राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
*सामायोपप्रदां भेदं दण्डं च नयकोविदाः । वदन्त्युपायांश्चतुरो यैरर्थः साध्यते नृपैः ॥ ६२ ॥
नीतिशास्त्रके विद्वान् साम, दान, भेद और दण्ड इन्हें चार उपाय कहते हैं। इनके द्वारा राजा लोग अपना प्रयोजन सिद्ध करते हैं ॥ ६२ ॥
“Scholars of political science (Niti-shastra) call Sama (conciliation), Dana (appeasement or gifts), Bheda (divide-and-rule or dissension), and Danda (force or punishment) the four strategic means. Through these, kings accomplish their objectives.” || 62 ||
श्लोक ( Shlok ) 63 – 65
प्रियं हितं वचः कायपरिष्वङ्गादि साम तत् । हस्त्यश्वदेशरत्नादि दत्ते सोपप्रदा मता ॥ ६३ ॥कृत्यानामुपजापेन स्वीकृतिं भेदमादिशेत् । शष्पमुष्टिवधं दाहलोपविध्वंसनादिकम् ॥ ६४ ॥शत्रुक्षयकरं कर्म अपण्डितैर्दण्डमिष्यते । इन्द्रियाणां निजार्थेषु प्रवृत्तिरविरोधिनी ॥ ६५ ॥
प्रिय तथा हितकारी वचन बोलना और शरीरसे आलिङ्गन आदि करना साम कहलाता है। हाथी, घोड़ा, देश तथा रत्न आदिका देना उपप्रदा – दान कहलाता है। उपजाप अर्थात् परस्पर फूट डालनेके द्वारा अपना कार्य स्वीकृत करना – सिद्ध करना भेद कहलाता है। शत्रुके घास आदि आवश्यक सामग्री की चोरी करा लेना, उनका वध करा देना, आग लगा देना, किसी वस्तुको छिपा देना अथवा सर्वथा नष्ट कर देना इत्यादि शत्रुओंका क्षय करनेवाले जितने कार्य हैं उन्हें पण्डित लोग दण्ड कहते हैं। इन्द्रियोंकी अपने-अपने योग्य विषयोंमें विरोध रहित प्रवृत्ति होना तथा कामादि शत्रुओंको भयभीत करना जयशाली मनुष्यकी जय कहलाती है ।। ६३-६५ ॥
“Speaking sweet and beneficial words, and embracing with the body, is called Sama (conciliation). Giving elephants, horses, land, gems, and other valuables is called Upaprada or Dana (gift/donation). Instigating Upajapa—that is, accomplishing one’s goal by sowing mutual dissension and discord among enemies—is called Bheda (division).
Causing the theft of the enemy’s essential supplies like fodder, orchestrating their assassination, setting fires, hiding resources, or destroying them completely—all such actions that cause the decline and ruin of enemies are termed Danda (punishment or force) by wise scholars.
The unhindered inclination of the senses toward their respective appropriate objects, along with striking fear into internal enemies like lust and anger, is what constitutes the true Jaya (victory) of a triumphant man.” || 63-65 ||
श्लोक ( Shlok ) 66 – 68
कामादिशत्रुवित्रासो वा जयो जयशालिनः । सन्धिः सविग्रहो नेतुरासनं यानसंश्रयौ ॥ ६६ ॥द्वैधीभावश्च षट् प्रोक्ता गुणाः प्रणयिनः श्रियः । कृतविग्रहयोः पश्चात्केनचिद्धेतुना तयोः ॥ ६७ ॥मैत्रीभावः स सन्धिः स्यात्सावधिविंगतावधिः । परस्परापकारोऽरिविजिगीष्वोः स विग्रहः ॥६८॥
सन्धि, विग्रह, आसन, यान, संश्रय और द्वैधीभाव ये राजाके छह गुण कहे गये हैं। ये छहों गुण लक्ष्मीके स्नेही हैं। युद्ध करनेवाले दो राजाओंका पीछे किसी कारणसे जो मैत्रीभाव हो जाता है उसे सन्धि कहते हैं। यह सन्धि दो प्रकारकी है अवधि सहित – कुछ समयके लिए और अवधि रहित- सदाके लिए। शत्रु तथा उसे जीतनेवाला दूसरा राजा ये दोनों परस्परमें जो एक दूसरेका अपकार करते हैं उसे विग्रह कहते हैं॥ ६६-६८ ॥
“Sandhi (alliance/peace), Vigraha (war/hostility), Asana (neutrality/halting), Yana (marching/expedition), Samshraya (seeking shelter/protection), and Dvaidhibhava (double-dealing/duplicity)—these are said to be the six attributes (Shadgunas) of a king. All six of these attributes are dear to Lakshmi (the Goddess of Wealth and Prosperity).
When two warring kings subsequently establish a friendly bond for some reason, it is called Sandhi. This peace is of two kinds: Avadhi-sahita (with a time limit, or temporary) and Avadhi-rahita (without a time limit, or permanent).
The mutual harm or hostility that an enemy and the conquering king inflict upon each other is called Vigraha.” || 66-68 ||
श्लोक ( Shlok ) 69
मामिहान्योऽहमप्यन्यमशक्तो हन्तुमित्यसौ । तूष्णींभावो भवेन्नेतुरासनं वृद्धिकारणम् ॥ ६९ ॥
इस समय मुझे कोई दूसरा और मैं किसी दूसरेको नष्ट करनेके लिए समर्थ नहीं हूं ऐसा विचार कर जो राजा चुप बैठ रहता है उसे आसन कहते हैं। यह आसन नामका गुण राजाओं-की वृद्धिका कारण है ।॥ ६९ ॥
“Thinking, ‘At this moment, no one else is capable of destroying me, nor am I capable of destroying anyone else,’ the king who remains quiet and still is said to be practicing Asana (neutrality or halting). This attribute named Asana is a cause of growth and prosperity for kings.” || 69 ||
श्लोक ( Shlok ) 70
स्ववृद्धौ शत्रुहानौ वा द्वयोर्वाभ्युद्यमं स्मृतम् । अरिं प्रति विभोर्यानं तावन्मात्रफलप्रदम् ॥ ७० ॥
अपनी वृद्धि और शत्रुकी हानि होने पर दोनोंका शत्रुके प्रति जो उद्यम है- शत्रु पर चढ़कर जाना है उसे यान कहते हैं। यह यान अपनी वृद्धि और शत्रुकी हानि रूप फलको देनेवाला है ॥ ७० ॥
“When one’s own power is increasing and the enemy is weakening, the effort exerted by both parties against the enemy—meaning, to march out and attack the enemy—is called Yana (expedition). This Yana yields the fruit of one’s own growth and the destruction of the enemy.” || 70 ||
श्लोक ( Shlok ) 71
अनन्यशरणस्याहुः संश्रयं सत्यसंश्रयम् । सन्धिविग्रहयोर्वृत्तिद्वैधीभावो द्विषां प्रति ॥ ७१ ॥
जिसका कोई शरण नहीं है उसे अपनी शरणमें रखना संश्रय नामका गुण है और शत्रुओंमें सन्धि तथा विग्रह करा देना द्वैधीभाव नामका गुण है ॥ ७१ ॥
“Keeping someone who has no other refuge under one’s own protection is the attribute called Samshraya (seeking shelter), and instigating peace (Sandhi) and hostility (Vigraha) among enemies is the attribute named Dvaidhibhava (double-dealing/duplicity).” || 71 ||
श्लोक 72 से 83
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