विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 126 to 131
श्लोक ( Shlok ) 126
सोऽपि सर्वसहिष्णुः सन् वज्रकायोऽचलाकृतिः । निश्चलो निर्वृतिं यातः शुक्रुध्यानेन शुद्धधीः ॥ १२६॥
जयन्त मुनिराज भी इस समस्त उपसर्गको सह गये, उनका शरीर वनके समान सुदृढ़ था, वे पर्वतके समान निश्चल खड़े रहे और शुक्लध्यानके प्रभाव से निर्मल ज्ञानके धारी मोक्षको प्राप्त हो गये ॥ १२६ ॥
Jayanta Muniraj, too, endured this ordeal with unwavering fortitude. His body remained as steadfast as a mountain, and having completely destroyed his karmas through the fire of pure meditation (Shukla Dhyana), he attained the state of perfect knowledge and ascended to the eternal bliss of Moksha (liberation). [126]
श्लोक ( Shlok ) 127
सर्वे निर्वाणकल्याणपूजां कर्तुं सुराधिपाः । चतुर्विधाः समं प्रापंस्तदा तद्भकिचोदिताः ॥ १२७ ॥
उसी समय चारों निकाय के इन्द्र उनकी भक्ति से प्रेरित होकर निर्वाण-कल्याणककी पूजा करनेके लिए आये ॥ १२७ ॥
At that very moment, the Indras of all four classes of celestial beings, inspired by their profound devotion, arrived to perform the worship of his Nirvana-Kalyanaka (the auspicious celebration of his liberation). [127]
श्लोक ( Shlok ) 128
स्वाग्रजाङ्गेक्षणोद्भूततृतीयावगमः क्रुधा । नागेन्द्रो नागपाशेन तान् बवन्धाखिलान् खगान् ॥ १२८ ॥
सब देवोंके साथ पूर्वोक्त धरणेन्द्र भी आया था, अपने बड़े भाईका शरीर देखनेसे उसे अवधिज्ञान प्रकट हो गया जिससे वह बड़ा कुपित हुआ । उसने उन समस्त विद्याधरोंको नागपाशसे बाँध लिया ।। १२८ ॥
The aforementioned Dharanendra also arrived along with all the other gods. Upon seeing the body of his elder brother, his Avadhijnana (clairvoyance) manifested, through which he realized what had happened and became greatly incensed. In his wrath, he bound all those Vidyadharas with the Nagapasha (serpent-noose). [128]
श्लोक ( Shlok ) 129 – 130
नास्माकं देव दोषोऽस्ति विद्युदंष्ट्ण पापिना । विदेहादमुमानीय भयं चास्मात्खचारिणाम् ॥ १२९ ॥ प्रतिपाद्य जनैरेभिरकारि विविधो मुधा । महोपसर्ग इत्याहुस्तेषु केचिद्विचक्षणाः ॥ १३० ॥
उन विद्याधरोंमें कोई-कोई बुद्धिमान् भी थे अतः उन्होंने प्रार्थना की कि हे देव! इस कार्यमें हम लोगोंका दोष नहीं है, पापी विद्युदंष्ट्र इन्हें विदेह क्षेत्रसे उठा लाया और विद्याधरोंको इसने बतलाया कि इनसे तुम सबको बहुत भय है। ऐसा कहकर इसी दुष्टने हम सब लोगोंसे व्यर्थ ही यह महान् उपसर्ग करवाया है ।। १२९-१३० ॥
Some of those Vidyadharas were wise; therefore, they pleaded, “O Lord! We are not at fault in this matter. The sinful Vidyudanshtra abducted him from the Videha region and told us that we were all in great danger from him. By saying this, it is this wicked being alone who has caused us to commit this grave and senseless atrocity.” [129-130]
श्लोक ( Shlok ) 131
श्रुत्वा तन्नागराजोऽपि तेषु कालुष्यमुत्सृजन् । विद्युद्धंष्ट्’ पयोराशौ सबन्धुं क्षेप्तुमुद्यतः ॥ १३१ ॥
विद्याधरोंकी प्रार्थना सुनकर धरणेन्द्रने उन पर क्रोध छोड़ दिया और परिवारसहित विद्युदंष्ट्रको समुद्रमें गिराने का उद्यम किया ॥ १३१ ॥
Upon hearing the plea of the Vidyadharas, Dharanendra relented in his anger toward them; however, he set out with determination to cast the wicked Vidyudanshtra and his entire family into the ocean. [131]
श्लोक 132 से 141
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 100
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 124
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |