मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 122 to 135
श्लोक ( Shlok ) 122 – 127
ततो भूपतिमासाद्य मन्त्रीतीदमबोधयत् । वारणारेरिवाभीरोरेककस्य गुहाश्रितः ॥ १२२ ॥अनाहतस्वसौख्यस्थ कस्यचिद्वनवासिनः । स्वकार्येष्वतितीव्रस्य जनस्यात्युग्रचेष्टितुः ॥ १२३ ॥ तावर्पितौ मया सोऽपि ‘तावाह कृतदोषयोः । भवतोर्न सुखं स्मार्य दुःखं भोग्यं सुदुष्करम् ॥ १२४ ॥ स्मर्त्तव्या देवता चिरो परलोकनिमित्ततः । इत्येतत्तौ च भद्र त्वं मा कृथाः कष्टदण्डनम् ॥ १२५ ॥ आवाभ्यामावयोः कार्यमित्यात्मकरभाविताम् । वेदनां तीव्रमापाद्य परलोकोन्मुखावुभौ ॥ १२६ ॥ भभूतां तद्विलोक्याहमभिप्रेतार्थनिष्ठितम् । ३ सुविधायागतो देव सिद्धं भवदुदीरितम् ॥ १२७ ॥
तदनन्तर वह मन्त्री राजाके समीप आया और यह-कहने लगा कि कोई एक वनवासी गुहा में रहता था, वह सिंहके समान निर्भय था, उसने अपने सुखोंका अनादर कर दिया था, वह अपने कार्योंमें अत्यन्त तीव्र था और उम्र चेष्टाका धारक था । मैंने वे दोनों ही कुमार उसके लिए सौंप दिये। उस गुहावासीने भी उनसे कहा कि आप दोनोंने बहुत भारी दोष किया है अतः अब आप लोग सुखका स्मरण न करें, अब तो आपको कठिन दुःख भोगना पड़ेगा। परलोकके निमित्त हृदयमें इष्ट देवताका स्मरण करना चाहिये। यह सुनकर उन दोनोंने मुझसे कहा कि ‘हे भद्र ! आप हम दोनोंके लिए कष्टकर दण्ड न दीजिये, यह कार्य तो हम दोनों स्वयं कर रहे हैं अर्थात् स्वयं ही दण्ड लेनेके लिए तत्पर हैं। यह कह वे दोनों अपने हाथसे उत्पादित तीव्र वेदना प्राप्त कर परलोकके लिए तैयार हो गये। यह देख मैं इष्ट अर्थकी पूर्ति कर वापिस चला आया हूं। हे राजन् ! इस तरह आपका अभिप्राय सिद्ध हो गया ।। १२२-१२७ ।।
“Thereafter, the minister approached the king and began to speak, ‘There lived a certain forest-dweller in a cave; he was as fearless as a lion, he had cast aside all his worldly pleasures, he was extremely intense in his actions, and he possessed rigorous endurance. I handed over both the princes to him. That cave-dweller also said to them, “Both of you have committed a very grave offense; therefore, do not think of comfort now, for you will now have to undergo severe hardships. For the sake of the afterlife, you must contemplate your chosen deity in your hearts.” Hearing this, they both said to me, “O gentle sir! Do not inflict painful punishment upon us; we are performing this act ourselves—that is, we are ready to take the punishment upon ourselves.” Saying this, they experienced intense agony generated by their own hands and prepared themselves for the next world. Seeing this, I returned after fulfilling your desired objective. O King! In this manner, your intention has been accomplished.'”122 – 127
श्लोक ( Shlok ) 128
श्रुत्वा तद्वचनं राजा महादुःखाकुलो मनाक् । निवातस्तिमितक्ष्माजसमानो निश्चलं स्थितः ॥ १२८॥
मन्त्रीके वचन सुनकर राजा महादुःखसे व्यग्र हो गया और कुछ देर तक हवारहित स्थानमें निष्पन्द खड़े हुए वृक्षके समान निश्चल बैठा रहा ।॥ १२८ ॥
“Hearing the minister’s words, the King became overwhelmed with profound grief, and for some time, he sat completely motionless, like a tree standing perfectly still in a windless place.”128
श्लोक ( Shlok ) 129
आत्मना मन्त्रिभिर्बन्धुर्जनैश्चालोच्य निश्चितम् । कार्य हितमनुष्ठेयं तत्प्रान्नानुष्ठितं त्वया ॥ १२९ ॥
तदनन्तर राजाने अपने आप, मंत्रियों तथा बन्धुजनों के साथ निश्चय किया और तत्पश्चात् मंत्रीसे कहा कि तुम्हें सदा हितकारी कार्य करना चाहिये, आज जो तुमने कार्य किया है वह पहले कभी भी तुम्हारे द्वारा नहीं किया गया ।। १२९ ।।
“Thereafter, the King deliberated within himself, as well as with his ministers and kinsmen, and then said to the minister, ‘You ought always to perform actions that are beneficial; yet, the deed you have committed today is something that has never been done by you before.'”129
श्लोक ( Shlok ) 130 – 135
करजालमतिक्रान्तमिव सर्पिमहीरुहे । प्रसूनमिव संशुष्कं कार्य कालातिपांतितम् ॥ १३० ॥तत्र शोको न कर्तव्यो वृथेति सचिवोदितम् । श्रुत्वा तद्वचनं ब्रूहि तर्के तद्वृत्तकं कथम् ॥ १३१ ॥ इत्यप्राक्षीत्ततोऽस्याभिप्रायवित्सचिवोऽवदत् । यतयो वनगिर्यद्रिगुहागहनवासिनः ॥१३२ ॥ धैर्यासिधारानिभिन्नकषायविषयद्विषः । स्थूलसूक्ष्मासुभृद्रक्षानितान्तोद्यतवृत्तयः ॥ १३३ ॥ भिया भियेव कोपेन कोपेनेवानिताशयाः । असंयतेषु भोगोपभोगेष्विव निरांदराः ॥ १३४ ॥तेभ्यस्तौ धर्मसद्भावं श्रुत्वा निबिंद्य दीक्षितौ । इति विस्पष्टतद्वाक्यात्परितुष्टो महीपतिः ॥ १३५ ॥
मन्त्रीने कहा कि जिस प्रकार जो किरणोंका समूह अतीत हो चुकता है और जो फूल सांप वाले वृक्षपर लगा-लगा सूख जाता है, उसके विषयमें शोक करना उचित नहीं होता है उसी प्रकार यह कार्य भी अब कालातिपाती – अतीत हो चुका है अतः अब आपको इसके विषयमें शोक नहीं करना चाहिये । मंत्रीके वचन सुनकर राजाने पूछा कि यथार्थ बात क्या है ? तदनन्तर राजाका अभि-प्राय जानने वाला मन्त्री बोला कि वनगिरि पर्वतकी गुफाओं और सघन वनोंमें बहुतसे यति-मुनि रहते हैं उन्होंने अपने धैर्य रूपी तलवारकी धारासे कषाय और विषयरूपी शत्रुओंको जीत लिया है, क्या स्थूल क्या सूक्ष्म – सभी जीवोंकी रक्षा करनेमें वे निरन्तर तत्पर रहते हैं। उनके हृदयसे भय मानो भयसे ही भाग गया है और क्रोध मानो क्रोधके कारण ही उनके पास नहीं आता है। वे भोग-उपभोगके पदार्थोंमें असंयमियोंके समान सदा निरादर करते रहते हैं। वे दोनों ही कुमार उन यतियोंसे धर्मका सद्भाव सुनकर विरक्त हो दीक्षित हो गये हैं। इस प्रकार मंत्रीके स्पष्ट वचन सुनकर राजा बहुत ही संतुष्ट हुआ ।। १३०-१३५ ।।
“The minister said, ‘Just as it is not fitting to grieve over a ray of light that has already passed, or over a flower that has withered away while remaining upon a venomous tree, in the exact same manner, this matter is now a thing of the past—it has run its course. Therefore, you should no longer grieve over it.’ Hearing these words of the minister, the King asked, ‘What is the absolute truth?’ Thereafter, the minister, understanding the King’s true intention, replied, ‘Numerous ascetics and sages reside in the caves and dense forests of the Vangiri mountain. They have conquered the enemies of passions and worldly desires with the sharp edge of their sword of fortitude. They are continuously devoted to protecting all living beings, whether large or microscopic. It is as if fear itself has fled from their hearts out of fear, and anger does not approach them due to its own anger. They constantly look upon the objects of worldly enjoyment with disdain, unlike non-ascetic people. Hearing the true essence of religion from those sages, both the princes became detached from worldly life and received initiation into the ascetic order.’ Hearing these clear words of the minister, the King was deeply satisfied and filled with immense joy.”130 – 135
श्लोक 136 से 152
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मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 33 | श्लोक 34 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121
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