अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 93 to 101
श्लोक ( Shlok ) 93
भवतोऽपि नमेः कच्छसुतस्यान्वयसम्भवात् । वंशजे नास्ति सम्बन्धस्तेन बाहुबलीशितुः ॥ ९३ ॥
आपका भी जन्म राजा कच्छके पुत्र नमिके वंशमें हुआ है अतः बाहुबली स्वामीके वंशमें उत्पन्न होनेवाले उस त्रिष्पृष्ठके साथ आपका सम्बन्ध है ही ॥ ९३ ॥
“You too have been born in the lineage of Nami, the son of King Kachha; therefore, you already share a connection with that Trishprishta, who will be born in the lineage of Lord Bahubali.” || 93 ||
श्लोक ( Shlok ) 94
त्रिपृष्ठाय प्रदातव्या त्रिखण्डश्रीसुखेशिने । अस्तु तस्य मनोहीं कन्या कल्याणभागिनी ॥ ९४ ॥
इसलिए तीन खण्डकी लक्ष्मी और सुखके स्वामी त्रिष्पृष्ठके लिए यह कन्या देनी चाहिये, यह कल्याण करने वाली कन्या उसका मन हरण करनेवाली हो ।। ९४ ।।
“Therefore, this maiden should be given to Trishprishta, the lord of supreme happiness and the sovereign of the fortune (Lakshmi) of the three realms (three khandas). This auspicious, virtue-bringing maiden shall surely captivate his heart.” || 94 ||
श्लोक ( Shlok ) 95
तेनैव भवतो भावि विश्वविद्याधरेशिता । निश्चित्येतदनुष्ठेयमादितीर्थंकरोदितम् ॥ ९५ ॥
त्रिपृष्ठ को कन्या देनेसे आप भी समस्त विद्याधरोंके स्वामी हो जावेंगे इसलिए भगवान् आदिनाथके द्वारा कही हुई इस बातका निश्चय कर आपको यह अवश्य ही करना चाहिये ॥ ९५ ॥
“By giving the maiden to Trishprishta, you too will become the sovereign lord of all the Vidyadhars. Therefore, keeping faith in this truth proclaimed by Lord Adinath, you must certainly do this.” || 95 ||
श्लोक ( Shlok ) 96
इति तद्वचनं चित्ते विधाय तमसौ मुदा । नैमित्तिकं समापूज्य रथनूपुरभूपतिः ॥ ९६ ॥
इस प्रकार निमित्तज्ञानीके वचनों को हृदयमें धारण करण कर रथनूपुर नगरके राजाने बड़े हर्षसे उस निमित्तज्ञानीकी पूजाकी ॥ ९६ ॥
Taking these words of the Nimittajnani deeply to heart, the king of Rathanupur City worshipped and honored the seer with great joy. || 96 ||
श्लोक ( Shlok ) 97
सुदूतमिन्दुनामानं सुलेखोपायनान्वितम् । प्रजापतिमहाराजं प्रतिसम्प्राहिणेत्तदा ॥ ९७ ॥
और उसी समय उत्तम लेख और भेंटके साथ इन्दु नामका एक दूत प्रजापति महाराजके पास भेजा ॥ ९७ ॥
And at that very moment, he dispatched a messenger named Indu to King Prajapati, carrying an excellent royal letter and exquisite gifts. || 97 ||
श्लोक ( Shlok ) 98 – 99
स्वयम्प्रभापतिर्भावी त्रिपृष्ठ इति भूपतिः । नैमित्तिकाद्विदित्वैतज्जयगुप्तात्पुरैव सः ॥ ९८ ॥खचराधिपदूतं खादवतीर्ण महोत्सवः । प्रतिगृह्य ससन्मानं वने पुष्पकरण्डके ॥ ९९ ॥
‘यह त्रिपृष्ठ स्वयंप्रभाका पति होगा’ यह बात प्रजापति महाराजने जयगुप्त नामक निमित्तज्ञानीसे पहले ही जान ली थी इसलिये उसने आकाशसे उतरते हुए विद्याधरराजके दूतका, पुष्पकरण्डक नामके वनमें बड़े उत्सवसे स्वागत-सत्कार किया ॥ ९८-९९ ॥
King Prajapati had already learned beforehand from a Nimittajnani named Jayagupta that “this Trishprishta will become the husband of Swayamprabha.” Therefore, with great celebration and festivity in a forest named Pushpakarandaka, he warmly welcomed and honored the Vidyadhar king’s messenger as he descended from the sky. || 98-99 ||
श्लोक ( Shlok ) 100 – 101
स दूतो राजगेहं स्वं सम्प्रविश्य सभागृहे । निजासने समासीनः प्राभृतं सचिवार्पितम् ॥ १०० ॥विलोक्य रागाद् भूपेन स्वानुरागः समर्पितः । प्राभृतेनैव तुष्टाः स्म इति दूतं प्रतोषयन् ॥ १०१ ॥
महाराज उस दूतके साथ अपने राजभवनमें प्रविष्ट होकर जब सभागृहमें राजसिंहासन पर विराजमान हुए तब मन्त्रीने दूसके द्वारा लाई हुई भेंट समर्पित की। राजाने उस भेंटको बड़े प्रेमसे देखकर अपना अनुराग प्रकट किया और दूतको सन्तुष्ट करते हुए कहा कि हम तो इस भेंटसे ही सन्तुष्ट हो गये ।। १००-१०१ ।।
Upon entering his royal palace along with the messenger, when the King took his seat upon the throne in the assembly hall, the minister presented the gifts brought by the messenger. Gazing at those gifts with deep affection, the King expressed his delight and, pleasing the messenger, said, “We are immensely satisfied with these gifts alone.” || 100-101 ||
श्लोक 102 से 112
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