मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 344 to 353
श्लोक ( Shlok ) 344 – 346
महाकालः समाश्वास्य स्वस्ति तेऽस्त्विति सादरम् । तमविज्ञातपूर्वत्वात्कुतस्त्यस्त्वं वनान्तरे ॥३४४॥परिभ्रमणमेतत्ते ब्रूहि मे केन हेतुना । इत्यपृच्छदसौ चाह निजवृतान्तमादितः ॥३४५॥ तं निशम्य महाकालः सगरं मम वैरिणम् । निर्वशीकर्तुमेव स्यात्समर्थो मे प्रतिष्कसः ॥ ३४६॥इति निश्चित्य पापात्मा ‘विप्रलम्भनपण्डितः । त्वत्पिता स्थण्डिलो विष्णुरूपमन्युरहं च भोः ॥३४७॥ भौमोपाध्यायसान्निध्ये शास्त्राभ्यासमकुर्वंहि । त्वत्पिता मे ततो विद्धि धर्मभ्राता तमीक्षितुम् ॥३४८॥ ममागमनमेतच्च वैफल्यं समपद्यत । मा भैषीः शत्रुविध्वंसे सहायस्ते भवाम्यहम् ॥३४९॥
महाकालने आश्वासन देते हुए आदरके साथ कहा कि तुम्हारा भला हो। तदनन्तर अजान बनकर महाकालने पर्वतसे पूछा कि तुम कहाँ से आये हो और इस वनके मध्यमें तुम्हारा भ्रमण किस कारणसे हो रहा है ? पर्वतने भी प्रारम्भसे लेकर अपना सब वृत्तान्त कह दिया। उसे सुनकर महाकालने सोचा कि यह मेरे बैरी राजाको निवेश करनेके लिए समर्थ है, यह मेरा साधर्मी है। ऐसा विचार कर ठगनेमें चतुर पापी महाकाल पर्वतसे कहने लगा कि हे पर्वत ! तुम्हारे पिताने, स्थण्डिलने, विष्णुने, उपमन्यु ने और मैंने भौम नामक उपाध्यायके पास शास्त्राभ्यास किया था इसलिए तुम्हारे पिता मेरे धर्म-भाई हैं। उनके दर्शन करनेके लिए ही मेरा यहाँ आना हुआ था परन्तु खेद है कि वह निष्फल हो गया । तुम डरो मत – शत्रुका नाश करनेमें मैं तुम्हारा सहायक हूँ ।। ३४४-३४९ ॥
Offering words of reassurance, Mahakala said with respect, “May blessings be upon you.”
Thereafter, feigning complete ignorance, Mahakala asked Parvata, “Where have you come from, and for what reason are you wandering in the midst of this forest?”
Parvata then related his entire account to him right from the very beginning. Hearing it, Mahakala thought to himself, “This man is capable of bringing about the downfall of my enemy, the King. He is a kindred spirit to me.” Reflecting thus, the sinful Mahakala, who was highly skilled in deception, said to Parvata, “O Parvata! Your father, Sthandila, Vishnu, Upamanyu, and I had all studied the scriptures together under a preceptor named Bhauma. Therefore, your father is my spiritual brother. I had come here solely to meet him, but alas, my visit has proven to be in vain. Do not fear—I shall be your ally in destroying your enemy.” || 344-349 ||
श्लोक ( Shlok ) 350 – 353
इति क्षीरकदम्बात्मजेष्ठार्थानुगताः स्वयम् । आथर्वणगताषष्टिसहस्त्र प्रमिताः पृथक् ॥३५०॥ ऋचो वेदरहस्यानीत्युत्पाद्याध्याप्य पर्वतम् । शान्तिपुष्ठ्यभिचारात्मक्रियाः पुर्वोक्तमन्त्रणैः ॥३५१॥ निशिताः पवनोपेतवह्निज्वालासमाः फलम् । इष्टेरुत्पादमिष्यन्ति प्रयुक्ताः पशुहिंसनात् ॥ ३५२॥ ततः साकेतमध्यास्य शान्तिकादिफलप्रदम् । हिंसायागं समारभ्य प्रभावं विदधामहे ॥३५३॥
इस प्रकार उस महाकालने क्षीरकदम्बकके पुत्र पर्वतके इष्ट अर्थका अनुसरण करनेवाली अथर्ववेद सम्बन्धी साठ हजार ऋचाएँ पृथक् पृथक् स्वयं बनाईं। ये ऋचाएँ वेदका रहस्य बतलानेवाली थीं, उसने पर्वतके लिए इनका अध्ययन कराया और कहा कि पूर्वोक्त मन्त्रोंसे वायुके द्वारा बढ़ी हुई अग्निकी ज्वालामें शान्ति पुष्टि और अभिचारात्मक क्रियाएँ की जावें तो पशुओंकी हिंसासे इष्ट फलकी प्राप्ति हो जाती है। तदनन्तर उन दोनोंने विचार किया कि हम दोनों अयोध्या में जाकर रहें और शान्ति आदि फल प्रदान करनेवाला हिंसात्मक यज्ञ प्रारम्भ कर अपना प्रभाव उत्पन्न करें ।॥ ३५०-३५३ ॥
In this manner, that Mahakala personally and independently composed sixty thousand verses related to the Atharvaveda, designed to align perfectly with the desired, corrupted motives of Kshirakadamba’s son, Parvata. These verses were claimed to reveal the hidden secrets of the Vedas.
He made Parvata study them thoroughly and instructed him, saying, “If rituals for peace (Shanti), prosperity (Pushti), and malevolent sorcery (Abhichara) are performed in the blazing fire fanned by the wind using the aforementioned mantras, then the desired fruits can be attained through the slaughter of animals.”
Thereafter, the two of them conspired, deciding, “Let us both go and reside in Ayodhya, and by initiating violence-based sacrifices that promise peace and other benefits, we shall establish our profound influence and power there.” || 350-353 ||
श्लोक 354 से 370
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343
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