध्यान साधा। आज्ञाविचय आदि चार धर्मध्यान धारण किए। वे प्रमादरहित सातवें गुणस्थान में थे। उनकी शुक्ल लेश्या दैदीप्यमान थी।
श्लोक 232 से 241 मोह पर विजय
भगवान ने विशुद्धि से कर्मों को नष्ट किया। संयम को टोप और कवच बनाया। ध्यान को अस्त्र और ज्ञान को मंत्री बनाया। गुणों से कर्मों को हराया। कर्मों की प्रकृति बदल गई। उन्होंने कर्मों को जड़ से उखाड़ फेंका।
श्लोक 242 से 253 क्षपक श्रेणी और गुणस्थान
भगवान क्षपक श्रेणी पर आरूढ़ हुए। सातवें से नौवें गुणस्थान तक पहुँचे। पृथक्त्ववितर्क शुक्लध्यान से मोह को नष्ट किया। कषाय और वेद को चूर्ण किया। अनिवृत्तिकरण में जयभूमि प्राप्त की। तीन करणों का स्वरूप बताया गया।
श्लोक 254 से 261 कर्मों का विनाश
अध:करण में स्थिति-बंध कम हुआ। अपूर्वकरण में निर्जरा हुई। अनिवृत्तिकरण में सोलह प्रकृतियाँ नष्ट कीं। आठ कषाय और सूक्ष्म लोभ को जीता। दसवें गुणस्थान में मोह पर विजय पाई। वे कुश्ती विजेता से सुशोभित थे।
श्लोक 262 से 273 केवलज्ञान की प्राप्ति
बारहवें गुणस्थान में मोह नष्ट किया। दूसरे शुक्लध्यान से घातिया कर्म जलाए। केवलज्ञान प्राप्त कर सर्वज्ञ हुए। अनंत लब्धियाँ प्राप्त कीं। फाल्गुन एकादशी को केवलज्ञान हुआ। देवों ने जय-शब्द किए। पुष्पवर्षा और वायु से समवसरण शुद्ध हुआ।
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन
श्लोक 1 से 11 श्रेणिक का प्रश्न और गौतम का उपदेश
राजा श्रेणिक ने गौतम गणधर से ध्यान का स्वरूप पूछा। उन्होंने ध्यान के लक्षण, भेद, स्वामी, समय, हेतु, और फल के बारे में जानना चाहा। गौतम ने कहा कि ध्यान कर्मों का क्षय करता है। चित्त का निरोध ध्यान है। यह अंतर्मुहूर्त तक रहता है। स्थिर चित्त ध्यान है, चंचल चित्त अनुप्रेक्षा है। यह बारहवें गुणस्थान तक होता है। बुद्धि के अधीन वृत्ति ही ध्यान है।
श्लोक 12 से 21 ध्यान की निरुक्ति और आलंबन
ध्यान के पर्याय शब्द योग, समाधि आदि हैं। आत्मा का परिणाम ध्यान है। करण, कर्तृ, और भाव से इसकी निरुक्ति होती है। ध्यान ज्ञान की पर्याय है। यह दर्शन, सुख, वीर्य को धारण करता है। चैतन्य से भिन्न होकर प्रकाशमान होता है। समस्त तत्त्व इसके आलंबन हैं। आत्मतत्त्व का चिंतवन विशुद्धि के लिए है। यह बंध नष्ट कर मुक्ति देता है। सभी पदार्थ ध्येय हैं।
श्लोक 22 से 31 शुभ और अशुभ ध्यान
शुभ चिंतवन ही ध्यान है। अशुभ चिंतवन असद्ध्यान है। तत्त्व न जानने वाला संक्लेश करता है। संकल्प से राग-द्वेष और बंध होता है। तृष्णा संकल्प है। तत्त्वार्थ भावना से ध्यान शुद्ध होता है। ध्यान प्रशस्त और अप्रशस्त दो प्रकार का है। यह आर्त, रौद्र, धर्म्य, शुक्ल चार भेदों में है। आर्त और रौद्र छोड़ने योग्य हैं। धर्म्य और शुक्ल ग्रहण करने योग्य हैं।
श्लोक 32 से 41 आर्तध्यान का वर्णन
आर्तध्यान चार प्रकार का है। इष्ट वियोग, अनिष्ट संयोग, निदान, और वेदना से यह होता है। इष्ट के लिए चिंतवन पहला आर्तध्यान है। अनिष्ट वियोग के लिए चिंतवन दूसरा है। भोगाकांक्षा तीसरा है। वेदना दूर करने का चिंतवन चौथा है। यह कषाय से छठवें गुणस्थान तक होता है। यह अशुभ लेश्या से उत्पन्न होता है। इसका फल तिर्यंच गति है। परिग्रह, कृपणता इसके चिह्न हैं।
श्लोक 42 से 51 रौद्रध्यान का वर्णन
रौद्रध्यान क्रूर पुरुष का होता है। यह चार प्रकार का है। हिंसानंद, मृषानंद, स्तेयानंद, और संरक्षणानंद इसके भेद हैं। यह पाँचवें गुणस्थान तक होता है। अशुभ लेश्या से उत्पन्न होता है। हिंसा, झूठ, चोरी, परिग्रह रक्षा इसके लक्षण हैं। हिंसक अपने आत्मा का घात करता है। क्रूरता, कठोर वचन इसके चिह्न हैं।
श्लोक 52 से 64 ध्यान की तैयारी
रौद्रध्यान का फल नरकगति है। आर्त और रौद्र का त्याग करना चाहिए। धर्म्य और शुक्ल उत्तम हैं। मुनि एकांत, श्मशान, नदी किनारे पर ध्यान करते हैं। पर्यंक आसन से शरीर सम रखते हैं। हाथ ऊपर, आँखें संतुलित रखते हैं। धीरे श्वास लेते हैं। मन को हृदय आदि में स्थिर कर तत्त्वों का चिंतवन करते हैं।
श्लोक 65 से 71 ध्यान में आसन का महत्व
तीव्र प्राणायाम से चित्त व्याकुल होता है। मंद श्वास से ध्यान सिद्ध होता है। सम शरीर से समाधान रहता है। विषम शरीर से बुद्धि आकुल होती है। पर्यंक और कायोत्सर्ग आसन सुखकर हैं। विषम आसन से पीड़ा होती है। ये दोनों आसन ध्यान के लिए उत्तम हैं।
श्लोक 72 से 81 आसन और स्थान की व्यवस्था
पर्यंक आसन अधिक सुखकर है। बलवान सभी आसनों से ध्यान करते हैं। कायोत्सर्ग और पर्यंक अशक्तों के लिए हैं। शक्तिशाली को सभी आसन ठीक हैं। शरीर की अवस्था ध्यान के विरोधी न हो। एकांत स्थान निवास के योग्य है। शहर में चित्त व्याकुल होता है। वन में रहना उचित है। सभी काल ध्यान के लिए ठीक हैं।
श्लोक 82 से 95 ध्याता का लक्षण
ध्यान करने वाला मुनि अपनी अवस्था से सिद्ध होता है। वह बलवान, तपस्वी, शास्त्रज्ञ होता है। आर्त-रौद्र से दूर रहता है। प्रमादरहित, बुद्धिमान, धीर-वीर होता है। वैरागी, सम्यग्ज्ञानी, व्रती होता है। कषायों से मुक्त, अनित्य का चिंतवन करता है। ज्ञान, दर्शन, चारित्र से मोह से बचता है।
श्लोक 96 से 111 ध्यान की भावनाएँ और ध्येय
ज्ञान की पाँच भावनाएँ शास्त्र पठन आदि हैं। सम्यग्दर्शन की सात भावनाएँ भय, शांति आदि हैं। चारित्र की भावनाएँ समिति, गुप्ति, और परीषह हैं। वैराग्य की भावनाएँ विषय त्याग आदि हैं। इनसे मुनि की बुद्धि स्थिर होती है। चौदह पूर्व जानने वाला ध्याता उत्तम है। अल्पश्रुत भी ध्याता हो सकता है। यह मुनि शुक्लध्यान को प्राप्त करता है। तत्त्व, सात तत्त्व, और शास्त्र ध्येय हैं। शब्द, अर्थ, ज्ञान ध्येय हैं।
श्लोक 112 से 120 : सिद्ध और अर्हंत ध्येय
सिद्ध परमेष्ठी ध्यान करने योग्य हैं। वे कर्ममल से मुक्त और विशुद्ध हैं। अनंत गुणों से युक्त हैं। सूक्ष्म पर प्रकट हैं। वे कल्याणकारी और सर्वज्ञ हैं। साकार और निराकार हैं। रत्नमय दर्पण जैसे स्पष्ट हैं। वे संसार नष्ट करते हैं। अर्हंत जिनेंद्र भी ध्येय हैं।
श्लोक 121 से 131 : अर्हंत के गुण
अर्हंत राग-विद्या को जीतते हैं। वे सिद्ध, बुद्ध, विश्वदर्शी हैं। केवलज्ञान उनका नेत्र है। समवसरण में विराजते हैं। अष्ट प्रातिहार्य उनकी प्रभुता दिखाते हैं। वे विश्वरूप और विश्वव्यापी हैं। निःस्पृह, नित्य, और अविनाशी हैं। ये गुण धर्म्य और शुक्लध्यान के ध्येय हैं। विशुद्धि में भेद है।
श्लोक 132 से 141 धर्म्यध्यान के भेद
ध्यान मुक्ति का कारण है। यह धर्म्य और शुक्ल दो प्रकार का है। वस्तु का स्वरूप धर्म है। धर्म्यध्यान चार भेदों का है। आज्ञाविचय आगम का ध्यान है। आगम सूक्ष्म पदार्थों को प्रकाशित करता है। मुनि आगम का ध्यान करता है। अपायविचय संसार के दुःखों का चिंतवन है।
श्लोक 142 से 151 धर्म्यध्यान का विस्तार
अपायविचय में उपायों का चिंतवन है। विपाकविचय कर्मों के उदय का ध्यान है। कर्म स्वयं और तप से फल देते हैं। संस्थानविचय लोक के आकार का चिंतवन है। मुनि लोक की रचना और जीवों का ध्यान करता है। संसार दुस्तर और गंभीर है।
श्लोक 152 से 161 धर्म्यध्यान का स्वरूप
आगम का विस्तार ध्येय है। धर्म्यध्यान अप्रमत्त अवस्था में होता है। यह शुभ लेश्या से चौथे से छठे गुणस्थान में होता है। इसका फल उत्तम है। प्रसन्नता इसके चिह्न हैं। अनुप्रेक्षाएँ इसके अंतरंग चिह्न हैं।
श्लोक 162 से 171 धर्म्यध्यान का फल
धर्म्यध्यान से अशुभ कर्मों की निर्जरा होती है। यह स्वर्ग और मोक्ष देता है। ध्यान छूटने पर भावनाओं का चिंतवन करना चाहिए। गौतम ने श्रेणिक को धर्म्यध्यान समझाया। शुक्लध्यान मोक्ष का कारण है। यह शुक्ल और परम शुक्ल दो भेदों का है। पहले शुक्लध्यान के दो भेद हैं।
श्लोक 172 से 182 शुक्लध्यान के भेद
पृथक्त्ववितर्क में शास्त्र का संक्रमण होता है। एकत्ववितर्क में संक्रमण नहीं होता। मुनि शब्द और योग बदलता है। चौदह पूर्व जानने वाला इसे धारण करता है। श्रुतस्कंध इसका ध्येय है। मोह का क्षय इसका फल है। यह आठवें से बारहवें गुणस्थान में होता है।
श्लोक 183 से 191 एकत्ववितर्क और परम शुक्ल
एकत्ववितर्क कषायमुक्त मुनि का है। यह केवलज्ञान देता है। यह बारहवें गुणस्थान में होता है। परम शुक्ल केवलियों का है। वे योग निरोध से समुद्घात करते हैं। आत्मा लोक को व्याप्त करती है। वे पूरक और रेचक अवस्था में पूज्य हैं।
श्लोक 192 से 205 परम शुक्लध्यान और सिद्ध अवस्था
केवली भगवान लोक को पूर्ण कर संकोच करते हैं। वे अघातिया कर्मों को नष्ट करते हैं। योग का निरोध कर तीसरा शुक्लध्यान करते हैं। फिर चौथा शुक्लध्यान प्राप्त करते हैं। इसमें कर्म नष्ट कर निर्वाण पाते हैं। चौदहवें गुणस्थान में कर्मप्रकृतियाँ नष्ट होती हैं। वे शुद्ध और मुक्त होकर लोकांत में निवास करते हैं। सिद्ध अनंत सुख में रहते हैं।
श्लोक 206 से 211 सिद्धों का सुख
सिद्धों के पर्याय शब्द कृतार्थ आदि हैं। उनका सुख अतींद्रिय है। वेदनाओं का अभाव होता है। शुद्ध आत्मा का सुख नित्य है। स्वास्थ्य ही सुख है। वे क्लेशरहित होने से अबाध्य हैं।
श्लोक 212 से 221 ध्यान का महत्व और प्रश्न
ध्यान से कर्म नष्ट होते हैं। यह कर्मरूपी विष को हरता है। ग्यारह तप इसके सहायक हैं। श्रेणिक संतुष्ट हुए। ऋषियों ने गौतम से अन्य ध्यान पूछे। वे विप्रतिपत्तियाँ दूर करना चाहते थे। गौतम को ऋषि, यति कहा। वे योग का निराकरण चाहते थे। गौतम ने तत्त्व स्पष्ट करने का वचन दिया।
श्लोक 222 से 231 योग के तत्त्व
योगवादी से योग, समाधि आदि पूछना चाहिए। योग काय, वचन, मन की क्रिया है। समाधि चित्त का स्थिर होना है। प्राणायाम योग का निग्रह है। धारणा बीजाक्षरों का अवधारण है। आध्यान भावनाओं का चिंतवन है। ध्येय शुद्ध आत्मतत्त्व है। स्मृति तत्त्वों का स्मरण है। ‘अर्हं’ बीज का ध्यान दुःख हरता है।
श्लोक 232 से 242 जाक्षर और योग का निराकरण
‘अर्हद्भ्यो नमः’ से अर्हंत अवस्था मिलती है। ‘नमः सिद्धेभ्यः’ मनोरथ पूर्ण करता है। ‘नमोऽर्हत्परमेष्ठिने’ दुःख हरता है। पंच परमेष्ठियों का बीज मोक्ष देता है। यह ब्रह्मतत्त्व को जानने में सहायक है। ध्यान से आनंद और ऋद्धियाँ मिलती हैं। बीज न जानने वाला बंधन में रहता है। अन्य मतों में जीव नित्य हो तो ध्यान असंभव है।
श्लोक 243 से 251 अन्य मतों का खंडन
अनित्य जीव में ध्यान सिद्ध नहीं होता। क्षणिक वृत्ति स्मरण नहीं कर सकती। पुद्गलवाद में ध्याता सिद्ध नहीं होता। विज्ञानाद्वैत में विषय के अभाव से ध्यान नहीं होता। शून्यवाद में कोई ध्यान नहीं कर सकता। सांख्य में चैतन्यरहित आत्मा ध्येय नहीं बनती।
श्लोक 252 से 261 स्याद्वाद और अर्हंत की महिमा
द्वैत-अद्वैत में ध्यान सिद्ध नहीं होता। स्याद्वाद में ही ध्यान संभव है। जीव द्रव्य से नित्य, पर्याय से अनित्य है। स्याद्वादी ही ध्यान सिद्ध करते हैं। अर्हंत मोह पर विजयी हैं। वे आप्त, सर्वज्ञ, और कल्याणकारी हैं। उनके अनेक नाम हैं।
श्लोक 262 से 268 अर्हंत और गौतम का उपदेश
अर्हंत का रूप प्रकाशमान है। उनका मुख शासकपना सिखाता है। गौतम ने ध्यानतत्त्व का निरूपण किया। मुनि संतुष्ट हुए। वे गौतम और वृषभदेव की स्तुति कर उनकी लक्ष्मी सुनने को तैयार हुए।
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन
श्लोक 1 से 11 जिनेंद्र का केवलज्ञान और संसार का आनंद
जिनेंद्र भगवान ने घातिया कर्मों पर विजय प्राप्त की। संसार में शांति छा गई। केवलज्ञान से तीनों लोकों में क्षोभ उत्पन्न हुआ। देवों के घंटे, सिंहनाद, और नगाड़े गूंजे। भवनवासी देवों को दर्शन का आह्वान हुआ। इंद्रों के आसन कंपायमान हुए। देवों के हाथी नृत्य करने लगे। कल्पवृक्ष फूल बरसाते सुशोभित हुए। दिशाएँ प्रसन्न हुईं। केवलज्ञानरूपी चंद्रमा ने संसार को आनंदित किया। अवधिज्ञानी इंद्र ने इसे जाना।
श्लोक 12 से 21 इंद्र का प्रस्थान
इंद्र आनंद से नतमस्तक होकर भगवान को नमस्कार करता उठा। उसने इंद्राणी को केवलज्ञान का समाचार बताया। नगाड़ों की सूचना पर वह देवों के साथ पूजा के लिए निकला। बलाहकदेव ने रत्नमय विमान बनाया। नागदत्त ने ऐरावत हाथी बनाया। सौधर्मेंद्र उस पर सवार हुआ। किल्विषिक और अन्य देव अपनी सवारियों पर पीछे चले। अप्सराएँ नृत्य करती गईं।
श्लोक 22 से 31 देवों के भेद
इंद्र ऐश्वर्यशाली होते हैं। सामानिक इंद्र के समान गुणी होते हैं। त्रायस्त्रिंश सभा में तैंतीस होते हैं। पारिषद मित्र के समान होते हैं। आत्मरक्ष अंगरक्षक होते हैं। लोकपाल स्वर्ग की रक्षा करते हैं। अनीक सात प्रकार की सेना होते हैं। प्रकीर्णक नगरवासी और आभियोग्य नौकर होते हैं। किल्विषिक पापकर्मी होते हैं। व्यंतर और ज्योतिषी कुछ भेदों से रहित होते हैं।
श्लोक 32 से 41 ऐरावत हाथी का वर्णन
ऐरावत का शरीर विशाल और बलवान था। उसके अनेक मुख, दाँत, और सूँडें थीं। वह शक्तिशाली और शूरवीर था। उसकी सूँड लंबी और चिकनी थी। उसका वक्ष चौड़ा और कान मनोहर थे। नख अर्धचंद्राकार थे। वह पर्वत के समान ऊँचा था। उसका शब्द गंभीर और सुगंधित था। वह सात प्रतिष्ठाओं से युक्त था। भ्रमर उसकी सेवा करते थे।
श्लोक 42 से 51 ऐरावत की शोभा
ऐरावत का तालू लाल था। उसके कानों से मृदंग-सा शब्द होता था। वह मदजल और सूँड से पर्वत-सा लगता था। दाँत चंद्रमा जैसे थे। वह सरोवर और कल्पवृक्ष की शोभा धारण करता था। सोने की साँकल और माला से सुशोभित था। वह घंटाओं से पूजा की घोषणा करता था। उसका शरीर जंबूद्वीप-सा और सफेदी कैलाश-सी थी।
श्लोक 52 से 61 इंद्र और अप्सराओं का वैभव
ऐरावत पर इंद्र सुशोभित था। इसके बत्तीस मुखों पर सरोवर और अप्सराएँ नृत्य करती थीं। नृत्य हास्य और शृंगार से भरा था। किन्नरियाँ विजयगीत गाती थीं। बत्तीस इंद्रों की सेनाएँ फैलीं। चमर हंसों-से लगते थे। आकाश आभूषणों से चित्रित था।
श्लोक 62 से 71 आकाश की शोभा
आकाश मणियों की कांति से व्याप्त था। वह संध्या, समुद्र, और मोतियों से सुशोभित था। देवांगनाएँ कल्पलताओं-सी लगती थीं। उनके मुख सरोवर-से थे। भ्रमर कामदेव की डोरी-से थे। देवों का आगमन समुद्र-सा था। वह ज्योतिषी सृष्टि-सा प्रतीत होता था।
श्लोक 72 से 81 देवों का आगमन और समवसरण
आकाश चित्रपट और वर्षा की शोभा धारण करता था। स्वर्ग शून्य हो गया। देवों से जगत दूसरा स्वर्ग-सा लगा। देवों ने समवसरण देखा। यह बारह योजन का और इंद्रनीलमय था। यह दर्पण-सा सुशोभित था। इंद्र ने इसकी रचना की। इसकी शोभा भव्य जीवों को प्रसन्न करती है।
श्लोक 82 से 91 धूलीसाल का वर्णन
समवसरण के बाहर रत्नों का धूलीसाल था। यह इंद्रधनुष-सा लगता था। यह काला, पीला, और लाल था। हरित मणियों से कमलिनी-सा था। चंद्रकांत और अन्य मणियों से चित्रित था। यह काम-क्रोध को चूर्ण करने वाला था। सुवर्ण धूलि से अग्नि-सा था। चार तोरणद्वार इससे सुशोभित थे।
श्लोक 92 से 102 मानस्तंभ की शोभा
धूलीसाल के भीतर चार मानस्तंभ थे। ये गोपुरद्वारों से घिरी पीठिका पर थे। अभिषेक जल से पवित्र थे। ये आकाश को स्पर्श करते थे। घंटाओं और ध्वजाओं से युक्त थे। इनके मूल में जिन प्रतिमाएँ थीं। मिथ्यादृष्टि का मान नष्ट करते थे। इंद्रध्वज कहलाते थे।
श्लोक 103 से 111 बावड़ियों की शोभा
मानस्तंभों के पास कमलयुक्त बावड़ियाँ थीं। ये भव्य जीवों की शुद्धता-सी लगती थीं। नीले-सफेद कमलों से ढकी थीं। चार-चार बावड़ियाँ दिशाओं में थीं। मणियों की सीढ़ियाँ और स्फटिक किनारे वाली थीं। ये भगवान के गुण गाती और नृत्य करती प्रतीत होती थीं। आगे परिखा कमलों से घिरी थी।
श्लोक 112 से 121 परिखा और लतावन
परिखा स्वच्छ जल से भरी थी। यह आकाशगंगा-सी सेवा करती लगती थी। इसमें तारों का प्रतिबिंब था। पक्षियों की माला करधनी-सी लगती थी। लहरें नृत्य करती थीं। मछलियाँ कटाक्षों का अभ्यास करती प्रतीत होती थीं। लतावन फूलों और लताओं से सुशोभित था। लताएँ हास्य और नील वस्त्र धारण करती थीं।
श्लोक 122 से 131 लतावन का वैभव
आकाश केसर से सुगंधित था। भ्रमर फूलों पर गूंजते थे। वायु लताओं को हिलाता था। क्रीड़ा पर्वत और लतागृह संतोष देते थे। चंद्रकांत शिलाएँ विश्राम के लिए थीं। सुवर्णमय कोट निषध पर्वत-सा था। यह इंद्रधनुषों से चित्रित था। मोती और मूँगे इसकी शोभा बढ़ाते थे।
श्लोक 132 से 141 कोट की शोभा
कोट विभिन्न रंगों से वर्षा-सा लगता था। इसमें जानवरों और लताओं के आकार थे। यह चमकता और सिंहनाद करता था। चार चाँदी के गोपुरद्वार आकाश को स्पर्श करते थे। ये निर्मल और लाल किरणों से युक्त थे।
श्लोक 142 से 151 गोपुरद्वार और नाट्यशालाएँ
गोपुरद्वारों पर देव गीत गाते थे। इनमें मंगलद्रव्य और तोरण थे। निधियाँ भगवान के प्रभाव को दर्शाती थीं। दो-दो नाट्यशालाएँ थीं। ये तीन खंडों वाली और मोक्ष मार्ग बताती थीं। सुवर्ण खंभों और स्फटिक दीवारों से बनी थीं। देवांगनाएँ नृत्य करती थीं।
श्लोक 152 से 161 नाट्यशालाओं का संगीत
नाट्यशालाओं में वीणा और मृदंग बजते थे। ये सफेद बादलों-सी थीं। किन्नर संगीत से चित्त आकर्षित होता था। धूपघटों से सुगंध फैलती थी। धुआँ मेघों-सा लगता था। भ्रमर सुगंध सूँघते थे। मृदंग और पुष्पवर्षा से वर्षाकाल प्रतीत होता था।
श्लोक 162 से 171 वनों का वर्णन
चार वन वीथियाँ नंदन-सी थीं। अशोक, सप्तपर्ण, चंपक, और आम के वृक्ष फूलों से हँसते थे। ये अर्घ लेकर खड़े थे। शाखाएँ नृत्य करती थीं। वृक्ष राजाओं-से सुखद थे। भ्रमर गुणगान करते थे। फूलों की भेंट होती थी। कोयलें इंद्रों को बुलाती थीं।
श्लोक 172 से 181 वनों की रमणीयता
वन प्रकाश से दिन-रात रहित थे। सूर्य किरणें संकोच करती थीं। बावड़ियाँ पीली थीं। तालाब, पर्वत, और महल थे। वन स्त्रियों-से मनोहर और सुखद थे। अशोक वन लाल फूलों से प्रेम वमन करता था। सप्तपर्ण सात स्थानों को दिखाता था।
श्लोक 182 से 191 चैत्यवृक्षों की महिमा
चंपक वन दीपांग-सा था। आम्र वन स्तुति करता था। अशोक वृक्ष पीठिका पर था। तीन कोटों से घिरा था। यह शोकरहित करता था। नीले पत्ते और लाल फूलों से युक्त था। भ्रमर कामदेव की तर्जना करते थे। यह प्रभावशाली था।
श्लोक 192 से 201 चैत्यवृक्ष का वैभव
चैत्यवृक्ष घंटों से घोषणा करता था। ध्वजाएँ पाप पोंछती थीं। तीन छत्र ऐश्वर्य दिखाते थे। चार प्रतिमाएँ थीं। देव पूजा करते थे। ये निर्मल थीं। अन्य वनों में भी चैत्यवृक्ष थे। ये इंद्र पूजित और शोभायमान थे।
श्लोक 202 से 211 वृक्ष और वनवेदिका
वृक्ष राजाओं-से फल, तेज, और पत्तों से युक्त थे। ये प्रेम और प्रसन्नता प्रकट करते थे। भगवान का केवलज्ञान अनुपम था। वनों के अंत में सुवर्णमयी वनवेदिका थी। यह भव्य बुद्धि-सी ऊँची और सुरक्षित थी। गोपुरद्वारों में घंटे और मालाएँ थीं। ध्वजाएँ महावीथी को अलंकृत करती थीं।
श्लोक 212 से 221 ध्वजाओं का वर्णन
ध्वजाओं के खंभे राजाओं-से ऊँचे थे। इनकी चौड़ाई 88 अंगुल और अंतर 25 धनुष था। ये तीर्थंकर की ऊँचाई से बारह गुने थे। ध्वजाओं में दस चिह्न थे। एक दिशा में 108 ध्वजाएँ थीं। ये वायु से हिलकर पूजा का आह्वान करती थीं। मालाएँ सौमनस्य दिखाती थीं।
श्लोक 222 से 231 ध्वजाओं की शोभा
वस्त्र ध्वजाएँ लहरों-सी थीं। मयूर साँप की काँचली निगलते थे। कमल आकाश में खिलते थे। भ्रमर कमलों पर भ्रमित होते थे। हंस द्रव्यलेश्या दिखाते थे। गरुड़ आकाश उल्लंघन करते थे। सिंह हाथियों को जीतना चाहते थे।
श्लोक 232 से 241 ध्वज और दूसरा कोट
बैल विजयपताका धारण करते थे। हाथी पर्वत-से थे। चक्र सूर्य से स्पर्धा करते थे। ध्वजाएँ आकाश साफ करती थीं। ये तीनों लोकों का स्वामित्व दिखाती थीं। दूसरा चाँदी का कोट था। इसके गोपुरद्वार हास्य-से थे। निधियाँ कुबेर को लज्जित करती थीं।
श्लोक 242 से 251 कल्पवृक्ष वन
दूसरे कोट में नाट्यशालाएँ और धूपघट थे। कल्पवृक्ष वन रत्नों से दैदीप्यमान था। ये राजाओं-से ऊँचे और फलयुक्त थे। ये देवकुरु-से लगते थे। फल आभूषण-से थे। देव वहाँ क्रीड़ा करते थे। सिद्धार्थ वृक्ष सूर्य-से थे।
श्लोक 252 से 261 वन और मकान
कल्पवृक्ष वनों में बावड़ियाँ और सभागृह थे। वनवेदिका चार गोपुरद्वारों से घिरी थी। आगे सुवर्ण खंभों वाले मकान थे। ये चंद्रकांत दीवारों से चित्रित थे। देव संगीत और नृत्य से आराधना करते थे।
श्लोक 262 से 271 स्तूप और तीसरा कोट
महावीथियों में नौ-नौ स्तूप थे। ये मेरु-से ऊँचे थे। सिद्ध प्रतिमाएँ चित्रित थीं। छत्र और पताकाएँ थीं। भव्य लोग पूजा करते थे। तीसरा स्फटिक कोट आकाश-सा था। यह भव्य जीव-सा विशुद्ध था।
श्लोक 272 से 281 श्रीमंडप
तीसरे कोट के गोपुरद्वार मंगलद्रव्यों से युक्त थे। व्यंतर और अन्य देव द्वारपाल थे। सोलह दीवालें सभाओं को विभाजित करती थीं। श्रीमंडप रत्नों से बना था। यह तीनों लोकों को स्थान देता था।
श्लोक 282 से 291 श्रीमंडप की शोभा
श्रीमंडप में फूल तारों-से लगते थे। मालाएँ कभी मुरझाती नहीं थीं। भ्रमर गुंजार से प्रकट होते थे। हंस शब्दों से पहचाने जाते थे। दीवालों में प्रतिबिंब चित्र-से थे। पहली वैडूर्य पीठिका थी।
श्लोक 292 से 301 पीठों का वर्णन
प्रथम पीठिका पर सोलह सीढ़ियाँ थीं। धर्मचक्र सूर्य-से थे। दूसरा सुवर्ण पीठ था। इसमें आठ ध्वजाएँ थीं। तीसरा रत्नमय पीठ सुमेरु-सा था। भ्रमर सुवर्ण-से लगते थे।
श्लोक 302 से 311 पीठ और समवसरण
तीसरा पीठ सुमेरु-सा लोक को नीचा करता था। भगवान इसमें सिद्ध-से विराजते थे। समवसरण का विस्तार एक-एक योजन था। महावीथियाँ एक कोश चौड़ी थीं। पीठों की ऊँचाई आठ, चार, और चार धनुष थी।
श्लोक 312 से 316 गौतम का उपदेश
गौतम ने समवसरण का वर्णन किया। श्रेणिक का मुख प्रफुल्लित हुआ। सभा में प्रीति बढ़ी। इंद्र प्रसन्न हुआ। समवसरण जयवंत रही।
आदिपुराण पर्व 23 – समवसरणविभूति का वर्णन
श्लोक 1 से 11 गंधकुटी का निर्माण और उसकी शोभा
कुबेर ने सुमेरु के तीसरे पीठ पर रत्नजटित, पवित्र गंधकुटी बनाई। यह इंद्रधनुष रचती, फूलों और चमरों से शोभती थी। सूर्य से स्पर्धा करती यह स्वर्ग के विमानों को लज्जित करती थी। ऊँचे शिखरों और पताकाओं से यह देवों को बुलाती-सी लगती थी।
श्लोक 12 से 21 गंधकुटी की अलौकिक सुंदरता
गंधकुटी तीन पीठों सहित लक्ष्मी की प्रतिमा-सी थी। मोतियों, सुवर्ण जालियों और रत्नमालाओं से अलंकृत यह भ्रमरों और स्तोत्रों से स्तुति करती-सी लगती थी। सुगंध, फूल और धूप से यह स्त्री-सी शोभती थी।
श्लोक 22 से 31 सिंहासन और भगवान की उपस्थिति
गंधकुटी ने सुगंध से दिशाएँ भर दीं। यह छह सौ धनुष विस्तृत थी। इसके मध्य रत्नमय सिंहासन पर भगवान वृषभदेव अधर विराजमान थे। इंद्र ने फूल बरसाए, जो भ्रमरों से गूंजते थे।
श्लोक 32 से 41 पुष्पवर्षा और अशोक वृक्ष
पुष्पवर्षा ने बारह योजन तक पराग फैलाया। भगवान के समीप अशोक वृक्ष रत्नमय पत्तों और फूलों से नृत्य करता और स्तुति करता था। इंद्र ने इसे मुख्य वृक्ष बनाया।
श्लोक 42 से 51 छत्र और चमरों की शोभा
तीन सफेद छत्र चंद्रमा को जीतते थे, रत्नों से जड़े थे। यक्षों के चमर क्षीरसागर-से लगते थे, जो आकाशगंगा-सी शोभती थीं। ये भगवान के यश को प्रकट करते थे।
श्लोक 52 से 61 चमर और दुंदुभि का वैभव
चमरों की संख्या चौंसठ थी, जो चक्रवर्ती से राजा तक घटती थी। ये चंद्रमा-सी कांति से स्पर्धा करते थे। दुंदुभि मधुर शब्द करते थे, जिन्हें मयूर प्रेम से देखते थे।
श्लोक 62 से 71 दिव्यध्वनि और प्रभामंडल
नगाड़े गंभीर शब्द करते थे। समवसरण भूमि भगवान की प्रभा से शोभती थी, जिसमें सात भव दिखते थे। उनकी दिव्यध्वनि सर्वभाषारूप थी, जो मोह नष्ट करती थी।
श्लोक 72 से 81 समवसरण का वर्णन
दिव्यध्वनि भगवान का गुण थी। समवसरण में भगवान सिंहासन पर थे। सभा पताकाओं, सरोवरों और परिखा से शोभती थी, जो इंद्रों को बुलाती-सी लगती थी।
श्लोक 82 से 91 समवसरण की संरचना
समवसरण नृत्यशालाओं, धूपघटों, वनों, ध्वजाओं और कल्पवृक्षों से युक्त थी। स्फटिक कोट और श्रीमंडप इसे अलंकृत करते थे। सौधर्मेंद्र ने इसमें प्रवेश किया।
श्लोक 92 से 101 भगवान के दर्शन और पूजा
भगवान चार मुखों से शोभित, अनंतचतुष्टय के स्वामी थे। उनकी प्रभा सूर्य से स्पर्धा करती थी। इंद्र और इंद्राणी ने प्रणाम कर उनकी पूजा की।
श्लोक 102 से 111 भगवान के चरणों की पूजा
भगवान वृषभदेव के चरणकमलों की नख-किरणें देवों के मस्तकों को स्पर्श करती थीं, मानो शेषाक्षत अर्पित कर रही हों। इंद्रों ने भक्ति से प्रणाम किया, उनके मस्तक चरण-प्रभा से पवित्र हुए। इंद्राणी ने अप्सराओं संग नमस्कार किया, नख-किरणें उसके स्तनों पर पड़ीं। इंद्र कल्पवृक्ष-से पूजा करते दिखे। इंद्रों और इंद्राणी ने गंध, पुष्प, धूप, अक्षत आदि से चरणों की पूजा की। इंद्राणी ने रत्न-चूर्ण से मंडल बनाया और जलधारा छोड़ी।
श्लोक 112 से 121 इंद्राणी की भक्ति और स्तुति का प्रारंभ
इंद्राणी ने रत्नमय दीपकों से भगवान की पूजा की, जो भक्ति में योग्यता का विचार नहीं करती। उसने धूप, दीप और अमृत-पिंड अर्पित किए, जो चंद्रमा-से लगते थे। फलों से भी उसने हर्षपूर्वक पूजा की। देवों ने भी भक्ति की, पर वीतराग भगवान को इससे प्रयोजन नहीं था, फिर भी वे भक्तों को फल देते थे। इंद्र प्रसन्नचित्त होकर भगवान की स्तुति करने लगे, अपनी भक्ति को गुण-रत्नों के खजाने की पूजा बताया।
श्लोक 122 से 131 भगवान के गुणों की स्तुति
इंद्रों ने कहा कि भगवान सर्वज्ञ, अविनाशी और जगत् के हितकारी हैं। उनकी गुण-किरणें कर्म-कलंक हटाकर चमकती हैं। वे संसार-लता को शांत परिणाम से उखाड़ते हैं। चार कषायों और कामदेव को उन्होंने तप और चारित्र से जीता। उनका शरीर विकाररहित और शांतिसुख का प्रतीक है, जो तीनों लोकों के गुरु होने को दर्शाता है।
श्लोक 132 से 141 भगवान के शरीर का वैभव
भगवान का शरीर सुंदर, सुगंधित, लक्षणयुक्त और दैदीप्यमान है। यह विकार-मल से मुक्त, वज्रमय संधियों वाला और अपार शक्ति का धारक है। यह सूर्य-सा तेजस्वी और स्वर्ग से रत्न-धारा लाता है। जन्म पर फूलों की वृष्टि और अभिषेक ने उनका माहात्म्य फैलाया। तपकल्याणक में देव उनकी सेवा करते थे।
श्लोक 142 से 151 भगवान की महिमा और उपासना
भगवान मोक्षमार्ग के धाता, तीनों लोकों के स्वामी और गुणों के खजाने हैं। वे मित्र, गुरु और पितामह हैं, जिनका ध्यान मोक्ष देता है। योगी उनके अगम का चिंतन करते हैं। उनकी चमरें, सिंहासन, छत्र और अशोकवृक्ष उनकी महिमा दर्शाते हैं। ये संसार से मुक्ति दिलाते हैं।
श्लोक 152 से 161 समवसरण का वैभव और स्तुति
दुंदुभि और पुष्पवर्षा से समवसरण गूंजता था, मयूर शब्द करते थे। चमरें कांति बढ़ाती थीं। भगवान की दिव्यध्वनि सर्वभाषारूपी और तत्त्वज्ञान देने वाली थी। उनकी वाणी तीर्थ और मोक्षमार्ग है। वे सर्वज्ञ, सर्वजित् और तीर्थंकर हैं। इंद्रों ने उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश रूप में पूजा।
श्लोक 162 से 171 इंद्रों की नमस्कार और भगवान का रूप
बत्तीस इंद्रों ने स्तुतियाँ कीं और नमस्कार किया। वे समवसरण में बैठे। भगवान का शरीर सुवर्ण-सा, भुजाएँ हाथी-सी, मुख चंद्र-सा और नेत्र कमल-से थे। चमरों से घिरा यह शरीर कामदेव को जीतता था। देवांगनाएँ उनके मुख को असंतुष्ट होकर देखती थीं।
श्लोक 172 से 181 भगवान के शरीर की प्रशंसा
भगवान का मुख कमल-सा, नेत्र विशाल और शरीर सुगंधित था। यह क्रोध-राग से मुक्त और शांत था। चरण लाल कमल-से, सिंहासन रत्नमय और छत्र चंद्र-सा था। उनका चरित्र जीवों का हित करता था। अशोकवृक्ष उनकी सेवा में शोभता था।
श्लोक 182 से 191 समवसरण के अवयवों की स्तुति
समवसरण में पुष्पवर्षा, ध्वजाएँ, मानस्तंभ, सरोवर, लतावन और चार वन शोभते थे। धूपघट, नाट्यशालाएँ, कल्पवृक्ष और स्तूप उनकी महिमा बढ़ाते थे। ये कल्याणकारी थे।
श्लोक 192 से 196 समवसरण की संरचना और प्रभाव
समवसरण में मानस्तंभ, सरोवर, कोट, सभाएँ और पीठिका थी। बारह गण क्रम से बैठते थे। भगवान स्याद्वाद-रथ पर सवार थे। उनकी स्तुति करने वाला अर्हंत अवस्था पाता है।
आदिपुराण पर्व 24 – भगवत्कृत धर्मोपदेश का वर्णन
श्लोक 1 से 11 श्रीवृषभदेव की जय और भरत का पूजा निश्चय
भगवान् श्रीवृषभदेव ने अपने ज्ञान से मोहरूपी विष को दूर कर समस्त जगत् को जगा दिया। राजर्षि भरत को एक साथ तीन समाचार मिले: उनके पिता को केवलज्ञान प्राप्त हुआ, अंतःपुर में पुत्र जन्मा, और आयुधशाला में चक्ररत्न प्रकट हुआ। भरत ने इन समाचारों को सुनकर यह विचार किया कि इनमें से पहले किसका उत्सव करना चाहिए। उन्हें लगा कि केवलज्ञान धर्म का फल, पुत्र काम का फल, और चक्ररत्न अर्थ का फल है। अंततः उन्होंने निश्चय किया कि सबसे पहले धर्मकार्य अर्थात् भगवान् की पूजा करनी चाहिए। इसके लिए वे अपने भाई, अंतःपुर की स्त्रियों और नगर के प्रमुख लोगों के साथ पूजा सामग्री लेकर भगवान् की वंदना के लिए तैयार हुए।
श्लोक 12 से 21 भरत का समवसरण की ओर प्रस्थान और पूजा
महाराज भरत नगाड़ों की गंभीर ध्वनि के साथ सेना सहित समवसरण की ओर प्रस्थान करते हैं। उनकी सेना समुद्र की लहरों और ध्वजाओं से सुशोभित दिखती है। समवसरण पहुँचकर वे प्रदक्षिणा देते हैं, मानस्तंभों और धर्मचक्रों की पूजा करते हैं, और गंधकुटी में भगवान् वृषभदेव को श्रेष्ठ सिंहासन पर विराजमान देखते हैं। वे भगवान् की भक्ति में लीन होकर पूजा के लिए आगे बढ़ते हैं।
श्लोक 22 से 31 भगवान् वृषभदेव का दिव्य स्वरूप और भरत की पूजा
भगवान् वृषभदेव चमरों, छत्रों, और पुष्पवृष्टि से सुशोभित दिखते हैं, मानो सुमेरु पर्वत हों। उनकी प्रभा और दिव्य ध्वनि से आनंद फैलता है। भरत उनकी प्रदक्षिणा करते हैं और उत्कृष्ट सामग्री से पूजा करते हैं। पूजा के बाद वे घुटनों पर बैठकर भगवान् को नमस्कार करते हैं और स्तुति शुरू करते हैं।
श्लोक 32 से 41 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 1)
भरत भगवान् को ब्रह्मा, परमज्योति, सृष्टिकर्ता, सर्वदर्शी, और आत्मभू कहकर स्तुति करते हैं। वे उन्हें हिरण्यगर्भ, परमात्मा, शंकर, और सर्वज्ञ बताते हैं। भगवान् को योगी, सिद्ध, और धर्म के अधिपति कहते हुए उनकी महिमा का वर्णन करते हैं।
श्लोक 42 से 51 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 2)
भरत भगवान् को उत्तम, स्थिर, अचल, और संसार का अंत करने वाला कहते हैं। वे उनके आठ प्रातिहार्यों और छत्रत्रितय की शोभा की प्रशंसा करते हैं। भगवान् का सिंहासन लोकभार धारण करने वाला प्रतीत होता है। भरत उनकी भक्ति में तल्लीन होकर स्तुति करते हैं।
श्लोक 52 से 61 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 3)
भरत भगवान् की प्रभा को पुण्यरूप जल मानते हैं। उनकी दिव्यध्वनि मोह को नष्ट करती है। वे भगवान् को सर्वव्यापी, स्वयंभू, और क्षायिक गुणों से युक्त कहते हैं। उनका ज्ञान और दर्शन एक साथ कार्य करते हैं, जो आश्चर्यजनक है।
श्लोक 62 से 71 भरत की भगवान् वृषभदेव की स्तुति (भाग 4)
भरत भगवान् के अनंत बल और सम्यक्चारित्र की प्रशंसा करते हैं। उनका सुख विषय-कषाय से मुक्त है। वे उनके जन्म के चमत्कारों का वर्णन करते हैं और उन्हें सर्वगत, सनातन कहते हैं। उनकी भक्ति से प्रेरित होकर भरत स्तुति करते हैं।
श्लोक 72 से 81 भरत की स्तुति समापन और तत्त्व प्रश्न
भरत भगवान् की भक्ति में अपनी अक्षमता स्वीकार करते हैं और उनकी कृपा माँगते हैं। स्तुति के बाद वे सभा में बैठते हैं और तत्त्वों के स्वरूप, मार्ग, और फल के बारे में प्रश्न करते हैं। भगवान् गंभीर वाणी से जवाब शुरू करते हैं।
श्लोक 82 से 91 भगवान् की दिव्यध्वनि और तत्त्व वर्णन
भगवान् की दिव्यध्वनि बिना प्रयत्न के प्रकट होती है। वे जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, और काल द्रव्यों का वर्णन करते हैं। तत्त्व को सम्यग्ज्ञान और मुक्ति का आधार बताते हुए इसके भेदों (दो, तीन, चार, पाँच, छह) का विवेचन करते हैं।
श्लोक 92 से 101 जीवतत्त्व का विस्तृत वर्णन
भगवान् जीव को चेतन, अनादि, ज्ञाता, और कर्ता बताते हैं। उसका स्वभाव ऊर्ध्वगमन और संकोच-विस्तार करना है। वे गति, इंद्रिय आदि मार्गणाओं और गुणस्थानों से जीव के अन्वेषण की व्याख्या करते हैं। ज्ञानोपयोग और दर्शनोपयोग के भेद भी स्पष्ट करते हैं।
श्लोक 102 से 111 जीवतत्त्व का उपयोग और पर्याय
भगवान् वृषभदेव बताते हैं कि ज्ञानोपयोग वस्तुओं को भेदपूर्वक ग्रहण करता है, इसलिए इसे साकार कहते हैं, जबकि दर्शनोपयोग सामान्य रूप से ग्रहण करता है, इसलिए यह अनाकार है। जीव को जीव, प्राणी, जंतु, क्षेत्रज्ञ, पुरुष, पुमान्, आत्मा, अंतरात्मा और ज्ञानी जैसे पर्यायवाची शब्दों से जाना जाता है। जीव का स्वरूप नित्य है, पर उसकी पर्यायें अनित्य हैं। यह उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से युक्त है। मिथ्यादृष्टि लोग इसके स्वरूप को गलत समझते हैं और विवाद करते हैं।
श्लोक 112 से 121 मिथ्यानय और मोक्ष के साधन
मिथ्यादृष्टि लोग आत्मा के अस्तित्व, नित्यता, कर्तृत्व, भोक्तृत्व और मोक्ष को लेकर भिन्न-भिन्न मत रखते हैं। भगवान् भरत को इन मिथ्या नयों को छोड़कर सही जीवतत्त्व समझने को कहते हैं। जीव की दो अवस्थाएँ हैं: संसार और मोक्ष। सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र ये तीनों मिलकर मोक्ष के साधन हैं। इनमें से किसी एक की कमी से मोक्ष संभव नहीं है।
श्लोक 122 से 131 मोक्षमार्ग और तत्त्वों की शुद्धता
कुछ मूर्ख लोग केवल एक या दो साधनों से मोक्ष मानते हैं, पर यह गलत है। आप्त, आगम और पदार्थों में श्रद्धा से सम्यग्दर्शन शुद्ध होता है। आप्त वह है जो कर्मों से मुक्त और कृतकृत्य हो। आगम आप्त का वचन है। जीव के भव्य, अभव्य और मुक्त तीन भेद हैं। भव्य जीव सिद्धि प्राप्त कर सकता है, अभव्य नहीं। मुक्त जीव कर्मबंधन से मुक्त हैं।
श्लोक 132 से 141 अजीवतत्त्व का वर्णन
अजीवतत्त्व के पाँच भेद हैं: धर्म, अधर्म, आकाश, काल और पुद्गल। धर्म गति में और अधर्म स्थिति में सहायक है, पर ये स्वयं प्रेरक नहीं हैं। आकाश स्थान देता है और काल परिवर्तन का सहकारी कारण है। काल दो प्रकार का है: व्यवहारकाल और निश्चयकाल। व्यवहारकाल से निश्चयकाल का बोध होता है।
श्लोक 142 से 151 अजीव के गुण और पुद्गल के भेद
निश्चयकाल लोकाकाश में असंख्यात अणुओं से जाना जाता है और एकप्रदेशी होने से अनस्तिकाय है। धर्म, अधर्म, आकाश और काल अमूर्तिक हैं, जबकि पुद्गल मूर्तिक है। पुद्गल में वर्ण, गंध, रस और स्पर्श होते हैं। इसके स्कंध और परमाणु दो भेद हैं। परमाणु सूक्ष्म और नित्य हैं। पुद्गल के छह भेद हैं: सूक्ष्मसूक्ष्म, सूक्ष्म, सूक्ष्मस्थूल, स्थूलसूक्ष्म, स्थूल और स्थूलस्थूल।
श्लोक 152 से 161 पुद्गल भेद और तत्त्व निरूपण
पानी आदि स्थूल और पृथिवी आदि स्थूलस्थूल हैं। जो इन तत्त्वों का सही श्रद्धान करता है, वह परब्रह्म अवस्था पाता है। भगवान् वृषभदेव भरत को चार पुरुषार्थ, मार्ग, फल, बंध, मोक्ष, लोकों का स्वरूप, स्वर्ग, और तीर्थंकरों के कल्याणकों का वर्णन करते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान के द्रव्यों का स्वरूप बताते हैं।
श्लोक 162 से 172 भरत और अन्य की प्रबुद्धता
तत्त्व सुनकर भरत आनंदित होते हैं और सम्यग्दर्शन व अणुव्रत ग्रहण करते हैं। वे गुरुदेव से प्रबुद्ध होकर शोभित होते हैं। सभा धर्मामृत से संतुष्ट होती है। वृषभसेन दीक्षा लेकर प्रथम गणधर बनते हैं। अन्य राजा और राजकन्याएँ भी दीक्षा लेते हैं।
श्लोक 173 से 181 गणधर और श्रावकों का उत्थान
वृषभसेन, सोमप्रभ, ब्राह्मी, सुंदरी आदि दीक्षा लेते हैं। श्रुतकीर्ति और प्रियव्रता श्रावक व्रत ग्रहण करते हैं। अनंतवीर्य मोक्ष के अग्रगामी बनते हैं। मरीचि को छोड़ अन्य तपस्वी पुनः दीक्षित होते हैं।
श्लोक 182 से 186 भरत का अयोध्यापुरी में प्रवेश
भगवान् की पूजा कर भरत बाहुबली आदि के साथ अयोध्या लौटते हैं। वे सूर्य के समान प्रभावशाली और विजयी प्रतीत होते हैं। अयोध्या जिनवाणी की तरह शोभित होती है, जिसमें पदार्थों का विस्तार, पवित्रता और आनंद भरा है।
आदिपुराण पर्व 25 – भगवान के एक हजार आठ नामों का वर्णन और भगवान के विहार का दर्शन करने वाला
श्लोक 1 से 12 भगवान वृषभदेव की महिमा और सौधर्मेंद्र की स्तुति का प्रारंभ
भगवान वृषभदेव की महिमा का वर्णन करते हुए कहा गया है कि राजर्षि भरत के चले जाने और दिव्यध्वनि के बंद होने पर वे समुद्र की तरह शांत हो गए हैं। उन्होंने धर्मरूपी जल से जीवों को सींचा और कल्पवृक्ष की भाँति अभीष्ट फल प्रदान किए। उनके चरणों में तीनों लोक विश्राम करते हैं। वे अनंत बल, गुणरूपी रत्नों और नव केवलज्ञान की किरणों से सुशोभित हैं। चार श्रमण संघों से घिरे हुए वे सुमेरु पर्वत जैसे प्रतीत होते हैं। आठ प्रातिहार्य, पाँच कल्याणक और चौंतीस अतिशयों से युक्त वे तीनों लोकों के स्वामी हैं। सौधर्मेंद्र ने स्थिर चित्त से उनकी स्तुति शुरू की, यह कहते हुए कि यद्यपि वे बुद्धि में सीमित हैं, पर भक्ति से प्रेरित होकर स्तुति करते हैं। वे मानते हैं कि भगवान की स्तुति से उत्तम फल प्राप्त होते हैं और मोक्ष सुख उसका परिणाम है।
श्लोक 13 से 21 भक्ति की प्रेरणा और भगवान के गुणों का प्रभाव
सौधर्मेंद्र कहते हैं कि भगवान के गुणों से प्रेरित भक्ति उन्हें आनंदित करती है और संसार से उदासीन होने पर भी वे स्तुति में प्रवृत्त हैं। थोड़ी-सी भक्ति भी कल्पवृक्ष की तरह बड़े फल देती है। भगवान का शरीर आभूषणों से रहित होकर भी राग-द्वेष पर विजय का प्रतीक है। उनका भूषणरहित शरीर स्वयं दैदीप्यमान है और अतिशय सुंदर प्रतीत होता है। उनके मुख पर क्रोध या शस्त्र का प्रयोग नहीं है, फिर भी उन्होंने घातियाकर्मों को नष्ट किया। उनकी सौम्य दृष्टि और निर्मल दीप्ति कामदेव पर विजय और पुण्यधारा की तरह जीवों को पवित्र करती है।
श्लोक 22 से 31 भगवान के मुख की शोभा और वचनों की महिमा
भगवान का मुख शरद् चंद्रमा की तरह कांतिमय है और वीतरागता को प्रकट करता है। उनकी पवित्र कांति अंधकार को नष्ट करती है और सरस्वती की तरह सुशोभित है। देवों की नेत्र-पंक्ति उनके मुखरूपी कमल पर भ्रमरों की तरह प्रतीत होती है। उनके वचनरूपी मकरंद से भव्य जीव आनंदित होते हैं। एक दिशा में मुख होने पर भी वे सर्वदर्शी प्रतीत होते हैं। उनके वचनरूपी किरणें अंधकार नष्ट करती हैं और अमृत की तरह जीवों को अमर बनाती हैं। उनका मुख धर्म का खजाना है और वचन सभा को आनंदित करते हैं।
श्लोक 32 से 41 शरीर की दिव्यता और समवसरण का माहात्म्य
भगवान का शरीर पसीना, मलमूत्र से रहित, सुगंधित और वज्र की तरह स्थिर है। उनकी सुंदरता, सौभाग्य और मधुर वाणी अद्वितीय हैं। उनका अपरिमित वीर्य अल्प शरीर में समाया है। समवसरण के चारों ओर सौ योजन तक अन्न-पान सुलभ होता है और यह आकाश में स्थिर रहता है। उनके उपदेश से हिंसक जीव भी अहिंसक हो जाते हैं। मोहनीय कर्म के क्षय से वे कवलाहार से मुक्त हैं। मूर्ख जो उनके कवलाहार की कल्पना करते हैं, उन्हें मोह दूर करने के लिए अनुभवी स्नेह की आवश्यकता है।
श्लोक 42 से 51 कर्मों पर विजय और दिव्य गुण
भगवान कर्मों से मुक्त हैं और असातावेदनीय उनके लिए प्रभावहीन है। वे पाप को धोने वाले, ईति-उपसर्ग से रहित हैं। उनका केवलज्ञान अनंतमुखी है और वे चतुर्मुख, अविनाशी हैं। उनका शरीर छायारहित और नेत्र अनुन्मेष हैं। उनके नख-केश स्थिर रहते हैं, जो रसादि के अभाव को दर्शाते हैं। उनके उदार गुण अद्वितीय हैं और इंद्र भी उनके रूप-सौंदर्य की इच्छा करते हैं, पर वे इन्हें त्यागते हैं।
श्लोक 52 से 61 समवसरण की शोभा और भक्ति का फल
उनकी उपासना करने वाले उनकी समानता प्राप्त करते हैं। समवसरण में अशोकवृक्ष, चमर, छत्र और सिंहासन उनकी शोभा बढ़ाते हैं। देवों के दुंदुभि उनके जयोत्सव की घोषणा करते हैं। पुष्पवर्षा और प्रभामंडल समवसरण को प्रभातमय बनाते हैं। उनके नखों की किरणें चरणों को कल्पवृक्ष की तरह सुशोभित करती हैं।
श्लोक 62 से 71 चरणों की महिमा और विजय के नाम
उनके चरणों की किरणें जीवों को आह्लादित करती हैं और मोह पर विजय का प्रतीक हैं। वे स्वयंभू, तीनों लोकों के स्वामी और विद्वानों में श्रेष्ठ हैं। उन्होंने घातियाकर्म, मृत्यु और संसार को जीता, इसलिए अनंतजित, मृत्युंजय और त्रिपुरारि कहलाते हैं।
श्लोक 72 से 81 गुणों के नाम और नमस्कार
वे त्रिनेत्र, अंधकांतक, अर्धनारीश्वर, शिव, हर, शंकर, वृषभ आदि नामों से पुकारे जाते हैं। वे चार शरणों के मूर्तिस्वरूप और पंच परमेष्ठी हैं। उनके कल्याणकों और कर्म-विनाश के लिए सौधर्मेंद्र नमस्कार करते हैं।
श्लोक 82 से 91 अनंत गुण और पवित्रता
वे अनंत वीर्य, सुख, प्रकाश और दान से युक्त हैं। परम ध्यानी, अयोनि, पवित्र और परमात्मा हैं। कर्म, मोह और राग से मुक्त होकर वे मोक्षगामी हैं।
श्लोक 92 से 101 नामों से स्तुति और अनंत वैभव, जिन सहस्त्रनाम 1 से 19
वे परम संयम, केवलदर्शन और रक्षक हैं। लेश्या, संज्ञा और दोषों से मुक्त हैं। उनके अनंत गुणों का स्तवन कठिन है, अतः उनके 1008 नामों से स्तुति की जाती है। वे श्रीमान, स्वयंभू, वृषभ, शंभव, विश्वभू आदि नामों से युक्त हैं।
इस प्रकार, सौधर्मेंद्र भगवान वृषभदेव की अनंत महिमा, गुणों और नामों से उनकी स्तुति करते हैं।
श्लोक 102 से 110 जिन सहस्त्रनाम 20 से 100, भगवान वृषभदेव के नाम और गुणों की महिमा
भगवान वृषभदेव समस्त पदार्थों को देखने वाले विश्वदृश्वा हैं और केवलज्ञान से सर्वत्र व्याप्त विभु कहलाते हैं। वे जीवों को मोक्ष पहुँचाने वाले धाता, विश्व के ईश्वर विश्वेश, और सबके हित के लिए उपदेश देने वाले विश्वविलोचन हैं। उनका ज्ञान विश्वव्यापी है और वे मोक्षमार्ग के विधानकर्ता विधि हैं। धर्म से जगत् की सृष्टि करने वाले वेधा, सदा विद्यमान शाश्वत, और चारों दिशाओं में मुख वाले विश्वतोमुख हैं। उन्होंने कर्मभूमि में आजीविका के लिए कार्यों का उपदेश दिया, इसलिए विश्वकर्मा कहलाते हैं। वे सबसे श्रेष्ठ जगज्ज्येष्ठ, अनंत गुणों से युक्त विश्वमूर्ति, और कर्म पर विजय पाने वाले जिनेश्वर हैं। वे अनंतज्योति से प्रकाशित और स्वामी होने पर भी अनीश्वर हैं।
श्लोक 111 से 121 जिन सहस्त्रनाम 101 से 200, दिव्य गुणों और पवित्रता का वर्णन
भगवान दिव्यध्वनि के स्वामी दिव्यभाषापति और अत्यंत सुंदर दिव्य हैं। उनके वचन और शासन पवित्र होने से पूतवाक् और पूतशासन कहलाते हैं। उनकी आत्मा शुद्ध पूतात्मा और उत्कृष्ट ज्योति से युक्त परमज्योति है। वे धर्म के अध्यक्ष धर्माध्यक्ष और इंद्रियों को जीतने वाले दमीश्वर हैं। मोक्षरूपी लक्ष्मी के अधिपति श्रीपति, अष्ट प्रातिहार्यों से युक्त भगवान, और पूज्य अर्हत् हैं। वे कर्ममल से रहित अरजा:, ज्ञानावरण से मुक्त विरजा:, और अति पवित्र शुचि हैं। तीर्थ के निर्माता तीर्थकृत्, केवलज्ञानी केवली, और अनंत सामर्थ्य से युक्त ईशान हैं। पूजा के योग्य पूजार्ह, घातियाकर्मों से मुक्त स्नातक, और मलरहित अमल हैं।
श्लोक 122 से 132 जिन सहस्त्रनाम 201 से 300, श्रेष्ठता और विश्वजयी स्वरूप
वे अनंत दीप्ति के धारक अनंतदीप्ति और ज्ञानस्वरूप ज्ञानात्मा हैं। स्वयं मोक्षमार्ग में प्रवृत्त स्वयंबुद्ध और जनसमूह के रक्षक प्रजापति हैं। कर्मबंधन से मुक्त, अनंत बलशाली शक्त, और बाधारहित निराबाध हैं। वे शरीररहित निष्कल और तीनों लोकों के स्वामी भुवनेश्वर हैं। कर्मरूपी अंजन से मुक्त निरंजन और जगत् को प्रकाशित करने वाले जगज्ज्योति हैं। उनके वचन सार्थक निरुक्तोक्ति और वे रोगरहित अनामय हैं। उनकी स्थिति अचल अचलस्थिति और वे अक्षोभ्य, नित्य कूटस्थ, गमनरहित स्थाणु, और क्षयरहित अक्षय हैं। वे विश्व को जीतने वाले विश्वजित् और मृत्यु को परास्त करने वाले विजितांतक हैं।
श्लोक 133 से 143 जिन सहस्त्रनाम 301 से 400, धर्म और पुण्य के प्रतीक
वे तीनों लोकों में अग्रणी और भव्यजीवों को मोक्ष दिलाने वाले ग्रामणी हैं। वे मार्गदर्शक नेता और शास्त्रों के रचयिता प्रणेता हैं। न्यायशास्त्र के उपदेशक न्यायशास्त्रकृत् और हितोपदेश देने वाले शास्ता हैं। वे धर्म के स्वामी धर्मपति और धर्म से युक्त धर्म्य हैं। उनकी आत्मा धर्मस्वरूप धर्मात्मा और वे तीर्थ के निर्माता धर्मतीर्थकृत् हैं। वृषभ चिह्न से युक्त वृषध्वज, धर्म के अधीश वृषाधीश, और धर्मरूपी पताका वृषकेतु हैं। वे धर्मशस्त्रधारी वृषायुध, धर्मस्वरूप वृष, और जीवों का पोषण करने वाले भर्ता हैं। सुंदर नाभि के कारण हिरण्यनाभि और सत्यस्वरूप भूतात्मा हैं। वे जीवों की रक्षा करने वाले भूतभृत् और मोक्ष के कारण प्रभव हैं।
श्लोक 144 से 155 जिन सहस्त्रनाम 401 से 500, सिद्धि और महानता का वर्णन
वे सिद्धि देने वाले सिद्धिद और संकल्प-सिद्ध सिद्धसंकल्प हैं। उनकी आत्मा सिद्ध अवस्था में सिद्धात्मा और मोक्ष-साधन से युक्त सिद्धसाधन हैं। वे सब कुछ जानने वाले बुद्धबोध्य और रत्नत्रय से युक्त महाबोधि हैं। उनके गुण बढ़ते रहते हैं, इसलिए वर्धमान, और ऋद्धियों के धारक महर्द्धिक हैं। वे वेदों के अंग वेदांग, वेदज्ञ वेदवित्, और दिगंबर जातरूप हैं। वे जानने वालों में श्रेष्ठ विदांवर और अनुभव से जानने योग्य स्वसंवेद्य हैं। आदि-अंत से रहित अनादिनिधन और ज्ञान से स्पष्ट व्यक्त हैं। वे युग के व्यवस्थापक युगादिकृत् और जगत् के प्रारंभ में उत्पन्न जगदादिज हैं। वे इंद्रों से श्रेष्ठ अतींद्र और इंद्रियातीत अतींद्रिय हैं।
श्लोक 156 से 167 जिन सहस्त्रनाम 501 से 600, महागुणों और शक्ति का प्रदर्शन
वे मुनियों में उत्तम महामुनि और मौन धारण करने वाले महामौनी हैं। शुक्लध्यान के स्वामी महाध्यान और जितेंद्रिय महादम हैं। वे शांत महाक्षम और उत्तम शील से युक्त महाशील हैं। तपश्चरण से कर्म नष्ट करने वाले महायज्ञ और पूज्य महामरण हैं। वे महाव्रतों के स्वामी महाव्रतपति और जगत्पूज्य मह्य हैं। विशाल कांति के धारक महाकांतिधर और मैत्रीभाव से युक्त महामैत्रीमय हैं। वे दयालु महाकारुणिक और मंत्रों के स्वामी महामंत्र हैं। यतियों में श्रेष्ठ महायति और गंभीर ध्वनि के धारक महानाद हैं। वे आनंदस्वरूप आनंद और सबको सुख देने वाले नंदन हैं। वे कामदेव को नष्ट करने वाले कामहा और अभीष्ट प्रदान करने वाले कामद हैं।
श्लोक 168 से 178 जिन सहस्त्रनाम 601 से 700, विजय और पवित्रता की महिमा
वे स्वाभाविक सुसंस्कार असंस्कृत-सुसंस्कार और रागादि का नाश करने वाले वैकृतांतकृत् हैं। वे सुंदर कांति के धारक कांत और इच्छित फल देने वाले चिंतामणि हैं। अजेय अजित और क्रोध पर विजय पाने वाले जितक्रोध हैं। वे मुनियों के नाथ मुनींद्र और गंभीर ध्वनि वाले दुंदुभिस्वन हैं। नाभिराज के पुत्र नाभिनंदन और उत्तम व्रतों के धारक सुव्रत हैं। वे अत्यंत शांत शांत और योगियों के स्वामी महायोगीश्वर हैं। सत्यस्वरूप सत्यात्मा और सत्यधर्म के उपदेशक सत्यशासन हैं। वे स्थिर स्थेयान और भक्तों के समीप नेदीदान हैं। सदा योगरूप सदायोग और आनंद के भोक्ता सदाभोग हैं। वे सुंदर मुख वाले सुमुख और सबके रक्षक गोप्ता हैं।
श्लोक 179 से 190 जिन सहस्त्रनाम 701 से 800, बुद्धि और विश्वप्रियता का वर्णन
वे प्रशस्त वचनों के धारक वाग्मी और बुद्धि के स्वामी शेमुषीश हैं। अनेक गुणों से युक्त नैकात्मा और साधारण जनों से अविज्ञेय हैं। वे ज्ञानगर्भ और दयालु दयागर्भ हैं। रत्नत्रय से युक्त रत्नगर्भ और सुंदर दर्शन वाले सुदर्शन हैं। वे लक्ष्मीवान् और त्रिदशाध्यक्ष हैं। धर्म के स्तंभ धर्मयुप और मुनियों के स्वामी मुनीश्वर हैं। उनके वचन अमोघवाक् और शासन सफल अमोघशासन है। वे सुख में स्थित सुस्थित और राग से मुक्त वीतराग हैं। तीनों लोकों के प्रिय त्रिजगद्वल्लभ और मंगलदाता त्रिजगन्मंगलोदय हैं। वे त्रिलोक के शिखर पर चूड़ामणि त्रिलोकाग्रशिखामणि हैं।
श्लोक 191 से 203 जिन सहस्त्रनाम 801 से 900,भगवान वृषभदेव की त्रिकालदर्शिता और कल्याणमय स्वरूप
भगवान वृषभदेव तीनों काल के पदार्थों को देखने वाले त्रिकालदर्शी हैं। वे लोकों के स्वामी लोकेश और लोगों के पोषक लोकधाता हैं। व्रतों को दृढ़ रखने वाले दृढ़व्रत और सभी लोकों से श्रेष्ठ सर्वलोकातिग हैं। पूजा के योग्य पूज्य और सभी को अभीष्ट स्थान तक पहुँचाने वाले सर्वलोकैकसारथि हैं। सबसे प्राचीन पुराण, आत्मगुणों से युक्त पुरुष, और सर्वप्रथम पूर्व कहलाते हैं। वे देवों में मुख्य आदिदेव और कल्याणस्वरूप कल्याण हैं। उनकी आत्मा निर्मल दीप्रकल्याणात्मा और वे कर्ममल से मुक्त विकल्मष हैं। वे देवों के देव देवदेव, जगत् के स्वामी जगन्नाथ, और सबसे ज्येष्ठ जगदग्रज हैं।
श्लोक 204 से 217 जिन सहस्त्रनाम 901 से 1008, तेजस्विता और शांत स्वरूप
वे दिगंबर दिग्वासा और परिग्रहरहित निष्किंचन हैं। ज्ञानरूपी नेत्रों के धारक ज्ञानचक्षु और मोह से मुक्त अमोमुह हैं। तेज के समूह तेजोराशि और अनंत प्रताप के धारक अनंतौज हैं। वे ज्ञान के समुद्र ज्ञानाब्धि और अंधकार को नष्ट करने वाले तमोऽपह हैं। तीनों लोकों में श्रेष्ठ जगच्चूड़ामणि और विघ्नों के नाशक विघ्नविनायक हैं। वे निद्रारहित अनिंद्रालु और सदा जागृत जागरूक हैं। मोक्ष के इच्छुक मुमुक्षु और इंद्रियों को जीतने वाले जिताक्ष हैं। धर्म के मूलकर्ता मूलकर्ता और कल्याणकारी वाणी के धारक श्रायसोक्ति हैं। वे शुभयुक्त शुभंयु और धर्म की रक्षा करने वाले धर्मपाल हैं।
श्लोक 218 से 231 नामों की महिमा और प्रार्थना
उनके एक हजार आठ नामों का स्मरण करने से स्मरणशक्ति पवित्र होती है। वे वचनों से परे होने पर भी स्तुति से अभीष्ट फल देने वाले हैं। वे जगत् के बंधु, वैद्य, और हितकारी हैं। एक प्रकाशक, द्विविध उपयोग, त्रिविध मोक्षमार्ग, और अनंतचतुष्टय से युक्त हैं। पंचपरमेष्ठी, छह द्रव्यों के ज्ञाता, और आठ गुणों से सुशोभित हैं। भक्त उनकी नाममाला से पूजा करते हैं, और यह स्तोत्र पाठ से कल्याण प्राप्त होता है। इंद्र ने उनकी स्तुति कर तीर्थ विहार की प्रार्थना की। वे भव्य जीवों को धर्मामृत से सींचने वाले और मोह की सेना को नष्ट करने वाले हैं।
श्लोक 232 से 244 समवसरण और विहार का वैभव
तीर्थंकररूपी सूर्य भव्य जीवों का अनुग्रह करने को तैयार हुए। वे छत्रत्रय, चमर, और मधुर दिव्यध्वनि से सुशोभित हैं। करोड़ों सूर्यों से स्पर्धा करने वाला भामंडल और पुष्पवर्षा उनकी शोभा बढ़ाते हैं। मेरु शिखर जैसे सिंहासन, अशोकवृक्ष, और मानस्तंभ उनके समवसरण को अलंकृत करते हैं। स्वच्छ जल की परिखा, गोपुरद्वार, और कल्पवृक्ष उनकी महिमा दर्शाते हैं। किन्नरदेव यश गाते हैं, और गंधकुटी दिशाओं को सुगंधित करती है। वे तीनों लोकों के स्वामी और विहार के लिए उद्यत हुए।
श्लोक 245 से 261 विहार का भव्य दृश्य
उनके विहार के समय करोड़ों देव इधर-उधर चले। इंद्रों के मुकुटों से मणि झलकते थे, और जय-जय शब्द गूँजता था। चार निकाय के देव महासागर जैसे क्षुब्ध थे। वे अर्धमागधी में उपदेश देते हैं और वृक्षों को फूलों से भर देते हैं। सुगंधित वायु बहती है, और पृथ्वी दर्पण-सी चमकती है। एक योजन तक भूमि स्वच्छ रहती है, और कमलों पर उनके चरण पड़ते हैं। धर्मचक्र, अष्ट मंगल, और ध्वजाएँ आकाश को व्याप्त करती हैं। दुंदुभि और भेरियों का शब्द कर्मशत्रुओं को तर्जना देता है।
श्लोक 262 से 271 विहार की शोभा और प्रभाव
देवांगनाएँ नृत्य करती हैं, और किन्नर गायन करते हैं। इंद्र उनके चारों ओर चमकते हैं। दिशाएँ निर्मल और पृथ्वी सुभिक्ष से भरी होती है। वृक्ष असमय फूलते हैं, और प्राणी मित्रता बढ़ाते हैं। सुवर्णमय कमल उनके चरणों के नीचे सुशोभित होते हैं। भव्य जीव आनंदित होते हैं, और चार सौ कोश तक कल्याण व्याप्त होता है।
श्लोक 272 से 281 कमलों की पंक्ति और विश्वप्रकाशन
सुवर्णमय कमल उनकी राह में 225 की संख्या में बिछे हैं। आकाश सरोवर-सा सुशोभित होता है। वे वचनामृत से सबको संतुष्ट करते हैं। मिथ्यात्व का अंधकार नष्ट कर वे जगत् को प्रकाशित करते हैं। भव्य धर्मामृत से संतोष पाते हैं।
श्लोक 282 से 290 देश-विहार और कैलास प्राप्ति
जिनेंद्ररूपी मेघ धर्मामृत बरसाते हैं, और भव्य चातक संतुष्ट होते हैं। वे अनेक देशों में विहार करते हैं। कैलास पर सभामंडप में विराजमान होकर वे अनंतचतुष्टय से युक्त होते हैं। इंद्रों द्वारा पूजित और तीनों लोकों के स्वामी, वे भक्तों को नमस्कार के योग्य हैं।
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
जैन धर्मं और दर्शन ( Jain Dharm aur Darshan )