बुखार उतारने का मंत्र
ॐ ह्रीं क्ष्वीं श्रीं अहं ॐ णमो अरिहंताणं णमो जिणाणं ह्रां ह्रीं ह्रूं ह्रौं ह्रंः अप्रति चक्रे फट विचक्राय असि आउसा झ्रौं झ्रौं स्वाहा
मंत्र साधक के लक्षण
अथातः संप्रवक्ष्यामि मंत्रि लक्षणमुत्तमं। यो मंत्रादि विधौ प्रोक्तः सजातीय स्त्रिवर्णभूत ॥१॥
अब मंत्री के लक्षण जो मंत्रादि के विधि में कहे गये हैं अब कह रहे हैं। मंत्री अच्छी जाति वाला और तीन वर्णो को धारण करने वाला हो।
रत्नत्रय धनः शूरः कुशलो धार्मिकः प्रभुः। प्रबुद्धारिवल शास्त्रार्थः परार्थ निरतः कती ॥२॥
वह सम्यकदर्शन-सम्यकज्ञान और सम्यकचारित्र इन तीन रत्नत्रयी रूपी धनवाला, शूरवीर, धार्मिक, प्रभु, सब शास्त्रों के अर्थ को जानने वालों दूसरों का उपकार करने वाला और कृतज्ञ हो।
शांतः कृपाल निषिः प्रसन्नः शिष्य वत्सलः षट्कर्म वित्साधुः सिद्भविद्यो महायशाः ॥३॥
वह अत्यंत शांत कृपालु,द्वेषरहित, कुशल शिष्यों से प्रेम करने वाला, छहों कर्मों के कृत्य को जानने याला,भली प्रकार विद्या सिद्ध किये हुआ और बढ़ा यशस्वी हो।
सत्ययादी जितासूयो निराशो निरहंकृतिः लोकज्ञः सर्वशास्त्रज्ञो तत्वज्ञो भावसंयुतः ॥४॥
वह सत्यवादी , ईर्ष्या रहित, अहसान करने याला, अतिमान रहित, लोक को पहचानने वाला, सब शास्त्रों के तत्त्वों को जानने याला और भायुक हो।
भवेतमंत्रोपदेशेषु गुरुमंत्रं फलाथिनां। इहोपदिश्यमानानां मंत्राणमुपदेशने ॥५॥
यह यहाँ आगे उपदेश किये जाने वाला मंत्रों के मंत्र के फल की इच्छा करने वालों को उपदेश देने से गुरू का काम कर सकता है।
मंत्र विज्ञान
अकारादि हकारंतावणमंत्राः प्रकीर्तिताः सर्वज्ञैरसहाया वा संयुक्ता वा परस्परं ॥ ३ ॥
अकार से हकार तक के स्वतंत्र असहाय अथवा परस्पर मिले हुवे वर्ण (अक्षर) मंत्र कहलाते हैं ।
स्वरोष्माणो द्विजाः श्वेता अंबुमंडल संस्थिताः अंतस्था भूभुजो रक्ता स्तेजोमंडलसंस्थिता ॥ ४ ॥
स्वर अकारादि १६ स्वर और उष्म ( श ष स ह ) द्विज, ब्राह्मण और श्वेत (सफेद) कहलाते हैं । यह अंबु (जल) मंडल में स्थित हैं और अंतस्थ ( य र ल व ) भूभुज (क्षत्रिय) और रक्त कहलाते हैं यह अग्नि मंडल में स्थित है।
अवर्ग शवर्गो कवर्ग पवर्गों शुप्तवैश्यान्वयो पीतौ पृथ्वीमंडल भागिनी दुतूकृष्णत्विषौ शुद्रौवायुमंडल संस्थितौ ॥ ५ ॥
अवर्ग शवर्ग कवर्ग प्रवर्ग शुप्त वैश्य पीतवर्ण के हैं। और पृथ्वी मंडल में स्थित हैं टवर्ग और तवर्ग कृष्ण कांति वाले और शूद्र वंश वाले तथा वायु मंडल में स्थित हैं । अ आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ लृ लृ ए ऐ ओ औ अं अः, श ष स ह क ख ग घ ङ, प फ ब भ म शुप्त वैश्य वंश वाले पीले रंग के हैं। और पृथ्वी मंडल में रहते हैं । ट ठ ड ढ ण त थ द ध न कृष्ण रंग के शुद्र और वायुमंडल में रहते हैं ।
प्रतिपन्त धमी रविशनिवारे द्विज सिद्धिरथ चतुथ्यांच च द्वादश्यैकाद्श्योः सितवारे भूपसिद्धिः स्यात् ॥ ६ ॥
वर्ग (च छ ज झ ञ) और पवर्ग ( प फ ब भ म ) वैश्य वंश वाले और पीत कहलाते हैं। वह पृथ्वीमंडल में स्थित हैं टवर्ग ( ट ठ ड ढ ण) और तवर्ग ( त थ द ध न ) शुद्ध और कृष्ण कांति वाले होते हैं। और वायुमंडल में स्थित द्विज मंत्र की सिद्धि प्रतिपदा नवमी रविवार और शनिवार को होती है। क्षत्रिय मंत्र की सिद्ध एकादशी द्वादशी चतुर्थी और सोमवार को होती है।
Taken from Vidyanushasan भट्टारक श्री मतिसागर विरचित विद्यानुशासन


