मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 153 to 162
श्लोक ( Shlok ) 153
तौ पञ्चदशचापोच्चौ’ द्वात्रिंशल्लक्षणान्वितौ । आदिसंहननौ संस्थानं चाभूदादिमं तयोः ॥१५३॥
वे दोनों ही भाई पन्द्रह धनुष ऊंचे थे, बत्तीस लक्षणोंसे सहित थे, वज्रवृषभनाराचसंहननके धारक थे और उन दोनोंके समचतुरस्रसंस्थान नामका पहला संस्थान था ।। १५३ ॥
“Both of those brothers were fifteen Dhanushas (bow-lengths) tall, were endowed with the thirty-two auspicious bodily marks, possessed the Vajra-Vrishabha-Naracha-Samhanana (the strongest, adamantine skeletal structure), and were characterized by the first type of symmetry known as Sama-Chaturasra-Samsthana (perfectly proportioned and balanced bodily symmetry).”153
श्लोक ( Shlok ) 154 – 160
अमेयवीयौं हंसांशनीलोत्पलसमत्विषौ । तयोः सपञ्चपञ्चाशत्-पञ्चाशद्वर्षसम्मिते ॥ १५४ ॥कुमारकाले निःक्रान्ते नितान्तपरमोदये । भारतेऽस्मिन्नयोध्यायां भरतादिमहीशितुः ॥ १५५ ॥ गतेष्विक्ष्वाकुमुख्येषु सङ्ख्यातीतेष्वनन्तरम् । हरिषेणमहाराजे दशमे चक्रवर्तिनि ॥ १५६ ॥ सर्वार्थसिद्धावुत्पन्ने संवत्सरसहस्रके । काले गतवति प्राभूत् सगराख्यो महीपतिः ॥ १५७ ॥ निःखण्डमण्डलश्चण्डः सुलसायाः स्वयंवरे । मधुपिङ्गलनामानं कुमारवरमागतम् ॥ १५८ ॥ दृष्यलक्ष्मायमित्युक्त्वा निरास्थ नृपमध्यगम् । सगरे बद्धवैरः सन् निःक्रम्य मधुपिङ्गलः ॥ १५९ ॥ सलज्जः संयमी भूत्वा महाकालासुरोऽभवत् । सोऽसुरः सगराधीशवंशनिर्मूलनोद्यतः ॥ १६०॥
वे दोनों ही अपरि-मित शक्तिवाले थे, उनमें से रामका शरीर हंसके अंश अर्थात् पंखके समान सफ़ेद था और लक्ष्मण का शरीर नील कमलके समान नील कान्तिवाला था ! जब रामका पचपन और लक्ष्मणका पचास वर्ष प्रमाण, अत्यन्त श्रेष्ठ ऐश्वर्यसे भरा हुआ कुमारकाल व्यतीत हो गया तब इसी भरतक्षेत्र की अयोध्यानगरी में एक सगर नामक राजा हुआ था। वह सगर तब हुआ था जब कि प्रथम चक्रवर्ती भरत महाराजके बाद इक्ष्वाकुवंशके शिरोमणि असंख्यात राजा हो चुके थे और उनके बाद जब हरिषेण महाराज नामक दशवां चक्रवर्ती मरकर सर्वार्थसिद्धिमें उत्पन्न हो गया था तथा उसके बाद जब एक हजार वर्ष प्रमाण काल व्यतीत हो चुका था। इस प्रकार काल व्यतीत हो चुकने पर सगर राजा हुआ था। वह अखण्ड राष्ट्रका स्वामी था, तथा बड़ा ही क्रोधी था। एकबार उसने सुलसाके स्वयंवरमें आये हुए एवं राजाओंके बीचमें बैठे हुए मधुपिङ्गल नामके श्रेष्ठ राजकुमारको ‘यह दुष्ट लक्षणोंसे युक्त है’ ऐसा कहकर सभाभूमिसे निकाल दिया। राजा मधुपिङ्गल सगर राजाके साथ वैर बांधकर लजाता हुआ स्वयंवर मण्डपसे बाहर निकल पड़ा। अन्तमें संयम धारणकर वह महाकाल नामका असुर हुआ। वह असुर राजा सगरके वंशको निर्मूल करनेमें तत्पर था ।। १५४-१६० ।।
“Both of them possessed boundless strength. Among them, Rama’s body was as white as the wing of a swan, and Lakshmana’s body possessed a blue luster like that of a blue lotus. When Rama’s fifty-five years and Lakshmana’s fifty years of youth—filled with supreme, magnificent opulence—passed away, a king named Sagara ruled in the Ayodhya city of this very Bharatakshetra. This Sagara came to power long after the first Chakravarti, King Bharata, when countless crest-jewel kings of the Ikshvaku lineage had already passed; and after them, when the tenth Chakravarti named King Harishena had died and was reborn in the Sarvarthasiddhi heavenly realm; and subsequently, when a time period of one thousand years had elapsed. It was after the passage of such time that King Sagara ruled. He was the sovereign lord of an undivided nation, yet he was extremely quick-tempered. Once, during the Swayamvara (bride-choice assembly) of Sulasa, he insulted a noble prince named Madhupingala who was seated among the kings, saying, ‘This man is possessed of evil, inauspicious traits,’ and expelled him from the assembly hall. Binding a deep-seated enmity against King Sagara and feeling utterly humiliated, Prince Madhupingala walked out of the Swayamvara pavilion. Eventually, adopting ascetic vows [at the end of his life], he was reborn as an Asura (demonic deity) named Mahakala. That Asura remained completely intent on uprooting and destroying King Sagara’s entire lineage.”) 154 – 160
श्लोक ( Shlok ) 161 – 162
द्विजवेषं समादाय सम्प्राप्य सगराह्वयम् । “अथर्ववेदविहितं प्राणिहिंसापरायणम् ॥ १६१ ॥ कुरु यागं श्रियो वृद्धयै शत्रुविच्छेदनेच्छया । इति तं दुर्मति भूपं पापाभीरुर्व्यमोहयत् ॥ १६२ ॥
वह ब्राह्मणका वेष रखकर राजा सगरके पास पहुँचा और कहने लगा कि तू लक्ष्मीकी वृद्धिके लिए, शत्रुओंका उच्छेद करनेके लिए अथर्ववेदमें कहा हुआ प्राणियोंकी हिंसा करने वाला यज्ञ कर । इस प्रकार पापसे नहीं डरने वाले उस महाकाल नामक व्यन्तरने उस दुर्बुद्धि राजाको मोहित कर दिया ॥ १६१-१६२ ॥
“Disguising himself as a Brahmin, he approached King Sagara and began to say, ‘For the increase of your wealth and prosperity, and for the utter destruction of your enemies, perform the violence-laden sacrifice (Yajna) involving the slaughter of living beings as prescribed in the Atharvaveda.’ In this manner, that Vyantara deity named Mahakala, who harbored no fear of sin, completely deluded and misdirected that evil-minded king.”161 – 162
श्लोक 163 से 173
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ तीर्थकर, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |