चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101
English translation of Uttar Puran parv 54- shlok 102 to 111
श्लोक ( Shlok ) 102
नित्योदयस्य चेन्न स्यात् पद्मानन्दकृतो बलम् । चण्डद्युतेः कथं पाति शक्रोऽध्यक्षः स्वयं दिशम् ॥१०२॥
यदि निरन्तर उदय रहने वाले और कमलोंको आनन्दित करने वाले सूर्यका बल प्राप्त नहीं होता तो इन्द्र स्वयं अधिपति हो कर भी अपनी दिशाकी रक्षा कैसे करता ! ॥ १०२ ॥
If Indra, despite being the Lord of the Heavens himself, did not receive the strength of the Sun—which rises incessantly and brings joy to the lotuses—how could he have protected his own direction? 102
श्लोक ( Shlok ) 103
विधीर्वेधा न चेदग्निं स्थापयेद्रक्षितु’ दिशम् । स्वयोनिदाहिना कोर्डाप क्वचित् केनापि रक्षितः ॥ १०३॥
विधाता अवश्य ही बुद्धि-हीन है क्योंकि यदि वह बुद्धिहीन नहीं होता तो आग्नेय दिशाकी रश्क्षाके लिए अग्निको क्यों नियुक्त करता ? भला, जो अपने जन्मदाताको जलाने वाला है उससे भी क्या कहीं किसीकी रक्षा हुई हैं ? ।।१०३।।
The Creator (Vidhata) is surely devoid of wisdom; for if he were not witless, why would he have appointed Fire (Agni) to protect the South-Eastern direction? Indeed, can anyone ever be protected by one who burns their own progenitor?103
श्लोक ( Shlok ) 104
पालको मारको वेति नान्तकं सर्वभक्षिणम् । किं वेत्ति वेधास्तं पातु पापिनं परिकल्पयन् ॥ १०४ ॥
क्या विधाता यह नहीं जानता था कि यमराज पालक है या मारक ? फिर भी उसने उसी सर्व- भक्षी पापीको दक्षिण दिशाका रक्षक बना दिया ।। १०४ ॥
Was the Creator (Vidhata) unaware whether Yama is a protector or a destroyer? Despite this, he appointed that all-consuming sinner as the guardian of the Southern direction. 104
श्लोक ( Shlok ) 105
शुनः स्थाने स्थितो दीनो नित्यं यमसमीपगः । स्वजीवितेऽपि सन्देह्यो नैर्ऋतः कस्य पालकः ॥ १०५ ॥
जो कुत्ते के स्थानपर रहता है, दीन हैं, सदा यमराजके समीप रहता है और अपने जीवनमें भी जिसे संदेह है ऐसा नैऋत किसकी रक्षा कर सकता है ? ॥ १०५ ॥
How can Nairrta protect anyone—he who occupies the place of a dog, who is wretched, who always remains in the shadow of Death (Yama), and who is perpetually uncertain of his own existence?105
श्लोक ( Shlok ) 106
‘काललीलां विलव्यालं (१) पाशहस्तो ‘जलप्रियः । स नदीनाश्रयः पाशी प्रजानां केन पालकः॥१०६॥
जो जल भूमिमें विद्यमान विलमें मकरादि हिंसक जन्तुके समान रहता है, जिसके हाथमें पाश है, जो जलप्रिय है- जिसे जल प्रिय है (पक्षमें जिसे जड-मूर्ख प्रिय है) और जो नदीनाश्रय है- समुद्रमें रहता है (पक्षमें दीन मनुष्योंका आश्रय नहीं है) ऐसा वरुण प्रजाकी रक्षा कैसे कर सकता है ? ॥ १०६ ॥
How can Varuna protect the subjects—he who lives in the watery depths like a predatory creature (such as a crocodile), who holds a noose (pasha) in his hand, who is “Jalapriya”—fond of water (or, in another sense, fond of the “Jada” or foolish)—and who is “Nadinashraya”—a dweller of the ocean (or, in another sense, one who offers no refuge to the wretched)?106
श्लोक ( Shlok ) 107
धूमध्वजसखोऽस्थास्नुः स्वयमन्यांश्च चालयन् । पालकः स्थापितस्तादृक् स किमेकत्र तिष्ठति ॥ १०७ ॥
जो अग्निका मित्र है, स्वयं अस्थिर है और दूसरोंको चलाता रहता है उस वायुको विधाताने वायव्य दिशाका रक्षक स्थापित किया सो ऐसा वायु क्या कहीं ठहर सकता है ? ॥ १०७ ॥
The Creator appointed Vayu (the Wind) as the guardian of the North-Western direction—he who is a friend of Fire, who is himself unstable, and who keeps others in a state of constant unrest. Can such a wind ever remain steady to protect anything? 107
श्लोक ( Shlok ) 108
लुब्धो न लभते पुण्यं विपुण्यः केन पालकः । धनेन चेददाता तत् गुह्यकोऽपि न पालकः ॥ १०८ ॥
जो लोभी है वह कभी पुण्य-संचय नहीं कर सकता और जो पुण्यहीन है वह कैसे रक्षक हो सकता है जब कि कुबेर कभी किसीको धन नहीं देता तब उसे विधाताने रक्षक कैसे बना दिया ? ।। १०८ ॥
One who is greedy can never accumulate merit (Punya), and how can one devoid of merit be a protector? Since Kubera never gives wealth to anyone, why did the Creator appoint him as a guardian? 108
श्लोक ( Shlok ) 109
ईशानोऽन्त्यां दशां यातो गणने सर्वपश्चिमः । पिशाचावेष्टितो दुष्टः कथमेष दिशः पतिः ॥ १०९ ॥
ईशान अन्तिम दशाको प्राप्त है, गिनती उसकी सबसे पीछे होती है, पिशाचों से घिरा हुआ है और दुष्ट है इसलिए यह ऐशान दिशाका स्वामी कैसे हो सकता है ? ॥ १०९ ॥
Ishana has reached the final state; he is last in the reckoning, surrounded by ghouls (Pishachas), and is of a wicked nature—how then can he be the lord of the North-Eastern direction? 109
श्लोक ( Shlok ) 110
कृत्वैतान् बुद्धिवैकल्यात्तत्प्रमाष्टुं प्रजापतिः । व्यधादेकमिमं मन्ये विश्वदिक्पालनक्षमम् ॥ ११० ॥
ऐसा जान पड़ता है कि विधाताने इन सबको बुद्धिकी विकलतासे ही दिशाओंका रक्षक बनाया था और इस कारण उसे भारी अपयश उठाना पड़ा था। अब विधाताने अपना सारा अप-यश दूर करनेके लिए ही मानो इस एक अजितसेनको समस्त दिशाओंका पालन करनेमें समर्थ बनाया था ।। ११० ॥
It appears as though the Creator (Vidhata) had appointed all those others as guardians of the directions out of a lapse in judgment, for which he had to endure great infamy. Now, as if to wash away all that previous disgrace, the Creator has made this single Ajitsena capable of protecting all the directions at once.110
श्लोक ( Shlok ) 111
इत्युदात्तवचोमाला विरचय्याभिसंस्तुतः । विक्रमाक्रान्तदिक्चक्रः शक्रादीन् सोऽतिलङ्घते ॥ १११ ॥
इस प्रकारके उदार वचनोंकी माला बनाकर सब लोग जिसकी स्तुति करते हैं और अपने पराक्रमसे जिसने समस्त दिशाओंको व्याप्त कर लिया है ऐसा अजितसेन इन्द्रादि देवोंका उल्लंघन करता था ॥ १११ ॥
In this manner, weaving a garland of generous words, all people sang his praises. Having pervaded every direction with his immense prowess, Ajitsena surpassed even the glory of Indra and the other gods.111
श्लोक 112 से 121
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