आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-शरीर आदिक पदार्थ जो कि मोहवान् प्राणी के द्वारा उपकारक एवं हितकारक समझे जाते हैं, वे सब कैसे हैं? इसको आगे के श्लोक में उल्लिखित दृष्टान्त द्वारा दिखाते हैं-
गाथा 9
दिग्देशेभ्यः खगा एत्य संवसन्ति नगे नगे । स्वस्वकार्यवशाद्यान्ति देशे दिक्षु प्रगे प्रगे ॥9॥
अन्वयार्थ – (नगे नगे) वृक्ष-वृक्ष पर (दिग्देशेभ्यः) दिशाओं और देशों से (एत्य) आकर (खगाः) पक्षी [संध्या के समय] (संवसन्ति) ठहर जाते हैं तथा (प्रगे प्रगे) प्रातः (स्वस्वकार्यवशात्) अपने-अपने कार्य के वश से (देशे दिक्षु) भिन्न-भिन्न देश, दिशाओं में (यान्ति) चले जाते हैं।
दिशा-दिशा से देश-देश से, उड़ उड़ पक्षी दल आते,
डाल-डाल पर पात-पात पर, पादप पर निशि बस जाते।
अपने-अपने कार्य साधने, उषा काल में फिर उड़ते,
दिशा-दिशा में देश-देश में, कहाँ देखते फिर मुड़के ॥९॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 9
विवेचना
दिशायें दस प्रकार की होती हैं। मूल में चार दिशायें हैं, चार विदिशायें, एक ऊपर और एक नीचे, इस प्रकार ये दस दिशायें मानी जाती हैं। इन दसों दिशाओं से सभी जाति के पक्षी आकर बस जाते हैं। एक-एक वृक्ष पर रहते हैं, डाल-डाल पर, पात-पात पर बैठ जाते हैं। संध्या के समय आप देख सकते हैं कि सब्जी मण्डी में जैसी आवाज होती है, वैसी ही वे सभी पक्षी चूँ- चूँ आदि रूप में कलरव करते हुए सब अपने अपने स्थान पर बैठ जाते हैं। कब तक बैठते हैं? जब तक पूरी रात नहीं होती। जिस प्रकार यात्री स्टेशन पर अपने-अपने स्थान से आकर एकत्रित होते हैं, आपस में पूछताछ करते हैं, गाड़ी आ गई क्या? प्लेटफार्म पर बैठकर गाड़ी की प्रतीक्षा करते हैं। गाड़ी आने पर सब कुछ छोड़-छाड़ कर गाड़ी में बैठकर जाने को तैयार हो जाते हैं। इस समय कोई किसी की कुछ नहीं सुनते। अपनी-अपनी धुन में रहते हैं। उसी प्रकार ये सारे के सारे पक्षी दिशा-दिशा से आ जाते हैं, बैठ जाते हैं। कौन कहाँ कब चले जाते हैं? आचार्य कहते हैं-“प्रगे- प्रगे देशे दिक्षु यान्ति” प्रातःकाल होने पर वे सभी दिशाओं में जिस किसी क्षेत्र में चले जाते हैं। यह उदाहरण परक एक कारिका है। इसमें तो मात्र पक्षियों को उपदेश दिया है, आपको कुछ नहीं कहा, ऐसा नहीं समझना। यह तो उदाहरण रूप है लेकिन उपदेश तो सभी को दिया है।
इस क्षेत्र (रामटेक) पर लोग कहाँ-कहाँ से आये? कोई नागपुर से, कोई सिवनी से, कोई उस पार से, कोई इस पार से आ गये। जब यहाँ से जाओगे तो कोई किसी को कुछ पूछता नहीं। आपके जाते समय यदि कोई कहे आप मत जाइये, आज का मुहूर्त अच्छा नहीं है, आज आपका जाना ठीक नहीं रहेगा, तो आप कह देते हैं कि मुहूर्त ठीक हो या न हो हम तो जा रहे हैं। इसी प्रकार संसारी प्राणी संसार में आ जाते हैं। कोई पचास साल के लिए, कोई साठ साल के लिए, कोई सौ साल के लिए, कोई पन्द्रह साल के लिए आते हैं और खूबी तो यह है कि जब आते हैं तो मंगलगीत होते हैं और जाते हैं तो दंगल गीत होने लग जाते हैं यानि रोते-रोते शोक मनाते हैं। मोह हमेशा हमेशा अपना काम करता रहता है।
यह जीव हमेशा शरीर को संवार कर, सहेज कर, श्रृंगार करके नया-नया बनाने का प्रयास करता है। नया जैसा लगने लग जाता है लेकिन शरीर तो हमेशा शीर्ण स्वभाव वाला ही है, वह तो पुराना ही होता चला जाता है। आत्मा कभी जन्म नहीं लेती, न कभी मरती है। आत्मा का शरीर नहीं है, किन्तु इस शरीर में रहकर आत्मा मोहित ज्ञान के माध्यम से अपने स्वभाव को न जानकर, मोह के प्रभाव में आता है और जो अपना नहीं है उसी को अपना कहता है। इष्ट पदार्थों का वियोग हो जाता है तो रोने लग जाता है और अनिष्ट पदार्थों का संयोग होता है तो भी रोने लग जाता है। इष्ट सामग्री की सुरक्षा और अनिष्ट सामग्री के प्रतिकार में इसका पूरा का पूरा जीवन निकल जाता है। अपने-अपने कार्य के वशीभूत हो करके अपने-अपने देश चले जाते हैं। आप लोग भी आते हैं, चले जाते हैं। तीर्थंकरों के वंश में भी लोग आए और चले गये, लेकिन आत्म स्वभाव के बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं कर पाये।
‘महापुराण’ का उल्लेख हो सकता है कि चक्रवर्ती की 96000 रानियाँ होती हैं, उनमें से 32000 रानियाँ तो म्लेच्छखण्ड से आती हैं शेष 64000आर्यखण्ड की होती है। म्लेच्छखण्ड पाँच होते हैं, आर्यखण्ड एक होता है। म्लेच्छखण्डों से उतनी रानियों का आना यह एक नियोग होता है। कोई भी चक्रवर्ती हो तो उसको 32000 हजार रानियाँ म्लेच्छ खण्ड से ही आयेंगी क्योंकि चक्रवर्ती का प्रभाव ही ऐसा होता है। वह षटखण्डाधिपति होता है जिससे म्लेच्छखण्ड भी प्रभावित होता है। फलतः वहाँ के राजा अपनी-अपनी कन्याओं का दान करते हैं। मुख्य ध्यान देने योग्य बात तो यह है कि जब चक्रवर्ती धार्मिक कार्यों में लीन होता है तो 96000 रानियाँ भी उसके साथ रहती हैं। वे 32000 रानियाँ उस समय अपने आपको म्लेच्छखण्ड से आयी हुई नहीं समझतीं बल्कि वे भी संगति में आकर धर्म-परायण हो जाती हैं। प्रत्येक धर्म कार्य में सम्मिलित होकर वे भी आत्मा परमात्मा की चर्चा करने लग जाती हैं। सोचने की बात है, आप लोगों को सोचना चाहिए कि म्लेच्छखण्ड की होने के बाद भी धार्मिक कार्यों में लीन रहती हैं। यदि कोई कहे कि उन्हें अपनी वंश परम्परा नहीं छोड़नी चाहिए। तो आचार्य महाराज कहते हैं कि शरीर का वंश अलग है, आत्मा का वंश अलग है। आत्मा को हंसा कहा है। आप लोग भी कहते हैं कि बगुले की रीति को नहीं अपनाना चाहिए, किन्तु अपनी नीति को ही सुरक्षित करके रहना चाहिए। आप लोग जिस देश में रहते हैं वहाँ के सारे के सारे काम करने लग जाते हैं चाहे धार्मिक हों या अधार्मिक। सोचने की बात है कि चक्रवर्ती के यहाँ म्लेच्छखण्ड की भी सभी रानियाँ इतनी शिक्षित और संस्कारित हो जाती हैं कि म्लेच्छखण्ड की परम्परा की बात तक नहीं करतीं। मेरे कहने का तात्पर्य यही है कि शरीर में रहकर आत्मा को केवल शरीर की परम्परा की ही बात नहीं करना चाहिए। शरीर तो भोग सामग्री है ऐसा मोही प्राणी मानता है, लेकिन सम्यग्दृष्टि की अपेक्षा से तो यह शरीर योग की सामग्री है। सम्यग्दृष्टि जीव इस शरीर के माध्यम से शरीरातीत होने का प्रयास करता है, जबकि मोही प्राणी मात्र भोग का विषय बनाकर अपना जीवन गुजार देता है और भविष्य में उसका जीवन गर्त में पड़ जाता है। शरीर में रहने पर भी आत्मा अपनी और शरीर की स्थितियों को समझ नहीं पाता। आप सब को भी विचार करना चाहिए कि हम सभी को इस पिंजरे में रहते-रहते बहुत काल व्यतीत हो गया, बहुत दिन हो गये, अब तो कम से कम आत्मा की खबर ले लेना चाहिए और आत्मा की चर्चा कर लेना चाहिए।
आचार्य पूज्यपादस्वामी ने ‘सर्वार्थसिद्धि’ ग्रन्थ में ” आर्या म्लेछाश्च“॥ ३/३६ ॥ इस सूत्र की
व्याख्या करते हुए आर्यों का लक्षण बताया है कि “गुणैर्गुणवद्भिर्वा अर्यन्त इत्यार्याः” ॥१७१॥ जो गुणों के द्वारा मान्यता को प्राप्त हो अथवा गुणी व्यक्तियों के साथ रहता हो वह आर्य माना जाता है। यह लगभग १५०० वर्ष प्राचीन ग्रन्थ है। वह आचार्य उमास्वामीजी द्वारा रचित तत्त्वार्थसूत्र पर टीका ग्रन्थ माना जाता है।
आगे ध्यान दीजिए कि शरीर का जन्म हुआ यह तो निश्चित है, लेकिन जन्म लेने वाले का जन्म नहीं हुआ। शरीर में जन्म अवश्य हुआ। इसका अर्थ यह है कि आत्मारूपी हंसा एक पिंजरे से दूसरे पिंजरे में गया है। इसलिए पिंजरे के माध्यम से वह पहचान में आने लगा। शरीर जन्म लेने के उपरान्त कुछ समय तक बढ़ता चला जाता है फिर पुष्ट होता जाता है। पुद्गल अपना परिचय अपने स्वभाव पूरण-गलन क्रिया से देता रहता है। द्रव्य, क्षेत्र, काल व भाव के निमित्त से जिस देश में पुष्ट होता है फिर अपने आप उसी देश में रहकर बिखरना प्रारम्भ कर देता है। उत्पाद, व्यय, ध्रौव्य के द्वारा परिणमन/परिवर्तन होता रहता है। फिर यह बड़ा हो गया, यह छोटा है आदि व्यवहार होता है। ‘राजवार्तिककार’ आचार्य अकलंकस्वामी जी कहते हैं कि पर से सम्बन्ध सम्बन्धी होने के कारण आत्मा में अनेकता आ जाती है। अनेकान्त हमेशा पर सापेक्ष होता है इसी को लेकर प्रायः हम व्यवहार में कहा करते हैं कि यह बड़ा हो गया, यह छोटा है, यह दुबला हो गया, यह मोटा है, इस प्रकार की उपाधियों से व्यक्ति की रीति-नीति का परिचय होता है। उसके आचरण से रहन- सहन एवं वेशभूषा से उसकी पहचान करते हैं। जीव की विभिन्न अवस्थाओं में भेद डालकर यह व्यवहार होता है।
मैं कह रहा था कि “गुणैर्गुणवद्भिर्वा अर्यन्त इत्यार्याः” अर्थात् गुणों के द्वारा जो मान्यता को प्राप्त होता है वह आर्य माना जाता है। गुण से क्या तात्पर्य है? गुण से तात्पर्य है सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्र अर्थात् अच्छे संस्कार, अच्छे विचार, अच्छे आचार, इन गुणों के विकास होने पर हम कह सकते हैं कि आत्मा का विकास हो रहा है। इन गुणों के पूर्ण विकास का अवसर आत्मा को मनुष्य गति में ही प्राप्त होता है। मनुष्यों में भी आर्यखण्ड में उत्पन्न हुए मनुष्यों को यह अवसर प्राप्त होता है। इसका यह अर्थ नहीं लगाना चाहिए कि जो म्लेच्छखण्ड में उत्पन्न मनुष्य हैं वे मुनि नहीं बन सकते। हाँ, इतना जरूर है कि वहीं रहते हुए मुनि नहीं बन सकते। कोई धर्म कार्य नहीं कर सकते। वहाँ तो केवल षट्कर्म चलते हैं। असि, मसि, कृषि, शिल्प, वाणिज्य और विद्या वहाँ पर इन षट्कर्मों पर आधारित व्यापार चलता रहता है, किन्तु धर्म से उनका कोई सम्बन्ध जुड़ा हुआ नहीं होता।
प्रश्न-म्लेच्छखण्डों में धर्म का सम्बन्ध क्यों नहीं रहता ? क्या वे म्लेच्छखण्ड के योग्य धर्म का पालन करते होंगे ?
समाधान-आचार्य महाराज कहते हैं कि “धर्म षट्कर्मों पर आधारित नहीं होता धर्म तो गुणात्मक इकाई है जो आत्मा से संबंधित है। आर्यखण्ड में ही उसकी प्राप्ति होती है।” धर्म आत्मा की वस्तु है न कि शरीर की या क्षेत्र की। क्षेत्र की अपेक्षा जब कोई म्लेच्छखण्ड का मनुष्य इधर आ जाता है और यहाँ आकर धर्म की बात करने लग जाता है, धर्म को स्वीकार करने लग जाता है तो उसको भी आत्मविकास का अवसर प्राप्त हो जाता है। अपना विकास कर लेता है। लेकिन आप लोग यहाँ पर रहकर भी उन गुणों की ओर दृष्टिपात नहीं कर पाते। बल्कि जीवन को आदि से लेकर अन्त तक षट्कर्मों में ही गंवा देते हैं। भीतरी सम्यक् गुणों की बात ही नहीं करते, तब भी आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी ने आप लोगों को ‘क्षेत्रार्य’ की कोटि में रखा है। उन्होंने आर्यों के पाँच भेदों का वर्णन किया है। जो कुल परम्परा से आर्यखण्ड में उत्पन्न हुआ वह ‘क्षेत्रार्य’। जो उच्चजाति में उत्पन्न हुआ वह ‘जात्यार्य’ जो चारित्र धारण करके रहता है वह’ चारित्रार्य’ है। जिसको सम्यग्दर्शन प्राप्त है वह ‘दर्शनार्य’ कहलाता है। मात्र आत्मतत्त्व की चर्चा करने वाले को दर्शनार्य नहीं कहते, किन्तु जो भीतरी आत्म-तत्त्व की परख करने वाला होता है, जो आत्मतत्त्व का श्रद्धान करता है, उसे दर्शनार्य कहा है। उस आत्मतत्त्व की ओर जिनकी दृष्टि नहीं है वे शेष चार आर्यों में आ जाते हैं। अन्तिम एक कर्मार्य होते हैं- कर्म से आर्य ‘कर्मार्य’।
आचार्य कहते हैं-“हम अनन्तों बार इस आर्यखण्ड में जन्म ले चुके हैं, अतः क्षेत्रार्य तो अनन्तों बार बन चुके, लेकिन शेष आर्यों में गिनती नहीं हुई। पक्षी बनकर यहाँ पर बैठ तो गये, लेकिन बिना कुछ लाभ उठाये हम चल दिये कहीं और अन्यत्र।” वृक्ष के फल कितने मीठे हैं, खा नहीं पाये। कुछ ऐसे पक्षी होते हैं जो स्वादिष्ट भोजन इत्यादि के लिए कभी सोचते ही नहीं। उनके लिए तो सड़ा गला मांस ही चाहिए, इसी के माध्यम से वे अपना जीवन निर्वाह कर लेते हैं। मीठे पदार्थों की ओर देखते तक नहीं। उन्हें सूँघते तक नहीं हैं। संसारी प्राणी ऐसा ही है। मोही होने के नाते विषय-कषायों में ऐसा फँसा है कि धर्म की बातें सुनने समझने में नहीं आती। इसलिए “देशे दिक्षु प्रगे प्रगे” मनुष्य जीवन को छोड़कर अन्यत्र चला जाता है। इस प्रकार अनन्त काल से भटकता आया है। कहाँ से आये हो ? सोचो, विचार करो। अरे! इतना भी ज्ञात नहीं कि कहाँ से आए हो? बोलो-बोलो। कहीं न कहीं से तो आए हो। हाँ, महाराज कहीं न कहीं से तो आए ही हैं पर अभी कहाँ से आए, यह हमें ज्ञात नहीं है। कभी नरकों से आ जाते हैं, कभी तिर्यञ्चों से, कभी मनुष्यों से, तो कभी देवों से आकर मनुष्य बन जाते हैं। मनुष्य बनने का द्वार तो चारों गतियों से खुला है।
विचार करो! जब नरकों में रहते हैं तो वहाँ क्षेत्रगत प्रभाव होगा ही। वहाँ भले ही किसी ने सम्यग्दर्शन की उपासना की हो, लेकिन चूँकि पूर्व में नरकायु का बन्ध कर लिया हो, तो उसे नरक में जाना अनिवार्य हो जाता है। वहाँ जाते ही “परस्परोदीरित दुःखाः ॥ ३/४ त० सू० ॥” परस्पर उदीरित दुःख का अनुभव करना पड़ता है। ऐसा क्यों? क्षेत्र का प्रभाव है। जैसे यहाँ किसी व्यक्ति का अवसान हो जाता है तो उसके यहाँ कुछ व्यक्ति बाहर से बैठने के लिए आ जाते हैं। उस समय उस घर में सदस्यों को रोना ही पड़ता है। यह उस काल का एवं परिस्थिति का प्रभाव रहता है। क्षेत्र, काल उसका ऐसा ही है। इसी प्रकार नारकियों को सम्यग्दर्शन भी हो और अवधिज्ञान भी, तब भी उनको “मैं शुद्ध-बुद्ध निरञ्जन स्वरूप आत्मतत्त्व हूँ” यह विचार नहीं आता। क्षायिक सम्यग्दृष्टि भी क्यों न हो, उसे भी वहाँ पर इस प्रकार का तत्त्व चिन्तन नहीं होता। ऐसा क्यों? यह क्षेत्र का प्रभाव है। इसलिए कभी-कभी आत्मा को कर्म के उदय में ऐसे कार्य न चाहते हुए भी करना पड़ते हैं। क्षेत्र की बात है कि वहाँ हमेशा एक दूसरे से लड़ाई-झगड़े, छेदन-भेदन आदि होते रहते हैं। वहाँ की परम्परा कैसी है? कि वहाँ पर जन्म होते ही जाति-स्मरण हो जाता है जिसके फलस्वरूप सामने जो नारकी खड़े दिखते हैं, वह उनको पहचान लेता है, यह तो माँ का जीव है, लेकिन क्षेत्र के प्रभाव से वह सोचता है कि यह माँ नहीं, यह तो महान् वैर को करने वाली है। जब मैं छोटा था, कोमल था तब यह हाथ में काजल लगाकर मेरी आँखें फोड़ना चाहती थी। लेकिन यह तो मेरा भाग्य था कि आँखें फूट नहीं पाईं। माँ तो काजल लगाकर आँखों को स्वस्थ रखने के लिए यह क्रिया करती थी लेकिन नरक अवस्था में ज्ञान उल्टा ही विचार करता है। कुअवधि ज्ञान से नारकी जीव हमेशा अच्छी बात को भी गलत मानकर चलता है। सागरों पर्यन्त आयु को भी नारकी जीव “हित को अहित और अहित को हित” रूप में मानकर व्यतीत करता रहता है। और अपने आत्मबोध से वंचित रहता है। वहाँ पर अवधिज्ञान भी है, वेदना भी बहुत है लेकिन इस वेदना से आत्मा को कुछ नहीं हो सकता ऐसा ज्ञान होना कठिन है।
अतः संसारी प्राणी को सोचना चाहिए कि कल्याण की बात किसी के द्वारा भी समझ में आ रही हो तो उसे और अधिक गहनता से समझने का प्रयास करना चाहिए। अन्यथा अवसर चूक जाने पर कभी समझना चाहोगे और प्रयास भी करोगे तो भी समझ नहीं पाओगे। फिर उस समय पश्चाताप ही हाथ लगेगा। फलतः आपका भी वही हाल होगा जैसा कि पक्षियों का होता है। वे भव-भव में जाकर आते रहेंगे। पुनः वहीं वहीं जाना आना होता रहेगा। आत्मबोध होने पर यह भ्रमण छूट सकता है। आत्मबोध नहीं होने के कारण ही मोह के वशीभूत हो पर पदार्थों के प्रति आसक्ति का भाव रहता है, सब पर पदार्थों को उन्हें ग्रहण कर सञ्चित करने का प्रयास चलता रहता है जबकि भूधरदास कृत बारह भावना में आप लोग स्वयं प्रतिदिन पढ़ते हो कि-
आप अकेला अवतरै, मेरै अकेला होय।
यूँ कबहूँ इस जीव को, साथी सगा न कोय ॥४॥
कोई वृद्ध मर जाता है, तो क्या कहा जाता है? आज हमारे दादा जी, बाबा जी चले गये। कहाँ चले गये ? अकेले कैसे चले गये? उनको तो आँखों से दिखता नहीं था। ऊपर चढ़ने की हिम्मत भी नहीं थी। कानों से सुनाई नहीं देता था। उनकी तो चलने की भी स्थिति नहीं थी। कहाँ चले गये? कहाँ से चले गये ? रास्ता ज्ञात हो तो बता दो, हमें उनके साथ जाना जरूरी था। कोई बात नहीं, अभी भी रास्ता बता दो रास्ते में मिल जायेंगे तो हम उन्हें चलने में सहयोग कर देंगे। कोई समझाता है कि वे तो चले गये। एक समय में ही जहाँ पहुँचना था, पहुँच गये। तुम वहाँ साथ देने नहीं जा सकोगे। जैसा आयुकर्म बंधता है, उसके उद्यानुसार उनकी गति होती है। आप सभी मिलकर एक इंच भी उन्हें इधर-उधर नहीं कर सकते। एक समय भी आगे-पीछे नहीं कर सकते। जिस व्यक्ति को जितनी दूरी तय करना है, उसमें इंच भर भी कमीवेशी नहीं कर सकते। सात-सात राजू की दूरी भी एक समय में पार की जा सकती है। इस प्रकार संसारी प्राणी शरीर के आश्रित होकर पुनः पुनः अकेला ही जन्म-मरण करता है। तभी तो कहा है-आप अकेला अवतरै, मरै अकेला होय। आते दम भी अकेला जाते/मरने दम भी अकेला रहता है। फिर भी इन दोनों अवस्थाओं के बीच में यदि अकेला हो जाता है तो घबड़ा जाता है। जब जीवन का प्रारम्भ भी अकेले किया, उसका अन्त यानि मरण भी अकेले ही करोगे फिर बीच में यदि कुछ समय को अकेले हो जाते हो तो घबराहट का अनुभव क्यों करते हो ? ऐसा क्यों सोचते हो कि अरे! हमें तो कोई पूछने वाला ही नहीं है। आचार्य कहते हैं कि कितनी बार तो पूँछ लगी मिली है, अब पूँछ लगाने का भाव क्यों करते हो ? आचार्यों ने इस प्रकार अनेक बार समझाया, पर जिसे राग की बहुलता होती है, मोह की बहुलता होती है उसे यह सब कुछ समझ में नहीं आता। इसीलिए उसका कल्याण भी नहीं हो पाता। लेकिन जिसे वैराग्य हो जाता है, उसे आचार्यों की बात एक बार में ही समझ में आ जाती है और वह अपना कल्याण भी कर लेता है।
सुनिये ! एक प्रसंग सुनाता हूँ-चक्रवर्ती की ९६००० रानियाँ होती हैं। जिनमें से ३२००० म्लेच्छखण्ड से आने वाली होती हैं। म्लेच्छखण्ड में रहते हुए अपने वंश में वे कोई धर्म नहीं करती थीं, लेकिन जबसे चक्रवर्ती के वंश में आती हैं तो वे सभी धर्मपारायण हो जाती हैं, क्योंकि चक्रवर्ती के वंश में एक नियम रहता है कि “उनके यहाँ पर कोई भी अधर्मी नहीं हो सकता।” उनके वंश में गूंगा, बहरा, लंगड़ा इत्यादिक नहीं होते। यहाँ तक सुनते हैं कि उनके वंश में कोई अकालमरण को प्राप्त नहीं हो सकता। इसके उपरान्त भी उसकी पटरानी जो पुत्ररत्न से रहित होती है फलतः रूपवान होती है चूँकि रूप का अभिमान, बहुत बड़ा अभिमान, उसमें पाया जाता है। उसके फलस्वरूप वह छठवीं पृथ्वी में जाकर जन्म लेती है। इस प्रसंग को इसलिए सुना रहा हूँ आप लोगों को “दिग्देशेभ्यः खगाः एत्य” वाली बात है। कहाँ-कहाँ से जीव आते हैं? किन-किन व्यक्तियों के साथ रहते हैं? और अन्त में क्या-क्या करके कहाँ-कहाँ चले जाते हैं? मुझे विश्वास नहीं होता कि इतना पुण्यशाली धार्मिक चक्रवर्ती का वंश, परिवार, उसका स्वयं का पुण्यमय जीवन और उसके साथ वर्षों तक रहकर भी वह पटरानी अपने जीवन के अन्तिम क्षणों में कृष्ण लेश्या के साथ कैसे रह जाती है? छठवीं पृथ्वी में कैसे चली जाती है? इस कथानक को आप लोगों को एक बार नहीं, बार-बार पढ़ना चाहिए।
एक मोक्षगामी जीव चक्रवर्ती जिसकी ९६००० रानियाँ, ३२००० मुकुटबद्ध राजाओं के द्वारा सम्मान पाने वाला, अठारह करोड़ घोड़े, चौरासी लाख हाथी, अठारह करोड़ रथ, नौ निधियाँ, चौदह रत्न, पिता जी तीर्थंकर, छोटे भाई कामदेव, स्वयं चक्रवर्ती जिसका धर्ममय व्यक्तित्व उसके साथ रहने वाली वह पटरानी। कैसा उसका हिसाब-किताब रहा होगा ? भावों का कैसा लेखा- जोखा चलता रहता है? चक्रवर्ती के वंश में जहाँ हमेशा शाकाहार, शुद्ध घी, दूध मिलता है। सुबह का भोजन शाम को नहीं खाया जाता और शाम का भोजन सुबह के लिए बच ही नहीं सकता। अतः बासा खाने की बात ही नहीं है, फिर भी ऐसा कौन-सा पाप हो गया होगा, जिससे छटवें नरक की आयु का बन्ध हो गया। मैं तो जब भी यह कथा पढ़ता हूँ, तो सोचता ही रहता हूँ कि यह भावों का कैसा खेल है। उसे स्वरूप का नहीं, मात्र रूप का अभिमान रहता है कि मैं सबसे सुन्दर हूँ। कहीं मेरा रूप कम न हो जाये, ऐसा अपने रूप का इतना अभिमान रहता है कि वह गर्भधारण नहीं करती। संतानहीन रहकर ही चक्रवर्ती को अपने रूप सौन्दर्य द्वारा प्रभावित करने का प्रयास करती रहती है और शेष समस्त रानियों को भी अपने रूप के द्वारा पराजित करने का भाव करती रहती है। अपने को सबसे बड़ी मानती है। वह नहीं समझती कि मेरा वर्तमान तो इतना रूपवान् है लेकिन भविष्य कितना काला/कुरूप। छठवीं पृथ्वी से आगे स्त्रियों का गमन ही नहीं होता। मतलब यह हुआ कि नारी की योग्यतानुसार नरक के अंतिम छोर को उसने छू लिया। कहाँ चक्रवर्ती की पटरानी और कहाँ वे ३२००० रानियाँ म्लेच्छखण्ड की जो आर्यिका बन जाती हैं, वे सद्गति को प्राप्त करती हैं। अगर आर्यिका नहीं बनती तो बताते हैं कि वे सभी रानियाँ अष्टमी, चतुर्दशी, आष्टाह्निकपर्व आदि में शुद्ध वस्त्र पहिनकर पूजन, चिन्तन, मनन में लीन रहती हैं।
सोचो, विचार करो कि भाव अलग हैं और दृश्य अलग है। भीतर का अलग और बाहर का दृश्य अलग है। जिस प्रकार वस्त्र को परिवर्तित करके आप दूसरे वस्त्र पहनते हो उसी प्रकार एक गति से दूसरी गति में जीव जाता है तो अपने शरीर को पुराने वस्त्र की भाँति छोड़ देता है और दूसरे शरीर को नवीन वस्त्र की भाँति ग्रहण कर लेता है। मनुष्य से नारकी के वेश को धारण करना अच्छा नहीं, क्योंकि यह लज्जा की बात है। लेकिन नारकी से मनुष्य वेश को धारण करे तो अच्छा है, क्योंकि इसमें उसकी उन्नति हो गई। वैसे ही निगोद से मनुष्य होना बहुत अच्छा है, विकास है लेकिन मनुष्य से निगोद होना ये अवनति है। आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी जी ने ‘भावपाहुड’ में कहा है कि यदि मुनि हो करके तिल-तुस मात्र भी परिग्रह रखता है तो निगोद का पात्र बनता है। साथ में यह भी कहा कि यदि कोई देव गुरु-शास्त्र की किसी भी कारण वश अवहेलना करता है तो उसका कषाय प्रचुर जीवन होता है। निगोद में कुछ ऐसे जीव रहते हैं कि जो अभी तक निगोद से निकलकर ही नहीं आये। उनके लिए आचार्य नेमिचन्द्र सिद्धान्तचक्रवर्ती स्वामी जी ने गोम्मटसार जीवकाण्ड में लिखा है कि “भावकलंकसुपउरा णिगोदवासं ण मुंचति ॥१९९७ ॥” वे निगोदिया जीव प्रचुरित कषाय वाले होते हैं इसलिए निगोदवास को नहीं छोड़ पाते। सभी प्रकार की कषायें उनमें पाई जाती हैं। वे वहाँ पर अन्धत्व का अनुभव करते हैं, वहाँ पर ज्ञान भी नहीं है। ज्ञान की अपेक्षा वे जघन्यता का अनुभव करते हैं। एकेन्द्रिय होते हैं उसमें भी यदि अपर्याप्तक हों तो एक इन्द्रिय सम्बन्धी पर्याप्ति को भी पूर्ण नहीं कर पाते कि मरण हो जाता है, श्वासोच्छ्वास पर्याप्ति भी पूर्ण नहीं कर पाते अर्थात् श्वास तक नहीं ले पाते कि मरण हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यही है कि देखो! मनुष्य से निगोद में चले जाना कितना अवनत जीवन हो गया और निगोद से मनुष्य बन जाये तो कितना उन्नत जीवन हो गया। यह सब भीतरी भावों का दृश्य अपने सामने फलीभूत होकर आता है। अब इस ओर दृष्टि पात् करिये और दुर्लभता से पाने योग्य पर्याय मिली है तो इसका अभिमान मत करिये। आचार्य समन्तभद्र स्वामीजी, ने ‘रत्नकरण्डक श्रावकाचार’ में आठ मदों के व्याख्यान में एक ‘रूप’ मद को भी व्याख्यायित किया, कोई कुल का मद करता है, कोई ज्ञान का मद करता है, कोई जाति का मद करता है, कोई पूजा, तप आदि का मद करता है। अरे! जो ज्ञान मोक्षमार्ग में कर्मों से बचने के लिए प्रकाश का कार्य करता है ज्यादा कुछ नहीं करता उस ज्ञान का क्या अभिमान कर रहे हो, इसका अभिमान करोगे तो सम्यग्दर्शन रूपी गुण कलंकित हो जायेगा, जीवन में अंधेरा छा जायेगा। छहढाला में आप पढ़ते हो, क्या लिखा है?
मद धारै तो यही दोष वसु, समकित को मल ठानै। ३/१४।
यानि मद धारण करने से समकित मलिन हो जाता है। समकित को मल ठानै अर्थात् समकित कोमल हो जाता है ऐसा अर्थ नहीं करना। वज्र के समान सम्यग्दर्शन भी मद के द्वारा भिद जाता है, कलंकित हो जाता है। नष्ट-भ्रष्ट हो जाता है इसलिए मदों को नहीं करना चाहिए।
जिस प्रकार आप लोग घर में अपने वस्त्रों की, बर्तनों की, आभूषणों की नूतनता व स्वच्छता बनाए रखने के लिए उन्हें धूल आदि से बचाये रखते हैं और लगी हुई धूल को अच्छे ढंग से धोते रहते हैं। मालिस, पॉलिस करते रहते हैं। उसी प्रकार सम्यग्दर्शन मटमैला न हो जाये इसलिए कषायों से, मदों से हमेशा बचना चाहिए। पर्याय बुद्धि बहुत खतरनाक है उससे भी बचना चाहिए। ‘दर्शन विशुद्धि’ भावना के द्वारा सम्यग्दर्शन को निर्मल बनाने का प्रयास करना चाहिए।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 9
इष्टोपदेश गाथा 9 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ (नगे नगे) वृक्ष-वृक्ष पर (दिग्देशेभ्यः) दिशाओं और देशों से (एत्य) आकर (खगाः) पक्षी संध्या के समय (संवसन्ति) ठहर जाते हैं, तथा (प्रगे प्रगे) प्रातः काल (स्वस्वकार्यवशात्) अपने- अपने कार्य के वश से (देशे दिक्षु) भिन्न-भिन्न देश और दिशाओं में (यान्ति) (उड़कर) चले जाते हैं।
भावार्थ – संध्याकाल के समय जैसे भिन्न-भिन्न देश और दिशाओं से आकर पक्षी वृक्ष पर वास करते हैं, रात्रि में निवास करते हैं और प्रातःकाल होते ही निज निज कार्य की परतंत्रता से देश और दिशाओं में चले जाते हैं। जिस देश जिस दिशा से आये हैं उसी दिशा में जाने का नियम नहीं है। किसी भी दिशा और देश में इच्छानुसार चले जाते हैं। यह आचार्य देव ने दृष्टान्त देकर दृष्टान्त गर्भित वस्तु का स्वरूप अवगत कराया है कि हे मूढात्मा पक्षियों के समान ये पुत्र, मित्र, शत्रु आदि चारों गतियों से आकर एक कुलरूपी वृक्ष पर अपनी आयु पर्यन्त रहते हैं और आयु के समाप्त हो जाने पर स्वकीय कर्मानुसार चारों गतियों में चले जाते हैं। अतः तेरी हित बुद्धि में ग्रहण किए हुए ये पुत्र पौत्रादि अन्य स्वभाव वाले हैं, यदि तेरे होते, तो तुझको छोड़कर तेरी आज्ञा बिना, अवस्थान्तर (मरण) को प्राप्त क्यों होते। अतः हे आत्मन् ! इनमें जो तेरी अपनत्व बुद्धि है, उसको छोड़ दे। यथावत् वस्तु के स्वरूप को समझ ।
उत्थानिका – आचार्य आगे के श्लोक में शत्रुओं के प्रति होने वाले भावों को ये हमारे शत्रु हैं, अहितकर हैं आदि को अज्ञानपूर्ण बतलाते हुए दृष्टांत द्वारा समझाते हैं, साथ ही ऐसे भावों को दूर करने के लिए प्रेरणा भी देते हैं – गाथा 10
स्वाध्याय गाथा सं 8 & 9
स्वाध्याय गाथा सं 9 & 10
इष्टोपदेश स्वाध्याय
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English Translation of Ishtopadesh Gatha 9
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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