श्रीअमृतचन्द्राचार्य विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय – गाथा 9 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी और ‘भावप्रकाशनी’ हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
उत्थानिका – उपर्युक्त आर्या छन्दों में पुरुषार्थसिद्धयुपाय कहने की प्रतिज्ञा की है। अब यहाँ शंका होती है कि ‘पुरुष’ शब्द का क्या अभिप्राय है यह हम नहीं जानते ? इस शंका का निराकरण करते हुए अगला सूत्र कहते हैं –
अस्ति पुरुषश्चिदात्मा विवर्जित: स्पर्शगन्धरसवर्णै: ।
गुणपर्ययसमवेत: समाहित: समुदयव्ययध्रौव्यै: ॥9॥
अन्वय – पुरुषः चिदात्मा अस्ति स्पर्शगन्धरसवर्णैः विवर्जितः गुणपर्ययसमवेतः समुदयव्ययध्रौव्यैः समाहितः।। अन्वयार्थ – (पुरुषः) आत्मा (चिदात्मा अस्ति) चैतन्य स्वरूप है (स्पर्शगन्धरसवर्णैः) स्पर्श, रस, गन्ध, वर्ण से (विवर्जितः) रहित है। (गुणपर्ययसमवेतः) गुण और पर्यायों से सहित है और (समुदयव्ययध्रौव्यैः) उत्पाद, व्यय और ध्रौव्य से (समाहितः) व्यवस्थित है।
टीकार्थ – पुरुष चिदात्मा है अर्थात् पुरुष चैतन्य का अनुभव करने वाला है या चैतन्य स्वरूप वाला है। चित् का अर्थ संस्कृत के अनुसार तीनों वाच्यों में किया जाता है, जो अनुभवन करता है या जिसके द्वारा अनुभवन किया जाता है या अनुभवन करना मात्र चित् कहलाता है। ‘चिति संज्ञाने’ धातु से चैतन्य शब्द बनता है। वही ‘स्व’ ‘पर’ को जानने वाली शक्ति है। चित् ही जिसकी आत्मा है वह चिदात्मा है। अतः अस्ति ‘पुरुषश्चिदात्मा’ इस पद के द्वारा जीव का लक्षण कहा गया है। गुण और लक्षण में भेद होता है। द्रव्य के गुण बहुत होते हैं पर लक्षण एक ही होता है। जैसे जीव द्रव्य के ज्ञान, दर्शन, वीर्य, अस्तित्व आदि अनन्तगुण हैं पर लक्षण एक चैतन्य ही है। इससे यह सिद्ध हुआ कि लक्षण विलक्षण होता है।
लक्षण – मिली हुई अनेक वस्तुओं में से लक्षित वस्तु के अलग करने वाले हेतु को लक्षण कहते हैं। इस प्रकार न्यायदीपिका में कहा है।
फरस गंध रस वर्ण से, रहित चिदातम देव । गुण पर्यायों सहित वो, ध्रुव व्यय उदय सदैव ॥९॥
शंका – जीव का लक्षण ज्ञान-दर्शन होना चाहिए क्योंकि इन दोनों गुणों का जीव के साथ तादात्म्य सम्बन्ध है?
समाधान – ऐसा नहीं है, क्योंकि छद्मस्थ अवस्था में तादात्म्य होने पर भी ज्ञान-दर्शन क्रमवर्ती होते हैं। अर्थात् – छद्मस्थ अवस्था में पहले दर्शन होता है और दर्शन पूर्वक ज्ञान होता है किन्तु सर्वज्ञ के दर्शन ज्ञान दोनों साथ-साथ होते हैं। इसलिए दर्शनोपयोग के काल में ज्ञान का अभाव हाने से लक्षण व्यभिचारी होता है। इसलिए चैतन्य लक्षण वाला जीव है। यह लक्षण अव्याप्ति, अतिव्याप्ति, असंभव दोष से रहित है। यदि आप कहें कि “उपयोग लक्षण वाला जीव है” तो ऐसी बात नहीं है क्योंकि उपयोग का लक्षण इस प्रकार कहा गया है” चैतन्य का अनुसरण करनेवाले परिणाम को उपयोग कहते हैं।” ऐसा आगम से प्रसिद्ध होने से दोनों में विशेषता का अभाव है। यहाँ पर पुरुष शब्द से मनुष्य अर्थ ग्रहण नहीं करना चाहिए क्योंकि यहाँ तो पुरुष शब्द आत्म द्रव्य का वाचक है। इसलिए चतुर्गति में होने वाले जीव और सिद्ध परमात्मा को पुरुष शब्द से ग्रहण करना चाहिए। उस पुरुष में और क्या विशेषता है तो कहते हैं कि वह स्पर्श गन्ध रस वर्ण से रहित है अर्थात् आठ प्रकार के स्पर्श, दो प्रकार के गन्ध, पाँच प्रकार के रस और पाँच प्रकार के वर्ण से रहित है। स्पर्श गन्ध रस वर्ण का इतरेतर द्वन्द्व समास किया गया है। जीव पदार्थ में स्पर्श गन्ध रस वर्ण नहीं होते हैं। यह कथन का तात्पर्य है।
यद्यपि व्यवहार नय की अपेक्षा शरीर के सम्बन्ध से जीव स्पर्श रस गन्धवर्ण से युक्त है तो भी जीव को चक्षु के द्वारा या सूक्ष्मदर्शी यन्त्र के द्वारा देखना या मृत्यु के बाद जीव की गति को जानना त्रिकाल में भी संभव नहीं है, क्योंकि तत्त्वार्थसूत्र में कहा है – अन्तिम शरीर (कार्मण शरीर) उपभोग से रहित है। जीव द्रव्य की और क्या विशेषता है – गुणपर्यय समवेत — द्रव्य के गुण शाश्वत होते हैं। पर्यायें क्षणक्षयी (क्षणध्वंसी) और चिरकाल तक स्थायी भी रहती हैं। द्रव्य के विधायक गुण हैं और द्रव्य का विकार पर्यायें हैं। पर्याय, पर्यय, परिणाम से सब एकार्थवाची हैं। जो गुण और पर्यायों से सहित है उसे जीव द्रव्य जानना चाहिए। जैसा कि तत्त्वार्थसूत्र में कहा है। ‘गुणपर्ययवद् द्रव्यम्’ अर्थात् गुण और पर्याय से युक्त द्रव्य होता है। इससे जीव की द्रव्यता का वर्णन किया गया है। तादात्म्य लक्षण वाली होने से द्रव्य से गुण पर्यायों का अपृथक्पना सिद्ध है ऐसा जानना चाहिए। अपृथक् (अभिन्न) होने पर भी शब्द (संज्ञा), संख्या, लक्षण की अपेक्षा से कथञ्चित् भिन्न है, कथञ्चित् अभिन्न है क्योंकि उन द्रव्य और गुण दोनों में अभेदपना है।
यदि जीव द्रव्य है तो सत्त्व कैसा होगा? इस प्रकार की शंका का निराकरण करते हुए कहते हैं ‘समुदयव्ययत्रौव्यैः समाहितः’ नवीन पर्याय की प्राप्ति उत्पाद कहलाती है। पूर्व पर्याय का त्याग व्यय कहलाता है। दोनों पर्यायों में सत् का होना ध्रौव्य कहलाता है। इनसे जो सहित है वह उत्पाद व्यय ध्रौव्य से युक्त है। जैसा कि तत्त्वार्थसूत्र में कहा है ‘उत्पाद व्यय ध्रौव्य युक्तं सत्।’ ये उत्पादादि कथञ्चिद् भिन्न हैं, क्योंकि ये भिन्न लक्षण वाले होते हैं। जैसे दही और घी, गोरस की अपेक्षा अभिन्न है किन्तु दूध का व्यय दही का उत्पाद, घृत पर्याय का उत्पाद, दही पर्याय का विनाश (व्यय) इन सभी स्थितियों में दूध रूप द्रव्य का सभी के साथ अनुवर्तन सदैव रहता है, इस अपेक्षा से कचिद् अभिन्न है। इस प्रकार एक दूसरे की अपेक्षा से उत्पादादि का स्वरूप जानना चाहिए। जैसा कि कहा है –
जिसके दुग्ध लेने का व्रत है अर्थात् आज मैं दूध ही लूँगा ऐसी प्रतिज्ञा है वह दही नहीं खाता, जिसके दही लेने का व्रत है, वह दुग्ध नहीं पीता और जिसका गोरस न लेने का व्रत है वह दूध, दही दोनों ही नहीं खाता। इससे मालूम होता है कि वस्तु तत्त्व त्रयात्मक है अर्थात् उत्पाद व्यय धौव्य रूप है।
उत्पाद आदि वस्तु के स्वाभाविक धर्म हैं। पर्यायार्थिक नय की अपेक्षा वस्तु जिस क्षण में उत्पन्न होती है उसी क्षण में वह विनाश को भी प्राप्त होती है। द्रव्यार्थिक नय की अपेक्षा उसी क्षण वस्तु सत्त्व (अस्तित्व या मौजूदगी) रूप में भी रहती है। इससे यह सिद्ध हुआ कि वस्तु प्रत्येक क्षण नवीन ही है। इस कारण से सिद्धों के प्रत्येक क्षण अपूर्व ही सुख होता है। चूँकि स्याद्वाद मुद्रा (मुहर) से अंकित जिनेन्द्र भगवान का शासन नवीनतम ही है इसलिए अनादि काल से निरन्तर पवन की तरह प्रवाहमान होकर भी यह जैन शासन अत्यन्त निर्मलता का अपूर्व प्रवाह है। उत्पाद व्यय प्रौव्यात्मक शक्ति सभी द्रव्यों में स्वभाव से ही रहती है। इस लोक में ऐसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि कोई पुरुष नहीं है कि जो लोक की रचना, रक्षा और विनाश करते हों। लोक में सभी द्रव्यों में उत्पाद, व्यय आदि स्वभाव से ही होते हैं। यहाँ ऐसा मानना चाहिए कि उत्पाद शक्ति ही निश्चय से ब्रह्मशक्ति है, व्यय शक्ति ही निश्चय से महेश की परिच्छेदक है और ध्रौव्यशक्ति का भाव ही विष्णु है। इस प्रकार शुद्ध निश्चय नय की अपेक्षा से जीव का स्वरूप कहा गया है ॥९॥
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 9
‘भावप्रकाशनी’ हिंदी टीका पं० मुन्नालाल रांधेलीय वर्णी
भावार्थ – लक्षण या स्वरूप दो तरहका होता है (१) निश्चयरूप अर्थात् असली ( भूतार्थ) और (२} ब्यवहाररूप ( नकली कामचलाऊ अभूतार्थ )। तदनुसार इस श्लोक द्वारा जीवद्रव्यका असाधारण ( आत्मभूत ) असली स्वरूप बताया गया है जो अन्य द्रव्योंमें नहीं पाया जाता, यह विकाल जीवके साथ रहता है, कभी जीवसे भिन्न नहीं रहता । जैसे कि चेतना गुण जीवद्रव्यका मुख्य गुण है उसके साथ जीवका अकालिक सम्बन्ध है और उसके साथ व्याप्यव्यापक सम्बन्ध भी है अतएव उसके साथ जीयका एकत्व है। यद्यपि चेतनाके तीन भेद किये गये हैं-(१) ज्ञानचेतना .(२). कर्मचेतना और (३) कर्मफल चेतना । परन्तु कार्य, वेतनाका एक जानना ही है । विषयभेदसे उक्त तीन भेद किये गये हैं या जो अपनेको खुद जाने ( स्वसंवेदन या आत्मसंवेदन करे अनुभवे ) वह ज्ञानचेतना है ( आत्मचेतना है ) और जो कर्म अर्थात् क्रिया को जाने ( प्रवृत्ति निवृत्ति करावे ) वह कर्मचेतना है तथा जो कर्मके फल सुख-दुःखको जाने-ज्ञान करावे, वह कर्मफल नेतना है । इन तीनोंमेंसे ‘ज्ञानचेतना’ सिर्फ सम्यग्दष्टि के होती है ऐसा कहा गया है। क्योंकि स्त्र और परका भेद विज्ञान सिवाय सम्यग्दृष्टिके और किसीको नहीं होता अर्थात् सत्यार्थ नहीं होता जो हितकारी है। परसे भिन्नताका ज्ञान होना सम्यग्दष्टिका ही कार्य है मिथ्याष्टिका नहीं है । मिथ्यादृष्टिके विपरीत ज्ञान होने से वह अपने आत्माको परसे भिन्न नहीं जानता मानता, अपितु पर रूप ही जानता मानता है, जैसी संयोगीपर्याय है तद्रूप हो जानता है इत्यादि । फलतः वस्तुका या आत्माका स्वरूप, परसे अर्थात् रूप रसादिक पुद्गलके गुणोंसे पृथक् है अर्थात् तादात्म्यरूप { अभिन्न या एकात्वरूप ) नहीं है । और अपने गुणपर्यायोंके साथ हमेशा रहता है ( एकत्वरूप है) तथा उत्पाद व्यय प्रौव्य इन तीन साधारण गुणोंबाग है, जो सभीमें (द्रव्य मात्रमें ) रहते हैं, कारण कि वे द्रव्यका स्वभाव हैं। ‘सद्द्रव्यलक्षणम् – उत्पादव्ययध्रौव्ययुक्तं सत् ऐसा द्रव्यका लक्षण कहा गया है । (तस्वार्थसूत्र अध्याय ५वाँ सू० २९, ३०)
प्रत्येकका लक्षण निम्न प्रकार है—
( १ ) नवीन पर्यायकी उत्पत्ति होना, उत्पाद कहलाता है जो समय २ होता है वस्तुका स्वभाव है |
(२) व्यय-प्रति समय जो पूर्व पर्याय का विनाश (अभाव) होता है वह व्यय है।
(३) ध्रौव्य – जो हमेशा स्थिर ( कायम ) रहता है वह ध्रौव्य है ऐसी चीज द्रव्य है। अर्थात् मूलभूत वस्तु है । परन्तु वह भी परिणामी ध्रुव ( नित्य ) है कूटस्थ नित्य (ध्रुव) नहीं है जैसा कि अन्य मतवाले मानते हैं।
(४) गुण-जो द्रव्यके आश्रय ( आधार ) रहते हैं और जिनमें गुण नहीं रहते (द्रव्याश्रयाः निर्गुणा: गुणाः, तत्त्वार्थसूत्र ५-४१)।
(५) पर्याय – जो बदल करके भी तद्रप ( द्रव्यरूप ) रहे, अन्यरूप न हो इत्यादि ( ‘तद्भावः परिणामः, त० सूत्र ५-४२) अर्थात जैसी द्रव्य हो वैसी हो पर्याय होतो है (परिणाम होता है)
पर्यायके भेद—-
( १ ) अर्थपर्याय—जो प्रति समय बदलती रहती है, प्रत्येक गुणको अवस्था परिवर्तित होती है । ( एक समयकी है ) ।
(२) व्यंजनपर्याय–जो समुदाय रूप स्थूल (व्यक्त होती है अनेक समयकी पर्यायोंके मेल रूप है । बह विभावरूप व स्वभावरूप दो सरहकी होती है, उनमेसे भेद है।
नोट—यह विभाव व्यंजनपर्याय, जीव और पुद्गल दो हो द्रव्योंमें होती है शेष चार द्रव्योंमें नहीं होती। (आलापपद्धतिमें देखो) निश्चयसे जीव द्रव्य के उक्त चार लक्षण ( स्वरूप) चेतनत्व, स्पर्शादिभिन्नत्त्व, गुणपर्ययवस्व, उत्पादव्ययध्रौव्यत्त्व हैं जो आत्मभूत लक्षण हैं (अभिन्न प्रदेशी हैं ) और कोई २ लक्षण अनात्मभूत (भिन्न प्रदेशी ) भी होता है। उसका नाम व्यवहारी लक्षण है जो संयोगावस्था में होता है अभिन्न प्रदेशी लक्षण का नाम निश्चयलक्षण है ऐसा जानना।
सम्यग्दृष्टिका लक्षण
जो आत्मा ( जीवद्रव्य ) के उक्त प्रकार अनेकान्त स्वरूपको निश्चयनय से जानता व मानता है वही सम्यग्दृष्टि होता है दुसरा नहीं ।
तदुक्तं
जो तच्चमणेयन्तं णियमा सद्दहदि सत्तभंगेहि । लोयाण पण्हवसदो ववहारपवत्तणट्ठं च ॥३१॥
___ कार्तिकेयानुपेक्षा
अर्थ-जो जीव सातभंगरूप ( भेदरूप अनेक धर्मरूप) अनेकान्तमय वस्तुको यथार्थ जानता है व श्रद्धान करता है वही सम्यग्दृष्टि होता है यह नियम है तथा जो जीव अनेकान्तमय तत्वको नहीं समझता बह मिथ्यादृष्टि होता है। और ऐसा अनेकान्तका ज्ञाता जीव हो संयोगी पर्यायमें रहता हआ अच्छी तरह लोकव्यहार चला सकता है कोई विघ्न-बाधा नहीं आती यह महान् लाभ होता है अस्तु ।
सातभंगोंके नाम
- स्यादस्ति
- स्यान्नास्ति
- स्यादस्तिनास्ति
- स्यादवक्तव्य
- स्यादस्ति अवक्तव्य
- स्यान्नास्ति अवक्तव्य
- स्यादस्तिनास्ति अवक्तव्य
ये सात धर्म वस्तुमें पाये जाते हैं, जो प्रश्न होने पर बताये जाते हैं। और भी ४७ शक्तियों तक विचार किया जाता है । ज्ञानकी महिमा अपरंपार है ऐसा समझना ।
सप्तभंगीका स्वरूप
एकस्मिन्नविरोधेन: प्रमाणनयवाक्यतः ।
सदादिकल्पना सा च सप्तभंगीति सा मता ।अर्थ– प्रमाणको अपेक्षा ( आलम्बन । से या नयकी अपेक्षासे एक ही पदार्थमै विरोधरहित अर्थात् स्याद्वादका सहारा लेकर जो सत्, असत् आदि सात प्रकारकी कल्पना ( विकल्प ) की जाती है, उसको सप्तभंगी कहते हैं। उसके दो भेद हैं-(१) प्रमाणसप्तभंगी ( २ ) नयसप्तभंगी इति । केवलज्ञानको छोड़कर ७ ज्ञानके भेद और ७ नयों के भेद इत्यादि जानना ।
विशेषार्थ
नोट- इस श्लोक द्वारा आचार्य महाराजने पुरुष ( आत्मा ) का श्रद्धेय व उपास्य तत्व क्या है ? यह खासकर बतलाया है, उसीसे उद्धार हो सकता है। वह तत्त्व एक चेतन द्रव्य है शेष पाँच जड़ ( अचेतन ) द्रव्य हैं। जब तक भव्यात्मा चेतन व अचेतनका पृथक् २ ज्ञान श्रद्धान नहीं करता तब तक अज्ञानी रहता है और जब चेतन व जड़का भेद जान लेता है और उसमें भी जड़को उपादेय न मानकर एक अपने शुद्ध स्वरूप आत्माको ही उपादेय-श्रद्धेय व उपास्य मानता है तभी निश्चमसे सम्यग्दृष्टि होता है और मोक्षका अधिकारी माना जाता है ! फलतः जड़ की या मृर्तकी उपासना करनेवाला ( तन-धन-जन-प्रतिमा या शास्त्र आदि पुद्गल द्रव्य व उसके पर्यायोंका उपादेय रूपसे आदर करनेवाला) कभी संसारसे पार नहीं हो सकता न वह सम्यग्दृष्टि कहा जा सकता है अरे ! जड़ ( अचेतन संयोगोपर्याय ) का उपासक या पूजक ( आत्मज्ञान रहित) कैसे पार पायेगा यह विचारणीय है। बस, यही खास तत्त्व इस श्लोकमें बतलाया गया है।
सारांश-चेतनको चेतनकी उपासना व श्रद्धा करना और सबसे सम्बन्ध विच्छेद करना, यही कार्यकारी है। वह चेतन पुरुष पूर्वोक्त प्रकारका है अन्य प्रकारका नहीं है। यदि भिन्न प्रकार माना जायगा तो मिथ्यात्व होगा इत्यादि । आत्मा ( चेतन) का आलम्बन, आत्मा ही है नान्य: इति मूर्ति ( प्रतिमा शास्त्र आदि) का आदर स्मारकरूप निमित्त होनेसे उपचार मानकर किया जाता है सत्य नहीं यह भेद है इसको ठोक २ समझना चाहिए।
अनुजीवी व प्रतिजीवी गुण
जीव ( आत्मा) द्रव्यमें (१) अनुजीवी और (२) प्रतिजीवी दो तरहके गुण रहते हैं । अर्थात् जीवमें विद्यमान रहते हैं या पाये जाते हैं।
(१) अनुजीवीगुणका अर्थ है स्वाश्रित गुण अर्थात् जो अपनी ही अपेक्षासे घटित हो सदा रहे अन्धको अपेक्षा न रखें । जैसे कि जीवद्रव्यमें चेतना-ज्ञान, दर्शन, सुख, बल विशेष गुण अथवा सुख, वीर्य, जीवत्व वगैरह, जिनसे जीवन सिद्ध होता है व स्वतः सिद्ध हैं-पराश्रित या आपेक्षिक नहीं हैं इत्यादि ।
(२) प्रतिजीवीगुणका अर्थ है पराश्रितगुण अर्थात् जो परको अपेक्षासे घटित होते हैं या प्रतिपक्षी गुण, जिनमें जीवनका सम्बन्ध नहीं है अर्थात् जो अनुजीवी नहीं हैं भिन्न हैं। जैसे कि अव्याबाधत्व, यह परकृत बाधासे रहित होने के कारण प्रकट होता है, अनुजीवी नहीं है प्रतिपक्षी हैं। अवगाहत्व, यह परको स्थान नहीं देने से प्रकट होता है या परमें प्रवेश न करनेसे प्रकट होता है। अगुरुलधुत्व, यह परका प्रवेश न होने देनेसे प्रकट होता है। नास्तित्त्व, परमें न रहनेसे यह प्रकट होता है ( परचतुष्टयको अपेक्षा रखता है ) इत्यादि दोनोंका अर्थ समझना। इससे भिन्न सद्भाव रूप या अभाव रूप अर्थ नहीं समझना जैसा कि अन्यत्र लिखा है अस्तु । यथा अभावरूप गुणोंको प्रतिजीवी गुण काहते हैं, ऐसा जो लक्षण लिखा है वहाँ पर अभावरूपका अर्थ, अनुजीवो गुणों के अभावरूप या प्रतिपक्षी रूप अर्थ समझना चाहिए अर्थात जो अनुजीवी रूप नहीं हैं। इसीसे उनका नाम प्रतिजीवी रखा गया है कारण की जीव द्रव्य (आत्मा) का जीवन उनके आश्रित नहीं है ऐसा स्पष्ट समझना चाहिए ।। ९ ।।
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 9
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