राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 72 to 83
श्लोक ( Shlok ) 72
स्वाम्यमात्यौ’ जनस्थानं कोशो दण्डः सगुप्तिकः । मित्रं च भूमिपालस्य सप्त प्रकृतयः स्मृताः ॥७२॥
स्वामी, मन्त्री, देश, खजाना, दण्ड, गढ़ और मित्र ये राजाकी सात प्रकृतियाँ कहलाती हैं ।। ७२ ।।
“Svami (the sovereign/master), Mantri (the minister/counselor), Desha (the territory/country), Khajana (the treasury/wealth), Danda (the army/force), Garh (the fort/fortress), and Mitra (the ally/friend)—these are called the seven constituent elements (Saptaprakriti) of a king.” || 72 ||
श्लोक ( Shlok ) 73
इमे राज्यस्थितेः प्राज्ञैः पदार्था हेतवो मताः । तेषूपायवती शक्तिः प्रधानव्यवसायिनी ॥ ७३ ॥
विद्वान् लोगोंने ऊपर कहे हुए ये सब पदार्थ, राज्य स्थिर रहनेके कारण माने हैं। यद्यपि ये सब कारण हैं तो भी साम आदि उपायोंके साथ शक्तिका प्रयोग करना प्रधान कारण है ।। ७३ ।।
“Wise scholars consider all the aforementioned elements to be the causes of stability for a kingdom. Although all of these are indeed causes, the primary and essential cause remains the application of power (Shakti) alongside strategic means like Sama and others.” || 73 ||
श्लोक ( Shlok ) 74
पानीयं खननाद्वह्निर्मथनादुपलभ्यते । अदृश्यमपि सम्प्राप्यं सत्फलं व्यवसायतः ॥ ७४ ॥
जिस प्रकार खोदनेसे पानी और परस्परकी रगड़से अग्नि उत्पन्न होती है उसी प्रकार उद्योगसे, जो उत्तम फल अदृश्य है-दिखाई नहीं देता वह भी प्राप्त करनेके योग्य हो जाता है ।॥ ७४ ॥
“Just as water is obtained by digging the earth and fire is produced by the mutual friction of wood, similarly, through diligent effort, even that excellent fruit which is currently invisible or unmanifest becomes attainable.” || 74 ||
श्लोक ( Shlok ) 75 – 76
फलप्रसवहीनं वा सहकारं विहङ्गमाः । विवेकवन्तो नामोपदिष्टं वा कुत्सितागमम् ॥ ७५ ॥राजपुत्रमनुत्साहं त्यजन्ति विपुलाः श्रियः । स्वकीययोधसामन्तमहामात्यादयोऽपि च ॥ ७६ ॥
जिस प्रकार फल और फूलोंसे रहित आमके वृक्षको पत्ती छोड़ देते हैं और विवेकी मनुष्य उपदिष्ट मिथ्या आगमको छोड़ देते हैं उसी प्रकार उत्साहहीन राजपुत्रको विशाल लक्ष्मी छोड़ देती है। यही नहीं, अपने योद्धा सामन्त और महामन्त्री आदि भी उसे छोड़ देते हैं ।॥ ७५-७६ ॥
“Just as birds desert a mango tree that is devoid of fruit and flowers, and as wise men abandon a false scripture that has been taught to them, similarly, great fortune (Lakshmi) deserts a prince who lacks enthusiasm. Not only that, but his own warriors, vassals, and chief ministers also abandon him.” || 75-76 ||
श्लोक ( Shlok ) 77 – 80
पुत्रं पिताप्यनुद्योगं मत्वायोग्यं विषीदति । इति विज्ञापनं श्रुत्वा तयोर्नरपतिस्तदा ॥ ७७ ॥युवाभ्यामुक्तमेवेदं प्रत्यपादि कुलोचितम् ।इत्याविष्कृतहर्षाप्तिर्भाविसीरभृतः स्वयम् ॥ ७८ ॥ अविन्यस्य राज्ययोग्योरुमुकुटं लक्ष्मणस्य च । प्रबध्य यौवराज्याधिपत्यपट्ट महौजसः ॥ ७९ ॥महाभ्युदयसम्पादिसत्याशीभिः प्रवर्द्धयन् । पुत्रौ प्रस्थापयामास पुरीं वाराणसीं प्रति ॥ ८० ॥
इसी तरह पिता भी उद्यम रहित पुत्रको अयोग्य समझकर दुखी होता है। राम और लक्ष्मणकी ऐसी प्रार्थना सुनकर महाराज दशरथ उस समय बहुत ही प्रसन्न हुए और कहने लगे कि तुम दोनोंने जो कहा है वह अपने कुलके योग्य ही कहा है। इस प्रकार हर्ष प्रकट करते हुए उन्होंने भावी बलभद्र-रामचन्द्रके शिर पर स्वयं अपने हाथोंसे राज्यके योग्य विशाल मुकुट बाँधा और महाप्रतापी लक्ष्मणके लिए यौवराज-का आधिपत्य पट्ट प्रदान किया। तदनन्तर महान् वैभव सम्पादन करनेवाले सत्य आशीर्वादके द्वारा बढ़ाते हुए राजा दशरथने उन दोनों पुत्रोंको बनारस नगरके प्रति भेज दिया ।। ७७-८० ॥
“In the same manner, a father too, considering an effort-free son to be incompetent, becomes sorrowful. Hearing such a request from Rama and Lakshmana, Maharaja Dasharatha was immensely pleased at that moment and began to say, ‘What you both have spoken is perfectly worthy of your lineage.’
Expressing his joy in this manner, he himself bound the grand crown worthy of kingship upon the head of the future Balabhadra-Ramachandra with his own hands, and bestowed the status of Crown Prince (Yauvarajya) upon the highly majestic Lakshmana.
Thereafter, elevating them with truthful blessings that bring about great fortune, King Dasharatha dispatched both his sons toward the city of Banaras.” || 77-80 ||
श्लोक ( Shlok ) 81 – 83
गत्वा प्रविश्य तामुच्चैः पौरान् जानपदानपि । दानमानादिभिः सम्यक् सदा तोषयतोस्तयोः ॥ ८१ ॥दुष्टनिग्रहशिष्टानुपालनप्रविधानयोः । अविलङ्घयतोः पूर्वमर्यादां नीतिवेदिनोः ॥ ८२ ॥प्रजापालनकार्येकनिष्ठयोनिष्ठितार्थयोः । काले गच्छति कल्याणैः कल्पैः निःशल्य सौख्यदैः ॥ ८३.॥
दोनों भाइयोंने जाकर उस उत्कृष्ट नगरमें प्रवेश किया और वहाँ के रहनेवाले नगरवासियों तथा देशवासियों को दोनों भाई सदा दान मान आदिके द्वारा सन्तुष्ट करने लगे। वे सदा दुष्टोंका निग्रह और सज्जनों-का पालन करते थे, नीतिके जानकार थे तथा पूर्व मर्यादाका कभी उल्लंघन नहीं करते थे। उनका प्रजा पालन करना ही मुख्य कार्य था। वे कृतकृत्य हो चुके थे-सब कार्य कर चुके थे अथवा किसी भी कार्यको प्रारम्भ कर उसे पूरा कर ही छोड़ते थे। इस प्रकार शल्यरहित उत्तम सुख प्रदान करने-वाले श्रेष्ठ कल्याणोंसे उनका समय व्यतीत हो रहा था ।। ८१-८३ ।।
“Both brothers went and entered that magnificent city, and they began to constantly satisfy the local townspeople and countrymen through gifts, honor, and appreciation. They always restrained the wicked and protected the righteous; they were well-versed in statecraft and never transgressed established traditions.
Protecting their subjects was their foremost duty. They were completely fulfilled—having accomplished all their goals—and whenever they initiated any task, they would never leave it unfinished. In this manner, their time passed in supreme welfare, which bestowed excellent and thornless (unimpeded) happiness.” || 81-83 ||
श्लोक 84 से 92
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71
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