भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |
श्लोक 72 से 81 नरक का भयंकर वातावरण
ऊँट, गधे निगलने दौड़ते हैं। भयंकर पुरुष तर्जना करते हैं। गीध, कुत्ते, कौवे, और शृगाल भय बढ़ाते हैं। असिपत्र वन और वैतरणी नदी संताप देते हैं। बिल जलते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
खरारटितमुत्प्रोथं ज्वलंज्ज्वाला करालितम् । “गिलितुमनलोद्गारिखरोष्ट्र नोऽभिधावति ।।७२।।
जिनके शब्द बड़े ही भयानक है, जो अपनी नासिका ऊपर को उठाये हुए है, जो जलती हुई ज्वालाओं से भयंकर हैं और जो मुँह से अग्नि उगल रहे हैं ऐसे ऊँट और गधों का यह समूह हम लोगों को निगलने के लिए ही सामने दौड़ा आ रहा है ।।72।।
“This herd of camels and donkeys, emitting terrifying sounds, with their nostrils raised, blazing with fierce flames, and spewing fire from their mouths, is rushing toward us to devour us.”
श्लोक ( Shlok ) 73
अमी च भीषणाकाराः कृपाणोद्यतपाणयः । पुरुषास्तर्जयन्त्य स्मानकारणरणोद्धराः ॥७३॥
जिनका आकार अत्यंत भयानक है जिन्होंने अपने हाथ में तलवार उठा रखी है और जो बिना कारण ही लड़ने के लिए तैयार हैं, ऐसे ये पुरुष हम लोगों की तर्जना कर रहे हैं―हम लोगों को घुड़क रहे हैं―डाँट दिखला रहे हैं ।।73।।
“These men, with extremely terrifying appearances, wielding swords in their hands and ready to fight without any reason, are threatening, scolding, and intimidating us.”
श्लोक ( Shlok ) 74
इमे च परुषापाता गृध्रा नोऽभि द्रवन्त्यरम् । “भषन्तः सारमेयाश्च भीषयन्तेतरामिमे ।।७४।।
भयंकर रूप से आकाश से पड़ते हुए ये गीध शीघ्र ही हमारे सामने झपट रहे हैं और ये भोंकते हुए कुत्ते हमें अतिशय भयभीत कर रहे हैं ।।74।।
“These vultures, terrifying as they descend rapidly from the sky, are swooping down upon us, while these barking dogs are instilling extreme fear in us.”
श्लोक ( Shlok ) 75
“नूनमेतन्निभे “नास्मद्दुरितान्येव निर्दयम् । पीडामुत्पादयन्त्येौ2वमहो व्यसनसन्निधिः”
निश्चय ही इन दुष्ट जीवों के छल से हमारे पूर्वभव के पाप ही हमें इस प्रकार दुःख उत्पन्न कर रहे हैं । बड़े आश्चर्य की बात है कि हम लोगों को सब ओर से दुःखों ने घेर रखा है ।।75।।
“Surely, it is the sins of our past lives, brought forth by the deceit of these wicked beings, that are causing us such suffering. It is truly astonishing how we are surrounded by pain from all sides.”
श्लोक ( Shlok ) 76
इतः स्वरति पध्दोषों नारकाणां प्रधावताम् । इतश्च करुणाक्रन्दगर्भः पूत्कारनिःस्वनः ।।७६।।
इधर यह दौड़ते हुए नारकियों के पैरों की आवाज संताप उत्पन्न कर रही है और इधर यह करुण विलाप से भरा हुआ किसी के रोने का शब्द आ रहा है ।।76।।
“On one side, the sound of the running footsteps of the hellish beings is causing agony, and on the other side, the sorrowful cries filled with lamentation are echoing.”
श्लोक ( Shlok ) 77
इतोऽयं प्रध्वनध्वाङ्क्ष कठोरारावमूर्च्छितः । **शिवानामशिवाध्वानः प्रध्वा नयतिरोदसी ।॥७७৷৷
इधर यह काँव-काँव करते हुए कौवों के कठोर शब्द से विस्तार को प्राप्त हुआ शृगालों का अमंगलकारी शब्द आकाश-पाताल को शब्दायमान कर रहा है ।।77।।
“On one side, the harsh cawing of crows echoes, while the ominous howling of jackals spreads far and wide, resonating through the heavens and the underworld.”
श्लोक ( Shlok ) 78
इतः परुषसंपातपवनाधूननोत्थितः । असिपत्रवने पत्रनिर्मोक्षपरुषध्वनिः ।।७८।।
इधर यह असिपत्र वन में कठिन रूप से चलने वाले वायु के प्रकंपन से उत्पन्न हुआ शब्द तथा उस वायु के आघात से गिरते हुए पत्तों का कठोर शब्द हो रहा है ।।78।।
“On this side, the sound produced by the trembling winds harshly sweeping through the Asipatra forest, along with the sharp noise of falling leaves struck by the wind, echoes intensely.”
श्लोक ( Shlok ) 79
सोऽयं कण्टकितस्कन्धः कूटशाल्मलिपादपः । यस्मिन् स्मृतेऽपि नोऽङ्गानि तुद्यन्त इव कण्टकैः ॥७९॥
जिसके स्कंध भाग पर काँटे लगे हुए हैं ऐसा यह वही कृत्रिम सेमर का पेड़है जिसकी याद आते ही हम लोगों के समस्त अंग काँटे चुभने के समान दुःखी होने लगते हैं ।।79।।
“This is that same artificial silk-cotton tree (Simal) with thorns on its branches; merely remembering it makes all our limbs ache as if pierced by thorns.”
श्लोक ( Shlok ) 80
सैषा वैतरणी नाम सरित् सारुष्करद्रवा । आस्तां तरणमेतस्याः स्मरणं च भयावहम् ॥८०॥
इधर यह भिलावे के रस से भरी हुई वैतरणी नाम की नदी है । इसमें तैरना तो दूर रहा इसका स्मरण करना भी भय का देने वाला है ।।80।।
“On this side is the river named Vaitarani, filled with the sap of marking-nut trees (poisonous Bhilawa). Far from swimming in it, even remembering it fills one with fear.”
श्लोक ( Shlok ) 81
एते च नारकावासाः प्रज्वलन्त्यन्तरुष्मणा । अन्धमूषास्विवावर्त नीयन्ते यत्र नारकाः ॥८१॥
ये वही नारकियों के रहने के घर (बिल) हैं जो कि गरमी से भीतर-ही-भीतर जल रहे हैं और जिनमें ये नारकी छिद्ररहित साँचे में गली हुई सुवर्ण, चाँदी आदि धातुओं की तरह घुमाये जाते हैं ।।81।।
“These are the same dwellings (burrows) of the hellish beings, burning from within due to intense heat, where these beings are churned around like molten gold, silver, and other metals poured into solid molds without any openings.”
श्लोक 82 से 92
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |