मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426 | श्लोक 427 से 443 | श्लोक 444 से 461
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 462 to 471
श्लोक ( Shlok ) 462
इत्यनेन स मन्त्री च राजा चागममार्हतम् । समासीनाश्च सर्वेऽपि मन्त्रिणं तुष्टुवुस्तराम् ॥ ४६२ ॥
इस प्रकार अतिशयमति मंत्रीके द्वारा कहा हुआ आगम सुनकर प्रथम मंत्री, राजा तथा अन्य सभा-सद लोगोंने उस द्वितीय मन्त्रीकी बहुत भारी स्तुति की ।। ४६२ ॥
“In this manner, having heard the sacred scriptures (Agama) expounded by the minister Atishayamati, the prime minister, the King, and the other members of the assembly praised that second minister immensely. || 462 ||”
श्लोक ( Shlok ) 463 – 467
तदा सेनापतिर्नान्ना महीशस्य महाबलः । पुण्यं भवतु पापं वा यागे नस्तेन किं फलम् ॥ ४६३ ॥प्रभावदर्शनं श्रेयो भूभृन्मध्ये कुमारयोः । इत्युक्तवांस्ततो राजा पुनश्चैतत् विचारवत् ॥ ४६४ ॥इति मत्वा विसृज्यैतान् मन्त्रिसेनापतीन् पुनः । हितोपदेशिनं प्रश्नं तमपृच्छत्पुरोहितम् ।। ४६५ ।।गतयोर्जनकागारं स्यान्न वेष्टं कुमारयोः । इति सोऽपि पुराणेषु निमित्तेषु च लक्षितम् ।। ४६६ ।।अस्मत्कुमारयोस्तत्र यागे भावी महोदयः । संशयोऽत्र न कर्तव्यस्त्वयान्यच्चेदमुच्यते ॥४६७ ।।
उस समय राजा दशरथका महाबल नामका सेनापति बोला कि यज्ञमें पुण्य हो चाहे पाप, हम लोगोंको इससे क्या प्रयोजन है ? हम लोगोंको तो राजाओंके बीच दोनों कुमारोंका प्रभाव दिखलाना श्रेयस्कर है। सेनापतिकी यह बात सुनकर राजा दशरथने कहा कि अभी इस बात पर विचार करना है। यह कह कर उन्होंने मंत्री और सेनापतिको तो विदा किया और तदनन्तर हितका उपदेश देनेवाले पुरोहितसे यह प्रश्न पूछा कि राजा जनकके घर जाने पर दोनों कुमारोंका इष्ट सिद्ध होगा या नहीं ? उत्तरमें पुरोहित भी पुराणों और मिमित्तशास्त्रोंके कहे अनुसार कहने लगा कि हमारे इन दोनों कुमारोंका राजा जनकके उस यज्ञमें महान् ऐश्वर्य प्रकट होगा इसमें आपको थोड़ा भी संशय नहीं करना चाहिये । इसके सिवाय एक बात और कहता हूँ ।। ४६३-४६७ ।।
“At that moment, King Dasharatha’s commander-in-chief, named Mahabala, spoke up: ‘Whether a Yajna (sacrifice) brings spiritual merit (Punya) or sin (Papa), what relevance does that have to us? For us, it is far more beneficial to display the glorious power and influence of both the princes before the assembled kings.’
Hearing this statement from the commander-in-chief, King Dasharatha replied, ‘This matter still requires careful consideration.’ Saying this, he dismissed the minister and the commander-in-chief.
Thereafter, he posed a question to his priest (Purohita), who always offered beneficial counsel: ‘Upon going to King Janaka’s house, will the desired objective of both the princes be accomplished or not?’
In response, the priest spoke in accordance with what is prescribed in the Puranas and the sciences of omens and astrology (Nimitta-Shastras): ‘The grand majesty and glory of our two princes will be spectacularly revealed in that Yajna of King Janaka; you should not harbor even the slightest doubt regarding this. Furthermore, let me tell you one more thing.’ || 463-467 ||”
श्लोक ( Shlok ) 468 – 469
अथास्मिन् भारते क्षेत्र मनवस्तीर्थनायकाः । चक्रेशास्त्रिविधारामा भविष्यन्ति महौजसः ।॥ ४६८।। इन्याख्याताः पुराणशैर्मुनीशैः प्राग्मया श्रुताः । ‘तेष्वष्टमाविमौ रामकेशवौ नः कुमारकौ ॥ ४६९ ॥
वह यह कि इस भरत क्षेत्रमें मनु-कुलकर, तीर्थकर, तीन प्रकारके चक्रवर्ती (चक्रवर्ती, नारायण और प्रतिनारायण) और महा प्रतापी बलभद्र होते हैं ऐसा पुराणोंके जाननेवाले मुनियोंने कहा है तथा मैंने भी पहले सुना है। हमारे ये दोनों कुमार उन महापुरुषोंमें आठवें बलभद्र और नारायण होंगे ॥४६८-४६९ ॥
“That is, in this Bharata Kshetra (the region of Bharata), there manifest the Manus (or Kulakaras), the Tirthankaras, the three types of Chakravartins (the Chakravartin, the Narayana, and the Pratinarayana), and the immensely glorious Balabhadras—so have the sages who possess the knowledge of the Puranas declared, and so have I also heard before.
These two princes of ours will be the eighth Balabhadra and Narayana among those exalted supreme beings (Mahapurushas).’ || 468-469 ||”
श्लोक ( Shlok ) 470
भाविनौ रावणं इत्वेत्यवादीद्भाविविद्भिरः । तत्तदुक्त’ तदाकर्ण्य परितोषमगानृपः ॥ ४७० ॥
तथा रावणको मारेंगे। इस प्रकार भविष्यको जाननेवाले पुरोहितके वचन सुनकर राजा सन्तोषको प्राप्त हुए ॥ ४७० ॥
“…and they will slay Ravana.’ In this manner, upon hearing the words of the priest who possessed knowledge of the future, the King attained deep contentment and satisfaction. || 470 ||”
श्लोक ( Shlok ) 471
कृत्वा पापमदः क्रुधां पशुवधस्योत्सूत्रमाभूतलं, हिंसायज्ञमवर्तयत् कपटधीः क्रूरो महाकालकः ।तेनागात्सवसुः सपर्वतखलो घोरां धरां नारकीं दुर्मार्गान् दुरितावहान्विदधतां नैतन्महत्पापिनाम् ॥ ४७१ ॥
कपट रूप बुद्धिको धारण करनेवाले क्रूरपरिणामी महाकालने क्रोधवश समस्त संसारमें शास्त्रोंके विरुद्ध और अत्यन्त पाप रूप पशुओंकी हिंसासे भरे हिंसामय यज्ञकी प्रवृत्ति चलाई इसी कारणसे वह राजा वसु, दुष्ट पर्वतके साथ घोर नरकमें गया सो ठीक ही है क्योंकि जो पाप उत्पन्न करनेवाले मिध्यामार्ग चलाते हैं उन पापियोंके लिए नरक जाना कोई बड़ी बात नहीं है ।॥ ४७१ ।।
“Possessing a deceptive intellect and driven by wrath, the cruel-minded Mahakala initiated the practice of violent Yajnas (sacrifices) throughout the entire world—a practice contrary to the sacred scriptures, utterly sinful, and filled with the slaughter of animals. For this very reason, King Vasu, along with the wicked Parvata, descended into a horrific hell. And this is entirely fitting, for it is no extraordinary thing for those sinners who propagate false paths that breed sin to go to hell. || 471 ||”
श्लोक 472 से 473
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 254 | श्लोक 255 से 273 | श्लोक 274 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 304 | श्लोक 305 से 321 | श्लोक 322 से 332 | श्लोक 333 से 343 | श्लोक 344 से 353 | श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426 | श्लोक 427 से 443 | श्लोक 444 से 461
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