विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 222 to 232
श्लोक ( Shlok ) 222
ददौ दन्तद्वयेनासौ व्यधात्पादचतुष्टयम् । पल्यङ्कस्यात्मनो मुक्ताभिश्च हारमधान तम् ॥ २२२ ॥
राजा पूर्णचन्द्रने उन दोनों दाँतोंसे अपने पलंगके चार पाये बनवाये और मोतियोंसे हार बनवाकर पहिना ।। २२२ ॥
King Purnachandra had four legs for his bed crafted from those two tusks, and he had a necklace made from the pearls, which he then wore. [222]
श्लोक ( Shlok ) 223
ईदृशं संसृतेर्भावं भावयन् को विधीनं चेत्। रतिं तनोति भोगेषु भवाभावमभावयन् ॥ २२३ ॥
वह मनुष्य सर्वथा बुद्धिरहित नहीं है अथवासंसारके अभावका विचार नहीं करता है तो संसारके ऐसे स्वभावका विचार करनेवाला कौन मनुष्य है जो विषय-भोगोंमें प्रीति बढ़ानेवाला हो ? ।। २२३ ।।
If a person is not entirely devoid of intellect, or if they do not simply ignore the reality of worldly existence, then who among those who contemplate the true nature of this world would ever seek to increase their attachment to sensory pleasures? [223]
श्लोक ( Shlok ) 224
इत्यसौ सिंहचन्द्रोक्तं रामदत्ताऽवबुध्य तत् । पुत्रस्नेहात्स्वयं गत्वा पूर्णचन्द्रमजिज्ञपत् ॥ २२४ ॥
इस तरह सिंहचन्द्र मुनिके समझाने पर रामदत्ताको बोध हुआ, वह पुत्रके स्नेहसे राजा पूर्णचन्द्रके पास गई और उसे सब बातें कहकर समझाया ।। २२४ ।।
In this way, after receiving the explanation from the sage Simhachandra, Ramadatta attained enlightenment. Driven by maternal affection, she went to King Purnachandra and explained everything to him to help him understand the truth. [224]
श्लोक ( Shlok ) 225 – 226
गृहीतधर्मतत्वोऽसौ विरं राज्यमपालयत् । रामदत्तापि तत्स्नेहात्सनिदानायुषोऽवधौ ॥ २२५ ॥महाशुके विमानेऽभूद् भास्करे भास्कराह्वयः । पूर्णचन्द्रोऽपि तत्रैव वैडूर्ये तत्कृताहूयः ॥ २२६ ॥
पूर्णचन्द्रने धर्म के तत्त्वको समझा और चिरकाल तक राज्यका पालन किया । रामदत्ताने पुत्रके स्नेहसे निदान किया और आयुके अन्त में मरकर महाशुक्र स्वर्गके भास्कर नामक विमानमें देव पद प्राप्त किया। तथा पूर्णचन्द्र भी उसी स्वर्गके वैडूर्य नामक विमानमें वैर्य नामका देव हुआ ।। २२५-२२६ ।।
Purnachandra understood the essence of Dharma and governed the kingdom for a long time. Out of affection for her son, Ramadatta made a Nidana (a solemn resolve/vow), and upon the end of her life, she attained the status of a celestial being in the Bhaskara celestial vehicle of the Mahashukra heaven. Purnachandra also passed away and became a deity named Vairya in the Vaidurya celestial vehicle of that same heaven. [225–226]
श्लोक ( Shlok ) 227
सिंहचन्द्रो मुनीन्द्रोऽपि सम्यगाराध्य शुद्धधीः । प्रीतिङ्करविमानेऽभूदुर्ध्वमैवेयकोर्ध्वके ॥ २२७ ॥
निर्मल ज्ञानके धारक सिंहचन्द्र मुनिराज भी अच्छी तरह समाधिमरण कर नौवें ग्रेवेयक के प्रीतिंकर विमानमें अहमिन्द्र हुए ।। २२७ ।।
The sage Simhachandra, the possessor of pure knowledge, also underwent a righteous Samadhimaran (meditative death) and was reborn as an Ahamindra in the Pritinkar celestial vehicle of the Ninth Graiveyaka. [227]
श्लोक ( Shlok ) 228 – 230
रामदत्ता ततश्च्युत्वा धरणीतिलके पुरे। अत्रैव दक्षिणश्रेण्यामतिवेगखगेशिनः ॥ २२८ ॥ श्रीधराख्या सुता जाता माताऽस्याः स्यात्सुलक्षणा । दशेयमलकाधीशे ‘दर्शकाय खगेशिने ॥ २२९ ॥ वैडूर्याधिपतिश्चायं दुहिताऽभूद्यशोधरा । “पुष्कराख्यपुरे सूर्यावर्तायादाय्यसावपि ॥ २३० ॥
रामदत्ताका जीव महाशुक्र स्वर्गसे चयकर इसी दक्षिण श्रेणीके धरणीतिलक नामक नगरके स्वामी अतिवेग विद्याधरके श्रीधरा नामकी पुत्री हुआ। वहाँ इसकी माताका नाम सुलक्षणा था। यह श्रीधरा पुत्री अलकानगरीके अधिपति दर्शक नामक विद्याधर के राजा के लिए दी गई। पूर्णचन्द्रका जीव जो कि महाशुक्र स्वर्ग के वैडूर्य विमानमें वैडूर्य नामक देव हुआ था वहाँ से चयकर इसी श्रीधराके यशोधरा नामकी वह कन्यो हुई जो कि पुष्करपुर नगरके राजा सूर्यावर्तके लिए दी गई थी ॥ २२८-२३०।।
The soul of Ramadatta, descending from the Mahashukra heaven, was reborn as Shridhara, the daughter of Ativega Vidyadhara, the lord of the city of Dharanitilaka in this southern range. Her mother’s name there was Sulakshana. This daughter, Shridhara, was given in marriage to King Darshaka, a Vidyadhara and the ruler of the city of Alaka.
The soul of Purnachandra, who had become the deity named Vaidurya in the Vaidurya celestial vehicle of the Mahashukra heaven, descended from there and was born to this same Shridhara as a daughter named Yashodhara, who was subsequently given in marriage to King Suryavarta of the city of Pushkarpur. [228–230]
श्लोक ( Shlok ) 231 – 232
राजा श्रीधरदेवोऽपि रश्मिवेगस्तयोरभूत् । कदाचिन्मुनिचन्द्राख्यमुनिधर्मानुशासनात् ॥ २३१ ॥ सूर्यावर्ते तपो याते श्रीधरा च यशोधरा । दीक्षां समग्रहीषातां गुणवत्यार्यिकान्तिके ॥ २३२ ॥
राजा सिंहसेन अथवा अशनिघोष हाथीका जीव श्रीधर देव उन दोनों- सूर्यावर्त और यशोधराके रश्मिवेग नामका पुत्र हुआ। किसी समय मुनिचन्द्र नामक मुनिसे धर्मोपदेश सुनकर राजा सूर्यावर्त तपके लिए चले गये और श्रीधरा तथा यशोधराने गुणवती आर्यिकाके पास दीक्षा धारण कर ली ।। २३१-२३२ ।।
The soul of King Singhsen (who was also the elephant Ashanighosha and later the deity Shridhar) was born as a son named Rashmivega to the couple Suryavarta and Yashodhara. After hearing a religious discourse from a sage named Munichandra, King Suryavarta departed to practice penance, while Shridhara and Yashodhara took initiation under the noble nun Gunavati Arya. [231–232]
श्लोक 233 से 242
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