धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 12 to 23
श्लोक ( Shlok ) 12
सर्वार्थसिद्धौ सत्सौख्यं निःप्रवीचारमन्वभूत् । ततो नृलोकमेतस्मिन् पुण्यभाज्यागमिष्यति ॥ १२ ॥
इस प्रकार वह सर्वार्थ-सिद्धिमें प्रवीचार रहित उत्तम सुखका अनुभव करता था। वह पुण्यशाली जब वहाँसे चयकर मनुष्य लोकमें जन्म लेनेके लिए तत्पर हुआ ।। १२ ।।
“In this manner, he experienced the supreme, uninterrupted bliss within Sarvartha-Siddhi. When that meritorious soul was ready to depart from there, he prepared to take birth in the human realm.”12
श्लोक ( Shlok ) 13 – 15
द्वीपेऽस्मिन्भारते रत्नपुराधीशो महीपतेः । कुरुवंशस्य गोत्रेण काश्यपस्य महौजसः ॥ १३ ॥देव्या भानुमहाराजसंज्ञस्य विपुलश्रियः । सुप्रभायाः सुरानीतवसुधारादिसम्पदः ॥ १४ ॥सितपक्षत्रयोदश्यां वैशाखे रेवतीविधौ । निशान्ते षोडशस्वप्नाः समभूवन् दृशोः स्फुटाः ॥ १५ ॥
तब इस जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें एक रत्नपुर नामका नगर था उसमें कुरुवंशी काश्यपगोत्री महातेजस्वी और महालक्ष्मीसम्पन्न महाराज भानु राज्य करते थे उनकी महादेवीका नाम सुप्रभा था, देवोंने रत्नवृष्टि आदि सम्पदाओंके द्वारा उसका सम्मान बढ़ाया था। रानी सुप्रभाने वैशाख शुक्ल त्रयोदशीके दिन रेवती नक्षत्रमें प्रातःकालके समय सोलह स्वप्न देखे ।। १३-१५ ।।
“At that time, in the Bharata-kshetra of this Jambudvipa, there was a city named Ratnapura. It was ruled by King Bhanu, a highly glorious and immensely prosperous monarch of the Kuru dynasty and Kashyapa clan. His chief queen was named Suprabha, whose honor the deities had magnified through showers of gems and other riches. In the early morning of the thirteenth day of the bright half of the month of Vaishakha, under the Revati constellation, Queen Suprabha witnessed sixteen auspicious dreams.”13 – 15
श्लोक ( Shlok ) 16
सा ‘प्रबुध्य फलान्यात्मपतेरवधिलोचनात् । तेषां विज्ञाय सम्भूतसुतेवासीत्ससम्मदा ॥ १६ ॥
जागकर उसने अपने अवधिज्ञानी पतिसे उन स्वप्नोंका फल मालूम किया और ऐसा हर्षका अनुभव किया मानो पुत्र ही उत्पन्न हो गया हो ॥ १६ ॥
“Upon waking, she learned the meaning of those dreams from her husband, who possessed Avadhijnana (clairvoyant knowledge). Hearing his words, she experienced such immense joy, it was as if a son had already been born to her.”16
श्लोक ( Shlok ) 17
तदैतानुत्तरादन्त्यादस्या गर्भेऽभवद्विभुः । सुरेन्द्राश्वादिकल्याणमकुर्वत समागताः ॥ १७ ॥
उसी समय अन्तिम अनुत्तरविमानसे – सर्वार्थसिद्धिसे चयकर वह अहमिन्द्र रानीके गर्भमें अवतीर्ण हुआ। इन्द्रोंने आकर गर्भकल्याणकका उत्सव किया ॥ १७ ॥
“At that very moment, departing from the highest Anuttara-Vimana—Sarvartha-Siddhi—that Ahamindra (supreme celestial being) descended into the womb of the Queen. The Indras (lords of the deities) then arrived to celebrate the Garbha-Kalyanaka (the auspicious festival of conception).”17
श्लोक ( Shlok ) 18
धवले नवमासान्ते गुरुयोगे त्रयोदशी । दिने माघे सुतं मासे साऽस्तावधिलोचनम् ॥ १८ ॥
नव माह बीत जाने पर माघ शुक्ला त्रयोदशीके दिन गुरुयोगमें उसने अवधिज्ञानरूपी नेत्रोंके धारक पुत्रको उत्पन्न किया ॥ १८ ॥
“When nine months had passed, on the thirteenth day of the bright half of the month of Magha (Magha Shukla Trayodashi), under an auspicious planetary conjunction (Guru Yoga), she gave birth to a son who possessed the eyes of Avadhijnana (clairvoyant/cosmic knowledge).”18
श्लोक ( Shlok ) 19
तदैवानिमिषाधीशास्तं नीत्वाऽमरभुधरे । क्षीराब्धिवारिभिर्भूरिकार्तस्वरघटोद्धतैः ॥ १९ ॥
उसी समय इन्द्रोंने सुमेरु पर्वत पर ले जाकर बहुत भारी सुवर्ण-कलशोंमें भरे हुए क्षीरसागरके जलसे उनका अभिषेक कर आभूषण पहिनाये तथा हर्षसे धर्मनाथ नाम रक्खा ॥ १९ ॥
“At that very moment, the Indras (celestial lords) took him to Mount Sumeru and performed his sacred ablation (Abhisheka) with the water of the ocean of milk (Kshira Sagara) filled in massive golden pitchers. They then adorned him with ornaments and joyfully named him Dharmanatha.”19
श्लोक ( Shlok ) 20 – 23
अभिषिच्य विभूष्योच्चैर्धर्माख्यमगदन्मुदा । सर्वभूतहितश्रीमत्सद्धर्मपथदेशनात् ॥ २० ॥अनन्तजिनसन्ताने चतुः सागरसम्मिते । काले पर्यन्तपल्योपमाबें धर्मेऽस्तमीयुषि ॥ २१ ॥तदभ्यन्तरवर्त्यायुर्धर्मनामोदयादि सः । दशलक्षसमाजीवी तप्तकाञ्चनसच्छविः ॥ २२ ॥खाष्टैकहस्तसद्देहो अवयः कौमारमुद्वहन् । सार्द्धलक्षद्वयादन्ते लब्धराज्यमहोदयः ॥ २३ ॥
जब अनन्तनाथ भगवान्के बाद चार सागर प्रमाण काल बीत चुका और अन्तिम प्रलयका आधा भाग जब धर्मरहित हो गया तब धर्मनाथ भगवान्का जन्म हुआ था, उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी। उनकी आयु दशलाख वर्षकी थी, शरीरकी कान्ति सुवर्णके समान थी, शरीरकी ऊँचाई एक सौ अस्सी हाथ थी । जब उनके कुमारकालके अढ़ाईलाख वर्ष बीत गये तब उन्हें राज्यका अभ्युदय प्राप्त हुआ था ।। २०-२३ ।।
“When a span of four Sagaras (cosmic time units) had elapsed after Lord Anantanatha, and when half of the final period of spiritual decline (Pralaya) had become devoid of righteousness (Dharma), Lord Dharmanatha was born; his own lifespan was also included within this interval. His lifespan was one million (Dasha-lakha) years, his bodily radiance was like pure gold, and his height was one hundred and eighty hands (Hatha). When two hundred and fifty thousand (two and a half Lakha) years of his youth (Kumara-kala) had passed, he attained the glory of the kingdom.”20 – 23
श्लोक 24 से 41
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