भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 गुरु की महत्ता
प्रीतिंकर महाबल में स्वयंबुद्ध, अब गुरु बने। गुरु बिना गुण नहीं, संसार नहीं तिरता। वज्रजंघ की सम्यक्त्व भावना दृढ़ हुई। श्रीमती की भी। तीन पल्य काल बीता।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
महावळमत्रेऽप्यासीत् स्वयंबुद्धो गुरुः स नः । वितीर्य दर्शनं सम्यगधुना तु विशेषतः ॥१७२॥
महाबल के भव में भी वे मेरे स्वयंबुद्ध नामक गुरु हुए थे और आज इस भव में भी सम्यग्दर्शन देकर विशेष गुरु हुए हैं ।।172।।
“Even in the Mahabal life, they were my Guru named ‘Swayambuddha,’ and in this life too, they have become a special Guru by bestowing the right vision (Samyak Darshan).”
श्लोक ( Shlok ) 173
‘गुरुणों यदि संसर्गो न स्यान्न स्याद् गुणार्जनम् । विना गुणार्जनात् क्वास्य जन्तोः सफलजन्मता। १७३।
यदि संसार में गुरुओं की संगति न हो तो गुणों की प्राप्ति नहीं हो सकती और गुणों की प्राप्ति के बिना इस जीव के जन्म की सफलता कहाँ हो सकती है ? ।।173।।
“If there is no association with Gurus in the world, virtues cannot be attained, and without the attainment of virtues, how can the purpose of this soul’s birth be fulfilled?”
श्लोक ( Shlok ) 174
रसोपविद्धः सन् धातुर्यथा याति सुवर्णताम् । तथा गुरुगुणाश्लिष्टो भव्यात्मा शुध्दि मृष्छति ॥१७४॥
जिस प्रकार सिद्ध रस के संयोग से तांबा आदि धातुएँ सुवर्णपने को प्राप्त हो जाती हैं उसी प्रकार गुरुदेव के उपदेश से प्रकट हुए गुणों के संयोग से भव्य जीव भी शुद्धि को प्राप्त हो जाते हैं ।।174।।
“Just as metals like copper become gold through contact with an alchemical essence, similarly, noble souls attain purity through the virtues awakened by the teachings of the revered Guru.”
श्लोक ( Shlok ) 175
न विना यानपात्रेण तरितुं शक्यतेऽर्णवः । नर्ते गुरूपदेशाश्च सुतरोऽयं भवार्णवः ॥१७५॥
जिस प्रकार जहाज के बिना समुद्र नहीं तिरा जा सकता है उसी प्रकार गुरु के उपदेश के बिना यह संसाररूपी समुद्र नहीं तिरा जा सकता ।।175।।
“Just as the ocean cannot be crossed without a ship, similarly, the ocean of worldly existence cannot be crossed without the teachings of the Guru.”
श्लोक ( Shlok ) 176
यथान्धतमसच्छन्नान् नार्थान् दीपाद् विनेक्षते । तथा जीवादिभावांश्च नोपदेष्टुर्विनेक्षते ॥१७६॥
जिस प्रकार कोई पुरुष दीपक के बिना गाढ़ अंधकार में छिपे हुए घट, पट आदि पदार्थों को नहीं देख सकता उसी प्रकार यह जीव भी उपदेश देने वाले गुरु के बिना जीव, अजीव आदि पदार्थों को नहीं जान सकता ।।176।।
“Just as a person cannot see hidden objects like pots and cloths in deep darkness without a lamp, similarly, the soul cannot comprehend substances like the living and the non-living without the teachings of a Guru.”
श्लोक ( Shlok ) 177
बन्धवो गुरवश्चेति द्वये संप्रीतये नृणाम् । बन्धवोऽत्रैव संप्रीत्यै गुरवोऽमुत्र चात्र च ॥१७७॥
इस संसार में भाई और गुरु ये दोनों ही पदार्थ मनुष्यों की प्रीति के लिए हैं । पर भाई तो इस लोक में ही प्रीति उत्पन्न करते हैं और गुरु इस लोक तथा परलोक, दोनों ही लोकों में विशेष रूप से प्रीति उत्पन्न करते हैं ।।177।।
“In this world, both brothers and Gurus are sources of affection for people. However, brothers foster affection only in this world, while Gurus cultivate profound affection in both this world and the hereafter.”
श्लोक ( Shlok ) 178
यतो गुरुनिदेशेन जाता नः शुद्धिरीदृशी । ततो गुरुपदे भक्तिर्भूया ज्जन्मान्तरेऽपि नः ॥१७८॥
जब कि गुरु के उपदेश से ही हम लोगों को इस प्रकार की विशुद्धि प्राप्त हुई है तब हम चाहते हैं कि जंमांतर में भी मेरी भक्ति गुरुदेव के चरण-कमलों में बनी रहे ।।178।।
“Since it is through the Guru’s teachings that we have attained such purity, I sincerely wish that my devotion to the revered Guru’s lotus feet continues in future lifetimes as well.”
श्लोक ( Shlok ) 179
इति चिन्तयतोऽस्यासीद् दृढा सम्यक्त्वभावना । सा तु कस्पलतेवास्मै सर्वमिष्टं फलिष्यति ॥ १७९॥
इस प्रकार चिंतवन करते हुए वज्रजंघ की सम्यक्त्व भावना अत्यंत दृढ़ हो गयी । यही भावना आगे चलकर इस वज्रजंघ के लिए कल्पलता के समान समस्त इष्ट फल देने वाली होगी ।।179।।
“Contemplating in this manner, Vajrajangha’s feeling of right faith (Samyaktva) became extremely firm. This very sentiment will, in the future, become like a wish-fulfilling creeper, granting him all desired fruits.”
श्लोक ( Shlok ) 180
समानभावनानेन साप्यभूष्छीमतीचरी । समानशीलयोश्चासीदाच्छिन्ना प्रीतिरेनयोः ॥१८०॥
श्रीमती के जीव ने भी वज्रजंघ के जीव के समान ऊपर लिखे अनुसार चिंतन किया था इसलिए इसकी सम्यक्त्व भावना भी सुदृढ़ हो गयी थी । इन दोनों पति-पत्नियों का स्वभाव एक-सा था इसलिए दोनों में एक-सी अखंड प्रीति रहती थी ।।180।।
“Shrimati’s soul also contemplated in the same manner as Vajrajangha’s, as described above, leading to a firm establishment of right faith (Samyaktva) in her as well. Since both husband and wife shared similar dispositions, they maintained unwavering mutual affection.”
श्लोक ( Shlok ) 181
दम्पत्योरिति संप्रीत्या भोगान्निर्विशतोश्म । भोगकालस्तयोर्निष्ठां प्रापत् पल्य त्रयोन्मितः ॥१८१॥
इस प्रकार प्रीतिपूर्वक भोग भोगते हुए उन दोनों दंपतियों का तीन पल्य प्रमाण भारी काल व्यतीत हो गया ।।181।।
“Thus, while joyfully enjoying worldly pleasures, the couple spent a long period equivalent to three Palyas.”
(Note: A “Palya” is an ancient time unit in Jainism, representing an extremely long duration.)
श्लोक 182 से 191
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171