मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 34 to 43
श्लोक ( Shlok ) 34 – 35
पूर्व तालपुराधीशो नान्ना नरपतिर्नृपः । महाकुलाभिमानादिदुर्लेश्याविष्टचित्तकः ॥ ३४॥पात्रापात्रविशेषानभिज्ञः कुज्ञानमोहितः । दत्त्वा किमिच्छकं दानं तत्फलात्समभूदिभः ॥ ३५ ॥
पूर्व भवमें यह हाथी तालपुर नगरका स्वामी नरपति नामका राजा था, वहाँ अपने उच्च कुलके अभिमान आदि खोटी-खोटी लेश्याओंसे इसका चित्त सदा घिरा रहता था, वह पात्र और अपात्रकी विशेषतासे अनभिज्ञ था, मिथ्या ज्ञानसे सदा मोहित रहता था । वहाँ इसने किमिच्छक दान दिया था उसके फलसे यह हाथी हुआ है ।। ३४-३५ ॥
“In its previous birth, this elephant was a king named Narapati, the ruler of Talapura city. There, his mind was constantly worn down by the foul defilements (leshyas) of pride in his noble lineage. He was completely ignorant of the distinction between a worthy and an unworthy recipient of charity, and was perpetually deluded by false knowledge. It was there that he gave Kimichchhika-dana (indiscriminate charity), and as a consequence of that act, he has been reborn as this elephant. ॥34–35॥”
श्लोक ( Shlok ) 36
नाज्ञानं स्मरति प्राच्यं न राज्यं पूज्यसम्पदम् । कुदानस्य च नैः फल्यं वनं स्मरति दुर्मतिः ॥ ३६ ॥
यह हाथी इस समय न तो अपने पहले अज्ञानका स्मरण कर रहा है, न पूज्य सम्पदासे युक्त राज्यका ध्यान कर रहा है और न कुदानकी निष्फलताका विचार कर रहा है ॥ ३६ ॥
“At this moment, this elephant is neither remembering his past ignorance, nor is he dwelling upon his kingdom that was endowed with worshipful wealth, nor is he contemplating the fruitlessness of his improper charity (Kudana). ॥36॥”
श्लोक ( Shlok ) 37
तद्वचः श्रवणोत्पन्नस्वपूर्वभवसंस्मृतेः । संयमासंयमं सद्यो जग्राह गजसत्तमः ॥ ३७ ॥
भगवान्के वचन सुननेसे उस उत्तम हाथीको अपने पूर्व भवका स्मरण हो आया इस लिए उसने शीघ्र ही संयमासंयम धारण कर लिया ॥ ३७ ॥
“Upon hearing the words of the Lord, that exceptional elephant attained the remembrance of his past births (Jati-smarana-jnana); consequently, he immediately adopted the vows of partial self-restraint (Sanyamasanyama). ॥37॥”
श्लोक ( Shlok ) 38
तत्प्रत्ययसमुत्पन्नबोधिस्त्यागोन्मुखो नृपः । लौकान्तिकैस्तदैवैत्य प्रस्तुतोक्त्या प्रतिश्रुतः ॥ ३८ ॥
इसी कारणसे भगवान् मल्लिनाथको आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया जिससे वे समस्त परिग्रहोंका त्याग करनेके लिए सम्मुख हो गये। उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी स्तुति की तथा उनके विचारोंका समर्थन किया ॥ ३८ ॥
“For this very reason, Lord Mallinatha attained self-realization (Atma-jnana), prompting him to prepare for the renunciation of all worldly possessions (Parigraha). At that very moment, the Laukantika deities arrived, offered their hymns of praise, and supported his pious thoughts. ॥38॥”
श्लोक ( Shlok ) 39
स्वराज्यं युवराजाय विजयाय वितीर्य सः । सुरैः सम्प्राप्तनिःक्रान्तिकल्याणमधीगुणः ॥३९ ॥
उन्होंने युवराज विजयके लिए अपना राज्य देकर देवोंके द्वारा दीक्षा-कल्याणकका महोत्सव प्राप्त किया ॥ ३९ ॥
“Having handed over his kingdom to Crown Prince Vijaya, he attained the grand celebration of Initiation-Welfare (Diksha-Kalyanaka) performed by the deities. ॥39॥”
श्लोक ( Shlok ) 40
अपराजितनामोरुशिबिकामधिरूढवान् । रूढकीर्तिः क्षरन्मूढिरूढो नरखगा मरैः ॥ ४० ॥
जिनकी कीर्ति प्रसिद्ध है, जिनका मोहकर्म दूर हो रहा है, और मनुष्य विद्याधर तथा देव जिन्हें ले जा रहे हैं ऐसे वे भगवान् अपराजित नामकी विशाल पालकीपर सवार हुए ॥ ४० ॥
“Enveloped in celebrated glory, with his deluding karma (Moha-karma) rapidly dissipating, the Lord—borne aloft by humans, Vidyadharas, and celestial deities—ascended the magnificent palanquin named ‘Aparajita’. ॥40॥”
श्लोक ( Shlok ) 41 – 43
प्राप्य षष्ठोपवासेन वनं नीलाभिधानकम् । वैशाखे बहुले पक्षे श्रवणे दशमीदिने ॥ ४१ ॥सहस्त्रभूपैः सायाद्धे सह संयममग्रहीत् । कैश्यमीशः सुरेशानां सुरेशो विश्वदृश्वनः ॥ ४२ ॥शाश्वतं पदमन्विच्छन् प्रापयत्पञ्चमाम्बुधिम् । चतुर्थावगमः शुद्धमताप्सीत् सोऽप्यलं तपः ॥ ४३ ॥
नील नामक वनमें जाकर उन्होंने वेलाके उपवासका नियम लिया और वैशाख कृष्ण दशमीके दिन श्रवण नक्षत्रमें सायंकालके समय एक हजार राजाओंके साथ संयम धारण कर लिया। शाश्वतपद-मोक्ष प्राप्त करनेकी इच्छा करने वाले सौधर्म इन्द्रने सर्वदर्शी भगवान् मल्लिनाथके बालोंका समूह पञ्चम- सागर-क्षीरसागर भेज दिया। दीक्षा लेते ही उन्हें मनःपर्ययज्ञान उत्पन्न हो गया और इस तरह उन्होंने दीर्घकाल तक शुद्ध तथा निर्मल तप किया ॥ ४१-४३ ॥
“Entering the forest named Neela, he took the vow of a two-day fast (Vela). On the evening of the tenth day of the dark fortnight of the month of Vaishakha, under the Shravana constellation, he embraced absolute self-restraint (Sanyama) along with one thousand kings. Desiring the attainment of the eternal state—Liberation (Moksha)—Saudharma Indra dispatched the gathered hair of the all-seeing Lord Mallinatha to the Kshirasagara, the fifth ocean. Immediately upon taking initiation (Diksha), the knowledge of reading minds (Manahparyaya-jnana) dawned upon him, and thus he practiced pure and stainless penance for a very long duration. ॥41–43॥”
श्लोक 44 से 52
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ तीर्थकर, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 125
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |