मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 231 to 242
श्लोक ( Shlok ) 232 – 235
दिनेषु केषुचिद्यातेषूद्यानावनिशोधने । हलाप्रेणोद्धतं मन्त्री मया दृष्टं यदृच्छया ॥ २३२ ॥पुरातनमिदं शास्त्रमित्यजानन्निव स्वयम् । विस्मितो राजपुत्राणां समाजे तदवाचयत् ॥ २३३ ॥ सम्भावयतु पिङ्गाक्षं कन्यावरकदम्बके । न मालया मृतिस्तस्याः सा तं चेत्समबीभवत् ॥ २३४ ॥ तेनापि न प्रवेष्टव्या सभांहोभीत्रपावता । प्रविष्टोप्यत्र यः पापी ततो निर्धास्यतामिति ॥ २३५ ॥
कितने ही दिन बीत जानेपर वनकी पृथिवी खोदते समय उसने हलके अग्रभागसे वह पुस्तक निकाली और कहा कि इच्छानुसार खोदते हुए मुझे यह सन्दूकची मिली है। यह कोई प्राचीन शास्त्र है इस प्रकार कहता हुआ वह आश्चर्य प्रकट करने लगा, मानो कुछ जानता ही नहीं हो। उसने वह पुस्तक राजकुमारोंके समूहमें बचवाई। उसमें लिखा था कि कन्या और वरके समुदायमें जिसकी आँख सफेद और पीली हो, मालाके द्वारा उसका सत्कार नहीं करना चाहिये । अन्यथा कन्याकी मृत्यु हो जाती है या वर मर जाता है। इसलिए पाप डर और लज्जावाले पुरुषको सभामें प्रवेश नहीं करना चाहिये । यदि कोई पापी प्रविष्ट भी हो जाय तो उसे निकाल देना चाहिये ।। २३२-२३५ ॥
“After several days had passed, while the earth of the forest garden was being dug up, the minister pulled out the casket using the tip of a ploughshare. Acting as if he knew absolutely nothing, he feigned great astonishment and proclaimed, ‘While digging freely, I have chanced upon this casket! This appears to be some ancient, sacred scripture!’
He then had that text read aloud before the entire assembly of gathered princes. In that book, it was written: ‘In an assembly of grooms, if there be a man whose eyes are pale white and yellowish (Śveta-pīta), the princess must never honor him with the wedding garland. Doing so will inevitably cause the sudden death of either the princess or the groom himself. Therefore, any man who possesses such a sin, fear, or shame should not even dare to enter the assembly hall. And if such a sinful person has already entered, he must be promptly expelled.’” ॥ 232-235 ॥
श्लोक ( Shlok ) 236 – 237
तदासौ सर्वमाकर्ण्य लज्जया मधुपिङ्गलः । तद्द्रुणत्वाचतो गत्वा हरिषेणगुरोस्तपः ॥ २३६॥प्रपन्नस्तद्विदित्वा ‘गुर्मुदं सगरभूपतिः । विश्वभूश्चेष्टसंसिद्धावन्ये च कुटिलाशयाः ॥ २३७ ॥
मधुपिङ्गलमें यह सब गुण विद्यमान थे अतः वह यह सब सुन लज्जावश वहाँ से बाहर चला गया और हरिषेण गुरुके पास जाकर उसने तप धारण कर लिया। यह जानकर अपनी इष्टसिद्धि होनेसे राजा सगर, विश्वभू मन्त्री, तथा कुटिल अभिप्रायवाले अन्य मनुष्य हर्षको प्राप्त हुए ॥ २३६-२३७ ॥
“Since all of these exact physical traits (the yellowish eyes) were present in Madhupiṅgala, he was overcome with profound shame upon hearing the text read aloud. Consequently, he walked out of the assembly hall, went to the revered preceptor Hariṣeṇa, and initiated himself into severe ascetical penance (Tapa).
Upon learning of this, and seeing their desired objective so perfectly fulfilled, King Sagara, his prime minister Viśvabhū, and all the other men of deceitful intent were filled with immense joy.” ॥ 236-237 ॥
श्लोक ( Shlok ) 238
सन्तस्तद्वान्धवाश्चान्ये विषादमगमँस्तदा । न पश्यन्त्यर्थिनः पापं वञ्चनासञ्चितं महत् ॥ २३८॥
मधुपिङ्गलके भाई-बन्धुओंको तथा अन्य सज्जन मनुष्योंको उस समय दुःख हुआ। देखो स्वार्थी मनुष्य दूसरोंको ठगनेसे उत्पन्न हुए बड़े भारी पापको नहीं देखते हैं ।॥ २३८ ॥
“At that moment, the kinsmen and brothers of Madhupiṅgala, along with all other noble and righteous people (Sajjana), were filled with deep sorrow. Behold! Selfish and greedy individuals fail to see the colossal, heavy sin (Pāpa) generated by deceiving and cheating others.” ॥ 238 ॥
श्लोक ( Shlok ) 239 – 240
अथ कृत्वा महापूजां दिनान्यष्टौ जिनेशिनाम् । तदन्तेऽभिषवं चैनां सुलसां कन्यकोत्तमाम् ॥ २३९ ॥ स्नातामलंकृतां शुद्धतिथिवारादिसन्निधौ । पुरोधा रथमारोप्य नीत्वा चारुभटावृताम् ॥ २४० ॥
इधर राजा सुयोधनने आठ दिनतक जिनेन्द्र भगवान्की महापूजा की, और उसके अन्त में अभिषेक किया। तदनन्तर उत्तम कन्या सुलसाको स्नान कराया, आभूषण पहिनाये, और शुद्ध तिथि वार आदिके दिन अनेक उत्तम योद्धाओंसे घिरी हुई उस कन्याको पुरोहित रथमें बैठाकर स्वयंवर-मण्डपमें ले गया ॥ २३९-२४० ॥
“Meanwhile, King Suyodhana organized a grand, eight-day festival of supreme worship (Mahāpūjā) dedicated to Lord Jinendra, culminating in the sacred ritual anointment (Abhiṣeka).
Following this, the exquisite princess Sulasā was given a ceremonial bath, adorned with magnificent royal ornaments, and on a highly auspicious day and astrological alignment (Tithi-Vāra), she was escorted into the Svayaṃvara pavilion. Surrounded by a massive guard of exceptional warriors, the royal priest seated her inside a grand chariot to lead her to the assembly.” ॥ 239-240 ॥
श्लोक ( Shlok ) 241 – 242
नृपान् भद्रासनारूढान् स स्वयंवरमण्डपे । यथाक्रमं विनिर्दिश्य कुलजात्यादिभिः पृथक् ॥ २४१ ॥ व्यरमत् सा समासक्ता साकेतपुरनायकम् । अकरोत्कण्ठदेशे तं मालालंकृतविग्रहम् ॥ २४२ ॥
वहाँ अनेक राजा उत्तम उत्तम आसनोंपर समारूढ़ थे । पुरोहित उनके कुल जाति आदिका पृथक् पृथक् क्रम पूर्वक निर्देश करने लगा परन्तु सुलसा अयोध्याके राजा सगरमें आसक्त थी अतः उन सब राजाओंको छोड़ती हुई आगे बढ़ती गई और सगरके गलेमें ही माला डालकर उसका शरीर मालासे अलंकृत किया ।। २४१-२४२ ।।
“In that grand assembly hall, numerous kings sat enthroned upon exquisite, magnificent seats. The royal priest began to systematically introduce each king, detailing their noble lineage (Kula), caste/dynasty (Jāti), and virtues one by one.
However, because Sulasā’s heart was completely devoted to King Sagara of Ayodhyā, she looked past all those other kings, leaving them behind as she moved forward. Stepping right up to Sagara, she placed the bridal garland (Varamālā) around his neck, beautifully adorning his body with it.” ॥ 241-242 ॥
श्लोक 243 से 254
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ तीर्थंकर पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ तीर्थकर पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ तीर्थकर, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125
मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 135 | श्लोक 136 से 152 | श्लोक 153 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 231
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |