आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161
श्लोक 162 से 171 सुख का स्वरूप
अहमिंद्रों का निर्बाध सुख प्रवीचारहित था। संसार में स्त्री-संभोग सुख नहीं, आकुलता है। यह मोह, शिथिलता, तृष्णा बढ़ाता है। रोगी जैसे औषधि लेता है, वैसे कामज्वर से संतप्त जीव संभोग करता है। सच्चा सुख संतोष से मिलता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162
पूर्वोक्तसप्रवीचारसुखानन्तगुणात्मकम् । सुखमव्याहतं तेषां शुभकर्मोदयोद्भवम् ॥१६२॥
उन अहमिंद्र के शुभ कर्म के उदय से जो निर्बाध सुख प्राप्त होता है वह पहले कहे हुए प्रवीचारसहित सुख से अनंत गुना होता है ।।162।।
“The uninterrupted bliss that those Ahmindras attained due to the rise of their auspicious karma was infinitely greater than the previously described sensual pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 163
संसारे स्त्रीसमासंगाद ङ्गिनां सुखसंगमः । तदभावे कुतस्तेषां सुखमित्यत्र चर्च्यते ॥१६३॥
जब कि संसार में स्त्रीसमागम से ही जीवों को सुख की प्राप्ति होती है तब उन अहमिंद्रों के स्त्री-समागम न होने पर सुख कैसे हो सकता है ? यदि इस प्रकार कोई प्रश्न करे तो उसके समाधान के लिए इस प्रकार विचार किया जाता है ।।163।।
“If one questions how the Ahmindras can experience happiness without union with women, considering that worldly beings derive pleasure from such unions, then the answer to this is understood through the following reasoning.”
श्लोक ( Shlok ) 164
“निर्द्वन्द्ववृत्तितामाप्ताः शमुशन्तीह देहिनाम् । तत्कुतस्त्यं सरागाणां द्वन्द्वोपहतचेतसाम् ॥१६४॥
चूँकि इस संसार में जिनेंद्रदेव ने आकुलतारहित वृत्ति को ही सुख कहा है, इसलिए वह सुख उन सरागी जीवों के कैसे हो सकता है जिनके कि चित्त अनेक प्रकार की आकुलताओं से व्याकुल हो रहे हैं ।।164।।
“Since Lord Jina has defined true happiness as a state free from restlessness, how can such bliss ever belong to worldly beings whose minds remain agitated by various desires and disturbances?”
श्लोक ( Shlok ) 165
स्त्रीभोगो न सुखं चेतःसंमोहाद् गात्रसादनात् । तृष्णानुबन्धात् संतापरूपत्वाच्च यथा ज्वरः॥ १६५
जिस प्रकार चित्त में मोह उत्पन्न करने से, शरीर में शिथिलता लाने से, तृष्णा (प्यास) बढ़ाने से और संताप रूप होने से ज्वर सुखरूप नहीं होता उसी प्रकार चित्त में मोह, शरीर में शिथिलता, लालसा और संताप बढ़ाने का कारण होने से स्त्री-संभोग भी सुख रूप नहीं हो सकता ।।165।।
“Just as fever cannot be considered happiness because it causes delusion in the mind, weakness in the body, increased thirst, and suffering, similarly, sexual indulgence cannot be true happiness as it leads to delusion, physical exhaustion, craving, and distress.”
श्लोक ( Shlok ) 166
मदनज्वरसंतप्तस्तत्प्रतीकारवान्छया । स्त्रीरूपं सेवते श्रान्तों यथा कट्वपि भेषजम् ॥१६६॥
जिस प्रकार कोई रोगी पुरुष कड़वी औषधि का भी सेवन करता है उसी प्रकार कामज्वर से संतप्त हुआ यह प्राणी भी उसे दूर करने की इच्छा से स्त्रीरूप औषधि का सेवन करता है ।।166।।
“Just as a sick person consumes bitter medicine, similarly, a being afflicted by the fever of desire indulges in women as a remedy to alleviate that suffering.”
श्लोक ( Shlok ) 167
मनोज्ञविषयासेवा तृष्णायै न वितृप्तये । तृष्णार्चिषा च संतप्तः कथं नाम सुखी जनः ॥१६७॥
जब कि मनोहर विषयों का सेवन केवल तृष्णा के लिए है न कि संतोष के लिए भी, तब तृष्णारूपी ज्वाला से संतप्त हुआ यह जीव सुखी कैसे हो सकता है ? ।।167।।
“Since the indulgence in pleasurable objects serves only to fuel craving rather than bring true satisfaction, how can a being tormented by the fire of desire ever attain real happiness?”
श्लोक ( Shlok ) 168 – 169
रुजां यन्नोपघाताय तदौषधमनौषधम् । यन्नाे दन्याविनाशाय नाञ्जसा तञ्जलं जलम् ॥१६८॥
न विहन्त्यापदं यच्च नार्थतस्तद्धनं धनम् । तथा तृष्णाच्छिदे यन्न न तद् विषयजं सुखम् ॥१६९॥
जिस प्रकार, जो औषधि रोग दूर नहीं कर सके वह औषधि नहीं है, जो जल प्यास दूर नहीं कर सके वह जल नहीं है और जो धन आपत्ति को नष्ट नहीं कर सके वह धन नहीं है । इसी प्रकार जो विषयज सुख तृष्णा नष्ट नहीं कर सके वह विषयज (विषयों से उत्पन्न हुआ) सुख नहीं है ।।168-169।।
“Just as a medicine that cannot cure a disease is not truly medicine, water that cannot quench thirst is not truly water, and wealth that cannot remove distress is not truly wealth—similarly, sensual pleasure that fails to extinguish craving is not true happiness.”
श्लोक ( Shlok ) 171
परं स्वास्थ्यं सुखं नैतद् विषयेष्वनुरागिणाम् । ते हि पूर्व तदात्वे च पर्यन्ते च विदाहिनः ॥ १७१ ॥
विषयों में अनुराग करने वाले जीवों को जो सुख प्राप्त होता है वह उनका स्वास्थ्य नहीं कहा जा सकता है―उसे उत्कृष्ट सुख नहीं कह सकते, क्योंकि वे विषय, सेवन करने से पहले, सेवन करते समय और अंत में केवल संताप ही देते हैं ।।171।।
“The pleasure experienced by beings attached to sensual objects cannot be considered true well-being or supreme happiness, for such pleasures bring only suffering—before indulgence, during indulgence, and after indulgence.”
श्लोक 172 से 182
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161