भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 अच्युतेंद्र का रूप (भाग 1)
वरदत्त आदि सामानिक देव बने। अच्युतेंद्र का शरीर सुंदर, निर्मल था। मस्तक पुष्प-सेहरा, वक्ष हार, नितंब वस्त्र से शोभित था।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
पूर्वोक्ता नृपपुत्राश्च वरदत्तादयः क्रमात् । समजायन्त पुण्यैः स्वैस्तत्र सामानिकाः सुराः ॥१७२॥
जिनका वर्णन ऊपर किया जा चुका है ऐसे वरदत्त आदि राजपुत्र भी अपने-अपने पुण्य के उदय से उसी अच्युत स्वर्ग में सामानिक जाति के देव हुए ।।172।।
“The royal princes, such as Varadatta and others, who have been described earlier, also, due to the rise of their meritorious karma, were reborn as Samanika (equal-rank) deities in the same Achyuta heaven.”
श्लोक ( Shlok ) 173
तत्राष्टगुणमैश्वर्य दिव्यं भोगं च निर्विशन् । स रेमे सुचिरं कालमच्युतेन्द्रोऽच्युतस्थितिः ॥१७३॥
पूर्ण आयु को धारण करने वाला वह अच्युत स्वर्ग का इंद्र अणिमा, महिमा आदि आठ गुण, ऐश्वर्य और दिव्य भोगों का अनुभव करता हुआ चिरकाल तक क्रीड़ा करता था ।।173।।
“The Indra of Achyuta heaven, possessing a full lifespan, enjoyed divine pleasures, supreme prosperity, and the eight great attributes (Anima, Mahima, etc.), engaging in celestial play for a long time.”
श्लोक ( Shlok ) 174
दिव्यानुभावमस्यासीद् वपुरव्याजसुन्दरम् । विषशस्त्रादिबाधाभिरस्पृष्टमतिनिर्मलम् ॥ १७४॥
उसका शरीर दिव्य प्रभाव से सहित था, स्वभाव से ही सुंदर था, विष-शस्त्र आदि की बाधा से रहित था और अत्यंत निर्मल था ।।174।।
“His body was endowed with divine radiance, naturally beautiful, free from harm by poison or weapons, and exceptionally pure.”
श्लोक ( Shlok ) 175
सन्तानकुसुमोत्तंसमसौ धत्ते स्म मौलिना । तपः फलमतिस्फीतं मूर्ध्नेवोद्धत्य दर्शयन् ॥१७५॥
वह अपने मस्तक पर कल्पवृक्ष के पुष्पों का सेहरा धारण करता था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो पूर्वभव में किये हुए तपश्चरण के विशाल फल को मस्तक पर उठाकर सबको दिखा ही रहा हो ।।175।।
“He adorned his head with a garland of flowers from the Kalpavriksha (wish-fulfilling tree), as if he were proudly displaying to all the immense fruits of the penance performed in his past life.”
श्लोक ( Shlok ) 176
सहजैर्भूषणैरस्य रुरुचे रुचिरं वपुः । दयावल्लीफलैरुद्धेः प्रत्यङ्गमिव संगतैः ॥१७६॥
उसका सुंदर शरीर साथ-साथ उत्पन्न हुए आभूषणों से ऐसा मालूम होता था मानो उसके प्रत्येक अंग पर दयारूपी लता के प्रशंसनीय फल ही लग रहे हैं ।।176।।
“His beautiful body, adorned with ornaments that manifested along with him, appeared as if each of his limbs bore the praiseworthy fruits of the vine of compassion.”
श्लोक ( Shlok ) 177
समं सुप्रविभक्ताङ्गः स रेजे दिव्य लक्षणैः । सुरद्रुम इवाकीर्णः पुष्पैरुच्चावचात्मभिः ॥१७७॥
समचतुरस्र संस्थान का धारक वह इंद्र अपने अनेक दिव्य लक्षणों से ऐसा सुशोभित होता था जैसा कि ऊँचे-नीचे सभी प्रदेशों में स्थित फलों से व्याप्त हुआ कल्पवृक्ष सुशोभित होता है ।।177।।
“Possessing a perfectly symmetrical form, that Indra shone brilliantly with his many divine attributes, just as a Kalpavriksha (wish-fulfilling tree) appears magnificent when laden with fruits across all its branches, high and low.”
श्लोक ( Shlok ) 178
शिरः सकुन्तलं तस्य रेजे सोष्णीषपट्टकम् । सतमालमिवाद्रीन्द्रकूटं व्योमोपगाश्रितम् ॥१७८॥
काले-काले केश और श्वेतवर्ण की पगड़ी से सहित उसका मस्तक ऐसा जान पड़ता था मानो तापिच्छ पुष्प से सहित और आकाशगंगा के पूर से युक्त हिमालय का शिखर ही हो ।।178।।
“His head, adorned with jet-black hair and a white turban, appeared as if it were the peak of the Himalayas, embellished with Tapichcha flowers and the radiance of the Milky Way.”
श्लोक ( Shlok ) 179
मुखमस्य लसन्नेत्रभृङ्गसंगतमाबभौ । स्मितांशुभिर्जलाक्रान्तं प्रबुद्धमिव पङ्कजम् ॥१७९॥
उस इंद्र का मुखकमल फूले हुए कमल के समान शोभायमान था, क्योंकि जिस प्रकार कमल पर भौंरे होते हैं उसी प्रकार उसके मुख पर शोभायमान नेत्र थे और कमल जिस प्रकार जल से आक्रांत होता है उसी प्रकार उसका मुख भी मुसकान की सफेद-सफेद किरणों से आक्रांत था ।।179।।
“That Indra’s face bloomed like a radiant lotus. Just as bees enhance the beauty of a lotus, his eyes adorned his face with charm. And just as a lotus is surrounded by water, his face was enveloped by the soft, white rays of his enchanting smile.”
श्लोक ( Shlok ) 180
वक्षःस्थले पृथौ रम्ये हारं सोऽधत्त निर्मलम् । शरदम्भोदसंघातमिव मेरोस्तटाश्रितम् ॥१८०॥
वह अपने मनोहर और विशाल वक्षःस्थल पर जिस निर्मल हार को धारण कर रहा था वह ऐसा मालूम होता था मानो मेरु पर्वत के तट पर अवलंबित शरद् ऋतु के बादलों का समूह ही हो ।।180।।
“The pristine necklace adorning his broad and magnificent chest appeared as if it were a cluster of autumn clouds resting upon the slopes of Mount Meru.”
श्लोक ( Shlok ) 181
लसदंशुकसंवीतं जघनं तस्य निर्बभौ । तरङ्गाक्रान्तमम्भोधेरिव सैकतमण्डलम् ॥१८१॥
शोभायमान वस्त्र से ढँका हुआ उसका नितंबमंडल ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो लहरों से ढँका हुआ समुद्र का बालूदार टीला ही हो ।।181।।
“His waist, draped in resplendent garments, appeared as if it were a sandy dune of the ocean, gracefully covered by shimmering waves.”
श्लोक 182 से 191
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171