मुनिसुव्रत तीर्थकर , हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 67 –श्लोक 354 से 370 | श्लोक 371 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 426
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 67- shlok 427 to 443
श्लोक ( Shlok ) 427
स्वर्गमस्यैव यागेन’ सजानिः सगरोऽप्यगात् । ज्वलत्प्रदीपमन्येन को दीपेन प्रकाशयेत् ॥ ४२७ ॥
इस पर्वतके बताये यज्ञसे ही राजा सगर अपनी रानी सहित स्वर्ग गया है। जो दीपक स्वयं जल रहा है- स्वयं प्रकाशमान है भला उसे दूसरे दीपकके द्वारा कौन प्रकाशित करेगा ? ॥ ४२७ ॥
“It is solely through the Yajna (sacrifice) prescribed by this Parvata that King Sagara, along with his queen, ascended to heaven. As for a lamp that is already burning by itself—one that is inherently self-luminous—who indeed would try to illuminate it with another lamp? || 427 ||”
श्लोक ( Shlok ) 428 – 434
पर्वतोक्त’ भयं हित्वा कुरुध्वं स्वर्गसाधनम् । इति हिंसानृतानन्दाद् वध्वायुर्नारकं प्रति ॥ ४२८ ॥ मिथ्यापापापवादाभ्यामभीरुरभणीदिदम् । अहो महीपतेर्वक्त्रादपूर्व घोरमीदृशम् ॥ ४२९ ॥ निर्यातमिति वैषम्यादुक्त नारदतापसैः ४ । आक्रोशदम्बरं नद्यः प्रतिकूलजलस्नवाः ॥ ४३० ॥ सद्यः सरांसि शुष्काणि रक्तवृष्टिरनारता । तीब्रांशोरंशवो मन्दा विश्वाशाश्च मलीमसाः ॥४३१॥ बभूवुः प्राणिनः कम्पमादधुर्भयविह्नलाः । तदा महाध्वनिर्धात्री द्विधाभेद “मुपागता ॥ ४३२ ॥ वसोस्तस्मिन् महारन्ध्र न्यमज्जत्सिंहविष्टरम् । तद्दष्ट्वा देवविद्याधरेशा घनपथे स्थिताः ॥ ४३३ ॥ अतिक्रम्यादिमं मार्ग वसुराजमहामते । धर्मविध्वंसनं मार्ग माभिधा इत्यघोषयन् ॥ ४३४ ॥
इसलिए तुम लोग भय छोड़कर जो पर्वत कह रहा है वही करो, वही स्वर्गका साधन है इस प्रकार हिंसानन्दी और मृषानन्दी रौद्र ध्यानके द्वारा राजा वसुने नरकायुका बन्ध कर लिया तथा असत्य भाषणके पाप और लोकनिन्दासे नहीं डरने वाले राजा वसुने उक्त वचन कहे। राजा वसुकी यह बात सुनकर नारद और तपस्वी कहने लगे कि आश्चर्य है कि राजाके मुखसे ऐसे भयंकर शब्द निकल रहे हैं इसका कोई विषम कारण अवश्य है। उसी समय आकाश गरजने लगा, नदियोंका प्रवाह उलटा बहने लगा, तालाब शीघ्र ही सूख गये, लगातार रक्तकी वर्षा होने लगी, सूर्यकी किरणें फीकी पड़ गई, समस्त दिशाएँ मलिन हो गई, प्राणी भयसे विह्वल होकर काँपने लगे, बड़े जोरका शब्द करती हुई पृथिवी फटकर दो टूक हो गई और राजा वसुका सिंहासन उस महागर्तमें निमग्न हो गया। यह देख आकाशमार्गमें खड़े हुए देव और विद्याधर कहने लगे कि हे बुद्धिमान् राजा वसु ! सनातन मार्गका उल्लंघन कर धर्म का विध्वंस करने वाले मार्गका निरूपण मत करो ॥४२८-४३४।।
“Therefore, cast aside all fear and do exactly what Parvata is telling you; that alone is the means to attain heaven.’
By uttering these words through Himsanandi (delighting in violence) and Mrishanandi (delighting in falsehood) types of Raudra Dhyana (dark/wrathful meditation), King Vasu bound himself to a lifespan in hell (Narakayu). Completely unafraid of the sin of speaking lies or the condemnation of the world, the King spoke those words.
Hearing this statement from King Vasu, Narada and the ascetics said, ‘How astonishing it is that such dreadful words are issuing from the mouth of the King! There must certainly be some sinister, underlying cause behind this.’
At that very moment, the heavens began to thunder, the currents of rivers began to flow backward, lakes quickly dried up, a continuous rain of blood began to fall, the rays of the sun grew pale, and all directions became dark and polluted. Living beings began to tremble, overwhelmed with terror; with a thunderous roar, the earth split into two, and King Vasu’s throne sank deep into that massive abyss.
Seeing this, the Devas (gods) and Vidyadharas (celestial beings) standing in the sky cried out, ‘O wise King Vasu! Do not violate the eternal path (Sanatana Marga) to advocate a path that utterly destroys righteousness (Dharma)!’ || 428-434 ||”
श्लोक ( Shlok ) 435 – 439
वसुराजं च सिंहासननिमज्जनात् । परिम्लानमुखौ दृष्ट्वा महाकालस्य किङ्कराः ॥ ४३५ ॥ तापसाकारमादाय भयं माऽत्र स्म गच्छतम् । इत्यात्मोत्थापितं चास्या दर्शयन् हरिविष्टरम् ॥४३६ ॥नृपोऽप्यहं कथं तत्त्वविद्विभेम्यमृषं वचः । पर्वतस्यैव निश्चिन्वन्नित्याकण्ठं निमग्नवान् ॥ ४३७ ॥अनेनेयमवस्थाभून्मिथ्यावादेन भूपते । त्यजेममिति सम्प्रार्थितोऽपि यत्नेन साधुभिः ॥ ४३८ ॥तथापि वशमेवाज्ञः सन्मार्ग प्रतिपादयन् । भुवा कुपित एवासौ निगीर्णोऽन्त्यामगात्क्षितिम् ॥४३९ ॥
पृथिवीमें सिंहासन घुसनेसे पर्वत और राजा वसुका मुख फीका पड़ गया। यह देख महाकालके किंकर ताप-सियोंका वेष रखकर कहने लगे कि आप लोग भयको प्राप्त न हों। यह कहकर उन्होंने वसुका सिंहा-सन अपने आपके द्वारा उठाकर लोगोंको दिखला दिया । राजा वसु यद्यपि सिंहासनके साथ नीचे धँस गया था तथापि जोर देकर कहने लगा कि मैं तत्त्वोंका जानकार हूँ अतः इस उपद्रवसे कैसे डर सकता हूं ? मैं फिर भी कहता हूं कि पर्वतके वचन ही सत्य हैं। इतना कहते ही वह कण्ठ पर्यन्त पृथिवीमें धँस गया । उस समय साधुओंने – तापसियोंने बड़े यत्नसे यद्यपि प्रार्थना की थी कि हे राजन् ! तेरी यह अवस्था असत्य भाषणसे ही हुई है इसलिए इसे छोड़ दे तथापि वह अज्ञानी यज्ञ-को ही सन्मार्ग बतलाता रहा। अन्तमें पृथिवीने उसे कुपित होकर हौ मानो निगल लिया और वह भरकर सातवें नरक गया ॥४३५-४३९।॥
“As the throne sank into the earth, the faces of Parvata and King Vasu turned pale with fear. Seeing this, the servants of Mahakala (the god of death/ruin) assumed the guise of ascetics and said, ‘Do not be afraid!’ Saying this, they lifted Vasu’s throne using their own power and showed it to the people.
Even though King Vasu had sunk deep into the earth along with his throne, he still insisted loudly, ‘I am a knower of the true principles; therefore, how can I be frightened by this calamity? I declare once again that the words of Parvata alone are the truth!’
The moment he said this, he sank into the earth right up to his neck. At that time, the saints and ascetics made great efforts to plead with him, saying, ‘O King! This plight of yours has been caused solely by your untruthful speech; therefore, renounce it!’ Yet, that ignorant king continued to proclaim the violent Yajna (sacrifice) as the true path.
In the end, as if completely enraged, the earth swallowed him entirely, and upon his death, he descended into the seventh hell. || 435-439 ||”
श्लोक ( Shlok ) 440 – 443
अथासुरो जगत्प्रत्ययायादाय नरेन्द्रयोः । दिव्यं रूपमवापावावां यागश्रद्धया दिवम् ॥ ४४० ॥नारदोक्तमपाकर्ण्यमित्युक्त्वापददृश्यत्नाम् । शोकाश्चर्यवतागात्स्वर्वसुर्नहि महीमिति ॥ ४४१ ॥संविसंवदमानेन, जनेन महता सह । प्रयागे विश्वभूर्गत्वा राजसूयविधिं व्यधात् ॥ ४४२ ॥महापुराधिपाद्याश्च निन्दन्तो जनमूढताम् । परमब्रह्मनिर्दिष्टमार्गरक्ता मनाक् स्थिताः ॥ ४४३ ॥
तदनन्तर वह असुर जगत्को विश्वास दिलानेके लिए राजा सगर और वसुका सुन्दर रूप धारण कर कहने लगा कि हम दोनों नारदका कहा न सुनकर यश्चकी श्रद्धासे ही स्वर्गको प्राप्त हुए हैं। इस प्रकार कहकर वह अदृश्य हो गया। इस घटनासे लोगोंको बहुत शोक और आश्चर्य हुआ। उनमें कोई कहता था कि राजा सगर स्वर्ग गया है और कोई कहता था कि नहीं, नरक गया है। इस तरह विवाद करते हुए विश्वम्भू मन्त्री अपने घर चला गया । तदनन्दर प्रयागमें उसने राजसूय यज्ञ किया। इसपर महापुर आदि नगरोंके राजा मनुष्योंकी मूढ़ताकी निन्दा करने लगे और परम ब्रह्म-परमात्माके द्वारा बतलाये मार्गमें तल्लीन होते हुए थोड़े दिन तक यों ही ठहरे रहे ॥ ४४०-४४३ ॥
“Thereafter, in order to make the world believe [the lie], that demon (Asura) assumed the beautiful forms of King Sagara and King Vasu and declared, ‘By disregarding the words of Narada and possessing absolute faith in the sacrificial rituals (Yajna), we both have attained heaven.’ Having spoken thus, he vanished.
The people were struck with great grief and astonishment by this incident. Among them, some claimed that King Sagara had indeed gone to heaven, while others argued that no, he had descended to hell. Debating in this manner, the minister Vishvabhu returned to his home.
Subsequently, he performed a Rajasuya Yajna in Prayaga. At this, the kings of cities like Mahapura and others began to condemn the foolishness of men; deeply immersing themselves in the path shown by the Supreme Lord (Param Brahma-Paramatma), they remained there in that manner for a few days. || 440-443 ||”
श्लोक 444 से 461
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