भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91
श्लोक 92 से 102 युगंधर की महिमा और श्रीमती का जवाब
युगंधर ने 66 सागर तक सुख भोगकर अरहंत पद पाया। वे तीर्थंकर हैं, जो भव्यों को विकसित करते हैं। उनके चरित्र से कई जीव सम्यग्दर्शी बने। श्रीमती ने कहा कि वह पिहितास्रव की पूजा और विहार याद करती है, पर ललितांग के जन्म का पता नहीं। वज्रदंत ने बताया कि वे अच्युत से च्युत हो वज्रदंत बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 6- Shlok 92 to 102
श्लोक ( Shlok ) 92
कल्याणत्रितये वर्मा स सपर्यामवापिवान् । क्रमात् चैवश्यमुत्पाद्य महामेष महीयते ॥९२॥
वही पुत्र गर्भ-जन्म और तप इन तीनों कल्याणों में इंद्र आदि देवों-द्वारा की हुई पूजा को प्राप्त कर आज अनुक्रम से केवलज्ञानी हो सबके द्वारा पूजित हो रहा है ।।92।।
“That same son, having attained the three auspicious events of conception, birth, and asceticism, was worshipped by Indra and other celestial beings. Today, he has sequentially attained omniscience (Kevalajñāna) and is revered by all.” 92
श्लोक ( Shlok ) 93
शुभानुबन्धिना सोऽयं कर्मणाऽभ्युदयं सुखम् । षट्षष्ठ्यरध्युपमं कालं भुक्त्वार्हन्त्यमथासदत् ॥93॥
इस प्रकार उस प्रहसित के जीव ने पुण्यकर्म से छयासठ सागर (16+20+30=66) तक स्वर्गों के सुख भोग कर अरहंत पद प्राप्त किया है ।।93।।
“In this way, the soul of Prahasit, through virtuous deeds, enjoyed the pleasures of the heavens for sixty-six sagaras (16 + 20 + 30 = 66) and ultimately attained the status of an Arhat.” 93
श्लोक ( Shlok ) 94
युग्यो धर्मरथस्यायं युगज्येष्ठोयुगंधरः । तीर्थकृत् त्रायते सोऽस्मान् भव्याब्जवनभानुमान् ॥९४॥
ये युगंधर स्वामी इस युग के सबसे श्रेष्ठ पुरुष हैं, तीर्थंकर हैं, धर्मरूपी रथ के चलाने वाले हैं तथा भव्यजीवरूप कमल वन को विकसित करने के लिए सूर्य के समान हैं । ऐसे ये तीर्थंकर देव हमारी रक्षा करें―संसार के दुःख दूर कर मोक्ष पद प्रदान करें ।।94।।
“Yugandhar Swami is the greatest person of this age, a Tirthankara, the charioteer of the chariot of Dharma, and like the sun, he is the one who nurtures the lotus garden of souls. May such a Tirthankara protect us, remove the sorrows of the world, and grant us the path to liberation.” 94
श्लोक ( Shlok ) 95
तदेति मद्वचः श्रुत्वा बहवो दर्शनं श्रिताः । युबां च धर्मसंवेग परमं समुपागतौ ॥९५॥
उस समय मेरे ये वचन सुनकर अनेक जीव सम्यग्दर्शन को प्राप्त हुए थे तथा आप दोनों भी (ललितांग और स्वयंप्रभा) परम धर्मप्रेम को प्राप्त हुए थे ।।95।।
“At that time, upon hearing these words of mine, many souls attained right perception (Samyagdarsana), and both of you (Lalitanga and Svayambhā) also attained supreme love for Dharma.”95
श्लोक ( Shlok ) 96
पिहितास्त्रवभट्टार कैवल्योपजनक्षणे । समं गत्वार्चयिष्या मस्तदा पुत्रि स्मरस्यदः ।॥96॥
हे पुत्रि, तुम्हें इस बात का स्मरण होगा कि जब पिहितास्रव भट्टारक को केवलज्ञान उत्पन्न हुआ था उस समय हम लोगों ने साथ-साथ जाकर ही उनकी पूजा की थी ।।96।।
“O daughter, you will remember that when the sage Pihitasrava Bhattaraka attained omniscience (Kevalajñāna), we all went together to worship him.” 96
श्लोक ( Shlok ) 97
अभिजानासि तत्पुत्रि स्वयंभूरमणोदधिम् । क्रीडाहेतोर्वजिष्यामों गिरिं चाञ्जनसंज्ञकम् ॥९७॥
हे पुत्रि, तू यह भी जानती होगी कि हम लोग क्रीड़ा करने के लिए स्वयंभूरमण समुद्र तथा अंजनगिरि पर जाया करते थे ।।97।।
“O daughter, you must also know that we used to go to Svayambhuramana sea and Anjangiri mountain to play.” 97
श्लोक ( Shlok ) 98
श्रीमती गुरुणेत्युक्ता तात युष्मत्प्रसादतः । अभिजानामि तत्सर्वमित्यसौ प्रत्यभाषत ॥९८॥
इस प्रकार पिता के कह चुकने पर श्रीमती ने कहा कि हे तात, आपके प्रसाद से मैं यह सब जानती हूँ ।।98।।
“After the father had spoken thus, the lady replied, ‘O father, by your grace, I know all of this.'” 98
श्लोक ( Shlok ) 99
“गुरोः स्मरामि कैवल्यपूजां द्युतिलके गिरौ । विहृर्ति चाञ्जने शैले स्वयंभूरमणे च यत॥९९॥
अंबरतिलक पर्वत पर गुरुदेव पिहितास्रव मुनि के केवलज्ञान की जो पूजा की थी वह भी मुझे याद है तथा अंजनगिरि और स्वयंभूरमण समुद्र में जो विहार किये थे वे सब मुझे याद है ।।99।।
“I also remember the worship we performed at Mount Ambaratilak for Guru Pihitasrava Muni’s attainment of omniscience (Kevalajñāna), as well as the time we spent at Anjangiri and Svayambhuramana sea.”99
श्लोक ( Shlok ) 100
प्रत्यक्षमिव तत्सर्वं परिस्फुरति मे हृदि । किंतु कान्तः क्व मे जात इति दोलायते मतिः ॥१००॥
हे पिताजी, वे सब बातें प्रत्यक्ष की तरह मेरे हृदय में प्रतिभासित हो रही हैं किंतु मेरा पति ललितांग कहाँ उत्पन्न हुआ है इसी विषय में मेरा चित्त चंचल हो रहा है ।।100।।
“O father, all those events are vividly appearing in my heart as if they were directly experienced. However, my mind is restless regarding the topic of where my husband, Lalitanga, was born.” 100
श्लोक ( Shlok ) 101 – 102
इति बुवाणां तां भूयः प्रत्युवाच नराधिपः । पुत्रि स्वर्गस्थयोरेव युवयोः प्राक्च्युतोऽच्युतात् ॥१०१॥
नगर्यामिह धुर्योऽहं यशोधरमहीपतेः । देव्या वसुंधरायाश्च वज्रदन्तः सुतोऽभवम् ॥१०२॥
इस प्रकार कहती हुई श्रीमती से वज्रदंत पुन: कहने लगे कि हे पुत्रि, जब तुम दोनों स्वर्ग में स्थित थे तब मैं तुम्हारे च्युत होने के पहले ही अच्युत स्वर्ग से च्युत हो गया था और इस नगरी में यशोधर महाराज तथा वसुंधरा रानी के वज्रदंत नाम का श्रेष्ठ पुत्र हुआ हूँ ।।101-102।।
“Speaking thus, Vajradanta once again addressed the lady, saying, ‘O daughter, when both of you were in heaven, I had already fallen from the imperishable heaven before your fall. I was born in this city as the son of King Yashodhara and Queen Vasundhara, and I am called Vajradanta.'” 101-102
श्लोक 103 से 111
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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