भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
मैक्षन्त केचिदागस्य सावधानं महाधियः । केचित् किमेतदित्युच्चैः जजस्तुवीय पट्टकम् ।।१९२॥
विशाल बुद्धि के धारक कितने ही पुरुष आकर बड़ी सावधानी से उस चित्रपट को देखने लगे और कितने ही उसे देखकर यह क्या है इस प्रकार जोर से बोलने लगे ।।192।।
“Possessors of great intellect, many men came and carefully observed the painting, while many others, upon seeing it, exclaimed loudly, ‘What is this?’ ( 192)”
श्लोक ( Shlok ) 193
तेषां समुचितैर्वाक्यैमंदती पण्डितोत्तरम् । तत्रास्ते स्म स्मितोचोसैः किरन्ती पण्डितावितान् ॥१९३॥
वह पंडिता समुचित वाक्यों से उन सबका उत्तर देती हुई और पंडिताभास-मूर्ख लोगों पर मंद हास्य का प्रकाश डालती हुई गंभीर भाव से वहाँ बैठी थी ।।193।।
“That learned woman, replying to all with appropriate statements, and casting a subtle smile upon the fools pretending to be scholars, sat there with a composed and dignified demeanor. ( 193)”
श्लोक ( Shlok ) 194
अय दिग्विजयाच्चक्री म्यकृतत् कृतदिग्जयः । प्रतीकृतनिःशेषमरविद्याधरामरः ॥१९४
अनंतर जिसने समस्त दिशाओं को जीत लिया है और जिसे समस्त मनुष्य विद्याधर और देव नमस्कार करते हैं ऐसा वज्रदंत चक्रवर्ती दिग्विजय से वापस लौटा ।।194।।
“Afterward, Vajradanta, the Chakravarti, who has conquered all directions and is saluted by all humans, Vidyadharas, and gods, returned from his conquest of the directions. ( 194)”
श्लोक ( Shlok ) 195
ततोऽभिषेकं द्वात्रिंशत्सहस्रधरणीश्वरैः । चक्रवर्ती परं प्रायत् पुण्यैः किं नु न लभ्यते १९५॥
उस समय चक्रवर्ती ने बत्तीस हजार राजाओं द्वारा किये हुए राज्याभिषेक महोत्सव को प्राप्त किया था सो ठीक ही है, पुण्य से क्या-क्या नहीं प्राप्त होता ? ।।195।।
“At that time, Chakravarti (the universal emperor) had attained the grand coronation festival conducted by thirty-two thousand kings, and rightly so—what cannot be attained through virtue and good deeds?”( 195)
श्लोक ( Shlok ) 196
स च ते च समाकाराः कराकविमादिभिः । तथापि तैः समभ्यच्यः सोऽभूत् पुण्यानुमावतः ॥१९६॥
यद्यपि वह चक्रवर्ती और वे बत्तीस हजार राजा हाथ, पाँव, मुख आदि अवयवों से समान आकार के धारक थे तथापि वह चक्रवर्ती अपने पुण्य के माहात्म्य से उन सबके द्वारा पूज्य हुआ था ।।196।।
“Although the Chakravarti (universal emperor) and the thirty-two thousand kings were alike in the form of their limbs, such as hands, feet, and face, yet the Chakravarti, through the greatness of his virtue, was revered by all of them.”( 196)
श्लोक ( Shlok ) 197
अनीदृशवपुश्चन्द्रसौम्यास्यः कमलेक्षणः । पुण्येन स बभौ सर्वानतिशय्य नरामरान् ॥१९७॥
इसका शरीर अनुपम था, मुख चंद्रमा के समान सौम्य था, और नेत्र कमल के समान सुंदर थे । पुण्य के उदय से वह समस्त मनुष्य और देवों से बढ़कर शोभायमान हो रहा था ।।197।।
“His body was unparalleled, his face serene like the moon, and his eyes were as beautiful as lotus petals. Due to the rise of his virtues, he shone more brilliantly than all humans and gods.”( 197)
श्लोक ( Shlok ) 198
शङ्खचक्राङ्कुशादीनि “लक्षणाम्यस्थ पादयोः । बभुरालिखितानीव छदम्या लक्ष्माणि चक्रिणः ॥१९८
इसके दोनों पाँवों में जो शंख, चक्र, अंकुश आदि के चिह्न शोभायमान थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी ने ही चक्रवर्ती के ये सब लक्षण लिखे हैं ।।198।।
“The marks of the conch, wheel, goad, and others that adorned his feet appeared as if Goddess Lakshmi herself had inscribed these auspicious signs on the Chakravarti.”(198)
श्लोक ( Shlok ) 199
अमोधशासने तस्मिन् सुवं शाखति भूभुजि । न दण्ापक्षः कोऽप्यासीत् प्रजानामकृतागसाम् ॥ १९९॥
अव्यर्थ आज्ञा के धारक महाराज वज्रदंत जब पृथ्वी का शासन करते थे तब कोई भी प्रजा अपराध नहीं करती थी इसलिए कोई भी पुरुष दंड का भागी नहीं होता था ।।199।।
“When the great king Vajradanta, who possessed infallible authority, ruled the earth, no subject committed any offense; therefore, no one became deserving of punishment.”(199)
श्लोक ( Shlok ) 200
स विभ्रद् वक्षसा लक्ष्मों वक्त्राब्जेन च वाग्वधूम्। प्रणाम्य्यामिव कोकान्तं प्राहिणोस् कोतिमेकिकाम् ॥२००।
वह चक्रवर्ती वक्षःस्थल पर लक्ष्मी को और मुखकमल में सरस्वती को धारण करता था परंतु अत्यंत प्रिय कीर्ति को धारण करने के लिए उसके पास कोई स्थान ही नहीं रहा इसलिए उसने अकेली कीर्ति को लोक के अंत तक पहुँचा दिया था । अर्थात् लक्ष्मी और सरस्वती तो उसके समीप रहती थीं और कीर्ति समस्त लोक में फैली हुई थी ।।200।।
“The Chakravarti bore Goddess Lakshmi on his chest and Goddess Saraswati in his lotus-like face. However, there was no place left to bear his dearest glory. Thus, he sent glory alone to the ends of the world. In other words, while Lakshmi and Saraswati stayed close to him, his fame spread across the entire universe.”( 200)
श्लोक ( Shlok ) 201
सुधासूतिरिषोदंशुरंशुमानित्र चोकरः । स कान्ति दीप्तिमन्युच्चैः अधाप्यनुतोदयः ॥२०१॥
वह राजा चंद्रमा के समान कांतिमान और सूर्य के समान उत्कर (तेजस्वी अथवा उत्कृष्ट टैक्स वसूल करने वाला) था । आश्चर्यकारी उदय को धारण करने वाला वह राजा कांति और तेज दोनों को उत्कृष्ट रूप से धारण करता था ।।201।।
“That king was as radiant as the moon and as powerful as the sun. Bearing a remarkable rise in fortune, he embodied both brilliance and splendor in their highest forms.”( 201)
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
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