भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
श्लोक 142 से 151 शतबल का देवत्व और सहस्त्रबल की कथा
शतबल महेंद्रस्वर्ग में ऋद्धियों सहित देव बने। एक बार महाबल को सुमेरु पर जैन धर्म का उपदेश दिया। स्वयंबुद्ध ने चौथी कथा शुरू की: सहस्त्रबल, शतबल के पिता, ने पुत्र को राज्य देकर जिनदीक्षा ली। तप से पृथ्वी को प्रकाशित किया, केवलज्ञान प्राप्त किया, और मोक्ष पाया। महाबल के पिता ने भी राज्य सौंपकर दीक्षा ली और मोक्ष की ओर अग्रसर हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
कृत्वानशमसञ्चर्यामवभोदर्यमप्यदः । यथोचितनियोगेन’ योगेनान्तेऽत्यजत् तनुम् ॥ १४२॥
उनने उपवास अवमोदर्य आदि सत्प्रवृत्ति को धारण कर आयु के अंत में यथायोग्य रीति से समाधिमरण पूर्वक शरीर छोड़ा ।।142।।
“He adopted practices such as fasting, self-control, and other virtuous activities, and at the end of his life, he left his body in the appropriate manner through Samadhi death (a death attained through meditation and self-discipline).”
श्लोक ( Shlok ) 143
माहेन्द्रकल्पेऽनल्पर्द्धिरभूदेष सुराग्रणीः । अणिमादिगुणोपेतः सप्ताम्बुधिमितस्थितिः ॥ १४३॥
जिससे महेंद्रस्वर्ग में बड़ी-बड़ी ऋद्धियों के धारक श्रेष्ठ देव हुए । वहाँ वे अणिमा, महिमा आदि गुणों से सहित थे तथा सात सागर प्रमाण उनकी स्थिति थी ।।143।।
“As a result, they became exalted deities in Mahendraswarga, endowed with great powers and abilities. There, they possessed qualities such as Anima, Mahima, and other divine attributes, and their state was as seven sagar.”
श्लोक ( Shlok ) 144 –145
स चान्यदा महामेरौ नन्दने त्वामुपागतम् । क्रीडाहेतोर्मया सार्द्ध दृष्ट्रातिस्नेहनिर्भरः ॥१४४॥
कुमार परमो धर्मों जैनाभ्युदयसाधनः । न विस्मार्यस्त्वयेत्येवं त्वां तदाम्वशिषत्तराम् ॥१४५॥
किसी एक दिन आप सुमेरु पर्वत के नंदनवन में क्रीड़ा करने के लिए मेरे साथ गये हुए थे वहीं पर वह देव भी आया था । आपको देखकर बड़े स्नेह के साथ उसने उपदेश दिया था कि हे कुमार, यह जैनधर्म ही उत्तम धर्म है यही स्वर्ग आदि अभ्युदयों की प्राप्ति का साधन है इसे तुम कभी नहीं भूलना ।।144-145।।
“One day, you had gone with me to play in the Nandanvan of Mount Sumeru, and it was there that the deity also arrived. Seeing you, he lovingly gave you advice, saying, ‘O Prince, Jainism is the supreme religion. It is the means to attain heavenly realms and other auspicious states. Never forget this path.'”
श्लोक ( Shlok ) 146
नमरख चरराजेन्द्रमस्तकास्वशासनः । सहस्रवल इत्यासीद् मवत्पितृपितामहः ॥
यह कथा कहकर स्वयंबुद्ध कहने लगा कि― ‘‘हे राजन् आपके पिता के दादा का नाम सहस्त्रबल था । अनेक विद्याधर राजा उन्हें नमस्कार करते थे और अपने मस्तक पर उनकी आज्ञा धारण करते थे ।।146।।
“After narrating this story, Swayambuddha began to say, ‘O King, your paternal grandfather’s name was Sahastrabal. Many Vidyadhara kings would salute him and bear his command on their heads.'”
श्लोक ( Shlok ) 147
स देव देवें निक्षिप्य लक्ष्मी शतबले सुते । जग्राह परमां दीक्षां जैनीं निर्वाणसाधनीम् ॥१४७।।
उन्होंने भी अपने पुत्र शतबल महाराज को राज्य देकर मोक्ष प्राप्त करने वाली उत्कृष्ट जिनदीक्षा ग्रहण की थी ।।147।।
“He too, after giving the kingdom to his son, King Shatbal, had taken the supreme Jain initiation that leads to liberation (moksha).”
श्लोक ( Shlok ) 148
विजहार महीं कृत्स्नां द्योतयन् स तपोऽश्शुभिः । मिथ्यान्धकारघटनां विघटस्योशुमामिव ॥१४८॥
वे तपरूपी किरणों के द्वारा समस्त पृथिवी को प्रकाशित करते और मिथ्यात्वरूपी अंधकार की घटा को विघटित करते हुए सूर्य के समान विहार करते रहे ।।148।।
“He illuminated the entire earth with the rays of his penance and, like the sun, he traversed, dispelling the clouds of delusion (false belief) that resembled darkness.”
श्लोक ( Shlok ) 149
क्रमात् कैवश्यमुत्पाद्यपूजितो नृसुरासुरैः । ततोऽनन्तमपारं च संप्रापच्छाश्वतं पदम् ॥१४९॥
फिर क्रम से केवलज्ञान प्राप्त कर मनुष्य, देव और धरणेंद्रों के द्वारा पूजित हो अनंत अपार और नित्य मोक्ष पद को प्राप्त हुए ।।149।।
“Then, in due course, he attained Kevaljnana (omniscient knowledge) and was worshipped by humans, gods, and the Lord of the Earth (Dharnendra), ultimately attaining the infinite, boundless, and eternal state of liberation (moksha).”
श्लोक ( Shlok ) 150 – 151
तथा युष्मत्पितायुष्मन् राज्यभूरिभरं वशी । त्वयि निक्षिप्य वैराग्यात् महाव्राज्यमास्थितः ।।
पुत्रनप्तृभिरम्यैश्च नमश्वरनराधिपैः । सार्द्धं तपश्वरम्नेष मुक्तिलक्ष्मीं जिघृक्षति ॥१५१॥
हे आयुष्मन् इसी प्रकार इंद्रियों को वश में करने वाले आपके पिता भी आपके लिए राज्यभार सौंप कर वैराग्यभाव से उत्कृष्ट जिनदीक्षा को प्राप्त हुए है और पुत्र, पौत्र तथा अनेक विद्याधर राजाओं के साथ तपस्या करते हुए मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त करना चाहते हैं ।।150-151।।
O auspicious one, in the same manner, your father, who had mastered his senses, after entrusting the responsibility of the kingdom to you, embraced the supreme Jain initiation with a spirit of renunciation. He now desires to attain the goddess of liberation (moksha) through asceticism, along with his son, grandson, and many Vidyadhara kings.”
श्लोक 152 से 161
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 |
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