Summary of Uttara Purana Parv 49 by Acharya Gunabhadra
संक्षिप्त सारांश:
भगवान् संभवनाथ, जिनका ज्ञान दर्पण के समान समस्त पदार्थों को प्रकाशित करता है और जो मिथ्यात्व तथा पाखण्ड का नाश करने वाले हैं, उनके पूर्वभव का आरम्भ पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर के राजा विमलवाहन से होता है। राजा विमलवाहन ने संसार की नश्वरता, मृत्यु की अनिवार्यता, आयु की क्षणभंगुरता और विषयभोगों की असारता पर गंभीर चिंतन किया। उन्होंने समझा कि जीव मोहवश मृत्यु के मुख में रहते हुए भी जागृत नहीं होता। इस वैराग्य से प्रेरित होकर उन्होंने राज्य अपने पुत्र को सौंप दिया, जिनदीक्षा धारण की, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। जीवनांत में वे प्रथम ग्रैवेयक के सुदर्शन विमान में अहमिन्द्र देव हुए।
देवलोक से च्युत होकर वही जीव भरत क्षेत्र की श्रावस्ती नगरी में राजा दृढ़राज्य और रानी सुषेणा के यहाँ अवतरित हुआ। रानी ने गर्भाधान से पूर्व सोलह शुभ स्वप्न देखे, और कार्तिक पूर्णिमा के दिन भगवान् संभवनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से लोक में आनंद छा गया। देवों ने उनके दिव्य स्वरूप, अनुपम तेज, जन्मजात त्रिज्ञान और लोकहितकारी महिमा की स्तुति की। उनका नाम ‘संभव’ इस कारण प्रसिद्ध हुआ कि उनके जन्म मात्र से जीवों के सुख और कल्याण की संभावना प्रकट हुई।
दीर्घकाल तक राज्यवैभव और देवोपम सुखों का उपभोग करने के बाद भगवान् संभवनाथ ने मेघों की चंचलता देखकर पुनः संसार की अनित्यता का विचार किया। उन्होंने अनुभव किया कि आयुकर्म ही जीव का वास्तविक यम है, शरीर नाशवान है, विषय विषतुल्य हैं और लक्ष्मी विद्युत् के समान चंचल है। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि केवल आत्मज्ञान और वैराग्य ही मोक्ष का मार्ग है। अतः उन्होंने राज्य त्यागकर सहस्र राजाओं सहित दीक्षा ग्रहण की और दीक्षा लेते ही मनःपर्ययज्ञान प्राप्त किया।
चौदह वर्षों तक कठोर तप, संयम और मौनपूर्वक छद्मस्थ अवस्था में रहने के पश्चात् भगवान् संभवनाथ ने शाल्मली वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ होकर चार घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त किया। ज्ञानकल्याणक के अवसर पर देवों ने महोत्सव मनाया। तत्पश्चात् उन्होंने विशाल धर्मतीर्थ की स्थापना की, जिसमें असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक, श्राविकाएँ, गणधर, केवलज्ञानी और देव सम्मिलित हुए। वे चौंतीस अतिशयों, आठ प्रातिहार्यों और दिव्यध्वनि से विभूषित होकर लोक-अलोक को प्रकाशित करते रहे।
भगवान् संभवनाथ का तेज, शुद्धता और धर्मप्रभाव चन्द्रमा से भी श्रेष्ठ कहा गया, क्योंकि उन्होंने केवल बाह्य अंधकार ही नहीं, बल्कि जीवों के आंतरिक अज्ञान का भी नाश किया। अंततः जब आयु का अंतिम समय निकट आया, तब वे सम्मेदशिखर पहुँचे, प्रतिमायोग धारण किया और चैत्र शुक्ल षष्ठी को निर्वाण प्राप्त कर सिद्धपद को प्राप्त हुए। इस प्रकार पूर्वभव के विमलवाहन राजा, फिर अहमिन्द्र देव और अंततः पंचकल्याणक सम्पन्न द्वितीय तीर्थंकर संभवनाथ भगवान् ने अनन्त जीवों के लिए मोक्षमार्ग को प्रकाशित किया।
श्लोक 1 से 12 : पूर्वभव में विमलवाहन राजा का वैराग्य और तीर्थंकर नामकर्म बन्ध
संभवनाथ भगवान् की स्तुति करते हुए वर्णन आता है कि पूर्व विदेह क्षेत्र के क्षेमपुर नगर के राजा विमलवाहन संसार की नश्वरता, आयु की क्षणभंगुरता और विषयभोगों की असारता का गहन चिंतन कर वैराग्य को प्राप्त हुए। उन्होंने राज्य पुत्र को सौंपकर स्वयंप्रभ जिनेन्द्र से दीक्षा ली, ग्यारह अंगों का अध्ययन किया और सोलह कारण भावनाओं द्वारा तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध किया। जीवनांत में वे प्रथम ग्रैवेयक के सुदर्शन विमान में महान् अहमिन्द्र देव हुए।
श्लोक 13 से 21 : अहमिन्द्र देव से संभवनाथ के गर्भ और जन्म कल्याणक तक
अहमिन्द्र रूप में दिव्य सुख भोगने के बाद वही जीव भरत क्षेत्र की श्रावस्ती नगरी में राजा दृढ़राज्य और रानी सुषेणा के यहाँ अवतीर्ण हुआ। रानी ने सोलह शुभ स्वप्न देखे और कार्तिक पूर्णिमा को भगवान् संभवनाथ का जन्म हुआ। उनके जन्म से लोक में सुख का संचार हुआ और देवों ने उनके दिव्य स्वरूप तथा जगत्-हितकारी महिमा की स्तुति की।
श्लोक 22 से 31 : जन्ममहिमा, राज्यवैभव और वैराग्य की पुनः जागृति
देवों ने संभवनाथ के तेज, ज्ञान और लोकहितकारी स्वरूप की प्रशंसा की। भगवान् दीर्घकाल तक राजवैभव भोगते रहे, परंतु मेघों की चंचलता देखकर उन्हें पुनः संसार की अनित्यता का बोध हुआ। उन्होंने समझा कि आयुकर्म ही वास्तविक मृत्युकारक है और जीव अज्ञानवश शरीर एवं विषयों में आसक्त होकर दुःख पाता है।
श्लोक 32 से 41 : दीक्षा, तप और केवलज्ञान
भगवान् ने राज्य त्यागकर पुत्र को सौंपा और सहस्र राजाओं सहित संयम ग्रहण किया। दीक्षा के साथ उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ। चौदह वर्ष तक कठोर तप एवं मौन साधना के पश्चात् शाल्मली वृक्ष के नीचे उन्होंने चार घातिया कर्मों का नाश कर केवलज्ञान प्राप्त किया और ज्ञानकल्याणक सम्पन्न हुआ।
श्लोक 42 से 54 : धर्मतीर्थ स्थापना, विशाल संघ और दिव्य प्रभाव
केवलज्ञान के बाद भगवान् संभवनाथ ने विशाल धर्मसंघ की स्थापना की जिसमें गणधर, केवलज्ञानी, अवधिज्ञानी, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ और असंख्य देव सम्मिलित थे। वे चौंतीस अतिशयों और आठ प्रातिहार्यों से विभूषित थे। उनकी दिव्यध्वनि ने मिथ्यात्व का नाश किया और वे चन्द्रमा से भी श्रेष्ठ सिद्ध हुए क्योंकि उन्होंने बाह्य और आंतरिक दोनों अंधकारों का नाश किया।
श्लोक 55 से 59 : सम्मेदशिखर पर निर्वाण और परम कल्याण
आयु पूर्ण होने पर भगवान् संभवनाथ सम्मेदाचल पहुँचे, प्रतिमायोग धारण किया और चैत्र शुक्ल षष्ठी को निर्वाण प्राप्त किया। उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्षलक्ष्मी को प्राप्त किया। पूर्वभव के विमलवाहन राजा से अहमिन्द्र और फिर पंचकल्याणक सम्पन्न तीर्थंकर बनकर उन्होंने अनंत जीवों के कल्याण का मार्ग प्रकाशित किया।
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