भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
श्लोक 182 से 191 महाबल के अंग
महाबल की भुजाएँ कल्पवृक्ष की शाखा समान, मध्य भाग समुद्र समान, नितंब जंबूद्वीप समान, जाँघें निशाने समान, पिंडरियाँ शाण समान, और चरण लक्ष्मी के घर समान थे। उसने रूप और मंत्रशक्ति से जगत जीता। उसके चार मंत्री—महामति, संभिन्नमति, शतमति, स्वयंबुद्ध—बाह्य प्राण समान थे। स्वयंबुद्ध सम्यग्दृष्टि था, शेष मिथ्यादृष्टि, पर सभी स्वामी के हित में तत्पर थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 4- Shlok 182 to 191
श्लोक ( Shlok ) 182
युगायतौ विभर्त्ति स्म बाहू चास्तलाङ्कितौ । स सुराग इवोदग्रविटपौ पल्लवोज्ज्वलौ ॥१८२॥
वह युग (जुआँरी) के समान लंबी और मनोहर हथेलियों से अंकित भुजाओं को धारणकर रहा था जिससे ऐसा मालूम हो रहा था मानो कोंपलों से शोभायमान दो बड़ी-बड़ी शाखाओं को धारण करने वाला कल्पवृक्ष ही हो ।।182।।
“He wore arms marked with long and beautiful palms, resembling the large branches of a wish-fulfilling tree adorned with tender shoots.”
श्लोक ( Shlok ) 183
गभीरनामिकं मध्यं सवर्लि ललितं दधौ । महाब्धिरिव सावर्त सतरङ्ग च सैकतम् ॥१८
वह राजा गंभीर नाभि से युक्त और त्रिवलि से शोभायमान मध्य भाग को धारण किये हुए था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो भँवर और तरंगों से सहित बालू के टीले को धारण करने वाला समुद्र ही हो ।।183।।
“The king possessed a serious navel and a midsection adorned with three folds, which made it appear as though he were the ocean, holding a sandbank with whirlpools and waves.”
श्लोक ( Shlok ) 184
धनं च जघनं तस्य मेखलादामवेष्टितम् । बभौ वेदिकया जम्बूद्वीपस्थलमिवावृतम् ॥१८४॥
करधनी से घिरा हुआ उसका स्थूल नितंब ऐसा शोभायमान होता था मानो वेदिका से घिरा हुआ जंबूद्वीप ही हो ।।184।।
“His stout hips, surrounded by a girdle, appeared as if they were the Jambudvipa, encircled by a platform.”
श्लोक ( Shlok ) 185
रम्भास्तम्मनिमावूरू स धत्ते स्म कनद्युती । कामिनीदृष्टिबाणानों लक्ष्याविव निवेशितौ ॥१८५॥
दैदीप्यमान कांति की धारण करने और कदली स्तंभ की समानता रखने वाली उसकी दोनों जाँघें ऐसी शोभायमान होती थीं मानो स्त्रियों के दृष्टिरूपी बाण चलाने के लिए खड़े किये गये दो निशानें ही हों ।।185।।
“His two thighs, radiant with brilliance and resembling banana tree trunks, appeared as if they were two targets set up for shooting arrows aimed at the gazes of women.”
श्लोक ( Shlok ) 186
वज्रशाणस्थिरे जङ्गेसोऽधत रुचिराकृती । मनोजजैत्रवाणानां निशानायेव कल्प्यते ॥ १८६॥
वह महाबल वज्र के समान स्थिर तथा सुंदर आकृति वाली पिंडरियों को धारण किये हुए था जिससे ऐसा मालूम होता था मानो कामदेव के विजयी बाणों को तीक्ष्ण करने के लिए दो शाण ही धारण किये हो ।।186।।
“Mahabal, possessing thighs as firm and beautiful as thunderbolts, appeared as though he were holding two arrows to sharpen the victorious arrows of Kamadeva.”
श्लोक ( Shlok ) 187
पदतामरसद्वन्द्व”ससदङ्गुलिपत्रकम् । नखांशुकेसरं दध्रे लक्ष्म्याः कुलगृहायितम् ॥१८७॥
वह अंगुलीरूपी पलों से युक्त शोभायमान तथा नखों की किरणोंरूपी केशर से युक्त जिन दो चरणकमलों को धारण कर रहा था वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी के रहने के लिए कुलपरंपरा से चले आये दो घर ही हो ।।187।।
“The two lotus-like feet he bore, adorned with fingers resembling petals and nails shining like saffron, seemed as though they were two houses passed down through generations, made for the residence of Lakshmi.”
श्लोक ( Shlok ) 188
इत्यस्य रूपमुद्भूतनवयौवनविभ्रमम् । कामनीयकमैकध्यसुपनीतमिवाबभौ ॥१८८॥
इस प्रकार महाबल का रूप बहुत ही सुंदर था, उसमें नवयौवन के कारण अनेक हाव-भाव विलास उत्पन्न होते रहते थे जिससे ऐसा मालूम होता था मानो सब जगह का सौंदर्य यहाँ पर ही इकट्ठा हुआ हो ।।188।।
“Thus, Mahabal’s form was very beautiful, and due to his youthful charm, various expressions of elegance continued to arise, making it seem as though the beauty of the entire world had gathered in him.”
श्लोक ( Shlok ) 189
न केवलमसौ रूपशोभयैवाजयज्जगत् । व्यजेष्ट मन्त्रशक्त्यापि वृद्धसंयोगलब्धया ॥१८९॥
उस राजा ने केवल अपने रूप की शोभा से ही जगत् को नहीं जीता था किंतु वृद्ध जनों की संगति से प्राप्त हुई मंत्रशक्ति के द्वारा भी जीता था ।।189।।
“That king had not only conquered the world with the beauty of his form but also with the power of mantras acquired through the company of elderly wise men.”
श्लोक ( Shlok ) 190
तस्याभूवन् महाप्रज्ञाश्चत्वारो मन्त्रिपुङ्गवाः । बहिश्चरा इव प्राणाः सुस्निग्धा दीर्घदर्शिनः ॥१९०॥
उस राजा के चार मंत्री थे जो महाबुद्धिमान् स्नेही और दीर्घदर्शी थे । वे चारों ही मंत्री राजा के बाह्य प्राणों के समान मालूम होते थे ।।190।।
“The king had four ministers who were highly intelligent, affectionate, and far-sighted. All four ministers seemed like the external life force of the king.”
श्लोक ( Shlok ) 191
महामतिश्च संमिन्नमतिः शतमत्तिस्तथा । स्वयंबुद्धश्च राज्यस्य मूलस्तम्मा इव स्थिराः ॥ १९१॥
उनके नाम क्रम से महामति, संभिन्नमति, शतमति और स्वयंबुद्ध थे । ये चारों ही मंत्री राज्य के स्थिर रत्नस्तंभ के समान थे ।।191।।
“Their names, in order, were Mahamati, Sambhinmati, Shatamati, and Svayambuddha. These four ministers were like the stable pillars of jewels that supported the kingdom.”
श्लोक 192 से 198
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181
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