भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
श्लोक 242 से 251 महाबल की समाधि और मृत्यु
तप से महाबल शुद्ध और प्रकाशमान हुआ। उसने परीषहों को जीता, पंचपरमेष्ठियों का ध्यान किया। 22 दिन सल्लेखना कर, अंतिम समय में नमस्कार मंत्र जपते हुए शुद्ध आत्मभावना के साथ स्वयंबुद्ध के समक्ष प्राण छोड़े। स्वयंबुद्ध ने मंत्रशक्ति से उसका आत्मबल बनाए रखा।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 242 to 251
श्लोक ( Shlok ) 242
तपस्तनूनपातापाद् दिदीपेऽधिकमेव सः । कनकाइम इवाध्यातः परां शुद्धिं समुद्रहन् ॥२४२॥
जिस प्रकार अग्नि में तपाया हुआ सुवर्ण पाषाण अत्यंत शुद्धि को धारण करता हुआ अधिक प्रकाशमान होने लगता है उसी प्रकार वह महाबल भी तपरूपी अग्नि से तप्त हो अत्यंत शुद्धि को धारण करता हुआ अधिक प्रकाशमान होने लगता था ।।242।।
Just as gold, when heated in fire, becomes exceedingly pure and begins to shine more brightly, in the same way, that great being, heated by the fire of asceticism, became exceedingly pure and began to shine more brightly. ( 242)
श्लोक ( Shlok ) 243
असह्यंतनुसंतापं सहमानस्य हेलया । ययुः परीषहामङ्गमभङ्गस्यास्य “संगरे ॥२४३॥
राजा असह्य शरीर-संताप को लीलामात्र में ही सहन कर लेता था तथा कभी किसी विपत्ति से पराजित नहीं होता था इसलिए उसके साथ युद्ध करते समय परीषह ही पराजय को प्राप्त हुए थे, परीषह उसे अपने कर्त्तव्य मार्ग से क्षत नहीं कर सके थे ।।243।।
The king could endure unbearable physical suffering with ease and was never defeated by any adversity. Therefore, while fighting against him, his adversaries (Parishah) were the ones who faced defeat, and they could not hinder him from his righteous path. ( 243)
श्लोक ( Shlok ) 244
त्वगस्थीभूतदेहोऽपि यद् व्यजेष्ट परीषहान् । स्वसमाधिबलाद् व्यक्तं स तदासीन्महाबलः ॥२४४ ।।
यद्यपि उसके शरीर में मात्र चमड़ा और हड्डी ही शेष रह गयी थी तथापि उसने अपनी समाधि के बल से अनेक परीषहों को जीत लिया था इसलिए उस समय वह यथार्थ में महाबल सिंह हुआ था ।।244।।
Although only skin and bones remained in his body, through the power of his meditation, he had conquered many adversities. Therefore, at that moment, he truly became a great and powerful lion. (244)
श्लोक ( Shlok ) 245
‘मूर्धिन लोकोतमान् सिद्धान् स्थापयन् हृदयेऽहंतः । शिरः कवचमस्त्रं च स चक्रे साधुभिस्त्रिभिः ॥ २४५॥
उसने अपने मस्तक पर लोकोत्तम परमेष्ठी को तथा हृदय में अरहंत परमेष्ठी को विराजमान किया था और आचार्य, उपाध्याय तथा साधु इन तीन परमेष्ठियों के ध्यानरूपी टोप-कवच और अस्त्र धारण किये थे ।।245।।
He had placed the supreme and highest being (Lokottama Parmeshthi) on his head and the Arhat Parmeshthi in his heart. He also wore the meditation-like crown, armor, and weapons, which symbolized the guidance of the three supreme beings: the Acharya, Upadhyaya, and Sadhu. (245)
श्लोक ( Shlok ) 246
चक्षुषी परमात्मानमद्राष्टामस्य योगतः । ‘अश्रोष्टां परमं मन्त्रं श्रोत्रे जिह्वा तमापठत् ॥२४६॥
। ध्यान के द्वारा उसके दोनों नेत्र मात्र परमात्मा को ही देखते थे, कान परम मंत्र (णमोकार मंत्र) को ही सुनते थे और जिह्वा उसी का पाठ करती थी ।।246।।
Through meditation, his eyes saw only the supreme soul, his ears heard only the sacred mantra (Namokar Mantra), and his tongue continuously recited it. ( 246)
श्लोक ( Shlok ) 247
मनोगर्मगृहेऽईन्सं विभायासौ निरञ्जनम् । प्रदीपमिव निर्भूतध्वान्तोऽमद् व्यानतेजसा ॥२४७॥
वह राजा महाबल अपने मनरूपी गर्भगृह में निर्धूम दीपक के समान कर्ममल कलंक से रहित अर्हंत परमेष्ठी को विराजमान कर ध्यानरूपी तेज के द्वारा मोह अथवा अज्ञानरूपी अंधकार से रहित हो गया था ।।247।।
The great and powerful king, in the womb-like chamber of his mind, had placed the Arhat Parmeshthi, free from the stain of karmic impurities, like a smoke-free lamp. Through the radiance of his meditation, he became free from the darkness of attachment and ignorance. ( 247)
श्लोक ( Shlok ) 248 – 250
द्वाविंशतिदिनान्येष कृतसल्लेखनाविधिः । जीविताम्ते समाधाय मनः स्वं परमेष्ठिषु ॥२४८।।
नमस्कारपदान्यन्तर्जल्पेन “निभृतं जपन् । ललाटपटविन्यस्तहस्तपङ्कजकुडमलः ॥२४९॥
कोशादसेरिवाम्यस्वं देहावज्जीवस्य भावयन् । भावितात्मा सुखं प्राणानौजतत् सन्मन्त्रिसाक्षिकम् ।।२५०॥
इस प्रकार महाराज महाबल निरंतर बाईस दिन तक सल्लेखना की विधि करते रहे । जब आयु का अंतिम समय आया तब उन्होंने अपना मन विशेष रूप से पंचपरमेष्ठियों में लगाया । उसने हस्त कमल जोड़कर ललाट पर स्थापित किये और मन-ही-मन निश्चल रूप से नमस्कार मंत्र का जाप करते हुए, म्यान से तलवार के समान शरीर से जीव को पृथक् चिंतवन करते और अपने शुद्ध आत्मस्वरूप की भावना करते हुए, स्वयंबुद्ध मंत्रि के समक्ष सुखपूर्वक प्राण छोड़े ।।248-250।।
Thus, King Mahabal continued the practice of Sallekhana for a full twenty-two days. When his final moment approached, he focused his mind specifically on the five supreme beings (Panch Parmeshthi). He joined his palms in reverence and placed them on his forehead. While mentally chanting the salutary mantra in stillness, he detached his soul from the body like drawing a sword from its sheath. With the awareness of his pure, self-realized nature, he peacefully departed in the presence of Swayambudha Minister. (Verses 248-250)
श्लोक ( Shlok ) 251
मन्त्रशक्त्या यथा पूर्व स्वयंमुद्धो न्यधाद् बलम् । तथापि मन्त्रशवस्यैव बळं न्यास्थन् महाबलेः॥ २५१॥
स्वयंबुद्ध मंत्री जिस प्रकार पहले अपनी मंत्रशक्ति (विचारशक्ति) के द्वारा महाबल में बल (शक्ति अथवा सेना) सन्निहित करता रहता था, उसी प्रकार उस समय भी वह, मंत्रशक्ति (पंचनमस्कार मंत्र के जाप के प्रभाव) के द्वारा उसमें आत्मबल सन्निहित करता रहा, उसका धैर्य नष्ट नहीं होने दिया ।।251।।
Just as Swayambudha minister previously infused Mahabal with strength (or army) through his mental power (contemplative energy), in the same way, at that moment, he continued to infuse him with inner strength through the power of the mantra (the effect of chanting the Panch Namaskar Mantra), ensuring that his patience remained unshaken. ( 251)
श्लोक 252 से 261
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
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