सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42 | श्लोक 43 से 51
English translation of Uttar Puran parv 53- shlok 52 to 56
श्लोक ( Shlok ) 52 – 53
धर्मामृतमयीं वाणीं ग्राहयन् विहरन् महीम् । पश्चात्संहृत्य सम्मेदे विहारं मासमुद्वहन् ॥ ५२ ॥प्रतिमायोगमापाग्र्यं सहस्रमुनिभिः समम् । फाल्गुने कृष्णसप्तम्यां राधायां दिनपोदये ॥ ५३ ॥
इस प्रकार लोगोंको धर्मामृतरूपी वाणी ग्रहण कराते हुए वे पृथिवीपर विहार करते थे। अन्तमें जब आयुका एक माह रह गया तब विहार बन्द कर वे सम्मेदशिखर पर जा पहुँचे। वहाँ एक हजार मुनियोंके साथ उन्होंने प्रतिमा-योग धारण किया और फाल्गुन कृष्ण सप्तमीके दिन विशाखा नक्षत्रमें सूर्योदय के समय लोकका अग्रभाग प्राप्त किया – मोक्ष पधारे ।। ५२-५३ ।।
“In this manner, while causing the people to drink the nectar-like speech of Dharma, He wandered across the earth. Finally, when only one month of His lifespan remained, He ceased His wanderings and reached Sammed Shikhar. There, along with one thousand monks, He took the vow of Pratima-yoga (motionless meditation). On the seventh day of the dark half of the month of Phalguna, under the Vishakha nakshatra at the time of sunrise, He attained the summit of the universe—He achieved Moksha (liberation).” ( 52–53)
श्लोक ( Shlok ) 54
कृतपञ्चमकल्याणाः कल्पपुण्याः सुरोत्तमाः । निर्वाणक्षेत्रमत्रेति परिकल्प्यागमन् दिवम् ॥ ५४ ॥
तदनन्तर पुण्यवान् कल्पवासी उत्तम देवेोंने निर्वाण-कल्याणक किया) तथा ‘यहाँ निर्वाण-क्षेत्र है’ इस प्रकार सम्मेदशिखरको निर्वाण-क्षेत्र ठहराकर स्वर्गकी ओर प्रयाण किया ।। ५४ ll
“Thereafter, the meritorious and celestial beings of the Kalpavasis performed the Nirvana-Kalyanaka (the auspicious ceremony of liberation). Having designated Sammed Shikhar as the ‘Nirvana-Kshetra’ (the sacred land of liberation), they departed toward the heavens.” ( 54)
श्लोक ( Shlok ) 55
दुर्वारां दुरितोरुशत्रुसमिति निष्पन्नधीर्निष्क्रियन् १ तूष्णीं युद्धमधिष्ठितः कतिपयाः काष्ठाः प्रतिष्ठां गतः ।निष्ठां दुष्टतमां निनाय निपुणो निर्वाणकाष्ठामितः श्रेष्ठो द्राक्कुरुताचिरं परिचितान् पार्श्वे सुपार्श्वः स नः ॥५५॥
अत्यन्त बुद्धिमान् और निपुण जिन सुपाश्र्वनाथ भगवान्ने दुःखसे निवारण करनेके योग्य पापरूपी बड़े भारी शत्रुओंके समूहको निष्क्रिय कर दिया, मौन रखकर उसके साथ युद्ध किया, कुछ काल तक समवसरणमें प्रतिष्ठा प्राप्त की, अत्यन्त दुष्ट दुर्वासनाको दूर किया और अन्तमें निर्वाण-की अवधिको प्राप्त किया, वे श्रेष्ठतम भगवान् सुपार्श्वनाथ हम सब परिचितोंको चिरकालके लिए शीघ्र ही अपने समीपस्थ करें ॥ ५५ ॥
“The supremely wise and proficient Lord Suparshvanath neutralized the massive army of sinful enemies that are the cause of all suffering. He waged war against them through the power of silence, graced the Samavasarana (divine assembly) for a period of time, eliminated all wicked and worldly desires, and finally reached the pinnacle of Nirvana. May that most excellent Lord Suparshvanath swiftly bring all of us—who seek refuge in Him—close to His eternal presence for all time.” ( 55)
श्लोक ( Shlok ) 56
क्षेमाख्यपत्तनपतिर्नुतनन्दिषेणः कृत्वा तपो नवसुमध्यगतेऽहमित्रः ।वाराणसीपुरि सुपार्श्वनृपो जितारि-रिक्ष्वाकुर्वशतिलकोऽवतु तीर्थकृद् वः ॥ ५६ ॥
जो पहले भवमें क्षेमपुर नगरके स्वामी तथा सबके द्वारा स्तुति करने योग्य नन्दिषेण राजा हुए, फिर तप कर नव ग्रैवेयकोंमेंसे मध्यके ग्रेवेयकमें अहमिन्द्र हुए, तदनन्तर बनारस नगरी में शत्रुओंको जीतनेवाले और इक्ष्वाकु वंशके तिलक महाराज सुपार्श्व हुए वे सप्तम तीर्थंकर तुम सबकी रक्षा करें ।॥ ५६ ॥
“He who, in his previous birth, was King Nandishena—the master of Kshemapur city and worthy of praise by all; who then performed penance and was reborn as an Ahamindra in the middle Graiveyaka (of the nine Graiveyakas); and who thereafter became King Suparshva, the glory of the Ikshvaku dynasty and the conqueror of enemies in the city of Banaras—may that Seventh Tirthankara protect you all.” ( 56)
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसङ्ग्रहे सुपार्श्वस्वामिनः पुराणं परिसमाप्तं त्रिपञ्चाशत्तमं पर्व ॥ ५३ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध, भगवद्गुणभद्राचार्यसे प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण वर्णन करनेवाला त्रेपनवाँ पर्व समाप्त हुआ ।
“Thus ends the fifty-third chapter, which describes the life story (Purana) of Lord Suparshvanath, in the collection known as the ‘Trishashti-Lakshana Mahapurana’—authored by the venerable Acharya Gunabhadra and famously known as the ‘Arsha’.”
चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन
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सुपार्श्वनाथ स्वामीका पुराण का वर्णन पर्व 53 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 42 | श्लोक 43 से 51
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