भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 श्रीमती की मूर्छा और माता-पिता का शोक
सखियों ने श्रीमती को शीतल उपचार से सचेत किया, पर वह मौन रही। सखियों ने माता-पिता को बताया। वज्रदंत और लक्ष्मीमती शोकाकुल होकर आए। उसे समझाने पर भी वह चुप रही। वज्रदंत ने कहा कि यह यौवन और पूर्वभव स्मरण से मूर्छित हुई है, इसमें दोष या रोग की शंका नहीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
सखीभिरथ सोपायमाश्वास्य म्यजनानिलैः । प्रस्थापति समानीता साभूद् भूयोऽप्यवाङ्मुखी ॥९२॥
तत्पश्चात् सखियों ने अनेक शीतलोपचार और पंखा की वायु से आश्वासन देकर उसे सचेत किया परंतु फिर भी उसने अपना मुँह ऊपर नहीं उठाया ।।92।।
Thereafter, the friends provided various soothing treatments and cooled her with the breeze of a fan to reassure her, but still, she did not lift her face upwards.
श्लोक ( Shlok ) 93
मनोहरं प्रभोद्धासि सुन्दरं चारुलक्षणम् । तद्वपुर्मनसीवास्या लिखितं निर्बभौ तदा ॥९३॥
उस समय मनोहर, प्रभा से दैदीप्यमान, सुंदर और अनेक उत्तम-उत्तम लक्षणों से सहित उस ललितांग का शरीर श्रीमती के हृदय में लिखे हुए के समान शोभायमान हो रहा था ।।93।।
At that time, the body of the beautiful and radiant Manohar, adorned with many excellent qualities, was shining in the heart of the lady, just like something written within it.
श्लोक ( Shlok ) 94
परिपृष्टापि साशङ्ग सखोभिर्जोषमास्त सा । मूकीभूता किलाप्राप्ते स्तस्य मौनं ममेत्यलम् ॥९४॥
अनेक आशंकाएँ करती हुई सखियों ने उससे उसका कारण भी पूछा परंतु वह चुपचाप बैठो रही । ललिता की प्राप्ति पर्यंत मुझे मौन रखना ही श्रेयस्कर है ऐसा सोचकर मौन रह गयी ।।94।।
The friends, filled with various concerns, asked her the reason, but she remained silently seated. Thinking that it was best to remain silent until Lalita’s arrival, she chose to stay quiet.
श्लोक ( Shlok ) 95
ततः पर्याकुलाः सत्यः तमुदन्तमशेषतः । गत्वा पितृभ्यामाचख्युः सख्यो वर्षधरैः समम् ॥९५॥
तदनंतर घबड़ायी हुई सखियों ने पहरेदारों के साथ जाकर उसके माता-पिता से सब वृत्तांत कह सुनाया ।।95।।
Afterward, the anxious friends went to the guards and informed her parents about the entire situation.
श्लोक ( Shlok ) 96
तद्वार्ताक्रर्णनातूर्ण तदभ्यर्ण मुपागतौ । पितरौ तदवस्यां च दृष्ट्रैनां शुचमायतुः ॥९६॥
सखियों की बात सुनकर उसके माता-पिता शीघ्र ही उसके पास गये और उसकी वह अवस्था देखकर शोक को प्राप्त हुए ।।96।।
Hearing the friends’ words, her parents quickly went to her and, upon seeing her condition, were filled with sorrow.
श्लोक ( Shlok ) 97 – 98
अङ्ग पुत्रि परिष्वङ्गं विधेद्युत्सङ्ग महिनौ । इति निर्बंध्यमानापि मोमुह्येव यदास्त सा ॥९७॥
लक्ष्मीमतिमयोवाच प्रभुरिङ्गित कोविदः । जाता ते पुत्रिका तन्वी सेयमापूर्णयौवना ॥९८॥
हे पुत्री, हमारा आलिंगन कर, गोद में आ इस प्रकार समझाये जाने पर भी जब वह मूर्च्छित हो चुपचाप बैठी रही तब समस्त चेष्टाओं और मन के विकारों को जानने वाले वज्रदंत महाराज रानी लक्ष्मीमती से बोले―हे तन्वि, अब यह तुम्हारी पुत्री पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त हो गयी है ।।97-98।।
“O daughter, come to us, embrace us, and rest in our lap,” they tried to console her in this way. However, when she remained unconscious and sat silently, King Vajradanta, who knew all the actions and the fluctuations of the mind, spoke to Queen Lakshmimati, saying—”O slender one, your daughter has now reached the full bloom of youth.”
श्लोक ( Shlok ) 99
अस्याः सुदति पश्येदं वपुरत्यन्तकान्तिमत् । अनीदृशमभूत स्वर्गनारीभिरपि दुर्लभम् ॥९९॥
हे सुंदर दाँतों वाली, देख, यह इसका शरीर कैसा अनुपम और कांति युक्त हो गया है । ऐसा शरीर स्वर्ग की दिव्यांगनाओं को भी दुर्लभ है ।।99।।
“O beautiful one with lovely teeth, see how her body has become so exquisite and radiant. Such a body is even rare among the celestial nymphs of heaven.”
श्लोक ( Shlok ) 100
ततो विकृतिवारेस्या न दुष्यत्यय सुन्दरि । तेन मा स्म भयं देवि शङ्कमानान्यथा गमः ॥१००॥
इसलिए हे सुंदरि, इस समय इसका यह विकार कुछ भी दोष उत्पन्न नहीं कर सकता । अतएव हे देवि, तू अन्य-रोग आदि की शंका करती हुई व्यर्थ ही भय को प्राप्त न हो ।।100।।
“Therefore, O beautiful one, this current condition of hers cannot cause any harm. Hence, O goddess, do not fear unnecessarily while worrying about other ailments or similar concerns.”
श्लोक ( Shlok ) 101
प्राग्जन्मानुमवः कोऽपि नूनमस्या हृदिस्थितः । संस्कारान् प्राक्कनान् प्रायः स्मृत्वा मूर्च्छन्ति जन्तवः॥ १०१ ॥
निश्चय ही आज इसके ह्रदय में कोई पूर्वभव का स्मरण हो आया है क्योंकि संसारी जीव प्राय: पुरातन संस्कारों का स्मरण कर मूर्च्छित हो ही जाते हैं ।।101।।
“Certainly, today some past-life memory must have arisen in her heart, for worldly beings often become unconscious when they recall ancient impressions.”
श्लोक 102 से 111
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
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