धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 122 to 130
श्लोक ( Shlok ) 122 – 126
क्षमावान् क्ष्माविभागो वा वारि वा श्रिततापनुत् । ‘गिरीश इव निःकम्पो निःसङ्गः परमाणुवत् ॥ १२२॥निर्लेपोऽम्बुदमार्गो वा गम्भीरो वाऽऽपगापतिः । शशीव सर्वसंह्लादी भानुमानिव अभास्वरः ॥ १२३ ॥ बाह्याभ्यन्तरसंशुद्धः सुधौतकलधौतवत् । आदर्शवत्समादर्शी सङ्कोची कूर्मसन्निभः ॥ १२४ ॥ अहिर्वा स्वाकृतावासः करीवाशब्दयानकः । शृगालवत्पुरालोकी स शूरो राजसिंहवत् ॥ १२५ ॥ सदा विनिद्रो मृगवत्सोढाशेषपरीषहः । उपसर्गसहो विक्रियाद्युक्तविविधद्धिकः ॥ १२६ ॥
वे पृथिवीके समान क्षमाके धारक थे, पानीके समान आश्रित मनुष्योंके सन्तापको दूर करते थे, पर्वतके समान अकम्प थे, परमाणुके समान निःसङ्ग थे, आकाशके समान निर्लेप थे, समुद्रके समान गम्भीर थे, चन्द्रमाके समान सबको आह्लादित करते थे, सूर्यके समान देदीप्यमान थे, तपाये हुए सुवर्णके समान भीतर-बाहर शुद्ध थे, दर्पणके समान समदर्शी थे, कछुवेके समान सङ्कोची थे, साँपके समान कहीं अपना स्थिर निवास नहीं बनाते थे, हाथीके समान चुपचाप गमन करते थे, शृगालके समान सामने देखते थे, उत्तम सिंहके समान शूरवीर थे और हरिणके समान सदा विनिद्र-जागरूक रहते थे। उन्होंने सब परिषह जीत लिये थे, सब उपसर्ग सह लिये थे और विक्रिया आदि अनेक ऋद्धियां प्राप्त कर ली थीं ।। १२२-१२६ ॥
He possessed forbearance equal to that of the earth, and like water, he extinguished the affliction and suffering of those who sought his refuge. He was unshakable like a mountain, unattached and solitary like a single atom, and untainted like the vast expanse of the sky. He was profound like the ocean, delighted everyone like the gentle moon, and was radiantly luminous like the sun. Pure both within and without like refined gold, he was even-sighted and impartial like a mirror, and restrained in his senses like a tortoise drawing in its limbs.
Like a serpent, he never established a permanent dwelling anywhere; he walked silently and majestically like an elephant, kept his gaze fixed straight ahead like a jackal, was courageous and heroic like a noble lion, and remained ever sleeplessly vigilant like a deer. He had conquered all bodily and mental afflictions (Pariṣahas), endured all kinds of severe adversities and calamities (Upasargas), and had acquired numerous supernatural powers (Ṛddhis) such as the power of bodily transformation (Vikriyā). || 122-126 ||
श्लोक ( Shlok ) 127
क्षपकश्रेणिमारुह्य ध्यानद्वयसुसाधनः । घातिकर्माणि निर्धूय कैवल्यमुदपादयन् ॥ १२७ ॥
उन्होंने क्षपकश्रेणीपर आरूढ़ होकर दो शुक्ल ध्यानोंके द्वारा घातिया कर्मोंको नष्टकर केवलज्ञान उत्पन्न किया था ।। १२७ ॥
Ascending the ladder of spiritual annihilation (Kṣapaka-śreṇī), he destroyed the destructive karmas (Ghātiyā Karmas) through the first two stages of pure meditation (Śukladhyāna), and manifested supreme omniscience (Kevalajñāna). || 127 ||
श्लोक ( Shlok ) 128
पुनविंहृत्य सद्धर्मदेशनाद्विषयान् बहून् । विनेयान् मुक्तिसन्मार्ग दुर्ग दुर्मार्गवर्तिनाम् ॥ १२८ ॥
तदनन्तर अनेक देशोंमें विहारकर अनेक भव्य जीवोंको समीचीन धर्मका उपदेश दिया और कुमार्गमें चलनेवाले मनुष्योंके लिए दुर्गम मोक्षका समीचीन मार्ग सबको बतलाया ।। १२८ ॥
Thereafter, wandering through numerous lands, he delivered sermons on the right faith (Samīcīna Dharma) to countless worthy souls (Bhavya Jīvas), and revealed to all the true path of liberation (Mokṣa)—a path otherwise inaccessible to those walking on the wrong course. || 128 ||
श्लोक ( Shlok ) 129
पश्चादन्तर्मुहूर्तायुर्योगं रुद्ध्या त्रिभेदकम् । सर्वकर्मक्षयावाप्यमावापन्मोक्षमक्षयम् ॥ १२९ ॥
जब उनकी आयु अन्तर्मुहूर्तकी रह गई तब तीनों योगोंका निरोध कर उन्होंने समस्त कर्मों के क्षयसे प्राप्त होनेवाला अविनाशी मोक्षपद प्राप्त किया ।। १२९ ।।
When his remaining lifespan was reduced to a mere Antarmuhūrta (a period within forty-eight minutes), he restrained the three channels of activity (Yogas—mind, speech, and body), and by destroying all remaining karmas, attained the imperishable state of final liberation (Mokṣapada). || 129 ||
श्लोक ( Shlok ) 130
जित्वा जिनेन्द्रवपुषेन्द्रसनत्कुमार-चक्रेण धर्मविहितेन हताधचक्रो माक्रम्य विक्रमबलेन दिशां च चक्रम् । दिश्यात्स वः श्रियमिहाशु सनत्कुमारः ॥ १३० ॥
जिन्होंने अपने जिनेन्द्रके समान शरीरसे सनत्कुमार इन्द्रको जीत लिया, जिन्होंने अपने पराक्रमके बलसे दिशाओंके समूह पर आक्रमण किया और धर्मचक्र द्वारा पापोंका समूह नष्ट किया वे श्री सनत्कुमार भगवान् तुम सबके लिए शीघ्र ही लक्ष्मी प्रदान करें ।॥ १३० ॥
May the venerable Lord Sanatkumāra—who, with a body radiant like a Jinendra, surpassed the Indra of Sanatkumāra heaven; who, by the power of his absolute valor, conquered all directions; and who, through the Wheel of Dharma (Dharmacakra), annihilated the entire mass of sins—swiftly bestow upon all of you the ultimate wealth of spiritual prosperity and liberation. || 130 ||
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे धर्मतीर्थकर सुदर्शन-पुरुषसिंहमधु-क्रीडमघवत्सनत्कुमारपुराणं परिसमाप्तम् एकषष्टितमं पर्व ॥ ६१ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्य विरचित त्रिषष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन करनेवाला इकसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ॥ ६१ ॥
Thus ends the sixty-first chapter, which narrates the legendary accounts of the Tīrthaṅkaras, Balabhadra Sudarśana, Nārāyaṇa Puruṣasiṃha, Pratinārāyaṇa Madhukrīḍa, and the Cakravartīs Maghavā and Sanatkumāra, contained within the compendium of the Triṣaṣṭilakṣaṇa Mahāpurāṇa—revered as the authoritative Ārṣa scripture—composed by the venerable Ācārya Guṇabhadra. || 61 ||
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायणके अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10
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अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 85
धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121
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