भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41
श्लोक 42 से 54 अजितंजय का चक्रवर्तित्व और पिहितास्रव
जयवर्मा ने दीक्षा ले अभिनंदन मुनि से मोक्ष प्राप्त किया। सुप्रभा ने रत्नावली व्रत कर स्वर्ग गयी। अजितंजय चक्रवर्ती बना और अभिनंदन की वंदना से पिहितास्रव नाम पाया। वज्रदंत ने उसे भोगों से विरक्ति का उपदेश दिया। पिहितास्रव ने मंदिरस्थविर से दीक्षा ली और श्रीमती को व्रत दिए थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 42 to 54
श्लोक ( Shlok ) 42 – 43
जयवर्माध निक्षिप्य स्वं राज्यमजितं जये । पाश्वेंऽभिनन्दनस्याधात् तपः साचाम्लवर्द्धनम् ।।४२।।
कर्मबन्धन निर्मुक्तो लेऽभेसौ परमं पदम् । यत्रात्यम्तिकमक्षय्यमव्याबाधं परं सुखम् ।।४३।।
कुछ समय बाद राजा जयवर्मा ने अपना समस्त राज्य अजितंजय पुत्र के लिए सौंपकर अभिनंदन मुनिराज के समीप दीक्षा ले ली और आचाम्लवर्धन तप तपकर कर्म बंधन से रहित हो मोक्षरूप उत्कृष्ट पद को प्राप्त कर लिया । उस मोक्ष में आत्यंतिक, अविनाशी और अव्याबाध उत्कृष्ट सुख प्राप्त होता है ।।42-43।।
After some time, King Jayavarma entrusted his entire kingdom to his son Ajitanjaya. He then took initiation under Abhinandana Muni and performed the Āchāmlavardhana penance. Through this, he became free from all karmic bondage and attained the supreme state of liberation (Moksha), where one experiences ultimate, eternal, indestructible, and uninterrupted bliss.” (42-43)
श्लोक ( Shlok ) 44
सुप्रभा च समासाद्य गणिनीं तां सुदर्शनाम् । रत्नावलीमुपोप्या भूद च्युतानुदिशाधिपः ।॥४४॥
रानी सुप्रभा भी सुदर्शना नाम की गणिनी के पास जाकर तथा रत्नावली व्रत के उपवास कर अच्युत स्वर्ग के अनुदिश विमान में देव हुई ।।44।।
“Queen Suprabhā also approached Gaṇinī Sudarshanā and, after observing the Ratnāvali vow with fasting, was reborn as a celestial deity in the Anudisha celestial vehicle of the Achyuta heaven.” (44)
श्लोक ( Shlok ) 45 – 46
ततोऽजितंजयश्चक्रो भूत्वा भक्त्याभिनन्दनम् । विवन्दिपुर्जिनं जातः पिहितास्त्रवनामभाक।।४५।।
तदा पापास्त्रवद्वारपिधानान्नाम तादृशम् । लब्ध्वासौ सुचिरं कालं साम्राज्यसुखमन्वभूत् ॥४६॥
तदनंतर अजितंजय राजा चक्रवर्ती होकर किसी दिन भक्तिपूर्वक अभिनंदन स्वामी की वंदना के लिए गया । वंदना करते समय उसके पापास्रव के द्वार रुक गये थे इसलिए उसका पिहितास्रव नाम पड़ गया । पिहितास्रव इस सार्थक नाम को पाकर वह सुदीर्घ काल तक राज्यसुख का अनुभव करता रहा ।।45-46।।
“Subsequently, King Ajitanjaya became a Chakravarti (universal monarch). One day, with great devotion, he went to pay homage to Abhinandana Swami. During the act of worship, the flow of his karmic influx was halted, earning him the meaningful name ‘Pihitāsrava’ (one whose karmic influx is sealed). Bearing this auspicious name, he continued to enjoy the pleasures of kingship for a long time.” (45-46)
श्लोक ( Shlok ) 47 – 50
प्रबोधितश्च सोऽन्येद्युः मयैव स्नेहनिर्भरम् । भो भव्य मा भवान् सा ङ् क्षीद् विषयेष्वपहारिषु ।। ४७।।
पश्य निर्विषयां तृप्तिमुशन्स्यास्यन्तिकी बुधाः । न सास्ति विषयैर्भुक्तैः दिव्यमानुषगोचरैः ॥४८।।
भूयो क्ततेषु मोगेषु भवेन्नैव रसान्तरम् । स एव चेद् रसः पूर्वः किं तैश्चर्वितचर्वणैः ॥४९॥
गैरैन्यैर्न यस्तृप्तः स किं तप्स्यति मर्त्यजैः । अनाशितम्मबैरेभिस्तदलं मङ्गुरैः सुखैः ॥५०॥
किसी दिन खेदपूर्वक मैंने उसे इस प्रकार समझाया―हे भव्य, तू इन नष्ट हो जाने वाले विषयों में आसक्त मत हो । देख, पंडित जन उस तृप्ति को ही सुख कहते हैं जो विषयों से उत्पन्न न हुई हो तथा अंत से रहित हो । वह तृप्ति मनुष्य तथा देवों के उत्तमोत्तम विषय भोगने पर भी नहीं हो सकती । ये भोग बार-बार भोगे जा चुके हैं, इनमें कुछ भी रस नहीं बदलता । जब इनमें वही पहले का रस है तब फिर चर्वण किये हुए का पुन: चर्वण करने में क्या लाभ है ? जो इंद्र संबंधी भोगों से तृप्त नहीं हुआ वह क्या मनुष्यों के भोगों से तृप्त हो सकेगा इसलिए तृप्ति नहीं करने वाले इन विनाशीक सुखों से बाज आओ, इन्हें छोड़ो ।।47-50।।
“One day, I advised him with concern: ‘O noble one, do not become attached to these perishable pleasures. Wise people define true contentment as that which does not arise from worldly pleasures and has no end. Such contentment cannot be achieved even by enjoying the finest pleasures of humans or gods.
These pleasures have been experienced countless times, and there is no change in their essence. When their taste remains the same as before, what is the point of chewing the already chewed? One who is not satisfied with the pleasures of Indra’s celestial domain will never be satisfied with human pleasures. Therefore, abandon these fleeting and unsatisfying enjoyments and rise above them.'” (47-50)
श्लोक ( Shlok ) 51 – 54
इत्यस्मद्वचनाज्जातवैराग्यः पिहितास्त्रवः । सहस्त्रगुणविंशत्या समं पार्थिवकुञ्जरैः ।।५१॥
मन्द्ररस्थविरस्यान्ते दीक्षामादाय सोऽवधिम् । चारणद्धि च संप्राप्य तिलकान्ते ऽम्बरे गिरौ ।॥५२॥
तपो जिनगुणर्द्धि, च श्रुतज्ञानविधिं च ते । तदादादाददानायै” स्वर्गाग्रसुखसाधनम् ।।५३।।
ततोऽस्मद्गुरुरेवासीत् तवाप्यभ्यर्हितो गुरुः । द्वाविंशतिं गुरुस्नेहाललिताङ्गानथार्चयम् ॥54॥
इस प्रकार मेरे वचनों से जिसे वैराग्य उत्पन्न हो गया है ऐसे पिहितास्रव राजा ने बीस हजार बड़े-बड़े राजाओं के साथ मंदिरस्थविर नामक मुनिराज के समीप दीक्षा लेकर अवधिज्ञान तथा चारण ऋद्धि प्राप्त की । उन्हीं पिहितास्रव मुनिराज ने अंबरतिलक नामक पर्वत पर पूर्वभव में तुम्हें स्वर्ग के श्रेष्ठ सुख देने वाले जिनगुण संपत्ति और श्रुतज्ञान संपत्ति नाम के व्रत दिये थे ।
इस प्रकार हे पुत्रि, जो पिहितास्रव पहले मेरे गुरु थे―माता के जीव थे वही पिहितास्रव व्रतदान की अपेक्षा तेरे भी पूज्य गुरु हुए । मेरी माता के जीव ललितांग ने मुझे उपदेश दिया था इसलिए मैंने गुरु के स्नेह से अपने समय में होने वाले बाईस ललितांग देवों की पूजा की थी ।।51-54।।
“Thus, inspired by my words, King Pihitāsrava developed detachment from worldly pleasures. Along with twenty thousand great kings, he took initiation under the sage Muniraj Mandirsthavira. He attained Avadhi Jñāna (clairvoyant knowledge) and Charan Riddhi (miraculous powers).
It was this same Pihitāsrava Muniraj who, on the sacred Ambertilak Mountain in a previous life, had bestowed upon you the vows named ‘Jin Gun Sampatti’ and ‘Shruta Jñāna Sampatti,’ which grant superior heavenly bliss.
Thus, O daughter, Pihitāsrava, who was once my spiritual teacher and the soul of my mother, also became your revered guru by virtue of imparting these vows. Since Lalitāṅga, my mother’s soul, had once guided me, I, out of devotion to my guru, worshipped twenty-two manifestations of Lalitāṅga Deva during my time.” (51-54)
श्लोक 55 से 71
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41
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