भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 मुनि सम्मान और स्वर्ग
मुनि ने कहा कि उनका अपमान दुःख देता है—वचन से गूँगापन, मन से स्मृति नाश, शरीर से तिरस्कार होता है। निर्नामा ने व्रत लेकर स्वर्ग प्राप्त किया, ललितांगदेव की स्वयंप्रभा बनी, फिर यहाँ श्रीमती हुई। वह ललितांग का अन्वेषण कर रही है, इसलिए मौन है।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
मुनयः पश्य कल्याणि शापानुग्रहयोः क्षमाः । अतिकान्तिरतस्तेषां लोकद्वय विरोधिनी ॥ १५२॥
हे कल्याणि, देख, मुनि शाप देने तथा अनुग्रह करने―दोनों में समर्थ होते हैं, इसलिए उनका अपमान करना दोनों लोकों में दुःख देने वाला है ।।152।।
O Kalyani, look, sages are capable of both cursing and granting blessings. Therefore, disrespecting them brings sorrow in both worlds. ||152||
श्लोक ( Shlok ) 153 – 156
वाचातिलङ्घनं वाचं निरुणद्धि भवे परे । मनसोल्लङ्घनं चापि स्मृतिमाहन्ति मानसीम् ॥१५३
कायेनातिक्रमस्तेषां कायार्त्तीः साधयेत्तराम् । तस्मात्तपोधनेन्द्राणां कार्यों नातिक्रमो बुधैः ॥ १५४॥
क्षमाधनातां क्रोधाग्नि जनाः संधुक्षयन्ति ये । क्षमाभस्मप्रतिच्छन्नं दुर्वचो विस्फुलिङ्गकम् ॥१५५।
संमोहकाष्ठजनितं प्रातीप्यपवनेरितम् । किं तैर्ने नाशितं मुग्धे हितं लोकद्वयाश्रितम् ॥१५६॥
जो पुरुष वचन द्वारा मुनियों का उल्लंघन-अनादर करते हैं वे दूसरे भव में गूँगे होते हैं । जो मन से निरादर करते हे उनकी मन से संबंध रखने वाली स्मरणशक्ति नष्ट हो जाती है और जो शरीर से तिरस्कार करते हैं उन्हें ऐसे कौनसे दुःख हैं जो प्राप्त नहीं होते हैं ? इसलिए बुद्धिमान् पुरुषों को तपस्वी मुनियों का कभी अनादर नहीं करना चाहिए । हे मुग्धे, जो मनुष्य, क्षमारूपी धन को धारण करने वाले मुनियों की, मोहरूपी काष्ठ से उत्पन्न हुई, विरोधरूपी वायु से प्रेरित हुई, दुर्वचनरूपी तिलगों से भरी हुई और क्षमारूपी भस्म से ढकी हुई क्रोधरूपी अग्नि को प्रज्वलित करते हैं उनके द्वारा, दोनों लोकों में होने वाला अपना कौन-सा हित नष्ट नहीं किया जाता ।।153-156।।
Men who disrespect sages through words become mute in their next life. Those who disrespect them in their minds lose their memory, and those who insult them physically face all kinds of suffering. Therefore, wise individuals should never disrespect ascetic sages.
O innocent one, the men who ignite the fire of anger in sages—who embody the wealth of forgiveness—by using harsh words born from the wind of hostility driven by the wood of delusion, filled with seeds of malice, and covered with the ashes of forgiveness, destroy their own well-being in both worlds. ||153–156||
श्लोक ( Shlok ) 157
इस्थ सुनिवचः पथ्यमनुमत्य यथाविधि । उपोप्य तद्द्वयं स्वायुरन्ते स्वर्गमयासिषम् ॥१५७।।
इस प्रकार मैं मुनिराज के हितकारी वचन मानकर और जिनेंद्रगुणसंपत्ति तथा श्रुतज्ञान नामक दोनों व्रतों के विधिपूर्वक उपवास कर आयु के अंत में स्वर्ग गयी ।।157।।
Thus, accepting the beneficial words of the revered sage and observing both vows—dedicated to the virtues of Lord Jina and scriptural knowledge—through proper fasting, I attained heaven at the end of my life. ||157||
श्लोक ( Shlok ) 158
ललिताङ्गस्य तत्रासं कान्तादेवी स्वयंप्रभा । सार्ध्द सपर्ययागत्य ततो गुरुमपूजयम् ।।१५८।।
वहाँ ललितांगदेव की स्वयंप्रभा नाम की मनोहर महादेवी हुई और वहाँ से ललितांगदेव के साथ मध्यलोक में आकर मैंने व्रत देने वाले पिहितास्रव गुरु की पूजा की ।।158।।
There, I became the enchanting great queen named Swayamprabha of Lalitangadeva. From there, returning to the middle world with Lalitangadeva, I worshipped the revered Guru Pihitasrava, who imparted vows. ||158||
श्लोक ( Shlok ) 159
कल्पेऽनस्पर्द्धिरशाने श्रीप्रमाधिपसंयुता । भोगान् भुक्त्वात्र जातेति कथापर्यवसानकम् ।।१५९।।
बड़ी-बड़ी ऋद्धियों को धारण करने वाली मैंने उस ऐशान स्वर्ग में श्रीप्रभविमान के अधिपति ललितांगदेव के साथ अनेक भोग भोगे तथा वहाँ से च्युत होकर यहाँ वज्रदंत चक्रवर्ती के श्रीमती नाम की पुत्री हुई हूँ । हे सखि, यहाँ तक ही मेरी पूर्वभव की कथा है ।।159।।
Possessing great miraculous powers, I enjoyed numerous pleasures in the Ishana heaven with Lalitangadeva, the lord of the Shri-Prabha celestial mansion. After falling from there, I was born here as Shrimati, the daughter of the Chakravarti king Vajradanta.O friend, this is the complete story of my past life. ||159||
श्लोक ( Shlok ) 160
ललिताङ्गच्युतौ तस्मात् षण्मासान् जिनपूजनम् । कृत्वा प्रच्युत्य संभूतिमिहालप्सि तनुदुरि ।।१६०।।
हे कृशोदरि, ललितांगदेव के स्वर्ग से च्युत होने पर मैं छह महीने तक जिनेंद्रदेव की पूजा करती रही फिर वहां से चलकर यहाँ उत्पन्न हुई हूँ ।।160।।
O slender-waisted one, after falling from Lalitangadeva’s heaven, I worshipped Lord Jinedra for six months. Thereafter, I departed from there and was born here. ||160||
श्लोक ( Shlok ) 161
तमिदानीमनुस्मृत्य तदन्वेषणसंविधौ । यऽहं प्रयता तेन वाचंयमविधिं दधे ॥१६१॥
मैं इस समय उसी का स्मरण कर उसके अन्वेषण के लिए प्रयत्न कर रही हूँ और इसीलिए मैंने मौन धारण किया है ।।161।।
At this time, I am remembering him and striving to search for him, which is why I have embraced silence. ||161||
श्लोक 162 से 171
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151
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