श्रीअमृतचन्द्राचार्य विरचित पुरुषार्थ सिद्धयुपाय – गाथा 4 मङ्गला संस्कृल टीका एवं दोहानुवाद * मुनि श्री प्रणम्यसागर जी
मुख्योपचार विवरण निरस्तदुस्तरविनेय दुर्बोधा: ।
व्यवहार निश्चयज्ञा: प्रवर्तयन्ते जगति तीर्थम् ॥4॥
उत्थानिका – इस संसार में धर्म तीर्थ के प्रवर्तन में कौन कुशल होते हैं, ऐसी जिज्ञासा होने पर आचार्य भगवान् कहते हैं –
अन्वय– मुख्योपचारविवरणनिरस्तदुस्तरविनेयदुर्बोधाः व्यवहारनिश्चयज्ञाः जगति तीर्थं प्रवर्तयन्ते । अन्वयार्थ :- (मुख्योपचारविवरणनिरस्तदुस्तरविनेयदुर्बोधाः) मुख्य और उपचार कथन से शिष्यों के दुर्निवार अज्ञान को नष्ट करने वाले तथा (व्यवहार निश्चयज्ञाः) व्यवहार और निश्चय नय के जानने वाले आचार्य (जगति) जगत में (तीर्थम्) धर्मतीर्थ का (प्रवर्तयन्ते) प्रवर्तन करते हैं।
किस विध किस ध्येय से, कथन मुख्य हो गौण। उनसे चलता तीर्थ ये, वे ही जग में प्रौढ़ ॥४॥
टीकार्थ – अनेकान्तवाद में दो प्रकार की पद्धति है। प्रथम पद्धति मुख्य अर्थात् निश्चयनयात्मक और द्वितीय पद्धति उपचार अर्थात् व्यवहारनयात्मक कही गई है। उन दोनों की सूक्ष्म और स्थूल प्ररूपणा से दूर कर दिया है शिष्यों के अतिगहन अज्ञान अंधकार को जिन्होंने ऐसे व्यवहार और निश्चय नय के जानने वाले आचार्य होते हैं। व्यवहार नय परापेक्षी अर्थात् भेदात्मक होता है। पर का अवलम्बन करके जिसकी प्रवृत्ति होती है उसे व्यवहार नय कहते हैं। निश्चय नय निरापेक्षी अर्थात् अभेदात्मक होता है। स्व का अवलम्बन लेकर जिसकी प्रवृत्ति होती है उसे निश्चय नय कहते हैं। इस कथन से दोनों नयों का महत्व सूचित किया है। जो पुरुष मात्र व्यवहार नय का ही हार की तरह आदर करते हैं तथा ज्ञान स्वरूपी आत्मा के प्रति जिनका कोई उत्साह नहीं है, मात्र क्रियाकाण्ड में ही तत्पर रहते हैं, वे तत्त्वज्ञान से पराङ्मुख हैं तथा जो निश्चय नय के ज्ञान से ही मोक्ष को मानते हुए व्रत तपश्चरण आदि की क्रिया को जड़ की क्रिया मानते हैं और आत्मा को सदा बन्धरहित वीतराग, कर्मकलङ्क से रहित विशुद्ध ज्ञानातिशय से युक्त मानते हुए मुनियों की निन्दा करते हैं वे पुरुष अनगढ़ पत्थर की तरह असंयम का आचरण करते हुए धर्मतीर्थ को नष्ट करते हैं। इसलिए स्व-पर के हितैषी पुरुषों को उन दोनों नयों को अच्छी तरह जानना चाहिए। पश्चात् पक्षाग्रह से रहित होकर एक दूसरे को उलाहना देने का त्याग करना चाहिए। बहुसम्प्रदायों से भरे हुए इस संसार समुद्र से निश्चय और व्यवहार के ज्ञाता पुरुष ही पार होते हैं और उन्हीं के द्वारा धर्मतीर्थ की प्रभावना होती है। कहा है ” यदि जिनेन्द्र भगवान के मत में प्रवृत्ति करना चाहते हो तो निश्चय नय और व्यवहार नय का त्याग मत करो। यदि व्यवहार नय का त्याग करते हो तो तीर्थ का उच्छेद हो जायेगा और निश्चय नय का त्याग करते हो तो वस्तु स्वरूप का उच्छेद हो जायेगा”॥४॥
समाधान – उपदेश तो सब जीवों का उपकार करने के लिए होता है तो भी हिताहित का विचार करने में कुशल विद्वानों को ही इसका लाभ होता है। क्योंकि उपदेशक तो निमित्त मात्र होते हैं। दूसरी बात यह भी है कि इस ग्रन्थ में प्रत्येक व्रत का स्वरूप और नयों का परिज्ञान आदि युक्ति के द्वारा कहा गया है और युक्ति बुद्धिमानों के लिए उपयोगी हुआ करती है। इसलिए कहा भी है कि “गुरु आदि के उपदेश से अज्ञानी ज्ञान दशा को प्राप्त नहीं होता और ज्ञानी अज्ञानता को प्राप्त नहीं होता। अन्य (अध्यापक, गुरु आदि) तो ज्ञानप्राप्ति में निमित्त मात्र हैं, जैसे जीव और पुद्गलों को चलने में धर्मास्तिकाय उदासीन निमित्त है।” इस प्रकार प्रतिज्ञा रूप आर्याछन्द पूर्ण हुआ॥३॥
English Translation of Purushartha Siddhi Upay Tika Gatha 4
Download PDF
Purusharth-Siddhi-Upay-Muni-Shri-Pranamya-Sagar.pdf
Home page : पुरुषार्थ सिद्धयुपाय Purusharth Siddhi Upay
गाथा 1 | Gatha1 | गाथा 2 | Gatha2 | गाथा 3 | Gatha 3 | गाथा 4 | Gatha 4 | गाथा 5 | Gatha 5