Hindi Translation of Uttar puran Parv 65
श्लोक 1 से 11 : राजा धनपति का वैराग्य और देवगति
अथानन्तर जो अगाध और असार संसाररूपी सागरसे पार कर देनेमें कारण हैं, अनेक राजा जिन्हें नमस्कार करते हैं और जो अत्यन्त श्रेष्ठ हैं ऐसे अरनाथ तीर्थंकरकी तुम सब लोग सेवा करो – उनकी शरणमें जाओ ।। १ ।। इस जम्बूद्वीपमें सीता नदीके उत्तर तटपर एक कच्छ नामका देश है। उसके क्षेमपुर नगरमें धनपति नामका राजा राज्य करता था। वह प्रजाका रक्षक था और लोगोंको अत्यन्त प्यारा था । पृथिवीरूपी धेनु सदा द्रवीभूत होकर उसके मनोरथ पूर्ण किया करती थी ।। २-३ ।। याचकोंको संतुष्ट करनेवाले और शत्रुओंको नष्ट करनेवाले उस राजामें ये दो गुण स्वाभाविक थे कि वह याचकोंके बिना भी त्याग करता रहता था और शत्रुओंके न रहने पर भ्री-उद्यम किया करता था ।।४।। उसके राज्यमें राजा-प्रजा सब लोग अपनी-अपनी वृत्तिके अनुसार त्रिषर्ग-का सेवन करते थे इसलिए धर्मका व्यतिक्रम कभी नहीं होता था ॥ ५ ॥ किसी एक दिन उस राजा-ने अर्हन्नन्दन तीर्थंकरकी दिव्यध्वनिसे उत्पन्न हुए श्रेष्ठधर्मरूपी रसायनका पान किया जिससे राज्य-सम्बन्धी भोगोंसे विरक्त होकर उसने अपना राज्य अपने पुत्रके लिए दे दिया और शीघ्र ही जन्म-मरणका अन्त करनेवाली जैनी दीक्षा धारण कर ली ।। ६-७ ॥ ग्यारह अङ्गरूपी महासागरके पार-गामी होकर उसने सोलह कारणभावनाओंके द्वारा तीर्थंकर नामक पुण्य कर्मका बन्ध किया । अन्तमें प्रायोपगमन संन्यासके द्वारा उसने जयन्त विमानमें अहमिन्द्र पद प्राप्त किया। वहाँ तैंतीस सागर प्रमाण उसकी आयु थी, एक हाथ ऊँचा शरीर था, द्रव्य और भावके भेदसे दोनों प्रकारकी शुक्ल लेश्याएँ थीं, वह साढ़े सोलह माहमें एक बार श्वास लेता था, और तैंतीस हजार वर्षमें एक बार मानसिक अमृतमय आहार ग्रहण करता, था। प्रवीचाररहित सुखरूपी सागरका पारगामी था, अपने अवधिज्ञानके द्वारा वह लोकनाड़ीके भीतर रहने वाले पदार्थोंके विस्तारको जानता था । ॥ ८-११ ।।
श्लोक 12 से 21 : अरनाथ भगवान् का गर्भ और जन्म कल्याणक
उसके अवधिज्ञानका जितना क्षेत्र था उतने ही क्षेत्र तक उसका प्रकाश, बल और बिक्रिया ऋद्धि थी । उसके राग-द्वेष आदि अत्यन्त शान्त हो गये थे और मोक्ष उसके निकट आ चुका था ।। १२ ।। वह साता वेदनीयके उदयसे उत्पन्न हुए उत्तम भोगोंका उपभोग करता था।इस तरह प्राप्त हुए भोगोंका उपभोग करता हुआ आयुके अन्तिम भागको प्राप्त हुआ। – वहाँ से च्युत होनेके सम्मुख हुआ ॥ १३ ॥ अथानन्तर इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें कुरुजांगल नामका देश है। उसके हस्तिनापुर नगर-
में सोमवंशमें उत्पन्न हुआ काश्यप गोत्रीय राजा सुदर्शन राज्य करता था। उसकी प्राणोंसे भी अधिक प्यारी मित्रसेना नामकी रानी थी ॥ १४-१५ ॥ जब धनपतिके जीव जयन्त विमानके अहमिन्द्रका स्वर्गसे अवतार लेनेका समय आया तब रानी मित्रप्तेनाने रत्नवृष्टि आदि देवकृत सत्कार पाकर बड़ी प्रसन्नतासे फाल्गुन कृष्ण तृतीयाके दिन रेवती नक्षत्रमें रात्रिके पिछले प्रहर सोलह स्वप्न देखे । सबेरा होते ही उसने अपने अवधिज्ञानी पतिसे उन स्वप्नोंका फल पूछा। तदनन्तर परम वैभवको धारण करनेवाली रानी पतिके द्वारा कहे हुए स्वप्नका फल सुनकर ऐसी प्रसन्न हुई मानो उसे तीन लोकका राज्य ही मिल गया हो ॥ १६-१८ ॥ उसी समय इन्द्रादि देवोंने जिसके गर्भकल्याणकका उत्सव किया है, जो अत्यन्त संतुष्ट है, मद रहित है, निरन्तर रमणीक है, सौम्य मुखवाली है, पवित्र है, उस समयके योग्य स्तुतियोंके द्वारा देवियां जिसकी स्तुति किया करती हैं, और जो मेघमालाके समान जगत्का हित करनेवाला उत्तम गर्भ धारण करती है ऐसी रानी मित्रसेनाने मगसिर शुक्ल चतुर्दशी के दिन पुष्य नक्षत्रमें तीन । ज्ञानोंसे सुशोभित उत्तम पुत्र उत्पन्न किया ।। १९-२१ ॥
श्लोक 22 से 34 : कुमारकाल, चक्रवर्ती पद और दीक्षा
उनके जन्म के समय जो उत्सव हुआ था उसका वर्णन करनेके लिए इतना लिखना ही बहुत है कि उसमें शामिल होनेके लिए अपनी-अपनी देवियों सहित समस्त उत्तम देव स्वर्ग खालीकर यहाँ आये थे ॥ २२ ॥ उस समय दीन अनाथ तथा याचक लोग सन्तोषको प्राप्त हुए थे यह कहना बहुत छोटी बात थी क्योंकि उस समय तो तीनों लोक अत्यन्त सन्तोषको प्राप्त हुए थे ।। २३ ।। श्रीकुन्थुनाथ तीर्थकरके तीर्थक बाद जब एक हजार करोड़ वर्ष कम पल्यका चौथाई भाग बीत गया था तब श्रीअरनाथ भगवान्का जन्म हुआ था। उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी । भगवान् अरनाथकी उत्कृष्टठ-श्रेष्ठतम आयु चौरासी हजार वर्षकी थी, तीस धनुष ऊँचा उनका शरीर था, सुवर्णके समान उनकी उत्तम कान्ति थी, वे लावण्यकी अन्तिम सीमा थे, सौभाग्यकी श्रेष्ठ खान थे, भगवान्को देखकर शङ्का होती थी कि ये सौन्दर्य के सागर हैं या सौन्द्रय सम्पत्तिके घर हैं, गुण इनमें उत्पन्न हुए हैं या इनकी गुणोंमें उत्पत्ति हुई है अथवा ये स्वयं गुणमय हैं-गुणरूप ही हैं। इस प्रकार लोगोंको शङ्का उत्पन्न करते हुए, बाल कल्पवृक्षकी उपमा धारण करनेवाले भगवान् लक्ष्मीके साथ-साथ वृद्धिको प्राप्त हो रहे थे ।। २४-२८ ॥ इस प्रकार कुमार अवस्थाके इकीस हजार वर्ष बीत जानेपर उन्हें मण्डलेश्वरके योग्य राज्य प्राप्त हुआ था और इसके बाद जब इतना ही काल और बीत गया तब पूर्ण चक्रवर्तीपद प्राप्त हुआ था। इस तरह भोग भोगते हुए जब आयुका तीसरा भाग बाकी रह गया तब किसी दिन उन्हें शरॠतुके मेघोंका अकस्मात् विलय हो जाना देखकर अपने जन्मको सार्थक करनेवाला आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया। उसी समय लौकान्तिक देवोंने उनके विचारोंका समर्थनकर उन्हें प्रबोधित किया और वे अरविन्दकुमार नामक पुत्रके लिए राज्य देकर देवोंके द्वारा उठाई हुई वैजयन्ती नामकी पालकीपर सवार हो सहेतुक वनमें चले गये। वहाँ तेलाका नियम लेकर उन्होंने मगसिर शुक्ला दशमीके दिन रेवती नक्षत्रमें सन्ध्याके समय एक हजार राजाओंके साथ दीक्षा धारण कर ली। दीक्षा धारण करते ही वे चार ज्ञानके धारी हो गये ॥ २९-३४॥
श्लोक 35 से 50 : केवलज्ञान, धर्मसंघ और निर्वाण
इस प्रकार तपश्चरण करते हुए वे किसी समय पारणाके दिन चक्रपुर नगरमें गये वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले राजा अपराजितने उन्हें आहार देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये। इस तरह मुनिराज अरनाथके जब छङ्गस्थ अवस्थाके सोलह वर्ष व्यतीत हो गये ॥ ३५-३६ ॥ तब वे दीक्षावनमें कार्तिक शुक्त द्वादशीके दिन रेवती नक्षत्रमें सायंकालके समय आम्रवृक्षके नीचे तेलाका नियम लेकर विराजमान हुए। उसी समय घातिया कर्म नष्टकर उन्होंने अर्हन्तपद प्राप्त कर लिया। देवोंने मिलकर चतुर्थ कल्याणकमें उनकी पूजा की ॥ ३७-३८ ॥ कुम्भार्यको आदि लेकर उनके तीस गणधर थे, छहसौ दश ग्यारह अंग चौदह पूर्वके जानकार थे, पैंतीस हजार आठ सौ पैंतीस सूक्ष्म बुद्धिको धारण करनेवाले शिक्षक थे ।। ३९ ।। अट्ठाईस सौ अवधिज्ञानी थे, इतने ही केवलज्ञानी थे, तैतालीस सौ विक्रिया-ऋद्धिको धारण करनेवाले थे, बीस सौ पचपन मनःपर्यंयज्ञानी थे ।। ४०-४१ ॥ और सोलह सौ श्रेष्ठ बादी थे। इस तरह सब मिलाकर पचासहजार मुनिराज उनके साथ थे ॥ ४२ ॥ यक्षिलाको आदि लेकर साठ हजार आर्यिकाएँ थीं, एक लाख साठ हजार श्रावक थे, तीन लाख श्राविकाएँ थीं, असंख्यात देव थे और संख्यात तिर्यश्च थे। इस प्रकार इन बारह सभाओंसे घिरे हुए अतिशय बुद्धिमान् भगवान् अरनाथने धर्मोपदेश देनेके लिए अनेक देशोंमें विहार किया। जब उनकी आयु एक माहकी बाकी रह गई तब उन्होंने सम्मेदाचलकी शिखरपर एकहजार मुनियोंके साथ प्रतिमायोग धारण कर लिया तथा चैत्र कृष्ण अमावस्याके दिन रेवती नक्षत्रमें रात्रिके पूर्वभागमें मोक्ष प्राप्त कर लिया ।।४३-४६ ।। उसी समय इन्द्रोंने आकर निर्वाणकल्याणककी पूजा की। भक्तिपूर्वक सैकड़ों स्तुतियोंके द्वारा उनकी स्तुति की, और तदनन्तर वे सब अपने-अपने स्थानोंपर चले गये ॥ ४७ ॥
जिन्होंने परम लक्ष्मी और धर्मचक्रको प्राप्त करनेकी इच्छासे पृथिवीमण्डलको सञ्चित करने-बाला अपना सुदर्शनचक्र कुम्भकारके चक्रके समान छोड़ दिया और राज्य-लक्ष्मीको घटदासी (पनहारिन) के समान त्याग दिया। तथा जो पापरूपी शत्रुका विध्वंस करनेवाले हैं ऐसे अरनाथ जिनेन्द्र भक्तिके भारसे नम्रीभूत एवं संसारसे भयभीत तुम सब भव्य लोगोंकी सदा रक्षा करें ।॥४८।। क्षुधा, तृषा, भय आदि बड़े-बड़े कर्मोंके द्वारा किये हुए क्षुधा तृषा आदि अठारहों दोषोंको उनके निमित्त कारणोंके साथ नष्टकर जिन्होंने विशुद्धता प्राप्त की थी, जो तीनों लोकोंके एक गुरु थे तथा अतिशय श्रेष्ठ थे ऐसे अठारहवें तीर्थंकर अरनाथ तुम लोगोंको शीघ्र ही मोक्ष प्रदान करें ॥ ४९ ॥ जो पहले धनपति नामके बड़े राजा हुए, फिर व्रतोंके स्वामी मुनिराज हुए, तदनन्तर स्वर्गके अग्र-भागमें सुशोभित जयन्त नामक विमानके स्वामी सुखी अहमिन्द्र हुए, फिर छहों खण्डके स्वामी होकर चौदह रत्नों और नौ निधियोंके अधिपति – चक्रवर्ती हुए तथा अन्त में तीनों लोकोंके स्वामी अरनाथ तीर्थकर हुए वे अतिशय श्रेष्ठ अठारहवें तीर्थकर अपने आश्रित रहनेवाले तुम सबको चिर-कालतक पवित्र करते रहें ।। ५० ।।
श्लोक 51 से 64 : राजा भूपाल, निदान और पुनर्जन्म
अथानन्तर – इन्हीं अरनाथ भगवान्के तीर्थमें सुभौम नामका चक्रवर्ती हुआ था। वह तीसरे जन्ममें इसी भरतक्षेत्रमें भूपाल नामका राजा था ॥ ५१ ॥ किसी समय राजा भूपाल, युद्धमें विजयकी इच्छा रखनेवाले विजिगीषु राजाओंके द्वारा हार गया। मान भंग होनेके कारण वह संसारसे इतना विरक्त हुआ कि उसने संभूत नामक गुरुके समीप जैनेश्वरी दीक्षा धारण कर ली। उस दुर्बुद्धिने तपश्चरण करते समय निदान कर लिया कि मेरे चक्रवर्तीपना प्रकट हो । उसने यह सब निदान भोगोंमें आसक्ति रखनेके कारण किया था। इस निदानसे उसने अपने तपको हृदयसे ऐसा दूषित बना लिया जैसा कि कोई विषसे दूधको दूषित बना लेता है ॥ ५२-५४ ॥ वह उसी तरह घोर तपश्चरण करता रहा। आयुके अन्त में चित्तको स्थिरकर संन्याससे मरा जिससे महाशुक्र स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ।॥ ५५ ॥ वहाँ सोलह सागर प्रमाण आयुको धारण करनेवाला वह देव सुखसे निवास करने लगा । इधर इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें अनेक गुणोंसे सहित एक कोशल नामका देश है। उसके अयोध्या नगरमें इक्ष्वाकुवंशी राजा सहस्रबाहु राज्य करता था। हृदयको प्रिय लगनेवाली उसकी चित्रमती नामकी रानी थी। वह चित्रमती कन्याकुब्ज देशके राजा पारतकी पुत्री थी । उत्तम पुण्यके उद्यसे उसके कृतवीराधिप नामका पुत्र हुआ ।। ५६-५८ ॥ जो दिन प्रतिदिन बढ़ने लगा। इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और कही जाती है जो इस प्रकार है- राजा सहस्त्रबाहुके काका शतबिन्दुसे उनकी श्रीमती नामकी स्त्रीके जमदग्नि नामका पुत्र उत्पन्न हुआ था। श्रीमती राजा पारतकी बहिन थी । कुमार अवस्थामें ही जमदग्निकी माँ मर गई थी इसलिए विरक्त होकर वह तापस हो गया और पञ्चाग्नि तप तपने लगा। इसीसे सम्बन्ध रखनेवाली एक कथा और है। एक दृढ़माही नामका राजा था। उसकी हरिशर्मा नामके ब्राह्मणके साथ अखण्ड मित्रता थी। इस प्रकार उन दोनोंका समय बीतता रहा। किसी एक दिन दृढ़ग्राही राजाने जैन तप धारण कर. लिया और हरिशर्मा ब्राह्मणने भी तापसके व्रत ले लिये। हरिशर्मा ब्राह्मण आयुके अन्तमें मरकर ज्योतिर्लोकमें उत्पन्न हुआ-ज्यौतिषी देव हुआ और दृढ़ग्राही सौधर्म स्वर्गमें देव हुआ। उसने अवधिज्ञानरूपी नेत्रसे जाना कि हमारा मित्र हरिशर्मा ब्राह्मण मिध्यात्वके कारण ज्योतिष लोकमें उत्पन्न हुआ है अतः वह उसे समीचीन जैनधर्म धारण कराने के लिए आया ।। ५९-६४ ।।
श्लोक 65 से 83 : जमदग्नि तापस का मोह और पतन
हरिशर्माके जीवको देख-कर दृढ़ग्राहीके जीवने कहा कि तुम मिध्यात्वके कारण इस तरह निन्द्यपर्यायमें उत्पन्न हुए हो और मैं सम्यक्त्वके कारण उत्कृष्ट देवपर्यायको प्राप्त हुआ हूं ।। ६५ ॥ इसलिए तुम मोक्षका मार्ग जो सम्यग्दर्शन है उसे धारण करो। जब दृढ़ग्राहीका जीव यह कह चुका तब हरिशर्माके जीवने कुछ संशय रखकर उससे पूछा कि तापसियोंका तप अशुद्ध क्यों है ? उसने भी कहा कि तुम पृथिवी तलपर चलो मैं सब दिखाता हूं। इस प्रकार सलाहकर दोनोंने चिड़ा और चिड़ियाका रूप बना लिया ।। ६६-६७ ।। पृथिवीपर आकर वे दोनों ही जमदग्नि मुनिकी बड़ी-बड़ी दाँडी और मूँछमें रहने लगे। वहाँ कुछ समयतक ठहरनेके बाद मायाको जाननेवाला सम्यग्दृष्टि चिड़ाका जीव, चिड़ि-याका रूप धारण करनेवाले ज्योतिषी देवसे बोला कि हे प्रिये ! मैं इस दूसरे वनमें जाकर अभी वापिस आता हूं मैं जब तक आता हूँ तबतक तुम यहीं ठहरकर मेरी प्रतीक्षा करना। इसके उत्तर में चिड़ियाने कहा कि मुझे तेरा विश्वास नहीं है यदि तू जाता ही है तो सौगन्ध दे जा ॥ ६८-७० ॥ तब वह चिड़ा कहने लगा कि बोल तू पाँच पापोंमेंसे किप्से चाहती है मैं तुझे उसीकी सौगन्ध दे जाऊँगा ।। ७१ ॥ उत्तरमें चिड़िया कहने लगी कि पाँच पापोंमेंसे किसीमें मेरी इच्छा नहीं है। तू यह सौगन्ध दे कि यदि मैं न आऊँ तो इस तापसकी गतिको प्राप्त होऊं ।॥ ७२ ॥ हे प्रिय ! यदि तू मुझे यह सौगन्ध देगा तो मैं तुझे अन्यत्र जानेके लिए छोहूँगी अन्यथा नहीं। चिड़ियाकी बात सुनकर चिड़ाने कहा कि तू यह छोड़कर और जो चाहती है सो कह, मैं उसकी सौगन्ध दूँगा। इस प्रकार चिड़ा और चिड़ियाका वार्तालाप सुनकर वह तापस क्रोधसे संतप्त हो गया, उसकी आँखें घूमने लगीं, उसने क्रूरता वश दोनों पक्षियोंको मारनेके लिए हाथसे मजबूत पकड़ लिया, वह कहने लगा कि मेरे कठिन तपसे जो भावी लोक होने वाला है उसे तुम लोगोंने किस कारणसे पसन्द नहीं किया ? यह कहा जाय । तापसके ऐसा कह चुकनेपर चिड़ाने कहा कि आप क्रोध न करें इससे आपकी सज्जनता नष्ट होती है ।। ७३-७६ ॥ क्या थोड़ी सी जामिनकी छाँचसे दूध नष्ट नहीं हो जाता ? यद्यपि आप चिरकालसे घोर तपश्चरण कर रहे हैं तो भी आपकी दुर्गतिका कारण क्या है ? सो सुनिये ।। ७७ ।। आप जो कुमार कालसे ही ब्रह्मचर्यका पालन कर रहे हैं वह संतानका नाश करनेके लिए है। संतानका घात करनेवाले पुरुषकी नरकके सिवाय दूसरी कौन-सी गति हो सकती है ? ।। ७८ ।। अरे ‘पुत्र रहित मनुष्यकी कोई गति नहीं होती’ यह आर्षवाक्य – वेदवाक्य क्या आपने नहीं सुना ? यदि सुना है तो फिर बिना विचार किये ही क्यों इस तरह दुर्बुद्धि होकर क्लेश उठा रहे हैं ? ॥ ७९ ॥ उसके मन्द वचन सुनकर उस तापसने उसका वैसा ही निश्चय कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि स्त्रीजनोंमें आसक्त रहनेवाले मनुष्योंके अज्ञान तपकी यही भूमिका है ॥ ८० ॥ ‘ये दोनों पक्षी मेरा उपकार करनेवाले हैं’ ऐसा समझकर उसने दोनों पक्षियोंको छोड़ दिया। इस प्रकार उन दोनों देवोंके द्वारा ठगाया हुआ दुर्बुद्धि तापस कन्याकुब्ज नगरके राजा पारतकी ओर चला। वह मानो इस बातकी घोषणा ही करता जाता था कि अज्ञान-पूर्ण वैराग्य स्थिर नहीं रहता। वहाँ अपने मामा पारतको देखकर उस निर्लज्जने अपने आकार मात्रप्ते ही यह प्रकट कर दिया कि मैं यहाँ कन्याके लिए ही आया हूँ। राजा पारतने उसकी परीक्षाके लिए दो आसन रक्खे – एक रागरहित और दूसरा रागसहित । दोनों आसनोंको देखकर वह रागसहित आसन पर बैठ गया ॥ ८१-८३ ॥
श्लोक 84 से 92 : रेणुकी से विवाह और पुत्रोत्पत्ति
उसने अपने आनेका वृत्तान्त राजाके लिए बतलाया । उसे सुनकर राजा पारत बड़े खेदसे कहने लगा कि इस अज्ञानको धिकार हो, धिक्कार हो ।॥ ८४ ॥ फिर राजाने कहा कि मेरे सौ पुत्रियाँ हैं इनमेंसे जो तुझे चाहेगी वह तेरी हो जायगी । राजाके ऐसा कहनेपर जमदग्नि कन्याओंके पास गया। उनमेंसे कितनी ही कन्याएँ जिसका शरीर तपसे जल रहा है ऐसे जमदग्निको अधजला मुर्दा मानकर ग्लानिसे भाग गई और कितनी ही भयसे पीड़ित होकर चली गई ॥ ८५-८६ ।। लज्जासे पीड़ित हुआ वह मूर्ख तापस उन सब कन्याओंको छोड़कर धूलिमें खेलनेवाली एक छोटी-सी लड़कीके पास गया और केलाका फल दिखाकर कहने लगा कि क्या तू मुझे चाहती है ? लड़कीने कहा कि हाँ चाहती हूँ। तापसने जाकर राजासे कहा कि यह लड़की मुझे चाहती है। इस प्रकार वह लड़कीको लेकर वनकी ओर चला गया । पद-पद पर लोग उसकी निन्दा करते थे, वह अत्यन्त दीन तथा मूर्ख था ॥ ८७-८९ ॥ जमदग्निने उस लड़कीका रेणुकी नाम रखकर उसके साथ विवाह कर लिया। उसी समयसे ऐसी प्रवृत्ति-स्त्रियोंके साथ तपश्चरण करना ही धर्म है यह कहावत प्रसिद्ध हुई है ॥९०॥ जिस प्रकार श्रद्धा विशेषके मतिज्ञान और श्रुतज्ञान ये दो ज्ञान उत्पन्न होते हैं अथवा किसी मुनिराजके तपके बाह्यतप और आभ्यन्तर तप ये दो भेद प्रकट होते हैं उसी प्रकार जमनिके इन्द्र और श्वेतराम नामके दो स्तुत्य पुत्र उत्पन्न हुए। ये दोनों ही पुत्र ऐसे जान पड़ते थे मानो लोगोंको प्रिय काम और अर्थ ही हों अथवा मिले हुए नय और पराक्रम ही हों ॥ ९१-९२॥
श्लोक 93 से 104 : रेणुकी को सम्यक्त्व की प्राप्ति और कामधेनु विद्या
इस प्रकार उन दोनोंका काल सुखसे बीत रहा था। एक दिन अरिश्ञ्जय नाम के मुनि जो रेणुकी के बड़े भाई थे उसे देखनकी इच्छासे उसके घर आये ॥ ९३ ॥ रेणुकीने विनयपूर्वक मुनिके दर्शन किये। तदनन्तर पतिसे प्रेरणा पाकर उसने मुनिसे पूछा कि हे पूज्य ! मेरे विवाहके समय आपने मेरे लिए क्या धन दिया था ? ॥ ९४ ॥ सो कहो, रेणुकीके ऐसा कहने पर मुनिने कहा कि उस समय मैंने कुछ भी नहीं दिया था। हे भद्रे ! अब ऐसा धन देता हूँ जोकि तीनों लोकोंमें दुर्लभ है। तू उसे ग्रहण कर। उस धनके द्वारा तू सुखोंकी परम्परा प्राप्त करेगी। यह कहकर उन्होंने व्रतसे संयुक्त तथा शीलकी माला उज्ज्वल सम्यक्त्वरूपी धन प्रदान किया और काललब्धिके समान उनके वचनोंसे प्रेरित हुई रेणुकीने कहा कि मैंने आपका दिया सम्यग्दर्शन रूपी धन ग्रहण किया। मुनिराज इस बातसे बहुत ही संतुष्ट हुए । उन्होंने मनोवांछित पदार्थ देनेवाली कामधेनु नामकी विद्या और मन्त्र सहित एक फरशा भी उसके लिए प्रदान किया ॥ ९५-९८ ॥ किसी दूसरे दिन पुत्र कृतवीरके साथ उसका पिता सहस्र-बाहु उस तपोवनमें आया। भाई होनेके कारण जमदग्निने सहस्त्रबाहुसे कहा कि भोजन करके जाना चाहिये। यह कह जमदग्निने उसे भोजन कराया। कृतवीरने अपनी माँकी छोटी बहिन रेणुकीसे पूछा कि भोजनमें ऐसी सामग्री तो राजाओंके घर भी नहीं होती फिर तपोवनमें रहनेवाले आप लोगोंके लिए यह सामग्री कैसे प्राप्त होती है ? उत्तर में रेणुकीने कामधेनु विद्याकी प्राप्ति आदिका सब समाचार सुना दिया। मोहके उदयसे आविष्ट हुए उस अकृतज्ञ कृतवीरने रेणुकीसे वह कामधेनु विद्या माँगी। रेणुकीने कहा कि हे तात ! यह कामधेनु तुम्हारे वर्णाश्रमोंके गुरु जमनिकी होम-धेनु है अतः तुम्हारी यह याचना उचित नहीं है। रेणुकीके इतना कहते ही उसे क्रोध आ गया । वह क्रोधके वेगसे कहने लगा कि संसारमें जो भी श्रेष्ठ धन होता है वह राजाओंके योग्य होता है। कन्द मूल तथा फल खानेवाले लोगोंके द्वारा ऐसी कामधेनु भोगने योग्य नहीं हो सक्ती ॥ ९९-१०४ ॥
श्लोक 105 से 117 : जमदग्नि की मृत्यु का प्रतिशोध और सुभौम का जन्म
ऐसा कह कर वह कामधेनुको जबरदस्ती लेकर जाने लगा तब जमदग्नि ऋषि रोकनेके लिए उसके सामने खड़े हो गये। कुमार्गगामी राजा कृतवीर जमदग्निको मारकर तथा अपना मार्ग उल्लंघकर नगरकी ओर चला गया। इधर कृशोदरी रेणुकी पतिकी मृत्युसे रोने लगी । तदनन्तर उसके दोनों पुत्र जब फूल, कन्द, मूल तथा फल आदि लेकर वनसे लौटे तो यह सब देख आश्चर्यसे पूछने लगे कि यह क्या है ? ॥ १०५-१०६ ।। सब बातको ठीक-ठीक समझ कर उन्हें क्रोध आ गया । स्वाभाविक पराक्रमको धारण करनेवाले दोनों भाइयोंने पहले तो शोकसे भरी हुई माताको युक्तिपूर्ण वचनोंसे संतुष्ट किया फिर तीक्ष्ण फरशाको ध्वजा बनानेवाले, यमतुल्य दोनों भाइयोंने परस्पर कहा कि गायके ग्रहणमें यदि मरण भी हो जाय तो वह पुण्यका कारण है ऐसा शास्त्रोंमें सुना जाता है अथवा यह बात रहने दो, पिताके मरणको कौन सह लेगा ? ऐसा कहकर दोनों ही भाई चल पड़े । स्नेहसे भरे हुए समस्त मुनिकुमार उनके साथ गये ।। १०७-११० ।। राजा सहस्र-बाहु और कृतवीर जिस मार्गसे गये थे उसी मार्गपर चलकर वे अयोध्यानगरके समीप पहुँच गये। वहाँ कृतवीरके साथ संग्रामकर उन्होंने राजा सहस्त्रबाहुको मार डाला और सायंकालके समय नगर-में प्रवेश किया सो ठीक ही है क्योंकि जो अकार्यमें प्रवृत्ति करते हैं उनके लिए हलाहल विषके समान भयंकर पापोंके परिपाक असह्य दुःखोंकी परम्परा रूप फल शीघ्र ही प्रदान करते हैं। इधर रानी चित्रमतीके बड़े भाई शाण्डिल्य नामक तापसको इस बातका पता चला कि परशुराम, सहस्त्रबाहु-की समस्त सन्तानको नष्ट करनेके लिए उत्सुक है और रानी चित्रमती, निदानरूपी विषसे दूर्षित तपके कारण महाशुक्र स्वर्गमें उत्पन्न हुए राजा भूपालके जीव स्वरूप देवके द्वारा गर्भवती हुई है अर्थात् उक्त देव रानी चित्रमतीके गर्भमें आया है। ज्यों ही शाण्डिल्यको इस बातका पता चला त्यों ही वह बहिन चित्रमतीको लेकर अज्ञात रूपसे चल पड़ा और सुबन्धु नामक निर्मन्थ मुनिके पास जाकर उसने सब समाचार कह सुनाये । ‘हे आर्य ! मेरे मठमें कोई नहीं है इसलिए मैं वहाँ जाकर वापिस आऊंगा। जब तक मैं वापिस आऊं तब तक यह देवी यहाँ रहेगी’ यह कहकर वह चित्रमती-को सुबन्धु मुनिके पास छोड़कर अन्यत्र चला गया ।। १११-११७।।
श्लोक 118 से 131 सुभौम का पालन-पोषण और शत्रु की भविष्यवाणी
इधर रानी चित्रमतीने पुत्र उत्पन्न किया। यह बालक भरत क्षेत्रका भावी चक्रवर्ती है यह विचारकर वन-देवताओंने उसे शीघ्र ही उठा लिया। इस प्रकार वन-देवियाँ जिसकी रक्षा करती हैं ऐसा वह बालक धीरे-धीरे बढ़ने लगा ।। ११८-११९ ॥ जब कुछ दिन व्यतीत हो गये तब एक दिन रानीने मुनिसे पूछा कि हे स्वामिन् ! यह बालक पृथिवीका आश्लेषण करता हुआ उत्पन्न हुआ था अतः अनुग्रह करके इसके शुभ-अशुभका निरूपण कीजिये। इस प्रकार रानीके कहने पर मुनि कहने लगे कि हे अम्ब ! यह बालक सोलहवें वर्षमें अवश्य ही चक्रवर्ती होगा और चक्रवर्ती होनेका यह चिह्न होगा कि यह बालक अग्निसे जलते हुए चूल्हेके ऊपर रखी कढ़ाईके घीके मध्यमें स्थित गरम गरम पुओंको निकालकर खा लेगा। इसलिए तू किसी प्रकारका भय मत कर । इस-प्रकार दयासे परिपूर्ण सुबन्धु मुनिने दुःखिनी रानी चित्रमतीको अत्यन्त सुखी किया । तदनन्तर बड़ा भाई शाण्डिल्य नामका तापस आकर उस चित्रमतीको अपने घर ले गया ।
यह बालक पृथिवीको छूकर उत्पन्न हुआ था इसलिये शाण्डिल्यने बड़ा भारी उत्सव कर प्रेमके साथ उसका सुभौम नाम रक्खा ॥ १२०-१२५ ॥ वहाँ पर वह उपदेशके अनुसार निरन्तर प्रयोग सहित समस्त शास्त्रोंका अभ्यास करता हुआ गुप्तरूपसे बढ़ने लगा ॥ १२६ ॥ इधर जिनका उम्र पराक्रम बढ़ रहा है ऐसे रेणुकीके दोनों पुत्रोंने इक्कीस वार क्षत्रिय वंशको निर्मूल नष्ट किया ॥ १२७ ॥ पिताके मारे जानेसे जिन्होंने वैर बाँध लिया है ऐसे उन दोनों भाइयोंने अपने हाथसे मारे हुए समस्त राजाओंके शिरोंको एकत्र रखनेकी इच्छासे पत्थरके खम्भोंमें संगृहीतकर रक्खा था ॥ १२८ ॥ इस तरह दोनों भाई मिलकर समस्त पृथिवीकी राज्यलक्ष्मीका अच्छी तरह उपभोग करते थे । किसी एक दिन निमित्तकुशल नामके निमित्तज्ञानीने फरशाके स्वामी राजा इन्द्ररामसे कहा कि आपका शत्रु उत्पन्न हो गया है इसका प्रतिकार कीजिये। इसका विश्वास कैसे हो ? यदि आप यह जानना चाहते हैं तो मैं कहता हूं। मारे हुए राजाओंके जो दांत आपने इकट्ठे किये हैं वे जिसके लिए भोजन रूप परिणत हो जायेंगे वही तुम्हारा शत्रु होगा ॥ १२९-१३१ ॥
श्लोक 132 से 143 : सुभौम की पहचान और परशुराम की चिंता
निमित्त ज्ञानीका कहा हुआ सुनकर परशुरामने उसका चित्तमें विचार किया और उत्तम भोजन करानेवाली दानशाला खुलवाई ।। १३२ ।। साथमें यह घोषणा करा दी कि जो भोजनाभिलाषी यहाँ आवें उन्हें पात्रमें रक्खे हुए दाँत दिखलाकर भोजन कराया जावे। इस प्रकार शत्रुकी परीक्षाके लिए वह प्रतिदिन अपने नियोगियों- नौकरोंके द्वारा अनेक पुरुषोंको भोजन कराने लगा ॥ १३३-१३४ ॥ इधर सुभौमने अपनी मातासे अपने पिताके मरनेका समाचार जान लिया, वास्तवमें उसका चक्र वर्तीपना प्राप्त होनेका समय आ चुका था, अतिशय निमित्तज्ञानी सुबन्धु मुनिके कहे अनुसार उसे अपने गुप्त रहनेका भी सब समाचार विदित हो गया अतः वह परिव्राजकका वेष रखकर अपने रहस्यको समझनेवाले राजपुत्रोंके समुहके साथ अयोध्या नगरकी ओर चल पड़ा सो ठीक ही है क्योंकि कल्याणकारी दैव भाग्यशाली पुरुषोंको समय पर प्रेरणा दे ही देता है ॥ १३५-१३७ ।। उस
समय अयोध्या नगरमें रहनेवाले देवता बड़े जोरसे रोने लगे, पृथिवी काँप उठी और दिनमें तारे आदि दिखने लगे ।। १३८ ॥ सुभौम कुमार भोजन करनेके लिए जब परशुरामकी दानशालामें पहुँचे तो वहांके कर्मचारियोंने बुलाकर उन्हें उच्च आसनपर बैठाया और मारे हुए राजाओंके संचित दाँत दिखलाये परन्तु सुभौमके प्रभावसे वे सब दाँत शालि चावलोंके भातरूपी हो गये। यह सब देखकर वहांके परिचारकोंने राजाके लिए इसकी सूचना दी। राजाने भी ‘उसे पकड़कर लाया जावे’ यह कहकर मजबूत नौकरोंको नेजा। अत्यन्त क्रूर प्रकृतिवाले भृत्योंने सुभौमके पास जाकर कहा कि तुम्हें राजाने बुलाया है अतः शीघ्र चलो। सुभौमने उत्तर दिया कि मैं तुम लोगोंके समान इससे नौकरी नहीं लेता फिर इसके पास क्यों जाऊँ ? तुम लोग जाओ’ ऐसा कहकर उसने उनकी तर्जना की, उसके प्रभावसे वे सब नौकर भयरूपी ज्वरसे ग्रस्त हो गये और सब यथास्थान चले गये ॥ १३९-१४३ ।।
श्लोक 144 से 151 : परशुराम का वध और सुभौम का चक्रवर्ती पद
यह सुनकर परशुराम बहुत कुपित हुआ। वह युद्धके सब साधन तैयार कर आ गया । उसे आया देख सुभौम भी उसके सामने गया ॥ १४४ ॥ परशुरामने उसके साथ युद्ध करनेके लिए अपनी सेनाको आज्ञा दी। परन्तु भरतक्षेत्रके अधिपति जिस व्यन्तरदेवने जन्मसे लेकर सुभौमकुमारकी रक्षा की थी उसने उस समय भी उसकी रक्षा की अतः परशुरामकी सेना उसके सामने नहीं ठहर सकी। यह देखकर परशुरामने सुभौमकी ओर स्वयं अपना हाथी बढ़ाया परन्तु उसी समय सुभौमके भी एक गन्धराज-मदोन्मत्त हाथी प्रकट हो गया। यही नहीं, एक हजार देव जिसकी रक्षा करते हैं और जो चक्रवर्तीपनाका साधन है ऐसा देवोपनीत चक्ररत्न भी पास ही प्रकट हो गया सो ठीक ही है क्योंकि भाग्यके सन्मुख रहते हुए क्या नहीं होता ? जिस प्रकार पूर्वाचल पर सूर्य आरूढ़ होता है उसी प्रकार उस गजेन्द्रपर आरूढ़ होकर सुभौमकुमार निकला। वह हजार आरे-वाले चक्ररत्नको हाथमें लेकर बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था। उसे देखकर परशुराम बहुत ही कुपित हुआ और सुभौमको मारनेके लिए सामने आया ।। १४५-१४९ ॥ सुभौम कुमारने भी चक्र-द्वारा उसे परलोक भेज दिया – मार डाला तथा वाकी बची हुई सेनाके लिए उसी समय अभय-घोषणा कर दी ।। १५० ।।
श्री अरनाथ तीर्थंकरके बाद दो सौ करोड़ बत्तीस वर्ष व्यतीत हो जानेपर सुभौम चक्रवर्तीउत्पन्न हुआ था ।। १५१ ॥
श्लोक 152 से 161 : सुभौम का वैभव और रसोइये का वैर
यह सुभौम समस्त शत्रओंको नष्ट करनेवाला था और चक्रवर्तियोंमें आठवाँ चक्रवर्ती था। उसकी साठ हजार वर्षकी आयु थी, अट्ठाईस धनुष ऊँचा शरीर था, सुवर्णके समान उसकी कान्ति थी, वह लक्ष्मीमान् था, इक्ष्वाकु वंशका सिंह था- शिरोमणि था, अत्यन्त स्पष्ट दिखनेवाले चक्र आदि शुभ लक्षणोंसे सुशोभित था ॥ १५२-१५३ ।। तदनन्तर बाकीके रत्न तथा नौ निधियों भी प्रकट हो गई इस प्रकार छह खण्डका आधिपत्य पाकर वह चक्रवर्तीके रूपमें प्रकट हुआ ।। १५४ ।। जिस प्रकार इन्द्र स्वर्गमें निरन्तर दिव्य भोगोंका उपभोग करता रहता है उसी प्रकार सुभौम चक्रवर्ती भी चक्रवर्ती पद्में प्राप्त होने योग्य दश प्रकारके भोगोंका चिरकाल तक उपभोग करता रहा ।। १५५ ।। सुभौमका एक अमृतरसायन नामका हितैषी रसोइया था उसने किसी दिन बड़ी प्रसन्नतासे उसके लिए रसायना नामकी कढ़ी परोसी ।। १५६ ॥ सुभौमने उस कढ़ीके गुणोंका विचार तो नहीं किया, सिर्फ उसका नाम सुनने मात्रसे वह कुपित हो गया। इसीके बीच उस रसोइयाके शत्रुने राजाको उल्टी प्रेरणा दी जिससे क्रोधवश उसने उस रसोइयाको दण्डित किया। इतना अधिक दण्डित किया कि वह रसोइया उस दण्डसे म्रियमाण हो गया। उसने अत्यन्त क्रुद्ध होकर निदान किया कि मैं इस राजाको अवश्य मारूँगा। थोड़ेसे पुण्यके कारण वह भरकर ज्योतिर्लोकमें विभङ्गावधिज्ञानरूपी नेत्रोंको धारण करनेवाला देव हुआ। पूर्व वैरका स्मरण कर वह क्रोधवश राजाको मारनेकी इच्छा करने लगा ॥ १५७-१५९ ॥ उसने देखा कि यह राजा जिह्वाका लोभी है अतः वह एक व्यापारीका वेष रख मीठे-मीठे फल देकर प्रतिदिन राजाकी सेवा करने लगा ।। १६० ॥ किसी एक दिन उस देवने कहा कि महाराज ! वे फल तो अब समाप्त हो गये । राजाने कहा कि यदि समाप्त हो गये तो फिरसे जाकर उन्हीं फलोंको ले आओ ।। १६१ ।।
श्लोक 162 से 171 : रसना-लोभ और सुभौम का पतन
उत्तरमें देवने कहा कि वे फल नहीं लाये जा सकते। पहले तो मैंने उस वनकी स्वामिनी देवीकी आराधना कर कुछ फल प्राप्त कर लिये थे ॥ १६२ ।। यदि आपकी उन फलोंमें आसक्ति है – आप उन्हें अधिक पसन्द करते हैं तो आप मेरे साथ वहाँ स्वयं चलिये और इच्छानुसार उन फलोंको खाइये ।।१६३॥ राजाने उसके मायापूर्ण वचनोंका विश्वास कर उसके साथ जाना स्वीकृत कर लिया सो ठीक ही है क्योंकि जिनका पुण्य क्षीण हो जाता है उनकी विचार-शक्ति नष्ट हो जाती है ।। १६४ ।। यद्यपि मन्त्रियोंने उस राजाको रोका था कि आप मत्स्यकी तरह रसना इन्द्रियके लोभी हो यह राज्य छोड़-कर क्यों नष्ट होते हो तथापि उस मूर्खने एक न मानी। वह उनके वचन उल्लंघन कर जहाज द्वारा समुद्रमें जा घुसा। उसी समय उसके घरसे जिनमें प्रत्येककी एक-एक हजार यक्ष रक्षा करते थे ऐसे समस्त रत्न निधियोंके साथ-साथ घरसे निकल गये। यह जानकर वैश्यका वेष रखनेवाला शत्र भूतदेव अपने शत्रु राजाको समुद्रके बीचमें ले गया ।। १६५-१६७ ।। वहाँ ले जाकर उस दुष्टने पहले जन्मका अपना रसोइयाका रूप प्रकट कर दिखाया और अनेक दुर्वचन कह कर पूर्वबद्ध, वैरके संस्कारसे उसे विचित्र रीतिसे मार डाला ॥ १६८ ॥ सुभौम चक्रवर्ती भी अन्तिम समय रौद्रध्यानसे मर कर नरकगतिमें उत्पन्न हुआ सो ठीक ही है क्योंकि दुर्बुद्धिसे क्या नहीं होता है ? ।। १६९ ।। सहस्रबाहु लोभ करनेसे अपने पुत्रके साथ-साथ तिर्यश्च गतिमें गया और हिंसामें तत्पर रहनेवाले जमदग्नि ऋषिके दोनों पुत्र अधोगति – नरकगतिमें उत्पन्न हुए ।। १७० ॥ इसीलिए बुद्धिमान् लोग इन राग-द्वेष दोनोंको छोड़ देते हैं क्योंकि इनके त्यागसे ही विद्वान् पुरुष वर्तमानमें परमपद प्राप्त करते हैं, भूतकालमें प्राप्त करते थे और आगामी कालमें प्राप्त करेंगे ॥ १७१ ॥
श्लोक 172 से 184 : सुभौम का पूर्वभव और पुण्डरीक–निशुम्भ युद्ध
देखो, आठवाँ चक्रवर्ती सुभौम यद्यपि सिंहके समान एक था- अकेला ही था तथापि वह समस्त पृथिवीका स्वामी हुआ। उसने अपने पिताका वध करनेवाले जमदग्निके दोनों पुत्रोंको मारकर अपनी कीर्तिसे समस्त दिशाएँ उज्ज्वल कर दी थीं किन्तु स्वयं दुर्नीतिके वश पड़कर नरकमें उत्पन्न हुआ था ।।१७२।। सुभौम चक्रवर्तीका जीव पहले तो भूपाल नामका राजा हुआ फिर असह्य तप-तपकर महाशुक्र स्वर्गमें सोलह सागरकी आयुवाला देव हुआ। वहाँसे च्युत होकर परशुरामको मारनेवाला सुभौम नामका सकल चक्रवर्ती हुआ और अन्तमें नरकका अधिपति हुआ ॥ १७३ ॥
अथानन्तर इन्हींके समय नन्क्षेिण बलभद्र और पुण्डरीक नारायण ये दोनों ही राजपुत्र हुए हैं। इनमें से पुण्डरीकका जीव तीसरे भवमें सुकेतुके आश्रयसे शल्य सहित तप कर आयुके अन्तमें पहले स्वर्गमें देव हुआ था, वहाँसे च्युत होकर सुभौम चक्रवर्तीके बाद छह सौ करोड़ वर्ष बीत जाने
पर इसी भरत क्षेत्र सम्बन्धी चक्रपुर नगरके स्वामी इक्ष्वाकुवंशी राजा बरसेनकी लक्ष्मीमती रानीसे पुण्डरीक नामका पुत्र हुआ था तथा इन्हीं राजाकी दूसरी रानी वैजयन्तीसे नन्दिषेण नामका बलभद्र उत्पन्न हुआ था। उन दोनोंकी आयु छप्पन हजार वर्षकी थी, शरीर छब्बीस धनुषः ऊँचा था, दोनों की आयु नियत थी और अपने तपसे सञ्चित हुए पुण्यके कारण उन दोनोंकी आयुका काल सुखसे व्यतीत हो रहा था ।॥ १७४-१७८ ॥ किसी एक दिन इन्द्रपुरके राजा उपेन्द्रसेनने अपनी पद्मावती नामकी पुत्री पुण्डरीकके लिए प्रदान की ।। १७९ ॥ अथानन्तर पहले भवमें जो सुकेतु नामका राजा था वह अत्यन्त अहङ्कारी दुराचारी और पुण्डरीकका शत्रु था। वह अपने द्वारा उपार्जित कर्मोंके अनुसार अनेक भवोंमें घूमता रहा। अन्तमें उसने क्रम-क्रमसे कुछ पुण्यका सञ्चय किया था उसके अनुरोधसे वह पृथिवीको वश करनेवाला चक्रपुरका निशुम्भ नामका अधिपति हुआ। उसकी आभा ग्रीष्म ऋतुके सूजेके मण्डलके समान थी। वह इतना तेजस्वी था कि दूसरेके तेजको बिलकुल ही सहन नहीं करता था। जब उसने पुण्डरीक और पद्मावतीके विवाहका समाचार सुना तो वह बहुत ही कुपित हुआ। उसने सब सेना तैयार कर ली, वह शत्रुओं को मारने वाला था, नारकियों से भो कहीं अधिक निर्दय था, और अखण्ड पराक्रमी था। पुण्डरीकको मारनेकी इच्छासे वह चल पड़ा। जिसका तेज निरन्तर बढ़ रहा है ऐसे पुण्डरीकके साथ उस निशुम्भने चिरकाल तक बहुत प्रकारका युद्ध किया और अन्तमें उसके चक्ररूपी वज्रके घातसे निष्प्राण होकर वह अधोगतिमें गया-नरकमें जाकर उत्पन्न हुआ ।। १८०-१८४ ॥
श्लोक 185 से 192: नन्दिषेण और पुण्डरीक का अंतिम परिणाम
सूर्य चन्द्रमाके समान अथवा मिले हुए दो लोकपालोंके समान वे दोनों अपनी प्रभासे दिङ्मण्डलको व्याप्त करते हुए चिरकाल तक पृथिवीका पालन करते रहे ।। १८५ ॥ वे दोनों ही भाई बिना बाँटी हुई लक्ष्मीका उपभोग करते थे, परस्परमें परम प्रीतिको प्राप्त थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो किसी एक मनोहर विषयको देखते हुए अलग-अलग रहनेवाले दो नेत्र ही हों ।। १८६ ॥ उन दोनोंकी राज्यसे उत्पन्न हुई तृप्ति, तीन भवसे चले आये पारस्परिक प्रेमसे उत्पन्न होनेवाली तृप्तिके एक अंशको भी नहीं प्राप्त कर सकी थी। भावार्थ -उन दोनोंका पारस्परिक प्रेम राज्य-प्रेमसे कहीं अधिक था ।।१८७॥ पुण्डरीकने चिरकाल तक भोग भोगे और उनमें अत्यन्त आसक्तिके कारण नरककी भयंकर आयुका बन्ध कर लिया। वह बहुत आरम्भऔर परिग्रहका धारक था, अन्तमें रौद्र ध्यानके कारण उसकी मिथ्यात्व रूप भावना भी जागृत हो उठी जिससे मर कर वह पापोदयसे तमःप्रभा नामक छठवें नरकमें प्रविष्ट हुआ ॥ १८८-१८९ ॥ उसके वियोगसे नन्दिक्षेण बलभद्रको बहुत ही वैराग्य उत्पन्न हुआ उससे प्रेरित हो उसने शिवघोष नामक मुनिराजके पास जाकर संयम धारण कर लिया ॥ १९० ॥ उसने निर्द्वन्द्व होकर बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारका शुद्ध तपञ्चरण किया और कर्मोंकी मूलोत्तर प्रकृतियोंका नाश कर मोक्ष प्राप्त किया ॥ १९१ ॥ ये दोनों ही तीसरे भवमें राजपुत्र थे, फिर पहले स्वर्गमें देव हुए, तदनन्तर एक तो नन्दिषेण बलभद्र हुआ और दूसरा निशुम्भ प्रतिनारायणका शत्रु पुण्डरीक हुआ । यह तीन खण्डके राजाओं- नारायणोंमें छठवाँ नारायण था ॥ १९२ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रह में अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायणके पुराणका वर्णन करनेवाला पैंसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।
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आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena