भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301
श्लोक 302 से 311 जिन चरणों की शक्ति
जिन चरणों के स्मरण से हाथी, सिंह, अग्नि, सर्प, लुटेरे, समुद्र, रोग, और बंधन शांत होते हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 302 to 311
श्लोक ( Shlok ) 302
नोपरोद्धमलं देव तव वैराग्यसंपदम् । सुरैर्विरचितां मक्रया प्रातिहार्यपरिच्छदैः ॥३०२॥
हे देव, यह प्रातिहार्यों का समूह आपकी वैराग्यरूपी संपत्ति को रोकने के लिए समर्थ नहीं है क्योंकि यह भक्तिवश देवों के द्वारा रचा गया है ।।302।।
O Lord, this collection of divine ornaments is not capable of hindering Your renunciation, for it has been created by the gods, who are under the influence of devotion.
श्लोक ( Shlok ) 303
करिकेसरिदावाहिनिषाद विषमाब्धयः । रोगा बन्धाश्च शाम्यन्ति त्वत्पदानुस्मृतेर्जिन ॥३०३॥
हे जिनदेव, आपके चरणों के स्मरण मात्र से हाथी, सिंह, दावानल, सर्प, भील, विषम समुद्र, रोग और बंधन आदि सब उपद्रव शांत हो जाते हैं ।।303।।
O Lord Jin, merely by remembering Your feet, all disturbances such as elephants, lions, wildfires, snakes, tribals, treacherous seas, diseases, and bonds are pacified.
श्लोक ( Shlok ) 304
करटक्षर दुद्दाममदाम्बुकृत दुर्दिनम् । गजमाघातुकं मर्त्या जयन्ति त्वदनुस्मृतेः ॥३०४॥
जिसके गंडस्थल से झरते हुए मदरूपी जल के द्वारा दुर्दिन प्रकट किया जा रहा है तथा जो आघात करने के लिए उद्यत है ऐसे हाथी को पुरुष आपके स्मरण मात्र से ही जीत लेते हैं ।।304।।
The elephant, whose temples drip with the water of intoxication, signaling the onset of troubled times, and which is ready to strike, is subdued by a person merely by remembering You.
श्लोक ( Shlok ) 305
करीन्द्र कुम्भनिर्भेदकठोरनखरो हरिः । क्रमेऽपि पत्तित्तं जन्तुं न हन्ति त्वत्पदस्मृतेः ॥३०५
बड़े-बड़े हाथियों के गंडस्थल भेदन करने से जिसके नख अतिशय कठिन हो गये हैं ऐसा सिंह भी आपके चरणों का स्मरण करने से अपने पैरों में पड़े हुए जीव को नहीं मार सकता है ।।305।।
The lion, whose claws have become exceedingly sharp from piercing the temples of mighty elephants, cannot kill a creature lying at his feet simply by remembering Your lotus feet.
श्लोक ( Shlok ) 306
नोपद्रवति दीप्तार्चिरप्यचिंष्मान् ‘समुत्थितः । त्व त्पदस्मृतिशीताम्बुधाराप्रशमितोदयः ॥३०६॥
हे देव, जिसकी ज्वालाएँ बहुत ही प्रदीप्त हो रही हैं तथा जो उन बढ़ती हुई ज्वालाओं के कारण ऊँची उठ रही है ऐसी अग्नि यदि आपके चरण-कमलों के स्मरणरूपी जल से शांत कर दी जाये तो फिर वह अग्नि भी उपद्रव नहीं कर सकती ।।306।।
O Lord, the fire, whose flames are blazing intensely and rising higher due to their growing intensity, can be calmed with the water of remembrance of Your lotus feet, and then it will no longer cause any disturbance.
श्लोक ( Shlok ) 307
फणी कृतफणो रोषादुद्गिरन् गरमुल्वणम् । त्व त्पदागदे’ संस्मृत्या सद्योभवति निर्विषः ॥307॥
क्रोध से जिसका फण ऊपर उठा हुआ है और जो भयंकर विष उगल रहा है ऐसा सर्प भी आपके चरणरूपी औषध के स्मरण से शीघ्र ही विषरहित हो जाता है ।।307।।
The serpent, whose hood is raised in anger and is spewing deadly venom, becomes free from poison and is quickly calmed by the remembrance of Your feet, which serve as the antidote.
श्लोक ( Shlok ) 308
वने प्रचण्डलुण्टाककोदण्डरवभीषणे । सार्थाः सार्थाधिपाः स्वैरं प्रयान्ति त्वत्पदानुगाः ॥३०८॥
हे देव, आपके चरणों के अनुगामी धनी व्यापारी जन प्रचंड लुटेरों के धनुषों की टंकार से भयंकर वन में भी निर्भय होकर इच्छानुसार चले जाते हैं ।।308।।
O Lord, the wealthy merchants who follow in the footsteps of Your lotus feet, move fearlessly and according to their wishes, even through the perilous forest, undeterred by the sound of the bows of fierce robbers.
श्लोक ( Shlok ) 309
अपि चण्डानिलाकाण्ड जृम्भणाघूर्णितार्णसम् । तरन्त्यर्णवमुद्वेलं हेलया त्वत्क्रमाश्रिताः ॥३०९॥
जो प्रबल वायु की असामयिक अचानक वृद्धि से कंपित हो रहा है ऐसे बड़ी-बड़ी लहरों वाले समुद्र को भी आपके चरणों की सेवा करने वाले पुरुष लीलामात्र में पार हो जाते हैं ।।309।।
Even the vast ocean, shaken by the sudden, fierce increase of winds, is easily crossed by those who serve Your lotus feet, as if it were a playful task.
श्लोक ( Shlok ) 310
अप्यस्थान कृतोत्थान तीव्रव्रणरुजो जनाः । सद्योभवन्त्यनातङ्काः स्मृतत्वत्पदभेषजाः ॥३१०॥॥
जो मनुष्य कुढंगे स्थानों में उत्पन्न हुए फोड़ों आदि के बड़े-बड़े घावों से रोगी हो रहे हैं वे भी आपके चरणरूपी औषध का स्मरण करने मात्र से शीघ्र ही नीरोग हो जाते हैं ।।310।।
Those humans, who are suffering from large wounds and sores caused by living in unpleasant places, are quickly healed and freed from their ailments by merely remembering the medicine of Your lotus feet.
श्लोक ( Shlok ) 311
कर्मबन्धविनिर्मुक्तं त्वामनुस्मृत्य मानवः ।दृढबन्धनबद्धोऽपि भवत्याशु विश्शृङ्खलः ॥३११॥
हे भगवन् आप कर्मरूपी बंधनों से रहित हैं । इसलिए मजबूत बंधनों से बँधा हुआ भी मनुष्य आपका स्मरण कर तत्काल ही बंधनरहित हो जाता है ।।311।।
O Lord, You are free from the bonds of karma. Therefore, even a person bound by strong shackles, upon remembering You, becomes instantly free from all bonds.
श्लोक 312 से 318
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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