भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181
श्लोक 182 से 191 वज्रदंत और वज्रबाहु का संवाद
वज्रदंत ने वज्रबाहु से कहा कि वे जो चाहें ले लें। वज्रबाहु ने कहा कि उनके पास सब है; वज्रदंत की प्रीति ही पर्याप्त है। धन नष्ट होता है, पर स्नेह अमर है। वे परोपकारी पुरुषों की तरह धन धारण करते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
यथासुखं च संतोषात् स्थितेष्वेवं सनाभिषु । ततश्चक्रधरो वाचमित्यवोचत् स्वसुः पतिम् ।।१८२॥
इस प्रकार जब सब बंधु संतोषपूर्वक सुख से बैठे हुए थे तब चक्रवर्ती ने अपने बहनोई राजा वज्रबाहु से नीचे लिखे हुए वचन कहे ।।182।।
Thus, when all the relatives were sitting contentedly and happily, the emperor spoke the following words to his brother-in-law, King Vajrabahu. ( 182)
श्लोक ( Shlok ) 183
यत् किंचिद् रुचितं तुभ्यं वस्तुजालं “ममालये । तद् गृहाण यदि प्रीतिर्मयि तेऽस्त्यनियन्त्रणा ॥१८३॥
यदि आपकी मुझ पर असाधारण प्रीति है तो मेरे घर में जो कुछ वस्तु आपको अच्छी लगती हो वही ले लीजिए ।।183।।
“If you have exceptional affection for me, then take whatever you find pleasing in my home.” ( 183)
श्लोक ( Shlok ) 184
प्रीतेरद्य परां कोटिमधिरोहति मे मनः । त्व ं सतुक्कः सदारश्च यन्ममाभ्यागतो गृहम् ।।१८४।।
आज आप पुत्र और स्त्रीसहित मेरे घर पधारे हैं इसलिए मेरा मन प्रीति की अंतिम अवधि को प्राप्त हो रहा है ।।184।।
Today, you have come to my home with your son and wife, and because of this, my heart is reaching the ultimate stage of affection.” ( 184)
श्लोक ( Shlok ) 185
त्वमिष्टबन्धुरायातो गृहं मेऽद्य सदारकः । संविभागोचितः कोऽन्यः प्रस्तावः स्यान्ममेदृशः ॥१८५।।
आप मेरे इष्ट बंधु हैं और आज पुत्रसहित मेरे घर आये हुए हैं इसलिए देने के योग्य इससे बढ़कर और ऐसा कौन-सा अवसर मुझे प्राप्त हो सकता है ।।185।।
You are my dear relative, and today you have come to my home with your son. Therefore, what greater opportunity could there be for me to offer than this?” ( 185)
श्लोक ( Shlok ) 186
तदत्रावसरे वस्तु तन्न में यन्न दीयते । प्रणयिन् प्रणयस्यास्य मा कृथा मङ्गमर्थिनः ।।१८६।।
इसलिए इस अवसर पर ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो मैं आपके लिए न दे सकूँ । हे प्रणयिन्, मुझ प्रार्थी के इस प्रेम को भंग मत कीजिए ।।186।।
“Therefore, on this occasion, there is nothing that I cannot offer you. O beloved, do not break the love of this humble devotee.” ( 186)
श्लोक ( Shlok ) 187
इत्युक्तः प्रेमनिध्नेन चक्रिणा प्रत्युवाच सः । त्वत्प्रसादान्ममास्त्येव सर्वं किं प्रार्थ्यमद्य मे ॥१८७।।
इस प्रकार प्रेम के वशीभूत चक्रवर्ती के वचन सुनकर राजा वज्रबाहु ने इस प्रकार उत्तर दिया । हे चक्रिन्, आपके प्रसाद से मेरे यहाँ सब कुछ है, आज मैं आप से किस वस्तु की प्रार्थना करूँ ? ।।187।।
Thus, being moved by love, King Vajrabahu responded to the emperor’s words: “O emperor, by your grace, I have everything here. Today, what should I ask of you?” ( 187)
श्लोक ( Shlok ) 188
“साम्नानेनार्पितः स्वेन प्रयुक्तेनेति सादरम् । प्रणयस्य परां भुमिमहमारं पितस्त्वया ॥ १८८।।
आज आपने सम्मानपूर्वक जो मेरे साथ स्वयं साम का प्रयोग किया है―भेंट आदि करके स्नेह प्रकट किया है सो मानो आपने मुझे स्नेह की सबसे ऊँची भूमि पर ही चढ़ा दिया है ।।188।।
“Today, the way you have personally shared a meal with me, offering gifts and expressing affection, it is as though you have elevated me to the highest realm of love.” ( 188)
श्लोक ( Shlok ) 189
कियन्मात्रमिदं देव स्वापतेयं परिक्षयि । त्वयाढ्यङ्करणी दृष्टिरलमेषार्पिता मयि ॥१८९॥
हे देव, नष्ट हो जाने वाला यह धन कितनी-सी वस्तु है ? यह आपने संपन्न बनाने वाली अपनी दृष्टि मुझ पर अर्पित कर दी है मेरे लिए यही बहुत है ।।189।।
“O Lord, how insignificant is this wealth that is bound to perish? You have bestowed upon me your enriching vision, and that is more than enough for me.” ( 189)
श्लोक ( Shlok ) 190
अहमद्य कृती धन्यो जीवितं श्लाध्यमद्य मे । यद् वीक्षितोऽस्मि देवेन स्नेहनिर्भरया दृशा ॥१९०॥
हे देव, आज आपने मुझे स्नेह से भरी हुई दृष्टि से देखा है इसलिए मैं आज कृतकृत्य हुआ हूँ, धन्य हुआ हूँ और मेरा जीवन भी आज सफल हुआ है ।।190।।
“O Lord, today you have looked upon me with a gaze filled with affection. Therefore, I am fulfilled today, blessed, and my life has become successful.” ( 190)
श्लोक ( Shlok ) 191
परोपकृतये बिभ्रत्यर्थवत्तां भवद्विधाः । लोके प्रसिद्धसाधुत्वाः शब्दा इव कृतागमाः ॥१९१॥
हे देव, जिस प्रकार लोक में शास्त्रों की रचना करने वाले तथा प्रसिद्ध धातुओं से बने हुए जीव अजीव आदि शब्द परोपकार करने के लिए ही अर्थों को धारण करते हैं, उसी प्रकार आप-जैसे उत्तम पुरुष भी परोपकार करने के लिए ही अर्थों धनधान्यादि विभूतियों) को धारण करते हैं ।।191।।
“O Lord, just as beings, both living and non-living, who are created by the scriptures and made of precious metals, hold meanings for the sake of benefiting others, similarly, noble individuals like you hold wealth, grains, and other riches only for the purpose of benefiting others.” ( 191)
श्लोक 192 से 201
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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