भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 महाबल का रूप
महाबल का रूप कामदेव से श्रेष्ठ था। उसके घुँघराले बाल मेघ समान मेरु शिखर जैसे थे। ललाट लक्ष्मी के विश्राम हेतु सुवर्ण शिला समान, भौंहें कामदेव के धनुष समान, और आँखें बाण यंत्र समान थीं। कान सरस्वती के झूले, नाक नेत्रों की स्पर्धा रोकने वाला पुल, और मुख सुगंधित कमल समान थे। वक्षस्थल लक्ष्मी का स्नानगृह, और कंधे क्रीड़ाचल समान शोभित थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 4- Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
अदृश्यो मदनोऽनङ्गो दृश्योऽसौ वारुविग्रहः । तदस्य मदनो दूरमौपम्यपदमप्यगात् ॥१७२॥
राजा महाबल और कामदेव दोनों ही सुंदर शरीर के धारक थे । अभी तक राजा को कामदेव की उपमा ही दी जाती थी परंतु कामदेव अदृश्य हो गया और राजा महाबल दृश्य ही रहे इससे ऐसा मालूम होता था मानो कामदेव ने उसकी उपमा को दूर से ही छोड़ दिया था ।।172।।
“King Mahabal and Kamadeva both possessed beautiful bodies. Until then, the king was often compared to Kamadeva, but as Kamadeva became invisible and King Mahabal remained visible, it seemed as if Kamadeva had abandoned his comparison from afar.”
श्लोक ( Shlok ) 173
तस्यामादलिसक्काश मृदुकुञ्चितमूर्द्धजम् । शिरोविन्यस्तमकुटं मेरोः कूटमिवाभ्रितम॥१७३।।
उस राजा के मस्तक पर भ्रमर के समान काले, कोमल और घुँघराले बाल थे, ऊपर से मुकुट लगा था जिससे वह मस्तक ऐसा मालूम होता था मानो काले मेघों से सहित मेरु पर्वत का शिखर ही हो ।।173।।
“On the king’s head, there were black, soft, and curly hair, resembling a bee, with a crown placed on top. This made his head appear as if it were the summit of Mount Meru, surrounded by dark clouds.”
श्लोक ( Shlok ) 174
ललाटमस्य विस्तीर्णमुन्नतं रुचिमादधे । लक्ष्म्या विश्रान्तये “क्लप्तमिव हैमं शिलातलम् ॥१७४॥
इस राजा का ललाट अतिशय विस्तृत और ऊँचा था जिससे ऐसा शोभायमान होता था मानो लक्ष्मी के विश्राम के लिए एक सुवर्णमय शिला ही बनायी गयी हो ।।174।।
“The king’s forehead was exceptionally broad and high, making it appear as if a golden stone had been specially created for the resting place of Lakshmi, the goddess of wealth.”
श्लोक ( Shlok ) 175
भ्रूरेखे तस्य रेजाते कुटिले भृशमायते । मदनस्यास्त्रशालायां धनुषोरिव यष्टिके ॥१७५॥
उस राजा की अतिशय लंबी और टेढ़ी भौंहों की रेखाएँ ऐसी मालूम होती थीं मानो कामदेव की अस्त्रशाला में रखी हुई दो धनुषयष्टि ही हों ।।175।।
The king’s exceptionally long and arched eyebrows appeared as though they were two bowstrings kept in the weaponry of Kamadeva, the god of love.”
श्लोक ( Shlok ) 176
चक्षुषी रेजतुस्तस्य भ्रूचापोपान्तवर्तिनी । विषमेषोरिवाशेषजिगीषोरिषुयन्त्रके ॥ १७६॥
भौंहरूपी चाप के समीप में रहने वाली उसकी दोनों आँखें ऐसी शोभायमान होती थीं मानो समस्त जगत् को जीतने की इच्छा करनेवाले कामदेव के बाण चलाने के दो यंत्र ही हों ।।176।।
“His eyes, situated near the bow-like eyebrows, were so captivating that they appeared as if they were the two weapons of Kamadeva, ready to shoot arrows with the intent of conquering the entire world.”
श्लोक ( Shlok ) 177
सकर्णपालिके चारु रत्नकुण्ठमण्डिते । श्रुताङ्गनास माक्रीड लीला दोलायिते दधी ॥१७७॥
रत्नजड़ित कुंडलों से शोभायमान उसके दोनों मनोहर कान ऐसे मालूम होते थे मानो सरस्वती देवी के झूलने के लिए दो झूले ही पड़े हों ।।177।।
“His two charming ears, adorned with jeweled earrings, appeared as though they were two swings set for Goddess Saraswati to swing on.”
श्लोक ( Shlok ) 178
दधेऽसौ नासिकावंशं तुङ्ग मध्येविलोचनम् । तद्वृद्धिस्पर्द्ध रोधार्थ बद्धं सेतुमिवायतम् ॥१७८॥
दोनों नेत्रों के बीच में उसकी ऊंची नाक ऐसी जान पड़ती थी मानो नेत्रों की वृद्धिविषयक स्पर्धा को रोकने के लिए बीच में एक लंबा पुल ही बाँध दिया हो ।।178।।
“Between his two eyes, his high nose appeared as if a long bridge had been built in the middle to prevent the rivalry for dominance between the eyes.”
श्लोक ( Shlok ) 179
मुखमस्य लसद्दन्तदीप्तिकेसरमाबभौ । महोधलमिवाभोदशालि दन्तच्छदच्छदम् ॥१७९॥
उस राजा का मुख सुगंधित कमल के समान शोभायमान था । जिसमें दाँतों की सुंदर किरणें ही केशर थीं और ओठ ही जिसके पत्ते थे ।।179।।
“The king’s face was as radiant as a fragrant lotus, with the beautiful rays of his teeth resembling saffron, and his lips resembling the petals of the lotus.”
श्लोक ( Shlok ) 180
पृथुवक्षो बभारासौ हाररोचिजंलप्लवम् । धारागृहमिषोदारं लक्ष्म्या निर्वापणं परम् ॥१८०॥
हार की किरणों से शोभायमान उसका विस्तीर्ण वक्षःस्थल ऐसा मालूम होता था मानो जल से भरा हुआ विस्तृत, उत्कृष्ट और संतोष को देने वाला लक्ष्मी का स्नानगृह ही हो ।।180।।
“His broad chest, adorned with the rays of necklaces, appeared as though it were a vast, exquisite, and blissful bathing place of Lakshmi, filled with water, offering contentment.”
श्लोक ( Shlok ) 181
केयूररुचिरावंसौं तस्य शोभामुपेयतुः । क्रीडाद्री रुचिरो लक्ष्म्या विहारायेव निर्मितौ ॥ १८१॥॥
केयूर (बाहुबंध) की कांति से सहित उसके दोनों कंधे ऐसे शोभायमान होते थे मानो लक्ष्मी के विहार के लिए बनाये गये दो मनोहर क्रीड़ाचल ही हों ।।181।।
“His two shoulders, adorned with the radiance of armlets (keyura), appeared as if they were two beautiful playgrounds created for the amusement of Lakshmi.”
श्लोक 182 से 191
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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