मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 42 | श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 63 to 71
श्लोक ( Shlok ) 63
कल्पानिर्वाणकल्याण मन्वेत्यामरनायकाः । गन्धादिभिः समभ्यर्च्य तत्क्षेत्रमपवित्रयन् ॥ ६३ ॥
उसी समय इन्द्रादि देवोंने स्वर्गसे आकर निर्वाण-कल्याणकका उत्सव किया और गन्ध आदिके द्वारा पूजा कर उस क्षेत्रको पवित्र बना दिया ॥ ६३ ॥
“At that very moment, arriving from heaven, Indra and the other celestial beings celebrated the Nirvana Kalyanaka (the auspicious event of liberation). By performing worship with fragrant materials like sandalwood and incense, they rendered that sacred land eternally pure and holy. || 63 ||”
श्लोक ( Shlok ) 64
जननमृतितरङ्गाद् दुःखदुर्वारिपूर्णा-दुपचितगुणरनो दुःस्पृहावर्तगर्तात् । स कुमतविधुवृद्धाद् ध्याति नावा भवाब्धे-रभजत भुवनाग्रं” विग्रहग्राहमुक्तः ॥ ६४ ॥
जिसमें जन्म-मरणरूपी तरङ्गे उठ रही हैं, जो दुःखरूपी खारे पानीसे लबालब भरा हुआ है, जिसमें खोटी इच्छाएँ रूपी भँवर पड़नेके गड्ढे हैं और जो मिथ्यामतरूपी चन्द्रमासे निरन्तर बढ़ता रहता है ऐसे संसार रूपी सागरसे, गुणरूपी रत्नोंका संचय करनेवाले मल्लिनाथ भगवान् शरीररूपी मगर-मच्छको दूर छोड़कर ध्यानरूपी नावके द्वारा पार हो लोकके अग्रभाग पर पहुँचे थे ॥ ६४ ॥
“From the ocean of worldly existence (Samsara)—in which waves of birth and death are constantly surging, which is filled to the brim with the salty water of misery, which contains deep abysses in the form of whirlpools of evil desires, and which continually swells due to the moon of false doctrines—Lord Mallinatha, the accumulator of the gems of virtues, cast away the crocodile of the physical body and, crossing over by means of the boat of deep meditation, reached the apex of the universe (Loka-agrabhanga). || 64 ||”
श्लोक ( Shlok ) 65
येन शिष्टमुरुवर्त्म ‘विमुक्ते-यं नमन्ति नमिताखिललोकाः ।यो गुणैः स्वयमधारि समग्रैः स श्रियं दिशतु मल्लिरशल्यः ॥६५ ॥
जिन्होंने मोक्षका श्रेष्ठ मार्ग बतलाया था, जिन्हें समस्त लोग नमस्कार करते थे, और जो समग्रगुणोंसे परिपूर्ण थे वे शल्य रहित मल्लिनाथ भगवान् तुम सबके लिए मोक्ष-लक्ष्मी प्रदान करें ।। ६५ ।।
“May Lord Mallinatha—who revealed the supreme path to liberation, who was revered and bowed to by the entire universe, who was completely filled with all divine virtues, and who was entirely free from all spiritual thorns (Shalyas)—bestow upon you all the ultimate wealth of liberation (Moksha-Lakshmi). || 65 ||”
श्लोक ( Shlok ) 66
अजनि वैश्रवणो धरणीश्वरः पुनरनुत्तरनाम्न्यपराजिते ।जितखलाखिलमोहमहारिपु-‘दिशतु मल्लिरसावतुलं सुखम् ॥ ६६ ॥
जो पहले वैश्रवण नामके राजा हुए, फिर अपराजित नामक अनुत्तर विमानमें अहमिन्द्र हुए और फिर अतिशय दुष्ट मोहरूपी महारिपुको जीतनेवाले तीर्थकर हुए वे मल्लिनाथ भगवान् तुम सबके लिए अनुपम सुख प्रदान करें ।। ६६ ।।
“May Lord Mallinatha—who first ruled as the king named Vaishravana, then became an Ahamindra in the supreme celestial realm named Aparajita Anuttara-vimana, and ultimately became the Tirthankara who conquered the exceptionally wicked and grand enemy in the form of delusion (Moha)—bestow upon you all incomparable, peerless bliss. || 66 ||”
श्लोक ( Shlok ) 67 – 68
मल्लेजिनस्य सन्तानेऽभूत्पद्मो नाम चक्रभृत् । द्वीपेऽस्मिन् प्राच्यसौ मेरोः सुकच्छविषये नृपः ॥ ६७ ॥श्रीपुरेशः प्रजापालस्तृतीयेऽजनि जन्मनि । स्वामिप्रकृतिसम्प्रोक्तगुणानामुत्तमाश्रयः ॥ ६८ ॥
अथानन्तर-मल्लिनाथ जिनेन्द्रके तीर्थमें पद्म नामका चक्रवर्ती हुआ है वह अपनेसे पहले तीसरे भवमें इसी जम्बूद्वीपके मेरुपर्वतसे पूर्वकी ओर सुकच्छ देशके श्रीपुर नगर में प्रजापाल नामका राजा था। राजाओंमें जितने प्राकृतिक गुण कहे गये हैं वह उन सबका उत्तम आश्रय था ।। ६७-६८ ॥
“Thereafter, during the era of Lord Mallinatha Jinendra, there arose a Chakravarti (universal monarch) named Padma. In his third previous birth from that time, he was a king named Prajapala in the city of Shripura, which is situated in the Sukachha region to the east of Mount Meru in this very Jambudvipa. He was the supreme abode of all the natural virtues that are ascribed to kings. || 67-68 ||”
श्लोक ( Shlok ) 69
सुराज्ञस्तस्य नाभूवन्राज्येऽस्यायुक्तिका दिभिः । प्रजानां पञ्चभिर्वाधास्तदवर्द्धन्त ताः सुखम् ॥ ६९ ॥
अच्छे राजाके राज्यमें प्रजाको अयुक्ति आदि पाँच तरहकी बाधाओंमेंसे कोई प्रकारकी बाधा नहीं थी अतः समस्त प्रजा सुखसे बढ़ रही थी ।॥ ६९ ॥
“Under the reign of that noble king, the subjects faced none of the five types of afflictions, such as unjust governance (Ayukti); hence, all the subjects were flourishing in absolute happiness. || 69 ||”
श्लोक ( Shlok ) 70
शक्तित्रितयसम्पत्त्या शत्रून्निजित्य जित्वरः । विश्रान्तविग्रहो भोगान् धर्मेणार्थेन चान्वभूत् ॥ ७० ॥
उस विजयीने तीन शक्तिरूप सम्पत्तिके द्वारा समस्त शत्रुओंको जीत लिया था, समस्त युद्ध शान्त कर दिये थे और धर्म तथा अर्थके द्वारा समस्त भोगोंका उपभोग किया था ।। ७० ।।
“That victorious king had conquered all his enemies through the possession of the three components of royal power (Shaktis), pacified all wars, and enjoyed all worldly pleasures in accordance with righteousness (Dharma) and wealth (Artha). || 70 ||”
श्लोक ( Shlok ) 71
स कदाचिद् विलोक्योल्कापातं जातावबोधनः । आपातरमणीयत्वमाकलय्येष्टसम्पदम् ॥ ७१ ॥
किसी समय उल्कापात देखनेसे उसे आत्मज्ञान उत्पन्न हो गया। अब वह इष्ट सम्पत्तियोंको आपात रमणीय – प्रारम्भमें ही मनोहर समझने लगा ।॥ ७१ ॥
“Upon witnessing a falling meteor (Ulkapata) at one time, spiritual self-realization (Atma-jnana) dawned upon him. Now, he began to perceive all desired worldly prosperities as merely fleetingly pleasant—delightful only in the beginning. || 71 ||”
श्लोक 72 से 81
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 192
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